श्री वासुपूज्य जिनेन्द्र, द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण का वर्णन पर्व 58 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 32
English translation of Uttar Puran parv 58- shlok 33 to 41
श्लोक ( Shlok ) 33 – 35
अस्तु कायः शुचिः स्थास्नुः प्रेक्षणीयो निरामयः । आयुश्चिरमनाबाधं सुखं 3 सन्ततसाधनम् ॥ ३३ ॥किन्तु ध्रुवो वियोगोऽत्र रागात्मकमिदं सुखम् । रागी बन्नाति कर्माणि बन्धः संसारकारणम् ॥ ३४ ॥चतुर्गतिमयः सोऽपि ताश्च दुःखसुखावहाः । ततः किममुनेत्येतत्त्याज्यमेव विचक्षणैः ॥ ३५ ॥
शरीर भला ही पवित्र हो, स्थायी हो, दर्शनीय-सुन्दर हो, नीरोग हो, आयु चिरकाल तक बाधासे रहित हो, और सुखके साधन निरन्तर मिलते रहें परन्तु यह निश्चित है कि इन सबका वियोग अवश्यंभावी है, यह इन्द्रियजन्य सुख रागरूप है, रागी जीव कर्मोंको बाँधता है, बन्ध संसारका कारण है, संसार चतुर्गति रूप है और चारों गतियाँ दुःख तथा सुखको देनेवाली हैं अतः मुझे इस संसारसे क्या प्रयोजन है ? यह तो बुद्धिमानोंके द्वारा छोड़ने योग्य ही है ॥ ३३-३५॥
“Even if the body is pure, enduring, beautiful to behold, free from disease, and blessed with a long life without obstacles; even if the means of pleasure are constantly available—it is certain that separation from all of these is inevitable.
These sensory pleasures are forms of attachment (Raga). A soul filled with attachment binds itself to Karma, and this bondage is the root cause of the cycle of rebirth (Samsara). This cycle consists of the four realms of existence (Chaturgati), all of which bring a mixture of pain and pleasure.
Therefore, what purpose does this world serve for me? To the wise, it is something to be renounced.” 33 – 35
श्लोक ( Shlok ) 36
इति चिन्तयतस्तस्य स्तवो लौकान्तिकैः कृतः । सुरा निष्क्रमणस्नानभूषणाद्युत्सवं व्यधुः ॥ ३६ ॥
इधर भगवान् ऐसा चिन्तवन कर रहे थे उधर लौकान्तिक देवोंने आकर उनकी स्तुति करना प्रारम्भकर दी । देवोंने दीक्षा-कल्याणकके समय होनेवाला अभिषेक किया, आभूषण पहिनाये तथा अनेक उत्सव किये ।। ३६ ।।
“While the Lord was reflecting in this manner, the Laukantika Devas (celestial beings) arrived and began to sing His praises. At this time of the Diksha-Kalyanaka (the auspicious ceremony of renunciation), the Devas performed the ritual anointing (Abhisheka), adorned Him with ornaments, and celebrated with great festivities.”36
श्लोक ( Shlok ) 37 – 38
शिबिकां देवसंरूढामारुह्य पृथिवीपतिः । वने मनोहरोद्याने चतुर्थोपोषितं वहन् ॥ ३७ ॥विशाखर्भे चतुर्दश्यां साथाद्धे कृष्णफाल्गुने । सामायिकं समादाय तुर्यज्ञानोऽप्यभूदनु ॥ ३८ ॥
महाराज वासुपूज्य देवोंके द्वारा उठाई गई पालकी पर सवार होकर मनोहरो-द्यान नामक वनमें गये और वहाँ दो दिनके उपवासका नियम लेकर फाल्गुनकृष्ण चतुर्दशीके दिन सायंकालके समय विशाखा नक्षत्रमें सामायिक नामका चारित्र ग्रहण कर साथ ही साथ मनःपर्यय-ज्ञानके धारक भी हो गये ।। ३७-३८ ॥
“Seated upon a palanquin carried by the celestial beings, Maharaja Vasupujya proceeded to the forest known as Manohara-Udyan. There, having taken a vow of fasting for two days, he embraced the conduct of Samayika (vows of equanimity and renunciation) during the evening of the fourteenth day of the dark half of the month of Phalguna (Phalguna-Krishna-Chaturdashi), under the Vishakha constellation. At that very moment, he also attained Manah-Paryaya-Jnana (the supernatural knowledge of the thoughts of others).” 37 – 38
श्लोक ( Shlok ) 39
सह तेन महीपालाः षट्सप्ततिमिताहिताः । प्रव्रज्यां प्रत्यपद्यन्त परमार्थविदो मुदा ॥ ३९ ॥
उनके साथ परमार्थको जाननेवाले छह सौ छिहत्तर राजाओंने भी बड़े हर्षसे दीक्षा प्राप्त की थी ॥ ३९ ॥
“Along with Him, six hundred and seventy-six kings, who were seekers of the ultimate truth (Paramartha), also embraced initiation (Diksha) with great joy.”39
श्लोक ( Shlok ) 40
द्वितीये दिवसेऽविक्षन् महानगरमन्धसे । सुन्दराख्यो नृपस्तस्मै सुवर्णाभोऽदिताशनम् ॥ ४० ॥
दूसरे दिन उन्होंने आहारके लिए महानगर में प्रवेश किया । वहाँ सुवर्णके समान कान्तिवाले सुन्दर नामके राजाने उन्हें आहार दिया ।। ४० ।।
“On the following day, He entered the great city to seek alms (Aahara). There, a king named Sundara, whose radiance was as brilliant as pure gold, offered Him His first meal.”40
श्लोक ( Shlok ) 41
आश्चर्यपञ्चर्क चापि तेन छान्द्मस्थ्यवत्सरे । गते श्रीवासुपूज्येशः स्वदीक्षावनमागतः ॥ ४१ ॥
और पञ्चाश्चर्य प्राप्त फिये । तदनन्तर छद्मस्थ अवस्थाका एक वर्ष बीत जानेपर किसी दिन वासुपूज्य स्वामी अपने दीक्षा-वनमें आये ।। ४१ ।।
“And he received the five wonders (Panchashcharya). Thereafter, when one year had passed in the state of Chadmastha (the stage of spiritual practice before attaining omniscience), Lord Vasupujya returned one day to the same forest where he had taken his initiation.”41
श्लोक 42 से 53
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