शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्तीका पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 63- shlok 193 to 201
श्लोक ( Shlok ) 193
हिमवान् महाहिमवान् निषधो मन्दरो महान् । नीलो रुक्मी शिखर्याख्यो विख्याताः कुलपर्वताः॥ १९३॥
हिमवान्, महाहिमवान्, निषध, महामेरु, नील, रुक्मी और शिखरी ये सात प्रसिद्ध कुलाचल हैं १९३ ॥
“Himavan, Maha-himavan, Nishadha, Mahameru, Nila, Rukmi, and Shikharin—these are the seven renowned Kulachalas (great mountain ranges).” [193]
श्लोक ( Shlok ) 194
इमा रम्या महानद्यश्चतुर्दशसमुद्रगाः । पद्मादिहदसम्भूता नानास्त्रोतस्विनीयुताः ॥ १९४ ॥
ये पद्मआदि सरोवरोंसे निकलने वाली, समुद्रकी ओर जानेवाली, अनेक नदियोंसे युक्त, मनोहर चौदह महानदियाँ हैं, ॥ १९४॥
“These are the fourteen enchanting great rivers (Mahanadi), which originate from the sacred lakes such as Padma, flow through numerous tributary streams, and steadily make their way toward the ocean.” [194]
श्लोक ( Shlok ) 195 – 196
गङ्गा सिन्धुश्च रोहिच्च रोहितास्या हरित्परा । हरिकान्ता परा सीता सीतोदा चाष्टमी नदी ॥ १९५ ॥नारी व नरकान्ता व कूलान्ता स्वर्णसंशिका । ततोऽन्या रूप्यकूलाख्या रक्ता रक्तोदया सह ॥ १९६॥
गङ्गा, सिन्धु, रोहित, रोहितास्या, हरित्, हरिकान्ता, सीता, सीतोदा, नारी, नरकान्ता, सुवर्णकूला, रूप्यकूला, रक्ता और रक्तोदा ये उनके नाम हैं ।। १९५-१९६ ॥
“Ganga, Sindhu, Rohita, Rohitasya, Harit, Harikanta, Sita, Sitoda, Nari, Narakanta, Suvarnakula, Rupyakula, Rakta, and Raktoda—these are their names.” [195-196]
Cosmic Geography Insight:
These fourteen rivers flow in pairs across the seven regions (Kshetras) mentioned in the previous verses:
- Bharata Region: Ganga & Sindhu
- Haimavata Region: Rohita & Rohitasya
- Harivarsha Region: Harit & Harikanta
- Videha Region: Sita & Sitoda (flowing through the central land where Tirthankaras reside)
- Ramyaka Region: Nari & Narakanta
- Hairanyavata Region: Suvarnakula & Rupyakula
- Airavata Region: Rakta & Raktoda
श्लोक ( Shlok ) 197 – 199
ह्रदाः षोडशसङ्ख्याः स्युः कुशेशयविभूषिताः । पश्य पश्नो महापश्नस्तिगन्छः केसरी महा-॥ १९७ ॥पुण्डरीकस्तथा पुण्डरीको निषधनामकः । परो देवकुरुः सूर्यः “सुलसो दशमः स्मृतः ॥ १९८ ॥विद्युत्प्रभाङ्कयः ख्यातो नीलवान् कुरुरुत्तरः । चन्द्रश्चैरावतो माल्यवांश्च विख्यातसंज्ञकः ॥ १९९ ॥
देखो, कमलोंसे सुशोभित ये सोलह हृद-सरोवर हैं। पद्म, महापद्म, तिगव्छ, केसरी, महा-पुण्डरीक, पुण्डरीक, निषध, देवकुरु, सूर्य, दशवाँ सुलस, विद्युत्प्रभ, नीलवान्, उत्तरकुरु, चन्द्र, ऐरावत और माल्यवान् ये उन सोलह हृदोंके नाम हैं ॥ १९७-१९९।॥
“Behold! These are the sixteen Hrada (lakes), brilliantly adorned with lotuses. Padma, Mahapadma, Tiganchha, Kesari, Maha-pundarika, Pundarika, Nishadha, Devakuru, Surya, the tenth Sulasa, Vidyutprabha, Nilavan, Uttarakuru, Chandra, Airavata, and Malyavan—these are the names of those sixteen lakes.” [197-199]
श्लोक ( Shlok ) 200
तेषामाथेषु षट्सु स्युस्ताः श्रीह्रीधुतिकीर्तयः । बुद्धिर्लक्ष्मीश्च शक्रस्य व्यन्तर्यो वल्लभाङ्गनाः ॥ २०० ॥
इनमें से आदिके छह हृदोंमें क्रमसे श्री, १ विधीयते ल० । २ बिभुक्ताः ल० । ३ रोहिताख्या ल० । ४ सुवर्ण ल० । ५ सुलभोः ल० ।ही, धृति, कीर्ति, बुद्धि और लक्ष्मी ये इन्द्रकी वल्लभा व्यन्तर देवियाँ रहती हैं ।॥ २०० ॥
“Among these, within the first six lakes, reside respectively Sri, Hri, Dhriti, Kirti, Buddhi, and Lakshmi—the beloved Vyantara goddesses of Indra.” [200]
श्लोक ( Shlok ) 201
नागाः शेषेषु तत्तामधेयाः सन्ततवासिनः । पश्यामी च महाभाग प्रेक्ष्या वक्षारपर्वताः ॥ २०१ ॥
बाकीके दश हृदोंमें उसी नामके नागकुमारदेव सदा निवास करते हैं। हे महाभाग ! इधर देखो, ये देखने योग्य वक्षार पर्वत हैं ॥ २०१ ॥
“Within the remaining ten lakes, the Nagakumara deities of the exact same names eternally reside. O Noble One! Look over here; these are the magnificent Vakshara mountains, which are truly a sight to behold.” [201]
श्लोक 202 से 221
उत्तरपुराण Uttarapurana home page –
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130
अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 82 | श्लोक 83 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 |श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 283 | श्लोक 284 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 |श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 363 | श्लोक 364 से 371 | श्लोक 372 से 382 | श्लोक 383 से 390 | श्लोक 391 से 401 | श्लोक 402 से 411 | श्लोक 412 से 421 | श्लोक 422 से 433 | श्लोक 434 से 442 | श्लोक 443 से 451 | श्लोक 452 से 462 | श्लोक 463 से 472 | श्लोक 473 से 481 | श्लोक 482 से 491 | श्लोक 492 से 501 | श्लोक 502 से 513
शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्तीका पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 |श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 102 | श्लोक 103 से 114 | श्लोक 115 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192
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