कुन्थुनाथ तीर्थकर तथा चक्रवर्ती का पुराण वर्णन पर्व 64 – श्लोक 1 से 11
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 64- shlok 12 to 21
श्लोक ( Shlok ) 12 – 13
इह जम्बूमति द्वीपे भरते कुरुजाङ्गले । ‘हस्तिनाख्यपुराधीशः कौरवः काश्यपान्वयः ॥ १२ ॥सूरसेनो महाराजः श्रीकान्ताऽस्याग्रवल्लभा । देवेभ्यो वसुधारादिपूजामाप्तवती सती ॥ १३ ॥
इसी जम्बूद्वीपके भरतक्षेत्र सम्बन्धी कुरुजांगल देशमें हस्तिनापुर नामका नगर है उसमें कौरववंशी काश्यपगोत्री महाराज सूरसेन राज्य करते थे। उनकी पट्टरानीका नाम श्रीकान्ता था । उस पतिव्रताने देवोंके द्वारा की हुई रत्नवृष्टि आदि पूजा प्राप्त की थी ।। १२-१३ ॥
“In the Kurujangala country belonging to the Bharata-kshetra of this very Jambudvipa, there is a city named Hastinapur. In it, King Surasena—who belonged to the Kaurava lineage and the Kashyapa clan—used to rule. The name of his chief queen was Shrikanta.
Being completely devoted to her husband (Pativrata), she received divine honors from the heavenly deities, including a shower of precious gems (Ratnavrishti).”12 – 13
श्लोक ( Shlok ) 14 – 15
‘भागे मनोहरे यामे दशम्यां निशि पश्चिमे । श्रावणे बहुले पक्षे नक्षत्रे कृत्तिकाह्वये ॥ १४ ॥सर्वार्थसिद्धिदेवस्य स्वर्गावतरणक्षणे । दृष्टषोडशसुस्वप्ना गजं वक्त्रप्रवेशिनम् ॥ १५ ॥
श्रावण कृष्ण दशमीके दिन रात्रिके पिछले भाग सम्बन्धी मनोहर पहर और कृत्तिका नक्षत्रमें जब सर्वार्थसिद्धिके उस अहमिन्द्रकी आयु समाप्त होनेको आई तब उसने सोलह स्वप्न देखकर अपने मुँह में प्रवेश करता हुआ एक हाथी देखा ॥ १४-१५ ॥
“On the tenth day of the dark fortnight of the month of Shravana (Shravana Krishna Dashami), during the delightful final watch of the night and under the auspicious constellation of Krittika, as the lifespan of that Ahamindra deity from Sarvarthasiddhi neared its end, Queen Shrikanta witnessed sixteen highly auspicious dreams, culminating in the vision of a magnificent elephant entering her mouth.”14 – 15
श्लोक ( Shlok ) 16 – 19
निशम्य यामभेर्यादिमङ्गलध्वनिबोधिता । कृतनित्यक्रिया स्नात्वा धृतमङ्गलमण्डना ॥ १६ ॥आप्तैः कतिपयैरेव वृत्ता विद्युद्विलासिनी । द्योतयन्ती सदोव्योम साक्षालक्ष्मीरिवापरा ॥ १७ ॥कृतानुरूपविनया भर्तुरर्द्धासने स्थिता । स्वप्नावलीं निवेद्यास्माद्विदित्वावधिवीक्षणात् ॥ १८ ॥फलान्यनुक्रमाचेषां विकसद्वदनाम्बुजा । नलिनीवांशुसंस्पर्शादुष्णांशोरतुषत्तराम् ॥ १९ ॥
प्रातःकाल भेरी आदिके माङ्गलिक शब्द सुनकर जगी, नित्य कार्यकर स्नान किया, माङ्गलिक आभूषण पहिने और कुछ प्रामाणिक लोगोंसे परिवृत होकर बिजलीके समान सभारूपी आकाशको प्रकाशित करती हुई दूसरी लक्ष्मीके समान राजसभामें पहुँची। वहाँ वह अपनी योग्यताके अनुसार विनयकर पतिके अर्धासनपर विराजमान हुई। अवधि-ज्ञानरूपी नेत्रोंको धारण करनेवाले पतिको सब स्वप्न सुनाये और उनसे उनका फल मालूम किया। अनुक्रमसे स्वप्नोंका फल जानकर उसका मुखकमल इस प्रकार खिल उठा जिस प्रकार कि सूर्यकी किरणोंके स्पर्शसे कमलिनी खिल उठती है ।। १६-१९ ॥
“Awakened in the morning by the auspicious sounds of kettle-drums (Bheri) and other instruments, Queen Shrikanta performed her daily routine, bathed, and adorned herself with auspicious ornaments. Surrounded by several authoritative and trusted attendants, she entered the royal court like a second goddess Lakshmi, illuminating the assembly-sky with her lightning-like splendor.
There, out of profound humility and in accordance with royal etiquette, she seated herself upon half of her husband’s throne (Ardhasana). She then narrated all her dreams to her husband, who possessed the divine eye of clairvoyance (Avadhi-jnana), and sought to know their meaning from him. Upon gradually learning the grand interpretation of her dreams, her lotus-like face blossomed with joy, just as a lotus patch blooms at the gentle touch of the sun’s first rays.”16 – 19
श्लोक ( Shlok ) 20
तदैवानिमषाधीशाः कल्याणाभिषवं तयोः । विधाय वहुधाभ्यर्च्य तोषयित्वा ययुदिंवम् ॥ २० ॥
उसी समय देवोंने महाराज शूरसेन और महारानी श्रीकान्ताका गर्भकल्याणक सम्बन्धी अभिषेक किया, बहुत प्रकारकी पूजा की और सन्तुष्ट होकर स्वर्गकी ओर प्रयाण किया ॥ २० ॥
“At that very moment, the celestial deities performed the Garbha-kalyanaka (conception ceremony) anointment of King Surasena and Queen Shrikanta. They offered various kinds of worship and rituals, and having attained deep spiritual satisfaction, they departed back toward the heavens.”20
श्लोक ( Shlok ) 21
शुक्तिर्मुक्ताविशेषेण नाभूत्सा तेन गर्भिणी । क्रोडीकृता मृताभीषुमेघरेखेव चाबभौ ॥ २१ ॥
जिस प्रकार मुक्ताविशेषसे सीप गर्भिणी होती है उसी प्रकार उस पुत्रसे रानी श्रीकान्ता गर्भिणी हुई थी और जिस प्रकार चन्द्रमाको गोदीमें धारण करनेवाली मेघोंकी रेखा सुशोभित होती है उसी प्रकार उस पुत्रको गर्भमें धारण करती हुई रानी श्रीकान्ता सुशोभित हो रही थी ॥ २१ ॥
“Just as an exceptional oyster becomes pregnant with a rare, precious pearl, Queen Shrikanta became pregnant with that divine son. And just as a silver streak of clouds is beautifully adorned when cradling the glowing moon in its lap, Queen Shrikanta shone with magnificent splendor while bearing that son within her womb.”21
श्लोक 22 से 31
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