चन्द्रप्रभ पुराण का वर्णन पर्व 54 – श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111
English translation of Uttar Puran parv 54- shlok 112 to 121
श्लोक ( Shlok ) 112
धनं दाने मतिर्धर्भे शौर्य भूताभिरक्षणे । आयुः सुखे तनुर्भीगे तस्य वृद्धिमवाश्विरम् ॥ ११२ ॥
उसका धन दान देनेमें, बुद्धि धार्मिक कार्योंमें, शूरवीरता प्राणियों की रक्षामें, आयु सुखमें और शरीर भोगोपभोगमें सदा वृद्धिको प्राप्त होता रहता था ।।११२॥
His wealth was dedicated to charity, his intellect to religious activities, his valor to the protection of living beings, his life to happiness, and his body to the enjoyment of comforts—all of which increased continually.112
श्लोक ( Shlok ) 113
अपरायत्तमच्छिन्नमबाधमयवर्द्धनम् । गुणान्पुष्णन् वितृष्णः सन् सुखेन सुखमीयिवान् ॥ ११३ ॥
उसके पुण्यकी वृद्धि दूसरेके आधीन नहीं थी, कभी नष्ट नहीं होती थी और उसमें किसी तरहकी बाधा नहीं आती थी। इस प्रकार वह तृष्णारहित होकर गुणोंका पोषण करता हुआ बड़े आराम से सुखको प्राप्त होता था ॥ ११३ ॥
The growth of his merit (Punya) was not dependent on anyone else; it was never exhausted, and it faced no obstacles whatsoever. In this manner, remaining free from cravings (Trishna-rahit) and nurturing virtuous qualities, he experienced supreme happiness with great ease.113
श्लोक ( Shlok ) 114
ऋतं वाचि दया चित्तं धर्मकर्मणि निर्मलः । स्वान् गुणान् वा प्रजाः पाति राजर्षिः केन नास्तु सः ।११४।
उसके वचनोंमें सत्यता थी, चित्तमें दया थी, धार्मिक कार्योंमें निर्मलता थी, और प्रजाकी अपने गुणोंके समान रक्षा करता था फिर वह राजर्षि क्यों न हो ? ॥ ११४ ॥
There was truth in his speech, compassion in his heart, and purity in his religious endeavors. He protected his subjects as dearly as his own virtues; why then should he not be considered a Rajarshi (a Royal Sage)?114
श्लोक ( Shlok ) 115
मन्ये नैसर्गिकं तस्य सौजन्यं कथमन्यथा । प्राणहारिणि पापेऽपि रिपौ नोपैति विक्रियाम् ॥ ११५ ॥
मैं तो ऐसा मानता हूं कि सुजनता उसका स्वाभाविक गुण था। यदि ऐसा न होता तो प्राण हरण करनेवाले पापी शत्रु पर भी वह विकारको क्यों नहीं प्राप्त होता ॥ ११५ ॥
I believe that nobility was his inherent nature. If it were not so, why would he remain unmoved by anger or malice—even toward a sinful enemy who sought to take his life?115
श्लोक ( Shlok ) 116
न हि मूलहरः कोऽपि नापि कोऽपि कदर्यकः । तादात्विकोऽपि तद्राज्ये सर्वे सद्व्ययकारिणः ॥ ११६ ॥
उसके राज्यमें न तो कोई मूलहर था- मूल पूँजीको खानेवाला था, न कोई कदर्य था- अतिशय कृपण था और न कोई तादात्विक था- भविष्यत्का विचार न रख वर्तमानमें ही मौज उड़ानेवाला था, किन्तु सभी समीचीन कार्योंमें खर्च करनेवाले थे ॥ ११६ ॥
In his kingdom, there was no one who was a Moolhara—one who consumes their core capital; nor was there anyone who was a Kadarya—an extreme miser; and there was no Tadatvika—one who squanders everything on present pleasures without any thought for the future. Instead, everyone spent their wealth only on Samichina (righteous and appropriate) endeavors.116
श्लोक ( Shlok ) 117
इति तस्मिन् महीं पाति सौराज्ये सति भूपतौ । प्रजाः प्रजापतिं मत्वा तमैधन्त सुमेधसम् ॥ ११७ ॥
इस प्रकार जब वह राजा पृथिवीका पालन करता था तब सब ओर सुराज्य हो रहा था और प्रजा उस बुद्धिमान् राजाको ब्रह्मा मानकर वृद्धिको प्राप्त हो रही थी ।। ११७ ।।
In this manner, while that King protected the earth, a state of perfect governance (Surajya) flourished in every direction. Regarding that wise King as Brahma (the Creator) himself, the subjects continued to prosper and grow.117
श्लोक ( Shlok ) 118
रत्नानि निधयश्चास्य चतुर्दश नवाभवत् । नवयौवनसम्प्राप्तौ प्राप्तपुण्योदयात् प्रभोः ॥ ११८ ॥
जब नव यौवन प्राप्त हुआ तब उस राजाके पूर्वोपार्जित पुण्य कर्मके उदय से चौदह रत्न और नौ निधियाँ प्रकट हुई थीं ।॥ ११८ ॥
When he attained fresh youth, due to the rising of his previously accumulated meritorious deeds (Punya-karma), the fourteen jewels (ratnas) and nine treasures (nidhis) manifested before that King.118
श्लोक ( Shlok ) 119
भाजनं भोजनं शय्या चमूर्वाहनमासनम् । निधीरत्नं पुरुं नाक्यमिति भोगान्दशान्वभूत् ॥ ११९ ॥
भाजन, भोजन, शय्या, सेना, सवारी, आसन, निधि, रत्न, नगर और नाट्य इन दश भोगोंका वह अनुभव करता था ॥ ११९॥
He experienced the ten types of enjoyments (bhogas): vessels (bhajana), food (bhojana), bedding (shayya), armies (sena), vehicles (savari), seating (asana), treasures (nidhi), jewels (ratna), cities (nagara), and drama or dance (natya).119
श्लोक ( Shlok ) 120 – 121
श्रद्धादिगुणसम्पन्नः स कदाचिन्महीपतिः । अरिन्दमाय दत्त्वान्नं सते मासोपवासिने ॥ १२० ॥गृहीतनवपुण्यात्मा वसुधारादिपञ्चकम् । प्रापाश्चर्यमनाप्यं किं सदनुष्ठानतत्परैः ॥ १२१ ॥
श्रद्धा आदि गुणोंसे संपन्न उस राजाने किसी समय एक माहका उपवास करनेवाले अरिन्दम नामक साधुके लिए आहार-दान देकर नवीन पुण्यका बन्ध किया तथा रत्न-वृष्टि आदि पञ्चाश्ञ्श्चर्य प्राप्त किये सो ठीक ही है क्योंकि उत्तम कार्योंके करनेमें तत्पर रहनेवाले मनुष्योंको क्या दुर्लभ है ? ।। १२०-१२१ ।।
On one occasion, that King—endowed with virtues like faith (shraddha) and devotion—offered alms (ahara-dana) to a monk named Arindama, who was observing a month-long fast. By this act, he bound new meritorious karma (Punya) and received the five celestial wonders (panch-ashcharya), including a rain of gems. This is only fitting, for what is unattainable to those who are ever-intent on performing noble deeds? 120 – 121
श्लोक 122 से 131
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