श्री बृहत् चारित्रशुद्धि विधान
अहिंसा व्रत पूजा
जिओ और जीने दो संस्कृति, यही वीर ने बतलाई। धर्म अहिंसा मुख्य जगत में, होता है ये सुखदाई॥ वृक्ष बीज के बिना ना होता, धर्म अहिंसा बिना नहीं। धारा प्रभु ने हम भी धारें, जिनवर का उपदेश यही ॥
धर्म अहिंसा की पूजा, व्रत को करना साथ। धर्म अहिंसा भी पालो, यही मुक्ति का राज ॥
ॐ ह्रीं अहिंसाव्रतधारक श्री जिनेन्द्र! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं।
ॐ ह्रीं अहिंसाव्रतधारक श्री जिनेन्द्रदेव! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् ।
ॐ ह्रीं अहिंसाव्रतधारक श्री जिनेन्द्रदेव! अत्र मम मन्त्रिहितौ भव-भव वषट् सन्निधिकरणं। परिपुष्पांजलिं क्षिपेत्।
शंभू छंद
अंतर मन द्वेष ग्लानि ईर्ष्या, हे प्रभु सदा भरा रहता। देख आपकी शांति मुद्रा, तुम सम बनने को कहता ॥ धर्म अहिंसा की पूजा से, मन को साफ कराना है। भक्ति जल स्नान हेतु मम, जल चरणों में चढ़ाना है। वैह्रीं अहिंसाव्रतधारक श्री जिनेन्द्रदेवाय जन्म-जरा-मृत्यु विनाशनाय जलं…।
राग आग बन आतम को, संताप सदा ही देती है। राग द्वेष इस रूप में आकर, सुख शांति हर लेती है॥ धर्म अहिंसा के पूजा से, मन संताप को हरना है। चंदन सी शीतलता हो, चंदन से पूजा करना है।
ॐ ह्रीं अहिंसाव्रतधारक श्री जिनेन्द्रदेवाय संसारताप विनाशनाय चंदनं…।
नश्वर माया नश्वर काया, नश्वर जग के भोग सभी। नश्वर के पीछे मैं भागूँ, शांति नहीं मिल पायी तभी ॥ धर्म अहिंसा की पूजा कर, अक्षय पद को पाना है। धर्म में अक्षय भाव रहें, शुभ अक्षत चरण चढ़ाना है।
ॐ ह्रीं अहिंसाव्रतधारक श्री जिनेन्द्रदेवाय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतं…।
पाँचों कृतित्य इच्छा करती, मन पूरा कर खुश होता है। पर शाका फल ती कष्ट मिले, यह बात समान पाता है। अब धर्म अहिंसा पृष्ष बना, भोगों से दूर ही जाना है। यह पुष्प चढ़ा अजी करता, अब भर्ग भारा में बहता है।॥
जिह्वा छोरी सी पर सबको, चरखने बकले गजबूर करें। दिवभर ही वाच वचाती है, संगम हो तो सद्कार्य करें ॥ अब धर्म अहिंसा की पूजा, कर संगम इस पर करना है। तैवेद्य चढ़ा के भक्ति करूँ, सच्चे सुख को ही नरना है॥
उपहारक श्री जिनेवा शुभारोगविनाशनाय नैनेशा…।
दीपक जग जगमग करता, पर हवा चले तो बुझ जायें। यदि ज्ञानदीप जल जायें तो. आतम को प्रकाशित कर जायें ॥ ले धर्म अहिंसा का दीपक, मुक्ति पथ को अब लखना है। मैं दीप से पूजें प्रभु तुम्हें, आतम इतिहास को लिखना है ॥
ॐ ह्रीं पापअहिंसाकाभारक श्री जिवेन्द्रदेवाय योहान्धकार विनाशनाथ दीपं…।
ये कर्म सतायें बहुत हमें, पर जग को दोष मैं देता हूँ। कर्मों की बात समझ जायें, तो धर्म सहारा लेता हूँ। ले धर्म अहिंसा शस्त्र हाथ, कर्मों को मार भगाना है। अब धूप से पूजूँ तुम्हें प्रभु, बस तुमसा ही बन जाना है।
ॐ ह्रीं परमअहिंसाव्रतधारक भी जिनेन्द्रदेवाय अष्टकर्म विनाशनाय धूपं…।
है आर्त रौद्र ये अशुभ ध्यान, जग जंगल में भटकाते हैं। शुभ धर्मध्यान औ शुक्ल ध्यान, कर धर्म अहिंसा पाते हैं ॥ संपूर्ण धर्म का फल यह है, यह धर्म अहिंसा पा जाऊँ। यह फल ही मुक्ति देता है, फल चढ़ा यही मैं फल पाऊँ ॥
ॐ ह्रीं परमअहिंसाव्रतधारक श्री जिनेन्द्रदेवाय मोक्षफल प्राप्तये फलं…।
चारों गतियों में घूम लिया, सब जगह तो हिंसा हिंसा है। हिंसा में कष्ट औ दुख पाया, शांति तो धर्म अहिंसा है । है पद अनर्घ्य की चाह मुझे, जो धर्म अहिंसा देता है। भावों में अहिंसा को लाऊँ, जो नाव हमारी खेता है।
ॐ ह्रीं परमअहिंसाव्रतधारक श्री जिनेन्द्रदेवाय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्य…
अर्ध्यावली
बादर एकेद्रिय पर्याप्तक
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