श्री अभिनन्दनस्वामी का पुराण वर्णन
Summary of Uttara Purana Parv 50 by Acharya Gunabhadra
संक्षिप्त सारांश:
श्री अभिनन्दननाथ स्वामी, जिनके सत्यस्वरूप से जिनवाणी की प्रमाणिकता प्रकट होती है, समस्त भक्तों के रक्षक और आनंददाता हैं। उनके पूर्वभव में वे पूर्व विदेह क्षेत्र के मंगलावली देश स्थित रत्नसंचय नगर के महाप्रतापी, न्यायशील और धर्मनिष्ठ राजा महाबल थे। उनके राज्य में प्रजा पूर्ण सुखी थी और अन्याय का नाम भी नहीं था। सांसारिक वैभव का दीर्घकाल उपभोग करने के बाद उनमें वैराग्य उत्पन्न हुआ। उन्होंने पुत्र धनपाल को राज्य देकर विमलवाहन मुनि से दीक्षा ली, ग्यारह अंगों का अध्ययन किया और सोलह कारण भावनाओं के चिंतन से तीर्थंकर नामकर्म का बंध किया।
समाधिमरण के पश्चात वे विजय अनुत्तर विमान में अहमिन्द्र देव बने। वहाँ से आयु पूर्ण होने पर भरत क्षेत्र की अयोध्या नगरी में इक्ष्वाकुवंशी राजा स्वयंवर और रानी सिद्धार्था के यहाँ गर्भावतार हुआ। रानी ने शुभ स्वप्न देखे और माघ शुक्ल द्वादशी को भगवान अभिनन्दननाथ का जन्म हुआ। इन्द्र ने सुमेरु पर्वत पर उनका जन्माभिषेक कर उन्हें ‘अभिनन्दन’ नाम दिया।
भगवान अभिनन्दननाथ का शरीर अत्यंत विशाल, स्वर्णमय आभायुक्त और अनुपम तेजस्वी था। युवावस्था में पिता द्वारा राज्य प्रदान किए जाने पर उन्होंने आदर्श शासन किया। उनके भीतर जन्मजात सम्यग्दर्शन, अद्भुत पुण्य, धर्मनिष्ठा और लोककल्याणकारी शक्ति विद्यमान थी। वे समस्त राजाओं के अधिपति होते हुए भी अंतर्मन से वैराग्य की ओर अग्रसर थे।
एक दिन मेघों में उत्पन्न होकर नष्ट होते महल को देखकर उन्हें संसार की क्षणभंगुरता का गहन बोध हुआ। उन्होंने शरीर, आयु और सम्पत्ति की अनित्यता पर विचार कर वैराग्य स्वीकार किया। लौकान्तिक देवों की प्रेरणा से उन्होंने हजार राजाओं सहित माघ शुक्ल द्वादशी को दीक्षा ग्रहण की और उसी समय मनःपर्ययज्ञान प्राप्त किया।
दीक्षा के पश्चात कठोर तप, मौन और साधना करते हुए अठारह वर्ष बाद पौष शुक्ल चतुर्दशी को असन वृक्ष के नीचे उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हुआ। देवों ने समवसरण की रचना की और उन्होंने विशाल धर्मसंघ के साथ धर्मोपदेश देकर असंख्य जीवों का कल्याण किया। उनके संघ में लाखों मुनि, आर्यिकाएँ, श्रावक-श्राविकाएँ तथा असंख्य देव सम्मिलित थे।
भगवान अभिनन्दननाथ ने दीर्घकाल तक धर्मवृष्टि करते हुए आर्यखण्ड में विहार किया और अंततः सम्मेदगिरि पर वैशाख शुक्ल षष्ठी के दिन पुनर्वसु नक्षत्र में अनेक मुनियों सहित मोक्ष प्राप्त किया। इन्द्रों ने उनके पंचकल्याणकों की महिमा का स्तवन किया। इस प्रकार पूर्वभव के महाबल, देवभव के अहमिन्द्र और वर्तमान के तीर्थंकर अभिनन्दननाथ—तीनों अवस्थाओं से विभूषित प्रभु अभिनन्दननाथ समस्त भव्य जीवों को निर्भयता, सत्य और मोक्षमार्ग की प्रेरणा प्रदान करते हैं।
श्लोक 1 से 11 : पूर्वभव में राजा महाबल का वैभव और वैराग्य
मंगलावली देश के रत्नसंचय नगर में महाबल नामक प्रतापी और न्यायप्रिय राजा राज्य करते थे। उनके शासन में प्रजा पूर्ण स्वतंत्रता और सुख से जीवन व्यतीत करती थी। वे अपार ऐश्वर्य, कीर्ति, विद्या और पराक्रम से विभूषित थे। दीर्घकाल तक सांसारिक सुख भोगने के पश्चात उनमें वैराग्य जाग्रत हुआ। उन्होंने पुत्र धनपाल को राज्य सौंपकर विमलवाहन गुरु से दीक्षा ग्रहण की, ग्यारह अंगों का अध्ययन किया और सोलह कारण भावनाओं का चिंतन किया।
श्लोक 12 से 22 : तीर्थंकर नामकर्म बंध, देवगति और अभिनन्दननाथ का गर्भ-जन्म
सोलह कारण भावनाओं के प्रभाव से महाबल ने तीर्थंकर नामकर्म बाँधा और समाधिमरण के पश्चात विजय अनुत्तर विमान में अहमिन्द्र देव बने। आयु पूर्ण होने पर वे भरत क्षेत्र की अयोध्या नगरी में राजा स्वयंवर और रानी सिद्धार्था के गर्भ में अवतरित हुए। रानी ने शुभ स्वप्न देखे और माघ शुक्ल द्वादशी को भगवान अभिनन्दननाथ का जन्म हुआ। इन्द्र ने सुमेरु पर्वत पर उनका जन्माभिषेक कर उनका नाम ‘अभिनन्दन’ रखा।
श्लोक 23 से 31 : जन्म महोत्सव, दिव्य महिमा और राज्यारोहण
इन्द्र ने अत्यंत हर्षपूर्वक नृत्य और उत्सव मनाकर बालक को पुनः अयोध्या पहुँचाया। भगवान अभिनन्दननाथ संभवनाथ के बाद अवतीर्ण हुए। उनका शरीर अत्यंत ऊँचा, स्वर्णवत् कान्तिमान और पुण्यसमूह का प्रत्यक्ष स्वरूप था। कुमारावस्था पूर्ण होने पर पिता ने उन्हें राज्य देकर वनगमन किया। वे तेज, शांति, वैभव और पुण्य में अद्वितीय सम्राट बने।
श्लोक 32 से 41 : असाधारण गुण, सम्यग्दर्शन और लोककल्याणकारी व्यक्तित्व
राजा अभिनन्दननाथ के चरणों में समस्त राजाओं सहित इन्द्र भी नतमस्तक होते थे। उनमें अविनाशी क्षायिक सम्यग्दर्शन विद्यमान था। वे कुमार अवस्था में धीर-वीर, संयम में शांत और अंतिम अवस्था में उदात्त बने। उनका जीवन धर्म, शक्ति, ज्ञान और लोकहित का अद्भुत समन्वय था। वे जन्मपूर्व से ही श्रेष्ठ गुणों से सम्पन्न थे और मोहादि शत्रुओं के विनाश के लिए तत्पर रहते थे।
श्लोक 42 से 53 : वैराग्य, दीक्षा और मनःपर्ययज्ञान
राज्यकाल के अंत में मेघों में उत्पन्न और नष्ट होते महल को देखकर उन्हें संसार की नश्वरता का गहन बोध हुआ। उन्होंने शरीर, आयु और सम्पत्ति की अस्थिरता पर चिंतन कर वैराग्य धारण किया। लौकान्तिक देवों की प्रेरणा से उन्होंने हजार राजाओं सहित माघ शुक्ल द्वादशी को दीक्षा ली। उसी समय उन्हें मनःपर्ययज्ञान की प्राप्ति हुई।
श्लोक 54 से 63 : केवलज्ञान और विशाल धर्मसंघ
दीक्षा के अगले दिन इन्द्रदत्त राजा ने उन्हें प्रथम आहार अर्पित किया। अठारह वर्ष के तप और मौन साधना के पश्चात पौष शुक्ल चतुर्दशी को असन वृक्ष के नीचे उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हुआ। उनके विशाल संघ में गणधर, पूर्वधारी, केवलज्ञानी, अवधिज्ञानी, मनःपर्ययज्ञानी, मुनि, आर्यिका, श्रावक और श्राविकाओं की विशाल संख्या थी। वे धर्मवृष्टि द्वारा असंख्य जीवों का कल्याण करते रहे।
श्लोक 64 से 70: सम्मेदशिखर पर मोक्ष और अंतिम स्तुति
भगवान अभिनन्दननाथ ने आर्यखण्ड में व्यापक विहार कर धर्म का प्रचार किया और अंततः सम्मेदगिरि पर एक मास के ध्यान के पश्चात वैशाख शुक्ल षष्ठी को पुनर्वसु नक्षत्र में अनेक मुनियों सहित मोक्ष प्राप्त किया। इन्द्रों ने उनकी पूजा की। पूर्वभव के महाबल, देवगति के अहमिन्द्र और वर्तमान के तीर्थंकर अभिनन्दननाथ—इन तीनों महान अवस्थाओं से विभूषित प्रभु समस्त भव्य जीवों के भय का नाश कर कल्याण करें।
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