चन्द्रप्रभ पुराण का वर्णन पर्व 54
संक्षिप्त सारांश:
आचार्य गुणभद्राचार्य रचित ‘उत्तरपुराण’ के 54वें पर्व में भगवान चन्द्रप्रभ (आठवें तीर्थंकर) के सात भवों का विस्तृत और आध्यात्मिक वर्णन है। संपूर्ण पर्व का कथ्य सारांश निम्नलिखित प्रमुख शीर्षकों के अंतर्गत प्रस्तुत है:
श्लोक 1 से 11 मंगलाचरण एवं सुगन्धि देश का परिचय
इन श्लोकों में चन्द्रप्रभ स्वामी की स्तुति करते हुए पुराण श्रवण की महिमा बताई गई है कि यह सम्यग्ज्ञान का मूल कारण है। इसके पश्चात विदेहक्षेत्र के ‘सुगन्धि’ देश का वर्णन है, जो किलों, वनों और प्राकृतिक संपदा से सुशोभित था। यहाँ के निवासी स्नेहपूर्ण और सूक्ष्म तत्वों के ज्ञाता थे।
श्लोक 12 से 21 आदर्श समाज एवं कृषि की सम्पन्नता
सुगन्धि देश के किसान अत्यंत सरल और धार्मिक थे, जिनके श्रम का फल सदैव निश्चित और सफल होता था। यहाँ के सरोवर निर्मल और खेत राजा के भंडार के समान समृद्ध थे। समाज में दण्ड, कठोरता और अपवाद जैसे नकारात्मक शब्द केवल तराजू, स्त्रियों के यौवन या व्याकरण शास्त्रों तक ही सीमित थे; वास्तविक जीवन में प्रजा पूर्णतः सुखी, निर्दोष और भयमुक्त थी।
श्लोक 22 से 31 श्रीपुर नगर का वैभव और धार्मिक वातावरण
देश के मध्य में स्थित ‘श्रीपुर’ नगर देवलोक के समान सुंदर था। यहाँ के निवासियों में क्रूरता या स्वार्थ के स्थान पर सम्यग्दृष्टि और त्याग की भावना प्रबल थी। नगर के भव्य भवन और सरोवर इसकी शोभा बढ़ाते थे। यहाँ के लोग केवल स्वर्ग के सुखों के लिए नहीं, अपितु मोक्ष प्राप्ति के महान उद्देश्य से धर्म का पालन करते थे।
श्लोक 32 से 41 राजा श्रीषेण और रानी श्रीकान्ता का चरित्र
नगर के स्वामी राजा श्रीषेण इन्द्र के समान प्रतापी और साम-दान की नीति में निपुण थे। उनकी पत्नी श्रीकान्ता गुणों की खान और पतिव्रता थी। उनके गुण विद्वानों के मन को आनंदित करने वाले और सज्जनों द्वारा वंदनीय थे। यह दंपती निष्पाप होकर उत्कृष्ट सुखों का उपभोग कर रहा था।
श्लोक 42 से 51 पुत्र प्राप्ति हेतु अनुष्ठान एवं मंगल स्वप्न
पुत्र के अभाव में दुखी राजा ने पुरोहित के परामर्श पर स्वर्णमयी जिन-प्रतिमाओं का निर्माण कर ‘आष्टाह्निकी’ पूजा और महाभिषेक संपन्न किया। इसके फलस्वरूप रानी ने स्वप्न में हाथी, सिंह, चन्द्रमा और लक्ष्मी का अभिषेक देखा, जो एक पराक्रमी और भाग्यशाली पुत्र के आगमन का संकेत था।
श्लोक 52 से 61 रानी का गर्भाधान और राजा का हर्ष
रानी के गर्भ धारण करते ही उनके शरीर में तेज और स्वाभाविक लज्जा के चिह्न प्रकट होने लगे। जब दासियों ने राजा को यह सुखद समाचार सुनाया, तो राजा का मुख कमल के समान खिल उठा। राजा ने इसे अपने वंश की उन्नति का कारण मानकर अपार प्रसन्नता व्यक्त की और सेविकाओं को पुरस्कृत किया।
श्लोक 62 से 71 राजकुमार श्रीवर्मा का जन्म और शिक्षा
शुभ ग्रहों के योग में रानी ने ‘श्रीवर्मा’ नामक पुत्र को जन्म दिया, जिससे राजा को असीम संतोष प्राप्त हुआ। राजकुमार का शरीर अत्यंत तेजस्वी था और उनकी बुद्धि का विकास वैद्यक एवं व्याकरण आदि शास्त्रों के अनुसार अत्यंत प्रखर रूप में हुआ। वे जम्बूद्वीप के मेरु पर्वत के समान सुशोभित होने लगे।
श्लोक 72 से 81 वैराग्य, राज्याभिषेक और मुनि दीक्षा
जिनेन्द्र श्रीपद्म के उपदेश से प्रभावित होकर राजा श्रीषेण ने पुत्र श्रीवर्मा को राज्य सौंपकर दीक्षा ग्रहण कर ली। कालान्तर में श्रीवर्मा ने भी आकाश में उल्कापात (टूटता तारा) देखकर संसार की नश्वरता को समझा और वैराग्य धारण कर लिया। उन्होंने अपने पुत्र श्रीकान्त को राज्य दिया और श्रीप्रभ जिनेन्द्र के समीप तपस्या करते हुए अंततः समाधिमरण प्राप्त किया।
श्लोक 82 से 91 श्रीधर देव एवं चक्रवर्ती अजितसेन का आगमन और राजा अजितंजय के स्वप्न
श्रीवर्मा का जीव स्वर्ग में ‘श्रीधर’ नामक देव हुआ, जिसकी आयु दो सागर थी।। वहाँ से च्युत होकर वह धातकीखण्ड द्वीप के अयोध्या नगर के राजा अजितंजय की रानी अजितसेना के गर्भ में आया। रानी ने आठ शुभ स्वप्न (हाथी, बैल, सिंह, चंद्रमा, सूर्य, सरोवर, शंख और पूर्ण कलश) देखे, जिनका फल राजा ने एक महाप्रतापी चक्रवर्ती पुत्र की प्राप्ति के रूप में बताया।
श्लोक 92 से 101 चक्रवर्ती अजितसेन का साम्राज्य
रानी ने श्रीधर देव के जीव को अजितसेन के रूप में जन्म दिया। राजा अजितंजय ने पुत्र को राज्य सौंपकर स्वयं दीक्षा ले ली।। अजितसेन के पुण्य से ‘चक्ररत्न’ सहित चौदह रत्न और नौ निधियाँ प्रकट हुआ और उन्होंने सुगमता से छह खण्डों पर विजय प्राप्त की। वे एक ऐसे चक्रवर्ती थे जो अपार वैभव के स्वामी होकर भी मोह और परिग्रह से अछूते थे।
श्लोक 102 से 111 दिशापालों से तुलना और शासक की श्रेष्ठता
यहाँ कवि ने अलंकृत वर्णन करते हुए कहा कि अजितसेन वास्तविक रक्षक थे, जबकि पौराणिक दिशापाल (अग्नि, यम, वरुण आदि) अपनी प्रकृति के कारण रक्षा में असमर्थ थे। अजितसेन के पराक्रम और न्यायप्रियता की स्तुति देवों द्वारा भी की जाती थी।
श्लोक 112 से 121 दान-धर्म एवं मुनि-आहार
राजा अजितसेन की बुद्धि सदैव धर्म और परोपकार में लगी रहती थी। उन्होंने मुनि अरिन्दम को भक्तिपूर्वक आहार-दान दिया, जिससे आकाश से रत्नों की वर्षा जैसे ‘पञ्चाश्चर्य’ प्रकट हुए। उनका जीवन संयम और प्रजा-रक्षा का उत्कृष्ट उदाहरण था।
श्लोक 122 से 131 अच्युतेन्द्र पद और पद्मनाभ का जन्म
गुप्तप्रभ जिनेन्द्र के उपदेश से वैराग्य पाकर अजितसेन ने पुत्र जितशत्रु को राज्य दिया और दीक्षा लेकर 16वें स्वर्ग में ‘अच्युतेन्द्र’ हुए। वहाँ का सुख भोगकर उनका जीव राजा कनकप्रभ और रानी कनकमाला के यहाँ ‘पद्मनाभ’ नामक पुत्र के रूप में अवतरित हुआ।
श्लोक 132 से 141 पद्मनाभ की शिक्षा एवं विवाह
राजकुमार पद्मनाभ ने अपनी इन्द्रियों को जीत लिया था और समस्त कलाओं एवं शास्त्रों में प्रवीणता प्राप्त की। यौवन प्राप्त करने पर उनका विवाह सोमप्रभा आदि अनेक कन्याओं से हुआ और उनके सुवर्णनाभ जैसे तेजस्वी पुत्रों का जन्म हुआ।
श्लोक 142 से 151 संसार की नश्वरता एवं कर्म-दर्शन
मुनि श्रीधर के उपदेश से पद्मनाभ के पिता ने दीक्षा ली। पद्मनाभ ने स्वयं भी संसार के चक्र का चिंतन किया। उन्होंने समझा कि जब तक ‘मिथ्यात्व’ जैसे दोष विद्यमान हैं, आत्मा कर्मों के बंधन में फंसी रहती है। उन्होंने संसार को जन्म-मरण का दुःखद जाल माना।
श्लोक 152 से 162 तीर्थंकर नामकर्म का बंध एवं अहमिन्द्र पद
पद्मनाभ ने पुत्र सुवर्णनाभ को राज्य देकर कठिन तपस्या प्रारम्भ की। उन्होंने सोलहकारण भावनाओं का चिंतन किया और ग्यारह अंगों का ज्ञान प्राप्त कर ‘तीर्थंकर नामकर्म’ का उपार्जन किया। अंत में, समाधिमरण के उपरांत वे वैजयन्त विमान में ‘अहमिन्द्र’ हुए, जहाँ से वे आगे चलकर तीर्थंकर पद प्राप्त करेंगे।
श्लोक 163 से 173 चन्द्रपुर में भगवान का अवतरण और नामकरण
अहमिन्द्र की आयु पूर्ण कर भगवान का जीव जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र स्थित चन्द्रपुर नगर में राजा महासेन और रानी लक्ष्मणा के यहाँ अवतरित हुआ। रानी ने चैत्र कृष्ण पंचमी को सोलह मंगलकारी स्वप्न देखे। तत्पश्चात, पौष कृष्ण एकादशी के दिन तीन ज्ञान से सम्पन्न पुत्र का जन्म हुआ। इन्द्र ने नवजात बालक को सुमेरु पर्वत पर ले जाकर क्षीरसागर के जल से अभिषेक किया। चूँकि उनके जन्म से पृथ्वी मण्डल नील-कमलों (कुवलय) के समान विकसित हो उठा था, इसलिए इन्द्र ने उनका सार्थक नाम ‘चन्द्रप्रभ’ रखा।
श्लोक 174 से 181 शैशव काल और शारीरिक वैशिष्ट्य
इन्द्र ने भगवान के समक्ष ‘आनन्द’ नामक नाटक किया और कुबेर को उनकी सेवा का निर्देश दिया। भगवान चन्द्रप्रभ, सुपार्श्वनाथ स्वामी के मोक्ष जाने के नौ सौ करोड़ सागर बाद उत्पन्न हुए थे। उनकी आयु दस लाख पूर्व और शरीर की ऊँचाई एक सौ पचास धनुष थी। उनका बाल्यकाल दिव्य चेष्टाओं और देवताओं के साथ कुतूहलपूर्ण क्रीड़ाओं में व्यतीत हुआ। उनके मुख की मन्द मुस्कान और लड़खड़ाते कदमों की शोभा देखते ही बनती थी।
श्लोक 182 से 193 अलौकिक कान्ति और युवावस्था
युवावस्था प्राप्त करने पर भगवान का शरीर अमृतमयी और चन्द्रमा के समान धवल कान्ति (शुक्ल लेश्या) से युक्त था। उनकी आभा के सामने ज्योतिषी देवों का प्रकाश भी फीका पड़ जाता था। वे वीणा वादन, संगीत, शास्त्रों की परीक्षा और भव्य जीवों को दर्शन देने में अपना समय व्यतीत करते थे। कवि कहते हैं कि उनके गुण चन्द्रमा की किरणों के समान निर्मल थे, जो भव्य जीवों के मन रूपी कमलों को विकसित करते थे।
श्लोक 194 से 201 राज्याभिषेक और सांसारिक ऐश्वर्य
दो लाख पचास हजार पूर्व वर्ष बीतने पर भगवान चन्द्रप्रभ का राज्याभिषेक हुआ। वे तीन लोक की रक्षा करने वाले अद्भुत तेज से सम्पन्न थे। यद्यपि वे सांसारिक सुखों और रानियों के बीच घिरे थे, किन्तु उनका ऐश्वर्य अलौकिक था। इन्द्र आदि देव भी उनकी सेवा में तत्पर रहते थे। उनका शासन काल न्याय और समृद्धि का प्रतीक था।
श्लोक 202 से 211 दर्पण दर्शन और वैराग्य का उदय
जब भगवान के साम्राज्य सुख का छह लाख पचास हजार पूर्व वर्ष व्यतीत हो गया, तब एक दिन दर्पण में अपना मुख देखते समय उन्हें वैराग्य उत्पन्न हुआ। उन्होंने चिन्तन किया कि यह शरीर नश्वर है और सांसारिक संयोग अंततः वियोग में परिणत होने वाले हैं। उन्होंने स्वयं को धिक्कारा कि जानते हुए भी वे मोह में फंसे रहे। अनित्य को नित्य समझना ही अज्ञान है और इसी कारण जीव संसार रूपी सागर के दुखों में भटकता है।
श्लोक 212 से 222 दीक्षा कल्याणक और कठोर तपश्चर्या
वैराग्य भाव प्रबल होते ही लौकान्तिक देवों ने आकर उनके विचारों की पुष्टि की। भगवान ने अपने पुत्र वरचन्द्र का राज्याभिषेक किया और ‘विमला’ पालकी में सवार होकर सर्वर्तुक वन पहुँचे। वहाँ पौष कृष्ण एकादशी को एक हजार राजाओं के साथ निर्ग्रन्थ दीक्षा धारण की, जिससे उन्हें मनःपर्यय ज्ञान प्राप्त हुआ। दूसरे दिन नलिन नगर के राजा सोमदत्त ने उन्हें आहार दान दिया। इसके उपरांत भगवान कषायों को जीतकर, पंच महाव्रतों और तीन गुप्तियों का पालन करते हुए परम योग में लीन हो गए।
श्लोक 223 से 231 केवलज्ञान की प्राप्ति और दिव्य अतिशय
भगवान ने दीक्षा के पश्चात तीन माह तक नागवृक्ष के नीचे कठोर तप किया। फाल्गुन कृष्ण सप्तमी के दिन क्षपक श्रेणी पर आरूढ़ होकर उन्होंने मोह रूपी शत्रु का विनाश किया और चारों घातिया कर्मों का क्षय कर केवलज्ञान (सर्वज्ञता) प्राप्त किया। वे शरीर सहित ‘सयोगकेवली’ हुए और चौंतीस अतिशयों एवं आठ प्रातिहार्यों के साथ तीन लोक के रक्षक और उपदेशक के रूप में सुशोभित हुए।
श्लोक 232 से 241 भगवान का अलौकिक वैभव और प्रतीकात्मकता
भगवान का सिंहासन और उनके शरीर की प्रभा केवलज्ञान की कान्ति के समान समस्त दिशाओं को प्रकाशित कर रही थी। उनकी दिव्यध्वनि एक ही समय में सभी श्रोताओं के संशयों का निवारण करती थी। उनके मस्तक पर सुशोभित तीन छत्र रत्नत्रय (सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र) के प्रतीक थे। आकाश से होने वाली पुष्प वर्षा और देवों के नगाड़े उनके द्वारा मोह रूपी शत्रु पर विजय की घोषणा कर रहे थे।
श्लोक 242 से 251 समवशरण की भव्यता और इन्द्र का आगमन
भगवान बारह सभाओं से घिरी ‘गन्धकुटी’ के मध्य में ऐसे सुशोभित थे जैसे नक्षत्रों के बीच चन्द्रमा। उनके संघ में 93 गणधर और ढाई लाख मुनिराजों सहित लाखों आर्यिकाएँ, श्रावक और श्राविकाएँ उपस्थित थीं। इसी समय ऐशानेन्द्र (इन्द्र) ने आकर भक्तिपूर्वक भगवान के चरणों में वन्दना की और उनसे संसार के दुखों से मुक्ति दिलाने वाले रत्नत्रय की याचना की।
श्लोक 252 से 261 इन्द्र द्वारा दार्शनिक एवं भावपूर्ण स्तुति
इन्द्र ने स्तुति करते हुए कहा कि कल्पवृक्ष केवल दूसरों का हित करता है, किन्तु भगवान स्व और पर दोनों का कल्याण करने वाले हैं। जो मनुष्य भगवान के वचनों और धर्म को हृदय में धारण करता है, वह उन्हीं के समान आनन्द प्राप्त करता है। इन्द्र ने उन्हें कर्म रूपी शत्रुओं का विनाशक और संसार रूपी समुद्र से पार उतारने वाला ‘आधार’ बताया। भगवान सबको जानते हैं, किन्तु इन्द्रियों द्वारा पूर्णतः नहीं जाने जा सकते।
श्लोक 262 से 272 मत-मतांतर का खंडन और निर्वाण गमन
इन्द्र ने नास्तिकता और केवल भाग्यवादिता का खंडन करते हुए भगवान के ‘अनेकान्त’ मार्ग की सराहना की। उन्होंने सिद्ध किया कि द्रव्य और गुण परस्पर अभिन्न हैं। स्तुति के पश्चात, भगवान चन्द्रप्रभ ने विभिन्न देशों में विहार कर धर्म की प्रभावना की और अंततः सम्मेद शिखर पहुँचे। वहाँ एक माह का योग निरोध कर फाल्गुन शुक्ल सप्तमी के दिन उन्होंने समस्त कर्मों का क्षय कर सिद्ध पद (निर्वाण) प्राप्त किया |
श्लोक 273 से 276मंगल कामना और उपसंहार
भगवान के निर्वाण के अवसर पर देवों ने आकर निर्वाण-कल्याणक की पूजा की। अंत में कवि मंगल कामना करते हुए कहते हैं कि जो चन्द्रमा के समान धवल लेश्या वाले हैं और जिन्होंने अष्ट कर्मों को नष्ट कर दिया है, वे भगवान चन्द्रप्रभ हमारी अज्ञानता को दूर कर मोक्ष-लक्ष्मी प्रदान करें। यहाँ श्रीवर्मा से लेकर तीर्थंकर बनने तक की उनकी सात भवों की यात्रा का पवित्र वर्णन समाप्त होता है।
श्लोक 1 से 11 मंगलाचरण एवं सुगन्धि देश का परिचय
English translation of Uttar Puran parv 54- shlok 1 to 11
श्लोक ( Shlok ) 1
नीत्वैकवर्णतां ‘सर्वा सभां यः प्रभया स्वया । शुद्धितामनयच्छुद्धः शुद्धयै चन्द्रप्रभोऽस्तु नः ॥ १॥
जो स्वयं शुद्ध हैं और जिन्होंने अपनी प्रभाके द्वारा समस्त सभाको एक वर्णकी बनाकर शुद्ध कर दी, वे चन्द्रप्रभ स्वामी हम सबकी शुद्धिके लिए हों ॥ १ ॥
“May Chandraprabha Swami, who is pure in His own self and who, through His divine radiance, purified the entire assembly by making them all of one (pure) color, grant us all purification.”1
श्लोक ( Shlok ) 2
देहप्रभेव वाग्यस्याह्लादिन्यपि च बोधिनी । तन्नमामि नभोभागे सुरतारापरिष्कृतम् ॥ २ ॥
शरीरकी प्रभाके समान जिनकी वाणी भी हर्षित करनेवाली तथा पदार्थोंको प्रकाशित करनेवाली थी और जो आकाशमें देवरूपी ताराओंसे घिरे रहते थे उन चन्द्रप्रभ स्वामीको नमस्कार करता हूँ ।। २ ।।
“I bow to Lord Chandraprabha, whose speech was as delightful and illuminating as the radiance of His body, and who was surrounded by celestial beings (Devas) in the sky, much like the moon is surrounded by the stars.” “I bow to Lord Chandraprabha, whose speech was as delightful and illuminating as the radiance of His body, and who was surrounded by celestial beings (Devas) in the sky, much like the moon is surrounded by the stars.” 2
श्लोक ( Shlok ) 3 – 4
नामग्रहोऽपि यस्यार्घ निहन्त्यखिलमङ्गिनाम् । न हन्यात् किं नु तस्याच्यं चरितं श्रुतिगोचरम् ॥ ३ ॥तत्पुराणं ततो वक्ष्ये भवादासप्तमादहम् । श्रोतव्यं भव्य ते श्रद्धां निधाय मगधाधिप ॥ ४ ॥
जिनका नाम लेना भी जीवोंके समस्त पापोंको नष्ट कर देता है फिर सुना हुआ उनका पवित्र चरित्र क्यों नहीं नष्ट कर देगा ? इसलिए मैं पहलेके सात भवोंसे लेकर उनका चरित्र कहूंगा। हे भव्य श्रेणिक ! तुझे उसे श्रद्धा रखकर सुनना चाहिये ।। ३-४ ।।
“When merely invoking His name destroys all the sins of living beings, why would hearing His sacred life story not do the same? Therefore, I shall narrate His life story, starting from His previous seven incarnations. O noble Shrenika! You should listen to it with deep faith and devotion.” 3 – 4
श्लोक ( Shlok ) 5
दानं पूजां तथान्यच्च मुक्त्यै ज्ञानेन संस्कृतम् । तत्पुराणश्रुतेः श्रव्यं तत्तदेव हितैषिभिः ॥ ५ ॥
दान, पूजा तथा अन्य कारण यदि सम्यग्ज्ञानसे सुशोभित होते हैं तो वे मुक्तिके कारण होते हैं और चूँकि वह सम्यग्ज्ञान इस पुराणके सुननेसे होता है-अतः हितकी इच्छा करनेवाले पुरुषोंके द्वारा अवश्य ही सुननेके योग्य है ।॥ ५॥
“Acts of charity (Dana), worship (Puja), and other virtuous deeds lead to liberation only if they are graced by Right Knowledge. Since that Right Knowledge is attained by listening to this Purana (sacred history), those who desire their own well-being must certainly listen to it.”5
श्लोक ( Shlok ) 6
अर्हद्भिर्भाषितं सूक्तमनुयोगैश्चतुष्टयम् । तेषु पूर्व पुराणानि तस्मात्प्रोक्तः श्रुतिक्रमः ॥ ६ ॥
अर्हन्त भगवान् ने अनुयोगेोंके द्वारा जो चार प्रकारके सूक्त बतलाये हैं उनमें पुराण प्रथम सूक्त है ! भगवान् ने इन पुराणांसे ही सुननेका क्रम बतलाया है ॥ ६ ॥
“Among the four types of scriptures (Anuyogas) explained by the Arhant Bhagwan, the Purana (Prathamanuyoga) is the first. Indeed, the Lord has ordained that the sequence of learning or listening to the scriptures begins with these Puranas.”6
श्लोक ( Shlok ) 7
सा जिह्वा तौ मनःकर्णों यैर्वक्तिश्रुतिचिन्तनाः । पुर्वादीनां पुराणानां पुरुषार्थोपदेशिनाम् ॥ ७ ॥
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष पुरुषार्थका उपदेश देनेवाले भगवान् ऋषभदेव आदिके पुराणोंको जो जीभ कहती है, जो कान सुनते हैं और जो मन सोचता है वही जीभ है, वही कान है और वही मन है, अन्य नहीं।। ७ ॥
“The tongue that narrates, the ears that hear, and the mind that contemplates the Puranas of Lord Rishabhadev and other Tirthankaras—which provide instruction on the four goals of life (Dharma, Artha, Kama, and Moksha)—are the only true tongue, ears, and mind. All others are not worthy of the name.”7
श्लोक ( Shlok ) 8
अस्त्यत्र पुष्करद्वीपः तन्मध्ये मानुषोत्तरः । नृसंचारस्य सीमासौ सर्वतो वलयाकृतिः ॥ ८ ॥
इस मध्यम लोकमें एक पुष्करद्वीप है। उसके बीचमें मानुषोत्तर पर्वत है। यह पर्वत चारों ओरसे वलयके आकार गोल है तथा मनुष्योंके आवागमनकी सीमा है ॥ ८ ॥
“In this Middle World (Madhyaloka), there exists a continent named Pushkaradvipa. In its center stands the Manushottara Mountain. This mountain is circular in shape, like a ring, and serves as the final boundary for the movement and habitation of human beings.”8
श्लोक ( Shlok ) 9 -10
तदभ्यन्तरभागे स्तो मन्दरौ पूर्वपश्चिमौ । पूर्वस्मिन् मन्दरे देशो विदेहे पश्चिमे महान् ॥ ९ ॥सीतोदोदक्तटे दुर्गवनखन्याकरोचितैः । अकृष्टपच्यसस्याद्यैः सुगन्धिर्भूगुणैरभात् ॥ १० ॥
उसके भीतरी भागमें दो सुमेरु पर्वत हैं एक पूर्व मेरु और दूसरा पश्चिम मेरु । पूर्व मेरुके पश्चिमकी ओर विदेहक्षेत्रमें सीतोदा नदीके उत्तर तट पर एक सुगन्धि नामका बड़ा भारी देश है। जो कि योग्य किला, वन, खाई, खानें और बिना बोये होनेवाली धान्य आदि पृथिवीके गुणोंसे सुशोभित है ॥ ९-१० ।।
“Within the inner side of that boundary stand two Sumeru Mountains: the East Meru and the West Meru. To the west of East Meru, in the Videha region (Videha-kshetra) on the northern bank of the Sitoda River, lies a vast and magnificent country named Sugandhi. This land is adorned with the finest attributes of the earth, including formidable forts, lush forests, deep moats, rich mines, and grains that grow naturally without even being sown.”9 -10
श्लोक ( Shlok ) 11
तस्मिन्देशे जनाः सर्वे वर्णत्रयविकल्पिताः । स्निग्धाः सूक्ष्मेक्षणाः प्रेक्ष्या विलोचनविशेषवत् ॥ ११ ॥
उस देशके सभी मनुष्य क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्णमें विभक्त थे तथा नेत्र विशेषके समान स्नेहसे भरे हुए, सूक्ष्म पदार्थोंको देखने वाले एवं दर्शनीय थे ।। ११ ।।
“The people of that country were divided into the classes of Kshatriyas, Vaishyas, and Shudras. Like a pair of remarkable eyes, they were filled with affection (Sneha), possessed the wisdom to perceive subtle truths, and were themselves beautiful to behold.”11
श्लोक 12 से 21
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
अजितनाथ तीर्थंकर तथा सगर चक्रवर्तीका वर्णन पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ तीर्थकर का पुराण वर्णन पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी का पुराण वर्णन पर्व 50 – श्लोक 1 से 70
सुमतिनाथ तीर्थंकर का पुराण वर्णन पर्व 51 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 87
पद्मप्रभ भगवान् के पुराण का वर्णन पर्व 52 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 64 | श्लोक 65 से 70
सुपार्श्वनाथ स्वामीका पुराण का वर्णन पर्व 53 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 34 | श्लोक 35 से 42 | श्लोक 43 से 51 | श्लोक 52 से 56
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