आदिपुराण पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151
श्लोक 152 से 162 सेवकों का संतोष
जैसे ग्वालिया गायों को कीड़े से बचाने के लिए औषधि देता है, वैसे ही राजा को दरिद्र या खिन्न सेवक का चित्त संतुष्ट करना चाहिए, अन्यथा सेवक विरक्त हो जाएगा। दरिद्रता को घाव के कीड़े समान मानकर त्वरित प्रतिकार करना चाहिए। सेवकों को सम्मान से संतोष मिलता है, जो धन से नहीं मिलता। जैसे ग्वालिया बलशाली बैल को पुष्ट करता है, वैसे ही राजा को उत्तम योद्धा को आजीविका और सम्मान देना चाहिए। पराक्रमी वीर को संतुष्ट रखने से भृत्य अनुरक्त रहते हैं। जैसे ग्वालिया पशुओं को उपद्रवहीन वन में चराता है, वैसे ही राजा को सेवकों को सुरक्षित स्थान पर रखना चाहिए।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 42- Shlok 152 to 162
श्लोक ( Shlok ) 152
सति चैवं कृतज्ञोऽयं नृप इत्यनुरक्तताम्। उपैति भृत्यवर्गोऽस्मिन् भवेच्च ध्रुवयोधनः ॥१५२॥
ऐसा करनेसे भृत्य लोग ‘यह राजा बड़ा कृतज्ञ है’ ऐसा मानकर उसपर अनुराग करने लगेंगे और अवसर पड़नेपर निरन्तर युद्ध करनेवाले बन जायेंगे ।।१५२॥
By acting thus, the servants come to regard the king as deeply grateful and noble-hearted; moved by such esteem, they grow ever more devoted to him and, when the time arises, stand ready to fight ceaselessly in his cause.152
श्लोक ( Shlok ) 153 – 154
यथाखल्वपि गोपालः कृमिदष्टे गवाङ्गणे । तद्योग्यमौषधं दत्वा करोत्यस्य प्रतिक्रियाम् ॥१५३॥ तथैव पृथिवीपालो दुर्विधं स्वानुजीविनम् । विमनस्कं विदित्वैनं सौचित्त्ये’ सन्नियोजयेत् ॥१५४।॥
कदाचित् गायोंके समूहको कोई कीड़ा काट लेता है तो जिस प्रकार ग्वालिया योग्य औषधि देकर उसका प्रतिकार करता है उसी प्रकार राजाको भी चाहिये कि वह अपने सेवकको दरिद्र अथवा खेदखिन्न जानकर उसके चित्तको संतुष्ट करे ।।१५३-१५४।।
If, perchance, some insect bites a member of the herd, the cowherd promptly treats it with the proper remedy—likewise, the king, upon perceiving that a servant is afflicted by poverty or sorrow, should endeavor to console and uplift his heart, bringing contentment to his soul.153 – 154
श्लोक ( Shlok ) 155
विरक्तो ह्यानुजीवी स्याद लब्धोचितजीवनः । प्रभोर्विमान’ नाच्चैवं तस्मान्नैनं विरुक्षयेत् ।।१५५।।
क्योंकि जिस सेवकको उचित आजीविका प्राप्त नहीं है वह अपने स्वामी के इस प्रकारके अपमानसे विरक्त हो जायगा इसलिये राजाको चाहिये कि वह कभी अपने सेवकको विरक्त न करे । ॥ १५५॥
For the servant who is denied a fitting livelihood grows disheartened by such neglect and turns away from his master in silent reproach. Therefore, the king must ever ensure that his servants do not fall into estrangement.155
श्लोक ( Shlok ) 156
तद्दौर्गत्यं व्रणस्थानकृमिसम्भवसन्निभम् । विदित्वा तत्प्रतीकारमाशु कुर्याद्विशाम्पतिः ॥१५६॥
सेवककी दरिद्रताको घावके स्थानमें कीड़े उत्पन्न होनेके समान जानकर राजाको शीघ्र ही उसका प्रतिकार करना चाहिये ।। १५६।।
The king should regard a servant’s poverty as akin to vermin festering in a wound—and must promptly take measures to remedy it, lest it fester further and bring harm.156
श्लोक ( Shlok ) 157
बहुनापि न दत्तेन सौचित्यमनुजीविनाम् । उचितात् स्वामिसन्मानाद् यथैपां जायते धृतिः ॥१५७॥
सेवकोंको अपने स्वामीसे उचित सन्मान पाकर जैसा संतोष होता है वैसा संतोष बहुत धन देनेपर भी नहीं होता है ।।१५७।।
The contentment a servant feels upon receiving due honor from his master surpasses even the satisfaction gained from great wealth—for true loyalty thrives more on respect than on riches.157
श्लोक ( Shlok ) 158 –159
गोपालको यथा यूथ स्व महोक्षं भरक्षमम् । ज्ञात्वास्य नस्यकर्मादि विदध्याद् गात्रपुष्टये ॥१५८॥ तथा नृवोऽपि सैन्ये स्वे योद्धारं भटसत्तमम् । ज्ञात्वेनं जीवनं प्राज्यं दत्वा सम्मानयेत् कृती ॥१५९॥
जिस प्रकार ग्वाला अपने पशुओंके झुण्डमें किसी बड़े बैलको अधिक भार धारण करने में समर्थ जानकर उसके शरीरकी पुष्टिके लिये नस्य कर्म आदि करता है अर्थात् उसकी नाकमें तेल डालता है और उसे खली आदि खिलाता है उसी प्रकार चतुर राजाको भी चाहिये कि वह अपनी सेनामें किसी योद्धाको अत्यन्त उत्तम जानकर उसे अच्छी आजीविका देकर सन्मानित करे ।। १५८-१५९।।
Just as the cowherd, recognizing a mighty bull within his herd as capable of bearing great burdens, strengthens its body through restorative measures—applying medicated oils to its nostrils and feeding it nourishing fodder—even so should a wise king, discerning an exceptional warrior in his army, honor him with generous livelihood and proper esteem. 158 –159
श्लोक ( Shlok ) 160
कृतापदानं तद्योग्यै सत्कारैः प्रीणयन् प्रभुः। न मुच्यतेऽनुरक्तैः स्वैर नुजीविभिरन्वहम् ॥१६०।।
जो राजा अपना पराक्रम प्रकट करनेवाले वीर पुरुषको उसके योग्य सत्कारोंसे संतुष्ट रखता है उसके भृत्य उसपर सदा अनुरक्त रहते हैं और कभी भी उसका साथ नहीं छोड़ते हैं ।। १६०।।
The king who duly honors the valiant warriors who manifest their prowess, keeping them content through fitting rewards, wins their unwavering loyalty—for such devoted servants remain ever attached to him and never forsake his side.160
श्लोक ( Shlok ) 161 – 162
यथा च गोपो गोयूथं कण्टकोपलर्जिते । शीतातपादिबाधाभिरुज्झिते चारयन् वने ॥१६१॥पोषयत्यतियत्नेन तया भूयोऽव्यविप्लवे । देश स्वानुगतं लोकं स्थापयित्वाऽभिरक्षतु ॥१६२॥
जिस प्रकार ग्वाला अपने पशुओंके समूहको कांटे और पत्थरों से रहित तथा शीत और गरमी आदिकी बाधासे शून्य वनमें चराता हुआ बड़े प्रयत्नसे उसका पोषण करता है उसी प्रकार राजाको भी अपने सेवक लोगोंको किसी उपद्रवहीन स्थानमें रखकर उनकी रक्षा करनी चाहिये ।।१६१-१६२।।
Just as the cowherd diligently nourishes his herd by grazing them in a forest free from thorns and stones, and sheltered from the afflictions of heat and cold,even so must the king safeguard his servants by placing them in a secure and trouble-free domain, ensuring their protection with utmost care.161 – 162
श्लोक 163 से 171
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कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211
आदिपुराण पर्व 41 – भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 158
आदिपुराण पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151
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