आदिपुराण पर्व 40 – द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23
श्लोक 24 से 31 काम्य मंत्र और जाति मंत्र
यह खंड काम्य मंत्रों और जाति मंत्रों पर केंद्रित है। ‘सेवाफलं षट्परमस्थानं भवतु’ आदि मंत्रों से छह परम स्थानों की प्राप्ति, अपमृत्यु नाश, और समाधिमरण की कामना की जाती है। जाति मंत्रों में ‘सत्यजन्मनः शरणं प्रपद्यामि’, ‘अर्हज्जन्मनः शरणं प्रपद्यामि’, और ‘रत्नत्रयस्य शरणं प्रपद्यामि’ जैसे मंत्र जिनेंद्रदेव, उनकी माता, पुत्र, और रत्नत्रय के शरणागत होने को दर्शाते हैं। सम्यग्दृष्टि, ज्ञानमूर्ति, सरस्वती की सम्बोधन में ‘स्वाहा’ के साथ मंत्र पढ़े जाते हैं।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 40- Shlok 24 to 31
श्लोक ( Shlok ) 24 – 25
काम्य मन्त्रः
ततः स्वकाम्यसिद्ध्यर्थमिदं पदमुदाहरेत् । सेवाफलं षट्परमस्थानं भवतु तत्परम् ॥२४॥ अपमृत्यु विनाशनं भवत्वन्तं पदं भवेत् । भवत्वन्तमतो वाच्यं समाधिमरणाक्षरम् ॥२५॥
(अब इसके आगे काम्य मन्त्र लिखते हैं) । तदनन्तर अपनी इष्टसिद्धिके लिये नीचे लिखे पदका उच्चारण करना चाहिये ‘सेवाफलं षट्परमस्थानं भवतु, अपमृत्युविनाशनं भवतु, समाधिमरणं भवतु’ अर्थात् मुझे सेवाके फलस्वरूप छह परम स्थानोंकी प्राप्ति हो, अपमृत्युका नाश हो और समाधिमरण प्राप्त हो ।॥ २४-२५।।
(Now, the kāmya mantras—mantras for the fulfillment of specific desires—are enunciated.)
Thereafter, for the attainment of one’s cherished goal, the following sacred utterance should be recited:
“May the fruit of my service be the attainment of the six supreme abodes;
May untimely death be vanquished;
May I attain death in deep meditative absorption (samādhi).”॥24–25॥
श्लोक ( Shlok ) 26
चूर्णिः- ‘सत्यजाताय नमः, अर्हज्जातायनमः, परमजाताय नमः, अनुपमजाताय नमः, स्वप्रधानाय नमः, अचलाय नमः, अक्षयाय नमः, अव्याबाधाय नमः, अनन्तज्ञानाय नमः, अनन्तदर्शनाय नमः, अनन्तवीर्याय नमः, अनन्तसुखाय नमः, नीरजसे नमः, निर्मलाय नमः, अच्छेद्याय नमः, अभेद्याय नमः, अजराय नमः, अमराय नमः, अप्रमेयाय नमः, अगर्भवासाय नमः, अक्षोभ्याय नमः, अविलीनाय नमः, परमघनाय नमः, परमकाष्ठायोगरूपाय नमः, लोकाग्रवासिने नमो नमः, परमसिद्धेभ्यो नमो नमः, अर्हत्सिद्धेभ्यो नमो नमः, केवलिसिद्धेभ्यो नमो नमः, अन्तकृत्सिद्धेभ्यो नमो नमः, परम्परसिद्धेभ्यो नमः, अनादिपरम्परसिद्धेभ्यो नमो नमः, अनाद्यनुपमसिद्धेभ्यो नमो नमः, सम्यग्दृष्टे सम्यग्दृष्टे आसन्नभव्य आसन्नभव्य निर्वाण-पूजार्ह निर्वाणपूजार्ह अग्नीन्द्र स्वाहा, सेवाफलं षट्परमस्थानं भवतु, अपमृत्युविनाशनं भवतु, समाधिमरणं भवतु ।पीठिका मन्त्र एष स्यात् पदैरेभिः समुच्चितैः । जातिमन्त्रमितो वक्ष्ये यथाश्रुतमनुक्रमात् ॥२६॥
ऊपर कहे हुए सब मन्त्रोंका संग्रह इस प्रकार है-सत्यजाताय नमः, अर्हज्जाताय नमः, परमजाताय नमः, अनुपमजाताय नमः, स्व-प्रधानाय नमः, अचलाय नमः, अक्षयाय नमः, अव्याबाधाय नमः, अनन्तज्ञानाय नमः, अनन्त-दर्शनाय नमः, अनन्तवीर्याय नमः, अनन्तसुखाय नमः, नीरजसे नमः, निर्मलाय नमः, अच्छेद्याय नमः, अभेद्याय नमः, अजराय नमः, अमराय नमः, अप्रमेयाय नमः, अगर्भवासाय नमः, अक्षो-भ्याय नमः, अविलीनाय नमः, परमधनाय नमः, परमकाष्ठायोगरूपाय नमः, लोकाग्रवासिने नमो नमः, परमसिद्धेभ्यो नमो नमः, अर्हत्सिद्धेभ्यो नमो नमः, केवलिसिद्धेभ्यो नमो नमः, अन्त-कृत्सिद्धेभ्यो नमो नमः, परम्परसिद्धेभ्यो नमो नमः, अनादिपरम्परसिद्धेभ्यो नमो नमः, अनाद्यनु-प्रमसिद्धेभ्यो नमो नमः, सम्यग्दृष्टे सम्यग्दृष्टे आसन्नभव्य आसन्नभव्य निर्वाणपूजार्ह निर्वाणपूजार्ह अग्नीन्द्र स्वाहा, सेवाफलं षट्परमस्थानं भवतु, अपमृत्यु विनाशनं भवतु, समाधिमरणं भवतु । इस प्रकार इन समस्त पदोंके द्वारा यह पीठिका मन्त्र कहा, अब इसके आगे शास्त्रोंके अनुसार अनुक्रमसे जातिमन्त्र कहते हैं ।। २६ ।।
The collection of all the aforementioned mantras is as follows:
Salutations to the True-born,Salutations to the Venerable-born,
Salutations to the Supreme-born,Salutations to the Incomparable-born,Salutations to the Self-exalted,
Salutations to the Immovable,Salutations to the Imperishable,
Salutations to the Unobstructed,Salutations to the Infinite Knowledge,Salutations to the Infinite Vision,Salutations to the Infinite Power,Salutations to the Infinite Bliss,Salutations to the Passionless,Salutations to the Pure,Salutations to the Indivisible,
Salutations to the Impenetrable,Salutations to the Ageless,
Salutations to the Deathless,Salutations to the Incomprehensible,
Salutations to the Unborn,Salutations to the Unshakable,
Salutations to the Unmerged,Salutations to the Supreme Treasure,
Salutations to the Embodiment of the Supreme Attainment,
Repeated salutations to the One Who Abides at the Summit of the Worlds,Repeated salutations to the Supreme Siddhas,
Repeated salutations to the Arhat Siddhas,Repeated salutations to the Kevali Siddhas,Repeated salutations to the Siddhas who have ended the cycle of birth,Repeated salutations to the Transcendent Lineage of Siddhas,Repeated salutations to the Primordial Line of Siddhas,Repeated salutations to the Siddhas manifest from the beginningless origin.To the Rightly-Seeing, the Rightly-Seeing,
To those Near to Liberation, those Near to Liberation,
To the Worthy of Nirvāṇa Worship, the Worthy of Nirvāṇa Worship,Obeisance to the Fire-lord — Svāhā.May the fruit of my service be the attainment of the six supreme abodes;
May untimely death be vanquished;May I attain death in the state of meditative absorption (samādhi).
Thus is concluded the Pīṭhikā Mantra, comprised of these sacred invocations.Now, in accordance with the scriptures, the Jāti Mantras (mantras pertaining to the spiritual birth) shall be declared in due sequence.॥26॥
श्लोक ( Shlok ) 27 –30
सत्यजन्मपदं तान्तमादौ शरणमप्यतः । प्रपद्यामीति वाच्यं स्यादर्हज्जन्मपदं तथा ॥२७॥अर्हन् मातृपदं ‘तद्वत्त्वन्तम र्हत्सुताक्षरम् ।अनादिगमनस्येति तथाऽनुपमजन्मनः ॥ २८॥ रत्नत्रयस्य शरणं प्रपद्यामीत्यतः परम् । बोद्ध्यन्तं च ततः सम्यग्दृष्टि द्वित्वेन योजयेत् ॥२९॥ ज्ञानमूर्तिपदं तद्वत्सरस्वतिपदं तथा । स्वाहान्तमन्ते वक्तव्यं काम्यमन्त्रश्च पूर्ववत् ॥३०॥
चूणिः सत्यजन्मनः शरणं प्रपद्यामि, अईजन्मनः शरणं प्रपद्यामि, अन्मानुः शरणं प्रपद्यामि, अर्हत्सुतस्य शरणं प्रपद्यामि, अनादिगमनस्य शरणं प्रपद्यामि, अनुपमजन्मनः शरणं प्रपद्यामि, रुनत्रयस्थ शरणं प्रपद्यामि, हैं सभ्यग्दृष्टे हे सम्यग्दछे, हे ज्ञानमूर्ते, ज्ञानमुळे हे सरस्वति, हे सरस्वति स्वाहा, संवाफलं षट्पश्मस्थानं मवतु, अपमृत्युविनाशनं मवतु ।
तान्त अर्थात् षष्ठीविभक्त्यन्त सत्यजन्म पदके आगे शरण और उसके आगे प्रपद्यामि शब्द कहना अर्थात् ‘सत्यजन्मनः शरणं प्रपद्यामि’ (मैं सत्यरूप जन्मको धारण करनेवाले जिनेन्द्रदेवका शरण लेता हूं), इस प्रकार कहना चाहिये । इसके बाद ‘अर्हज्जन्मनः शरणं प्रपद्यामि’ (मैं अरहन्त पदके योग्य जन्म धारण करनेवाले का शरण लेता हूं) ‘अर्हन्मातुः शरणं प्रपद्यामि’ (अर्हन्तदेवकी माताका शरण लेता हूं,) ‘अर्हत्सुतस्य शरणं प्रपद्यामि’ (अरहन्तदेवके पुत्रका शरण लेता हूं), ‘अनादिगमनस्य शरणं प्रपद्याश्चि’ (अनादि ज्ञानको धारण करनेवालेका शरण लेता हूं), ‘अनुपमजन्मनः शरणं प्रभद्यामि’ (उपमारहित जन्मको धारण करनेवालेका शरण लेता हूं) और ‘रत्नत्रयस्य शरणं प्रपद्यामि’ (रत्नत्रयका शरण ग्रहण करता हूं) ये मन्त्र बोलना चाहिये । तदनन्तर सम्बोधन विभक्त्यन्त सम्यग्दृष्टि, ज्ञानमूर्ति और सरस्वती पदका दो दो बार उच्चारणकर अन्तमें स्वाहा शब्द बोलना चाहिये अर्थात् सम्यग्दृष्टे सम्यग्दृष्टे, ज्ञानमूर्ते, ज्ञानमूर्ते, सरस्वति सरस्वति, स्वाहा (हे सम्यग्दृष्टे हे सम्यग्दृष्टे, हे ज्ञानमूर्ते हे ज्ञानमूर्ते, हे सरस्वति, हे सरस्वति, मैं तेरे लिये हवि समर्पण करता हूं) यह मन्त्र कहना चाहिये और फिर काम्य मन्त्र पहले के समान ही पढ़ना चाहिये ।। २७-३०।।
One should now recite the following mantras with reverence and correct grammatical form. Using the sixth case (ṣaṣṭhī-vibhakti), the word satyajanma (true birth) is to be followed by śaraṇaṁ (refuge), and thereafter by prapadyāmi (I take refuge), forming the invocation:“Satyajanmanaḥ śaraṇaṁ prapadyāmi”
— I take refuge in the Lord Jina who has assumed the birth of truth.Next, one should similarly recite:“Arhajjanmanaḥ śaraṇaṁ prapadyāmi”— I take refuge in Him who has taken birth worthy of the Arhat-state.“Arhanmātuḥ śaraṇaṁ prapadyāmi”— I take refuge in the mother of the Arhat.“Arhatsutasya śaraṇaṁ prapadyāmi”— I take refuge in the son of the Arhat.“Anādigamanasya śaraṇaṁ prapadyāmi”
— I take refuge in Him who embodies the beginningless path of knowledge.“Anupamajanmanaḥ śaraṇaṁ prapadyāmi”— I take refuge in Him who has taken an incomparable birth.“Ratnatrayasya śaraṇaṁ prapadyāmi”— I take refuge in the Three Jewels (Ratnatraya).Thereafter, the words Samyagdṛṣṭi (Right Vision), Jñānamūrti (Embodiment of Knowledge), and Sarasvatī (Goddess of Wisdom) should be recited twice each in the vocative case, followed by the oblation mantra svāhā:“Samyagdṛṣṭe, samyagdṛṣṭe; jñānamūrte, jñānamūrte; Sarasvati, Sarasvati — svāhā”— O Seer of Truth, O Seer of Truth!
O Embodiment of Knowledge, O Embodiment of Knowledge!
O Goddess Sarasvatī, O Goddess Sarasvatī!
To You I offer this sacred oblation — svāhā. Having thus spoken this mantra, one should again recite the kāmya mantra as previously described.॥27–30॥
श्लोक ( Shlok ) 31
जातिमन्त्रोऽयमाम्नातो जातिसंस्कारकारणम् । मन्त्रं निस्तारकादि च यथाम्नायमितो ब्रुवे ॥३१॥निस्तारकमन्त्र:–
ऊपर कहे हुए पीठिका मन्त्रोंका संग्रह इस प्रकार है-‘सत्यजन्मनः शरणं प्रपद्यामि, अर्हज्जन्मनः शरणं प्रपद्यामि, अर्हन्मातुः शरणं प्रपद्यामि, अर्हत्सुतस्य शरणं प्रपद्यामि, अनादिगमनस्य शरणं प्रपद्यामि, अनुपमजन्मनः शरणं प्रपद्यामि, रत्नत्रयस्य शरणं प्रपद्यामि, सम्यग्दृष्टे सम्यग्दृष्टे ज्ञानमूर्ते ज्ञानमूर्ते, सरस्वति सरस्वति स्वाहा, सेवाफलं षड्परमस्थानं भवतु, अपमृत्युविनाशनं भवतु, समाधिमरणं भवतु ।’ ये मन्त्र जातिसंस्कारका कारण होनेसे जाति मन्त्र कहलाते हैं अब इसके आगे निस्ता-रक मन्त्र कहते हैं ।।३१।।
The collection of the foregoing Pīṭhikā mantras is as follows:“Satyajanmanaḥ śaraṇaṁ prapadyāmi,
Arhajjanmanaḥ śaraṇaṁ prapadyāmi,
Arhanmātuḥ śaraṇaṁ prapadyāmi,
Arhatsutasya śaraṇaṁ prapadyāmi,
Anādigamanasya śaraṇaṁ prapadyāmi,
Anupamajanmanaḥ śaraṇaṁ prapadyāmi,
Ratnatrayasya śaraṇaṁ prapadyāmi,
Samyagdṛṣṭe samyagdṛṣṭe, jñānamūrte jñānamūrte,
Sarasvati sarasvati, svāhā.
Sevāphalaṁ ṣaṭparamasthānaṁ bhavatu,
Apamṛtyuvināśanaṁ bhavatu,
Samādhimaraṇaṁ bhavatu.”These sacred invocations, being the cause of the Jāti-saṁskāra (the rite of spiritual birth), are known as the Jāti Mantras.Now, the Nistāraka Mantras—mantras that lead to liberation—shall be revealed.॥31॥
श्लोक 32 से 42
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205
आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223 | श्लोक 224 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 293 | श्लोक 294 से 303 | श्लोक 304 से 313
आदिपुराण पर्व 39 – दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211
आदिपुराण पर्व 40 – द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23
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