आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वतकी गुफाका द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101
श्लोक 102 से 111 : कृतमाल देव की भक्ति और सेवा
कृतमाल देव ने भरत को छह खंडों का शासक और ऐश्वर्यशाली बताया, उनकी कीर्ति और सरस्वती की स्वच्छंदता की प्रशंसा की। उन्होंने सेना के शब्दों से भयभीत होकर भरत की सेवा में आने की बात कही। देव ने स्वयं को विजयार्थ पर्वत का निवासी और मर्मज्ञ बताते हुए भरत के अधीन होने की घोषणा की, कहा कि उनकी जानकारी समस्त द्वीप और समुद्र तक फैली है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 31 – Shlok 102 to 111
श्लोक ( Shlok ) 102
गीर्वाणा वयमन्यत्र जिगीषौ शितगीश्शराः। त्वयि कुण्ठगिरो जाताः प्रस्खलद्गर्वगद्गदाः ।।१०२ll
हम गीर्वाण हैं और आपके अतिरिक्त विजयकी इच्छा करनेवाले किसी दूसरे पुरुपके विषय में यद्यपि हम वचनरूपी तीक्ष्ण वाणोंको धारण करते हैं तथापि आपके विषयमे हम लोग कुण्ठितवचन हो रहे हैं, हमारा अहंकार जाता रहा है और हमारे वचन गद्गद् स्वरसे निकल रहे हैं ।॥१०२॥
We are the Gīrvāṇas—celestials skilled in speech—and though we wield words as sharp as arrows against any man who dares aspire to conquest besides yourself, in your presence our speech grows humbled. Our pride is dispelled, our voices falter, and our words emerge in a choked and trembling tone.Verse 102
श्लोक ( Shlok ) 103
‘राजोक्तिस्त्वयि राजेन्द्र राजतेऽनन्यगामिनी । अखण्डमण्डलां कृत्स्नां षट्खण्डां गां नियच्छति ॥१०३।।
हे राजेन्द्र, आप छह खण्डोंमें बँटी हुई समस्त प्रदेश सहित इस संपूर्ण पृथिवी का शासन करते हैं इसलिये दूसरी जगह नहीं रहनेवाली राजोक्ति आपमें ही सुयोभित हो रही है-आप ही वास्तवमें राजा हैं ।॥ १०३॥
O Sovereign of Kings, you rule over the entire earth, divided into six realms, and thus the regal title that cannot exist elsewhere, shines resplendently in you alone. Truly, you are the rightful King.Verse 103
श्लोक ( Shlok ) 104
चक्रात्मना ज्वलत्येष प्रतापस्तव दुःसहः । प्रथते दण्डनीतिश्च दण्डरत्नछलाद् विभोः ॥१०४।॥
हे विभो, चक्ररत्नके बहानेसे यह आपका दुःसह प्रताप देदीप्यमान हो रहा है और दण्डरत्नके छलसे आपकी दंड नीति प्रसिद्ध हो रही है ।।१०४।।
O Almighty One, through the brilliance of your Wheel of Sovereignty, your formidable power shines forth in a manner unparalleled, and through the cunning of your Rod of Justice, your righteous rule becomes renowned across the lands.Verse 104
श्लोक ( Shlok ) 105
ईशितव्या मही कृत्स्ना स्वतन्त्रस्त्वमसीश्वरः । निधिरवर्द्धिरेश्वर्य कः परस्त्वादृशः प्रभुः ॥१०५॥
यह समस्त पृथिवी आपके आधीन है-पालन करने योग्य है, आप इसके स्वतन्त्र ईश्वर हैं और निधियाँ तथा रत्न ही आपका ऐश्वर्य है इसलिये आपके समान ऐश्वर्यशाली दूसरा कौन है ? ॥१०५।।
The entire earth lies under your dominion, worthy of your care; you are its sovereign deity, its independent Lord. Treasures and jewels are your glory, and thus, who could be as affluent and powerful as you?Verse 105
श्लोक ( Shlok ) 106
भ्रमत्येकाकिनी लोकं शश्वत्कीर्तिरनर्गला’। सरस्वती च वाचाला कथं ते ते प्रिये प्रभोः ॥१०६।।
हे प्रभो, आपकी कीर्ति स्वच्छन्द होकर समस्त लोकमें सदा अकेली फिरा करती है और सरस्वती वाचाल है अर्थात् बहुत बोलनेवाली है फिर भी न जाने ये दोनों ही स्त्रियां आपको प्रिय क्यों हैं? ॥ १०६ ॥
O Lord, your fame roams freely across all realms, ever resplendent and solitary, while Sarasvatī, the loquacious goddess of speech, speaks without restraint. Yet, even so, it remains a mystery why these two—your renowned glory and the eloquent goddess—hold such a place of favor in your heart.Verse 106
श्लोक ( Shlok ) 107
इति प्रतीतमाहात्म्यं त्वां सभाजयितुं दिवः । त्वद्धलध्वानसंक्षोभसाध्वसाद् वयमागताः ॥१०७॥
इस प्रकार जिनका माहात्म्य प्रसिद्ध है ऐसे आपकी सेवा करनेके लिये हम लोग आपकी सेनाके शब्दके क्षोभसे भयभीत हो आकाश से यहां आये हैं ।॥ १०७॥
Thus, having heard of your renowned greatness, we, struck with fear by the tumultuous roar of your armies, have come down from the sky to serve you here, trembling at the very sound of your exalted forces.Verse 107
श्लोक ( Shlok ) 108
कूटस्था वयमस्थादेः स्वपदा दविचालिनः । भूमिमेतावर्ती तावत् त्वया देवावतारिताः ॥१०८॥
हे देव, हम लोग इस पर्वतकी शिखरपर रहते हैं और अपने स्थानसे कभी भी विचलित नहीं होते परन्तु इस भूमि पर आपके द्वारा ही अवतारित हुए हैं- उतारे गये हैं ।। १०८।।
O Divine One, we reside upon the peaks of this mountain, steadfast and unmoving in our place, yet it is by your divine will that we have descended to this earthly realm—sent forth by you to fulfill your purpose.Verse 108
श्लोक ( Shlok ) 109
विप्रकृष्टान्तरावासवासिनो व्यन्तरा वयम् । संविधेयास्त्वये दानीं प्रत्यासन्नाः पदातयः ॥१०९।॥
हम लोग दूर दूर तक अनेक स्थानोंमे रहनेवाले व्यन्तर हैं अब आप हम लोगोंको अपने समीप रहनेवाले सेवक बना लीजिये ॥ १०९॥
We are the Vyantaras, roaming across distant lands and vast spaces. O Lord, make us your humble attendants, residing near you, serving at your side as devoted servants.Verse 109
श्लोक ( Shlok ) 110
विद्धि मां विजयार्द्धस्य मर्मज्ञमभृताशनम् । कृतमालं गिरेरस्य कूटेऽमुष्मिन् कृतालयम् ॥११०॥
आप मुझे इस पर्वतके इस शिखरपर रहनेवाला और विजयार्ध पर्वतका मर्म जाननेवाला कृतमाल नामका देव जानिये ।।११०।।
Know me to be Kṛtamāla, the divine being who resides upon the peak of this mountain and is well-versed in the secret of Mount Vijaya-Ardha.Verse 110
श्लोक ( Shlok ) 111
मयि स्वसात्कृते देव स्वीकृतोऽयं महाचलः । सगुहाकाननस्यास्य गिरेर्गर्भविदस्म्यहम् ॥१११॥
हे देव, आपने मुझे वश कर लिया है इसलिये इस महापर्वतको अपने आधीन हुआ ही समझिये क्योंकि मैं गुफाओं और वन सहित इस पर्वतका समस्त भीतरी हाल जानता हूँ ।।१११।।
O Divine One, you have conquered me, and thus, consider this grand mountain as now under your dominion. For I am well-acquainted with its inner secrets, including its caves and forests, and all that lies within its vast expanse.Verse 111
श्लोक 112 से 121
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221
आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 66 | श्लोक 67 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 169
आदिपुराण पर्व 30 – पश्चिम समुद्र के द्वारका विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 34 | श्लोक 35 से 50 | श्लोक 51 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 129
आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वतकी गुफाका द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101