आदिपुराण पर्व 24 – भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 |
श्लोक 42 से 51 भरत की भगवान् वृषभदेव की स्तुति (भाग 2)
भरत भगवान् को उत्तम, स्थिर, अचल, और संसार का अंत करने वाला कहते हैं। वे उनके आठ प्रातिहार्यों और छत्रत्रितय की शोभा की प्रशंसा करते हैं। भगवान् का सिंहासन लोकभार धारण करने वाला प्रतीत होता है। भरत उनकी भक्ति में तल्लीन होकर स्तुति करते हैं।
English translation of Ādi purāṇa parv 24 – Shlok 42 to 51
श्लोक ( Shlok ) 42
यज्वाज्यं च त्वमिज्या व पुण्यो गग्यो गुणाकरः । त्वमपारि रपारश्च त्वममध्योऽपि मध्यमः ॥४२॥
आप ही यज्वा हैं―यज्ञ करने वाले हैं, आज्य हैं―घृतरूप हैं, पूजारूप हैं, अपरिमित पुण्यस्वरूप हैं, गुणों की खान हैं, शत्रुरहित हैं, पापरहित हैं, और मध्यरहित होकर भी मध्यम हैं । भावार्थ―भगवान् निश्चयनय की अपेक्षा अनादि और अनंत हैं जिसका आदि और अंत नहीं होता उसका मध्य भी नहीं होता । इसलिए भगवान के लिए यहाँ कवि ने अमध्य अर्थात् मध्यरहित कहा है परंतु साथ ही मध्यम भी कहा है । कवि की इस उक्ति में यहाँ विरोध आता है परंतु अब मध्यम शब्द का ‘मध्ये मा अनंतचतुष्टयलक्ष्मीर्यस्य स:’―जिसके बीच में अनंतचतुष्टयरूप लक्ष्मी है ऐसा अर्थ किया जाता है तब वह विरोध दूर हो जाता है । यह विरोधाभास अलंकार है ।।42।।
You are the Yajva—the performer of sacred rituals, the Ajya—the essence of ghee, the embodiment of worship, the infinite form of merit, the repository of virtues, free from enemies, free from sins, and though devoid of a middle, still considered the ‘middle’.
Meaning: From the perspective of the absolute viewpoint (Nishchaya Naya), the Lord is beginningless and endless. That which has neither a beginning nor an end cannot have a middle. Therefore, the Lord is described as ‘Amadhya’ (without a middle). However, He is also called ‘Madhyama’ (middle) because He embodies the infinite fourfold excellences (infinite knowledge, perception, power, and bliss) at the center of His existence. This apparent contradiction is a poetic device known as Virodhābhāsa Alankara (the figure of speech involving a paradox).” ( 42)
श्लोक ( Shlok ) 43
उत्तमोऽनुत्तरो ज्येष्ठो गरिष्ठः स्थेष्ठ एव च।त्वमणीयान् महीयांश्च” स्थवीयान् गरिमास्पदम् ।। ४३ll
हे भगवन् आप उत्तम होकर भी अनुत्तम हैं (परिहार पक्ष में ‘नास्ति उत्तमो यस्मात्स:’ ―जिससे बढ़कर और दूसरा नहीं है) ज्येष्ठ हैं, सबसे बड़े गुरु हैं, अत्यंत स्थिर हैं, अत्यंत सूक्ष्म हैं, अत्यंत बड़े हैं, अत्यंत स्थूल हैं और गौरव के स्थान हैं ।।43।।
“O Lord, You are supreme, yet incomparable (‘Anuttama’ — there is none greater than You). You are the greatest, the highest teacher, exceedingly steadfast, extremely subtle, immensely vast, remarkably gross, and the very abode of majesty and glory.” ( 43)
श्लोक ( Shlok ) 44
महान् महीयितो “मह्यो भूष्णुः स्थास्नु रनश्वरः । जित्वरो ऽनित्वरो नित्यः शिवः शान्तो भवान्तकःll ४४ll
आप बड़े हैं, क्षमा गुण से पृथ्वी के समान आचरण करने वाले हैं, पूज्य हैं, भवनशील (समर्थ) हैं, स्थिर स्वभाव वाले हैं, अविनाशी हैं, विजयशील हैं, अचल हैं, नित्य हैं, शिव हैं, शांत हैं, और संसार का अंत करने वाले हैं ।।44।।
“You are great, embodying the virtue of forgiveness like the earth, worthy of worship, capable and powerful, steady in nature, imperishable, victorious, immovable, eternal, auspicious, peaceful, and the one who brings an end to worldly existence.” ( 44)
श्लोक ( Shlok ) 45
त्वं हि ब्रह्मविदां ध्येयस्त्वं हि ब्रह्मपदेश्वरः । त्वां नाममालया देवमित्यभिष्टुमहे वयम् ॥४५॥
हे देव, आप ब्रह्मविद् अर्थात् आत्मस्वरूप के जानने वालों के ध्येय हैं―ध्यान करने योग्य हैं और ब्रह्मपद―आत्मा की शुद्धि पर्याय के ईश्वर हैं । इस प्रकार हम लोग अनेक नामों से आपकी स्तुति करते हैं ।।45।।
“O Lord, You are the object of meditation for those who realize the true self (Brahmavid) and the supreme ruler of the pure state of the soul (Brahmapada). In this way, we praise You by various names.” ( 45)
श्लोक ( Shlok ) 46
अष्टोत्तरशतं नाम्नामित्यनुध्याय चेतसा । त्वामीडे नीडमीडानां प्रातिहार्याष्टकप्रभुम् ॥४६॥
हे भगवन इस प्रकार आपके एक सौ आठ नामों का हृदय से स्मरण कर मैं आठ प्रातिहार्यों के स्वामी तथा स्तुतियों के स्थानभूत आपकी स्तुति करता हूँ ।।46।।
“O Lord, thus, by remembering Your one hundred and eight names with devotion, I offer my praises to You, the master of the eight miraculous attributes (Pratiharyas) and the supreme object of all hymns of praise.” ( 46)
श्लोक ( Shlok ) 47
तवायं प्रचलच्छाखस्तुङ्गोऽशोकमहाद्विपः । स्वच्छायासंश्रितान् पाति त्वतः शिक्षामिवाश्रितः ॥४७॥
हे भगवन् जिसकी शाखाएँ अत्यंत चलायमान हो रही है ऐसा यह ऊँचा अशोक महावृक्ष अपनी छाया में आये हुए जीवों की इस प्रकार रक्षा करता है मानो इसने आपसे ही शिक्षा पायी हो ।।47।।
“O Lord, this tall Ashoka tree, with its branches swaying vigorously, protects the beings who come under its shade, as if it has learned the art of compassion and shelter directly from You.” ( 47)
श्लोक ( Shlok ) 48
तवामी चामरव्राता यक्षैरुत्क्षिप्य वीजिताः। निर्धुनन्तीव निर्व्याजभागोगोमक्षिका नृणाम् ॥४८॥
यक्षों के द्वारा ऊपर उठाकर ढोले गये ये आपके चमरों के समूह ऐसे जान पड़ते हैं मानो बिना किसी छल के मनुष्यों के पापरूपी मक्खियों को ही उड़ा रहे हों ।।48।।
“The clusters of your chauris (fly-whisks) carried aloft by the Yakshas appear as if they are effortlessly driving away the fly-like sins of humans, without any deceit.” ( 48)
श्लोक ( Shlok ) 49
त्वामापतन्ति परितः सुमनोऽन्जलयो दिवः । तुष्टया स्वर्गलक्ष्म्येव मुक्ता इर्षाश्रुबिन्दवः ॥४९॥
हे नाथ, आपके चारों ओर स्वर्ग से जो पुष्पांजलियों की वर्षा हो रही है वह ऐसी जान पड़ती है मानो संतुष्ट हुई स्वर्गलक्ष्मी के द्वारा छोड़ी हुई हर्षजनित आँसुओं की बूँदें ही हों ।।49।।
“O Lord, the shower of flower garlands descending from the heavens around You appears as if they are droplets of joyful tears shed by the goddess of prosperity (Swargalakshmi), overwhelmed with devotion and satisfaction.” ( 49)
श्लोक ( Shlok ) 50
छत्रत्रितयमाभाति सूच्छ्रितं जिन तावकम् । मुक्तालम्वनविभ्राजि लक्ष्म्याः क्रीडास्थलायितम् ॥५०॥
हे जिनेंद्र, मोतियों के जाल से सुशोभित और अतिशय ऊँचा आपका यह छत्रत्रितय ऐसा जान पड़ता है मानो लक्ष्मी का क्रीड़ास्थल ही हो ।।50।।
“O Jinendra, Your trio of canopies, adorned with pearl nets and towering high, appears as if it is the very playground of the goddess of prosperity (Lakshmi).” (50)
श्लोक ( Shlok ) 51
तव हर्यासनं भाति विश्वभर्तुर्भवद्भरम् । कृतयत्नैरिवोद्वोढुं न्य ग्भूयोढं मृगाधिपैः ॥५१॥
हे भगवन् सिंहों के द्वारा धारण किया हुआ यह आपका सिंहासन ऐसा सुशोभित हो रहा है मानों आप समस्त लोक का भार धारण करने वाले हैं―तीनों लोकों के स्वामी हैं इसलिए आपका बोझ उठाने के लिए सिंहों ने प्रयत्न किया हो, परंतु भार की अधिकता से कुछ झुककर ही उसे धारण कर सके हों ।।51।।
“O Lord, Your throne, upheld by lions, appears so splendid as if You, being the Lord of all realms and the bearer of the entire universe, are so mighty that the lions, despite their effort, can only support it by slightly bending under its immense weight.” ( 51)
श्लोक 52 से 61
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण पर्व 24 – भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 |