आदिपुराण पर्व 39 – दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131
श्लोक 132 से 141 द्विज की शुद्धि और अशुद्धि
क्षमा, शौच, संतोष, और निर्दोष आचरण से युक्त द्विज सर्वोत्तम हैं। मलिन आचार, हिंसा, और पापकर्म करने वाले ब्राह्मण नहीं, बल्कि कर्मचांडाल हैं। हिंसक धर्म को मानने वाले निर्दय, लुटेरे, और दंडनीय हैं। जैन लोग निर्मल आचार से शुक्लवर्ग में, जबकि मिथ्यादृष्टि पापियों के कृष्णवर्ग में गिने जाते हैं। द्विज की शुद्धि श्रुति, स्मृति, पुराण, सदाचार, मंत्र, और कामनाश से होती है। दया न्याय और हिंसा अन्याय है, जिससे शुद्धि-अशुद्धि का निर्णय होता है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 39- Shlok 132 to 141
श्लोक ( Shlok ) 132
वर्णोत्तमानिमान् विद्मः क्षान्तिशौचपरायणान् । सन्तुष्टान् प्राप्तवैशिष्टयान क्लिष्टाचारभूषणान् ॥१३२॥
जो क्षमा और शौच गुणके धारण करनेमें सदा तत्पर हैं, संतुष्ट रहते हैं, जिन्हें विशेषता प्राप्त हुई है और निर्दोष आचरण ही जिनका आभूषण है ऐसे इन द्विजोंको सब वर्णोंमें उत्तम मानते हैं ।॥१३२॥
Those ever ready to embody the virtues of forgiveness and purity, content in their state, endowed with distinction, and adorned solely by faultless conduct — such Dvijas are esteemed as the highest among all castes.132
श्लोक ( Shlok ) 133
‘क्लिष्टाचाराः परे नैव बाह्मणा द्विजमानिनः । पापारम्भरता शश्वदाहत्य पशुघातिनः ॥ १३३॥
इनके सिवाय जो मलिन आचारके धारक हैं, अपनेको झूठमूठ द्विज मानते हैं, पापका आरम्भ करनेमें सदा तत्पर रहते हैं और हठपूर्वक पशुओंका घात करते हैं वे ब्राह्मण नहीं हो सकते ॥ १३३॥
Apart from these, those who bear impure conduct, falsely claim the title of Dvija, eagerly initiate sin, and stubbornly commit harm upon living beings — such ones can never be true Brāhmaṇas. 133
श्लोक ( Shlok ) 134
सर्वमेधमयं धर्ममभ्युपेत्य पशुघ्नताम् । का नाम गतिरेषां स्यात् पापशास्त्रोपजीविनाम् ॥१३४।।
जो समस्त हिंसामय धर्म स्वीकार कर पशुओंका घात करते हैं ऐसे पापशास्त्रोंसे आजीविका करनेवाले इन ब्राह्मणोंकी न जाने कौन सी गति होगी ? ॥१३४॥
Those who embrace a faith steeped in violence and slay living beings, earning their livelihood through sinful scriptures—what fate, one wonders, awaits such Brāhmaṇas?134
श्लोक ( Shlok ) 135
चोदनालक्षणं धर्ममधर्म प्रतिजानते। ये तेभ्यः कर्मचाण्डालान् पश्यामो नापरान् भुवि ॥१३५॥
जो अधर्म स्वरूप वेदमें कहे हुए प्रेरणात्मक धर्मको धर्म मानते हैं मैं उनके सिवाय इस पृथिवीपर और किसीको कर्म चाण्डाल नहीं देखता हूं अर्थात् वेदमें कहे हुए धर्मको माननेवाले सबसे बढ़कर कर्म चाण्डाल हैं ।। १३५॥
Those who accept as dharma the injunctions of the Vedas that embody unrighteousness and provoke wrongdoing—apart from them, I see none else in this world as greater Karma-Chāṇḍālas; indeed, those who uphold such Vedic dharma are the foremost among the karmic outcasts.135
श्लोक ( Shlok ) 136
पार्थिवैर्दण्डनीयाश्च लुण्टाकाः पापपण्डिताः । तेऽमी धर्मजुषां बाह्या ये निघ्नन्त्यघृणाः पशून् ॥१३६॥
जो निर्दय होकर पशुओंका घात करते हैं वे पापरूप कार्यों में पंडित हैं, लुटेरे हैं, और धर्मात्मा लोगोंसे बाह्य हैं; ऐसे पुरुष राजाओंके द्वारा दण्डनीय होते हैं ।। १३६ ।।
Those who mercilessly slay living beings are masters of sinful deeds, akin to marauders, and are alien to the righteous; such men are justly punishable by kings. 136
श्लोक ( Shlok ) 137
“पशुहत्यासमारम्भात् क्रव्यादेभ्योऽपि निष्कृपाः । यद्युच्छ्रिति “मुशन्त्येते हन्तैवं धार्मिका हताः ॥१३७।।
पशुओंकी हिंसा करनेके उद्योगसे जो राक्षसोंसे भी अधिक निर्दय हैं यदि ऐसे पुरुष ही उत्कृष्टताको प्राप्त होते हों तब तो दुःखके साथ कहना पड़ेगा कि बेचारे धर्मात्मा लोग व्यर्थ ही नष्ट हुए ॥१३७।।
If those who, by the enterprise of violence against living beings, are more ruthless than demons, are deemed to attain excellence, then alas, it must be lamented that the virtuous have perished in vain.137
श्लोक ( Shlok ) 138
मलिनाचरिता ह्यते ‘कृष्णवर्गे द्विजब्रुवाः । जैनास्तु निर्मलाचाराः ‘शुक्लवर्गे मता बुधैः ॥१३८॥
ये द्विज लोग मलिन आचारका पालन करते हैं और झूठमूठ ही अपनेको द्विज कहते हैं इसलिये विद्वान् लोग इन्हें कृष्णवर्ग अर्थात् पापियोंके समूहमें गर्भित करते हैं और जैन लोग निर्मल आचारका पालन करते हैं इसलिये इन्हें शुक्लवर्ग अर्थात् पुण्यवानोंके समूहमें शामिल करते हैं ।॥१३८॥
These Dvija who practice impure conduct and falsely claim the title of twice-born are, therefore, by the learned, classified among the Kṛṣṇavarga—the company of sinners. In contrast, the Jains, who uphold pure conduct, are included in the Śuklavarga—the assembly of the virtuous.138
श्लोक ( Shlok ) 139
*श्रुतिस्मृति’ पुरावृत्त वृत्तमन्त्रक्रियाश्रिता । देवतालिङगकामान्तकृता शुद्धिर्द्विजन्मनाम् ॥ १३९।।
द्विज लोगोंकी शुद्धि श्रुति, स्मृति, पुराण, सदाचार, मन्त्र और क्रियाओंके आश्रित है तथा देवताओंके चिह्न धारण करने और कामका नाश करनेसे भी होती है ॥१३९॥
The purity of the Dvija depends upon the Śruti, Smṛti, Purāṇa, virtuous conduct, sacred mantras, and prescribed rites; it is also attained by bearing the marks of the deities and by the destruction of desire.139
श्लोक ( Shlok ) 140
ये विशुद्धतरां वृत्तिं तत्कृतां समुपाश्रिताः । ते शुक्लवर्गे बोधव्याः शेषाः शुद्धेः बहिः कृता ॥१४०॥
जो श्रुत स्मृति आदिके द्वारा की हुई अत्यन्त विशुद्ध वृत्तिको धारण करते हैं उन्हें शुक्लवर्ग अर्थात पुण्यवानोंके समूहमें समझना चाहिये और जो इनसे शेष बचते हैं उन्हें शुद्धिसे बाहर समझना चाहिये अर्थात् वे महा अशुद्ध हैं ।॥१४०।।
Those who uphold the most pure conduct as prescribed by the Śruti, Smṛti, and other scriptures should be regarded as belonging to the Śuklavarga—the assembly of the virtuous. All others, who fall short of this standard, must be deemed outside purity and are truly profoundly impure. 140
श्लोक ( Shlok ) 141
तच्छुद्धयशुद्धी” बोधव्ये न्यायान्यायप्रवृत्तितः । न्यायो दयार्द्रवृत्तित्वमन्यायः प्राणिमारणम् ॥१४१।।
उनकी शुद्धि और अशुद्धि, न्याय और अन्यायरूप प्रवृत्तिसे जाननी चाहिये । दयासे कोमल परिणाम होना न्याय है और प्राणियोंका मारना अन्याय है ॥१४१॥
Their purity and impurity, righteousness and unrighteousness, must be discerned by their conduct. Compassion leading to gentle outcomes is justice; the taking of life, however, is injustice. 141
श्लोक 142 से 151
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205
आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223 | श्लोक 224 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 293 | श्लोक 294 से 303 | श्लोक 304 से 313
आदिपुराण पर्व 39 – दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131
Download PDF