आदिपुराण पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31
श्लोक 32 से 41 बुद्धिपालन और तत्त्वज्ञान
बुद्धिपालन अविद्या (मिथ्याज्ञान) का नाश करने से होता है। अर्हंतदेव का कहा ही तत्त्व है, जो ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय, और अंतराय कर्मों का क्षय कर चुके हैं। राजविद्या और धर्मशास्त्र का परिज्ञान बुद्धि को दृढ़ करता है। तीर्थंकर और वृषभदेव के चारित्र में स्थिर राजा महादेव कहलाते हैं, उनकी पत्नियां महादेवी। अन्य मतों के दावे (जैसे स्वयं को महादेव या तारक मानना) सारहीन हैं, क्योंकि केवल जिनेंद्रदेव का मार्ग ही संसार से तारता है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 42- Shlok 32 to 41
श्लोक ( Shlok ) 32
तत्पालनं कथं स्याच्चेदविद्यापरिवर्जनात् । मिथ्याज्ञानमविद्या स्याद तत्त्वे तत्त्वभावना ॥३२॥
उस बुद्धिका पालन किस प्रकार हो सकता है? यदि यह जानना चाहो तो उसका उत्तर यह है कि अविद्या का नाश करनेसे ही उसका पालन होता है। मिथ्या ज्ञानको अविद्या कहते हैं और अतत्त्वोंमें तत्त्ववृद्धि होना मिथ्या ज्ञान कहलाता है ।। ३२ ।।
How then is this discernment—buddhi—to be preserved? If this be your inquiry, know that its preservation lies in the destruction of avidyā, ignorance.
That which is false knowledge is called avidyā; and the exaltation of the non-essential in place of the essential—this indeed is the mark of deluded understanding. 32
श्लोक ( Shlok ) 33
आप्तोपज्ञं भवेत्तत्वमप्तो दोषावृति क्षयात् । तस्मात्तन्मतमभ्यस्येन्मनोमलमपासितुम् ॥३३॥
जो अरहंतदेवका कहा हुआ हो वही तत्त्व हो सकता है और अरहंत भी वही हो सकता है जो ज्ञानावरण दर्शनावरण मोहनीय और अन्त-राय कर्मका क्षय कर चुका हो। इसलिये अपने मनका मल दूर करनेके लिये अरहन्तदेवके मतका अभ्यास करना चाहिये ।। ३३ ।।
That alone may be deemed tattva—the true principle—which has been declared by the Arhant Lord; and verily, he alone is an Arhant who has annihilated the karmic veils of knowledge, perception, delusion, and obstruction.
Therefore, to cleanse the impurities of one’s own mind, one must earnestly cultivate the doctrine of the Arhant.33
श्लोक ( Shlok ) 34
राजविद्यापरिज्ञानादैहिकेऽर्थे दृढा मतिः । धर्मशास्त्रपरिज्ञानान्मतिर्लोकद्वयाश्रिता ॥ ३४।।
राजविद्याका परिज्ञान होनेसे इस लोक सम्बन्धी पदार्थों में बुद्धि दृढ़ हो जाती है और धर्मशास्त्रका परिज्ञान होनेसे इस लोक तथा परलोक दोनों लोक सम्बन्धी पदार्थोंमें दृढ़ हो जाती है ।। ३४ ।।
Through the knowledge of rājavidyā—the science of kingship—one’s intellect becomes steadfast in matters pertaining to this world; and through the knowledge of dharmāśāstra, it becomes firmly rooted in the understanding of both this world and the world beyond.34
श्लोक ( Shlok ) 35
क्षत्रियास्ती ‘र्थमुत्पाद्य येऽभूवन् परमर्षयः । ते महादेवशब्दाभिधेया माहात्म्ययोगतः ॥३५॥
जो क्षत्रिय तीर्थ उत्पन्न कर परमर्षि हो गये हैं वे अपने माहात्म्यके योगसे महादेव कहलाते हैं ।॥ ३५॥
Those Kṣatriyas who have established sacred Tīrthas and, through supreme renunciation, have become Paramarṣis, are—by virtue of their exalted glory—revered as Mahādevas.35
श्लोक ( Shlok ) 36
आदिक्षत्रियवृत्तस्थाः पार्थिवा ये महान्वयाः । महत्त्वानुगतास्तेऽपि महादेवप्रथां गताः ॥३६॥
बड़े बड़े वंशोंमें उत्पन्न हुए जो राजा लोग आदिक्षत्रिय-भगवान् वृषभदेवके चारित्रमें स्थिर रहते हैं वे भी माहात्म्यके योगसे महादेव इस प्रसिद्धिको प्राप्त हुए हैं ।॥ ३६॥
Kings born in illustrious lineages, who remained steadfast in the conduct exemplified by the primordial Kṣatriya—Lord Ṛṣabhadeva—have also, by the power of their spiritual eminence, attained the renowned title of Mahādeva.36
श्लोक ( Shlok ) 37
तद्देव्यश्च महादेव्यो महाभिजन’ योगतः । महद्भिः परिणीतत्वात् प्रसूतेश्च महात्मनाम् ॥३७॥
ऐसे पुरुषोंकी स्त्रियां भी बड़े पुरुषोंके साथ सम्बन्ध होनेसे-बड़े पुरुषोंके द्वारा विवाहित होनेसे और महापुरुषों को उत्पन्न करनेसे महादेवियां कहलाती हैं ।॥ ३७।।
The wives of such exalted men are likewise called Mahādevīs—by virtue of their union with noble souls, through being wedded to great men, and by giving birth to illustrious beings of divine stature.37
श्लोक ( Shlok ) 38 –39
इत्येवमास्थिते पक्ष जैनैरन्यमताश्रयी । यदि कश्चित् प्रतिब्रूयान्मिथ्यात्वोपहताशयः ॥३८॥ वयमेव महादेवा जगन्निस्तारका वयम् । नास्मदाप्तात् परोऽस्त्याप्तो मतं नास्मन्मतात्परम् ॥३९।।
इस प्रकार जैनियोंके द्वारा अपना पक्ष स्थिर कर लेनेपर मिथ्यादर्शनसे जिसका हृदय नष्ट हो रहा है ऐसा कोई अन्यमतावलम्बी पुरुष यदि कहे कि हम ही महादेव हैं, संसारसे तारनेवाले भी हम ही है, हमारे देवके सिवाय अन्य कोई देव नहीं हैं और हमारे धर्मके सिवाय अन्य कोई धर्म नहीं है ॥ ३८-३९॥
Thus, having firmly established their position through the doctrine of the Jinas, should some follower of a deluded creed—whose heart is being consumed by false vision—proclaim: “We alone are the Mahādevas; we alone are the saviours of the world; there exists no deity other than ours, and no true religion apart from our own,”—such a claim stands as the utterance of ignorance, born not of wisdom but of blindness, contrary to the truth upheld by the enlightened path of the Jinas.38 –39
श्लोक ( Shlok ) 40
इत्यत्र बूम हे नैतत्सारं संसारवारिधेः । यः समुत्तरणोपायः स मार्गो जिनदेशितः ॥४०॥
परन्तु इस विषयमें हम यही कहते हैं कि उसका यह कहना सारपूर्ण नहीं है क्योंकि संसारसमुद्रसे तिरनेका जो उपाय है वह जिनेन्द्रदेवका कहा हुआ मार्ग ही है ॥४०॥
But in this matter, we declare with certainty: such a claim holds no substance—for the true means of crossing the ocean of worldly existence lies solely in the path proclaimed by the Lord Jineśvara.40
श्लोक ( Shlok ) 41
आप्तोऽर्हन्वीत दोषत्वादा प्तम्मन्यास्ततोऽपरे । तेषु वागात्मभाग्यातिशयानामविभावनात् ॥४१॥
रागद्वेष आदि दोषोंसे रहित होनेके कारण एक अर्हन्तदेव ही आप्त हैं उनके सिवाय जो अन्य देव हैं वे सब आप्तंमन्य हैं अर्थात् झूठमूठ ही अपनेको आप्त मानते हैं क्योंकि उनमें वाणी, आत्मा और भाग्यके अतिशय का कुछ भी निश्चय नहीं है ।।४१।।
Free from the blemishes of attachment and aversion, the Arhant alone is truly Āpta—a perfectly trustworthy and enlightened one. All other so-called deities are merely āpta-mānya—those who falsely imagine themselves to be authoritative—for in them, there is no certain excellence of speech, soul, or destiny.41
श्लोक 42 से 51
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211
आदिपुराण पर्व 41 – भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 158
आदिपुराण पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31
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