आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 131
श्लोक 132 से 141 सर्वज्ञता और सप्तभंगी
भरत ने कहा कि घातिया कर्मों के नष्ट होने से भगवान के दर्शन, ज्ञान, और सुख प्रकट हुए। उनके केवलज्ञान ने लोक-अलोक को जाना। उनकी सप्तभंगी वाणी, जो पदार्थों के अस्तित्व, नास्तित्व, और अवक्तव्य स्वरूप को दर्शाती है, उनकी सर्वज्ञता को प्रमाणित करती है। यह वाणी विरोधरहित और सभी पदार्थों को समेटने वाली है, जो उनकी आप्तता को स्थापित करती है। अन्य देवों के वचनों में विरोध होता है, पर भगवान के उपदेश निर्भ्रान्त हैं।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 33 – Shlok 132 to 141
श्लोक ( Shlok ) 132
केवलाख्यं परं ज्योतिस्तव देव यदोदगात् । तदा लोकमलोकं च त्वमबद्धा विनावधेः ॥१३२॥
हे देव, जिस समय आपके केवल ज्ञान नामकी उत्कृष्ट ज्योति प्रकट हुई थी उसी समय आपने मर्यादाके बिना ही समस्त लोक और अलोकको जान लिया था ॥१३२॥
O Divine One, in the very moment Your supreme radiance of omniscience was unveiled, You beheld—without limit or boundary—the entirety of the cosmos and the transcendent realms beyond.132
श्लोक ( Shlok ) 133
सार्वज्ञयं तव वक्तीश वचः शुद्धिरशेषगा। न हि वाग्विभवो मन्दधियामस्तीह पुष्कलः ॥१३३॥
हे ईश, सब जगह जानेवाली अर्थात् संसारके सब पदार्थोंका निरूपण करनेवाली आपके वचनोंकी शुद्धि आपके सर्वज्ञपने को प्रकट करती है सो ठीक ही है क्योंकि इस जगत् में मन्द बुद्धि-वाले जीवों के इतना अधिक वचनोंका वैभव कभी नहीं हो सकता है ॥ १३३॥
O Lord, the flawless purity of Your speech—capable of reaching all realms and elucidating the nature of every substance in existence—truly reveals the majesty of Your omniscience; for verily, such eloquent and boundless expression can never arise from beings of feeble intellect within this world.133
श्लोक ( Shlok ) 134
वक्तृप्रामाण्यतो देव वचः प्रामाण्यमिप्यते । न ह्यशुद्धतराद् वक्तुः प्रभवन्त्युज्ज्वला गिरः ॥१३४॥
हे देव, वक्ता की प्रमाणतासे ही वचनोंकी प्रमाणता मानी जाती है क्योंकि अत्यन्त अशुद्ध वक्तासे उज्ज्वल वाणी कभी उत्पन्न नहीं हो सकती है ।।१३४।।
O Lord, the veracity of speech is acknowledged only through the authenticity of its speaker, for no radiant or pure words can ever emanate from a speaker who is tainted by impurity.134
श्लोक ( Shlok ) 135
सप्तभङ्ग्यात्मिकेयं ते भारती विश्वगोचरा । आप्तप्रतीति ममलां त्वय्युद्भावयितुं क्षमा ॥१३५॥
हे नाथ, समस्त पदार्थोंको विषय करनेवाली आपकी यह सप्तभंगरूप वाणी ही आपमें आप्तपने की निर्मल प्रतीति उत्पन्न कराने के लिये समर्थ है ॥१३५॥
O Lord, this sevenfold, perfectly structured speech of Yours, which comprehensively expounds upon all phenomena, is indeed capable of instilling a clear and pure realization of Your inherent perfection and transcendental truth. 135
श्लोक ( Shlok ) 136
स्यादस्त्येव हि नास्त्येव स्यादवक्तव्यमित्यपि । स्यादस्ति नास्त्यवक्तव्यमिति ते सार्व” भारती ॥१३६॥
हे सबका हित करनेवाले, आपकी सप्तभङ्गरूप वाणी इस प्रकार है कि जीवादि पदार्थ कथंचित् हैं ही, कथंचित् नहीं ही हैं, कथंचित् दोनों प्रकार ही हैं, कथंचित् अवक्तव्य ही हैं, कथंचित् अस्तित्व रूप होकर अवक्तव्य हैं, कथंचित् नास्तित्व रूप होकर अवक्तव्य हैं और कथंचित् अस्तित्व तथा नास्तित्व-दोनों रूप होकर अवक्तव्य हैं। विशेषार्थ-जैनागममें प्रत्येक वस्तुमें एक एक धर्मके प्रतिपक्षी धर्मकी अपेक्षासे सात सात भङ्ग माने गये हैं, जो कि इस प्रकार हैं-१ स्यादस्त्येव, २ स्यान्नास्त्येव, ३ स्यादस्ति च नास्त्येव, ४ स्यादवक्तव्यमेव, ५ स्यादस्ति चावक्तव्यं च ६ स्यान्नास्ति चावक्तव्यं च और ७ स्यादस्ति नास्ति चावक्तव्यं च । इनका स्पष्ट अर्थ यह है कि संसारकाप्रत्येक पदार्थ स्वचतुष्टय (द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव) की अपेक्षा अस्तित्व रूप ही है, परचतुष्टयकी अपेक्षा नास्तित्व रूप ही है और एक साथ दोनों धर्म नहीं कहे जा सकनेके कारण अवक्तव्य रूप भी है, इस प्रकार प्रत्येक पदार्थमें मुख्यतासे अस्तित्व, नास्तित्व और अवक्तव्य ये तीन धर्म पाये जाते हैं। इन्हीं मुख्य धर्मोके संयोगसे सात सात धर्म हो जाते हैं। जैसे ‘जीवोऽस्ति’ जीव है। यहांपर जीव और अस्तित्व क्रियामें विशेष्य विशेषण सम्बन्ध है। विशेषण विशेष्यमें ही रहता है इसलिये जीवका अस्तित्व जीवमें ही है दूसरी जगह नहीं है, इसी प्रकार ‘जीवोनास्ति’ जीव नहीं है यहाँपर भी जीव और नास्तित्वमें विशेष्यविशेषण सम्बन्ध है इसलिये ऊपर कहे हुए नियमसे नास्तित्व जीवमें ही है दूसरी जगह नहीं है। जीवके इन अस्तित्व और नास्तित्व रूप धर्मोको एक साथ कह नहीं सकते इसलिये उसमें एक अवक्तव्य नामका धर्म भी है। इन तीनों धर्मोमेंसे जब जीवके केवल अस्तित्व धर्मकी विवक्षा करते हैं तब ‘स्याद् अस्त्येव जीवः’ ऐसा पहला भङ्ग होता है, जब नास्तित्व धर्मको विवक्षा करते हैं तब ‘नास्त्येव जीवः’ ऐसा दूसरा भङ्ग होता है, जब दोनोंकी क्रम क्रमसे विवक्षा करते हैं तब ‘स्यादस्ति च नास्त्येव जीवः’ इस प्रकार तीसरा भङ्ग होता है, जब दोनोंकी अक्रम अर्थात् एक साथ विवक्षा करते हैं तब दो विरुद्ध धर्म एक कालमें नहीं कहे जा सकनेके कारण ‘स्यादवक्तव्यमेव’ ऐसा चौथा भङ्ग होता है, जब अस्तित्व और अवक्तव्य इन दो धर्मोकी विवक्षा करते हैं तब ‘स्यादस्ति चावक्तव्यं च’ ऐसा पाँचवाँ भङ्ग होता है, जब नास्तित्व और अवक्तव्य इन दो धर्मोकी विवक्षा करते हैं तब ‘स्यान्नास्ति चा वक्तव्यं च’ ऐसा छठवाँ भङ्ग हो जाता है और जब अस्तित्व, नास्तित्व तथा अवक्तव्य इन धर्मोकी विवक्षा करते हैं तब ‘स्यादस्ति नास्ति चावक्तव्यं’ च ऐसा सातवाँ भङ्ग हो जाता है। संयोगकी अपेक्षा प्रत्येक पदार्थ में प्रत्येक धर्म सात सात भङ्गके रूप रहता है इसलिये उन्हें कहने के लिये जिनेन्द्र भगवान्ने सप्त-भङ्गी (सात भङ्गों के समूह) रूप वाणी के द्वारा उपदेश दिया है। जिस समय जीवके अस्तित्व धर्मका निरूपण किया जा रहा है उस समय उसके अवशिष्ट धर्मोका अभाव न समझ लिया जावे इसलिये उसके साथ विवक्षा सूचक स्याद् शब्दका भी प्रयोग किया जाता है तथा सन्देह दूर करनेके लिये नियमवाचक एव या च आदि निपातोंका भी प्रयोग किया जाता है जिससे सब मिलाकर ‘स्यादस्त्येव जीवः’ इस वाक्यका अर्थ होता है कि जीव किसी अपेक्षासे है ही। इसी प्रकार अन्य वाक्योंका अर्थ भी समझ लेना चाहिये। जैनधर्म अपनी व्यापक दृष्टिसे पदार्थ के भीतर रहनेवाले उसके समस्त धर्मोका विवक्षानुसार कथन करता है इसलिये वह स्याद्वादरूप कहलाता है। वास्तव में इस सर्वमुखी दृष्टिके बिना वस्तुका पूर्ण स्वरूप कहा भी तो नहीं जा सकता ।। १३६।।
O Lord, Your sevenfold speech is such that it encompasses all aspects of a thing’s existence—sometimes asserting its existence, sometimes its non-existence, sometimes both, sometimes neither, and in some cases, it remains ineffable. This profound expression, which aligns with the philosophy of Jainism, comprehensively covers all possibilities of a substance’s nature in relation to the fourfold view—substance, space, time, and mode.
Each object has inherent aspects, which can be described through seven distinct perspectives, as follows:
- It exists.
- It does not exist.
- It both exists and does not exist.
- It is to be expressed.
- It both exists and is to be expressed.
- It both does not exist and is to be expressed.
- It both exists and does not exist and is to be expressed.
This explanation points to the fact that every substance can manifest differently depending on the angle from which it is viewed. The Jain Aṅga philosophy meticulously articulates the multifaceted nature of existence, drawing from the reality of these various perspectives.
Thus, through the ‘syād’ (perhaps meaning “it is possible” or “it is to be understood as”), Lord Jinendra teaches us to see the ultimate truth, embracing all contradictions and possibilities simultaneously. This method of expression is essential in understanding the totality of a thing, for without such a broad view, the full nature of any substance cannot be comprehended. 136
श्लोक ( Shlok ) 137
विरुद्धाबद्धवाग्जालरुद्धव्यामुग्धबुद्धिपु । अश्रद्धेयमनाप्तेषु सार्वज्ञ्यं त्वयि तिष्ठते ॥१३७॥
हे देव, जिनकी बुद्धि प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे विरुद्ध तथा सम्बन्धरहित वचनोंके जालमें फंसकर व्यामुग्ध हो गई है ऐसे कुदेवोंमें श्रद्धान नहीं करने योग्य सर्वज्ञता आपमें विराजमान है। भावार्थ-सर्वज्ञ वही हो सकता है जिसके वचनोंमें कहीं भी विरोध नहीं आता है। संसारके अन्य देवी-देवताओं के वचनोंमें पूर्वापर विरोध पाया जाता है और इसीसे उनकी भ्रान्त बुद्धिका पता चल जाता है इन सब कारणोंको देखते हुए ‘ये सर्वज्ञ थे’ ऐसा विश्वास नहीं होता परन्तु आपके वचनों अर्थात् उपदेशोंमें कहीं भी विरोध नहीं आता तथा आपने वस्तु के समस्त धर्मोका वर्णन किया है इससे आपकी बुद्धि-ज्ञान-निर्भ्रान्त है और इसीलिये आप सर्वज्ञ हैं ।॥ १३७।।
O Lord, in those who are deluded by the net of words that are contradictory to direct perception and other valid sources of knowledge, and are disconnected from the truth, there is no place for faith in the omniscience that resides in You.
Meaning:
Only one whose words are free from contradiction can be considered omniscient. The words of other gods in the world often contain contradictions, revealing the confusion of their intelligence. Due to these reasons, belief in them being omniscient is not justified. However, Your words, that is, Your teachings, are free from contradiction, and You have described all the attributes of things in their entirety. Therefore, Your intellect and knowledge are clear, untainted, and omniscient. 137
श्लोक ( Shlok ) 138
रविः पयोधरोत्सङगसुप्तरश्मिर्विकासिभिः । सूच्यतेऽब्जैर्यथा तद्वदु द्भैर्वाग्विभवैर्भवान् ॥१३८॥
जिस प्रकार बीचमें जिसकी समस्त किरणें छिप गई हैं ऐसा सूर्य यद्यपि दिखाई नहीं देता तथापि फूले हुए कमलोंसे उसका अस्तित्व सूचित हो जाता है उसी प्रकार आपका प्रत्यक्ष रूप भी दिखाई नहीं देता तथापि आपके श्रेष्ठ वचनों के वैभवके द्वारा आपके प्रत्यक्ष रूपका अस्तित्व सूचित हो रहा है। भावार्थ-आपके महान् उपदेश ही आपको सर्वज्ञ सिद्ध कर रहे हैं ।॥ १३८।।
Just as the sun, whose rays are hidden in the middle, though not visible, is still indicated by the blooming lotuses, in the same way, Your direct form, though not visible, is indicated by the magnificence of Your supreme words.138
Meaning:
It is Your great teachings that prove You to be omniscient, just as the blooming lotuses, though not directly showing the sun, indicate its presence. Similarly, though Your direct form may not be visible, Your exalted words testify to Your omniscience.
श्लोक ( Shlok ) 139
ययान्धतमसे दूरात्तर्क्य ते विरुतैः शिखी । तथा त्वमपि सुव्यक्तैः सूक्तैराप्तोक्तिमर्हसि ॥ १३९॥
अथवा जिस प्रकार सघन अन्धकारमें यद्यपि मयूर दिखाई नहीं देता तथापि अपने शब्दोंके द्वारा दूर से ही पहिचान लिया जाता है उसी प्रकार आपका आप्तपना यद्यपि प्रकट नहीं दिखाई देता तथापि आप अपने स्पष्ट और सत्यार्थ वचनोंसे आप्त कहलाने के योग्य हैं ।।१३९।।
Alternatively, just as in dense darkness, although the peacock is not visible, it is recognized from a distance by its call, in the same way, though Your omniscience may not be visibly manifested, You are worthy of being called the perfect one through Your clear and truthful words.
Meaning:
Even when something is not directly visible, its presence can be inferred by its unmistakable signs. In the same way, although Your omniscience may not be overtly visible, Your authentic and truthful teachings make You deserving of being acknowledged as the perfect, omniscient being.139
श्लोक ( Shlok ) 140
आस्तामाध्यात्मिकीयं ते ज्ञानसंपन्महोदया । बहिर्विभूतिरेवैषा शास्ति नः शास्तृतां त्वयि ॥१४०॥
अथवा हे देव, जिसका बड़ा भारी अभ्युदय है ऐसी यह आपकी अध्यात्मसम्बन्धी ज्ञानरूपी सम्पत्ति दूर रहे, आपकी यह बाह्य विभूति ही हम लोगोंको आपके हितोपदेशीपनका उपदेश दे रही है । भावार्थ-आपकी बाह्य विभूति ही हमें बतला रही है कि आप मोक्षमार्गरूप हितका उपदेश देनेवाले सच्चे वक्ता और आप्त हैं ।॥ १४०॥
lternatively, O Lord, whose immense prosperity is evident, this external glory of Yours is in itself imparting to us the teachings of Your role as the guide to spiritual knowledge.
Meaning:
Your external grandeur itself serves as evidence that You are the true teacher, imparting the path to liberation and guiding us with Your authentic teachings. It is a reflection of Your role as the perfect guide and expert in the realm of spiritual knowledge.140
श्लोक ( Shlok ) 141
परार्ध्यमासनं सैहं कल्पितं सुरशिल्पिभिः । रत्नरुक्छुरितं भाति तावकं मेरुशृङ्गवत् ॥१४१॥
हे भगवन्, देवरूप कारीगरोंके द्वारा बनाया हुआ और रत्नोंकी किरणोंसे मिला हुआ आपका यह श्रेष्ठ सिंहासन मेरु पर्वतकी शिखर के समान सुशोभित हो रहा है ॥ १४१ ॥
O Lord, this magnificent throne of Yours, crafted by divine artisans and adorned with the rays of jewels, shines resplendently like the summit of Mount Meru.
Meaning:
This throne, made by celestial craftsmen and embellished with the brilliance of precious jewels, stands as a symbol of divine grandeur, resembling the towering peak of Mount Meru, the center of the universe in Hindu and Jain cosmology. It reflects the supreme status and radiance of the Lord.
श्लोक 142 से 151
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129
आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 159
आदिपुराण पर्व 32 -उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 130 | श्लोक 131 से 141 | श्लोक 142 से 154 | श्लोक 155 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 199
आदिपुराण पर्व 33 – भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 27 | श्लोक 28 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 131
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