आदिपुराण भाग – 2 पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41
श्लोक 42 से 51
ग्रामीण जीवन और प्रकृति
मदोन्मत्त बैल स्थलकमलों को खोद रहे थे और गायें दूध से भूमि को तर कर रही थीं। गायें और उनके बछड़े शरद् ऋतु की शोभा के समान थे। मेघों के नष्ट होने से मयूरों को दुख हुआ। फूले हुए वृक्ष और झरने पर्वतों को हंसते और फाग खेलते हुए दर्शाते थे। कलमी धान और सहजना वृक्ष प्रकृति की समृद्धि को दर्शाते थे।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 26 – Shlok 42 to 51
श्लोक ( Shlok ) 42
दर्पोद्धुराः खुरोत्खातभुवस्ताम्रीकृतेक्षणाः । वृषाः प्रतिवृषालोककुपिताः प्रतिसस्व नुः ॥४२॥
जो खुरोंसे पृथिवीको खोद रहे थे, जिनकी आंखें लाल लाल हो रही थीं और जो दूसरे बैलोंके देखनेसे क्रोधित हो रहे थे ऐसे मदोन्मत्त बैल अन्य बैलोंके शब्द सुनकर बदलेमें स्वयं शब्द कर रहे थे ।।४२।।
The intoxicated bulls, who were digging into the earth with their hooves, whose eyes had turned red, and who grew angry upon seeing other bulls, would respond to the calls of those bulls by bellowing loudly themselves. ||42||
श्लोक ( Shlok ) 43
अवास्किरन्त’ श्रृङ्गाग्रेर्वृषभा धीरनिःस्वनाः । वनस्थलीः स्थलाम्भोजमृणालशकलाचिताः ॥४३॥
उसी प्रकार गम्भीर शब्द करते हुए वे बैल अपने सींगोंके अग्रभागसे स्थलकमलोंके मृणालके टुकडोंसे व्याप्त हुई वनकी पृथिवीको खोद रहे थे ।॥४३।।
In the same way, those bulls, making deep and resonant sounds, were digging up the forest floor with the tips of their horns, which was covered with fragments of lotus stalks from the sthalakamala (land lotuses). ||43||
श्लोक ( Shlok ) 44
वृषाः ककुदसंलग्नमृदः कुमुदपाण्डुराः । व्यक्ताङ्कस्य मृगाङ्कस्य लक्ष्मीमबिभरु स्तदा ॥४४॥
इसी तरह उस शरद्ॠतुमें जिनके कांधौलपर मिट्टी लग रही है और जो कुमुद पुष्पके समान अत्यन्त सफेद हैं ऐसे वे बैल स्पष्ट चिह्नवाले चन्द्रमाकी शोभा धारण कर रहे थे ।॥४४।।
In the same way, during that autumn season, the bulls—whose shoulders were smeared with dust and who were brilliantly white like kumuda flowers—were bearing a striking resemblance to the clearly marked and radiant beauty of the moon. ||44||
श्लोक ( Shlok ) 45
क्षीरप्लवमयी कृत्स्नामातन्वाना वनस्थलीम् । प्रस्नुवाना वनान्तेषु प्रसस्त्रुर्गोमतल्लिकाः ॥४५॥
जिनसे अपने आप दूध निकल रहा है ऐसी उत्तम गायें वनकी सम्पूर्ण पृथिवीको दूधके प्रवाहके रूप करती हुई वनोंके भीतर जहां तहां फिर रही थीं ।॥४५।।
The excellent cows, from whom milk was flowing on its own, were wandering here and there within the forests, turning the entire forest floor into streams of milk with their flowing abundance. ||45||
श्लोक ( Shlok ) 46
कुण्डोध्न्योऽमृलपिण्डेन घटिता इव निर्मलाः। गोगुष्टयो वनान्तेषु शरच्छ्रिय इवारुचन् ॥४६॥
इसी प्रकार जिनके स्तन कुण्डके समान भारी हैं और जो अमृतके पिण्डसे बनी हुईंके समान अत्यन्त निर्मल हैं ऐसी तुरत्तकी प्रसूत हुई गायें वनोंके मध्यमें शरद्ऋतुकी शोभाके समान जान पडती थीं ।॥४६।।
In the same way, the freshly calved cows—whose udders were heavy like water reservoirs and who appeared as pure as if formed from lumps of nectar—seemed, in the midst of the forests, to embody the very beauty of the autumn season. ||46||
श्लोक ( Shlok ) 47
हुम्भारवभृतो वत्सानापिप्य न्प्रकृतस्वनान्। पीनापीनाः पयस्विन्यः पयः पीयूषमुत्सुकाः ॥४७॥
जिनके स्तन बहुत ही स्थूल हैं और जो हंभा शब्द कर रही हैं ऐसे दूधवाली गायें दूध पीनेके लिये उत्सुक हुए तथा बार बार हंभा शब्द करते हुए अपने बच्चोंको दूधरूपी अमृत पिला रही थीं ।॥४७।।
The milk-laden cows, with large, full udders and lowing continuously, were eagerly feeding their calves, offering them milk like nectar, while repeatedly calling out with their deep hambha sounds. ||47||
श्लोक ( Shlok ) 48
क्षीरस्यतो निजान्वत्सान् हुम्भागम्भीरनिःस्वनान् । धेनुष्याः पाययन्ति स्म गोपैरपि नियन्त्रिताः ॥४८॥
इसी प्रकार हंभा ऐसा गंभीर शब्द करनेवाली गायें ग्वालाओंके द्वारा अलग बांध दिये जानेपर भी दूध पीनेकी इच्छा करनेवाले अपने बच्चोंको दूध पिला ही रही थीं ॥४८॥
In the same way, the cows, making deep hambha sounds, despite being tied separately by the cowherds, were still feeding their calves with milk, fulfilling their desire to drink. ||48||
श्लोक ( Shlok ) 49
प्राक्स्वीया जलदा जाताः शिखिनामप्रियास्तदा । रिक्ता जलधनापायादहो कष्टा दरिद्रता ॥४९॥
जो मेघ पहले मयूरोंको अत्यन्त प्रिय थे वे ही अब शरदऋतुमें जलरूप धनके नष्ट हो जानेसे खाली होकर उन्हें अप्रिय हो गये थे सो ठीक ही है क्योंकि दरिद्रता बहुत ही कष्ट देनेवाली होती है ।।४९।।
The clouds, which were once dearly loved by the peacocks, had now become empty and unpleasant to them due to the loss of their watery wealth in the autumn season. This is indeed fitting, as poverty is truly a source of great distress. ||49||
श्लोक ( Shlok ) 50
‘व्यावहासीमिवातेनुर्गिरयः पुष्पितैर्दु मैः । व्यात्युक्षीमिव तन्वानाः स्फुरन्निर्झरशीकरैः ॥५०॥
उस समय फूले हुए वृक्षोंसे पर्वत ऐसे जान पड़ते थे मानो परस्पर में हँसी ही कर रहे हों और झरते हुए झरनोंके छींटोंसे ऐसे जान पड़ते थे मानों फाग ही कर रहे हों-विनोदवश एक दूसरेके ऊपर जल डाल रहे हों ।॥५०॥
At that time, the mountains, with their blooming trees, seemed as if they were laughing with one another, and the splashes from the cascading waterfalls seemed as if they were playfully splashing water on each other in a joyous celebration, like the festival of Phag (Holi). ||50||
श्लोक ( Shlok ) 51
प्रवृद्धवयसो रेजुः कलमा भृशमानताः । परिणामात्प्रशुष्यन्तो जरन्तः पुरुषा इव ॥५१॥
कलमी जाति के धान, जो कि बहुत दिनके थे अथवा जिनके समीप बहुत पक्षी बैठे हुए थे, जो खूब नव रहे थे और जो अपने परिपाकसे जगत्के समस्त जीवोंका पोषण करते थे, वे ठीक वृद्ध पुरुषोंके समान सुशोभित हो रहे थे ।॥५१॥
The kalmi variety of rice, which had been growing for a long time or were surrounded by many birds, who were feeding on them, and which nourished all the creatures of the world with their ripened grains, were appearing just like elderly men, radiating a dignified beauty. ||51||
श्लोक 52 से 61
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण भाग – 2
आदिपुराण पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41


