Hindi Translation of Adi purana Parv 31
श्लोक 1 से 11 : चक्रवर्ती भरत का उत्तर दिशा विजय अभियान
अथानन्तर-उत्तर दिशाको जीतने के लिये उद्यत हुए चक्रवर्ती भरत जिनमें अनेक घोड़े हैं ऐसी सेनाओंसे दिशाओंको व्याप्त करते हुए निकले ।।१।। उस समय घोड़ोंके गुण जानने वाले लोगोंने धौरित नामकी गतिसे उनकी चाल जानी, उत्साहसे उनका वल जाना, स्फतिके साथ हलकी चाल चलनेसे उनकी शिक्षा जानी और शरीरके गुणोंसे उनकी जाति जानी ।।२।। गतिकी चतुराईको धौरित, उत्साहको पराक्रम, विनयको शिक्षा और रोमोंकी कान्तिको शरीरका गुण कहते हैं ।।३।। अच्छी तरह मार्ग तय करनेवाले घोड़े मार्गमें बहुत जल्दी जल्दी जा रहे थे और ऐसे जान पड़ते थे मानो अपने पीछेके भागोंसे अगले भागोंको उल्लंघन ही करना चाहते हों ।।४।। अपने खुरोंसे उड़ती हुई पृथिवीकी धूलिका कहीं हमारे ही शरीरके साथ स्पर्श न हो जावे ? इस भयसे ही मानों अनेक बड़े बड़े घोड़े अपना पराक्रम प्रकट करते हुए मार्गमें उस धूलिको उल्लंघन कर रहे थे ।।५।। कितने ही घोड़े अपनी छायाका भी अपने साथ चलना नहीं सह सकते थे. इसलिये ही मानो वे उसे अपने खुरोंसे तोड़ रहे थे परन्तु सुक्ष्म होनेसे उस छायाको कुछ भी बाधा नहीं होती थी ।।६।। कितने ही घोड़े ऐसे जान पड़ते थे मानों चलने के प्रारम्भमें बजते हुए नगाड़े आदि बाजों के साथ साथ अपने पैरोंसे पृथ्वीरूपी रङ्गभूमिपर नृत्य ही कर रहे हों ।।७।। जिनका स्वभाव और पराक्रम स्थिर है परन्तु जिन्होंने अपने चलते हुए खुरोंसे पृथ्वी खोद डाली है ऐसे घोड़ोंकी चंचलता केवल चलने में ही थी अन्यत्र नहीं थी ॥८॥ जिनका वेग वायुके समान है, जो उत्तम जातिके हैं और जो योग्य हैं ऐसे चक्रवर्ती के घोड़ों की संख्या अठारह करोड़ थी ।।९।। जिसने किनारे के बन रोक लिये हैं, जिसने किनारेकी पृथिवी तोड़ दी है और जो जलको कम करती जाती है ऐसी चलती हुई वह सेना मानो सिन्धु नदीके साथ शत्रुता ही धारण कर रही थी। भावार्थ वह सेना सिन्धु नदीको हानि पहुँचाती हुई जा रही थी ॥१०॥ वह सिन्धु नदी मानो चक्रवर्ती भरतके आनेसे संतुष्ट होकर ही सुख देनेवाले अपनी लहरोंकी पवनसे धीरे धीरे सेनाके मुख्य लोगोंकी सेवा कर रही थी ॥११॥
श्लोक 12 से 21 : सिन्धु नदी और विजयार्थ पर्वत की ओर प्रस्थान
जो गङ्गा नदीके समस्त वर्णनसे सहित है और फेनोंसे भरी हुई है ऐसी सामने आई हुई सिन्धु नदीको देखते हुए निधिपति-भरत उत्तर दिशाको जीती हुईके समान समझने लगे थे ॥१२॥ सिन्धु नदीके किनारे किनारे अपनी सेनाओंके द्वारा उत्तर दिशाके राजाओंको वश करते हुए कुलकर-भरत धीरे धीरे विजयार्थ पर्वतके समीप जा पहुंचे ॥१३॥ जो मणियोंके बने हुए नौ शिखरोंसे बहुत विशाल मालूम होता था ऐसा वह चाँदीका विजयार्थ पर्वत भरतने दूरसे ऐसा देखा मानो शिखरोंके बहानेसे अर्घ ही धारण कर रहा हो ।।१४।। जिनकी शाखाओंके अग्रभागरूपी भुजाएँ वायुसे हिल रही हैं ऐसे वृक्षोंसे वह पर्वत ऐसा जान पड़ता था मानो दूरसे सन्मुख आये हुए विजयी भरतको बुला ही रहा हो ।।१५।। शिखरोंके समीपसे ही पड़ते झरनोंके जलसे वह पर्वत ऐसा अच्छा सुशोभित हो रहा था मानो चक्रवर्ती भरतके आनेपर उनके लिये पाद्य अर्थात् पैर धोनेका जल ही देना चाहता हो ।।१६।। वह पर्वत नाग, नागकेसर और सुपारी आदिके वृक्षोंसे भरे हुए तथा मनोहर अपने किनारेके वनके प्रदेशोंसे ऐसा जान पड़ता था मानो विश्राम करनेके लिये स्वामी भरतको बुला ही रहा हो ॥१७॥ जो अपने वनके चारों ओर वायुसे उड़ते हुए फूलोंकी परागका चंदोवा तान रहा है और शब्द करते हुए कोकिल ही जिसके नगाड़े हैं ऐसा वह पर्वत भरतका सन्मान करनेके लिये सामने खड़े हुए के समान जान पड़ता था ।।१८।। इस विषयमें अधिक कहनेसे क्या लाभ है ? इतना ही बहुत है कि वह पर्वत बड़े प्रेमसे प्रकट किये हुए सत्कारके सब साधनोंसे दिग्विजय करनेके लिये उद्यत हुए भरतका मानो सत्कार ही कर रहा था ।।१९।। जिसके चारों ओर तोरण बँधे हुए हैं ऐसी वनकी ऊंची वेदीको उल्लंघन कर की समस्त भूमियाँ भर गई थीं, उनके पक्षीरूपी प्राण उड़ गये थे और उस समय वे ऐसी जान पड़ती थीं मानो श्वासोच्छ्वाससे रहित ही हो गई हों। अर्थात् सेनाओं के बोझसे दबकर मानो मर ही गई हों ॥२१।।
श्लोक 22 से 31: सेना के प्रभाव से वन का क्षोभ
जो पहले कभी सुननेमें नहीं आया था और जिसकी प्रतिध्वनि उठ रही थी ऐसा सेनाका कलकल शब्द सुनकर वनमें रहनेवाले पशु बहुत ही भयभीत और दुःखी हो गये थे ॥२२॥ जो अपने शरीरकी अपेक्षा ऐरावत हाथीके समान था, जिसके समस्त अंगो-पाङ्गोंका विभाग ठीक ठीक हुआ था, और जो मधुर गर्जना कर रहा था ऐसा कोई सफेद रंगका हाथी सेनाके क्षोभसे वनके भीतरसे निकलता हुआ बहुत ही अच्छा सुशोभित हो रहा था ।।२३।। मेरे मनमें कुछ भी भय नहीं है जिसकी इच्छा हो सो देख ले इस प्रकार दिखलाता हुआ ही मानो कोई सिंह जागकर जमुहाई लेता हुआ मुँह खोल रहा था ।। २४।। अष्टापद बड़े वेगसे ऊपरकी ओर उछलकर ऊपरकी ओर मुँह करके नीचे पड़ गया था परन्तु बनानेवाले (नामकर्म) की चतुराईसे पीठपरके पैरोंसे ठीक ठीक आ खड़ा हुआ था उसे कोई चोट नहीं आई थी ॥२५॥ जो पत्थरसे अपने कन्धे घिस रहा है, जिसके नेत्र क्रोधित होनेसे कुछ कुछ लाल हो रहे हैं और जो खुरोंसे पृथिवी खोद रहा है ऐसा एक निर्भय भैंसा सेनाके लोगोंने देखा था ॥२६॥ सेनाके शब्द सुननेसे जिनके भय उत्पन्न हो रहा है ऐसे छोटे छोटे पशु प्रलयकालके समान विजयार्ध पर्वतकी गुफाओंके मध्य भागका आश्रय ले रहे थे। भावार्थ-जिस प्रकार प्रलयकालके समय जीव विजयार्धकी गुफाओंमें जा छिपते हैं उसी प्रकार उस समय भी अनेक जीव सेनाके शब्दोंसे डरकर विजयार्थकी गुफाओंमें जा छिपे थे ॥ २७॥ जिनके पीछे पीछे बच्चे दौड़ रहे हैं और जिनका शरीर कँप रहा है ऐसे डरे हुए हरिण चारों ओर भाग रहे थे तथा वे उस समय ऐसे मालूम होते थे मानों भयरूपी रससे सींचे ही गये हों ।॥२८॥ सेनाके क्षोभसे जिन्होंने जलसे भरे हुए छोटे छोटे तालाब (तलैया) छोड़ दिये हैं और जिनके झुण्ड विश्वर गये हैं ऐसे सूअर अपने उत्तम आहारमें प्रेम छोड़कर इधर उधर घुस रहे थे ॥ २९॥ कितने ही अन्य हाथी भयसे भागकर वृक्षोंसे ढकी हुई जगहमें छिपकर जा खड़े हुए थे और हरिण सिहोंकी गुफाओं के भीतर ही जा ठहरे थे ।। ३० ।। इस प्रकार वनके प्राणोंके समान अत्यन्त चंचल हुए प्राणी सेनाका क्षोभ शान्त होनेपर बहुत देरमें अपने अपने स्थानोंपर वापिस लौटे थे ।। ३१।।
श्लोक 32 से 41 : विजयार्थ पर्वत पर सेना का पड़ाव
तदनन्तर वह सेना वन ही वन कुछ दूर जाकर विजयार्ध पर्वतके पाँचवें कूटके समीप पहुँचकर ठहर गई ॥३२॥ सेनाके ठहरनेपर सेनापतियोंने महाराजकी आज्ञासे, जिसके वृक्ष मन्द मन्द वायुसे हिल रहे थे ऐसे उस वनमें सेना के डेरे लगवा दिये थे ।॥ ३३॥ जिसमें अपने आप फूलोंके समूह गिर रहे हैं और जो घने घने लगे हुए वृक्षोंसे सघन हैं ऐसे विजयार्ध पर्वतके किनारेके वनमें सैनिक लोगोंने अपने इच्छानुसार डेरे ले लिये थे ।। ३४ ।। सरोवरोंके किनारेके वृक्षोंके समीप ही जो लतागृहोंके स्थान थे वे बिना प्रयत्न किये ही सेनाके लोगोंके मनोहर डेरे हो गये थे ॥३५॥ ‘वनमें प्रवेश करना वैराग्यका कारण है, ऐसा मूर्ख मनुष्य ही कहते हैं क्योंकि उस वनमें प्रवेश करना उन सैनिकोंकी रागवृद्धिका कारण हो रहा था। भावार्थ-वनमें जानेसे सेनाके लोगोंका राग बढ़ रहा था इसलिये वनमें जाना वैराग्यका कारण है ऐसा कहनेवाले पुरुष मूर्ख ही हैं ।॥ ३६॥
अथानन्तर-महाराज भरतको वहाँ नियमानुसार ठहरा हुआ जानकर विजयार्ध पर्वतका स्वामी विजयार्थ नामका देव मागध देवके समान भरतके दर्शन करनेके लिये आया ।।३७।। उस समय वह देव किसी दूसरे विजयार्थ पर्वतके समान सुशोभित हो रहा था, क्योंकि जिस प्रकार विजयार्ध पर्वत शिखरसे ऊंचा है उसी प्रकार वह देव भी मुकुटरूपी शिखरसे ऊंचा था, जिस प्रकार विजयार्थ पर्वतपर झरने झरते हैं उसी प्रकार उस देवके गलेमें भी झरनों के समान हार लटक रहे थे और जिस प्रकार विजयार्ध पर्वतका कटक अर्थात् मध्यभाग देदीप्यमान है उसी प्रकार उसका कटक अर्थात् हाथोंका कड़ा भी देदीप्यमान था ॥ ३८।। जो सफेद वस्त्र धारण किये हुए हैं, मालाएँ पहिने है, जिसके शरीरपर सफेद चन्दन लगा हुआ है और जो रत्नोंका अर्थ धारण कर रहा है ऐसा वह देव खड़ी की हुई शंख नामक निधिके समान सुशोभित हो रहा था ।।३९।। उस देवने बड़ी शीघ्रताके साथ आकर चक्रवर्तीको नमस्कार किया औरचक्रवर्तीने भी उसे सत्कारपूर्वक उत्तम आसनपर बैठाया ।॥४०॥ भरतसे उस देवने कहा कि मैं इस पर्वतका रक्षक हूँ और इस पर्वतके बीचके शिखरपर रहता हूँ। हे प्रभो, मैं आजतक अपनी इच्छानुसार रहता था-स्वतन्त्र था परन्तु आज बहुत दिनमें आपके आधीन हुआ हूँ ॥४१॥
श्लोक 42 से 51: विजयार्थ देव द्वारा भरत का अभिषेक
मुझे तथा इस ऊँचे पर्वतको आप विजयार्ध जानिये अर्थात् हम दोनोंका नाम विजयार्ध है और हम दोनों ही परस्पर एक दूसरेके आश्रयसे अलंभ्य तथा निश्चल स्थितिसे युक्त हैं ।।४२।। हे देव, यह पर्वत दिग्विजयका आधा आधा विभाग करता है इसलिये ही यह विजयार्ध नामको धारण करता है और उसपर रहनेसे मेरा भी विजयार्ध नाम रूढ़ हो गया है ।।४३।। हे आयुष्मन्, मैं आपकी आज्ञाको मालाके समान मस्तकपर धारण करता हूँ और आपके पैदल चलनेवाले एक सैनिकके समान ही हूँ, इसके सिवाय में और क्या प्रार्थना करूँ ? ॥४४।। इस प्रकार कहता हुआ और ‘दिग्विजय करनेवाले चक्रवतियोंका अभिषेक करना मेरा काम है’ इस तरह अपने नियोगकी सूचना करता हुआ वह देव उठा और अनेक देवोंके साथ साथ कल्याण करनेवाले तीर्थजलसे सम्म्राट् भरतका अभिषेक करने लगा ।।४५।। उस समय आकाशमें गंभीर शब्द करते हुए नगाड़े बज रहे थे और वन-गलियोंको कम्पित करता हुआ वायु धीरे धीरे बह रहा था ॥४६॥ लीलापूर्वक भौंहोंको नचाती हुई नृत्य करनेवाली देवांगनाएँ नृत्य कर रही थीं और किन्नर देव भरतकी विजयको सूचित करनेवाले मंगलगीत गा रहे थे ।।४७।। तदनन्तर जिनका अभिषेक किया जा चुका है और जो सफेद वस्त्र धारण किये हुए हैं ऐसे भरतको विजय करनेवाला आशीर्वाद देते हुए उस देवने अनेक रत्नोंकी प्राप्तिसे युक्त किया अर्थात् अनेक रत्न भेंट किये ॥४८॥ उस देवने उनके लिये रत्नोंका भृङ्गार, सफेद छत्र, दो चमर और एक दिव्य सिंहासन भी भेंट किया था ।।४९।। इस प्रकार ऊपर लिखे हुए सत्कारसे तथा विनय-सहित वचनोंसे प्रसन्न हुए भरतने उस देवपर प्रसन्नतासे चंचल हुई अपनी दृष्टि डाली ।॥५०॥ अनन्तर भरतने जिसका आदर-सत्कार किया है और ‘जाओ’ इस प्रकार आज्ञा देकर जिसे बिदा किया है ऐसा वह विजयार्ध देव उनका दासपना स्वीकार कर अपने स्थानपर वापिस चला गया ।॥५१॥
श्लोक 52 से 61: विजयार्थ पर्वत की विजय और उत्तरार्ध की आकांक्षा
विजयार्ध पर्वतके जीत लेनेपर समस्त दक्षिण भारत जीत लिया गयाऐसा मानते हुए चक्रवर्तीने चक्ररत्नकी पूजा की ॥५२॥ उन्होंने चक्ररत्नकी पूजा गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, जल, अक्षत, फल और दिव्य नैवेद्यके द्वारा की थी ॥५३॥ विजयार्ध पर्वत तक विजय कर लेनेपर भी उत्तरार्धको जीतनेकी आशासे उद्यत हुए चक्रवर्तीका विजयका उद्योग शिथिल नहीं हुआ था ।॥ ५४।। तदनन्तर-वह भरत कुछ पीछे लौटकर विजयार्ध पर्वतकी पश्चिम गुहाके समीपवर्ती वनको अपनी सेनाके द्वारा घेरकर ठहर गया ।। ५५।। विजयार्थ पर्वतके दक्षिणकी ओर पर्वत तथा वन दोनोंकी वेदियोंके बीचमें सिन्धु नदी के किनारेके वन के बाहर भरतकी सेना ठहरी थी ।॥५६॥ अनेक आश्चर्योसे भरे हुए इस पर्वतपर बहुत कुछ देखने योग्य है यही समझकर चक्रवर्तीने वहां बहुत दिन तक रहना अच्छा माना था ।।५७।। वहाँपर बहुत दिनतक रहनेपर भी भरतका थोड़ा भी खर्च नहीं हुआ था, बल्कि अपूर्व अपूर्व वस्तुओंके लाभ होनेसे वह समुद्रके समान भर गया था ।।५८।। भरतको वहां रहता हुआ सुनकर गङ्गा और सिन्धु दोनों नदियोंके बीचमें रहनेवाले अनेक राजा लोग अपनी अपनी पृथिवीसे उनके दर्शन करनेके लिये आये थे ॥५९॥ दूरसे झुके हुए चंचल मुकुटोंपर जिन्होंने अपने हाथ जोड़कर रक्खे हैं ऐसे नमस्कार करते हुए राजा लोग महाराज भरतमें अपनी भक्ति प्रकट कर रहे थे ॥ ६०॥ उन राजाओंने केशर, अगुरु, कपूर, सुवर्ण, मोती, रत्न तथा और भी अनेक वस्तुओंसे भक्तिपूर्वक चक्रवर्तीका उत्तम सन्मान किया था ।। ६१।।
श्लोक 62 से 71 : राजाओं का समर्थन और युद्ध की तैयारी
धनकी राशियों से निरन्तर चारों ओरसे भरते हुए भरतके खजाने में प्रविष्ट हुए रत्नोंकी मर्यादा (संख्या) का भला कौन निर्णय कर सकता था ? भावार्थ-उसके खजानेमें इतने अधिक रत्न इकट्ठे हो गये थे कि उनकी गणना करना कठिन था ।। ६२।। उस समय समीपवर्ती देशोंके राजाओंने, सेनापतियोंके द्वारा जिसकी अच्छी तरह रक्षा की गई है ऐसी भरतकी सेनाको चिरकाल तक भूसा, ईंधन आदि वस्तुएँ देकर उपकृत किया था ।। ६३।। महाराज भरत विज-यार्ध पर्वतसे उत्तर भागको जीतनेका उद्योग कर रहे हैं यह सुनकर कुरु देशके राजा जयकुमारतथा और भी अनेक राजा लोग अपनी समस्त सेना और सवारियाँ लेकर उसी समय आ पहुंचे ॥६४॥ कितने ही मण्डलेश्वर राजा भरतके बुलाये हुए आये थे और कितने ही उत्तम उत्तम योद्धा बिना बुलाये ही उनके समीप आ उपस्थित हुए थे ।। ६५।। अब विदेशमें जाना है और म्लेच्छ राजाओंको जीतना है यही विचार कर सामन्तोंने प्रायः धनुष-बाणको धारण करने वाली सेना तैयार की थी ॥६६॥ धनुष धारण करनेवाले योद्धा छोटे-बड़े बाणोंसे भरे हुए तरकसोंके बाँधनेसे ऐसे जान पड़ते थे मानो वे अपने स्वामियोंसे यही कह रहे हों कि हम लोग आपके ऋण के दास हैं अर्थात् आज तक आप लोगोंने जो हमारा भरणपोषण किया है उसके बदले हम लोग आपकी सेवा करनेके लिये तत्पर हैं ।॥ ६७।। हुंकार शब्द करते हुए कितने ही धनुषधारी लोग अपने ड़ोरी सहित धनुषको आस्फालन कर खींच रहे थे और उससे वे ऐसे जान पड़ते थे मानो शत्रुओं के जीवोंको ही खींचना चाहते हों ॥ ६८॥ कितने ही योद्धा लोग हाथमें तलवार लेकर उसे तोल रहे थे मानो स्वामीसे प्राप्त हुए सत्कारके भारके साथ उसका प्रमाण ही करना चाहते हों ।। ६९।। जो कवच धारण किये हुए हैं और जिनकी तलवारें चमक रही हैं ऐसे कितने ही योद्धा इतने अच्छे सुशोभित हो रहे थे मानो जिनकी काँचली कुछ ढीली हो गई है और जीभ बार-बार बाहर लपक रही है ऐसे बड़े बड़े सर्प ही हों ।॥७०॥ कितने ही योद्धा अभिमानसहित हाथमें तलवार उठाये और गर्जना करते हुए चारों ओर इस प्रकार घूम रहे थे मानो शत्रुओंको अपने सामने ही देख रहे हों ।।७१।।
श्लोक 72 से 81 : सेना की रचना और योद्धाओं का उत्साह
आग्नेय बाण आदि अस्त्र, महा-स्तम्भ आदि व्यस्त्र, तलवार धनुष आदि शस्त्र, शिरकी रक्षा करनेवाले लोहके टोप और कवच आदिसे भरे हुए रथोंके समूह ठीक आयुधशालाओंकी शोभा धारण कर रहे थे ।।७२।। रथोंमें सवार होनेवाले योद्धा यद्यपि भारी भारी शस्त्रोंको रथोंपर रखकर जा रहे थे तथापि वे पैदल चलनेवाले सैनिकोंकी अपेक्षा अधिक गौरव अर्थात् भारीपन (पक्षमें श्रेष्ठता) को प्राप्त हो रहे थे। भावार्थ पैदल चलनेवाले सैनिक अपने शस्त्र कन्धेपर रखकर जा रहे थे और रथोंपर सवार होनेवाले सैनिक अपने सब शस्त्र रथोंपर रखकर जा रहे थे तो भी वे पैदल चलनेवालोंकी अपेक्षा अधिक भारी हो रहे थे यह बड़े आश्चर्यकी बात है परन्तु अति गौरव शब्दका अर्थ अतिशय श्रेष्ठता लेनेपर वह आश्चर्य दूर हो जाता है। पैदल सैनिकोंकी अपेक्षा रथपर सवार होनेवाले सैनिक श्रेष्ठ होते ही हैं ।॥ ७३।। राजाओंने हाथियोंके पैरोंकी रक्षा करनेके लिये जिन शूरवीर योद्धाओंको नियुक्त किया था वे अनेक राजाओंके साथ युद्ध करते थे और उन हाथियोंके चारों ओर विद्यमान रहते थे अथवा समय पर महावत भी बनाये जाते थे ।।७४।। जो राजाओंके साथ भी युद्ध करनेवाले थे ऐसे श्रेष्ठ शूर वीर पैदल सेनाके सेनापति बनाये गये थे और जो घुड़सवार कवच पहिने हुए तथा लहराते हुए नदीके प्रवाहके समान थे उन्हें घुड़सवार सेनाका सेनापति बनाया था ।।७५।। कितने ही राजा लोग अच्छी तरह रचे हुए दण्डव्यूह, (दण्डके आकार सेनाको सीधी रेखामें खड़ा रखना) मण्डल व्यूह, (मण्डलके आकार गोल चक्कर लगाकर खड़ा रखना), भोगव्यूह (अर्धगोला-कार खड़ा करना) और असंहृत व्यूह, (फैलाकर खड़ा करना) से अपनी सेनाकी रचना कर उसे देख रहे थे ॥७६।। इस चक्रवर्तीका ऐसा कौन-सा कार्य है जिसका हम तुच्छ लोग स्मरण भी कर सकते हों अर्थात् कार्यका सिद्ध करना तो दूर रहा उसका स्मरण भी नहीं कर सकते, फिर भी हम लोग जो स्वामीके पीछे पीछे चल रहे हैं सो यह हम लोगोंकी इस समयपर होने वाली भक्ति ही है। हम लोगोंको स्वामीका कार्य सिद्ध करना चाहिये, अपना यशरूपी धन फैलाना चाहिये, शत्रुओंकी सेना दूर हटानी चाहिये, पुरुषार्थ धारण करना चाहिये, अनेक देश देखने चाहिये और विजयके अनेक आशीर्वाद प्राप्त करने चाहिये, इस प्रकार प्रशंसनीय उदाहरणों के द्वारा योद्धा लोग परस्परमें बातचीत कर रहे थे ।। ७७-७९।। यह दुर्गम पर्वत उल्लंघन करना है और बीचमें बड़ी-बड़ी नदियाँ पार करनी हैं इस प्रकार अनेक विघ्न-बाधाओं का विचार करते हुए कितने ही लोग आगे नहीं जाना ही अच्छा समझते थे ।।८०।। इस प्रकार अनेक प्रकारके भावों और परस्परकी बातचीतके साथ जल्दी उठकर जिन्होंने प्रस्थान किया है ऐसे सैनिक लोग अपने अपने स्वामियों सहित चक्रवर्तीके शिविरमें जा पहुंचे ॥८१॥
श्लोक 82 से 91: विजयार्थ पर्वत पर सेना का एकत्रीकरण
भरतेश्वरका हिमवान् पर्वत तक विजय प्राप्त करनेका उद्योग बहुत समयमें पूर्ण होगा ऐसा समझकर राजा लोग सब प्रकारकी सामग्रीसे कोठे भर भरकर निकले ॥८२॥ कितने ही राजा लाठी धारण करनेवाले योद्धाओंके साथ, और कितने ही ललाटकी ओर देखनेवाले उत्तम सेवकोंके साथ, अपनी सेना पीछे छोड़कर भरतके निकट आये ।।८३।। इस प्रकार अपनी अपनी सेना सहित चारों ओरसे आते हुए अनेक सामन्तोंने एक जगह इकट्ठे हो कर, जिनकी आज्ञा सब जगह देदीप्यमान है ऐसे चक्रवर्तीका जयजयकार किया ।।॥८४॥ जिस प्रकार नदियोंके समहसे समुद्र भर जाता है उसी प्रकार सहायता देनेवाले सामन्तोंके समूहसे भरतकी सेना सभी ओरसे भर गई थी ।॥८५॥ जिस प्रकार भगवान्के जन्म-कल्याण के समय वन और भूमि सहित सुमेरु पर्वत देवोंको सेनाओंसे भर जाता है उसी प्रकार वह विजयार्ध पर्वत भी वन और भूमि सहित चारों ओरसे सेनाओंसे भर गया था ।॥८६॥ भरतकी सेनाओंसे अधि-ष्ठित हुए विजयार्ध पर्वतके शिखर अलग अलग तने हुए राजमण्डपोंसे स्वर्गकी शोभा धारण कर रहे थे ।।८७।। जिसमें चारों ओरसे रथ चल रहे हैं, घोड़े हिनहिना रहे हैं, और हाथी गरज रहे हैं ऐसी उस सेनाने उस विजयार्ध पर्वतको एक शब्दोंके ही आधीन कर दिया था अर्थात् शब्दमय बना दिया था ।।८८।। गुफाओंके छिद्रोंसे जिसकी प्रतिध्वनि निकल रही है ऐसे सेना के शब्दोंको धारण करता हुआ वह पर्वत ऐसा जान पड़ता था मानो सेनासे घिर जानेके कारण फू फू शब्द ही कर रहा हो अर्थात् रो ही रहा हो ।॥८९॥
इसी बीचमें भरतने, देदीप्यमान मुकुटकी कान्तिसे जिसने आकाशको भी पीला कर दिया है और जो पर्वतपरसे नीचे उतर रहा है ऐसा एक देव आकाशमें देखा ॥९०॥ जिसके आभूषण तथा वस्त्र देदीप्यमान हो रहे हैं ऐसा वह देव अपने सेवकों सहित उस पर्वतसे उतरता हुआ ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो जिसके आभूषण और वस्त्र देदीप्यमान हो रहे हैं ऐसा वनसहित कल्पवृक्ष ही हो ।।९१।।
श्लोक 92 से 101 : कृतमाल देव का आगमन और भरत का सत्कार
क्या कोई दिव्य प्रभाका समूह आकाशमें फैल रहा है ? अथवा क्या बिजलीका समह है ? अथवा क्या अग्निकी ज्वाला है ? इस प्रकार अनेक कल्पनाओं से लोगोंने जिसे क्षण भर देखा था जो पहले तो यह कोई कान्तिका समूह है इस प्रकार सामान्य रूपसे देखा गया था, परन्तु बादमें अवयवोंके प्रकट होनेसे जिसका पुरुषका-सा आकार साफ साफ प्रकट हो रहा था, जो अपना कृतमाल नाम प्रकट करनेके लिये चम्पाके फूलोंकी माला पहिने हुआ था और जो उससे फूले हुए कृतमाल वृक्षके समान जान पड़ता था ऐसे उस देवको चक्रवर्ती भरतने अपने सामने खड़ा हुआ देखा ।। ९२-९४।। आनेके साथ ही नमस्कार करते हुए उस देवको अकस्मात् अपने सामने देखकर भरतने उसे यथा योग्य सत्कारके साथ आसन दिया ॥९५॥ भरतकी आज्ञासे वह देव आसनपर बैठा और उनके लोकोत्तर तेजको देखता हुआ क्षण भरके लिये आश्चर्य करने लगा ।॥९६॥ प्रथम ही, पहले बोलनेवाले सम्राट् भरतने जिसके साथ बातचीत की है ऐसा वह देव नीचे लिखे अनुसार विनयसहित वचन कहने लगा ।।९७।। हे देव, हम क्षुद्र देव कहाँ ? और आप दिव्य मनुष्य कहाँ ? तथापि मैं ऐसा मानता हूं कि हम लोगोंका यथायोग्य देवपना ही हम लोगोंको स्पष्ट रूपसे वाचालित कर रहा है अर्थात् जबर्दस्ती बुलवा रहा है ।।९८।। हे आयुष्मन्, आप जैसे शासन करनेवालोंका कुशल-मंगल पूछनेके लिये हम लोग लज्जित हो रहे हैं क्योंकि इस जगत्का सब तरहका कल्याण करना आपके ही आधीन है ।। ९९।। जगत्का कल्याण करनेके लिये जिसकी चतुराई प्रसिद्ध है और जो समस्त पृथिवीको जीतना चाहती है ऐसी आपकी इस दाहिनी भुजाकी कुशलता है न ? ॥१००।। हे देव, आप देवोंके भी प्रिय हैं, आपने समस्त जगत्को जीत लिया है इसलिये यह देवपना आपके ही योग्य है हम लोग तो नाममात्रके ही देव हैं- केवल देव जातिमें जन्म होनेसे ही देव कहलाने लगे हैं। यहाँ पर ‘देवानां’ ‘प्रिय’ ये दोनों ही पद पृथक् पृथक् हैं, अथवा ऐसा कार्य करना चाहिये कि हे प्रिय, समस्त जगत्को जीतनेसे आप देवोंके भी देव हैं ।।१०१॥
श्लोक 102 से 111 : कृतमाल देव की भक्ति और सेवा
हम गीर्वाण हैं और आपके अतिरिक्त विजयकी इच्छा करनेवाले किसी दूसरे पुरुपके विषय में यद्यपि हम वचनरूपी तीक्ष्ण वाणोंको धारण करते हैं तथापि आपके विषयमे हम लोग कुण्ठितवचन हो रहे हैं, हमारा अहंकार जाता रहा है और हमारे वचन गद्गद् स्वरसे निकल रहे हैं ।॥१०२॥ हे राजेन्द्र, आप छह खण्डोंमें बँटी हुई समस्त प्रदेश सहित इस संपूर्ण पृथिवी का शासन करते हैं इसलिये दूसरी जगह नहीं रहनेवाली राजोक्ति आपमें ही सुयोभित हो रही है-आप ही वास्तवमें राजा हैं ।॥ १०३॥हे विभो, चक्ररत्नके बहानेसे यह आपका दुःसह प्रताप देदीप्यमान हो रहा है और दण्डरत्नके छलसे आपकी दंड नीति प्रसिद्ध हो रही है ।।१०४।। यह समस्त पृथिवी आपके आधीन है-पालन करने योग्य है, आप इसके स्वतन्त्र ईश्वर हैं और निधियाँ तथा रत्न ही आपका ऐश्वर्य है इसलिये आपके समान ऐश्वर्यशाली दूसरा कौन है ? ॥१०५।। हे प्रभो, आपकी कीति स्वच्छन्द होकर समस्त लोकमें सदा अकेली फिरा करती है और सरस्वती वाचाल है अर्थात् बहुत बोलनेवाली है फिर भी न जाने ये दोनों ही स्त्रियां आपको प्रिय क्यों हैं? ॥ १०६ ॥ इस प्रकार जिनका माहात्म्य प्रसिद्ध है ऐसे आपकी सेवा करनेके लिये हम लोग आपकी सेनाके शब्दके क्षोभसे भयभीत हो आकाश से यहां आये हैं ।॥ १०७॥ हे देव, हम लोग इस पर्वतकी शिखरपर रहते हैं और अपने स्थानसे कभी भी विचलित नहीं होते परन्तु इस भूमि पर आपके द्वारा ही अवतारित हुए हैं- उतारे गये हैं ।। १०८।। हम लोग दूर दूर तक अनेक स्थानोंमे रहनेवाले व्यन्तर हैं अब आप हम लोगोंको अपने समीप रहनेवाले सेबक बना लीजिये ॥ १०९॥ आप मुझे इस पर्वतके इस शिखरपर रहनेवाला और विजयार्ध पर्वतका मर्म जाननेवाला कृतमाल नामका देव जानिये ।।११०।। हे देव, आपने मुझे वश कर लिया है इसलिये इस महापर्वतको अपने आधीन हुआ ही समझिये क्योंकि मैं गुफाओं और वन सहित इस पर्वतका समस्त भीतरी हाल जानता हूँ ।।१११।।
श्लोक 112 से 121 : कृतमाल देव की सहायता और गुफा द्वार का उद्घाटन
अथवा में ‘इस पर्वतका भीतरी हाल जाननेवाला हूँ’ यह बहुत ही थोड़ा कहा गया है क्योंकि समस्त द्वीप और समुद्रोंके भीतर ऐसा कोई भी प्रदेश नहीं है जो हम लोगोंका जाना हुआ न हो ।।११२।। हे सार्व अर्थात् सबका हित करनेवाले, वटके वृक्षोंपर, छोटे छोटे गड्ढों में, पहाड़ोंकी शिखरोंपर, वृक्षोंकी खोलों और पत्तोंकी झोपड़ियों में रहनेवाले तथा दिन और रात्रिमें भ्रमण करनेवाले हम लोगोंको आप सब जगह जाने वाले समझिये ।।११३।। इस प्रकार आदर सहित शान्त और ओजपूर्ण वचन कहकर उस देवने भरतके लिये चौदह आभूषण दिये ॥११४।। जो किसी दूसरेको प्राप्त नहीं हो सकते थे ऐसे उन आभूषणोंको पाकर चक्रवर्ती परम हर्षको प्राप्त हुए और चक्रवर्तीके द्वारा किये हुए सत्कारोंसे वह देव भी अत्यन्त हर्षको प्राप्त हुआ ।।११५।। तदनंतर विजयार्ध पर्वतकी गुफाके द्वारसे प्रवेश करनेका उपाय बतलाने वाले उस देवको भरत चक्रवर्तीने बिदा किया और गुफाका द्वार खोलनेके लिये सबसे आगे अपना सेनापति भेजा ।११६।। चक्रवर्तीने सेनापतिसे कहा कि तुम गुफाका द्वार उघाड़कर जब तक गुफा शान्त हो तब तक पश्चिम खण्डको जीतनेका उद्योग करो ।। ११७।। इस प्रकार चक्रवर्तीकी आज्ञाको मालाके समान मस्तकपर धारण करता हुआ और कृतमाल देवके द्वारा बतलाये हुए समस्त उपायोंके प्रयोगको जाननेवाला वह चतुर सेनापति कुछ घोड़े और सैनिकों के साथ दंडरत्न हाथमें लेकर अश्वरत्नपर आरूढ़ होकर चला ।।११८-११९॥ और कुछ थोड़ी दूर जाकर तथा सिन्धु नदीके बनकी वेदीको उल्लंघन कर विजयार्ध पर्वतके तटकी वेदी पर जा पहुंचा ।।१२० ।। प्रथम ही वह सेनापति सीढियोंके द्वारा विजयार्ध पर्वतकी वेदिकापर चढ़ा और फिर पश्चिम की ओर मुहकर गुफाके आगे जा पहुंचा ॥१२१॥
श्लोक 122 से 131: गुफा द्वार का खुलना और म्लेच्छ खंड में प्रवेश
अश्वरत्न पर बैठे हुए सेनापतिने चक्रवर्तीकी जय हो इस प्रकार कहकर दण्डरत्नसे गुफा द्वारका ताड़न किया जिससे बड़ा भारी शब्द हुआ ।॥१२२॥ दण्डरत्नकी चोटसे गुफाका द्वार खुल जानेपर उसके भीतरसे बड़ी भारी गर्मी निकलने लगी ।। १२३॥ दण्डरत्नके प्रहारसे उत्पन्न हुए क्रेङकार शब्दको धारण करते हुए दोनों किवाड़ ऐसे जान पड़ते थे मानो वेदनासे सहित होनेके कारण चिल्ला ही रहे हों, उन्हें दुःखसे पसीना ही आ गया हो और गुफाके भीतरकी गरमी से उनके प्राण ही निकले जा रहे हों ।॥१२४।। जिसके किवाड़ खुल गये हैं ऐसे द्वारसे गरमी को निकालता हुआ वह विजयार्ध पर्वत ऐसा जान पड़ता था मानो बहुत दिन बाद उसने उच्छ्वास ही लिया हो । १२५॥ दोनों किवाड़ों के खुलनेसे एक बड़ा भारी शब्द हुआ था और वह ऐसा जान पड़ता था मानो दण्डरत्नके द्वारा ताड़ित हुए पर्वतके रोनेका शब्द ही हो ॥१२६॥ वेगशालो अश्वरत्न जिसे बहुत दूर तक भगा ले गया है और देवताओंने जिसकी रक्षा की है ऐसे उस सेनापतिको गुफाकी गरमी छू भी नहीं सकी थी ।। १२७॥ उस समय उस सेना-पतिपर देवांगनाओंके कटाक्षोंके साथ साथ आकाशसे फूलोंके समूह पड़ रहे थे और वे जयलक्ष्मी के हासके समान जान पड़ते थे ॥१२८।। सेनापति सीढ़ियों सहित विजयार्भ पर्वतके किनारे की वेदीको उल्लंघन करता हुआ तोरण सहित सिन्धु नदीके पश्चिम ओर वाली वनकी वेदिवा के सन्मुख पहुंचा ।।१२९॥ उसने उस वेदिकाको भी उल्लंघन कर अनेक खानि, पुर, ग्राम, सीमा और बाग. बगीचोंसे सुन्दर म्लेच्छखण्डको उत्तम भूमिमें प्रवेश किया ॥ १३०॥ उस भूमिमें सेनापतिके प्रवेश करते ही वहाँकी समस्त प्रजा घबड़ा गई, उसमेंसे कितने ही लोग स्त्रियों तथा गाय भैंस आदिके साथ भागनेके लिये तैयार हो गये ॥ १३१ ॥
श्लोक 132 से 141 : म्लेच्छ राजाओं का वशीकरण
कितने ही बुद्धिमान् तथा धीर वीर पुरुष पवित्र अक्षत आदिका बना हुआ अर्घ लेकर सेनासहित सेनापतिके सन्मुख गये और उसका सत्कार किया ॥१३२॥ अरे डरो मत, डरो मत, जिसको जिस प्रकार सुख हो उसी प्रकार रहो इस प्रकार प्रजाको आश्वासन देते हुए चक्रवर्तीके सेवक चारों ओर घूमे थे ॥ १३३॥ अखण्ड आज्ञाको धारण करनेवाला वह सेनापति प्रदक्षिणा रूपसे म्लेच्छखण्ड में घूमता हुआ जगह जगह म्लेच्छ राजाओंसे चक्रवर्तीकी आज्ञा स्वीकृत करवाता जाता था ।।१३४।। सेनापतिने म्लेच्छ राजाओंको यह भी सिखलाया कि यह चक्रवर्तीका क्षेत्र है और वह प्रसिद्ध चक्रवर्ती समीप ही है इसलिये तुम सब अपने अपने सेनाओंके साथ उनकी सेवा करनेके लिये शीघ्रता करो। चक्रवर्ती भरत इस युगके प्रथम अथवा सबसे मुख्य राजा हैं इसलिये कभी भंग नहीं होनेवाली उनकी आज्ञाको तुम सब अपने मस्तकपर धारण करो ।।१३५-१३६।। ‘आज हम लोग बहुत दिनमें सनाथ हुए हैं इसलिये जोर जोरसे आशीर्वाद देते हुए कितने ही बुद्धिमान् लोगोंने चक्रवर्तीकी आज्ञा स्वीकृत की थी ।।१३७।। जिन्होंने सन्धि, विग्रह और यान आदि छह गुणोंमें अपना पराक्रम दिखाया था और जो थोड़ेसे ही ऐश्वर्यसे उन्मत्त हो गये थे ऐसे कितने ही राजाओंसे सेनापतिने जबर्दस्ती प्रणाम कराया था ।।१३८।। किलेके भीतर रहनेवाले कितने ही म्लेच्छ राजाओंको सेनापतिने उनका चारों ओरसे आवागमन रोककर वश किया था सो ठीक ही है क्योंकि अज्ञानी लोग अधिक दुःखी किये जानेपर ही नम्रीभूत होते हैं ।॥१३९।। कितने ही राजा लोग सेनाओंके द्वारा घिरकर उससे उत्पन्न हुए दुःखको सहन करनेके लिये असमर्थ हो चक्रवर्तीके शासनमें स्थित हुए थे, सो ठीक ही है क्योंकि बिना पेले खल अर्थात् खलीसे स्नेह अर्थात् तेल उत्पन्न नहीं होता (पक्षमें बिना दुःखी किये हुए खल अर्थात् दुर्जनसे स्नेह अर्थात् प्रेम उत्पन्न नहीं होता) ।।१४०।। इस प्रकार उपायोंको जाननेवाले सेनापति ने अनेक उपायोंके द्वारा म्लेच्छ राजाओंको वश किया और उनसे चक्रवर्ती के उपभोगके योग्य कन्या आदि अनेक रत्न भेंटमें लिये ॥१४१।।
श्लोक 142 से 151 : सेनापति की वापसी और सत्कार
ये लोग धर्मक्रियाओंसे रहित हैं इसलिये म्लेच्छ माने गये हैं, धर्मक्रियाओंके सिवाय अन्य आचरणोंसे आर्य खण्डमें उत्पन्न होनेवाले लोगोंके समान हैं ।॥१४२।। इस प्रकार वह सेनापति, धर्मक्रियाओंसे रहित उस म्लेच्छभूमिको वश कर म्लेच्छराजाओंकी सेनाके साथ फिर वापिस लौटा ॥ १४३॥ जिसने दिग्विजय कर लिया है, सबको जीतना ही जिसका स्वभाव है, और जो अश्वरत्नसे सहित है ऐसा वह राजाधि-राज भरतका सेनापति ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो मूर्तिमान् प्रताप ही हो ।॥१४४।। तोरणोंसहित सिन्धु नदीके वनकी वेदीको उल्लंघन कर वह सेनापति सीढियों सहित विजयार्ध पर्वतके वनकी वेदीपर जा चढ़ा ।। १४५।। जिसका वक्षःस्थल बहुत बड़ा है और जिसकी भुजाएँ बहुत लम्बी हैं ऐसा वह सेनापति पर्वतकी वेदिकापर चढ़कर छह महीने में जिसकी गर्मी शान्त हो गई है ऐसी गुफाके द्वारपर ठहर गया ।। १४६।। वहाँ ठहरकर उसने अनेक विघ्नों से भरे हुए गुफाके भीतरी भागको शुद्ध (साफ) कराया और फिर अच्छी तरहसे उसकी रक्षा का उपाय कर वह चक्रवर्ती की छावनीमें वापिस लौट अया ।।१४७।। सेनापतिके वहां पहुंचने पर अनेक उत्तम उत्तम राजाओने अपनी सेनाओंके साथ सामने जाकर विजयसूचक नगाड़ोंके शब्दोंके साथ साथ उसका स्वागत-सत्कार किया ।। १४८।। जिसमें अनेक तोरण लगे हुए हैं और जिसमें बहुत ऊँची अनेक पताकाओंके समूह फहरा रहे हैं ऐसे राजमार्गको उल्लंघन कर वह सेनापति महाराज भरतके डेरेमें प्रविष्ट हुआ ।। १४९।। वह व्यवहारकुशल सेनार्यात दूरसे ही उत्तम घोड़ेपरसे उतर पड़ा और जहाँ महाराज भरत राजसिंहासनपर बैठे हुए थे उस सभा-मण्डपमें जा पहुँचा ॥१५०।। दूरसे ही झुके हुए चंचल मुकुटपर जिसने अपने दोनों हाथ जोड़कर रखे हैं और सभासद् लोग जिसे आश्चर्य के साथ देख रहे हैं ऐसा सेनापतिने महाराज भरतको नमस्कार किया ।।१५१॥
श्लोक 152 से 159 : म्लेच्छ राजाओं का समर्पण और भरत की महिमा
जिन्होंने अपने ललाटसे पृथिवीतलका स्पर्श किया है और जो जय-जय शब्द करनेसे वाचालित हो रहे हैं ऐसे म्लेच्छ राजाओंने भयसहित सामने आकर भरत को नमस्कार किया ॥१५२।। उन म्लेच्छ राजाओंके द्वारा उपहारमें लाये हुए रत्न आदिको सामने रखकर सेनापतिने महाराज भरतसे नाम ले लेकर सबका परिचय कराया ।।१५३।। महाराजने प्रसन्नताके साथ सन्मान करके उन सब राजाओंका सत्कार किया, तदनन्तर वे राजा महाराजकी अनुमतिसे अपने अपने स्थान पर वापिस चले गये ।। १५४।॥ इस प्रकार चक्रवर्ती ने पुण्य कर्मके उदयसे केवल दण्डरत्नके द्वारा ही विजयार्ध पर्वतके समीपवर्ती राजाओंको जबर्दस्ती जीत लिया था सो ठीक ही है क्योंकि पुण्यके बिना विजय कहांसे हो सकती है ? ।१५५।
अथानन्तर-अनेक राजाओंके समूहने प्रेमपूर्वक जिसका सत्कार किया है, जिसने सब किले जीत लिये हैं, जिसने म्लेच्छ राजाओंको नम्म्रीभूत किया है, जो साक्षात् विजयके समान सुशोभित हो रहा है और विजयके चिह्नोंसे जिसका सन्मान किया गया है ऐसे उस सेनापति को रत्नोंके स्वामी भरत महाराजने विजय प्राप्त करनेके लिये फिर भी प्रधान सेनापतिके पदपर नियुक्त किया ॥१५६॥ योग्य निधियाँ, रत्न तथा उत्कृष्ट भोग-उपभोगकी वस्तुओं के द्वारा जिसमें सुखोंका सार प्रकट रहता है, और जिसमें अनेक सम्पदाओंका प्रसार रहता है ऐसा यह चक्रवर्तीका पद जिसके प्रसादसे लीला मात्रमें प्राप्त हो जाता है ऐसा यह जिनेन्द्र भगवान्का शासन सदा जयवन्त रहे ।। १५७।। महाराज भरतने विजयार्ध पर्वतक स्वामीको जीतकर उससे चन्द्रमाकी किरणोंकी हंसी करनेवाला सुन्दर छत्र, सुवर्णमय देदीप्यमान दण्डोंसे युक्त तथा गङ्गा नदीके फेनके समान कान्तिवाले दो मनोहर चमर, सुमेरु पर्वतसे अलग किये हुए उसके शिखरके समान सिंहासन तथा और भी अन्य अनेक रत्न प्राप्त किये थे ॥१५८॥ ‘कृतमाल’ इस नागसे प्रसिद्ध देवने सत्कार कर महाराज भरतके लिये जो आभू-षण दिये थे इरा भरतक्षेत्रमें उनकी उपमा देने योग्य कोई भी पदार्थ नहीं है। उन अनुपम आभूषणोंसे जिनका शरीर अलंकृत हो रहा है और जो मणियोंके बने हुए सिंहासनपर विराजमान हैं ऐसे महाराज भरतेश्वर उस समय मेरु पर्वतकी शिखरपर स्थित फूले हुए कल्प वृक्षके समान अत्यन्त सुशोभित हो रहे थे ।।१५९।।
इस प्रकार भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराणसंग्रहके हिन्दी भावानुवादमें विजयार्ध पर्वतकी गुफाका द्वार उघाड़नेका वर्णन करनेवाला इकतीसवां पर्व समाप्त हुआ ।
पर्व 31 सारांश
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आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena