आदिपुराण पर्व 41 – भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91
श्लोक 92 से 101 वंदनमाला और धर्मप्रिय प्रजा
भरत के मस्तक पर लगे घंटे जिनेंद्रदेव के चरणों की छाया जैसे सुशोभित थे। उनके द्वारा रत्नजड़ित तोरणों में स्थापित घंटों को देख अन्य लोग भी अपने घरों में वंदनमालाएँ लगाने लगे। ये मालाएँ अरहंतदेव की वंदना के लिए बनाई गईं, इसलिए वंदनमाला नाम से प्रसिद्ध हुईं। धर्मात्मा राजा होने से प्रजा भी धर्मप्रिय थी। भरत के सदाचार के कारण प्रजा धर्मत्रिय हो गई। लोग उनके धर्मप्रेम और सन्मान को देख धर्म में प्रीति करने लगे। भरत धर्मविजयी, सदाचारी, और बलिष्ठ थे, जिससे प्रजा को धार्मिक क्रियाएँ करने का उपदेश मिला।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 41- Shlok 92 to 101
श्लोक ( Shlok ) 92
लोकचूडामणेस्तस्य मौलिलग्ना विरेजिरे । पादच्छाया जिनस्येव घण्टास्ता लोकसम्मताः ॥९२॥
महाराज भरत स्वयं तीनों लोकों के चूड़ामणि थे उनके मस्तक पर लगे हुए वे लोकप्रिय घंटा ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो जिनेन्द्रदेवके चरणोंकी छाया ही हो ॥९२॥
Lord Bharata himself was the crest-jewel of all the three worlds, and the revered bell adorning his crown shone forth in such splendor, as though it were the very shadow cast by the sacred feet of the Lord Jina.92
श्लोक ( Shlok ) 93 – 94
रत्नतोरणविन्यासे स्थापितास्ता निधीशिना । दृष्टवार्हव्वन्दनाहेतोर्लोकोऽप्यासीत्तदादरः ॥९३॥पौरैर्जनैरतः स्वेषु वेश्मतोरणदामसु । यथाविभवमाबद्धा घण्टास्ता सपरिच्छदाः ॥९४॥
निधियों के स्वामी भरतने अर्हन्तदेवकी वन्दनाके लिये जो घंटा रत्नोंके तोरणों-की रचनामें स्थापित किये थे उन्हें देखकर अन्य लोग भी उनका आदर करने लगे थे अर्थात् अपने अपने दरवाजेके तोरणोंकी रचनामें घंटा लगवाने लगे थे। उसी समयसे नगरवासी लोगोंने भी अपने अपने घरकी तोरणमालाओं में अपने अपने वैभवके अनुसार जिनप्रतिमा आदि सामग्रीसे युक्त घंटा बाँधे थे ॥९३-९४।।
When the Lord of treasures, King Bharata, installed ornate bells amidst archways adorned with jewels for the veneration of the Arhant, others too were inspired by his example and began to revere them. From that very time, the citizens of the capital, in emulation of his devotion, began to affix bells within the festooned gateways of their own homes—each according to their means—adorned with images of the Jina and other sacred emblems of worship.93 – 94
श्लोक ( Shlok ) 95
आदिराजकृतां सृष्टि प्रजास्तां बहुमेनिरे । प्रत्यगारं यतोऽद्यापि लक्ष्या वन्दनमालिकाः ॥९५॥
उस समय प्रथम राजा भरतकी बनाई हुई इस सृष्टिको प्रजाके लोगोंने बहुत माना था, यही कारण है कि आज भी प्रत्येक घरपर बन्दन मालाएं दिखाई देती हैं ।॥ ९५।।
So deeply did the people revere the world fashioned by the first sovereign, King Bharata, that to this very day, festooned garlands of veneration may be seen adorning every household.95
श्लोक ( Shlok ) 96
वन्दनार्थं कृता माला यतस्ता भरतेशिना । ततो वन्दनमालाख्यां प्राप्य रूढि गताः क्षितौ ॥९६॥
चूँकि भरतेश्वरने वे मालाएं अरहन्तदेवकी वन्दनाके लिये बनवाई थीं इसलिये ही वे वन्दनमाला नाम पाकर पृथिवीमें प्रसिद्धिको प्राप्त हुई हैं ।।९६।।
And because King Bharata had those festooned garlands fashioned for the veneration of the Arhant, they came to be known by the noble name of “Vandana-mālā” and attained enduring renown upon the earth.96
श्लोक ( Shlok ) 97
धर्मशीले महीपाले यान्ति तच्छीलतां प्रजाः । ‘अताच्छील्यमतच्छीले” यथा राजा तथा प्रजाः ॥९७॥
यदि राजा धर्मात्मा होता है तो प्रजा भी धर्मात्मा होती है और राजा धर्मात्मा नहीं होता है तो प्रजा भी धर्मात्मा नहीं होती है, यह नियम है कि जैसा राजा होता है वैसी ही प्रजा होती है ।।९७।।
If the sovereign is righteous, so too shall the people be; and if he strays from the path of virtue, the subjects likewise fall into irreligion. Such is the immutable law—that as is the king, so is the realm.97
श्लोक ( Shlok ) 98
तदा कालानुभावेन प्रायो धर्मप्रिया नराः । साधीयः साधुवृत्तेऽस्मिन् स्वामिन्यासन् हिते रताः ॥९८॥
उस समय कालके प्रभावसे प्रायः सभी लोग धर्मप्रिय थे सो ठीक ही है क्योंकि सदाचारी भरतके राजा रहते हुए सब लोग अपना हित करनेमें लगे हुए थे ॥ ९८।।
It is but fitting that in those days, under the influence of time, nearly all souls were devoted to righteousness—for with the virtuous Bharata upon the throne, all people were earnestly engaged in the pursuit of their true welfare.98
श्लोक ( Shlok ) 99
सुकालश्च सुराजा च समं सन्निहितं द्वयम् । ततो धर्मप्रिया जाताः प्रजास्तदनुरोधतः ॥९९॥
उस समय अच्छा राजा और अच्छी प्रजा दोनों ही एक साथ मिल गये थे इसलिये राजाके अनुरोधसे प्रजा धर्मप्रिय हो गई थी ।।९९।।
In that blessed age, a noble king and a virtuous people had come together in perfect accord; thus, at the sovereign’s gentle behest, the populace too turned wholeheartedly toward the path of righteousness.99
श्लोक ( Shlok ) 100
एष धर्मप्रियः सम्म्राट् धर्मस्थानभिनन्दति । मत्वेति निखिलो लोकस्तदा धर्मे रति व्यधात् ॥१००॥
यह सम्राट् स्वयं धर्मप्रिय है और धर्मात्मा लोगोंका सन्मान करता है यही मानकर उस समय लोग धर्ममें प्रीति करने लगे थे ॥१००॥
Beholding that the Emperor himself was devoted to righteousness and held the virtuous in high esteem, the people too were inspired in that age to cultivate a deep love for the Dharma. 100
श्लोक ( Shlok ) 101
स धर्मविजयी सम्म्राट् सद् वृत्तः शुचिरुर्जितः । ‘प्रकृतिष्वनु रक्तासु व्यधाद् धर्मक्रियादरम् ।।१०१।।
वह चक्रवर्ती धर्मविजयी था, सदाचारी था, पवित्र था और बलिष्ठ था इसलिये ही वह अपनेपर प्रेम रखनेवाली प्रजामें धार्मिक क्रियाओंका आदर करता था अर्थात् प्रजाको धार्मिक क्रियाएं करनेका उपदेश देता था ॥१०१।।
That universal sovereign was a conqueror through righteousness—virtuous, pure of conduct, and mighty in strength. And thus, beloved by his subjects, he honored religious observances and exhorted his people to engage in sacred rites and righteous deeds. 101
श्लोक 102 से 111
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कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211
आदिपुराण पर्व 40 – द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 31 | श्लोक 32 से 42 | श्लोक 43 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
आदिपुराण पर्व 41 – भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91
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