आदिपुराण पर्व 32 -उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 130 | श्लोक 131 से 141 | श्लोक 142 से 154 | श्लोक 155 से 171
श्लोक 172 से 181 : विजयार्थ पर्वत की ओर वापसी
गंगा किनारे के वनों का वायु, भीलों की स्त्रियों के केश, और मयूरों की पूँछ हिलाता हुआ भरत को सुख दे रहा था। पराजित देशों के राजा उनकी आराधना करते थे। भरत उत्तर भरत क्षेत्र को वश कर विजयार्थ पर्वत की तराई लौटे। उन्होंने सेनापति को पूर्व खंड जीतने की आज्ञा दी। छह माह तक वे वहाँ रहे। विद्याधर राजा नमि और विनमि धन-सामग्री लेकर दर्शन हेतु आए।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 32 – Shlok 172 to 181
श्लोक ( Shlok ) 172 –173
वने वनचरस्त्रीणामुदस्यन्नलकावलीः । मुहुस्स्खलन कपालेषु नृत्यद्वनशिग्यण्डिनाम ॥१७२॥विलोलितालिराधुन्वन्नुत्फुल्ला वनवल्लरीः । गिरिनिर्झर संश्लेषशिशिरो मरुदाववौ ॥१७३॥
वहांके वनमें भीलोंकी स्त्रियोंके केशोंके समूहको उड़ाता हुआ, नृत्य करते हुए वनमयूरोंकी पूंछपर बार-बार टकराता हुआ, भ्रमरोंको इधर-उधर भगाता हुआ, फूली हुई बनकी लताओंको कुछ कुछ हिलाता हुआ और पहाड़ी झरनोंके स्पर्श से शीतल हुआ वायु चारों ओर बह रहा था ।।१७२-१७३।।
“There, within the forest, the wind swept through in all directions—tossing the tresses of the Bhīla women, brushing again and again against the fanned tails of dancing peacocks, scattering bees from bloom to bloom, gently stirring the blossoms of the forest creepers, and cooled by the touch of mountain springs.” ॥172–173॥
श्लोक ( Shlok ) 174
प्रतिप्रयाणमानम्रा नृपास्तद्देशवासिनः । प्रभुमाराधयांचकुराक्रान्ता जयसाधनैः ॥१७४॥
विजय करनेवाली सेनाके द्वारा दबाये हुए उन देशोंमें निवास करनेवाले राजा लोग नम्र होकर प्रत्येक पड़ाव पर महाराज भरतकी आराधना करते थे ।।१७४।।
“In every encampment along the way, the humbled kings of the lands subdued by his victorious army came forth with reverence, offering homage to Emperor Bharata.” ॥174॥
श्लोक ( Shlok ) 175
कृत्स्नामिति प्रसाध्यैनामुत्तरां भरतावनिम् । प्रत्यासीददथो जिष्णुर्विजयार्द्धचलस्थलीः ॥१७५॥
इस प्रकार उत्तर भरत क्षेत्रकी समस्त पृथिवी को वशकर विजयी महाराज भरत फिरसे विजयार्ध पर्वत की तराईमे आ पहुँचे ॥ १७५।।
“Thus, having subjugated the entire northern expanse of Bhāratavarṣa, the triumphant Emperor Bharata at length returned once more to the foothills of the sacred Vijayārdha Mountain.” ॥175॥
श्लोक ( Shlok ) 176
तत्रावासितसैन्यं च सेनान्यं प्रभुरादिशत । अपावृत गुहाद्वारः प्राच्यखण्डं जयेत्यरम् ॥१७६॥
वहाँ पर उन्होंने सेना ठहराकर सेनापतिके लिये आज्ञा दी कि ‘गुफाका द्वार उघाड़कर शीघ्र ही पूर्व खण्ड की विजय प्राप्त करो’ ।।१७६।।
“There, halting his army, Emperor Bharata commanded his general: ‘Unseal the mouth of the cavern, and swiftly press onward to conquer the eastern division!’” ॥176॥
श्लोक ( Shlok ) 177
यावदभ्येति सेनानीम्लेच्छराजजयोद्यमात् । तावत्प्रभो किलातीयुर्मासाः षट् सुखसंगिनः ॥१७७॥
जब तक सेनापति म्लेच्छराजाओंको जीतकर वापिस आया तब तक सुखपूर्वक रहते हुए महाराज भरतके छह महीने वहीं पर व्यतीत हो गये ॥ १७७।।
“While the commander marched forth and subdued the Mleccha kings, Emperor Bharata remained there in comfort, and six serene months passed by.” ॥177॥
श्लोक ( Shlok ) 178
दक्षिणोत्तरयोः श्रेण्योः निवसन्तोऽम्बरेचराः । विद्याधराधिपैः सार्द्ध प्रभुं दृष्टुमिहाययुः ॥१७८॥
विजयार्ध पर्वतकी दक्षिण तथा उत्तर श्रेणीपर निवास करनेवाले विद्याधर लोग अपने अपने स्वामियों के साथ महाराज भरतका दर्शन करनेके लिये वहींपर आये ॥ १७८।।
“The Vidyādharas dwelling upon the northern and southern ranges of the Vijayārdha Mountain came forth with their lords, eager to behold the illustrious Emperor Bharata.” ॥178॥
श्लोक ( Shlok ) 179
विद्याधरधराधीशैरारादानम्रमौलिभिः । नखांशुमालिका व्याजादाज्ञास्य शिरसा धृता ॥१७९॥
दूरसे ही मस्तक झुकाने-वाले विद्याधर राजाओंने नखोंकी किरणोंके समूहके बहानेसे महाराज भरतकी आज्ञा अपने शिरपर धारण की थी। भावार्थ नमस्कार करते समय विद्याधरराजाओंके मस्तक पर जो भरत महाराजके चरणोंके नखोंकी किरणें पड़ती थीं उनसे वे ऐसे मालुम होते थे मानो भरतकी आज्ञा ही अपने मस्तकपर धारण कर रहे हों ।॥ १७९॥
“The Vidyādhara kings, bowing from afar, seemed to bear Emperor Bharata’s command upon their brows— for as the radiant beams from his toenails touched their foreheads, it appeared as though they had crowned themselves with his very will.” ॥179॥
श्लोक ( Shlok ) 180
नमिश्च विनमिश्चैव विद्याधर धराधिपौ। स्वसारधनसामग्रया विभुं प्रष्टुमुपेयतुः ॥१८०॥
नमि और विनमि दोनों ही विद्याधरोंके राजा अपने मुख्य धनकी सामग्रीके साथ भरतके दर्शन करनेके लिये समीप आये ॥१८०॥
“Nami and Vinami, the sovereigns of the Vidyādharas, approached Emperor Bharata, bringing with them the choicest treasures of their realms to pay him homage.” ॥180॥
श्लोक ( Shlok ) 181
विद्याधरधरासारधनोपायनसंपदा । तदुपानीतयाऽनन्यलभ्ययासीद्विमोधृतिः ॥१८१॥
नमि और विनमि जो अन्य किसीको नहीं मिलनेवाली विद्याधरों के देशकी मुख्य धनरूप सम्पत्ति भेंटमें लाये थे उससे महाराज भरत को भारी संतोष हुआ था ।।१८१॥
“Emperor Bharata was deeply gratified by the rare and peerless treasures of the Vidyādhara realms that Nami and Vinami had brought as tribute—gifts unmatched and offered to none but him.” ॥181॥
श्लोक 182 से 191
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129
आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 159
आदिपुराण पर्व 32 -उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 130 | श्लोक 131 से 141 | श्लोक 142 से 154 | श्लोक 155 से 171
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