आदिपुराण पर्व 40 – द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211
श्लोक 212 से 223 व्रतचर्या और ब्राह्मण सृष्टि
दश अधिकारों का विस्तार उपासकाध्ययन शास्त्र से समझना चाहिए। व्रतचर्या में सात पीठिका मंत्र सामान्य और सभी क्रियाओं में उपयोगी हैं। विशेष मंत्र विशिष्ट क्रियाओं के लिए हैं। मंत्रों का यथायोग्य प्रयोग करने वाला द्विज सन्मान प्राप्त करता है। मंत्ररहित क्रियाएँ सिद्धि नहीं देतीं। शास्त्राभ्यासी द्विज मंत्रोच्चारण सहित विधिपूर्वक क्रिया करें। महाराज भरत ने धर्म विजय और धार्मिक निपुणता से द्विजों को शिक्षा देकर ब्राह्मणवर्ण की सृष्टि की। वृषभदेव के मतानुसार दीक्षित ब्राह्मणों का सत्कार हुआ, जिनका चारित्र सुंदर और शास्त्रज्ञान प्रखर था। भरत ने इन ब्राह्मणों को सदाचार में स्थिर कर प्रतिदिन सन्मान किया, अपनी सृष्टि की उन्नति देख कृतकृत्य माना। इस प्रकार चालीसवाँ पर्व समाप्त हुआ।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 40- Shlok 212 to 223
श्लोक ( Shlok ) 212
अतोऽतिबालविद्यादीन्नियोगान् दशधोदितान् । यथार्हमात्मसात्कुर्वन् द्विजः स्याल्लोकसम्मतः ॥२१२॥
इसलिये जो अतिबालविद्या आदि दश प्रकारके नियोग निरूपण किये हैं उन्हें यथायोग्य रीतिसे स्वीकार करनेवाला द्विज ही सब लोगोंको मान्य हो सकता है ।। २१२॥
Therefore, only that Dvija who duly embraces the tenfold obligations—beginning with the early childhood education and so forth—can truly gain the esteem and recognition of all.212
श्लोक ( Shlok ) 213
गुणेप्वेष विशेषोऽन्यो यो वाच्यो बहुविस्तरः । स उपासकसिद्धान्ताद धिगम्यः प्रपञ्चतः ॥२१३॥
इन गुणोंमें जो अन्य विशेष गुण बहुत विस्तारके साथ विवेचन करनेके योग्य हैं उन्हें उपासकाध्ययनशास्त्रसे विस्तारपूर्वक समझ लेना चाहिये ।। २१३।।
Among these virtues, those special qualities that merit extensive discourse ought to be thoroughly comprehended through the sacred study of the Upāsaka-dhyāna scriptures.213
श्लोक ( Shlok ) 214
“क्रियामन्त्रानुषङ्गेण व्रतचर्याक्रियाविधौ । दशाधिकारा व्याख्याताः सवृत्तैराहृता द्विजैः ॥२१४॥
इस प्रकार व्रतचर्या क्रियाकी विधि का वर्णन करते समय उस क्रियाके योग्य मंत्रोंके प्रसंगसे उत्तम आचरणवाले द्विजोंके द्वारा माननीय दश अधिकारोंका निरूपण किया ।। २१४।।
Thus, while describing the method of the vow-observance rites, the ten venerable rights were delineated, established by the upright and virtuous Dvijas, in conjunction with the fitting mantras of those rites.214
श्लोक ( Shlok ) 215
क्रियामन्त्रास्त्विह ज्ञेया ये पूर्वमनुवर्णिताः । सामान्यविषयाः सप्त पीठिकामन्त्ररूढयः ।।२१५।।
इस प्रकरणमें जिनका वर्णन पहले कर चुके हैं उन्हें क्रियामन्त्र जानना चाहिये और जो सात पीठिकामन्त्र इस नामसे प्रसिद्ध हैं उन्हें सामान्यविषयक समझना चाहिये अर्थात् वे मन्त्र सभी क्रियाओंमें काम आते हैं ।॥२१५॥
In this chapter, those mantras which have been previously described must be known as ritual mantras; and the seven Pīṭhikā mantras, renowned by that name, ought to be understood as general in nature—that is, these mantras are applicable in all rites.215
श्लोक ( Shlok ) 216
ते हि साधारणाः सर्वक्रियासु विनियोगिनः । तत औत्सर्गिकानेतान् मन्त्रान् मन्त्रविदो विदुः ॥२१६॥
वे साधारण मन्त्र सभी क्रियाओंमें काम आते हैं इसलिये मंत्रोंके जाननेवाले विद्वान् उन्हें औत्स-गिक अर्थात् सामान्य मन्त्र कहते हैं ।।२१६।।
These common mantras serve in all sacred rites; therefore, the learned scholars who possess knowledge of mantras call them autsagika—that is, general or universal mantras. 216
श्लोक ( Shlok ) 217
विशेषविषया मन्त्राः क्रियासूक्तासु दर्शिताः । इतः प्रभृति चाभ्यूह्यास्ते यथाम्नायमग्रजैः ॥२१७॥
इनके सिवाय जो विशेष मन्त्र हैं वे ऊपर कही हुई क्रियाओंमें दिखला दिये गये हैं। अब व्रतचर्यासे आगेके जो मन्त्र हैं वे द्विजोंको अपनी आम्नाय (शास्त्र परम्परा) के अनुसार समझ लेना चाहिये ॥ २१७॥
Apart from these, the specialized mantras have been demonstrated in the aforementioned rites. Now, the mantras that follow in the observance of vows (Vratacharya) ought to be comprehended by the twice-born according to their own Āmnāya—their sacred scriptural tradition.217
श्लोक ( Shlok ) 218
मन्त्रानिमान् यथा योगं यः क्रियासु नियोजयेत् । स लोके संभर्ति याति युक्ताचारो द्विजोत्तमः ॥२१८॥
जो इन मन्त्रोंको क्रियाओं में यथायोग्य रूपसे काममें लाता है वह योग्य आचरण करनेवाला उत्तम द्विज लोकमें सन्मान को प्राप्त होता है ॥२१८।।
He who duly employs these mantras in their appropriate rites, practicing worthy conduct, is esteemed in the world as an exalted and noble twice-born. 218
श्लोक ( Shlok ) 219
क्रियामन्त्रविहीनास्तु प्रयोक्तॄणां न सिद्धये । यथा सुकृतसन्नाहाः सेनाध्यक्षा विनायकाः॥२१९॥
जिस प्रकार अस्त्र-शस्त्र धारण कर तैयार हुए मुख्य मुख्य योद्धा सेनापतिके बिना कुछ भी नहीं कर सकते उसी प्रकार मंत्रोंसे रहित क्रियाएं भी प्रयोग करने-वाले पुरुषोंकी कुछ भी सिद्धि नहीं कर सकतीं ।॥ २१९।।
Just as armed warriors, however valiant, cannot prevail without the guidance of their generals, so too actions devoid of mantras yield no accomplishment for the practitioner.219
श्लोक ( Shlok ) 220
ततो विधिममुं सम्यग वगम्य कृतागमः । विधानेन प्रयोक्तव्याः क्रियामन्त्रपुरस्कृताः ॥२२०॥
इसलिये शास्त्रोंका अभ्यास करनेवाले द्विजोंको यह सब विधि अच्छी तरह जानकर मन्त्रोच्चारणके साथ साथ सब क्रियाएं विधि-पूर्वक करनी चाहिये ।। २२० ।।
Therefore, the twice-born who study the scriptures must thoroughly comprehend all these methods and, with precise recitation of mantras, perform every rite in strict accordance with the prescribed procedure.220
श्लोक ( Shlok ) 221
इत्थं स धर्मविजयी भरताधिराजो धर्मक्रियासु ‘कृतधीर्नृ पलोकसाक्षि । तान् सुव्रतान् द्विजवरान् विनियम्य सम्यक् धर्मप्रियः समसृजत् द्विजलोकसर्गम् ॥ २२१॥
इस प्रकार जिसने धर्मके द्वारा विजय प्राप्त की है, जो धार्मिक क्रियाओंमें निपुण है और जिसे धर्म प्रिय है ऐसे भरतक्षेत्रके अधिपति महाराज भरतने राजा लोगोंकी साक्षीपूर्वक अच्छे अच्छे व्रत धारण करनेवाले उन उत्तम द्विजोंको अच्छी शिक्षा देकर ब्राह्मणवर्णकी सृष्टि की अर्थात् ब्राह्मणवर्णकी स्थापना की ॥२२१॥
Thus, the sovereign of Bharat, King Bharata, who triumphed through righteousness, skilled in sacred rites and devoted to dharma, with the kings as his witnesses, bestowed noble instruction upon those virtuous twice-born, well-versed in virtuous vows, thereby founding the Brahmin varna—the establishment of the Brahmin order. 221
श्लोक ( Shlok ) 222
इति भरतनरेन्द्रात् प्राप्तसत्कारयोगा व्रतपरिचयचारूद्वारवृत्ताः श्रुताढ्याः । जिनवृषभमतानु “ब्रज्यया पूज्यमानाः जगति बहुमतास्ते ब्राह्मणाः ख्यातिमीयु ॥ २२२॥
इस प्रकार महाराज भरतसे जिन्हें सत्कारका योग प्राप्त हुआ है, व्रतोंके परिचयसे जिनका चारित्र सुन्दर और उदार हो गया है, जो शास्त्रों के अर्थोंको जाननेवाले हैं और श्रीवृषभ जिनेन्द्रके मतानुसार धारण की हुई दीक्षासे जो पूजित हो रहे हैं ऐसे वे ब्राह्मण संसार में बहुत ही प्रसिद्धिको प्राप्त हुए और खूब ही उनका आदर-सन्मान किया गया ।। २२२।।
Thus, those who were honoured by the great King Bharata, whose conduct became noble and magnanimous through the observance of sacred vows, who were versed in the meanings of the scriptures, and who, having embraced initiation in accordance with the doctrine of the venerable Ṛṣabha Jina, became worthy of veneration—such Brahmins attained great renown in the world and were held in the highest esteem and reverence. 222
श्लोक ( Shlok ) 223
वृत्तस्थानथ तान् विधाय सभवानिध्क्ष्वाकुचूडामणिः” जैने वर्त्मनि सुस्थितान् द्विजवरान् सम्मानयन् प्रत्यहम् । स्वं मेने कृतिनं मुदा परिगतां स्वां सृष्टिमुच्चैः कृतां पश्यन् कः सुकृती कृतार्थपदवीं नात्मानमारोपयेत् ॥२२३॥
तदनन्तर इक्ष्वाकुकुलचूड़ामणि महाराज भरत जैनमार्ग में अच्छी तरह स्थित रहनेवाले उन ब्राह्मणोंको सदाचारमें स्थिर कर प्रतिदिन उनका सन्मान करते हुए अपने आपको धन्य मानने लगे सो ठीक ही है क्योंकि आनन्दसे युक्त तथा उत्कृष्टताको प्राप्त हुई अपनी सृष्टिको देखता हुआ ऐसा कौन पुण्यवान् पुरुष है जो अपने आपको कृतकृत्य न माने ।। २२३।।
Thereafter, the crest-jewel of the Ikṣvāku lineage, Emperor Bharata, seeing those Brahmins well established in the Jain path, firmly rooted in noble conduct, daily honoured them and considered himself blessed thereby. And rightly so—for what virtuous soul, beholding his own sacred creation resplendent with joy and exalted in excellence, would not deem himself fulfilled?223
इत्यार्षे भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षणमहापुराणसङ्ग हे द्विजोत्पत्तौ क्रियामन्त्रानुवर्णनं नाम चत्वारिंशत्तमं पर्व ॥४०॥
इस प्रकार भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराणसंग्रहके भाषा-नुवादमें द्विजोंकी उत्पत्तिमें क्रियामन्त्रोंका वर्णन करनेवाला यह चालीसवां पर्व समाप्त हुआ ।
In this manner concludes the fortieth canto of the Ṣaṭtriṃśallakṣaṇa Mahāpurāṇa Saṅgraha, composed by the revered Ācārya Jinaseṇa, containing the exposition, in lucid language, of the origin of the twice-born and the sacred mantras employed in their consecratory rites.
आदिपुराण पर्व 41 – भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन
पर्व 41 – श्लोक 1 से 11
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313
आदिपुराण पर्व 39 – दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211
आदिपुराण पर्व 40 – द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 31 | श्लोक 32 से 42 | श्लोक 43 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211
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