आदिपुराण पर्व 40 – द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 31 | श्लोक 32 से 42 | श्लोक 43 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112
श्लोक 113 से 121 जन्म संस्कार की विधि
जन्म संस्कार में पिता पुत्र के अंगों का स्पर्श कर ‘हे पुत्र, तू मेरे अंग-अंग से उत्पन्न हुआ है, मेरा आत्मा है, सैकड़ों वर्ष जीवित रह’ कहता है। ‘घातिजयो भव’ मंत्र पढ़कर नाभि नाल काटी जाती है। ‘श्रीदेव्यः ते जातक्रियां कुर्वन्तु’ कहकर सुगंधित चूर्ण से उबटन, ‘त्वं मन्दराभिषेकार्हो भव’ मंत्र से स्नान, और ‘चिरं जीव्या:’ मंत्र से अक्षत डाले जाते हैं। ‘नश्यात् कर्ममलं कृत्स्नम्’ मंत्र से औषधीय घी मुख और नाक में डाला जाता है। ‘विश्वेश्वरीस्तन्यभागी भूयाः’ मंत्र से माता का स्तन मंत्रित कर बालक को पिलाया जाता है। जरायु पटल को मंत्र पढ़कर पवित्र भूमि में गाड़ा जाता है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 40- Shlok 113 to 121
श्लोक ( Shlok ) 113
इत्यङ्गानि स्पृशेदस्य प्रायः सारूप्ययोगतः । तत्राधा यात्मसङ्कल्पं ततः सूक्तमिदं पठेत् ॥११३॥
इस प्रकार आशीर्वाद देकर पिता उसके समस्त अंगोंका स्पर्श करे और फिर प्रायः अपने समान होनेसे उसमें अपना संकल्पकर अर्थात् यह मैं ही हूँ ऐसा आरोपकर नीचे लिखे हुए सुभाषित पढ़े ।। ११३।।
“Having thus bestowed his benediction, the father should touch all the limbs of the child,and then, recognizing in the child a likeness to himself,he should impress upon him his own intention—identifying the child with his very self, thinking, ‘This indeed is I.’Thereafter, he should recite the noble verses that follow.”॥113॥
श्लोक ( Shlok ) 114
अङ्गादङ्गात्सम्भवसि हृदयादपि जायसे । आत्मा वै पुत्र नामासि स जीव शरदः शतम् ॥११४॥
हे पुत्र, तू मेरे अङ्ग अङ्गसे उत्पन्न हुआ है और मेरे हृदयसे भी उत्पन्न हुआ है इसलिये तू पुत्र नामको धारण करनेवाला मेरा आत्मा ही है। तू सैकड़ों वर्षों तक जीवित रह ।।११४।।
O son, thou hast sprung from every limb of my body, and even from the depths of my heart;therefore, thou art verily my very self, bearing the sacred name of ‘son.’Mayst thou live for hundreds of years in strength and righteousness.”॥114॥
श्लोक ( Shlok ) 115
क्षीराज्यममृतं पूतं नाभावावर्ज्य युक्तिभिः । घातिंजयो भवेत्यस्य ह्रासयेन्नाभिनालकम् ॥११५।।
तदनन्तर दूध और घीरूपी पवित्र अमृत उसकी नाभिपर डालकर ‘घातिजयो भव’ (तू घातिया कर्मोंको जीतने-वाला हो) यह मन्त्र पढ़कर युक्तिसे उसकी नाभिका नाल काटना चाहिये ।।११५।।
hereafter, let sanctified nectar in the form of milk and ghee be gently poured upon the infant’s navel,and while reciting the mantra ‘Ghātijayo bhava’ — ‘May you be the conqueror of destructive karmas,’let the umbilical cord be severed with due care and proper rite.”॥115॥
श्लोक ( Shlok ) 116 –117
श्रीदेव्यो जात ते जात क्रियां कुर्वन्त्विति बुवन्। तत्तनुं चूर्णवासेन’ शनैरुद्वयं यत्नतः ॥११६।॥ त्वं मन्दराभिषेकार्हो भवेति स्नपयेत्ततः । गन्धाम्बुभिश्चिरं जीव्या इत्याशास्याक्षतं क्षिपेत् ॥११७॥
तत्पश्चात् ‘हे जात, श्रीदेव्यः ते जातक्रियां’ कुर्वन्तु अर्थात् हे पुत्र, श्री, ह्री आदि देवियाँ तेरी जन्मक्रियाका उत्सव करें यह कहते हुए धीरे धीरे यत्नपूर्वक सुगन्धित चूर्णसे उस बालकके शरीरपर उबटन करे फिर ‘त्वं मन्दराभिषेकार्हो भव’ अर्थात् तू मेरु पर्वतपर अभिषेक करने योग्य हो यह मन्त्र पढ़कर सुगन्धित जलसे उसे स्नान करावे और फिर ‘चिरं जीव्याः’ अर्थात् तू चिरकालतक जीवित रह इस प्रकार आशीर्वाद देकर उसपर अक्षत डाले ।।११६-११७।।
“Thereafter, let the following auspicious invocation be spoken:
‘O newly born one, may the goddesses of Prosperity (Śrī), Modesty (Hrī), and the like, celebrate thy birth rites!’
Saying thus, let one gently and carefully anoint the child’s body with fragrant powders.Then, reciting the mantra ‘Tvaṁ Mandarābhiṣekārho bhava’ — ‘May you be worthy of the ceremonial anointing upon Mount Meru,’the infant should be bathed with perfumed water.Finally, bestowing the blessing ‘Ciraṁ jīvyāḥ’ — ‘May you live long,’let consecrated rice (akṣata) be gently scattered over him.”॥116–117॥
श्लोक ( Shlok ) 118
नश्यात्कर्ममलं कृत्स्नमित्यास्ये ऽस्य सनासिके । घृतमौषधसंसिद्धमाव पेन्मात्रया द्विजः ॥११८।।
इसके अनन्तर द्विज, ‘नश्यात् कर्ममलं कृत्स्नम्’- अर्थात् तेरे समस्त कर्ममल नष्ट हो जावें यह मन्त्र पढ़ करउसके मुख और नाकमें, औषधि मिलाकर तैयार किया हुआ घी मात्राके अनुसार छोड़े ॥११८॥
“Thereafter, O noble Brāhmaṇa, let the mantra be recited:
‘Naśyāt karmamalaṁ kṛtsnam’ — ‘May all the defilements of karma be utterly destroyed.’Then, medicated ghee, prepared with auspicious herbs, should be gently administered into the infant’s mouth and nostrils in appropriate measure.”॥118॥
श्लोक ( Shlok ) 119
ततो विश्वेश्वरास्तन्यभागी ” भूया इतीरयन् । मातुस्तनमुपामन्त्र्य वदनेऽस्य समासजेत् ॥११९।।
तत्पश्चात् ‘विश्वेश्वरीस्तन्यभागी भूयाः’ अर्थात् तू तीर्थ करकी माताके स्तनका पान करने वाला हो ऐसा कहता हुआ माताके स्तनको मन्त्रितकर उसे बालकके मुहमें लगा दे ।।११९।।
“Thereafter, reciting the mantra ‘Viśveśvarī-stanya-bhāgī bhūyāḥ’
‘May you partake of the milk of the Universal Mother, the mother of the Tīrthaṅkara,’let the mother’s breast be sanctified with the mantra and gently placed into the infant’s mouth.”॥119॥
श्लोक ( Shlok ) 120
प्राग्वणितमथानन्दं प्रीतिदानपुरःसरम् । विधाय विधिवत्तस्य जातकर्म समापयेत् ॥१२०॥
तदनन्तर जिस प्रकार पहले वर्णन कर चुके हैं उसी प्रकार प्रीतिपूर्वक दान देते हुए उत्सव कर विधिपूर्वक जातकर्म अथवा जन्मकालकी क्रिया समाप्त करनी चाहिये ।। १२० ।।
Thereafter, as described before, the birth rite (Jātakarma) — the sacred ceremony of nativity —should be concluded with devotion, offering gifts with delight and performing the prescribed festivities with due ritual observance.”॥120॥
श्लोक ( Shlok ) 121
जरायुपटलं चास्य नाभिनालसमायुतम् । शुचौ भूमौ निखातायां विक्षिपेन्मन्त्रमापठन् ॥१२१॥
उसके जरायु पटलको नाभिकी नालके साथ साथ किसी पवित्र जमीनको खोदकर मन्त्र पढ़ते हुए गाड़ देना चाहिये ।।१२१।।
“His placental membrane, together with the umbilical cord, should be buried in sanctified earth,while chanting the prescribed mantras with reverence and solemnity.”॥121॥
श्लोक 122 से 131
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313
आदिपुराण पर्व 39 – दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211
आदिपुराण पर्व 40 – द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 31 | श्लोक 32 से 42 | श्लोक 43 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112
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