आदिपुराण पर्व 32 -उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61
श्लोक 62 से 71 : जयकुमार का पराक्रम
सेना के तंबू में चार दरवाजे और रक्षा व्यवस्था थी। सिलावट रत्न ने तंबू, झोपड़ियाँ और रथ बनाए। कोलाहल सुन राजा क्रुद्ध हुए, पर चक्रवर्ती के आदेश पर गणबद्ध देवों और जयकुमार ने नागमुख-मेघमुख देवों को परास्त किया। जयकुमार बाण वर्षा करता बादल सा शोभित हुआ और मेधेश्वर नाम पाया।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 32 – Shlok 62 to 71
श्लोक ( Shlok ) 62
मध्ये रत्नद्वयस्यास्य स्थितमासप्तमाद् दिनात् । जलप्लवे बल’ भर्तुः व्यक्तमण्डायितं तदा ॥६२॥
उस जलके प्रवाहमें भरत की वह सेना सात दिन तक दोनों रत्नोंके भीतर ठहरी थी और उस समय वह ठीक अंडा के समान जान पड़ती थी ॥ ६२।।
“For seven days, Bharata’s army remained stationary within the confines of the two gems, the Chatraratna and Charmaratna, amidst the flow of that deluge, appearing as though it were an egg, enclosed and protected in its shell.” ॥62॥
श्लोक ( Shlok ) 63
चक्ररत्नकृतोद्योते रुद्धद्वादशयोजने । तत्राण्डके स्थितं जिष्णोर्निराबाधमभूद् बलम् ॥६३॥
जिसमें चक्ररत्नके द्वारा प्रकाश किया जा रहा है ऐसे उस बारह योजन लम्बे-चौड़े अण्डाकार तम्बू में ठहरी हुई भरत की सेना सब तरह की पीड़ा से रहित थी ॥६३।।
“Within the twelve-yojana long and wide, egg-shaped tent illuminated by the Chakraratna, the army of Bharata, resting in its shelter, was free from all manner of distress.” ॥63॥
श्लोक ( Shlok ) 64
प्रविभक्तचतुर्द्वारं सेनान्यान्तःसुरक्षितम् । बहिर्जयकुमारेण ररक्षे किल तद्वलम् ॥ ६४।।
उस बड़े तम्बूमें चारों दिशाओंमें चार दरवाजे विभक्त किये गये थे, उसके भीतरकी रक्षा सेनापतिने की थी और बाहरसे जय-कुमार उस सेनाकी रक्षा कर रहे थे ॥ ६४।।
“Within that grand tent, four doors were established, one in each direction. The defense within was entrusted to the commander, while the valiant Jai-Kumara stood guard outside, protecting the army from without.” ॥64॥
श्लोक ( Shlok ) 65
तदा पटकुटीभेदाः कीडिकाश्च विशङ्कटाः । कृताः स्थपतिरत्नेन रथाश्चाम्बर गोचराः ।॥६५।।
उस समय सिलावट रत्नने अनेक प्रकारके कपड़े के तम्बू, घासकी बड़ी बड़ी झोपड़ियां और आकाशमें चलनेवाले रथ भी तैयार किये थे ॥६५॥
“At that time, the Silāvaṭa Ratna fashioned various kinds of cloth tents, vast thatched huts of grass, and even aerial chariots that moved through the sky.” ॥65॥
श्लोक ( Shlok ) 66
बहिः कलकलं श्रुत्वा किमेतदिति पार्थिवाः । करं व्यापारयामासुः क्रुद्धाः कौक्षेयकं प्रति ॥६६॥
बाहर कोलाहल सुनकर ‘यह क्या है’ इस प्रकार कहते हुए राजाओंने क्रोधित होकर अपना हाथ तलवारकी ओर बढ़ाया ।। ६६ ।।
“Hearing the tumult outside, the kings, angered and exclaiming, ‘What is this?’, reached for their swords in haste.” ॥66॥
श्लोक ( Shlok ) 67
ततश्चक्रधरादिष्टा गणबद्धामरास्तदा । नागानुत्सारयामासुरारुष्टा हुङ्कृतैः क्षणात् ॥६७॥
तदनन्तर, उस समय जिन्हें चक्रवर्ती ने आदेश दिया है ऐसे गणबद्ध जाति के देवोंने क्रुद्ध होकर अपने हुंकार शब्दोंके द्वारा क्षणभरमें नागमुख देवों को हटा दिया ।।६७।।
“Then, at that moment, the deities of the Gaṇabaddha lineage—commanded by the Chakravartin—rose in fury and, with their thunderous roars, drove away the Nāgamukha deities in but a single instant.” ॥67॥
श्लोक ( Shlok ) 68
बलवान् कुरुराजोऽपि मुक्तसिंहप्रगर्जितः । दिव्यास्त्रैरजयन्नागान् रथं दिव्यमधिष्ठितः ।॥६८॥
अतिशय बलवान् कुरुवंशी राजा जयकुमारने भी दिव्य रथपर बैठकर सिंह-गर्जना करते हुए, दिव्य शस्त्रोंके द्वारा उन नागमुख देवोंको जीता ॥६८॥
“The exceedingly mighty Kuruvamshi king, Jai-Kumara, too ascended his divine chariot, and with lion-like roars and celestial weapons, he vanquished the Nāgamukha deities.” ॥68॥
श्लोक ( Shlok ) 69
तदा रणाङ्गणे वर्षन् शरधारामनारतम् । स रेजे धृतसन्नाहः प्रावृषेण्य इवाम्बुदः ॥६९॥
उस समय युद्धके आंगनमें निरन्तर बाणोंकी वर्षा करता हुआ और शरीरपर कवच धारण किये हुए वह जयकुमार वर्षाऋतुके बादलके समान सुशोभित हो रहा था ।॥६९॥
“At that time, in the arena of battle, Jai-Kumara—ceaselessly showering arrows and clad in shining armor—appeared resplendent like a rain-laden cloud at the height of the monsoon.” ॥69॥
श्लोक ( Shlok ) 70
तन्मुक्ता विशिखा दीप्रा रेजिरे समराजिरे । द्रष्टुं तिरोहितान्नागान् दीपिका इव बोधिताः ॥७०।।
जयकुमारके द्वारा छोड़े हुए वे देदीप्यमान बाण युद्धके आंगनमें ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो छिपे हुए नागमुखों को देखनेके लिये जलाये हुए दीपक ही हों ।। ७० ।।
“The radiant arrows released by Jai-Kumara lit up the battlefield, appearing as though they were flaming lamps kindled to reveal the hidden Nāgamukhas.” ॥70॥
श्लोक ( Shlok ) 71
ततो निववृते जित्वा नागान् मेघमुखानसौ । कुमारो रणसंरम्भात् प्राप्तमेघस्वरश्रुतिः ॥७१॥
तदनन्तर वह जयकुमार नागमुख और मेघ-मुख देवोंको जीतकर तथा मेधेश्वर नाम पाकर उस युद्धसे वापिस लौटा ॥ ७१।।
“Thereafter, having triumphed over the deities Nāgamukha and Meghamukha, Jai-Kumara returned from the battlefield bearing the honored title of Medheśvara—Lord of the Skies.” ॥71॥
श्लोक 72 से 81
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129
आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 159
आदिपुराण पर्व 32 -उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61
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