आदिपुराण पर्व 25 – भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31| श्लोक 32 से 41 |
श्लोक 42 से 51 कर्मों पर विजय और दिव्य गुण
भगवान कर्मों से मुक्त हैं और असातावेदनीय उनके लिए प्रभावहीन है। वे पाप को धोने वाले, ईति-उपसर्ग से रहित हैं। उनका केवलज्ञान अनंतमुखी है और वे चतुर्मुख, अविनाशी हैं। उनका शरीर छायारहित और नेत्र अनुन्मेष हैं। उनके नख-केश स्थिर रहते हैं, जो रसादि के अभाव को दर्शाते हैं। उनके उदार गुण अद्वितीय हैं और इंद्र भी उनके रूप-सौंदर्य की इच्छा करते हैं, पर वे इन्हें त्यागते हैं।
English translation of Ādi purāṇa parv 25 – Shlok 42 to 51
श्लोक ( Shlok ) 42
असद्वेद्योदयो घातिसहकारिव्यपायतः । त्वय्यकिंचित्करो नाथ सामग्ज्या हि फलोदयः ॥४२॥
कर्मरूपी सहकारी कारणों का अभाव हो जाने से असातावेदनीय का उदय आपके विषय में अकिंचित्कर है अर्थात् आपका कुछ नहीं कर सकता, सो ठीक ही है क्योंकि फल का उदय सब सामग्री इकट्ठी होने पर ही होता है ।।42।।
O Lord, due to the absence of cooperative causes in the form of karma, the rise of unpleasant sensations (Asata Vedaniya) has no effect on you. This is only natural because the fruition of results occurs only when all contributing factors come together. ॥42॥
श्लोक ( Shlok ) 43
नेतयो नोपसर्गाश्च प्रभवन्ति त्वयीशिनि । जगतां पालके हेलाक्षालितांहः कलङ्कके ॥४३॥
हे ईश, आप जगत् के पालक हैं और अपने लीलामात्र से ही पापरूपी कलंक धो डाले हैं, इसलिए आप पर न तो ईतियाँ अपना प्रभुत्व जमा सकती हैं और न उपसर्ग ही । भावार्थ―आप ईति, भीति तथा उपसर्ग से रहित हैं ।।43।।
O Lord, you are the protector of the world and have wiped away the stain of sin merely through your divine play. Therefore, neither calamities can dominate you, nor can obstacles affect you.
Meaning: You are free from calamities, fears, and afflictions. ॥43॥
श्लोक ( Shlok ) 44
त्वय्यनन्तमुखो त्सर्पत्केवलामललोचने । चातुरास्यमिदं युक्तं नष्टघातिचतुष्टये ॥४४॥
हे भगवन, यद्यपि आपका केवलज्ञानरूपी निर्मल नेत्र अनंतमुख हो अर्थात् अनंतज्ञेयों को जानता हुआ फैल रहा है फिर भी चूँकि आपके चार घातियाकर्म नष्ट हो गये हैं इसलिए आपके यह चातुरास्य अर्थात् चार मुखों का होना उचित ही है ।।44।।
O Lord, although your pure eye of omniscience (Kevalgyan) extends infinitely, knowing infinite objects, it is fitting that you are described as having four faces because your four destructive Karmas have been eradicated. ॥44॥
श्लोक ( Shlok ) 45
सर्वविद्येश्वरो योगी चतुरास्यस्त्वमक्षरः । सर्वतोऽक्षिमयं ज्योतिस्तन्वानों भास्यधीशितः ॥४५॥
हे अधीश्वर, आप सब विद्याओं के स्वामी हैं, योगी हैं, चतुर्मुख हैं, अविनाशी हैं और आपकी आत्ममय केवलज्ञानरूपी ज्योति चारों ओर फैल रही है इसलिए आप अत्यंत सुशोभित हो रहे हैं ।।45।।
O Supreme Lord, you are the master of all knowledge, a true yogi, four-faced, eternal, and your soul’s radiance in the form of omniscience spreads in all directions. Therefore, you appear exceedingly radiant and magnificent. ॥45॥
श्लोक ( Shlok ) 46
अच्छायत्वमनुन्मेषनिमेषत्वं च ते वपुः। धत्ते तेजोमयं दिव्यं परमौदारिकाह्वयम् ॥४६॥
हे भगवन् तेजोमय और दिव्यस्वरूप आपका यह परमौदारिक शरीर छाया का अभाव तथा नेत्रों की अनुन्मेष वृत्ति को धारण कर रहा है अर्थात् आपके शरीर की न तो छाया ही पड़ती है और न नेत्रों के पलक ही झपते हैं ।।46।।
O Lord, your luminous and divine transcendental body possesses the qualities of being shadowless and free from the act of blinking. That is, your body casts no shadow, and your eyes never blink. ॥46॥
श्लोक ( Shlok ) 47
विभ्राणोऽप्यध्यधिच्छत्र मच्छाया ङ्गस्त्वमीक्ष्यसे । महतां चेष्टितं चित्र मथवौजस्तवेदृशम् ॥४७॥
हे नाथ, यद्यपि आप तीन छत्र धारण किये हुए हैं तथापि आप छायारहित ही दिखायी देते हैं, सो ठीक ही है क्योंकि महापुरुषों की चेष्टाएँ आश्चर्य करने वाली होती हैं अथवा आपका प्रताप ही ऐसा है ।।47।।
O Lord, although you bear three parasols (symbols of honor), you still appear to be without a shadow. This is only natural, for the actions of great beings are truly wondrous, or perhaps it is the sheer brilliance of your glory. ॥47॥
श्लोक ( Shlok ) 48
निमेषापायधीराक्षं तव वक्त्राब्जमीक्षितुम् । त्वयेव नयनस्पन्दो नूनं देवैश्च संहृतः ॥४८॥
हे स्वामिन्, पलक न झपने से जिसके नेत्र अत्यंत निश्चल हैं ऐसे आपके मुखरूपी कमल को देखने के लिए ही देवों ने अपने नेत्रों का संचलन आप में ही रोक रखा है । भावार्थ―देवों के नेत्रों में पलक नहीं झपते सो ऐसा जान पड़ता है मानो देवों ने आपके सुंदर मुखकमल को देखने के लिए ही अपने पलकों का झपाना बंद कर दिया हो ।।48।।
O Lord, your eyes are utterly motionless, never blinking. It seems as if the gods have ceased blinking their own eyes just to gaze upon your lotus-like face.
Meaning: The gods’ eyes do not blink, as if they have deliberately stopped blinking to continuously behold your beautiful, radiant face. ॥48॥
श्लोक ( Shlok ) 49
नखकेशमितावस्था तवाविष्कुरुते विभो । रसादिविलयं देहे विशुद्धस्फटिकामले ॥४९॥
हे भगवन आपके नख और केशों की जो परिमित अवस्था है वह आपके विशुद्ध स्फटिक के समान निर्मल शरीर में रस आदि के अभाव को प्रकट करती है । भावार्थ―आपके नख और केश ज्यों-के-त्यों रहते हैं―उनमें वृद्धि नहीं होती है, इससे मालूम होता है कि आपके शरीर में रस, रक्त आदि का अभाव है ।।49।।
O Lord, the limited growth of your nails and hair reveals the absence of fluids like essence or blood in your pure, crystal-like radiant body.
Meaning: Your nails and hair remain unchanged—they do not grow—which indicates that your body is free from essence, blood, and other such substances. ॥49॥
श्लोक ( Shlok ) 50
इत्युदारैर्गुणैरेभिस्त्वमनन्यत्रभाविभिः । स्वयमेत्य वृतो नूनमदृष्टशरणान्तरैः ॥५०॥
इन प्रकार ऊपर कहे हुए तथा जो दूसरी जगह न पाये जाये ऐसे आपके इन उदार गुणों ने दूसरी जगह घर न देखकर स्वयं आपके पास आकर आपको स्वीकार किया है ।।50।।
In this way, the noble qualities described above, as well as those not found anywhere else, have found no suitable abode elsewhere and have thus come to reside in you alone, acknowledging you as their rightful dwelling. ॥50॥
श्लोक ( Shlok ) 51
अप्यमी रूम्सौन्दर्यकान्तिदीप्त्यादयो गुणाः । स्पृहणीयाः सुरेन्द्राणां तव हेयाः किलाद्भुतम् ॥५१॥
हे देव, यह भी एक आश्चर्य की बात है कि जिनकी प्राप्ति के लिए इंद्र भी इच्छा किया करते हैं ऐसे ये रूप-सौंदर्य, कांति और दीप्ति आदि गुण आपके लिए हेय हैं अर्थात् आप इन्हें छोड़ना चाहते हैं ।।51।।
O Lord, it is truly astonishing that qualities like beauty, radiance, and brilliance—so desirable that even Indra longs for them—are considered insignificant by you, as you seek to renounce them. ॥51॥
श्लोक 52 से 61
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268
आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 316
आदिपुराण पर्व 23 – समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 196
आदिपुराण पर्व 24 – भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 172 | श्लोक 173 से 181 | श्लोक 182 से 186
आदिपुराण पर्व 25 – भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 |