आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 |
श्लोक 182 से 191 सिद्धार्थक वन और शिला
सिद्धार्थक वन में चंद्रकांत शिला थी, जो छायादार और सजी थी। भगवान पालकी से उतरे और सभा को उपदेश दिया।
English translation of Ādi purāṇa parv 17 – Shlok 182 to 191
श्लोक ( Shlok ) 182
ततः प्राप सुरेन्द्राणां पृतना व्याप्य रोदसी । वयोरुतैरिवाहानं कुर्वरिसद्धार्थकं वनम् ॥१८२॥
तदनंतर इंद्रों की सेना भी आकाश और पृथिवी को व्याप्त करती हुई उस सिद्धार्थक वन में जा पहुंची । उस वन में अनेक पक्षी शब्द कर रहे थे इसलिए वह उनसे ऐसा मालूम होता था मानो इंद्र की सेना को बुला ही रहा हो ।।182।।
Thereafter, the army of the Indras, spreading across the sky and earth, also arrived at the Siddharthaka forest. The forest resonated with the calls of numerous birds, making it seem as if it were inviting Indra’s army. ( 182)
श्लोक ( Shlok ) 183
तत्रैकस्मिन् शिलापट्टे सुरैः प्रागुपकल्पिते । प्रथीयसि शुचौ स्वस्मिन् परिणाम इवोन्न ते ॥१८३॥
उस वन में देवों ने एक शिला पहले से ही स्थापित कर रखी थी । वह शिला बहुत ही विस्तृत थी, पवित्र थी और भगवान् के परिणामों के समान उन्नत थी ।।183।।
In that forest, the gods had already established a sacred stone. It was vast, pure, and elevated, just like the divine virtues of the Lord. ( 183)
श्लोक ( Shlok ) 184
चन्द्रकान्तमये चन्द्रकान्तशो भावहासिनि । पुञ्जीभूत इवैकत्र स्वस्मिन् यशसि निर्मले ।।१८४।।
वह चंद्रकांत मणियों की बनी हुई थी और चंद्रमा की सुंदर शोभा की हँसी कर रही थी इसलिए ऐसी मालूम होती थी मानो एक जगह इकट्ठा हुआ भगवान् का निर्मल यश ही हो ।।184।।
That stone was made of moonstone gems and seemed to mock the beauty of the moon. It appeared as if the pure, radiant glory of the Lord had gathered in one place. ( 184)
श्लोक ( Shlok ) 185
स्वभावभास्वरे रम्ये सुवृत्तपरिमण्डले । सिद्धक्षेत्र इव दृष्टुं तां भूतिं भुवमागते ॥१८५।
वह स्वभाव से ही दैदीप्यमान थी, रमणीय थी और उसका घेरा अतिशय गोल था इसलिए वह ऐसी मालूम होती थी मानो भगवान् के तपकल्याणक की विभूति देखने के लिए सिद्धक्षेत्र ही पृथ्वी पर उतर आया हो ।।185।।
It was naturally radiant, enchanting, and perfectly circular in shape. It appeared as if the sacred Siddha Kshetra itself had descended to Earth to witness the grandeur of the Lord’s ascetic initiation. ( 185)
श्लोक ( Shlok ) 186
सुशीतलतरुच्छायानिरुद्धोष्णकरत्विषि । पर्यन्तशाखिशाखाग्र विगलत्कुसुमीस्करे ।११८६।।
वृक्षों की शीतल छाया से उस पर सूर्य का आतप रुक गया था और चारों ओर लगे हुए वृक्षों की शाखाओं के अग्रभाग से उस पर फूलों के समूह गिर रहे थे ।।186।।
The cool shade of the trees blocked the sun’s heat from reaching it, and clusters of flowers continuously fell upon it from the tips of the surrounding tree branches. ( 186)
श्लोक ( Shlok ) 187
श्रीखण्डद्रवदत्ताच्छच्छटामङ्गलसंगते । शचीस्व हस्तविन्यस्तरत्नचूर्णोपहारके ।।१८७॥
वह शिला घिसे हुए चंदन-द्वारा दिये गए मांगलिक छींटों से युक्त थी तथा उस पर इंद्राणी ने अपने हाथ से रत्नों के चूर्ण के उपहार खींचे थे―चौक वगैरह बनाये थे ।।187।।
That sacred stone was adorned with auspicious sandalwood splashes and was further decorated by Indrani, who had drawn intricate patterns like chowk using powdered gems with her own hands. ( 187)
श्लोक ( Shlok ) 188
विशंकटपटी क्लृप्त विचित्रपटमण्डपे । मन्दानिलचलच्चित्रकेतुमालात ताम्बरे ।।१८८।।
उस शिला पर बड़े-बड़े वस्त्रों द्वारा आश्चर्यकारी मंडप बनाया गया था तथा मंद-मंद वायु से हिलती हुई अनेक रंग की पताकाओं से उस पर का आकाश व्याप्त हो रहा था ।।188।।
A marvelous pavilion was constructed over that stone using grand fabrics, and the sky above it was filled with flags of various colors, gently fluttering in the soft breeze. ( 188)
श्लोक ( Shlok ) 189
समन्तादुच्च रद्धू पधूमामोदितदिङ्मुखे । पर्यन्तनिहितानल्पमङ्गलद्रव्यसंपदि ।।१८९॥
उस शिला के चारों ओर उठते हुए धूप के धुओं से दिशाएँ सुगंधित हो गयी थी तथा उस शिला के समीप ही अनेक मंगलद्रव्यरूपी संपदा रखी हुई थी ।।189।।
The rising incense smoke around that sacred stone filled the directions with fragrance, and nearby, a vast collection of auspicious substances was placed. ( 189)
श्लोक ( Shlok ) 190
इत्यनल्पगुणे तस्मिन् शस्तवास्तुप्रतिष्ठिते । यानादत्रातरद्देवः सुरैः क्ष्मामवतारितात् ॥१९०॥
इस प्रकार जिसमें अनेक गुण विद्यमान है तथा जो उत्तम घर के लक्षणों से सहित है ऐसी उस शिला पर, देवों द्वारा पृथ्वी पर रखी गयी पालकी से भगवान् वृषभदेव उतरे ।।190।।
Thus, on that sacred stone, which possessed many virtues and displayed the finest signs of an auspicious abode, Lord Rishabhadeva descended from the palanquin that had been placed on Earth by the gods. ( 190)
श्लोक ( Shlok ) 191
धृतजन्माभिषेकर्द्धिः या शिला पाण्डुकाह्वया। पश्यन्नेनं शिलापट्टे विभुस्तस्याः समस्मरत् ।।१९१॥
उस शिलापट्ट को देखते ही भगवान् को जन्माभिषेक की विभूति धारण करने वाली पांडुकशिला का स्मरण हो आया ।।191।।
As soon as the Lord beheld that sacred stone, he was reminded of the Panduka Shila, which bore the grandeur of his birth consecration. ( 191)
श्लोक 192 से 201
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