आदिपुराण पर्व 23 – समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31
श्लोक 32 से 41 पुष्पवर्षा और अशोक वृक्ष
पुष्पवर्षा ने बारह योजन तक पराग फैलाया। भगवान के समीप अशोक वृक्ष रत्नमय पत्तों और फूलों से नृत्य करता और स्तुति करता था। इंद्र ने इसे मुख्य वृक्ष बनाया।
English translation of Ādi purāṇa parv 23 – Shlok 32 to 41
श्लोक ( Shlok ) 32
द्विषढ्यो जन भूभागमा मुक्ता सुरवारिदैः । पुष्पवृष्टिः पतन्ती सा व्यधाच्चित्रं रजस्ततम् ॥३२॥
देवरूपी बादलों-द्वारा छोड़ी जाकर पड़ती हुई पुष्पों की वर्षा ने बारह योजन तक के भूभाग को पराग (धूलि) से व्याप्त कर दिया था, यह एक भारी आश्चर्य की बात थी । भावार्थ―यहाँ पहले विरोध मालूम होता है क्योंकि वर्षा से तो धूलि शांत होती है न कि बढ़ती है परंतु जब इस बातपर ध्यान दिया जाता है कि वह पुष्पों की वर्षा थी और उसने भूभाग को पराग अर्थात् पुष्पों के भीतर रहने वाले केशर के छोटे-छोटे कणों से व्याप्त कर दिया था तब वह विरोध दूर हो जाता है यह विरोधाभास अलंकार कहलाता है ।।32।।
The rain of flowers, released by the god-like clouds, covered the land up to twelve yojanas with pollen (dust), which was indeed a great wonder.
Explanation:
At first, this statement appears contradictory because rain usually settles dust rather than increasing it. However, upon closer attention, it becomes clear that it was a rain of flowers, and it covered the land with pollen—tiny particles of saffron present inside the flowers. This resolves the apparent contradiction. Such a literary device, where an initial contradiction is later clarified, is known as the Virodhabhasa Alankara (Paradox Figure of Speech).
श्लोक ( Shlok ) 33
वृष्टिरसौ कुसुमानां तुष्टिकरी प्रमदानाम् । दृष्टिततीरनुकृत्य स्त्रष्टुरपप्तदुपान्ते ॥३३॥
स्त्रियों को संतुष्ट करने वाली वह फूलों की वर्षा भगवान् के समीप में पड़ रही थी और ऐसी जान पड़ती थी मानो स्त्रियों के नेत्रों की संतति ही भगवान् के समीप पड़ रही हो ।।33।।
The rain of flowers, which pleased the women, was falling near the Lord, and it seemed as if it was nothing but the offspring of their eyes falling near Him.33
श्लोक ( Shlok ) 34
षट्पदवृन्दविकीर्णेः पुष्परजोभिरुपेता । वृष्टिरमर्त्य विसृष्टा सौमनसी रुरुचेऽसौ ॥३४॥
भ्रमरों के समूहों के द्वारा फैलाये हुए फूलों के पराग से सहित तथा देवों के द्वारा बरसायी वह पुष्पों की वर्षा बहुत ही अधिक शोभायमान हो रही थी ।।34।।
The rain of flowers, showered by the gods and filled with the pollen spread by swarms of bees, appeared exceedingly beautiful.34
श्लोक ( Shlok ) 35
शीतलैर्वारिभिर्गाङ्गैरार्द्रिता कौसुमी वृष्टिः । षड्भेदैरा कुलापप्तत् पत्युरग्रे ततामोदा ॥३५॥
जो गंगा नदी के शीतल जल से भीगी हुई है, जो अनेक भ्रमरों से व्याप्त है और जिसकी सुगंधि चारों ओर फैली हुई है ऐसी वह पुष्पों की वर्षा भगवान् के आगे पड़ रही थी ।।35।।
That rain of flowers, moistened by the cool waters of the Ganga, swarming with numerous bees, and spreading its fragrance in all directions, was falling before the Lord.35
श्लोक ( Shlok ) 36
मरकतहरितैः पत्रैर्मणिमय कुसुमैश्चित्रैः । मरुदुपविधुताः शाखाश्चिरमधृत महाशोकः ॥३६॥
भगवान् के समीप ही एक अशोक वृक्ष था जो कि मरकतमणि के बने हुए हरे-हरे पत्ते और रत्नमय चित्र-विचित्र फूलों से सहित था तथा मंद-मंद वायु से हिलती हुई शाखाओं को धारण कर रहा था ।।36।।
Near the Lord stood an Ashoka tree, adorned with green leaves resembling emerald gems and decorated with exquisite, jewel-like flowers. Its branches, swaying gently in the soft breeze, added to its beauty.36
श्लोक ( Shlok ) 37
मदकलविरुतैर्भृङ्गैरपि परपुष्टविहङ्गैः । स्तुतिमिव भर्तुरशोको मुखरितदिक्कुरुते स्म ॥३७॥
वह अशोकवृक्ष मद से मधुर शब्द करते हुए भ्रमरों और कोयलों से समस्त दिशा को शब्दायमान कर रहा था जिससे ऐसा जान पड़ता था मानो भगवान् की स्तुति ही कर रहा हो ।।37।।
That Ashoka tree, resonating with the sweet humming of intoxicated bees and the melodious calls of cuckoos, filled all directions with sound, making it seem as if it were offering praises to the Lord.
श्लोक ( Shlok ) 38
व्यायतशाखादोश्चलनैः स्वैर्नृत्तमथासौ कर्तुमिवाग्रे। पुष्पसमूहैरञ्जलिमिद्धं भर्तुरकार्षींद व्यक्तमशोकः ॥३८॥
वह अशोकवृक्ष अपनी लंबी-लंबी शाखारूपी भुजाओं के चलाने से ऐसा जान पड़ता था मानो भगवान् के आगे नृत्य ही कर रहा हो और पुष्पों के समूहों से ऐसा जान पड़ता था मानो भगवान् के आगे दैदीप्यमान पुष्पांजलि ही प्रकट कर रहा हो ।।38।।
That Ashoka tree, by moving its long branch-like arms, appeared as if it were dancing before the Lord. With its clusters of flowers, it seemed as though it was offering a radiant floral tribute to Him.38
श्लोक ( Shlok ) 39
रेजेऽशोकतरुरसौ रुन्धन्मार्ग व्योमवर महेशानाम् । तन्वन्योजनविस्तृताः शाखा धुन्वन् शोकमयमदो ध्वान्तम् ॥३९॥
आकाश में चलने वाले देव और विद्याधरों के स्वामियों का मार्ग रोकता हुआ अपनी एक योजन विस्तार वाली शाखाओं को फैलाता हुआ और शोकरूपी अंधकार को नष्ट करता हुआ वह अशोकवृक्ष बहुत ही अधिक शोभायमान हो रहा था ।।39।।
That Ashoka tree, spreading its branches over a vast expanse of one yojana, seemed to obstruct the path of the gods and the lords of the Vidyadharas moving through the sky. Dispelling the darkness of sorrow, it appeared exceedingly magnificent. 39
श्लोक ( Shlok ) 40
सर्वा हरितो विटपैस्ततैः संमार्ष्टुमिवोद्यतधीरसौ + व्यायद्विकचैः कुसुमोस्करैः पुष्पोपहृ तिं विदधद्द्रुमः ॥४०॥
फूले हुए पुष्पों के समूह से भगवान के लिए पुष्पों का उपहार समर्पण करता हुआ वह वृक्ष अपनी फैली हुई शाखाओं से समस्त दिशा को व्याप्त कर रहा था और उससे ऐसा जान पड़ता था मानो उन फैली हुई शाखाओं से दिशा को साफ करने के लिए ही तैयार हुआ हो ।।40।
That tree, offering a floral tribute to the Lord with its clusters of blooming flowers, spread its branches across all directions. It seemed as if it had extended its branches solely to cleanse the directions.40
श्लोक ( Shlok ) 41
वज्रमू लबद्धरत्न बुध्नं सज्जपा भरस्नचित्रसूनम् । मतकोकिलालिसेव्यमेनं चक्रुरग्र्यमङ्घ्रिपं सुरेशाः ॥४१॥
जिसकी जड़ वज्र की बनी हुई थी, जिसका मूल भाग रत्नों से दैदीप्यमान था, जिसके अनेक प्रकार के पुष्प जपापुष्प की कांति के समान पद्मरागमणियों के बने हुए थे और जो मदोन्मत्त कोयल तथा भ्रमरों से सेवित था ऐसे उस वृक्ष को इंद्र ने सब वृक्षों में मुख्य बनाया था ।।41।।
Its roots were made of vajra (diamond), its base shone brilliantly with jewels, and its numerous flowers, resembling the radiance of hibiscus, were crafted from ruby gems. Adorned by intoxicated cuckoos and bees, that tree was made the foremost among all trees by Indra.41
श्लोक 42 से 51
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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