आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 159
आदिपुराण पर्व 32 -उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 12
श्लोक 13 से 21 : गुफा में प्रवेश और मार्ग संशय
गुफा के गाढ़ अंधकार से सेना भयभीत हुई। सेनापति ने पुरोहित के साथ अंधकार दूर करने के लिए दीवारों पर काकिणी और चूड़ामणि रत्नों से सूर्य-चंद्र मंडल बनवाए। इनके प्रकाश से सेना गुफा के मध्य में प्रवेश कर गई। चक्ररत्न दीपक सा मार्ग प्रशस्त करता था। सेना दो भागों में सिन्धु नदी के जल का उपयोग कर चलती थी, पर दिशा संशय के कारण भ्रमित थी। कई पड़ाव पार कर भरत ने गुफा की आधी भूमि तय की और उन्मग्नजला-निमग्नजला नदियों के संगम पर पहुँचे।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 32 – Shlok 13 to 21
श्लोक ( Shlok ) 13
तामालोक्य बलं जिष्णोर्दूरादासीत्स साध्यसम् । तमसा सूचिभेद्येन कज्जलेनेव सम्भृताम् ॥१३॥
सुई की नोकसे भी जिसका भेद नहीं हो सकता ऐसे कज्जलके समान गाढ़ अन्धकारसे भरी हुई उस गुफाको देखकर चक्रवर्तीकी सेना दूरसे ही भयभीत हो गई थी ।॥१३॥
“Beholding from afar that cavern, dense with a darkness as impenetrable as collyrium—into which not even the tip of a needle could pierce—the Emperor’s army grew stricken with fear.” (13)
श्लोक ( Shlok ) 14
चक्रिणा ज्ञापितो भूयः सेनानीः सपुरोहितः । तत्तमोनिर्गमोपाये प्रयत्नमकरोत्ततः ॥१४॥
तदनन्तर जिसे चक्रवर्ती ने आज्ञा दी है ऐसे सेनापतिने पुरोहितके साथ साथ, उस अन्धकारसे निकलनेका उपाय करने के लिये फिर प्रयत्न किया ॥१४।।
“Thereafter, the appointed general—commanded by the Emperor—once again made earnest effort, together with the royal priest, to find a means to dispel that profound darkness.” (14)
श्लोक ( Shlok ) 15
काकिणीमणिरत्नाभ्यां प्रतियोजनमालिखत् । गुहाभित्तिद्वये सूर्यसोमयोर्मण्डलद्वयम् ।।१५।।
उन्होंने गुफा की दोनों ओर की दीवालों पर काकिणी और चूड़ामणि रत्नसे एक एक योजन की दूरी पर सूर्य और चन्द्रमा के मण्डल लिखे ॥ १५॥
“Upon the walls on either side of the cavern, they inscribed the orbs of the Sun and Moon—placing them at intervals of one yojana—using the radiant gems Kākiṇī and Chūḍāmaṇi as their medium.” (15)
श्लोक ( Shlok ) 16
तत्प्रकाशकृतोद्योतं सज्योत्स्नातमसन्निधिम् । गुहामध्यमपध्वान्तं व्यगाहत ततो बलम् ॥१६॥
तदनन्तर उन मण्डलों के प्रकाश से जिसमें प्रकाश किया जा रहा है, चांदनी और धूप दोनों ही जिसमें मिल रहे हैं तथा जिसका सब अन्धकार नष्ट हो गया है, ऐसे गुफा के मध्य भाग में सेना ने प्रवेश किया ।।१६।।
“Then, by the light emanating from those mandalas, where moonlight and sunlight converged, and all darkness was dispelled, the army entered the very heart of the cavern.” (16)
श्लोक ( Shlok ) 17
चक्ररत्नज्वलद्दीपे ससेनान्या पुरः स्थिते । बलं तदनुमार्गेण प्रविभज्य द्विधा ययौ ॥१७॥
आगे आगे सेनापतिके साथ साथ चक्ररत्नरूपी देदीप्यमान दीपक चल रहा था और उसके पीछे पीछे उसी मार्गसे दो भागों में विभक्त होकर सेना चल रही थी ॥१७॥
“Ahead of them, guiding the way, the brilliant lamp in the form of the Chakraratna illuminated the path, while the army, splitting into two divisions, followed along the same route.” (17)
श्लोक ( Shlok ) 18
परिसिन्धु नदीस्त्रोतः प्राक् पश्चाच्चोभयोः पयोः । बलं प्रायज्जलं सिन्धो रुपयुज्योपयुज्य तत्॥१८॥
गृह सेना, सिन्धु नदीके प्रवाहके पूर्व तथा पश्चिमकी ओरके दोनों मार्गोंमें सिन्धु नदीके जलका उपयोग करती हुई जा रही थी ।।१८।।
“The homeward-bound army, utilizing the waters of the Sindhu River, advanced along both the eastern and western paths, following the river’s course.” (18)
श्लोक ( Shlok ) 19
पथि द्वैधे स्थिता तस्मिन् सेनाग्रण्या नियन्त्रिता । सा चमूः संशयद्वैधं तदा प्रापद् दिगाश्रयम् ॥१ ९॥
उन दोनों मार्गोपर चलती हुई तथा सेनापतिके द्वारा वश की हुई वह सेना उस समय दिशाओं सम्बन्धी संशयकी द्विविधताको प्राप्त हो रही थी अर्थात् उसे इस बातका संशय हो रहा था कि पूर्वदिशा कौन है ? और पश्चिम दिशा कौन है ? ॥१९॥
“As the army moved along both paths, under the general’s command, they became ensnared by a dual uncertainty regarding the directions—uncertain whether the east was before them or the west.” (19)
श्लोक ( Shlok ) 20
ततः प्रयाणकैः कैश्चित् प्रभूतयवसोदकैः। गुहार्द्धसम्मितां भूमि व्यतीयाय पतिर्विशाम् ॥२०॥
तदनन्तर जिनमें घास और पानी अधिक है ऐसे कितने ही मुकाम चलकर महाराज भरतने गुफाकी आधी भूमि तय की ॥ २०।।
“Then, after traversing many regions abundant in grass and water, King Bharata covered half the expanse of the cavern.” (20)
श्लोक ( Shlok ) 21
यत्रोन्मग्नजला सिन्धु र्निमग्नजलया समम् । प्रविष्टा तिर्यगुद्देशं तं प्राप बलमीशितुः ॥२१॥
और जहां पर ‘उन्मग्नजला’ नदी ‘निमग्नजला’ नदीके साथ साथ दोनों तरफकी दीवालोंके कुण्डोंसे निकलकर सिन्धु नदीमें प्रविष्ट होती है उस स्थानपर चक्रवर्तीकी सेना जा पहुँची ॥२१॥
At the spot where the Unmagna-jala river merges with the Nimagna-jala river, both flowing from the wells on either side and joining the Sindhu River, the Emperor’s army arrived.” (21)
श्लोक 22 से 31
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221
आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 66 | श्लोक 67 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 169
आदिपुराण पर्व 30 – पश्चिम समुद्र के द्वारका विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 34 | श्लोक 35 से 50 | श्लोक 51 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 129
आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 159
आदिपुराण पर्व 32 -उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 12
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