आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 |
श्लोक 82 से 91 उत्सव की भव्यता
देव और मनुष्य मंगल द्रव्य लेकर उपस्थित थे। अप्सराएँ और वारांगनाएँ नृत्य कर रही थीं। जय-घोष और मंगलगीत गूँज रहे थे। भगवान ने राज्य पुत्रों को सौंपकर दीक्षा की तैयारी की।
English translation of Ādi purāṇa parv 17 – Shlok 82 to 91
श्लोक ( Shlok ) 82
शचीदेव्यैकतो रङ्गवल्ल्यादिरचना कृता । देव्याऽन्यतो यशस्वत्या सानन्दं ससुनन्दया ॥८२॥
एक ओर तो इंद्राणी देवी ने रंगावली आदि की रचना की थी―रंगीन चौक पूरे थे और दूसरी ओर यशस्वती तथा सुनंदा देवी ने बड़े हर्ष के साथ रंगावली आदि की रचना की थी―तरह-तरह के सुंदर चौक पूरे थे ।।82।।
“On one side, Goddess Indrani had created intricate Rangavalli designs—colorful patterns adorned the ground, while on the other, Queens Yashasvati and Sunanda joyfully crafted beautiful and diverse Rangavalli patterns, filling the surroundings with vibrant artistic decorations.”
श्लोक ( Shlok ) 83
एकतो मङ्गलद्रव्यधारिण्यो दिक्कुमारिकाः । अन्यतः कृतनेपथ्या वारमुख्या वरस्त्रियः ॥८३॥
एक ओर तो दिक्कुमारी देवियाँ मंगल द्रव्य धारण किए हुई थी और दूसरी और वस्त्राभूषण पहने हुई उत्तम वारांगनाएँ मंगल द्रव्य लेकर खड़ी हुई थीं ।।83।।
“On one side, the celestial maidens (Dikkumari Devis) stood holding auspicious offerings, while on the other, noble women, adorned with exquisite garments and jewelry, stood gracefully, carrying sacred items for the ceremony.”
श्लोक ( Shlok ) 84
सुरवृन्दारकैः प्रीतैर्भगवानेकतो वृतः । क्षत्रियाणां सहस्रेण कुमारावन्यत्तो वृतौ ॥८४॥
एक ओर भगवान वृषभदेव अत्यंत संतुष्ट हुए श्रेष्ठ देवों से घिरे हुए थे और दूसरी ओर दोनों राजकुमार हजारों क्षत्रिय-राजाओं से घिरे हुए थे ।।84।।
“On one side, Lord Rishabhadeva, deeply content, was surrounded by the most exalted deities, while on the other, the two princes were encircled by thousands of Kshatriya kings.”
श्लोक ( Shlok ) 85
पुष्पान्जलिः सुरैर्मुक्तः स्तुवानैर्भर्तुरेकतः । अन्यतः साशिषः शेषाः क्षिप्ताः पौरैर्युवेशिनोः ॥८५॥
एक ओर स्वामी वृषभदेव के सामने स्तुति करते हुए देव लोग पुष्पांजलि छोड़ रहे थे और दूसरी ओर पुरवासीजन दोनों राजकुमारों के सामने आशीर्वाद के शेषाक्षत फेंक रहे थे ।।85।।
“On one side, the celestial beings were offering floral tributes while singing praises before Lord Rishabhadeva, and on the other, the citizens of the kingdom were joyfully showering sacred rice grains as a blessing upon the two princes.”
श्लोक ( Shlok ) 86
एकतोऽप्सरसां नृत्तमस्पृष्टधरणीतलम् । सलीलपदविन्यासमन्यतो वारयोषिताम् ॥८६॥
एक ओर पृथ्वीतल को बिना छुए ही―अधर आकाश में अप्सराओं का नृत्य हो रहा था और दूसरी ओर वारांगनाएँ लीलापूर्वक पद-विन्यास करती हुई नृत्य कर रही थीं ।।86।।
“On one side, celestial nymphs (Apsaras) were gracefully dancing in mid-air without touching the earth, while on the other, noble women were performing elegant dances, moving their feet rhythmically with playful charm.”
श्लोक ( Shlok ) 87
एकतः सुरतुर्याणां प्रध्वानों रुद्धदिङ्मुखः । नान्दीपटहनिर्घोषप्रविजृम्भितमन्यतः ॥८७॥
एक ओर समस्त दिशाओं को व्याप्त करने वाले देवों के बाजों के महान् शब्द हो रहे थे और दूसरी और नांदी पटह आदि मांगलिक बाजों के घोर शब्द सब ओर फैल रहे थे ।।87।।
“On one side, the resounding melodies of celestial instruments played by the gods echoed across all directions, while on the other, the auspicious sounds of Nandi, Pataha, and other ceremonial drums reverberated everywhere.”
श्लोक ( Shlok ) 88
एकतः किनरारब्धकलमङ्गलनिः क्वणः । अन्यतोऽन्तः पुरस्त्रीणां मङ्गलोद्गीतिनि स्वनः ॥८८॥
एक ओर किन्नर जाति के देवों के द्वारा प्रारंभ किये हुए मनोहर मंगल गीतों के शब्द हो रहे थे और दूसरी ओर अंतःपुर की स्त्रियों के मंगल गानों की मधुर ध्वनि हो रही थी ।।88।।
On one side, the enchanting melodies of auspicious songs sung by the celestial Kinnaras filled the air, while on the other, the sweet voices of the palace women resonated with joyful hymns of celebration.”
श्लोक ( Shlok ) 89
एकतः सुरकोटीनां जयकोलाहलध्वनिः । पुण्यपाठककोटीनां संपाठध्वनिरन्यतः ॥८९॥
एक ओर करोड़ों देवों का जय-जय ध्वनि का कोलाहल हो रहा था और दूसरी ओर पुण्यपाठ करने वाले करोड़ों मनुष्यों के पुण्यपाठ का शब्द हो रहा था ।।89।।
“On one side, the victorious cheers of millions of deities resounded through the skies, while on the other, the sacred chants of millions of virtuous humans echoed in devotion.”
श्लोक ( Shlok ) 90
इत्युच्चैरुत्सव द्वैतव्यग्रद्युजन भूजनम् । परमानन्दसाद्भूतमभूत्तद्राजमन्दिरम् ॥९०॥
इस प्रकार दोनों ही बड़े-बड़े उत्सवों में जहाँ देव और मनुष्य व्यग्र हो रहे हैं ऐसा वह राज-मंदिर परम आनंद से व्याप्त हो रहा था―उसमें सब ओर हर्ष ही हर्ष दिखाई देता था ।।90।।
“In this way, amidst both grand celebrations, where both deities and humans were filled with excitement, the royal palace was immersed in supreme bliss—everywhere, there was only joy and jubilation.”
श्लोक ( Shlok ) 91
वित्तीर्णराज्यभारस्य विभोरधियुवेश्वरम् । परिनिष्क्रमणोद्योगस्तदा जज्ञे निराकुलः ॥९१॥
भगवान ने अपने राज्य का भार दोनों ही युवराजों को समर्पित कर दिया था इसलिए उस समय उनका दीक्षा लेने का उद्योग बिलकुल ही निराकुल हो गया था―उन्हें राज्य संबंधी किसी प्रकार की चिंता नहीं रही थी ।।91।।
“Having entrusted the responsibility of the kingdom to both young princes, Lord Rishabhadeva was completely free from any worldly concerns—His resolve to embrace asceticism was now entirely undisturbed.”
श्लोक 92 से 101
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 209 | श्लोक 210 से 213
आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 224
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 208 | श्लोक 209 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 275
आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 |