आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301
श्लोक 302 से 311 पीठ और समवसरण
तीसरा पीठ सुमेरु-सा लोक को नीचा करता था। भगवान इसमें सिद्ध-से विराजते थे। समवसरण का विस्तार एक-एक योजन था। महावीथियाँ एक कोश चौड़ी थीं। पीठों की ऊँचाई आठ, चार, और चार धनुष थी।
English translation of Ādi purāṇa parv 22 – Shlok 302 to 311
श्लोक ( Shlok ) 302
अधरीकृतनिःशेषभवनं भासुरद्यति । जिनस्येव वपुर्भाति यत् स्म देवासुरार्चितम् ॥ ३०२॥
जिसने समस्त लोक को नीचा कर दिया है, जिसकी कांति अतिशय दैदीप्यमान है और जो देव तथा धरणेंद्रों के द्वारा पूजित है ऐसा वह पीठ जिनेंद्र भगवान् के शरीर के समान सुशोभित हो रहा था क्योंकि जिनेंद्र भगवान् के शरीर ने भी समस्त लोकों को नीचा कर दिया या, उसकी कांति भी अतिशय दैदीप्यमान थी, और वह भी देव तथा धरणेंद्रों के द्वारा पूजित था ।।302।।
“That Peeth, which surpassed the entire universe in grandeur, radiated an extraordinary brilliance and was revered by both deities and Dharanendra. It shone resplendently, much like the divine body of Lord Jinedra, for just as the Lord’s form outshone all worlds, emitted an unparalleled radiance, and was worshiped by gods and Dharanendra, so did this Peeth embody the same supreme glory.”302
श्लोक ( Shlok ) 303
ज्योति र्गंणपरीतत्वात् सर्वोत्तर तयापि तत् । न्यक् चकार श्रियं मेरोर्धारणाच्च जगद्गुरोः ॥३०३॥
अथवा वह पीठ सुमेरु पर्वत की शोभा धारण कर रहा था क्योंकि जिस प्रकार सुमेरु पर्वत ज्योतिर्गण अर्थात् ज्योतिषी देवों के समूह से घिरा हुआ है उसी प्रकार वह पीठ भी ज्योतिर्गण अर्थात् किरणों के समूह से घिरा हुआ था, जिस प्रकार सुमेरुपर्वत सर्वोत्तर अर्थात् सब क्षेत्रों से उत्तर दिशा में है उसी प्रकार वह पीठ भी सर्वोत्तर अर्थात् सबसे उत्कृष्ट था, और जिस प्रकार सुमेरु पर्वत (जन्माभिषेक के समय) जगद्गुरु जिनेंद्र भगवान को धारण करता है उसी प्रकार वह पीठ भी (समवसरण भूमि में) जिनेंद्र भगवान् को धारण कर रहा था ।।303।।
“That Peeth embodied the grandeur of Mount Sumeru, for just as Sumeru is surrounded by celestial bodies and luminous deities, the Peeth was encircled by radiant beams of light. Just as Sumeru stands in the northernmost and highest position, surpassing all regions, the Peeth too was the most supreme and exalted. And just as Mount Sumeru supports Lord Jinedra during his birth consecration, this Peeth bore the presence of Lord Jinedra in the Samavasarana.”303
श्लोक ( Shlok ) 304
ईदृक् त्रिमेखलं पीठमस्योपरि जिनाधिपः । त्रिलोकशिखरे सिद्धपरमेष्ठीव निर्बभौ ॥३०४॥
इस प्रकार तीन कटनीदार वह पीठ था, उसके ऊपर विराजमान हुए जिनेंद्र भगवान् ऐसे सुशोभित हो रहे थे जैसे कि तीन लोक के शिखर पर विराजमान हुए सिद्ध परमेष्ठी सुशोभित होते हैं ।।304।।
“Thus, that Peeth, adorned with three terraces, stood magnificently. Upon it, Lord Jinedra shone resplendently, just as the Siddha Parmesthi radiates supreme glory while seated at the pinnacle of the three worlds.”
श्लोक ( Shlok ) 305 – 306
नमः स्फटिकसालस्य मध्यं योजनसम्मितम् । वनत्रयस्य रुन्द्रत्वं ध्वजरुद्धावनेरपि ॥३०५॥
प्रत्येकं योजनं ज्ञेयं धूलीसालाच्च खातिका । गत्वा योजनमेकं स्याज्जिनदेशितविस्तृतिः ॥३०६॥
आकाश के समान स्वच्छ स्फटिकमणियों से बने हुए तीसरे कोट के भीतर का विस्तार एक योजन प्रमाण था, इसी प्रकार तीनों वन (लतावन, अशोक आदि के वन और कल्पवृक्ष वन) तथा ध्वजाओं से रुकी हुई भूमि का विस्तार भी एक-एक योजन प्रमाण था और परिखा भी धूलीसाल से एक योजन चल कर थी, यह सब विस्तार जिनेंद्रदेव का कहा हुआ है ।।305-306।।
“The inner expanse of the third fortification, made of crystal-clear sapphire gems, measured one yojana in extent. Similarly, the expanses of the three forests—Lata Vana (Creeper Forest), Ashoka Vana (Forest of Ashoka Trees), and Kalpavriksha Vana (Forest of Wish-Fulfilling Trees)—as well as the land adorned with towering flags, each extended one yojana. Additionally, the moat, stretching from the Dhulisala, also measured one yojana. All these vast dimensions have been described as belonging to Lord Jinedra’s divine realm.”305 – 306
श्लोक ( Shlok ) 307
नमःस्फटिकसालातु स्यादाराद् वनवेदिका । योजनार्ध तृतीयाच्च सालात् पीठं तदर्धगम् ॥३०७॥
आकाशस्फटिकमणियों से बने हुए कोट से कल्पवृक्षों के वन की वेदिका आधा योजन दूर थी और उसी साल से प्रथमपीठ पाव योजन दूरी पर था ।।307।।
“The altar of the Kalpavriksha forest, made of celestial crystal gems, was half a yojana away from the fortification. Similarly, the first Peeth was situated one-fourth of a yojana from the same reference point.”307
श्लोक ( Shlok ) 308
क्रोशार्ध पीठमूर्ध्नः स्याद् विष्कम्भो मेखलेऽपरे। प्रत्येकं धनुषां रुन्द्रे स्यातामर्धाष्टमं शतम्॥ ३०८ ॥
पहले पीठ के मस्तक का विस्तार आधे कोश का था, इसी प्रकार दूसरे और तीसरे पीठ की मेखलाएँ भी प्रत्येक साढ़े सात सौ धनुष चौड़ी थीं ।।308।।
“The summit of the first Peeth extended half a kos in width. Similarly, the girdles of both the second and third Peeths were each 750 dhanush wide.”308
श्लोक ( Shlok ) 309
क्रोशं रुन्द्रा महावीथ्यो भित्तयः स्वोच्छ्रितेर्मिताः। रोन्द्र्ये णाष्टमभागेन “प्राङ्निर्णीता तदुच्छ्रितिः ॥३०९।
महावीथियों अर्थात् गोपुर-द्वारों के सामने के बड़े-बड़े रास्ते एक-एक कोश चौड़े थे और सोलह दीवालें अपनी ऊंचाई से आठवें भाग चौड़ी थीं । उन दीवालों की ऊँचाई का वर्णन पहले कर चुके हैं―तीर्थंकरों के शरीर की ऊँचाई से बारहगुनी ।।309।।
“The grand avenues in front of the Gopura gates were each one kos wide. The sixteen walls had a width equal to one-eighth of their height. Their height, as previously described, was twelve times the height of a Tirthankara’s body.”309
श्लोक ( Shlok ) 310
अष्टदण्डोच्छ्रिता ज्ञेया जगती’ पीठमादिमम् । द्वितीयं च तदर्धेन मितोच्छ्रायं विदुर्बुधाः ॥३१०
प्रथम पीठरूप जगती आठ धनुष ऊँची जाननी चाहिए और विद्वान् लोग द्वितीय पीठ को उससे आधा अर्थात् चार धनुष ऊँचा जानते हैं ।।310।।
“The first Peeth, resembling a grand terrace (Jagati), was eight dhanush high. Scholars consider the second Peeth to be half of that, measuring four dhanush in height.”310
श्लोक ( Shlok ) 311
तावदुच्छ्रितमन्त्यं च पीठं सिंहासनोन्नतिः । धनुरेकमिहाम्नातं धर्मचक्रस्य चोच्छ्रितिः ॥३११॥
इसी प्रकार तीसरा पीठ भी चार धनुष ऊँचा था, तथा सिंहासन और धर्मचक्र की ऊँचाई एक धनुष मानी गयी है ।।311।।
“Similarly, the third Peeth was also four dhanush high, while the throne and the Dharma Chakra were each one dhanush in height.”311
श्लोक 312 से 316
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192
आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 253 | श्लोक 254 से 261
आदिपुराण पर्व 21 – ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 95 | श्लोक 96 से 111 | श्लोक 112 से 120 | श्लोक 121 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 205 | श्लोक 206 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 268
आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301