आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211
श्लोक 212 से 221 ध्वजाओं का वर्णन
ध्वजाओं के खंभे राजाओं-से ऊँचे थे। इनकी चौड़ाई 88 अंगुल और अंतर 25 धनुष था। ये तीर्थंकर की ऊँचाई से बारह गुने थे। ध्वजाओं में दस चिह्न थे। एक दिशा में 108 ध्वजाएँ थीं। ये वायु से हिलकर पूजा का आह्वान करती थीं। मालाएँ सौमनस्य दिखाती थीं।
English translation of Ādi purāṇa parv 22 – Shlok 212 to 221
श्लोक ( Shlok ) 212
सुस्थास्ते मणिपीठेषु ध्वजस्तम्भाः स्फुरद्रुचः । विरेजुर्जगतां मान्याः सुराजान इवोन्नताः ॥२१२॥
वे ध्वजाओं के खंभे मणिमयी पीठिकाओं पर स्थिर थे, दैदीप्यमान कांति से युक्त थे, जगत्मान्य थे और अतिशय ऊँचे थे इसलिए किन्हीं उत्तम राजाओं के समान सुशोभित हो रहे थे क्योंकि उत्तम राजा भी मणिमय आसनों पर स्थित होते हैं―बैठते हैं, दैदीप्यमान कांति से युक्त होते हैं, जगत्मान्य होते हैं―संसार के लोग उनका सत्कार करते हैं और अतिशय उन्नत अर्थात् उदारहृदय होते हैं ।।212।।
Those flag-bearing pillars stood firmly on jewel-studded pedestals, radiating a brilliant luster, revered by the world, and towering in height. Thus, they resembled great kings, for just as noble kings sit on jeweled thrones, shine with brilliance, are honored by the world, and possess a lofty and generous heart, so too did these majestic pillars exude grandeur and magnificence. ॥212॥
श्लोक ( Shlok ) 213
अष्टाशीत्यङ्गुलान्येषां रुन्द्रत्वं परिकीर्तितम् । पञ्चविंशतिकोदण्डान्यमीषामन्तरं विदुः ॥२१३॥
उन खंभों की चौड़ाई अट्ठासी अंगुल कही गयी है और उनका अंतर पच्चीस-पच्चीस धनुष प्रमाण जानना चाहिए ।।213।।
The width of those pillars was said to be eighty-eight angulas, and the distance between them was measured to be twenty-five bows’ length. ॥213॥
श्लोक ( Shlok ) 214 – 215
सिद्धार्थचैत्य वृक्षाश्च प्राकारवनवेदिकाः । स्तूपाः सताेरणा मानस्तम्भाः स्तम्भाश्च कैतवाः ॥२१४॥
प्रोक्तास्तीर्थकृदुत्सेधादुत्सेधेन द्विषड्गुणाः । दैर्व्यानुरूपभेतेषां रोन्द्रयमाहुर्मनीषिणः ॥२१५॥
सिद्धार्थवृक्ष, चैत्यवृक्ष, कोट, वनवेदिका, स्तूप, तोरणसहित मानस्तंभ और ध्वजाओं के खंभे ये सब तीर्थंकरों के शरीर की ऊँचाई से बारह गुने ऊँचे होते हैं और विद्वानों ने इनकी चौड़ाई आदि इनकी लंबाई के अनुरूप बतलायी है ।।214-215।।
The Siddhartha tree, Chaitya tree, fort walls, Vanavedika (forest altar), stupas, arches with Manastambhas (honor pillars), and flag-bearing pillars—all of these structures are twelve times the height of a Tirthankara’s body. Scholars have described their width and other dimensions in proportion to their height. ॥214-215॥
श्लोक ( Shlok ) 216
वनानां स्वगृहाणां च पर्वतनां तथैव च । भवेदुन्नतिरेषैव वर्णितागमकोविदैः ॥२१६॥
इसी प्रकार आगम के जानने वाले विद्वानों ने वन, वन के मकान और पर्वतों की भी यही ऊँचाई बतलायी है अर्थात् ये सब भी तीर्थंकर के शरीर से बारह गुने ऊँचे होते हैं ।।216।।
Similarly, scholars well-versed in the Agamas have stated that the forests, forest dwellings, and mountains also have the same height—twelve times the height of a Tirthankara’s body. ॥216॥
श्लोक ( Shlok ) 217
भवेयुर्गिरयो रुन्द्राः स्वोत्सेधादष्टसंगुणम् । स्तूपानां रौन्द्रयमुच्छ्रयात् सातिरेकं विदो विदुः ॥२१७॥
पर्वत अपनी ऊंचाई से आठ गुने चौड़े होते है और स्तूपों का व्यास विद्वानों ने अपनी ऊँचाई से कुछ अधिक बतलाया है ।।217।।
Mountains are eight times as wide as their height, and scholars have stated that the diameter of stupas is slightly greater than their height. ॥217॥
श्लोक ( Shlok ) 218
उशन्ति वेदिकादीनां स्वोत्सेधस्य चतुर्थकम् । पार्थवं परमज्ञानमहाकूपारपारगाः ॥२१८॥
परमज्ञानरूपी समुद्र के पारगामी गणधर देवों ने वनवेदियों की चौड़ाई वन की ऊँचाई से चौथाई बतलायी है ।।218।।
The Ganadhara Devas, who have crossed the ocean of supreme knowledge, have stated that the width of the Vanavedis (sacred forest altars) is one-fourth of the height of the forest. ॥218॥
श्लोक ( Shlok ) 219
स्रग्वस्त्रसहसानाब्ज हंसवीन मृगेशिनाम् । वृषभेभेन्द्रचक्राणां ध्वजाः स्युर्दशभेदकाः ॥२१९॥
ध्वजाओं में माला, वस्त्र, मयूर, कमल, हंस, गरुड़, सिंह, बैल, हाथी और चक्र के चिह्न थे इसलिए उनके दस भेद हो गये थे ।।219।।
The flags bore symbols of garlands, cloth, peacocks, lotuses, swans, Garuda, lions, bulls, elephants, and chakras, thus forming ten distinct types. ॥219॥
श्लोक ( Shlok ) 220
अष्टोत्तरशतं ज्ञेयाः प्रत्येकं पालिकेतनाः। एकैकस्यां दिशि प्रोच्चास्तरङ्गास्तोयधेरिव ॥२२०॥
एक-एक दिशा में एक-एक प्रकार की ध्वजाएँ एक सौ आठ―एक सौ आठ थीं, वे ध्वजाएँ बहुत ही ऊँची थीं और समुद्र की लहरों के समान जान पड़ती थी ।।220।।
In each direction, there were 108 flags of each type, making a total of 108 per direction. These flags were exceedingly tall and appeared like the waves of the ocean. ॥220॥
श्लोक ( Shlok ) 221
पवनान्दोलितस्तेषां केतूनामंशुकोत्करः । “व्याजुहूपुरिवाभासीद् जिनेज्यायै नरामरान् ॥२२१॥
वायु से हिलता हुआ उन ध्वजाओं के वस्त्रों का समुदाय ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो जिनेंद्र भगवान् की पूजा करने के लिए मनुष्य और देवों को बुलाना ही चाहता हो ।।221।।
The fluttering fabrics of those flags, swaying in the wind, appeared so magnificent as if they were calling upon humans and celestial beings to come and worship Lord Jinedra. ॥221॥
श्लोक 222 से 231
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192
आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 253 | श्लोक 254 से 261
आदिपुराण पर्व 21 – ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 95 | श्लोक 96 से 111 | श्लोक 112 से 120 | श्लोक 121 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 205 | श्लोक 206 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 268
आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211