आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 208 | श्लोक 209 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 |
श्लोक 262 से 271 भगवान के नाम और राज्य
भगवान को इक्ष्वाकु, गौतम, काश्यप आदि नाम मिले। उनका राज्यकाल 63 लाख पूर्व तक रहा। पुण्य की महत्ता बताई गई।
English translation of Ādi purāṇa parv 16 – Shlok 262 to 271
श्लोक ( Shlok ) 262
तदा कच्छमहाकच्छप्रमुखानपि भूभुजः । सोऽधिराजपदे देवः स्थापयामास सत्कृतान् ॥२६२॥
तदनंतर भगवान् आदिनाथ ने कच्छ महाकच्छ आदि प्रमुख-प्रमुख राजाओं का सत्कार कर उन्हें अधिराज के पद पर स्थापित किया ।।262।।
Then, Lord Adinath honored the eminent kings Kachchha, Mahakachchha, and others, appointing them to the esteemed position of Adhiraja (overlords). (262)
श्लोक ( Shlok ) 263
पुत्रानपि तथा योग्यं वस्तुवाहनसंपदा । भगवान् संविधत्ते स्म तद्धि राज्योब्जने फलम् ॥२६३॥
इसी प्रकार भगवान् ने अपने पुत्रों के लिए भी यथायोग्य रूप से महल, सवारी तथा अन्य अनेक प्रकार की संपत्ति का विभाग कर दिया था सो ठीक ही है क्योंकि राज्य प्राप्ति का यही तो फल है ।।263।।
Similarly, Lord Adinath appropriately distributed palaces, vehicles, and various other riches among His sons. And rightly so, for this is the true reward of attaining a kingdom. (263)
श्लोक ( Shlok ) 264
“आाकानाच्च तदेक्षणा रससंग्रहणे नृणाम् । इक्ष्वाकुरित्यभूद् देवो जगतामभिसंमतः ॥२६४॥
उस समय भगवान् ने मनुष्यों को इक्षु का रस संग्रह करने का उपदेश दिया था इसलिए जगत् के लोग उन्हें इक्ष्वाकु कहने लगे ।।264।।
At that time, Lord Adinath instructed humans on how to extract and collect sugarcane juice; hence, the people of the world began calling Him Ikshvaku. (264)
श्लोक ( Shlok ) 265
गौः स्वर्गः स प्रकृष्टात्मा गौतमोऽभिमतः सताम्। स तस्मादागतो देवो गौतमश्रुतिमन्वभूत् ॥ २६५॥
‘गो’ शब्द का अर्थ स्वर्ग है जो उत्तम स्वर्ग हो उसे सज्जन पुरुष ‘गोतम’ कहते हैं । भगवान् वृषभदेव स्वर्गों में सबसे उत्तम सर्वार्थसिद्धि से आये थे इसलिए वे ‘गौतम’ इस नाम को भी प्राप्त हुए थे ।।265।।
The word ‘Go’ means heaven, and the most excellent heaven is called ‘Gotama’ by noble men. Since Lord Vrishabhadev descended from the supreme heaven, Sarvarthasiddhi, He was also known by the name ‘Gautama’. (265)
श्लोक ( Shlok ) 266
काश्यमित्युच्यते तेजः काश्यपस्तस्य पालनात् । जीवनोपायमननान् मनुः कुलधरोऽप्यसौ ॥२६६॥
‘काश्य’ तेज को कहते हैं भगवान् वृषभदेव उस तेज के रक्षक थे इसलिए ‘काश्यप’ कहलाते थे । उन्होंने प्रजा की आजीविका के उपायों का भी मनन किया था इसलिए वे मनु और कुलधर भी कहलाते थे ।।266।।
The word ‘Kashya’ means radiance, and since Lord Vrishabhadev was the protector of that radiance, He was called ‘Kashyapa’. He also contemplated the means of livelihood for His people, which is why He was known as ‘Manu’ and ‘Kuladhara’. (266)
श्लोक ( Shlok ) 267
विधाता विश्वकर्मा च स्रष्टा चेत्यादिनामभिः । प्रजास्तं व्याहरन्ति स्म जगतां पत्तिमच्युतम् ॥२६७॥
इनके सिवाय तीनों जगत् के स्वामी और विनाशरहित भगवान् को प्रजा ‘विधाता’ विश्वकर्मा और ‘स्रष्टा’ आदि अनेक नामों से पुकारती थी ।।267।।
Apart from these names, the eternal Lord, the master of the three worlds, was also called ‘Vidhata’ (the Supreme Ordainer), ‘Vishwakarma’ (the Divine Architect), and ‘Srashta’ (the Creator) by the people. (267)
श्लोक ( Shlok ) 268
त्रिषष्टिलक्षाः पूर्वाणां राज्यकालोऽस्य संमितः । स तस्य पुत्रपौत्रादिवृतस्याविदितोऽगमत् ॥२६८॥
भगवान् का राज्यकाल तिरसठ लाख पूर्व नियमित था सो उनका वह भारी काल, पुत्र-पौत्र आदि से घिरे रहने के कारण बिना जाने ही व्यतीत हो गया अर्थात् पुत्र-पौत्र आदि के सुख का अनुभव करते हुए उन्हें इस बात का पता भी नहीं चला कि मुझे राज्य करते समय कितना समय हो गया है ।।268।।
The reign of the Lord was fixed for sixty-three lakh Purvas. Thus, that vast period passed without His awareness, as He was surrounded by His sons, grandsons, and other relatives. Engrossed in the joy of their company, He did not even realize how much time had elapsed while ruling. (268)
श्लोक ( Shlok ) 269
स सिंहासनमायोध्यमध्यासीनो महाद्युतिः । सुखानुपनतां पुण्यैः साम्राज्यश्रियमन्वभूत् ॥ २६९॥
महादैदीप्यमान भगवान् वृषभदेव ने अयोध्या के राज्यसिंहासन पर आसीन होकर पुण्योदय से प्राप्त हुई साम्राज्यलक्ष्मी का सुख से अनुभव किया था ।।269।।
The greatly radiant Lord Rishabhdev, seated upon the royal throne of Ayodhya, joyfully experienced the fortune of imperial prosperity, which He had attained due to the rise of His past merits. (269)
श्लोक ( Shlok ) 270
इश्थं सुरासुरगुरुर्गुरु पुण्ययोगाद् भोगान् वितन्वति तदा सुरलोकनाथे ।
सौख्यैरगाद् धृति मचिन्त्य धृतिः स धीरः पुण्यार्जने कुरुत यत्नमतो बुधेन्द्राः ॥२७०॥
इस प्रकार सुर और असुरों के गुरु तथा अचिंत्य धैर्य के धारण करने वाले भगवान वृषभदेव को इंद्र उनके विशाल पुण्य के संयोग से भोगोपभोग की सामग्री भेजता रहता था जिससे वे सुखपूर्वक संतोष को प्राप्त होते रहते थे । इसलिए हे पंडितजन, पुण्योपार्जन करने में प्रयत्न करो ।।270।।
Thus, Indra continuously sent various enjoyments and luxuries to Lord Rishabhdev, who was the guru of both gods and demons and the embodiment of immeasurable patience, as a result of His great accumulated merit. Through these divine gifts, He remained content and at peace.
Therefore, O wise ones, strive to accumulate merit (punya)! (270)
श्लोक ( Shlok ) 271
पुण्यात् सुखं न सुखमस्ति विनेह पुण्याद् बीजाद्विना न हि भवेयुरिह प्ररोहाः ।
पुण्यं च दानदम संयम सत्य शौच त्यागक्षमा दिशुभचेष्टितमूल मिष्टम् ॥२७१॥
इस संसार में पुण्य से ही सुख प्राप्त होता है । जिस प्रकार बीज के बिना अंकुर उत्पन्न नहीं होता उसी प्रकार पुण्य के बिना सुख नहीं होता । दान देना, इंद्रियों को वश करना, संयम धारण करना, सत्यभाषण करना, लोभ का त्याग करना, और क्षमाभाव धारण करना आदि शुभ चेष्टाओं से अभिलषित पुण्य की प्राप्ति होती है ।।271।।
In this world, happiness is attained only through merit (punya). Just as a sprout cannot emerge without a seed, similarly, happiness cannot exist without merit.
Acts such as giving charity, controlling the senses, practicing self-discipline, speaking the truth, renouncing greed, and cultivating forgiveness lead to the accumulation of the desired merit (punya). (271)
श्लोक 272 से 275
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 209 | श्लोक 210 से 213
आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 224
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 208 | श्लोक 209 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 |