आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वतकी गुफाका द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31
श्लोक 32 से 41 : विजयार्थ पर्वत पर सेना का पड़ाव
सेना विजयार्थ पर्वत के पाँचवें कूट पर रुकी, जहाँ सेनापतियों ने वन में डेरे लगवाए। वन के सघन वृक्षों और लतागृहों ने सैनिकों को आश्रय दिया। वन में प्रवेश से सैनिकों का राग बढ़ा, जिससे वैराग्य की धारणा मूर्खतापूर्ण प्रतीत हुई। विजयार्थ पर्वत का स्वामी विजयार्थ देव भरत के दर्शन हेतु आया, जो शिखरों, हारों और कड़ों से सुशोभित था।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 31 – Shlok 32 to 41
श्लोक ( Shlok ) 32
“प्रयायानुवनं किञ्चिदन्तरं तदनन्तरम् । “रूप्याद्रेर्मध्यमं कूटं सन्निकृप्य स्थितं बलम् ॥३२॥
तदनन्तर वह सेना वन ही वन कुछ दूर जाकर विजयार्ध पर्वतके पाँचवें कूटके समीप पहुँचकर ठहर गई ॥३२॥
“Thereafter, the army advanced through the forests, moving onward until it reached the vicinity of the fifth peak of the Vijayārtha Mountain, where it came to a halt.”32
श्लोक ( Shlok ) 33
तप्तस्तस्मिन् वने मन्दं मरुतां दोलितद्रुमे । नृपाज्ञया बलाध्यक्षाः स्कन्धावारं न्यवेशयन् ॥३३॥
सेनाके ठहरनेपर सेनापतियोंने महाराजकी आज्ञासे, जिसके वृक्ष मन्द मन्द वायुसे हिल रहे थे ऐसे उस वनमें सेना के डेरे लगवा दिये थे ।॥ ३३॥
“Upon the army’s halt, at the command of the king, the commanders set up the camp within the forest, where the trees swayed gently in the soft breeze.”33
श्लोक ( Shlok ) 34
स्वैरं जगृहुरावासान् सैनिकाः सानुमत्तटे । स्वयं गलत्प्रसूनौध घनशाखि घने वने ॥३४॥
जिसमें अपने आप फूलोंके समूह गिर रहे हैं और जो घने घने लगे हुए वृक्षोंसे सघन हैं ऐसे विजयार्ध पर्वतके किनारेके वनमें सैनिक लोगोंने अपने इच्छानुसार डेरे ले लिये थे ।। ३४ll
“In the forest at the edge of the Vijayārtha Mountain, where clusters of flowers fell of their own accord and the dense trees stood thick and full, the soldiers took their camps as they pleased, settling in accordance with their desires.”34
श्लोक ( Shlok ) 35
सरस्तीरतरूपान्तललामण्डपगोचराः । रम्या बभूवुरावासाः सैनिकानामयत्नतः ॥३५॥
सरोवरोंके किनारेके वृक्षोंके समीप ही जो लतागृहोंके स्थान थे वे बिना प्रयत्न किये ही सेनाके लोगोंके मनोहर डेरे हो गये थे ॥३५॥
“Near the trees by the lakesides, where the creepers had naturally entwined, the soldiers’ beautiful camps were set up effortlessly, as though the very place had become a haven for them.”35
श्लोक ( Shlok ) 36
वनप्रवेशमुन्मुग्धाः प्राहुवैराग्यकारणम् । तत्प्रवेशो ‘यतस्तेषाम भवद् रागवृद्धये ॥३६॥
‘वनमें प्रवेश करना वैराग्यका कारण है, ऐसा मूर्ख मनुष्य ही कहते हैं क्योंकि उस वनमें प्रवेश करना उन सैनिकोंकी रागवृद्धिका कारण हो रहा था। भावार्थ-वनमें जानेसे सेनाके लोगोंका राग बढ़ रहा था इसलिये वनमें जाना वैराग्यका कारण है ऐसा कहनेवाले पुरुष मूर्ख ही हैं ।॥ ३६॥
“Only the foolish would say that entering the forest is a path to renunciation, for, in truth, the soldiers’ attachment grew all the more as they entered that very forest. Thus, to claim that entering the forest fosters detachment is the folly of those who are blind to its true nature.”36
श्लोक ( Shlok ) 37
अथ तत्र कृतावासं ज्ञात्वा सनियमं प्रभुम् ।अगान्मागधवत् द्रष्टुं विजयार्द्धाधिपः सुरः ॥३७॥
अथानन्तर-महाराज भरतको वहाँ नियमानुसार ठहरा हुआ जानकर विजयार्ध पर्वतका स्वामी विजयार्थ नामका देव मागध देवके समान भरतके दर्शन करनेके लिये आया ।।३७।।
“Thereafter, perceiving that Emperor Bharata had settled there in accordance with the prescribed rites, the lord of Vijayārtha Mountain, known as Vijayārtha, approached to see the king, much like the divine Magadha deity coming to behold a great seer.”37
श्लोक ( Shlok ) 38
तिरीटशिखरोदग्रो लम्बप्रालम्बनिर्झरः। स भास्वत्कटको रेजे राजताद्रिरिवापरः ॥३८॥
उस समय वह देव किसी दूसरे विजयार्थ पर्वतके समान सुशोभित हो रहा था, क्योंकि जिस प्रकार विजयार्ध पर्वत शिखरसे ऊंचा है उसी प्रकार वह देव भी मुकुटरूपी शिखरसे ऊंचा था, जिस प्रकार विजयार्थ पर्वतपर झरने झरते हैं उसी प्रकार उस देवके गलेमें भी झरनों के समान हार लटक रहे थे और जिस प्रकार विजयार्ध पर्वतका कटक अर्थात् मध्यभाग देदीप्यमान है उसी प्रकार उसका कटक अर्थात् हाथोंका कड़ा भी देदीप्यमान था ॥ ३८।।
“At that moment, the deity appeared as splendid as another Vijayārtha Mountain itself, for just as the summit of Vijayārtha rises above all, so did the crown upon the deity’s head stand taller; as the mountain’s peaks are adorned with cascading waterfalls, so did the deity’s neck bear necklaces like flowing streams; and just as the middle portion of Vijayārtha Mountain shines with radiance, so too did the deity’s armlets gleam with a brilliant glow.”38
श्लोक ( Shlok ) 39
सितांशुकधरः स्रग्वी हरिचन्दनचर्चितः । स बभौ धृतरत्नार्थो निधिः शङ्ख इवोच्छ्रि तः ॥३९॥
जो सफेद वस्त्र धारण किये हुए हैं, मालाएँ पहिने है, जिसके शरीरपर सफेद चन्दन लगा हुआ है और जो रत्नोंका अर्थ धारण कर रहा है ऐसा वह देव खड़ी की हुई शंख नामक निधिके समान सुशोभित हो रहा था ।।३९।।
“The deity, adorned in white garments, wearing garlands, his body smeared with white sandalwood paste, and bearing the meaning of jewels, appeared resplendent, much like a conch-shell treasure standing upright, shining with ethereal brilliance.”39
श्लोक ( Shlok ) 40
ससंभ्रमं च सोऽभ्येत्य प्रह्वतामगमत्प्रभोः । ससत्कारं च तं चक्री भद्रासनमलम्भयत् ॥४०॥
उस देवने बड़ी शीघ्रताके साथ आकर चक्रवर्तीको नमस्कार किया औरचक्रवर्तीने भी उसे सत्कारपूर्वक उत्तम आसनपर बैठाया ।॥४०॥
“The deity swiftly approached and offered his salutations to the Emperor, who, in turn, with great reverence, bade him sit upon a seat of honor, welcoming him warmly.”40
श्लोक ( Shlok ) 41
‘गोपायिताऽहमस्याद्रेर्मध्यमं कूटमावसन् । स्वैरचारी चिरादद्य त्वयाऽस्मि परवान् विभो ॥४१।।
भरतसे उस देवने कहा कि मैं इस पर्वतका रक्षक हूँ और इस पर्वतके बीचके शिखरपर रहता हूँ। हे प्रभो, मैं आजतक अपनी इच्छानुसार रहता था-स्वतन्त्र था परन्तु आज बहुत दिनमें आपके आधीन हुआ हूँ ॥४१॥
“The deity said to Bharata, ‘I am the guardian of this mountain and dwell upon its central peak. O Lord, until this day, I have lived as I pleased—free and unbound; but today, after many days, I have come under your sovereign rule.'”41
श्लोक 42 से 51
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221
आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 66 | श्लोक 67 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 169
आदिपुराण पर्व 30 – पश्चिम समुद्र के द्वारका विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 34 | श्लोक 35 से 50 | श्लोक 51 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 129
आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वतकी गुफाका द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31