आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121
श्लोक 122 से 131: गुफा द्वार का खुलना और म्लेच्छ खंड में प्रवेश
सेनापति ने दंडरत्न से गुफा द्वार पर प्रहार किया, जिससे द्वार खुला और गर्मी निकली। द्वार के किवाड़ चिल्लाते और पसीने से तर प्रतीत हुए। गुफा से निकला शब्द पर्वत के रोने सा लगा। सेनापति को गर्मी ने स्पर्श नहीं किया, और आकाश से फूल बरसे। वह सिन्धु नदी के पश्चिम तट की वेदिका को पार कर म्लेच्छ खंड में प्रवेश किया, जहाँ प्रजा घबरा गई और कुछ लोग भागने लगे।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 31 – Shlok 122 to 131
श्लोक ( Shlok ) 122
जयताच्चक्रवर्तीति सोऽश्वरत्नमधिष्ठितः। दण्डेन ताडयामास गुहाद्वारं स्फुरद्ध्वनिः ॥१२२॥
अश्वरत्न पर बैठे हुए सेनापतिने चक्रवर्तीकी जय हो इस प्रकार कहकर दण्डरत्नसे गुफा द्वारका ताड़न किया जिससे बड़ा भारी शब्द हुआ ।॥१२२॥
“Seated upon the gem-studded horse-jewel, the commander of the army proclaimed, ‘Victory to the Emperor!’ So declaring, he struck the cave’s entrance with the rod-jewel, causing a mighty and resounding echo to arise.” ॥122॥
श्लोक ( Shlok ) 123
दण्डरत्नाभिघातेन गुहाद्वारे निरर्गले । तद्गर्भाद् बलवानूष्मा निर्ययौ किल संततः ॥१२३॥
दण्डरत्नकी चोटसे गुफाका द्वार खुल जानेपर उसके भीतरसे बड़ी भारी गर्मी निकलने लगी ।। १२३॥
“As the cave’s door opened under the blow of the rod-jewel, an intense and overwhelming heat began to pour forth from within.” ॥123॥
श्लोक ( Shlok ) 124
दधद्दण्डाभिधातोत्थं क्रेङ्कारमररीपुटम्। सवेदनमिवास्वेदि निर्गतासु गुहोष्मणा ॥१२४।॥
दण्डरत्नके प्रहारसे उत्पन्न हुए क्रेङकार शब्दको धारण करते हुए दोनों किवाड़ ऐसे जान पड़ते थे मानो वेदनासे सहित होनेके कारण चिल्ला ही रहे हों, उन्हें दुःखसे पसीना ही आ गया हो और गुफाके भीतरकी गरमी से उनके प्राण ही निकले जा रहे हों ।॥१२४।।
“The two doors, bearing the clangorous cry born of the rod-jewel’s blow, seemed as though they were wailing in pain—sweating in anguish, as if the searing heat within the cave were drawing forth their very life-breath.” ॥124॥
श्लोक ( Shlok ) 125
उद्घाटितकवाटेन द्वारेणोष्माणमुद्वमन् । रराज राजतः शैलो लब्धोच्छ्वासश्चिरादिव ॥ १२५।।
जिसके किवाड़ खुल गये हैं ऐसे द्वारसे गरमी को निकालता हुआ वह विजयार्ध पर्वत ऐसा जान पड़ता था मानो बहुत दिन बाद उसने उच्छ्वास ही लिया हो । १२५॥
“From the doorway whose panels had now swung open, the heat surged forth—while the mountain of Vijayaardha appeared as though, after a long and stifled stillness, it had at last heaved a deep and burdened sigh.” ॥125॥
श्लोक ( Shlok ) 126
कवाटपुटविश्लेषाद् उच्चचार महान् ध्वनिः । दण्डेनाभिहतस्याद्रेः आक्रोश इव विस्फुरन् ।।१२६॥
दोनों किवाड़ों के खुलनेसे एक बड़ा भारी शब्द हुआ था और वह ऐसा जान पड़ता था मानो दण्डरत्नके द्वारा ताड़ित हुए पर्वतके रोनेका शब्द ही हो ॥१२६॥
As both doors opened, a single, mighty sound thundered forth—seemingly nothing less than the very cry of the mountain, smitten by the rod-jewel.” ॥१२६॥
श्लोक ( Shlok ) 127
गुहोष्मणा स नाश्लेषि’ विदूरमपवाहितः । तरश्विनाऽश्वरत्नेन देवताभिश्च रक्षितः ॥१२७॥
वेगशाली अश्वरत्न जिसे बहुत दूर तक भगा ले गया है और देवताओंने जिसकी रक्षा की है ऐसे उस सेनापति को गुफा की गरमी छू भी नहीं सकी थी ।। १२७॥
“The swift-paced horse-jewel had borne the commander far away, and the gods themselves had watched over him—so that not even the searing heat of the cave could lay a finger upon him.” ॥१२७॥
श्लोक ( Shlok ) 128
निपेतुरमरस्त्रीणां दृक्क्षेपैः सममम्बरात् । सुमनःप्रकरास्तस्मिन् हासा इव जयश्रियः ॥१२८॥
उस समय उस सेनापति पर देवांगनाओं के कटाक्षों के साथ साथ आकाश से फूलों के समूह पड़ रहे थे और वे जयलक्ष्मी के हास के समान जान पड़ते थे ॥१२८।।
“At that moment, showers of celestial blossoms rained down upon the commander from the heavens, accompanied by the sidelong glances of divine maidens—appearing like the radiant smile of the Goddess of Victory herself.” ॥१२८॥
श्लोक ( Shlok ) 129
तटवेदीं ससोपानां रूप्याद्रेः समतीयिवान् । सोऽभ्येत् सतोरणां सिन्धोः पश्चिमां वनवेदिकाम् ॥१२९।।
सेनापति सीढ़ियों सहित विजयार्ध पर्वतके किनारे की वेदीको उल्लंघन करता हुआ तोरण सहित सिन्धु नदीके पश्चिम ओर वाली वनकी वेदिका के सन्मुख पहुंचा ।।१२९॥
“The commander, crossing the steps and surmounting the altar at the edge of Mount Vijayaardha, passed beneath the archway and arrived before the sacred platform that lay within the forest on the western bank of the Sindhu River.” ॥१२९॥
श्लोक ( Shlok ) 130
वेदिकां तामतिक्रम्य संजगाहे परां भुवम् । नानाकरपुरग्रामसीमारामैरलङ्कृताम् ॥१३०॥
उसने उस वेदिकाको भी उल्लंघन कर अनेक खानि, पुर, ग्राम, सीमा और बाग. बगीचोंसे सुन्दर म्लेच्छखण्ड की उत्तम भूमि में प्रवेश किया ॥ १३०॥
“He then crossed even that sacred platform, and pressing onward, entered the noble land of the Mlecchas—adorned with many mines, cities, villages, borders, and flourishing orchards and gardens.” ॥१३०॥
श्लोक ( Shlok ) 131
प्रविष्टमात्र एवास्मिन् प्रजास्त्रासमुपाययुः। समं ‘दारगवैरन्या घटन्ते स्म पलायितुम् ॥१३१॥
उस भूमिमें सेनापतिके प्रवेश करते ही वहाँकी समस्त प्रजा घबड़ा गई, उसमेंसे कितने ही लोग स्त्रियों तथा गाय भैंस आदिके साथ भागनेके लिये तैयार हो गये ॥ १३१ ॥
“No sooner had the commander set foot upon that land than its entire populace was seized with panic; many among them began to prepare for flight, taking with them their women, cattle, and buffaloes.” ॥१३१॥
श्लोक 132 से 141
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221
आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 66 | श्लोक 67 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 169
आदिपुराण पर्व 30 – पश्चिम समुद्र के द्वारका विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 34 | श्लोक 35 से 50 | श्लोक 51 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 129
आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121