आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 |
श्लोक 152 से 161 देशों और नगरों की रचना
विभिन्न देशों (कौशल, काशी, मगध आदि) और उनकी प्रकृति (देवमातृक, अदेवमातृक) का वर्णन। इनकी सीमाओं पर रक्षक नियुक्त किए गए।
English translation of Ādi purāṇa parv 16 – Shlok 152 to 161
श्लोक ( Shlok ) 152 –156
देशाः सुकोसलावन्तीपुण्ड्रो प्राश्मकरम्यकाः । कुरुकाशीकलिङ्गाङ्गवङ्गसुह्याः समुद्रकाः ॥१५२॥
काश्मीरोशीन रानर्त्त वत्सपञ्चालमालवाः । दशार्णाः कच्छमगधा विदर्भाः कुरुजाङ्गलम् ॥१५३॥
करहाटमहाराष्ट्रसुराष्ट्राभीरकोङ्कणाः । वनवासान्ध्रकर्णाटकोसलाश्चोल केरलाः ॥१५४॥
दार्वाभिसारसौवीरशूरसेनापरान्तकाः । विदेहसिन्धुगान्धारपवनाश्चेदिपल्लवाः ॥१५५॥
काम्बोजा रट्टबाह्लीकतुरुष्कशककेकयाः । निवेशितास्तथान्येऽपि विभक्ता विषयास्तदा ॥१५६॥
सुकोशल, अवंती, पुंड्र, उंड्र, अश्मक, रम्यक, कुरु, काशी, कलिंग, अंग, बंग, सुहृा, समुद्रक, काश्मीर, उशीनर, आनर्त, वस्तु, पंचाल, मालव, दशार्ण, कच्छ, मगध, विदर्भ, कुरुजांगल, करहाट, महाराष्ट्र, सुराष्ट्र, आभीर, कोंकण, वनवास, आंध्र, कर्णाट, कोशल, चोल, केरल, दारु, अभिसार, सौवीर, शूरसेन, अपरांतक, विदेह, सिंधु, गांधार, भवन, चेदि, पल्लव, कांबोज, आरट्ट, वाह्लीक, तुरुष्क, शक और केकय इन देशों की रचना की तथा इनके सिवाय उस समय और भी अनेक देशों का विभाग किया ।।152-156।।
“Sukoshala, Avanti, Pundra, Undra, Ashmaka, Ramyaka, Kuru, Kashi, Kalinga, Anga, Banga, Suhṛa, Samudraka, Kashmir, Ushinara, Anarta, Vastu, Panchala, Malava, Dasharna, Kachchha, Magadha, Vidarbha, Kurujangala, Karahata, Maharashtra, Saurashtra, Abhira, Konkan, Vanavasa, Andhra, Karnataka, Kosala, Chola, Kerala, Daru, Abhisara, Sauvira, Shurasena, Aparantaka, Videha, Sindhu, Gandhara, Bhavana, Chedi, Pallava, Kamboja, Aratta, Vahlika, Turushka, Shaka, and Kekaya—these regions were established.
Apart from these, at that time, many other regions were also classified and organized.”
श्लोक ( Shlok ) 157
अदेवमातृकाः केचिद् विषया देवमातृकाः । परे साधारणाः केचिद् यथास्वं ते निवेशिताः
इंद्र ने उन देशों में से कितने ही देश यथासंभव रूप से अदेवमातृक अर्थात् नदी-नहरों आदि से सींचे जाने वाले, कितने ही देश देवमातृक अर्थात् वर्षा के जल से सींचे जानेवाले और कितने ही देश साधारण अर्थात् दोनों से सींचे जाने वाले निर्माण किये थे ।।157।।
“Indra established many of these regions as Adevamatrika (irrigated by rivers, canals, etc.), many as Devamatrika (dependent on rainfall for irrigation), and some as ordinary (irrigated by both sources) as per their suitability.”
श्लोक ( Shlok ) 158
अभूतपूर्वरुद्मतैर्भूरमात्तैर्जनास्पदैः । दिवः खण्डेरिवायातैः कौतुकाद्धरणीतलम् ॥१५८॥
जो पहले नहीं थे नवीन ही प्रकट हुए थे ऐसे देशों से वह पृथिवीतल ऐसा सुशोभित होता था मानो कौतुकवश स्वर्ग के टुकड़े ही आये हों ।।158।।
“The surface of the earth was so beautifully adorned with these newly emerged regions, which had not existed before, that it seemed as if fragments of heaven had descended upon it out of curiosity.”
श्लोक ( Shlok ) 159
देशैः साधारणानुपजाङ्गलैस्तैस्तता मही। रेजे रजतभूभर्तु रारादा च पयोनिधेः ॥१५९॥
विजयार्ध पर्वत के समीप से लेकर समुद्र पर्यंत कितने ही देश साधारण थे, कितने ही बहुत जल वाले थे और कितने ही जल की दुर्लभता से सहित थे, उन देशों से व्याप्त हुई पृथिवी भारी सुशोभित होती थी ।।159।।
“From the vicinity of the Vijayaradha Mountain to the ocean, many regions were ordinary, some were abundant in water, while others suffered from water scarcity. The earth, filled with these regions, appeared immensely beautiful.”
श्लोक ( Shlok ) 160
तदन्तेष्वन्तपालानां दुर्गाणि परितोऽभवन् । स्थानानि कोकपालानामिव स्वर्धामसीमसु ॥१६०॥
जिस प्रकार स्वर्ग के धामों-स्थानों की सीमाओं पर लोकपाल देवों के स्थान होते हैं उसी प्रकार उन देशों की अंत सीमाओं पर भी सब ओर अंतपाल अर्थात् सीमारक्षक पुरुषों के किले बने हुए थे ।।160।।
“Just as the abodes of the guardian deities are situated at the borders of the celestial realms, similarly, at the outer boundaries of these regions, fortresses of Antapala (border guards) were built all around.”
श्लोक ( Shlok ) 161
तदन्तरालदेशाश्च बभूवुरनुरक्षिताः । लुब्धकारण्यचरक पुलिन्दशवरादिभिः ॥ १६१॥
उन देशों के मध्य में और भी अनेक देश थे जो लुब्धक, आरण्य, चरट, पुलिंद तथा शबर आदि म्लेच्छ जाति के लोगों के द्वारा रक्षित रहते थे ।।161।।
“Amidst those regions, there were many other lands that were guarded by people of the Lubdhaka, Aranya, Charata, Pulinda, and Shabara communities, who were considered Mlechchhas (non-Vedic tribes).”
श्लोक 162 से 171
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 209 | श्लोक 210 से 213
आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 224
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 |