आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131
श्लोक 132 से 141 कोट की शोभा
कोट विभिन्न रंगों से वर्षा-सा लगता था। इसमें जानवरों और लताओं के आकार थे। यह चमकता और सिंहनाद करता था। चार चाँदी के गोपुरद्वार आकाश को स्पर्श करते थे। ये निर्मल और लाल किरणों से युक्त थे।
English translation of Ādi purāṇa parv 22 – Shlok 132 to 141
श्लोक ( Shlok ) 132
क्वचिद् विद्रुमससंघातः पद्मरागांशुरञ्जितः । यस्मिन् सांध्यघनच्छायमाविष्कर्तुमलंतराम् ॥१३२॥
उस कोट में कहीं-कहीं जो मूँगाओं के समूह लगे हुए थे वे पद्मरागमणियों की किरणों से और भी अधिक लाल हो गये थे और संध्याकाल के बादलों की शोभा प्रकट करने के लिए समर्थ हो रहे थे ।।132।।
In some places within that enclosure, clusters of corals were embedded, which, illuminated by the rays of Padmaraga gems, appeared even more crimson—
so much so that they seemed capable of reflecting the radiant beauty of evening clouds. ||132||
श्लोक ( Shlok ) 133 –134
क्वचिन्नवघनच्छायः क्वचिच्छाडवलसच्छविः । क्वचिच्च सुरगोपाभो विद्युदापिञ्जरः क्वचित् ॥ १३३॥
क्वचिद्विचित्र रत्नांशु रचितेन्द्र शरासनः। घनकालस्य स्य वैदग्धीं स सालोऽलं व्यडम्बयत् ॥१३४॥
वह कोट कहीं तो नवीन मेघ के समान काला था, कहीं घास के समान हरा था, कहीं इंद्रगोप के समान लाल-लाल था, कहीं बिजली के समान पीला-पीला था और कहीं अनेक प्रकार के रत्नों की किरणों से इंद्रधनुष की शोभा उत्पन्न कर रहा था । इस प्रकार वह वर्षाकाल की शोभा की विडंबना कर रहा था ।।133-134।।
That enclosure appeared in various colors—
some parts were as dark as new clouds,some as green as fresh grass,some as red as Indragopa insects,some as golden as lightning,and some, illuminated by the rays of various gems, radiated the beauty of a rainbow.In this way, it seemed to mirror the splendor of the monsoon season. ||133-134||
श्लोक ( Shlok ) 135 – 137
क्वचिद् द्विपहरिव्याघ्ररूपैर्मिथुनवृत्तिभि । निचितः क्वचिदुद्देशे शुकैर्हंसैश्च बर्हिंणैः ॥१३५॥
विचित्ररत्न निर्माणैर्मनुष्यमिथुनैः क्वचित् । क्वचिच्च कल्पवल्लीभिर्व हिरन्तश्च चित्रितः ॥१३६॥
हसन्निवोन्मिषद्रत्नमयूखनिवहेः क्वचित्। क्वचित्सिंहरवान् कुर्वसियोत्सर्पत्प्रतिध्वनिः ॥१३७॥
वह कोट कहीं तो युगल रूप से बने हुए हाथी-घोड़े और व्याघ्रों के आकार से व्याप्त हो रहा था, कहीं तोते, हंस और मयूरों के जोड़ों से उद्भासित हो रहा था, कहीं अनेक प्रकार के रत्नों से बने हुए मनुष्य और स्त्रियों के जोड़ों से सुशोभित हो रहा था, कहीं भीतर और बाहर की ओर बनी हुई कल्पलताओं से चित्रित हो रहा था, कहीं पर चमकते हुए रत्नों की किरणों से हँसता हुआ-सा जान पड़ता था और कहीं पर फैलती हुई प्रतिध्वनि से सिंहनाद करता हुआ-सा जान पड़ता था ।।135-137।।
That enclosure was adorned in various ways—
Some parts were filled with figures of paired elephants, horses, and tigers,
Some places shone with pairs of parrots, swans, and peacocks,
Some were beautified by pairs of men and women crafted from precious gems,
Some were painted with intertwining wish-fulfilling creepers inside and out,
Some places appeared to be laughing due to the gleaming rays of brilliant gems,
And some parts resounded like a lion’s roar due to the expanding echoes. ||135-137||
श्लोक ( Shlok ) 138
दीप्राकारः स्फुरद्रत्नरुचिरा रुद्रखाङ्गणः । निषधाद्रिप्रतिस्पर्धीं स सालो व्यरुचत्तराम् ॥१३८॥
जिसका आकार बहुत ही दैदीप्यमान है, जिसने अपने चमकीले रत्नों की किरणों से आकाशरूपी आँगन को घेर लिया है और जो निषध कुलाचल के साथ ईर्ष्या करने वाला है ऐसा वह कोट बहुत ही अधिक शोभायमान हो रहा था ।।138।।
That enclosure was exceedingly radiant,Its shimmering gemstone rays enveloped the vast sky,It rivaled the splendor of Mount Nishadha,And it shone with unparalleled brilliance. ||138||
श्लोक ( Shlok ) 139
महान्ति गोपुराण्यस्य विबभुर्दिक्चतुष्टये । “राजतानि खगेन्द्राद्रेः शृङ्गाणीव स्पृशन्ति खम् ॥१३९॥
उस कोट के चारों दिशाओं में चाँदी के बने हुए चार बड़े-बड़े गोपुरद्वार सुशोभित हो रहे थे जो कि विजयार्ध पर्वत के शिखरों के समान आकाश का स्पर्श कर रहे थे ।।139।।
In all four directions of that enclosure,Stood four grand silver gates,Resplendent and towering high,Touching the sky like the peaks of Vijaya Mountain. ||139||
श्लोक ( Shlok ) 140
ज्योत्स्नं मन्यानि तान्युच्चैस्त्रिभूमानि चकासिरे। प्रहासमिव तन्वन्ति निर्जित्य त्रिजगच्छ्रियम्॥ १४०॥
चांदनी के समूह के समान निर्मल, ऊँचे और तीन-तीन खंड वाले वे गोपुरद्वार ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो तीनों लोकों की शोभा को जीतकर हँस ही रहे हों ।।140।।
Pure and radiant like clusters of moonlight,Tall and adorned with three grand tiers,Those majestic gateways shone brightly,
As if laughing in triumph over the beauty of the three worlds. ||140||
श्लोक ( Shlok ) 141
पद्मरागमयैरुच्चैः शिखरैर्व्योमलङ्ङ्घिभिः । दिशः पल्कवयन्तीव प्रसरैः शोणरोचिषाम् ॥१४१॥
वे गोपुरद्वार पद्मरागमणि के बने हुए और आकाश को उल्लंघन करने वाले शिखरों से सहित थे तथा अपनी फैलती हुई लाल-लाल किरणों के समूह से ऐसे जान पड़ते थे मानो दिशाओं को नये-नये कोमल पत्तों से युक्त ही कर रहे हों ।।141।।
Those grand gateways, crafted from Padmaraga gems,Stood tall, their towering peaks piercing the sky.With their spreading crimson rays, they seemed as ifThey were adorning the directions with fresh, tender leaves. ||141||
श्लोक 142 से 151
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 253 | श्लोक 254 से 261
आदिपुराण पर्व 21 – ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 95 | श्लोक 96 से 111 | श्लोक 112 से 120 | श्लोक 121 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 205 | श्लोक 206 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 268
आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131