Hindi Translation of Adi purana Parv 27
हिन्दी-भाषानुवाद : पर्व 26
श्लोक 1 से 11 : गंगा नदी की महिमा और भरत की दृष्टि
अथानन्तर वहां पर जो स्वच्छ जलसे अपने लिये (भरतके लिये) पादोदक प्रदान करती हुई सी जान पड़ती थी ऐसी गङ्गा नदीपर महाराज भरतने अपनी दृष्टि डाली ॥१॥
उस समय सारथिने महाराज भरतको गङ्गापर दृष्टि डाले हुए देखकर चित्तको प्रसन्न करनेवाले निम्नलिखित समयानुकूल वचन कहे ॥ २॥ हे महाराज ! यह गङ्गा नदी ठीक ऋषभदेव भगवान्की वाणी के समान जान पड़ती है, क्योंकि जिस प्रकार ऋषभदेव भगवान्की वाणी समस्त संसारको आनन्दित करती है उसी प्रकार यह गङ्गा नदी भी समस्त लोकको आनन्दित करती है और ऋषभदेव भगवान्की वाणी जिस प्रकार रज अर्थात् पापोंको नष्ट करनेवाली है उसी प्रकार यह गङ्गा नदी भी रज अर्थात् धूलिको नष्ट कर रही है ॥ ३॥ गंभीर तथा निर्मल जलसे भरी हुई यह गङ्गा नदी उत्पत्तिके समय तो हिमवान् पर्वतको पवित्र करती है और प्रवेश करते समय समुद्रको पवित्र करती है ।।४।। जिस प्रकार गंभीर और सन्तापको नष्ट करनेवाली सद्विद्या (सम्यग्ज्ञान) को पाकर बड़े बड़े मुनि लोग मद अर्थात् अहंकार छोड़ कर मुक्त हो जाते हैं उसी प्रकार ये जंगली हाथी भी इस गंभीर तथा संतापको नष्ट करनेवाली गङ्गा नदीको पाकर मद अर्थात् गण्डस्थलसे झरनेवाले तोय विशेषको छोड़कर शान्त हो जाते हैं ।।५।। इधर ये बनके हाथी शब्द करते हुए इसका पानी पी रहे हैं और इधर जलकी वृष्टि करते हुए ये शरऋतुके मेघ इसे भर रहे हैं ।।६।। अत्यन्त ऊंचा और सदा निश्चल रहनेवाला विजयार्ध पर्वत भी जिसे धारण नहीं कर सका है ऐसे इसके प्रवाहको गम्भीर होनेसे समुद्र सदा धारण करता रहता है ।।७।। संभव है कि अपने खारे जलसे जिसका अन्तःकरण निरन्तर जलता रहता है ऐसा समुद्र इस गङ्गा नदी के जलके प्रवाहसे अवश्य ही प्यासरहित हो जायेगा ।।८।। यह गङ्गा प्रसन्न मनके समान निर्मल हिमवान् पर्वतके पद्म नामक सरोवरसे निकल-कर पृथिवीपर प्रसिद्ध हुई है सो ठीक ही है क्योंकि जिसका जन्म शुद्ध होता है वह पूज्य होता ही है ।।९।। यह गङ्गा अपने जलके प्रवाहसे गङ्गादेवीके घरको चारों ओरसे भिगोकर आकाश- से अर्थात् हिमवान् पर्वतके ऊपरसें पृथिवीपर पड़ी है इसलिये इसे आकाशगङ्गा भी कहते हैं ।।१०।। जो चन्द्रमाकी किरणोंके समान निर्मल है, समुद्रतक फैली हुई है और लोकको पवित्र करनेवाली है ऐसी इस गङ्गाको यह हिमवान् अपनी कीर्तिके समान, धारण करता है ॥११॥
श्लोक 12 से 21 : गंगा की शोभा और शरद् ऋतु
यह गङ्गा अपने तटवर्ती दोनों ओरके वनोंसे ऐसी सुशोभित हो रही है मानो इसने नीले रंगके दो वस्त्र ही धारण कर रक्खे हों ॥१२॥ कमलोंके परागसे जिनका शरीर पीला पीला हो गया है और जो मनोहर शब्द कर रही हैं ऐसी हंसोंकी पंक्तियोंको यह नदी इस प्रकार धारण करती है मानो मन्द मन्द शब्द करती हुई सुवर्णमय करधनी ही धारण किये हो ।॥१३॥ यह नदी स्वच्छ मृणालके टुकडों के समान निर्मल अन्य सखी स्वरूप सहायक नदियोंको अपने में मिलाकर धारण करती है सो ठीक ही है क्योंकि ऐसे पुरुषोंकी मित्रता ही प्रशंसनीय कहलाती है ।।१४।। अनेक राजहंस (पक्षमें बड़े बड़े राजा) जिसकी सेवा करते हैं, जो संसारको प्रेम उत्पन्न करनेवाली है, और जिसकी महिमा भी कोई उल्लंघन नहीं कर सकता ऐसी यह गङ्गा आपकी राजलक्ष्मीके समान सुशोभित हो रही है ।।१५।। जो अत्यन्त ऊंची है, सोनेकी बनी हुई है, आकाश-मार्गको उल्लंघन करनेवाली है और आपकी आज्ञाके समान जिसका कोई उल्लंघन नहीं कर सकता ऐसी वनवेदिकाको यह गङ्गा नदी धारण कर रही है ।॥१६॥ हे देव, प्रसन्न होइए और इधर वनपंक्तियों, नदियों और तालाबोंमें स्थान जमाये हुई शरद् ऋतु की इस शोभाको निहारिये ॥१७॥ ये सप्तपर्ण जातिके वृक्ष अपनी सुगन्धिसे समस्त दिशाओं को सुगन्धित करनेवाले सुगन्धिचूर्णके समान फूलोंकी परागको चारों ओर बिखेर रहे हैं ।॥१८॥ इधर कामदेवके बाणोंके समान फूले हुए बाण जातिके वृक्षों द्वारा कामी मनुष्योंका चित्त अपहृत किया जा रहा है सो ठीक ही है क्योंकि रमणीय वस्तु क्या अपहृत नहीं करती ? अथवा किसे मनोहर नहीं जान पड़ती ? ।।१९।। इधर तालाबोंमें नील कमलोंके साथ साथ साधारण कमल भी विकसित हो रहे हैं और जो ऐसे जान पड़ते हैं मानो जिनमें नेत्र विकसित हो रहे हैं ऐसे शरॠतुरूपी लक्ष्मीके मुख ही हों ।॥ २०॥ इधर ये कुछ कुछ अव्यक्त शब्द करते हुए सुगन्ध के लोभी भूमर कमलोंमें उस प्रकार निलीन हो रहे हैं जिस प्रकार कि चाटुकारी करते हुए कामी जन स्त्रियोंके मुखरूपी कमलोंमें निलीन-आसक्त होते हैं ।।२१।।
श्लोक 22 से 31 : प्रकृति और गंगा की शोभा
जो मकरन्द रसका पान करनेके लिये उत्कण्ठित हो रहे हैं ऐसे ये भूमर कामदेवके बाणोंकी मूठके समान आभावाले अपने पंखोंसे कमलिनियोंके समूहमें जहां तहां विचरण कर रहे हैं घूम रहे हैं ।॥ २२॥ जिनके अंगोपांग कमलकी केशरसे रूषित होनेके कारण सुवर्णके समान पीले पीले हो गये हैं ऐसे ये भूमर कामरूपी अग्निके स्फुलिङ्गोंके समान जान पड़ते हैं ।।२३।। जगह जगह पृथिवीपर फूले हुए स्थल-कमलिनियोंके पेड़ ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो सबको जीतनेकी इच्छा करने-वाली शरऋतुरूपी लक्ष्मीके खड़े हुए कपड़े के तम्बू ही हों ।॥२४॥ जो कमलोंकी परागसे व्याप्त हो रहा है ऐसे सरोवरमें कमलको स्थलकमल समझती हुई यह हंसी पंखोंके विक्षेपकी रोककर अर्थात् पंख हिलाये बिना ही प्रवेश करती है और पानीमें डब जाती है ।॥ २५॥ यह हंस चन्द्रमाकी किरणोंके समान कोमल और देदीप्यमान मृणालको अपनी चोंचसे उठाकर और क्षीर-सहित मक्खनके समान कोई पदार्थ समझकर अपने बच्चेके लिये दे रहा है ॥ २६॥ कमलिनीके परागसे भरे हुए तालाबके जलमें ये हंस धीरे धीरे पंख हिलाते हुए बड़े प्रयत्नसे तैर रहे हैं ।॥ २७॥ तालाबके तीरपर तरंगोंसे तिरोहित हुई चकवीको नहीं देखता हुआ यह हंस आंखोंमें आंसू भरकर बड़ी करुणाके साथ रो रहा है ॥ २८॥ संभोगकी इच्छा करनेवाला यह शब्द करता हुआ हंस, तालाबकी तरंगोंसे जिसका शरीर सफेद हो गया है ऐसी चकवी के सन्मुख जा रहा है जब कि वह चकवी इस हंसकी इच्छा नहीं कर रही है ॥ २९॥ गङ्गा नदी के किनारे किनारे यह सप्तपर्ण जातिके वृक्षोंका वन ऐसा सुशोभित हो रहा है मानो अपने फूलोंकी परागसे आकाशमें चंदोवाकी शोभा ही धारण कर रहा हो ॥३०॥ मार्गकी थकावट को दूर करता हुआ और किनारेके वनोंको हिलाता हुआ यह गङ्गाकी लहरोंसे उठा हुआ पवन हम लोगोंके शरीरको धीरे धीरे स्पर्श कर रहा है ।॥ ३१॥
श्लोक 32 से 41 : वन और देव क्रीड़ा
वनकी पंक्तियोंको हिलाता हुआ यह वायु ग्रहण की हुई गङ्गाके जलकी बूंदोंसे ऐसा जान पड़ता है मानो हम लोगोंका अतिथि सत्कार करता हुआ ही आ रहा हो ।।३२।। हे देव, जो गायोंके संचारसे रहित है अर्थात् अत्यन्त दुर्गम है और जो देवों के द्वारा अधिष्ठित है अर्थात् जहां देव लोग आकर क्रीड़ा करते हैं ऐसा यह वन फूलों के बिछौनोंसे सुशोभित इन लतागृहोंसे अतिशय सुशोभित हो रहा है ।॥३१॥ इधर मन्दार वृक्षोंकी वन-पंक्तियोंकी घनी छायामें बैठे हुए ये देव लोग चन्द्रकान्त मणियोंकी शिलापर बार-बार क्रीड़ा कर रहे हैं ।॥ ३४।। अहा, इस किनारेके वनकी सुन्दरता कैसी आश्चर्य-जनक है कि देव लोग भी अपने अपने निवासस्थान छोड़कर यहां क्रीड़ा करते हैं ॥३५॥ जिन्होंने अपनी इच्छानुसार रति-क्रीड़ा प्रारम्भ की है ऐसे देव देवांगनाओंके द्वारा यहां काम-देवके चरकी शोभा बढ़ाई जा रही है। भावार्थ देव देवांगनाओंकी स्वच्छंद रतिक्रीडाको बेखकर मालूम होता है कि मानो यह कामदेवके रहनेका घर ही हो ।। ३६।। यह गङ्गा अपनी तरंगोंसे उठी हुई जलकी बूंदोंसे ऐसी जान पड़ती है मानो संभोग करनेमें असमर्थ होकर दीनता भरे अस्पष्ट शब्द करनेवाली देवांगनाओंकी हंसी ही कर रही हो ।। ३७ ।। इधर किन्नरोंका संगीत हो रहा है, इधर सिद्ध लोग बीणा बजा रहे हैं, इधर विद्याधरियां नृत्य कर रही हैं और इधर कुछ विद्याधरियां विलासपूर्वक टहल रही हैं ।॥ ३८॥ इधर यह किन्नर अपनी कान्ता के साथ साथ अप्सराओंका नृत्य देखता हुआ, और उनके संगीत शब्दोंको सुनता हुआ सुखसे गला ऊंचा कर बैठा है ॥ ३९॥ परस्परमें एक दूसरेको देखनेके लिये जिसका मन उत्कण्ठित हो रहा है ऐसा ऋतुओंका समूह इस वनमें एक साथ इकट्ठा होता हुआ बढ़ रहा है ॥४०॥ लाखसे रंगे हुए विद्याधरियोंके चरणोंसे ताड़ित हुआ यह अशोक वृक्ष इस वनमें पुष्प-मंजरियों को धारण कर रहा है ।।४१।।
श्लोक 42 से 51 : वन में ऋतुओं की शोभा
कोकिलोंके आलापसे जिसने समस्त दिशाओंको वाचालित कर दिया है ऐसा यह आमृवृक्ष कामदेवकी आंखोंकी पुतलियोंके समान पुष्प-मंजरियोंको धारण कर रहा है ।।४२।। वसन्तऋतुके फैलनेपर इस वनमें जो चम्पक जातिके वृक्ष विकसित हो रहे हैं और फूलोंके समूह धारण कर रहे हैं वे ऐसे जान पड़ते हैं मानो कामदेवके दीपक ही धारण कर रहे हों ।॥४३।। इधर ये मदोन्मत्त भूमर आम् वृक्षोंपर ऐसा शब्द कर रहे हैं मानो सबको जीतनेकी इच्छा करनेवाले कामदेवरूपी राजाके बाजे ही बज रहे हों ।॥४४।। कोयलों के मधुर शब्दरूपी नगाड़ों और भूमरोंकी गुंजार रूप प्रत्यंचाकी टंकार ध्वनिसे यहां ऐसा मालूम होता है मानो कामदेव तीनों लोकोंको जीतनेके लिये सेना सहित चढ़ाई ही कर रहा हो ॥४५॥ अहा, कैसा आश्चर्य है कि आमूवृक्षके साथ साथ फूलता हुआ यह निचुल जातिका वृक्ष इस वनमें वर्षाऋतुकी शोभाके साथ साथ वसन्त ऋतुकी भारी शोभा बढ़ा रहा है ॥४६।। इधर इस वनमें चारों ओरसे वन-लक्ष्मीके उत्कृष्ट हास्यकी शोभा बढ़ानेवाले माधवीलता के गुच्छोंपर आज वसन्त बड़ी वृद्धिको प्राप्त हो रहा है ।॥४७॥ जो अपने विकाससे वसन्त ऋतुके हास्यकी शोभा बढ़ा रही हैं और जो फूलोंकी सुगन्धिसे भूमरोंको व्याकुल कर रही हैं ऐसी ये वसन्तमें विकसित होनेवाली माधवीलताएं विकसित हो रही हैं फूल रही हैं ॥४८।। जिसने मालतीकी फैली हुई सुगन्धिसे भूमरोंको चंचल कर दिया है और फूल ही जिसका पवित्र हास्य है ऐसा यह ग्रीष्मऋतु वृक्षोंपर पैर रख रहा है अपना स्थान जमा रहा है ॥४९।। हे देव, कदम्ब पुष्पोंकी सुगन्धिसे सुगन्धित तथा केतकीकी धूलिसे धूसर हुआ यह वर्षाऋतु का वायु इस वनमें सदा बहता रहता है ।॥५०॥ इस वनमें मयूरोंके साथ साथ कोयल सदा उन्मत्त रहते हैं और कल हंसियों (वदकों) के मनोहर शब्दोंके साथ अपना शब्द मिलाकर बोलते हैं ।।५१।।
श्लोक 52 से 61 : वन का संगीतमय वातावरण
इधर उन्मत्त कोकिलाएं कुह कुह कर रही हैं, मयूर केका वाणी कर रहे हैं और ये हंस इन दोनों के शब्दोंकी प्रतिध्वनि कर रहे हैं ।॥५२॥ इघर ये भूमर किन्नरियोंके द्वारा गाये हुए गीतोंका अनुकरण कर रहे हैं और इधर यह कोयल सिद्धोंके द्वारा बजाई हुई वीणाके शब्दोंको छिपा रहा है ।। ५३।। इधर नूपुरोंकी भंकारको जीतता हुआ हंसोंका शब्द हो रहा है, और इधर जिसका अनुकरण कर मयूर नाच रहे हैं ऐसा विद्याधरियोंका नृत्य हो रहा है ।।५४।। इधर बालूके टीलोंकी गोदमें अपने बच्चों सहित सोये हुए हंसोंको प्रातः कालके समय यह विद्याधरियोंके नूपुरोंका ऊंचा शब्द जगा रहा है ।।५५।। इधर जो बहुतसे फूलोंसे बनाई हुई शय्याओंसे मनोहर जान पड़ते हैं, जिनके मध्यमें चन्द्रकान्त मणिकी शिलाएं पड़ी हुई हैं और जो देवोंके उपभोग करने योग्य हैं ऐसे लतागृह बने हुए हैं ।। ५६ ।। इस प्रकार यह वन अत्यन्त रमणीय सामग्रीसे देवोंके सदा नन्दन वनकी प्रीतिको उत्पन्न करता रहता है ॥५७॥
इधर किनारेके वनके बाहर भी एक बड़ा भारी वन दिखाई दे रहा है जो कि अनेक प्रकारके वृक्षों, लताओं, छोटे छोटे पौधों और झाड़ियोंसे अत्यन्त दुर्गम है ।॥५८॥ जिसमें दृष्टि भी नहीं जा सकती ऐसे इस वनमें सेनाके क्षोभसे घबड़ाया हुआ यह अनेक जातिके मृगों का समूह बड़े जोरसे दौड़ा जा रहा है ।॥५९॥ जो हमारी सेनाके क्षोभसे भयभीत हुए हरिणों से व्याप्त है तथा जिसमें जीवोंके प्राण आकुल हो रहे हैं ऐसा यह वन अन्धकारसे व्याप्त हुए के समान जान पड़ता है ॥ ६०॥ इधर सेनाके क्षोभसे अलग अलग हुआ यह हाथियोंका झुण्ड गङ्गा किनारेके जलवाले प्रदेशसे अन्धकारके समान चारों ओर बड़े वेगसे भागा जा रहा है ।॥६१।।
श्लोक 62 से 71 : वन्य जीवों का क्षोभ
हाथियों के झुण्डकी रक्षा करनेवाला यह भद्र गजराज सूंड़को ऊंचा उठाता हुआ तथा दिशाओंको सूंघता हुआ धीरे धीरे ऐसा जा रहा है मानो शेषनाग सहित सुमेरु पर्वत ही जा रहा हो ।॥ ६२।। जिसने अपने शरीरके ऊर्ध्वभागको ऊंचा उठा रक्खा है ऐसा यह बड़ा भारी सर्प जलवाले प्रदेशसे सांस लेता हुआ इस प्रकार आ रहा है मानो वृक्षोंकी लम्बाईको नापता हुआ ही आ रहा हो ॥ ६३।। इधर इस लतागृहमें इकट्ठे हुए ये अजगरके बच्चे इस प्रकार श्वास ले रहे हैं मानो सेनाके क्षोभसे वनकी अंतड़ियों के समह ही निकल आये हों ॥६४।। जो अकेला ही फिरा करता है, जिसने अपनी नाकसे समीपके स्थल खोद डाले हैं, और जो अत्यन्त क्रोधी है ऐसा यह शुकर सेनाका मार्ग रोक रहा है ।। ६५।। सेनाके लोगोंने जिसे पत्थर लकड़ी आदिसे रोक रक्खा है ऐसा यह गंड अर्थात् छोटे पर्वतके समान दिखनेवाला गैंडा हाथी स्पष्ट रूपसे सेनाको व्याकुल कर रहा है ।। ६६॥ जो दावानलकी ज्वालाके समान पीले और विस्तृत गर्दनपरके बालोंके समूहोंको हिला रहे हैं ऐसे ये सिंह इस वनसे इस प्रकार निकल रहे हैं मानो उसके प्राण ही निकल रहे हों ।॥ ६७।। जो मेघके समान कर्बुर वर्ण है, जिसके सींगका अग्रभाग यमराजकी दाढ़के समान है तथा जो अत्यन्त भयंकर है ऐसा यह भैंसा इस गुगुलके वनसे बाहर निकल रहा है ।॥ ६८॥ जिनकी पूंछ हिल रही है, जिह्वा चंचल हो रही है और नेत्र अत्यन्त लाल हो रहे हैं ऐसे ये सिंह आदि क्रर जीव स्वयं व्याकुल न होकर ही सेना का क्षोभ बढ़ा रहे हैं ।। ६९।। यह अष्टापद आकाशमें उछलकर यद्यपि पीठके बल गिरता है तथापि पीठपर रहनेवाले पैरोंसे यह दुःखका अनुभव नहीं करता। भावार्थ अष्टापदः नामका एक जंगली जानवर होता है उसके पीठपर भी चार पांव होते हैं। जब कभी वह आकाश में छलांग मारनेके बाद चित्त अर्थात् पीठ के बल गिरता है तो उसे कुछ भी कष्ट नहीं होता क्योंकि वह अपने पीठपरके पैरोंसे संभलकर खड़ा हो जाता है ॥७०॥ जो मृतिमान् अहंकारके समान है, दुर्जेय है और सेनासे घिर जानेके कारण जल्दी जल्दी छलांग मारता हुआ इधर-उधर दौड़ रहा है ऐसा यह मृग सेनाका क्षोभ बढ़ा रहा है ।। ७१।।
श्लोक 72 से 81 : वन्य जीव और वन की शोभा
हे देव, यह खरगोश दौड़ रहा है, यद्यपि सैनिकोंने इसका पीछा नहीं किया है तथापि यह डरपोंक होनेसे इधर-उधर दौड़कर शरण ढूंढनेके लिये आपकी सेनाके बीच में ही कहीं छिप जाता है ।॥ ७२॥ जिसने अपने शरीरकी कान्तिसे वनको भी काला कर दिया है ऐसा यह कृष्णसार जातिका मृग सूखे हुए वृक्षके समान अनेक शाखाओंवाले सींगोंके भारसे धीरे धीरे जा रहा है ॥७३॥ देखिये, दाहिनी ओर घाव लगनेसे जो चारों ओर चक्कर लगा रहा है ऐसा यह हरिणोंका समूह मानो आपसे यही कह रहा है कि आपको सब जीवोंका पालन करना योग्य है ।॥ ७४।। जो अपनी पूंछके द्वारा बनलक्ष्मी के केशपाशकी शोभा को बढ़ा रहा है ऐसा यह मयूर पूंछके भारसे धीरे धीरे जा रहा है ।।७५।। इधर इस वनस्थलमें यह मयूरोंका समूह ऐसा सुशोभित हो रहा है मानो अपनी पूंछ परके चन्द्रकोंसे वनकी पृथिवी रूपी स्त्रीके नेत्रोंके समूह की शोभा ही बढ़ा रहा हो ॥७६॥ इधर देखिये, चलते हुए रथके पहिये के शब्दको बार बार सुनता हुआ यह हरिणोंका समूह मार्ग से एक ओर नहीं हट रहा है ॥७७॥ ये स्त्रियां हरिणियोंके नेत्रोंमें अपने नेत्रोंकी शोभा बड़े कौतूहलके साथ देख रही हैं और हरिणोंकी पूंछोंमें अपने केशोंकी शोभा निहार रही हैं ॥७८॥ जिसमें ह्रिण पक्षी आदि सभी जीव एक दूसरेको बाधा किये बिना ही निवास कर रहे हैं ऐसा यह वन यद्यपि सैनिकोंके द्वारा व्याकुल किया गया है तथापि आकुलतासे रहित ही प्रतीत हो रहा है ।॥७९॥ हे देव, जो बड़े बड़े वृक्षोंकी घनी छायासे सदा सहित रहता है ऐसे इस वनमें रहनेवाले हम लोगोंको यह तीव्र घाम कुछ भी बाधा नहीं कर रहा है ॥८०॥ ये घनी छाया वाले वनके मनोहर वृक्ष ऐसे जान पड़ते हैं मानो वनलक्ष्मीने आपकी भक्ति (सेवा) करनेके लिये मण्डप ही लगा रक्खे हों ।॥८१॥ किनारे परके वृक्षोंसे जिनकी सब गर्मी दूर कर दी गई है ऐसे स्वच्छ जलसे भरे हुए ये छोटे छोटे तालाब ऐसे मालूम होते हैं मानो वन-लक्ष्मीने क्लेश दूर करनेवाली प्याऊ ही स्थापित की हों ।॥८२॥
श्लोक 82 से 91 : वन की शोभा और सेना की तुलना
हे प्रभो, यह वन आपकी सेना के समान जान पड़ता है क्योंकि जिस प्रकार आपकी सेना बहुतसे बाणासन अर्थात् धनुषोंसे व्याप्त है उसी प्रकार यह वन भी बाण और असन जातिके वृक्षोंसे व्याप्त है, जिस प्रकार आप की सेना खड्गी अर्थात् तलवार धारण करनेवाले सैनिकोंसे भरी हुई है उसी प्रकार यह वन भी खड्गी अर्थात् गैंडा हाथियोंसे भरा हुआ है, जिस प्रकार आपकी सेना हाथियोंके समूहसे सहित है उसी प्रकार यह वन भी हाथियोंके समूहसे सहित है और जिस प्रकार आपकी सेनाका अन्त नहीं दिखाई देता उसी प्रकार इस बनका भी अन्त नहीं दिखाई देता ॥८३॥ इस प्रकार सारथिके वनकी समृद्धिका वर्णन करते रहनेपर सम्राट् भरत उस वनभूमिको इस तरह पार कर गये कि उन्हें उसकी लम्बाईका पता भी नहीं चला ।।८४।। उस समय घोड़ोंके समूहके खुरों के आधातसे उठी हुई वनकी धूलि समस्त दिशाओंमें व्याप्त होकर परदेकी शोभा धारण कर रही थी ।॥८५॥ घुड़सवारोंके कवच, यद्यपि ऊपरसे सफेद वस्त्रोंसे ढके हुए थे तथापि वनकी धूलिसे व्याप्त होनेके कारण ऐसे मालूम पड़ते थे मानो कषाय रंगसे रंगे हुए ही हों ॥८६॥ मार्गके परिश्रमसे अलसाती हुई स्त्रियां वनकी धूलि लगनेसे भारी हुए स्तन ढंकनेवाले वस्त्रों को बड़ी कठिनाईसे धारण कर रही थीं ।॥८७॥ गेरू रंगकी भूमिसे उठी हुई मार्गकी धूलि हाथियोंके गण्डस्थलों में लग कर सिन्दूरकी शोभा धारण कर रही थी ।।८८ ।। तदनन्तर मध्याह्न का समय निकट आनेपर सूर्य अत्यन्त देदीप्यमान होने लगा। उस समय वह सूर्य किसी विजि-गीषु राजाके समान जान पड़ता था क्योंकि जिस प्रकार विजिगीषु राजा प्रताप (प्रभाव) धारण करता है उसी प्रकार सूर्य भी प्रताप (प्रकृष्ट गर्मी) धारण कर रहा था और जिस प्रकार विजिगीषु राजाका मण्डल (स्वदेश) शुद्ध अर्थात् आन्तरिक उपद्रवोंसे रहित होता है उसी प्रकार सूर्यका मण्डल (विम्ब) भी मेघ आदिका आवरण न होनेसे अत्यन्त शुद्ध (निर्मल) था ।।८९।। शरद् ऋतुके घामके संतापसे जिनके पंखोंकी शोभा संकुचित हो गई है ऐसे पक्षी सरोवरोंके किनारेके वृक्षोंकी छायाका आश्रय लेने लगे ॥९०॥ जो मध्याह्नकी गर्मी सहन करनेमें असमर्थ हैं और इसीलिये जो कमलोंके समूहमें आकर इकट्ठे हुए हैं ऐसे अपने बच्चोंको हंस पक्षी अपने पंखोंसे ढंकने लगे ।। ९१।।
श्लोक 92 से 101 : मध्याह्न की गर्मी और प्रकृति
मद का प्रवाह गर्म हो जाने से जिन्हें भूमरों के समूह ने छोड़ दिया है ऐसे जंगली हाथी अवगाहन करने के लिये सरोवरों की ओर जाने लगे ॥९२॥ सूर्यकी किरणोंसे पीड़ित हुए हाथी वृक्षोंकी डालियां तोड़ तोड़कर अपने ऊपर छाया करते हुए जा रहे थे और उनसे ऐसे मालूम होते थे मानो शाखाओंका उद्धार ही कर रहे हों ॥९३॥ उस समय जंगली शूकरोंका समूह कीचड़ सहित छोटे छोटे तालाबोंमें प्रवेश कर परस्पर एक दूसरेके ऊपर इकट्ठे हो शयन कर रहे थे ।।९४।। अपने शरीरको मृणालके तन्तुओंसे लपेट-कर बैठे हुए हंस ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो अपनी रक्षा करनेके लिये चन्द्रमाकी किरणोंसे बने हुए पिंजड़ेमें ही घुस गये हों ।॥९५।। जो उष्णता सहन करनेमें असमर्थ है ऐसे किसी तरुण चकवाने अपने सर्व शरीरमें लगे हुए, मोटे मोटे तथा विस्तृत शेवालको धारण कर रक्खा था और उससे वह ऐसा मालूम होता था मानो नीले रंगका कुरता ही धारण कर रहा हो ।।९६।। जिसने कमलिनियों के वनमें सफेद कमलरूप छत्रसे छाया बना ली है ऐसा राजहंस उस मध्याह्न के समय अपनी हंसियोंके साथ जलमें गोते लगा रहा था ।।९७।। जिन्होंने मुणालके टुकड़ोंका आहार किया है और मृणालके तन्तुओंसे ही जिनका शरीर ढका हुआ है ऐसे हंसोंके बच्चे कमलिनी के पत्ररूपी शय्या पर सो रहे थे ॥ ९८।। इस प्रकार शरऋतुका घाम तीव्र संताप फैला रहा था और उससे तपे हुए नदियोंके किनारोंपर हंसोंको संतोष नहीं हो रहा था ।। ९९।। उस समय सूर्य यद्यपि मध्यस्थ था, आकाशके बीचोंबीच स्थित था, पक्षपात रहित था तथापि वह पृथित्रीको बहुत ही संतप्त कर रहा था सो ठीक ही है क्योंकि तीव्र प्रतापी पदार्थोंका मध्यस्थ रहना भी संताप करनेवाला होता है ।। १००।। जिस प्रकार कमलिनियां (कमलकी लताएं) जलकी बूंदोंसे सुशोभित कमलोंको धारण करती हैं उसी प्रकार महाराज भरतकी स्त्रियां पसीनेकी बूंदोंसे जिनपर मोतियोंका जाल-सा बन रहा है ऐसे अपने मुख धारण कर रही थीं ॥१०१।।
श्लोक 102 से 111 : रानियों और सेना की स्थिति
रानियोंके मुख-कमलोंपर जो पसीनेकी बूंदें उठी हुई थीं वे निकलते हुए सौन्दर्य रूपी रसके प्रवाहके समान शोभाको पुष्ट कर रही थीं ।॥१०२॥ जिनसे पसीनेकी बूंदें टपक रही हैं ऐसे रानियोंके मुख ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो ओंसकी बूंदोंसे व्याप्त हुए कमल ही हों ।॥१०३।। जिन पसीनेकी बूंदोंसे रानियोंके मुख-कमल सुशोभित हो रहे थे वे ऐसी जान पड़ती थीं मानो केशपाशको अलंकृत करनेवाले मोती ही पिघल पिघलकर तरल रूप हो गये हों ॥१०४।। उस समय सूर्य बड़ी तेजीके साथ तप रहा था इसलिये जो घोड़े रथोंको ले जा रहे थे उनके मुख परिश्रमसे खुल गये थे, उनमें फेन निकल आया था और उनके खुर समान जमीनपर भी स्खलित होने लगे थे ॥ १०५॥ जिनके खुर छोटे और गोल हैं, जिनपर छोटे और चिकने रोम हैं, जो बहुत ऊंचे हैं, जिनका आसन अर्थात् पीठ बहुत बड़ी है, और जिनका वेग वायुके समान है ऐसे बड़े बड़े उत्तम घोड़े भी जल्दी जल्दी दौड़े जा रहे थे ।।१०६॥ जो तीव्र वेगसे सहित हैं, जो अपने आगेके खुरोंको मुखसे उगलते हुए के समान जान पड़ते हैं, जिनका वक्षःस्थल बड़ा है और जिनकी नाकके नथने कुछ कुछ हिल रहे हैं ऐसे बड़े बड़े घोड़े जल्दी जल्दी जा रहे थे ।।१०७।। जिनके आगेका भाग बहुत ऊंचा है, जिनके शरीरपरके भंवर अत्यन्त शुद्ध हैं, और जिनका वेग मनके समान है ऐसे घोड़े उस छोटेसे मार्गमें बड़ी शीघ्रताके साथ जा रहे थे ॥ १०८॥ जो बुद्धि-बल और वेगसे सहित हैं, विनयवान् हैं तथा सुन्दर गमनके धारक हैं ऐसे घोड़े पृथिवीको (रजस्वला अर्थात् धूलिसे युक्त पक्षमें रजोधर्मसे युक्त समझ) उसके स्पर्श करनेमें घृणा करते हुए ही मानो बड़े वेगसे जा रहे थे ।।१०९॥ पैदल चलनेवाले सैनिक जूता पहने हुए पैरोंसे डूंठ, कांटे तथा पत्थर आदिको लांघते हुए घोड़े और रथोंसे भी जल्दी जा रहे थे ।।११०।। शक्ति नामके हथियारको धारण करनेवाले लट्ठ धारण करनेवालों के साथ, भाला धारण करनेवाले धनुष धारण करनेवालोंके साथ और तलवार धारण करने-वाले लोग परस्पर एक दूसरेके साथ स्पर्धा करते हुए ही मानो बड़ी शीघ्रताके साथ जा रहे थे ॥१११।।
श्लोक 112 से 121 : सेना का उत्साह और मार्ग की अव्यवस्था
आगे आगे दौड़नेसे जिनके कवचके अग्र भाग कुछ कुछ हिल रहे हैं ऐसे योद्धा लोग इतनी जल्दी जा रहे थे मानो पंख उत्पन्न होनेसे वे उड़े ही जा रहे हों ।। ११२॥ चलो, दौड़ो, हटो, आगेका मार्ग मत रोको इस प्रकार जोर जोरसे बोलनेवाले योद्धा लोग अपने सामनेके लोगोंको हटा रहे थे ।।११३।। अरे, इन घोड़ोंके समूहसे एक ओर हटो, इन हाथियोंके समूहसे भागो, और बिचले हुए इन रथोंसे भी दूर भाग जाओ ।॥११४॥ अरे, इन बच्चोंको लोगोंकी इस भीड़से उठाओ और इन हाथियोंके आगेसे घोड़ोंको भी शीघ्र हटाओ ।।११५॥ इधर यह दुष्ट हाथी रास्ता रोककर खड़ा हुआ है और इधर यह रथ सारथिकी गलतीसे मार्ग के बीचमें ही उलट गया है ।। ११६।। इधर देखो, जिसने अपना भार पटक दिया है, जिसके लंबे ओठ हैं और जो बहुत घबड़ा गया है ऐसा यह ऊंट मार्गमें इस प्रकार उल्टा दौड़ा जा रहा है मानो लोगोंकी विडम्बना ही करना चाहता हो ।। ११७।। इधर इस ऊँची जमीनपर घबड़ाये हुए खच्चरपरसे गिरती हुई अन्तःपुरकी स्त्रीको कोई कंचुकी बीच में ही धारण कर रहा है परन्तु ऐसा करता हुआ वह स्वयं गिर रहा है ।।११८।। यह तरुण पुरुष वेश्याका मुख देखनेसे आश्चर्य-चकित होता हुआ घोड़ेके धक्केसे गिर गया है, परन्तु वह मूर्ख ‘में’ गिर र गया गया हूं हूं इस इस तरह अव भी अपने आपको नहीं जान रहा है ॥ ११९ ॥ जिसने अपने बाल खिजाबसे काले कर लिये हैं, जिसकी आंखोंमें काजल लगा हुआ है और जो किंसी कुट्टिनीके पीछे पीछे जा रहा है ऐसा यह बुढा ठोक तरुण पुरुषके समान आचरण कर रहा है ।। १२०।। इस प्रकार चलते समयकी बात- चीतसे जिन्हें मार्गका परिश्रम भी मालूम नहीं हुआ है ऐसे सैनिक लोग सेनापतिके द्वारा पहले से ही तैयार किये हुए शिबिर अर्थात् ठहरनेके स्थानपर जा पहुंचे ॥ १२१ ॥
श्लोक 122 से 131 : शिबिर की ओर प्रस्थान
तदनन्तर जब मध्याह्नका सूर्य अन्तःपुरकी स्त्रियोंके मुखकी कान्तिको मलिन कर रहा था तब सम्राट् भरत शिबिरके समीप पहुंचे ॥ १२२॥ जिनपर छत्ररत्नके द्वारा छाया की जा रही है और जो देवनिर्मित सुन्दर रथपर बैठे हुए हैं ऐसे महाराज भरतको उस दोपहरके समय भी गर्मीका कुछ भी दुःख मालूम नहीं हुआ था ।।१२३।। जिन्होंने समीपमें चलनेवाले वृद्ध जनोंके साथ साथ अनेक प्रकारकी कथाएं प्रारम्भ की हैं ऐसे भरतेश्वरको बीते हुए मार्गका भी पता नहीं चला था ।। १२४।। दिव्य सामर्थ्य होनेके कारण रथके पहियोंकी चालसे उनके शरीरमें कुछ भी उद्घात (दचका) नहीं लगा था और न रथका तीव्र वेग होनेपर भी उनके शरीरमें कुछ क्लेश हुआ था ।।१२५।। रथके वेगसे उत्पन्न हुए वायुसे ऊपरकी ओर फहराता हुआ उनकी ध्वजा का लम्बा वस्त्र ऐसा जान पड़ता था मानो पीछे आनेवाली सेनाके लिये मार्ग ही सूचित कर रहा हो ।॥१२६।। रथकी उद्धत गतिके क्षोभसे जिनके अंग अंगमें पीड़ा उत्पन्न हो रही है ऐसे रथ पर सवार हुए अन्य राजा लोग बड़ी कठिनाईसे महाराज भरतके रथके समीप पहुंच सके थे ।।१२७।। जो घुड़सवार लोग महाराज भरतके साथ ही शिबिरमें प्रवेश करना चाहते थे उन्होंने बचे हुए मार्गको अपने उन्हीं चलते हुए श्रेष्ठ घोड़ोंसे बड़ी शीघ्रताके साथ तय किया था ॥१२८॥ जो राजभवनोंकी शोभाकी ओर भी हँस रहे हैं ऐसे शिबिरके चारों ओर खड़े किये हुए रावडी तम्बू आदि डेराओंको महाराज भरतने दूरसे ही देखा ।। १२९।। उन्होंने चांदीके खंभोंपर खड़े किये हुए बहुत बड़े बड़े कपड़ेके उन मण्डपोंको भी देखा था जो कि सज्जन पुरुषों के समान लोगोंका संताप दूर कर रहे थे ।।१३०।। क्या ये स्थलकमल हैं अथवा हंसोंके समूह हैं इस प्रकार आशंका कर लोग दूरसे ही उन तम्बुओंके अग्रभागोंको देख रहे थे ।।१३१।।
श्लोक 132 से 141 : शिबिर और बाजार की शोभा
सामन्त लोगोंकी ठहरनेकी जगहपर अनेक प्रकारकी रचना कर जो तम्बू वगैरह बनाये गये थे उन्हें भी महाराज भरतने सामनेसे देखा था ।।१३२।। तम्बुओंके चारों ओर जो कटीली बाड़ियां बनाई गई थीं उन्हें देखकर महाराज भरतने अपने निष्कण्टक राज्यमें ये ही कांटे हैं ऐसा माना था। भावार्थ-भरतके राज्यमें बाड़ी के कांटे छोड़कर और कोई कांटे अर्थात् शत्रु नहीं थे ।।१३३।। जहांपर वृक्षोंकी डालियोंके अग्र भागपर घोड़ोंके पलान आदि अनेक वस्तुएं टंगी हुई हैं और जो शिबिरके बाहिर बने हुए हैं ऐसे कितने ही डेरे महाराज भरतने देखे ॥१३४।। इस प्रकार शिबिरके बाहर बनी हुई अनेक प्रकारकी विशेष वस्तुओंको देखते हुए महाराज शिबिरमें प्रवेश करनेके लिये उसके बड़े दरवाजेपर जा पहुंचे ॥१३५॥ बड़े दरवाजेको उल्लंघन कर सैनिकों के साथ कुछ दूर और गये तथा जिसमें समुद्रके समान गंभीर शब्द हो रहे हैं ऐसे बाजारमें वे जा पहुंचे ।।१३६।। जिसकी बहुत अच्छी सजावट की गई है जिसमें तोरण बंधे हुए हैं, अनेक प्रकारकी ध्वजाएं फहरा रही हैं और व्यापारी लोग जिसमें रत्नों का अर्थ लेकर खड़े हैं ऐसे उस वाजार में महाराजने प्रवेश किया ।।१३७।। वहांपर प्रत्येक दुकानपर निधियोंके समान रत्नोंकी राशि देखते हुए महाराज भरतने माना था कि निधियों की संख्या प्रसिद्धि मात्रसे ही निश्चित की गई है। भावार्थ प्रत्येक दूकानपर रत्नोंकी राशियां देखकर उन्होंने इस बातका निश्चय किया था कि निधियोंकी संख्या नौ है यह प्रसिद्धि मात्र है, वास्तवमें वे असंख्यात हैं ।॥ १३८ ॥ जो मोतियोंसे सहित है, जिसमें अनेक रत्न देदीप्यमान हो रहे हैं और जो मनुष्योंके समूहरूपी लहरोंसे व्याप्त हो रहा है ऐसे उस बाजाररूपी समुद्र को रथोंने जहाजके समान पार किया था ।।१३९॥ उस समय वह राजमार्ग चलते हुए घोड़ों के समुदायरूपी लहोंसे, चमकती हुई तलवाररूपी मछलियोंसे और बड़े बड़े हाथीरूपी मगरों से ठीक समुद्रकी शोभा धारण कर रहा था ।।१४०।। उस समय वह बाजारका रास्ता महाराज के तम्बू तक चारों ओरसे अनेक राजकुमारोंसे भरा हुआ था इसलिये वास्तवमें राजमार्ग हो रहा था ।।१४१।।
श्लोक 142 से 152 : शिबिर का वैभव और भरत की आराधना
तदनन्तर जिसके समीप ही रत्नोंके देदीप्यमान तोरण लग रहे हैं, घेरकर रक्खे हुए रथोंके समूहसे जिसकी बाहरकी शोभा बढ़ रही है-जो घोड़ोंके समूहसे भरा हुआ है, हाथियों के समूहसे जिसके भीतर जाना कठिन है, जो हाथियोंकी बड़ी भारी सेनासे सुशोभित है, हाथियोंके बच्चे और हथिनियोंसे भी भरा हुआ है। अनेक छत्रोंके समूहकी छाया होनेसे जो कहींपर किसी बड़े भारी बगीचाके समान जान पड़ता है और कहीं अनेक राजाओंकी मण्डलीसे युक्त होनेके कारण सभामण्डपके समान मालूम होता है, जो प्रवेश करते हुए और बाहर निकलते हुए अनेक कर्मचारियोंसे लहरोंसे शब्द करते हुए किसी महासागरके किनारेके समान जान पड़ता है। जहांपर बड़े बड़े द्वारपाल लोग मनुष्योंकी भीड़को दूर हटानेमें लगे हुए हैं, जहां अनेक प्रकारके मंगलमय शब्द हो रहे हैं और इसीलिये जो ऐसा जान पड़ता है मानो सरस्वती देवीने ही उसमें अपना निवास कर रखा हो तथा जो चिरकालसे अनुभूत होनेपर भी अपनी अनोखी शोभासे अपूर्वके समान मालूम हो रहा है ऐसे राजभवनके आंगनको देखते हुए महाराज भरत भी कुछ कुछ आश्चर्यचकित हो गये थे ।। १४२-१४७।। जिसके चारों ओर निधियां रक्खी हुई हैं और बीचमें अनेक प्रकारके रत्न रखे हुए हैं ऐसे उस बड़े भारी शिबिर की विशेषताका कौन वर्णन कर सकता है ।॥१४८।। इस प्रकार लक्ष्मीके निवासस्थानके समान सुशोभित अपने शिबिरको चारों ओरसे देखते हुए जो अत्यन्त संतुष्ट हो रहे हैं ऐसे लक्ष्मीपति श्रीमान् भरतने, चारों ओर दौड़ते हुए द्वारपालोंके द्वारा जिसमें मनष्योंकी भीड़ का उपद्रव दूर किया जा रहा है, जिसपर अनेक पताकाएं फहरा रही हैं, और जिसमें अनेक प्रकारकी रचना की गई है ऐसे अपने तम्बमें शीघ्र ही प्रवेश किया ।।१४९।। जिसमें मंगल-द्रव्य रखे हुए हैं, गङ्गा नदीकी लहरोंसे उत्पन्न हुए तथा संतापको दूर करनेवाली जलकी बूंदोंको बरसाते हुए वायुसे जिसके आंगनकी वेदी साफ की गई है, जो प्रशंसनीय है, विस्तृत है तथा स्थपति (शिलावट) रत्नके द्वारा बहुत शीघ्र खड़ा किया गया है, बनाया गया है ऐसे तंबूमें पूर्व दिशाको जीतनेवाले, निधियोंके स्वामी श्रीमान् भरतने सुखपूर्वक निवास किया ॥१५०।। जिस समय राजाओंके तम्बुओंमें मनुष्योंकी भीड़का क्षोभ शान्त हो गया था, घोड़ों के समूह जल पीकर कपड़े के बने हुए मण्डपोंमें अपने इच्छानुसार घास खाने लगे थे, और हाथियों के समूह गङ्गा नदी के किनारे के सरोवरोंमें अवगाहन कराकर स्नान कराकर-वनोंमें बांध दिये गये थे उस समय विजयी महाराज भरतकी वह सेना ऐसी जान पड़ती थी मानो चिर कालसे ही वहां रह रहो हो ।। १५१।। जिस प्रकार श्रेष्ठ महिमाको धारण करनेवाले तथा समवसरण सभामें विराजमान जिनेन्द्रदेवकी देव लोग आराधना करते हैं उसी प्रकार श्रेष्ठ वैभवको धारण करनेवाले तथा उस मण्डपमें बैठे हुए महाराज भरतको पूर्वदिशाके राजाओंने अपनी कुल-परम्परासे आया हुआ धन भेंटमें देकर, कन्याएं प्रदान कर तथा और भी अनेक योग्य वस्तुएं देकर उनकी आराधना-सेवा की थी। इसी प्रकार उनकी सेनाके द्वारा रोके हुए अन्य कितने ही राजाओंने अहंकार छोड़कर दूरसे ही मस्तक झुकाकर चक्रवर्तीके लिये प्रणाम किया था ।।१५२॥
इस प्रकार भगवज्जिनसेनाचार्य-प्रणीत त्रिषष्टिलक्षण श्रीमहापुराणसंग्रहके भाषानुवादमें भरतराजका राजाओंकी विजयके लिये प्रयाण करना इस बातका वर्णन करनेवाला सत्ताईसवां पर्व समाप्त हुआ ।
हिन्दी-भाषानुवाद
आदिपुराण सारांश
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आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena
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