आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51
श्लोक 52 से 61 हारों के प्रकार
आभूषणों के प्रकारों का विस्तृत वर्णन। हार के भेद जैसे इंद्रच्छंद (1008 लड़ियाँ), विजयच्छंद (504 लड़ियाँ), नक्षत्रमाला (27 लड़ियाँ) आदि का उल्लेख। ये आभूषण पुत्रों की शोभा बढ़ाते थे।
English translation of Ādi purāṇa parv 16 – Shlok 52 to 61
श्लोक ( Shlok ) 52
यष्टिः शीर्षकसंज्ञा स्यात् मध्यैकस्थूलमौक्तिका । मध्यैस्त्रिभिः क्रमस्थूलैः मौक्तिकैरुपशीर्षकम् ॥५२॥
जिसके बीच में एक बड़ा स्थूल मोती हो उसे शीर्षक यष्टि कहते हैं और जिसके बीच में क्रम-क्रम से बढ़ते हुए तीन मोती हों उसे उपशीर्षक कहते हैं ।।52।।
The Yaṣṭi, which has one large prominent pearl in the center, is called Śīrṣaka Yaṣṭi. The one that has three pearls gradually increasing in size is known as Upaśīrṣaka. ||52||
श्लोक ( Shlok ) 53
प्रकाण्डकं क्रमस्थूलैः पञ्चभिर्मध्यमौक्तिकैः । मध्यादनुक्रमाद्धीनैः मौक्ति कैरवघाटकम् ॥५३॥
जिसके बीच में क्रम-क्रम से बढ़ते हुए पाँच मोती लगे हों उसे प्रकांडक कहते हैं, जिसके बीच में एक बड़ा मणि हो और उसके दोनों ओर क्रम-क्रम से घटते हुए छोटे-छोटे मोती लगे हों उसे अवघाटक कहते हैं ।।53।।
The Yaṣṭi, which has five pearls gradually increasing in size in the center, is called Prakāṇḍaka. The one that has a large gemstone in the center, with gradually decreasing smaller pearls on both sides, is known as Avaghāṭaka. ||53||
श्लोक ( Shlok ) 54
तरलप्रतिबन्धः स्यात् सर्वत्र सममौक्तिकैः । तथैव मणियुक्तानामुह्या भेदास्त्रिधात्मनाम् ॥५४॥
और जिसमें सब जगह एक समान मोती लगे हों उसे तरलप्रतिबंध कहते हैं । ऊपर जो एकावली, रत्नावली और अपवर्तिका ये मणियुक्त यष्टियों के तीन भेद कहे हैं उनके भी ऊपर लिखे अनुसार प्रत्येक के शीर्षक, उपशीर्षक आदि पाँच-पाँच भेद समझ लेना चाहिए ।।54।।
The Yaṣṭi, in which pearls of uniform size are strung throughout, is called TaralapratiBandha. The previously mentioned Ekaavali, Ratnaavali, and Apavartika, which are types of gem-adorned Yaṣṭis, also have five subcategories each, namely Śīrṣaka, Upashīrṣaka, Avaghāṭaka, Prakāṇḍaka, and TaralapratiBandha, as described earlier. ||54||
श्लोक ( Shlok ) 55
हारो यष्टिकलापः स्यात् स चैकादशधा मतः । इन्द्रच्छन्दादिभेदेन यष्टिसंख्याविशेषतः ॥५५॥
यष्टि अर्थात् लड़ियों के समूह को हार कहते हैं वह हार लड़ियों की संख्या के न्यूनाधिक होने से इंद्रच्छंद आदि के भेद से ग्यारह प्रकार का होता है ।।55।।
The Yaṣṭi, meaning a collection of strands, is called a Hāra (necklace). This Hāra is classified into eleven types, including Indrachhanda, based on the variation in the number of strands. ||55||
श्लोक ( Shlok ) 56
यष्टयोऽष्ट सहस्रं तु यत्रेन्द्रच्छन्दसंज्ञकः । स हारः परमोदारः शक्रचक्रजिनेशिनाम् ॥५६॥
जिसमें एक हजार आठ लड़ियाँ हों उसे इंद्रच्छंद हार कहते हैं । वह हार सबसे उत्कृष्ट होता है और इंद्र चक्रवर्ती तथा जिनेंद्रदेव के पहनने के योग्य होता है ।।56।।
The Hāra (necklace) that consists of 1,008 strands is called Indrachchhanda Hāra. This necklace is considered the most superior and is worthy of being worn by an Indra Chakravarti (Universal Emperor) and Jinendra Deva (Tirthankara). ||56||
श्लोक ( Shlok ) 57
तदर्द्धप्रमित्तो यस्तु विजयच्छन्दसंज्ञकः । सोऽर्द्धचक्रधरर्कोयो हारोऽन्येषु च केषुचित् ॥५७॥
जिसमें इंद्रच्छंद हार से आधी अर्थात् पाँच सौ चार लड़ियाँ हों उसे विजयच्छंद हार कहते हैं । यह हार अर्धचक्रवर्ती तथा बलभद्र आदि अन्य पुरुषों के पहनने योग्य कहा गया है ।।57।।
The Hāra (necklace) that consists of 504 strands, which is half the number of strands in the Indrachchhanda Hāra, is called Vijayachchhanda Hāra. This necklace is considered suitable for being worn by Ardhachakravarti (semi-emperors), Balabhadra, and other distinguished men. ||57||
श्लोक ( Shlok ) 58
शतमष्टोत्तरं यत्र यष्टीनां हार एव सः। एकाशीत्या भवेद् देवच्छन्दो मौक्तिकयष्टिभिः ॥५८॥
जिसमें एक सौ आठ लड़ियाँ हो उसे हार कहते हैं और जिसमें मोतियों की इक्यासी लड़ियाँ हो उसे देवच्छंद कहते हैं ।।58।।
The necklace that consists of 108 strands is itself called a Hāra. The one that has 81 strands and is made of pearl strands is known as Devachchhanda Hāra. ||58||
श्लोक ( Shlok ) 59
चतुःषष्टयार्धहारः स्याच्चतुः पञ्चाशता पुनः । भवेद् रश्मिकलापाख्यो गुच्छो द्वात्रिंशता मतः ॥५९॥
जिसमें चौंसठ लड़ियाँ हों उसे अर्धहार, जिसमें चौवन लड़ियाँ हों उसे रश्मिकलाप और जिसमें बत्तीस लड़ियों हों उसे गुच्छ कहते हैं ।।59।।
The necklace with sixty-four strands is called Ardha-Hāra, the one with fifty-four strands is known as Rashmikalāpa, and the one with thirty-two strands is called Guccha. ||59||
श्लोक ( Shlok ) 60
यष्टीनां सप्तविंशत्या भवेन्नक्षत्रमालिका । शोभां नक्षत्रमालाया या हसन्ती स्वमोक्तिकैः ॥६०॥
जिसमें सत्ताईस लड़ियाँ हों उसे नक्षत्रमाला कहते हैं । यह हार अपने मोतियों से अश्विनी भरणी आदि नक्षत्रों की माला की शोभा की हँसी करता हुआ-सा जान पड़ता है ।।60।।
he necklace with twenty-seven strands is called Nakshatra-Mālā. This necklace, with its pearls, seems to mock the beauty of the garland of constellations like Ashwini, Bharani, etc. ||60||
श्लोक ( Shlok ) 61
चतुर्विशत्यार्द्धगुच्छो विंशत्या माणवाह्वयः । भवेन्मौक्तिकयष्टीनां तदर्द्धेनार्द्धमाणवः ॥६१॥
मोतियों की चौबीस लड़ियों के हार को अर्धगुच्छ, बीस लड़ियों के हार को माणव और दश लड़ियों के हार को अर्धमाणव कहते हैं ।।61।।
The necklace with twenty-four strands is called Ardha-Guccha, the one with twenty strands is called Māṇava, and the one with ten strands is called Ardha-Māṇava. ||61||
श्लोक 62 से 71
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51