आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31
श्लोक 32 से 41 ऐरावत हाथी का वर्णन
ऐरावत का शरीर विशाल और बलवान था। उसके अनेक मुख, दाँत, और सूँडें थीं। वह शक्तिशाली और शूरवीर था। उसकी सूँड लंबी और चिकनी थी। उसका वक्ष चौड़ा और कान मनोहर थे। नख अर्धचंद्राकार थे। वह पर्वत के समान ऊँचा था। उसका शब्द गंभीर और सुगंधित था। वह सात प्रतिष्ठाओं से युक्त था। भ्रमर उसकी सेवा करते थे।
English translation of Ādi purāṇa parv 22 – Shlok 32 to 41
श्लोक ( Shlok ) 32 – 41
इन्द्रस्तम्बेरमः कीदृगिति चेत् सोऽनुवर्ण्यते । तुङ्गवंशो महावर्ष्मा सुवृतोन्नतमस्तकः ॥३२॥
बह्वाननो बहुरदो बहुदोर्विपुलासनः । “लक्षणैव्यञ्जनैर्युक्तः सात्विको जवनो बली ॥३३॥
कामगः कामरूपी च शूरः सदवृतकन्धरः l समसंबन्धनो धुर्यो मधुस्निग्धरदेक्षणः ll34ll
“तिर्थ ग्लोलायत स्थूल समवृत्तर्जुसत्करः । स्निग्धाताम्रपृथुस्त्रोतो दीर्घाङ्गुलिसपुष्करः ॥३५॥
वृत्तगात्रापरः स्थेयान् दीर्घमेह नबालधिः । व्यूढोरस्को महाध्यानकर्णः सत्कर्णपल्लवः ॥३६॥
अर्धेन्दुनिभसुश्लिष्ट विद्रुमाभनखोत्करः । सच्छायस्ताम्रताल्वास्यः शैलोदग्रो महाकटः ॥३७॥
वराहजघनः श्रीमान् दीर्घोष्टो दुन्दुभिस्वनः। सुगन्धिदीर्घनिःश्वासः सोऽमितायुः कृशोदरः ॥३८॥
अन्वर्थवेदी कल्याणः कल्याणप्रकृतिः शुभः। अयोनिजः सुजातश्च सप्तधा सुप्रतिष्ठितः ॥३९॥
मदनिर्झरसंसिक्त कर्ण चामर लम्बिनीः । मदस्त्रुतीरिवाबिभ्रदपराः षट्पदावली ॥४०॥
मुखैर्बहुभिराकीर्णों गजराजः स्म राजते । सेव्यमान इवायातैर्भक्त्या विश्वैरनेकपैः ॥४१॥
अब इंद्र के ऐरावत हाथी का भी वर्णन करते हैं―उसका वंश अर्थात् पीठ पर की हड्डी बहुत ऊँची थी, उसका शरीर बहुत बड़ा था, मस्तक अतिशय गोल और ऊँचा था । उसके अनेक मुख थे, अनेक दाँत थे, अनेक सूंड़े थीं, उसका आसन बहुत बड़ा था, वह अनेक लक्षण और व्यंजनों से सहित था, शक्तिशाली था, शीघ्र गमन करने वाला था, बलवान् था, वह इच्छानुसार चाहे जहाँ गमन कर सकता था, इच्छानुसार चाहे जैसा रूप बना सकता था, अतिशय शूरवीर था । उसके कंधे अतिशय गोल थे, वह सम अर्थात् समचतुरस्र संस्थान का धारी था, उसके शरीर के बंधन उत्तम थे, वह धुरंधर था, उसके दाँत और नेत्र मनोहर तथा चिकने थे । उसकी उत्तम सूँड नीचे की ओर तिरछी लटकती हुई चंचल, लंबी, मोटी तथा अनुक्रम से पतली होती हुई गोल और सीधी थी; पुष्कर अर्थात् सूंड का अग्रभाग चिकना और लाल था, उसमें बड़े-बड़े छेद थे और बड़ी-बड़ी अंगुलियों के समान चिह्न थे । उसके शरीर का पिछला हिस्सा गोल था, वह हाथी अतिशय गंभीर और स्थिर था, उसकी पूँछ और लिंग दोनों ही बड़े थे, उसका वक्षःस्थल बहुत ही चौड़ा और मजबूत था, उसके कान बड़ा भारी शब्द कर रहे थे, उसके कानरूपी पल्लव बहुत ही मनोहर थे । उसके नखों का समूह अर्ध चंद्रमा के आकार का था, अंगुलियों में खूब जड़ा हुआ था और मूंगा के समान कुछ-कुछ लाल वर्ण का था, उसकी कांति उत्तम थी । उसका मुख और तालु दोनों ही लाल थे, वह पर्वत के समान ऊँचा था, उसके गंडस्थल भी बहुत बड़े थे । उसके जघन सुअर के समान थे, वह अतिशय लक्ष्मीमान् था, उसके ओठ बड़े-बड़े थे, उसका शब्द दुंदुभी शब्द के समान था, उच्छवास सुगंधित तथा दीर्घ था, उसकी आयु अपरिमित थी और उसका सभी कोई आदर करता था । वह सार्थक शब्दार्थ का जानने वाला था, स्वयं मंगलरूप था, उसका स्वभाव भी मंगलरूप था, वह शुभ था, बिना योनि के उत्पन्न हुआ था, उसकी जाति उत्तम थी अथवा उसका जन्म सबसे उत्तम था, वह पराक्रम, तेज, बल, शूरता, शक्ति, संहनन और वेग इन सात प्रकार की प्रतिष्ठाओं से सहित था । वह अपने कानों के समीप बैठी हुई उन भ्रमरों की पंक्तियों को धारण कर रहा था जो कि गंडस्थलों से निकलते हुए मदरूपी जल के निर्झरनों से भीग गयी थीं और ऐसी जान पड़ती थीं मानो मद की दूसरी धाराएँ ही हों । इस प्रकार अनेक मुखों से व्याप्त हुआ वह गजराज ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो भक्तिपूर्वक आये हुए संसार के समस्त हाथी ही उसकी सेवा कर रहे हों ।।32-41।।
Now, the description of Indra’s elephant, Airavata, is given—his lineage and form. His backbone was very high, his body was enormous, and his head was exceedingly round and elevated. He had multiple mouths, numerous teeth, and many trunks. His seat was vast, and he was adorned with numerous auspicious marks and features. He was powerful, swift in movement, and immensely strong. He could travel anywhere at will and could assume any form he desired. He was extraordinarily brave.
His shoulders were exceedingly round, and his body had a symmetrical, well-proportioned structure. His body’s joints were excellent, and he was a great warrior. His teeth and eyes were charming and smooth. His exquisite trunk hung down slightly curved, was lively, long, thick, and gradually tapered, ending in a smooth, round, and straight tip. The tip of his trunk (Pushkara) was smooth and red, with large openings and markings resembling big fingers.
The rear part of his body was round. This elephant was extremely dignified and steady. His tail and genital organ were both large. His chest was exceptionally broad and strong. His ears produced a deep, thunderous sound, and his leaf-like ear flaps were extremely beautiful. His nails were shaped like a crescent moon, well-embedded in his toes, and had a reddish hue resembling coral. His complexion was radiant.
His mouth and palate were both red. He was as tall as a mountain, and his cheekbones were enormous. His loins resembled those of a boar. He was highly prosperous and had large lips. His voice was like the sound of a drum, and his breath was fragrant and deep. His lifespan was immeasurable, and everyone respected him.
He was knowledgeable in meaningful words and their interpretations. He was inherently auspicious, with a nature that radiated positivity. He was sacred and was born without a womb. His lineage was supreme, or his birth was the most excellent. He was endowed with the seven great attributes—valor, brilliance, strength, heroism, power, compactness, and speed.
He bore the rows of bees that hovered near his ears, which had been soaked by the streams of intoxicating liquid oozing from his temples. These bees seemed as if they were the second flow of the same nectar. Thus, pervaded by many mouths, this king of elephants appeared resplendent, as if all the elephants of the world had come with devotion to serve him. ( 32-41)
श्लोक 42 से 51
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आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 253 | श्लोक 254 से 261
आदिपुराण पर्व 21 – ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 95 | श्लोक 96 से 111 | श्लोक 112 से 120 | श्लोक 121 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 205 | श्लोक 206 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 268
आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31