आदिपुराण पर्व 21 – ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 205
श्लोक 206 से 211 सिद्धों का सुख
सिद्धों के पर्याय शब्द कृतार्थ आदि हैं। उनका सुख अतींद्रिय है। वेदनाओं का अभाव होता है। शुद्ध आत्मा का सुख नित्य है। स्वास्थ्य ही सुख है। वे क्लेशरहित होने से अबाध्य हैं।
English translation of Ādi purāṇa parv 21 – Shlok 206 to 211
श्लोक ( Shlok ) 206
कृतार्था निष्ठिताः सिद्धाः कृतकृत्या निरामयाः। सूक्ष्मा निरञ्जनाश्चेति पर्यायाः सिद्धिमा पुषाम्।२०६।।
कृतार्थ, निष्ठित, सिद्ध, कृतकृत्य, निरामय, सूक्ष्म और निरंजन ये सब मुक्ति को प्राप्त होने वाले जीवों के पर्यायवाचक शब्द हैं ।।206।।
The words कृतार्थ, निष्ठित, सिद्ध, कृतकृत्य, निरामय, सूक्ष्म, and निरंजन are all synonyms for beings who have attained liberation (moksha).(206)
श्लोक ( Shlok ) 207
तेषामतीन्द्रियं सौख्यं दुःखप्रक्षयलक्षणम् । तदेव हि परं प्राहुः सुखमानन्त्यवेदिनः ॥२०७॥
उन सिद्धों के समस्त दुःखों के क्षय से होने वाला अतींद्रिय सुख होता है और यथार्थ में केवली भगवान् उस अतींद्रिय सुख को ही उत्कृष्ट सुख बतलाते हैं ।।207।।
The perfected beings experience supersensory bliss that arises from the complete destruction of all suffering. In reality, the omniscient Lord (Kevali Bhagwan) describes this supersensory bliss as the supreme happiness.( 207)
श्लोक ( Shlok ) 208
क्षुदादिवेदनाभावान्नैषां विषयकामिताः । किमु सेवेत भैषज्यं स्वस्थावस्थः सुधीः पुमान् ॥२०८॥
आदि वेदनाओं का अभाव होने से उनके विषयों की इच्छा नहीं होती सो ठीक ही है क्योंकि ऐसा कौन बुद्धिमान पुरुष होगा जो स्वस्थ होने पर भी औषधियों का सेवन करता हो ।208।।
Due to the absence of primary sensations (worldly feelings), they have no desire for sensory objects. This is indeed appropriate because which wise person would take medicine when they are already healthy?(208)
श्लोक ( Shlok ) 209
न तत्सुखं परद्रव्यसंबन्धादुपजायते । नित्यमव्ययमक्षय्यमात्मोत्थं हि परं शिवम् ॥२०९॥
जो सुख पर-पदार्थों के संबंध से होता है वह सुख नहीं है, किंतु जो शुद्ध आत्मा से उत्पन्न होता है, नित्य है, अविनाशी है और क्षयरहित है वही वास्तव में उत्तम सुख है ।।209।।
The happiness that arises from external objects is not true happiness. However, the bliss that originates from the pure soul—which is eternal, indestructible, and free from decay—is indeed the supreme happiness.(209)
श्लोक ( Shlok ) 210
स्वास्थ्यं चेत्सुखमेतेषामदोऽस्त्यानन्त्यमाश्रितम् । ततोऽन्यच्चेत् सुखं नाम न किंचिद् भुवनोदरे ॥ २१०॥
यदि स्वास्थ्य (समस्त इच्छा का अपनी आत्मा में ही समावेश रहना―इच्छा जन्य आकुलता का अभाव होना) ही सुख कहलाता है तो वह अनंत सुख सिद्ध भगवान के रहता ही है और यदि स्वास्थ्य के सिवाय किसी अन्य वस्तु का नाम सुख है तो वह सुख लोक के भीतर कुछ भी नहीं है । भावार्थ―विषयों की इच्छा अर्थात् आकुलता का न होना ही सुख कहलाता है सो ऐसा सुख सिद्ध परमेष्ठी के सदा विद्यमान रहता है । इसके सिवाय यदि किसी अन्य वस्तु का नाम सुख माना जाये तो वह सुख नाम का पदार्थ लोक में किसी जगह भी नहीं है ऐसा समझना चाहिए ।।210।।
If true happiness is defined as perfect well-being—meaning the complete absorption of all desires within the self, with no agitation caused by cravings—then such infinite bliss naturally resides in the liberated Siddha Lords.
However, if happiness is believed to be something other than this state of well-being, then such happiness does not exist anywhere in the universe.
Explanation: The absence of desire or restlessness caused by sensory cravings is the true definition of happiness. This state of bliss is eternally present in the Siddha Paramesthi (liberated souls). If happiness were to be defined differently, then such a thing would not be found anywhere in existence.(Verse 210)
श्लोक ( Shlok ) 211
सकलक्लेशनिर्मुक्तो निर्मोहो निरुपद्रवः । केनासौ बाध्यते सूक्ष्मस्तदस्यात्यन्तिकं सुखम् ॥२११॥
वे सिद्ध भगवान् समस्त क्लेशों से रहित हैं, मोहरहित हैं, उपद्रवरहित हैं और सूक्ष्म हैं इसलिए वे किसके द्वारा बाधित हो सकते हैं―उन्हें कौन बाधा पहुंचा सकता है अर्थात् कोई नहीं । इसीलिए उनका सुख अंतरहित कहा जाता है ।।211।।
The liberated Siddha Lords are completely free from all afflictions, delusion, and disturbances. They exist in a subtle state, beyond all worldly limitations.
Who can obstruct them? Who can cause them any hindrance? The answer is—no one.
This is why their bliss is called “uninterrupted” (eternal and undisturbed).( 211)
श्लोक 212 से 221
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण पर्व 19 – नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192
आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 193 | श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 253 | श्लोक 254 से 261
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