आदिपुराण पर्व 30 – पश्चिम समुद्र के द्वारका विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 34 | श्लोक 35 से 50
श्लोक 51 से 63 : पश्चिम के हाथी और नदियाँ
भरत ने पश्चिम दिशा के उत्कृष्ट गुणों वाले हाथियों को प्राप्त किया, जो शूरवीर, सुगंधित मद वाले और मजबूत थे। सह्य पर्वत की नदियाँ, जैसे भीमरथी, दारुवेणा, नीरा, मूला, बाणा, गोदावरी आदि, सेना ने पार कीं। इन नदियों में मगरमच्छ, पक्षी और वृक्षों की छाया थी। सेनापति ने जंगली हाथियों को भी पकड़ा।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 30 – Shlok 51 to 63
श्लोक ( Shlok ) 51
तत्रा परान्तकान् नागान् ह्रस्वग्रीवान् परान् रदैः। युक्तान् “पीनायतस्निग्धैः श्यामान् स्वक्षान मृदुत्वचः ll५१llमहोत्सङ्गानु दग्राङ्गान् रक्तजिह्योष्ठतालुकान् । मानिनो दीर्घवालोष्ठान् पद्मगन्धमदच्युतः ॥५२॥सन्तुष्टान् स्वे वने शूरान् दृढपादान् सुवर्षणः । स भेजे तद्वनाधीशैः ससम्भ्रममुपाहृतान् ॥५३।।
जिनकी गर्दन कुछ छोटी है, जो देखनेमें उत्कृष्ट हैं, मोटे लम्बे और चिकने दाँतोंसे सहित हैं, काले हैं, जिनकी सब इन्द्रियाँ अच्छी हैं, चमड़ा कोमल है, पीठ चौड़ी है, शरीर ऊँचा है, जीभ, ओंठ और तालु लाल हैं, जो मानी हैं, जिनकी पूछ और ओंठ लम्बे हैं, जिनसे कमलके समान गंधवाला मद कर रहा है, जो अपने ही वनमें संतुष्ट हैं, शूरवीर हैं, जिनके पैर मजबूत हैं, शरीर अच्छा है और जिन्हें उन वनोंके स्वामी बड़े हर्ष या क्षोभके साथ भेंट देनेके लिये लाये हैं ऐसे पश्चिम दिशामें उत्पन्न होनेवाले हाथी भी भरतने प्राप्त किये थे ।।५१-५३।।
Those whose necks are slightly short, yet who are of surpassing beauty; endowed with thick, long, and gleaming teeth; of dark complexion; whose every sense is finely tuned; whose skin is soft to the touch; whose backs are broad and bodies tall; whose tongues, lips, and palates are tinged with red; who are intelligent and discerning; whose tails and lips are long; from whom issues a fragrant ichor redolent of lotus-blossoms; who dwell contentedly within their native forests; who are valiant by nature; whose feet are firm and strong, and whose forms are splendid—such noble elephants, born of the western regions and presented with great delight or deep agitation by the lords of those forests, were also received by Bharata.
श्लोक ( Shlok ) 54
वनरोमावलीस्तुङ्गतटारोहा बहूर्नदीः । पूर्वापराब्धिगाः सोऽत्येत् सह्याद्रेर्दुहितृ रिव ॥५४॥
वन ही जिनकी रोमावली है और ऊंचे किनारे ही जिनके नितम्ब हैं ऐसी सह्य पर्वतकी पुत्रियोंके समान पूर्व तथा पश्चिम समुद्रकी ओर बहनेवाली अनेक नदियां महाराज भरतने उल्लंघन की थीं- पार की थीं ।॥ ५४।।
Whose very forests were like flowing tresses, and whose lofty banks rose like stately hips—such were the daughters of the Sahya mountains, the many rivers that streamed toward the eastern and western seas. Even these, King Bharata had crossed and conquered.54.
श्लोक ( Shlok ) 55
सञ्चरद्भीषणग्राहैर्भीमां भैम रथी नदीम् । नक्रचक्रकृतावर्तेर्दारुवेणां च दारुणाम् ॥५५॥
नीरां तीरस्थवानीर’ शाखाग्रस्थगिताम्भसम् । मूलां कूलङ्कषैरोधैः उन्मूलिततटद्रुमाम् ॥५६॥
बाणामविरताबाणां केत म्बामम्बुसम्भृताम् । करीरित तटोत्सङ्गां करीरी सरिदुत्तमाम् ॥५७॥
प्रहरां “विषमग्राहैः दूषितामसतीमिव । मुररां कुररैः सेव्याम् अपपङकां सतीमिव ॥५८।।
पारां पारेजलं कूजत्क्रौञ्चकादम्ब सारसाम् । दमनां समनिम्नेषु समानामस्खलद्गतिम् ॥५९॥
मदस्त्रुश्ति “मिवाबद्ध वेणिकां” सह्यदन्तिनः । गोदावरीमविच्छिन्नप्रवाहामतिविस्तृताम् ॥६०॥
करीरवण संरुद्धतटपर्यन्तभूतलाम् । तापीमातपसन्तापात् कवोष्णा बिभ्र तीमपः ॥६१॥
रम्यां तीरतरुच्छायासंसुप्तमृगशावकाम् । खातामिवापरान्तस्य नदीं लाङ्गलखातिकाम् ॥६२॥
सरितोऽम्ः समं सैन्यैरूत्ततार चमूपतिः । तत्र तत्र “समाकर्षन्मदिनो वनसामजान् ॥६३॥
चलते-फिरते हुए भयंकर मगरमच्छोंसे भयानक भीमरथी नदी, नाकुओंसे समहसे की हुई आवर्तोंसे भयंकर दारुवेणा नदी, किनारे पर स्थित बेतोंकी शाखाओंके अग्रभागसे जिसका जल ढका हुआ है ऐसी नीरा नदी, किनारे को तोड़नेवाले अपने प्रवाहसे जिसने किनारेके वृक्ष उखाड़ दिये हैं ऐसी मूला नदी, जिसमें निरन्तर शब्द होता रहता है ऐसी बाणा नदी, जलसे भरी हुई केतवा नदी, जिसके किनारेके प्रदेश हाथियोंने तोड़ दिये हैं अथवा जिसके किनारेके प्रदेश करीर वृक्षोंसे व्याप्त हैं ऐसी करीरी नामकी उत्तम नदी, विषमग्राह अर्थात् नीच मनुष्योंसे दूषित व्यभिचारिणी स्त्रीके समान विषम ग्राह अर्थात् बड़े बड़े मगरमच्छोंसे दूषित प्रहरा नदी, सती स्त्रीके समान अपंका अर्थात् कीचड़-रहित, (पक्षमें-कलंकरहित) तथा कुरर पक्षियोंके द्वारा सेवा करने योग्य सुररा नदी, जिसके जलके किनारेपर क्रौञ्च, कलहंस (बदक) और सारस पक्षी शब्द कर रहे हैं ऐसी पारा नदी, जो समान तथा नीची भूमिपर एक समान जलसे भरी रहती है तथा जिसकी गति कहीं भी स्खलित नहीं होती है ऐसी मदना नदी, जो सह्य पर्वतरूपी हाथी के बहते हुए मदके समान जान पड़ती है, जो अनेक धाराएं बांधकर बहती है, जिसका प्रवाह बीचमें कहीं नहीं टूटता, और जो अत्यन्त चौड़ी है ऐसी गोदावरी नदी, जिसके किनारे के समीपकी भूमि करीर वृक्षोंके वनोंसे भरी हुई है और जो धूपकी गरमीसे कुछ कुछ गरम जलको धारण करती है ऐसी तापी नदी, तथा जिसके किनारेके वृक्षोंकी छायामें हरिणोंके बच्चे सो रहे हैं और जो पश्चिम देशकी परिखाके समान जान पड़ती है ऐसी मनोहर लांगलखातिका नदी, इत्यादि अनेक नदियों को सेनापतिने अपनी सेनाके साथ साथ पार किया था। उस समय वह सेनापति मदोन्मत्त जंगली हाथियोंको भी पकड़वाता जाता था ।। ५५-६३।।
The dread Bhīmarathī, haunted by fearsome crocodiles that roamed its waters; the terrifying Dāruveṇā, whose whirlpools, stirred by submerged rocks, churned with fury; the Nīrā, her waters concealed beneath the outstretched tips of canes lining her shores; the impetuous Mūlā, whose surging current tore at the banks and uprooted the trees; the ever-rumbling Bāṇā, resounding with an unceasing roar; the brimming Ketavā, heavy with water; the noble Karirī, whose riverbanks were either trampled by elephants or thickly forested with karīra trees—
All these were crossed by the commander of Bharata’s army.
He traversed the Praharā, foul and perilous, defiled by monstrous crocodiles like a woman of impure conduct corrupted by ignoble men;
The Surarā, pure as a chaste wife, free of mud, graced by the presence of kurara birds;
The Pārā, along whose banks krauñchas, kalahaṁsas, and graceful cranes raised their calls;
The Madanā, flowing evenly over level ground, her waters steady, unswerving in course;
The mighty Godāvarī, vast and unfaltering, whose countless streams ran as if the very ichor of the Sahya mountain-elephant had burst forth—broad, unbroken in midstream, and majestic in flow;
The Tāpī, whose shores, warmed gently by the sun, were ringed by karīra groves;
And the lovely Lāṅgalakhatikā, seeming like the protective moat of the western land, where the fawns of deer lay sleeping in the shade of trees along her banks.
Such were the many rivers crossed by that great general, who advanced with his army, and all the while captured wild elephants intoxicated with rut from the deep forests they passed.
श्लोक 64 से 71
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221
आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 66 | श्लोक 67 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 169
आदिपुराण पर्व 30 – पश्चिम समुद्र के द्वारका विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 34 | श्लोक 35 से 50