Hindi Translation of Adi purana Parv 26
श्लोक 1 से 11 : चक्रवर्ती भरत का उत्सव और शरद् ऋतु की शोभा
अथानन्तर श्रीमान् चक्रवर्ती भरत महाराजने विधिपूर्वक चक्ररत्नकी पूजा की और फिर अनुक्रमसे पुत्र उत्पन्न होनेका आनन्द मनाया ॥१॥ राजा भरतके उस महोत्सव के समय संसार भरमें कोई दरिद्र नहीं रहा था किन्तु दरिद्रता इस बातकी हो गई थी कि धन देने पर भी उसे कोई लेनेवाला नहीं मिलता था । भावार्थ-महाराज भरतके द्वारा दिये हुए दानसे याचक लोग इतने अधिक संतुष्ट हो गये कि उन्होंने हमेशाके लिये याचना करना छोड़ दिया ।।२।। उस समय राजाने चौराहोंमें, गलियोंमें, नगरके भीतर और बाहर सभी जगह रत्नोंके ढेर किये थे और वे सब याचकोंके लिये दे दिये थे ॥ ३॥ उस समय भरतने जो चक्ररत्नकी पूजा की थी वह उसके शत्रुओंके लिये अभिचार क्रिया अर्थात् हिंसाकार्यके समान मालूम हुई थी और पुत्र जन्मका जो उत्सव किया था वह संसारको शान्ति कर्मके समान जान पड़ा था ।।४।। तदनन्तर भरतने दिग्विजयके लिये उद्योग किया, उसी समय शरऋतु भी आ गई जो कि भरतकी जयलक्ष्मीके समान प्रसन्न तथा निर्मल अम्बर (आकाश) को धारण करनेवाली थी ।।५।। उस समय सप्तपर्ण जातिके फूलोंसे उठी हुई परागसे जिनुके शरीर सुशोभित हो रहे हैं ऐसे भूमरोंके समूह इस शरद् ऋतुके अलकों (केशपाश) के समान शोभाय-मान हो रहे थे ॥६॥ जिस प्रकार कवियोंका उत्तम काव्य प्रसन्न अर्थात् प्रसाद गुणसे सहित और जनसमूहके चित्तको आनन्दित करनेवाला होता है उसी प्रकार तालाबों और नदियोंका जल भी प्रसन्न अर्थात् स्वच्छ और मनुष्योंके चित्तको आनन्द देनेवाला बन गया था ।।७।। चारों ओर उड़ती हुई हंसोंकी पंक्तियां ऐसी सुशोभित हो रही थीं मानो शरऋतुरूपी लक्ष्मी की बड़े बड़े मोतियोंकी मालासे बनी हुई कण्ठमाल (गलेमें पहननेका हार) ही हो ।॥८॥ कमलोंकी परागसे व्याप्त हुआ सरोवरका जल ऐसा सुन्दर जान पड़ता था मानो सुवर्णकी धूलिसे व्याप्त हुआ रत्नजटित पृथिवीका तल ही हो ।।९।। जिसका जल चारों ओरसे कमलों की परागसे ढका हुआ है ऐसे सरोवरको देखकर कादम्ब जातिके हंसोंकी स्त्रियां स्थलका संदेह कर बार बार मोहमें पड़ जाती थीं अर्थात् सरोवरको स्थल समझने लगती थीं ।॥१०॥ जो भूमरोंकी पंक्तियां कमलोंके केशरके समूहसे पीली पीली हो गई थीं वे ऐसी जान पड़ती थीं मानो सुवर्णमय मनकाओंसे गूंथा हुआ शरद् ऋतुका कंठहार ही हो ।।११।।
श्लोक 12 से 21 : चक्रवर्ती भरत का उत्सव और शरद् ऋतु की शोभा
जिस प्रकार चारण लोग प्रसिद्ध दानी पुरुषके समीप उसकी कीति गाते हुए पहुंचते हैं उसी प्रकार हंस पक्षी भी शब्द करते हुए अतिशय सुगन्धित सरोवरके जलके समीप पहुंच रहे थे ।।१२।। शरद् ऋतुके आते ही नदियोंके किनारे स्वच्छ हो गये थे और ऐसे जान पड़ते थे मानो सफेद वस्त्रों से बने हुए हंसोंके बिछौने ही हों ॥१३।। कमलोंसे सहित सरोवर, नील कमलोंसे सहित खेतोंकी भूमियां और हंसों सहित किनारोंसे युक्त नदियां ये सब कामी मनुष्योंका चित्त हरण कर रहे थे ॥१४॥ जिनमें स्वच्छ जल भरा हुआ है और जो सारस पक्षियोंके जोड़ोंसे सहित हैं ऐसे छोटे छोटे तालाब, नूपुरोंके शब्दको जीतनेवाले कलहंस पक्षियोंके सुन्दर शब्दोंसे बहुत ही अधिक सुशोभित हो रहे थे ।।१५।। नीलोत्पल ही जिसके नेत्र हैं और कमल ही जिसका मुख है ऐसी शरद् ऋतुकी लक्ष्मीरूपी स्त्री कलहंसियोंके मधुर शब्दों के बहाने वार्तालाप करती हुई सी जान पड़ती थी ।॥ १६॥ जिनमें वालें नीचेकी ओर झुक गई हैं और जिनकी शोभा कुछ कुछ पीली हो गई है ऐसी पके चावलोंकी पृथिवियां उस समय ऐसी जान पड़ती थीं मानो शरद् कालरूपी पतिके आनेपर हल्दी आदिके उवटन द्वारा स्नान कर सुसज्जित ही बैठी हों ॥१७॥ उस शरद्ऋतुकी शोभा देखकर हंस हर्षको प्राप्त हुए थे और मयूरोंने अपना हर्ष छोड़ दिया था । सो ठीक ही है क्योंकि शुद्धि और अशुद्धिका यही स्वभाव होता है। भावार्थ-हंस शुद्ध अर्थात् सफेद होते हैं इसलिये उन्हें शरऋतुकी शोभा देखकर हर्ष हुआ परन्तु मयूर अशुद्ध अर्थात् काले होते हैं इसलिये उन्हें उसे देखकर दुःख हुआ। किसीका वैभव देखकर शुद्ध अर्थात् स्वच्छ हृदयवाले पुरुष तो आनन्दका अनुभव करते हैं और अशुद्ध अर्थात् मलिन स्वभाव वाले दुर्जन पुरुष दुःखका अनुभव करते हैं, यह इनका स्वभाव ही है ॥१८॥
निर्मल शरीरको धारण करनेवाले हंस मधु शब्द करते हुए ऐसे जान पड़ते थे मानों अहो तुम लोग जड़प्रिय-मूर्खप्रिय (पक्षमें जलप्रिय) हो इस प्रकार कहकर मयूरोंकी हँसी ही उड़ा रहे हों ॥१९॥ जिनका वर्ण अनेक प्रकारका है, जिनकी रुचि इच्छा (पक्षमें कान्ति) मेघोंमें लग रही है और जो पर्वतोंके आश्रय हैं ऐसे मयूरोंने इन्द्रधनुषोंके साथ ही साथ अपनी भी उन्नति छोड़ दी थी। भावार्थ-उस शरऋतुके समय मयूर और इन्द्रधनुष दोनोंकी शोभा नष्ट हो गई थी ।।२०।। वन-पंक्तियोंमें शरऋतुरूपी लक्ष्मीके द्वारा थूके हुए ताम्बूलके रसके बूंदोंके समान शोभा देनेवाले बन्धूक (दुपहरिया) पुष्पोंने क्या इन्द्रगोप अर्थात् वर्षाऋतुमें होनेवाले लाल रंगके कीड़ोंकी शोभा नहीं बढ़ाई थी ? अर्थात् अवश्य ही बढ़ाई थी। बन्धुक पुष्प इन्द्रगोपोंके समान जान पड़ते थे ॥ २१॥
श्लोक 22 से 31 : शरद् ऋतु की प्राकृतिक सौंदर्यता
जिस प्रकार निर्मल अन्तःकरणवाली, पापरहित और स्वच्छ वस्त्र धारण करनेवाली कोई सती स्त्री घरसे बाहिर प्रकट हो अपने बन्धुजनोंके विषयमें विकास अर्थात् प्रेमको धारण करती है उसी प्रकार शुद्ध दिशाओंको धारण करनेवाली कीचड़-रहित और स्वच्छ आकाशवाली शरऋतुने भी प्रकट होकर बन्धुजीव अर्थात् दुपहरिया के फूलोंपर विकास धारण किया था उन्हें विकसित किया था। तात्पर्य यह है कि उस समय दिशाएं निर्मल थीं, कीचड़ सूख गया था, आकाश निर्मल था और वनोंमें दुपहरियाके फूल खिले हुए थे ॥ २२॥ उस समय जो हंसोंके शब्द हो रहे थे वे नगाड़ोंके समान जान पड़ते थे, बनोंमें काशके फूल फूल रहे थे वे उज्ज्वल चमरोंके समान मालूम होते थे, और तालाबोंमें कमल खिल रहे थे वे छत्रके समान सुशोभित हो रहे थे तथा इन सबसे वह शरऋतु ऐसी जान पड़ती थी मानो उसे दिग्विजय करनेकी इच्छा ही उत्पन्न हुई हो ।।२३।। उस शरॠतुने दिशाओं को प्रसाधन अर्थात् अलंकृत करने के लिये वाणासन अर्थात् बाण और आसन जातिके पुष्पों का समूह धारण किया था सो ठीक ही है क्योंकि शत्रुओंको प्रसाधन अर्थात् वश करनेके लिये जिगीषु राजाको वाणासन अर्थात् धनुषका ग्रहण करना प्रशंसनीय ही है ॥ २४।। उस समय समस्त आशा अर्थात् दिशाओं (पक्षमें संगमकी इच्छाओं) को छोड़ती हुई मेघमाला कृश और पाण्डुवर्ण हो गई थी सो उससे ऐसी जान पड़ती थी मानो वर्षा कालके वियोगसे उत्पन्न हुई चिन्तासे व्याकुल होकर ही वैसी हो गई हो ।। २५।। उस शरद्ऋतुके समय ताराओंसे सहित आकाश ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो कुमुदिनियों सहित सरोवरकी हँसी ही कर रहा हो और कुमुदिनियोंसे सहित सरोवर ऐसा जान पड़ता था मानो ताराओंसे सुशोभित आकाश को ही जीत रहा हो ।॥२६॥ तारकारूप कुमुदोंसे भरे हुए आकाशरूपी निर्मल सरोवरमें अपने किरणरूप पंखोंको फैलाता हुआ चन्द्रमा ठीक हंसके समान आचरण करता था ।।२७।। जिनकी कान्ति दिशारूपी स्त्रियोंके हारोंमें लगे हुए बड़े बड़े मोतियोंके समान है ऐसे तारागण आकाशरूपी घरके आंगनमें फूलोंके उपहारसे उत्पन्न हुई शोभाको बढ़ा रहे थे ।।२८।। देदीप्य-मान मुक्ताफलों के समान निर्मल तारे आकाशरूपी समुद्रमें ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो मेघों के समूहने बर्फके समान शीतल ओले ही धारण कर रक्खे हों ।॥२९॥। आकाशरूपी आंगनमें जहां तहां बिखरे हुए तारागण ऐसी शोभा धारण कर रहे थे मानो चांदनी रूप जलसे उत्पन्न हुए बबूलोंके समूह ही हों ।॥ ३०।। वर्षाकालरूपी पतिसे बिछुड़ी हुई नदियां विरहिणी स्त्रियोंके समान अत्यन्त कृश होकर जलके सूक्ष्म प्रवाहरूपी चोटियोंको धारण कर रही थीं ॥३१।।
श्लोक 32 से 41 : प्रकृति और भरत की शोभा
वर्षाकालके नष्ट हो जानेसे नदीरूप स्त्रियां मानों वैधव्य अवस्थाको ही प्राप्त हो गई थीं, क्योंकि जिस प्रकार विधवाएं उद्धतता छोड़ देती हैं उसी प्रकार नदियोंने भी उद्धतता छोड़ दी थी, विधवाएं जिस प्रकार स्वच्छ (सफेद) वस्त्र धारण करती हैं उसी प्रकार नदियां भी स्वच्छ वस्त्ररूपी जल धारण कर रही थीं, और विधवाएं जिस प्रकार अगम्भीर वृत्तिको धारण करती हैं उसी प्रकार नदियां भी अगम्भीर अर्थात् उथली वृत्तिको धारण कर रही थीं ॥३२॥ मेघोंके नष्ट हो जानेसे जिनकी मूर्ति आकृति प्रकाशित हो रही है ऐसी दिशारूपी स्त्रियां अत्यन्त प्रसन्न हो रही थीं और हंसरूप आभरणोंके छलसे मानो एक दूसरेके प्रति हँस ही रही थीं ।॥३३॥ उस समय मयूरोंने अपनी केका वाणी छोड़ दी थी, मानो कलहंस पक्षियोंके मधुर शब्दोंसे पराजित होकर ही छोड़ दी हो, सो ठीक ही है क्योंकि समयके बलसे सभी बलवान् हो जाते हैं ।॥३४॥ चांदनीरूपी रेशमी वस्त्र पहने हुए, देदीप्यमान नक्षत्रोंकी माला (पक्ष में सत्ताईस मणियोंवाला नक्षत्रमाल नामका हार) धारण किये हुए और दुपहरियाके फूल रूप अधरोंसे सहित वह निर्मल शरऋतुरूपी स्त्री अतिशय सुशोभित हो रही थी ॥३५॥ शरद्ॠतुकी शोभा पाकर आकाशमण्डलमें चांदनीरूपी कीर्तिको फैलाता हुआ चन्द्रमा किसी उत्तम राजाके समान अत्यन्त सुशोभित हो रहा था ।। ३६॥ वह शरऋतु नवोढ़ा स्त्रीके समान सुशोभित हो रही थी क्योंकि जिस प्रकार नवोढ़ा स्त्री बन्धुजीव अर्थात् भाईबन्धुओंपर राग अर्थात् प्रेम रखती है उसी प्रकार वह शरऋतु भी बन्धुजीव अर्थात् दुपहरियाके फूलोंपर राग अर्थात् लालिमा धारण कर रही थी, नवोढा स्त्री जिस प्रकार देदीप्यमान होती है उसी प्रकार शरऋतु भी बाण जातिके फूलोंसे देदीप्यमान हो रही थी और नवोढा स्त्री जिस प्रकार सखियोंसे घिरी रहती है उसी प्रकार वह शरऋतु भी हंसीरूपी सखियोंसे घिरी रहती थी ॥३७।। उस समय आकाश अपने आप साफ किये हुएके समान जान पड़ता था, चन्द्रमा अपने आप बोये हुएके समान मालूम होता था, नदियां अपने आप स्वच्छ हुई सी जान पड़ती थीं और दिशाएं अपने आप झाड जहार कर साफ की हुईके समान मालूम होती थीं ॥३८॥ जो शरद्ॠतुरूपी लक्ष्मीके मुख देखने के लिये दर्पणके समान है और जो बिना साफ किये ही अत्यन्त उज्ज्वल है ऐसे चन्द्रमण्डलमें प्रजाके नेत्र बड़ा भारी संतोष प्राप्त करते थे ।।३९।। जिनकी सुगन्धि चारों ओर फैल रही है और जो फूलरूप आभरणोंसे उज्ज्वल हो रही हैं ऐसो वन-पंक्तियोंको भूमर कोलाहल शब्द करते हुए सेवन कर रहे थे ॥४०॥ जो फूले हुए पुष्परूपी मन्द हास्यसे सहित थीं तथा गन्धसे अंधे हुए भुमरोंके समूहसे व्याप्त होनेके कारण जो सुन्दर केशोंसे सुशोभित थीं ऐसी वनकी लताएं उस समय कृश शरीरवाली स्त्रियोंके समान शोभा पा रही थीं ।॥४१॥
श्लोक 42 से 51 : ग्रामीण जीवन और प्रकृति
जो खरोंसे पृथिवीको खोद रहे थे, जिनकी आंखें लाल लाल हो रही थीं और जो दूसरे बैलोंके देखनेसे क्रोधित हो रहे थे ऐसे मदोन्मत्त बैल अन्य बैलोंके शब्द सुनकर बदलेमें स्वयं शब्द कर रहे थे ।।४२।। उसी प्रकार गम्भीर शब्द करते हुए वे बैल अपने सींगोंके अग्रभागसे स्थलकमलोंके मृणालके टुकडोंसे व्याप्त हुई वनकी पृथिवीको खोद रहे थे ।।४३।। इसी तरह उस शरॠतुमें जिनके कांधौलपर मिट्टी लग रही है और जो कुमुद पुष्पके समान अत्यन्त सफेद हैं ऐसे वे बैल स्पष्ट चिह्नवाले चन्द्रमाकी शोभा धारण कर रहे थे ।।४४।। जिनसे अपने आप दूध निकल रहा है ऐसी उत्तम गायें वनकी सम्पूर्ण पृथिवीको दूधके प्रवाहके रूप करती हुई वनोंके भीतर जहां तहां फिर रही थीं ।॥४५।। इसी प्रकार जिनके स्तन कुण्डके समान भारी हैं और जो अमृतके पिण्डसे बनी हुईंके समान अत्यन्त निर्मल हैं ऐसी तुरन्तकी प्रसूत हुई गायें बनोंके मध्यमें शरऋतुकी शोभाके समान जान पडती थीं ।॥४६।।
जिनके स्तन बहुत ही स्थूल हैं और जो हंभा शब्द कर रही हैं ऐसे दूधवाली गायें दूध पीनेके लिये उत्सुक हुए तथा बार बार हंभा शब्द करते हुए अपने बच्चोंको दूधरूपी अमृत पिला रही थीं ।॥४७।। इसी प्रकार हंभा ऐसा गंभीर शब्द करनेवाली गायें ग्वालाओंके द्वारा अलग बांध दिये जानेपर भी दूध पीनेकी इच्छा करनेवाले अपने बच्चोंको दूध पिला ही रही थीं ।॥४८॥ जो मेघ पहले मयूरोंको अत्यन्त प्रिय थे वे ही अब शरऋतुमें जलरूप धनके नष्ट हो जानेसे खाली होकर उन्हें अप्रिय हो गये थे सो ठीक ही है क्योंकि दरिद्रता बहुत ही कष्ट देनेवाली होती है ।।४९।। उस समय फूले हुए वृक्षोंसे पर्वत ऐसे जान पड़ते थे मानो परस्पर में हँसी ही कर रहे हों और झरते हुए झरनोंके छींटोंसे ऐसे जान पड़ते थे मानों फाग ही कर रहे हों-विनोदवश एक दूसरेके ऊपर जल डाल रहे हों ।। ५०।। कलमी जाति के धान, जो कि बहुत दिनके थे अथवा जिनके समीप बहुत पक्षी बैठे हुए थे, जो खूब नव रहे थे और जो अपने परिपाकसे जगत्के समस्त जीवोंका पोषण करते थे, वे ठीक वृद्ध पुरुषोंके समान सुशोभित हो रहे थे ।॥५१॥
श्लोक 52 से 61 : प्रकृति और भरत का दिग्विजय उद्योग
सहजनाके वृक्ष मदोन्मत्त भूमरोंके समूहसे घिरे हुए अपने फूलोंसे ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो जिनके मेध्यभागमें इन्द्रनील मणि लगा हुआ है ऐसे सुवर्णमय आभू-षणोंसे ही सुशोभित हो रहे हों ॥ ५२।। जिस प्रकार आभूषण आदि पहिनने के परदेवाले घरसे निकल कर रंगभूमिमें आई हुई नत्यकारिणी नेत्रोंको आनन्द देती है उसी प्रकार मेघोंके आवरणसे छूटी हुई दिशाएं नेत्रोंको अतिशय आनन्द दे रही थीं ।॥५३॥ पर्वतोंने जो अपनी शिखरों पर जल-रहित सफेद बादलोंके समूह धारण किए थे वे ऐसे जान पड़ते थे मानों अंचल-सहित नवीन वस्त्र ही हों । ॥ ५४।। जिनपर वायुरूपी महावत बैठे हुए हैं, जो भीतर ही भीतर गरज रहे हैं और जो लतागृहोंमें जलकी बूदें रूपी मदधाराकी बूंदें छोड़ रहे हैं ऐसे मेघरूपी हाथी जहाँ तहाँ फिर रहे थे ॥ ५५॥ जिनकी चोंच मूंगा के समान लाल है ऐसी तोताओंकी पंक्ति आकाशमें ऐसी शोभा बढ़ा रही थी मानो पद्मराग मणियोंकी कान्ति सहित हरित मणियों की बनी हुई वन्दनमाला ही हो ।॥५६॥ जिस प्रकार अधिकारसे भूष्ट हुए मनुष्योंके चित्त दीनताको प्राप्त होते हैं उसी प्रकार नावोंके द्वारा आजीविका करनेवाले उद्धत मल्लाहोंके चित्त दीनताको प्राप्त हो रहे थे। भावार्थ-शरऋतुमें नदियोंका पानी कम हो जानेसे नाव चलानेवाले लोगोंका व्यापार बन्द हो गया था इसलिये उनके चिंत्त दुःखी हो रहे थे ।।५७।। उस समय सूर्य भी ठीक महाराज भरतके समान देदीप्यमान हो रहा था, क्योंकि जिस प्रकार भरत प्रतापी थे उसी प्रकार सूर्य भी प्रतापी था, जिस प्रकार भरत लोकके एकमात्र नेत्र थे अर्थात् सबको हिताहितका मार्ग दिखानेवाले थे उसी प्रकार सूर्य भी लोकका एक मात्र नेत्र था, जिस प्रकार भरतका तेज प्रतिदिन बढ़ता जाता था उसी प्रकार सूर्यका भी तेज प्रतिदिन बढ़ता जाता था, और जिस प्रकार भरतने अन्य तेजस्वी राजाओंको दबा दिया था उसी प्रकार सूर्यने भी अन्य चन्द्रमा तारा आदि तेजस्वी पदार्थोंको दबा दिया था-अपने तेजसे उनका तेज नष्ट कर दिया था ।। ५८ ।। इस प्रकार अत्यंन्त निर्मल चन्द्रमाकी किरणें ही जिसका हास्य है ऐसी शरद् ऋतुके आनेपर चक्रवर्ती भरतने चक्ररत्न आगे कर दिग्विजय करनेके लिये उद्योग किया ।।५९।।
उस समय गम्भीर शब्द करते हुए प्रस्थान कालके नगाड़े बज रहे थे, जिन्हें मेघके आडम्बरकी शंका करनेवाले मयूर अपनी ग्रीवा ऊंची उठाकर सुन रहे थे ॥६०॥ उस समय जिन्होंने मंगलमय वस्त्राभूषण धारण किये हैं ऐसे महाराज भरत हार तथा सफेद चन्दन से सुशोभित जिस वक्षःस्थलको धारण किये हुए थे वह ऐसा जान पड़ता था मानो शरऋतु रूपी लक्ष्मी ही उसकी सेवा कर रही हो ।।६१।।
श्लोक 62 से 71 : भरत का राजसी वैभव
महाराज भरतने चांदनीसे बने हुएके समान सफेद, बारीक और कोमल जिन दो दिव्य वस्त्रोंको धारण किया था वे ऐसे जान पड़ते थे मानो शरऋतुरूपी लक्ष्मीके द्वारा ही उपहारमें लाये गये हों ।॥ ६२॥ घुटनों तक लटकते हुए ब्रह्मसूत्रसे महाराज भरत ऐसे सुशोभित हो रहे थे, जैसा कि तटको स्पर्श करनेवाले गंगा जलके प्रवाहसे हिमवान् पर्वत सुशोभित होता है ।। ६३।। मुकुट लगानेसे जिनका मस्तक बहुत ऊंचा हो रहा है ऐसे भरत महाराजने अपने दोनों कानोंमें जो कुण्डल धारण किये थे वे ऐसे जान पड़ते थे मानो जयोत्सवकी बधाई देनेके लिये सूर्यमण्डल और चन्द्रमण्डल ही आये हों ॥६४।। भरतेश्वरके वक्षःस्थलपर देदीप्यमान कौस्तुभ मणि ऐसा सुशोभित होता था, मानो विजयलक्ष्मी के विवाहरूपी मंगलकी सूचना देनेवाला दीपक ही हो ॥ ६५।। उन्होंने चन्द्रमण्डलके साथ स्पर्धा करनेवाले जिस छत्रको धारण किया था वह ऐसा जान पड़ता था मानो उस छत्रके बहानेसे स्वयं चन्द्रमण्डल ही आकर उनकी सेवा करना चाहता हो ।। ६६ ।। महाराज भरतने जो छत्र धारण किया था वह चूड़ारत्नकी किरणोंसे मिलकर ऐसा सुशोभित हो रहा था, मानो सूर्यकी लाल किरणों सहित कमल ही हो ।।६७।। जो वारांगनाएं महाराज भरतके आस-पास गंगाके जल की बूंदोंके साथ स्पर्धा करनेवाले चमरोंके समूह ढल रहीं थीं ऐसी जान पड़ती थों मानो अच्छी तरहसे आई हुई दिक्कन्याएं ही हों ॥ ६८॥ तदनन्तर स्थपति रत्नने एक बड़ा भारी रथ तैयार किया जो कि सुवर्ण और मणियोंसे चित्र विचित्र दिखनेवाले मेरु पर्वतके लतागृहोंकी शोभाकी ओर हँस रहा था ।। ६९।। वह रथ चक्ररत्नकी प्रतिस्पर्धा करनेवाले दो पहियोंसे सहित था तथा वजूके बने हुए अक्ष (दोनों पहियोंके बीचमें पड़ा हुआ मजबूत लोहदंड-भौंरा) से युक्त था इसलिये महाराज भरतके मनोरथ के समान बहुत ही ही अधिक सुशोभित हो रहा था ।।७०।। उस रथमें जो घोड़े जोते गये थे वे इच्छानुसार गमन करते थे, वायुके समान वेगशाली थे, कुमुदके समान उज्ज्वल कान्तिवाले थे और यशके समूह के समान जान पड़ते थे ॥७१॥
श्लोक 72 से 81 : भरत की सेना का प्रस्थान
जिस प्रकार इन्द्र मेरु पर्वतके तटपर आरूढ़ होता है उसी प्रकार भरतेश्वर, जिसपर योग्य सारथि (हांकनेवाला) बैठा है ऐसे रथपर आरूढ़ हुआ ।।७२।। तदनन्तर प्रस्थान समयमें होनेवाले ‘जय’ ‘जय’ आदि पुण्य शब्दोंके द्वारा जिनका अभिनन्दन किया जा रहा है, जो दिग्विजयकी समस्त तैयारियां कर चुके हैं और जिनके साथ प्रस्थान-कालीन सभी मंगलाचार किये जा चुके हैं ऐसे महाराज भरतने प्रस्थान किया ।॥७३॥ उस समय आकाशरूपी समस्त आंगन जय जय शब्दोंकी घोषणासे भर गया था, और राजाका आँगन सेनापतियोंसे भर गया था ।।७४।। जिस प्रकार देव लोग इन्द्रको घेर कर खड़े हो जाते हैं उसी प्रकार दूरसे ही मस्तक झुकाकर नमस्कार करते हुए महामुकुट बद्ध राजा लोग भरत को घेरे हुए चारों ओर खड़े थे ।। ७५।। जिसने चारों ओरसे नगरकी समस्त गलियोंको रोक लिया है ऐसी वह सेना चलने लगी । उस समय ऐसा जान पड़ता था मानो यों बड़े-बड़े योद्धाओंकी एक अपूर्व सृष्टि ही उत्पन्न हुई हो ।। ७६।। सबसे पहले पैदल चलनेवाले सैनिकोंका समूह था, उसके पीछे घोड़ोंका समूह था, उसके पीछे रथोंका समूह और उसके पीछे हाथियों का समूह था। इस प्रकार वह सेना पताकाओंसे सहित महाराजके रथको घेरकर अनुक्रम से निकली ॥७७।। जिन मागौसे वह सेना जा रही थी वे मार्ग रथ और घोड़ोंके संघटनसे उठी हुई सुवर्णमय धूलिसे ऐसे जान पड़ते थे मानो सेनाका आघात सहनेमें असमर्थ होकर स्वयं आकाशमें ही उड़ गये हों ।॥ ७८।। उस समय सुवर्णमय धूलिसे भरा हुआ आकाशरूपी आंगन ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो बालसूर्यकी सुनहली प्रभासे स्पर्श किया गया हो, और सुगन्धित पूर्णसे ही व्याप्त हो गया हो ।॥ ७९।। धीरे धीरे लोग नगरकी गलियोंको छोड़कर आगे निकल गये जिससे खाली हुई वे गलियां ऐसी जान पड़ती थीं मानो ज्वारभाटासे उठी हुई लहरोंके चले जानेपर खाली हुई समुद्र के किनारे की भूमि ही हों ॥८०।। उस समय बड़े बड़े मकानोंके झरोखों में खड़ी हुई नगर-निवासिनी स्त्रियों के द्वारा अपने अपने कटाक्षोंके साथ छोड़ी हुई पुष्पाञ्जलियां महाराज भरतके ऊपर पड़ रही थीं ॥८१॥
श्लोक 82 से 91 : नगर से प्रस्थान और सेना की शोभा
हे ईश, आपकी जय हो, हे विजय करनेवाले महाराज, आप संसारका विजय करें और दशों दिशाओंको जीतें; इस प्रकार सैकड़ों पुण्याशीर्वादोंके द्वारा नगरनिवासी लोग भरतकी पूजा कर रहे थे उनके प्रति सन्मान प्रकट कर रहे थे ।।८२।। इस प्रकार उस समय होनेवाली अयोध्याकी उत्कृष्ट विभूतिको देखने हुए सम्म्राट् भरत धीरे धीरे रत्नोंके तोरणोंसे देदीप्यमान गोपुरद्वारको प्राप्त हुए ॥८३॥ उस समय महाराज भरतको नगरके बाहर अपने आगे पीछे और साथ साथ जहांतक दृष्टि पड़ती थी वहां तक असंख्यात सेना ही सेना दिखाई पड़ती थी ।॥८४॥ जगत्की उत्पत्तिके घरके समान उस अयोध्यापुरीसे वह सेना गोपुरद्वारको रोकती हुई बड़ी कठिनतासे धीरे धीरे बाहर निकली ॥८५।। क्या यह प्रलय कालके क्षोभसे क्षोभको प्राप्त हुआ समुद्रका जल है ? अथवा यह तीनों लोकोंकी नवीन सुष्टि उत्पन्न हो रही है ? इस प्रकार आशंका कर आकाशमें खड़े हुए देव लोग जिसे बड़े आश्चर्य के साथ देख रहे हैं ऐसी चक्रवर्तीकी वह सेना नगरसे निकल कर चारों ओर फैल गई ।।८६-८७।। तदनन्तर जिन्होंने सबसे पहले पूर्व दिशाको जीतनेका उद्योग किया है ऐसे महाराज भरतने चक्ररत्नके पीछे-पीछे जाते हुए पूर्वकी ओर मुख कर प्रयाण किया ॥८८॥ सूर्यमण्डल के समान देदीप्यमान और चारों ओरसे देव लोगोंके द्वारा घिरा हुआ जाज्वल्यमान चक्ररत्न आकाशमें भरतेश्वरके आगे-आगे चल रहा था ।।८९।। जिस प्रकार मुनियोंका समूह गुरुकी इच्छानुसार चलता है उसी प्रकार निधियोंके स्वामी महाराज भरतकी वह सेना चक्ररत्न की इच्छानुसार उसके पीछे पीछे चल रही थी । ९० ।। दण्डरत्नको आगे कर सेनापति सबसे आगे चल रहा था और वह ऊंचे नीचे दुर्गम वनस्थलोंको लीलापूर्वक एकसा करता जाता था ।।९१।।
श्लोक 92 से 101 : मार्ग की प्राकृतिक शोभा
आगे चलनेवाला दण्डरत्न सब मार्गको राजमार्गके समान विस्तृत और सम करता जाता था इसलिये वह सेना किसी भी जगह स्खलित न होती हुई इच्छानुसार जा रही थी ॥९२॥ तदनन्तर मार्ग में प्रजापति-भरतने दिशाओं को अलंकृत करनेवाली अपनी कीतिके समान निर्मल शरद् ऋतुकी शोभा देखी ॥ ९३।। शरद् ऋतुरूपी लक्ष्मीके मुखके समान जो सरोवर कमल की सुगन्धि छोड़ रहे थे उन्हें देखकर महाराज भरत बहुत ही प्रसन्न हुए ॥९४॥ सरोवरोंके किनारेपर मधुर शब्द करते हुए और मृणालरूपी मक्खन खाकर पुष्ट हुए हंसोंको भरतेश्वर ने शरऋतुके पुत्रोंके समान देखा ।।१५।। जो हंस अपनी चोंचसे मृणालको उठाकर हंसीके लिये दे रहा था उसने, सब राजाओंमें श्रेष्ठ इन भरत महाराज के हृदयमें बड़ा भारी संतोष उत्पन्न किया था ।।९६।। जो चकवा लहरोंसे रुकी हुई चकवीको न देखकर सरोवरके चारों ओर शब्द कर रहा था उसने भी भरतके मनकी प्रीतिको अत्यन्त विस्तृत किया था ॥ ९७।। एक तरुण हंसने कमल केशरकी धूलिसे पीली हुई अपनी हंसीको चकवी समझकर भूलसे छोड़ दिया था महाराज भरतने यह भी देखा ।।१८।। लहरोंसे जिसका शरीर सफेद हो गया है ऐसी चकवीको हंसी समझकर और उसपर मोहित होकर एक बूढ़ा हंस उसके पीछे-पीछे दौड़ रहा था–महाराज भरतने यह भी देखा ।।९९।। जिनकी सीमाएं अत्यन्त पवित्र हैं जो हंस तथा सारस आदि पक्षियोंसे मनोहर हैं, और जो विछी हुई शय्याओंके समान जान पड़ते हैं ऐसे नदी-किनारे के प्रदेशोंपर महाराज भरतको भारी संतोष हुआ ॥१००॥ जो किनारेपर लगी हुई लताओं के अग्रभागसे गिरे हुए फूलों के समूहसे सुशोभित हो रही हैं और जो जलके प्रवाह से उठी हुई लहरोंसे व्याप्त हैं ऐसी नदियोंके किनारेकी भूमि भी भरतेश्वरने बड़े प्रेमसे देखी थी ॥१०१॥
श्लोक 102 से 111 : मार्ग के दृश्य
जिनमें अपने आप गिरे हुए फूलोंके समूहसे शय्याएं बनी हुई हैं ऐसे रमणीय लतागृहोंको देखते हुए भरतको उनमें भारी प्रीति उत्पन्न हुई थी ॥१०२॥ उन भरत महाराज ने कहीं कहीं पर लतागृहों के भीतर पड़ी हुई चन्द्रकान्ति मणिकी शिलाओंपर बैठे हुए और अपना यशगान करनेमें लगे हुए किन्नरोंको देखा था ।।१०३।। कहीं कहींपर लताओंके फूलोंपर बैठे हुए भूमरों के समूहों को देखकर जिनकी चोटियां ढीली होकर नीचेकी ओर लटक रही हैं ऐसी “प्रिय स्त्रियोंका स्मरण करता था ।।१०४।। जिनकी शाखाओंके अग्रभाग वायुसे हिल रहे हैं ऐसे फूले हुए मार्ग के वृक्ष मानो बड़े प्रेमसे ही भरत महाराजके मस्तकपर फूलोंकी वर्षा कर रहे थे ॥१०५॥ वह भरत मार्ग के दोनों ओर लगे हुए जिन वृक्षोंको देखते जाते थे वे वृक्ष राजाओंका अनुकरण कर रहे थे क्योंकि जिस प्रकार राजा सच्छाय अर्थात् उत्तम कान्तिसे सहित होते हैं उसी प्रकार वे वृक्ष भी सच्छाय अर्थात् उत्तम छांहीसे सहित थे, जिस प्रकार राजा सफल अर्थात् अनेक प्रकारकी आयसे सहित होते हैं उसी प्रकार वे वृक्ष सफल अर्थात् अनेक प्रकारके फत्रोंसे सहित थे, जिस प्रकार राजा तुङ्ग अर्थात् उदार प्रकृतिके होते हैं उसी प्रकार वे वृक्ष भी तुङ्ग अर्थात् ऊंचे थे और जिस प्रकार राजाओंकी सम्पदाएं सबके उपभोगमें आती हैं उसी प्रकार उन वृक्षोंकी फल पुष्प पल्लव आदि सम्पदाएं भी सबके उपभोगमें आती थीं ।॥१०६ जो सरोवरोंके किनारेकी भूमियां कमलोंकी परागसे व्याप्त हो रही थीं और इसीलिये जो पथिकों के हृदयमें क्या यह सुवर्णकी धूलियोंसे व्याप्त हैं, इस प्रकार शंका कर रहीं थीं; उन्हें भी महाराज भरत देखते जाते थे ।।१०७।। सेनाकी धूलिसे भरे हुए और इसीलिये रात्रिके समान जान पड़नेवाले आकाशमें रात्रि समझ कर रोती हुई चकवीको देखकर महाराज भरतके हृदय में बड़ी दया उत्पन्न हो रही थी ॥ १०८॥ कुछ आगे चलकर उन्होंने जंगलोंकी गोचरभूमिमें चरते हुए गायोंके समूह देखे, वे गायों के समूह दूधके मेधोंके समान निरन्तर झरते हुए दूधसे अपनी समीपवर्ती भूमिको तर कर रहे थे ।।॥१०९॥ जिन्होंने अपने सींगोंके अग्रभागसे स्थलकमल उखाड़ डाले हैं और जो अपने यशके समान उनकी मृणालोंको जहां तहां फेंक रहे हैं ऐसे उन्मत्त बैल भी भरत महाराजने देखे थे ।। ११०।। दूधसे पालन पोषण होनेके कारण ही मानो जिनका निर्मल सफेद शरीर है, जो चंचलताकी अन्तिम सीमाके समान जान पड़ते हैं और जो बार बार उछल-कूद रहे हैं ऐसे गायोंके बछडोंके समूह भी भरतेश्वर देखते जाते थे ।।१११।।
श्लोक 112 से 121 : खेतों और ग्रामीण जीवन की शोभा
भरत महाराज पकी हुई बालोंसे नम्रीभूत हुए धानोंके खेत भी देखते जाते थे, उस समय वे खेत ऐसे मालूम होते थे मानो ‘लोगोंको उद्धतपना फल देनेवाला नहीं है’ यही कहने के लिये तैयार हुए हों ॥ ११२।। जो खेतके भीतर उत्पन्न हुए कमलोंको सूंघनेके लिये ही मानो नम्रीभूत हो रहे हैं ऐसे खेतोंमें लगे हुए धानके पौधोंको देखकर भरत महाराज परम आनन्दको प्राप्त हो रहे थे ॥११३॥ उन्होंने खेतकी भूमियोंमें फलों के भारसे झुके हुए धानके उन पौधोंको भी देखा था जो कि अपने जन्म देने के कारण खेतोंको बड़े आदरके साथ नमस्कार करते हुएसे जान पड़ते थे ।। ११४।। उन्होंने जहां तहां फैली हुई धानरूप सम्पदाओं को गायोंके समान देखा था, क्योंकि जिस प्रकार गायें जल पीती हैं उसी प्रकार धान भी जल पीते हैं (जलसे भरे हुए खेतोंमें पैदा होते हैं) जिस प्रकार गायोंमें उत्तम दूध भरा रहता है उसी प्रकार धानोंमें भी पकने के पहले दूध भरा रहता है और गायें जिस प्रकार लोगोंका उपकार करती हैं उसी प्रकार धान भी लोगोंका उपकार करते हैं ।। ११५॥ जिन्होंने नाल सहित कमलोंको अपने कर्णका आभूषण बनाया है, कमलकी पराग जिनके स्तनोंपर पड़ रही है, जो हाथमें ईखका दंडा लिये हुए हैं और जो धान रखाने के लिये ‘छो छो’ शब्द कर रही हैं ऐसी स्त्रियों को भी उन्होंने देखा था ।। ११६।। जो अपने मनोहर गीतोंके शब्दोंसे खिचकर आये हुए हंसों के समूहोंसे घिरी हुई हैं ऐसी धानकी रक्षा करनेवाली नवीन स्त्रियां भरत महाराजके नेत्रोंका आनन्द बढ़ा रही थीं ।।११७।। जो पथिकों को रोकनेवाले सुन्दर गीत गा रही हैं और जिन्होंने धानकी वालोंसे कर्णभूषण बना कर धारण किये हैं ऐसी धानकी रखानेवाले स्त्रियोंको भरत ने बड़े प्रेमसे देखा था ।।११८।। जो अपने मुखकी सुगन्धित निःश्वाससे आये हुए भूमरोंसे व्याकुल हो रही हैं ऐसी धान रखानेवाली कुलीन लड़कियां महाराज भरतके मनको हरण कर रही थीं ।। ११९।। जो सेनाके लोगोंसे मार्गके समीपवर्ती खेतोंकी रक्षा करनेके लिये उनके चारों ओर दौड़ रहे हैं और सेनाके लोगोंकी जबर्दस्ती करनेपर खेद खिन्न हो रहे हैं ऐसे खेतोंके मालिक किसानोंको भी भरतेश्वरने बड़े कौतुकके साथ देखा था ।। १२० ।। जो खेत काटनेवाले इधर-उधर घूमते हुए किसानोंसे व्याप्त हो रहीं हैं ऐसी प्रत्येक ग्रामोंके चारों ओरकी निकट-वर्ती भूमियोंको भी भरतेश्वरने देखा था ।।१२१॥
श्लोक 122 से 128 : ग्रामों और गंगा की ओर प्रस्थान
जो स्पष्ट दिखनेवाले गायोंके खुरोंके चिह्नोंसे ऊंचे नीचे हो रहे हैं और जो अत्यन्त सकड़े हैं ऐसे कुछ कुछ कीचड़से भरे हुए गांवके समीपवर्ती मार्गोको भी भरत महाराज देखते जाते थे ।। १२२।। उन्होंने ग्रामोंके चारों ओर खड़े हुए महाबलवान् गांवके मुखिया लोगोंको देखा था तथा पक्षी तिर्यञ्च और मनुष्यों के द्वारा सेवा करने योग्य बड़े बड़े बगीचों के वृक्ष भी देखे थे ॥ १२३।। जो जहां तहां लौकी अथवा तुरई की लताओंके फूलों से ढकी हुई वाड़ियोंसे घिरे हुए हैं और जिनपर एकसे दूसरेपर मरगा भी उड़कर जा सकता है ऐसे गावोंको वे दूरसे ही छोड़ते जाते थे ।। १२४।। झोपड़ियोंके समीपम फल और फूलोंसे झुक्की हुई फूलों सहित उत्तम लताओंको देखते हुए महाराज भरतको बड़ा आनन्द आ रहा था ॥ १२५।। जो सुवर्णकी मालाओं और कड़ोंसे अलंकृत हैं तथा वाड़ियोंकी ओटमें खड़ी हुई हैं ऐसी गांवोंकी स्त्रियां भी देखनेवाले भरतका मन हरण कर रही थीं ।। १२६।। गांवों के बड़े बड़े लोग घीके घड़े, दही के पात्र और अनेक प्रकारके फल भेंट कर उनके दर्शन करते थे ।।१२७।। तदनन्तर धीरवीर भरत सेनासहित कितनी ही मंजिलों द्वारा लम्बा मार्ग तय कर गङ्गा नदी के समीप जा पहुंचे ।। १२८।।
श्लोक 129 से 147 : गंगा नदी का वर्णन
वहां जाकर उन्होंने गङ्गा नदीको देखा, जोकि उनकी कीर्तिके समान सुशोभित हो रही थी क्योंकि जिस प्रकार उनकी कीति हिमवान् पर्वतसे धारण की गई थी उसी प्रकार गङ्गा नदी भी हिमवान् पर्वतसे धारण की गई थी, जिस प्रकार उनकी कीर्ति पूज्य और उत्तम थी उसी प्रकार गङ्गा नदी भी पूज्य तथा उत्तम थी, जिस प्रकार उनकी कीति समुद्र तक गमन करनेवाली थी उसी प्रकार गङ्गा नदी भी समुद्र तक गमन करनेवाली थी, जिस प्रकार उनकी कीतिका प्रवाह पवित्र था उसी प्रकार गङ्गा नदीका प्रवाह भी पवित्र था और जिस प्रकार उनकी कीर्ति कल्पान्त काल तक टिकनेवाली थी उसी प्रकार गङ्गा नदी भी कल्पान्त काल तक टिकनेवाली थी। अथवा जो गङ्गा किसी स्त्रीके समान जान पड़ती थी, क्योंकि मछलियां ही उसके नेत्र थे, उठती हुई तरंगें ही भौहोंका नचाना था और दोनों किनारों के वनकी पंक्ति ही उसकी साड़ी थी। जो स्त्रियों के जवन भाग के समान सुन्दर किनारोंसे सहित थी, उसके वे किनारे बहुत ही बड़े थे। शब्द करती हुई हंसोंकी माला ही उनकी करधनी थी और लहरें ही उनके वस्त्र थे। चञ्चल लहरों रूपी हाथोंके द्वारा उड़ाये हुए पक्षि-समूहों के मनोहर शब्दोंसे जो ऐसी जान पड़ती थी मानो किनारे के वृक्षोंके साथ कुछ वार्तालाप करने के लिये प्रयत्न ही कर रही हो। जो अपनी छलकती हुई लहरोंसे ऐसी जान पड़ती थी मातो तटरूनी नितम्ब प्रदेशपर जंगली हाथियोंके द्वारा किये हुए दातों के घावोंको समुद्ररूप पतिके डरसे शोभायमान लहरोंरूपी वस्त्रसे ढक ही रही हो। जो दोनों ओर लगी हुई हरी भरी वनश्रेणियों के प्रकट करने तथा साफ साफ दिखाई देनेवाली भंवरोंसे ऐसी जान पडती थी मानों किसी स्त्रीकी तरह अपने समुद्ररूप पतिके लिये रोमराजि और नाभि ही दिखला रही हो । जो चंचल लहरोंके संघटनसे उड़ी हुई पक्षियोंकी पंक्तिको धारण कर रही थी और उससे ऐसी जान पड़ती थी मानो सब नदियोंको जीत लेनेसे प्राप्त हुई विजय पताकाको ही धारण कर रही हो। जो किसी उत्तम गायकी हँसी करती हुई सी जान पड़ती थी क्योंकि जिस प्रकार उत्तम गाय समांसमीना अर्थात् प्रति वर्ष प्रसव करनेवाली होती है उसी प्रकार वह नदी भी समांस-मीना अर्थात् परिपुष्ट मछलियोंसे सहित थी, जिस प्रकार उत्तम गायमें पर्याप्त पय अर्थात् दूध होता है उसी प्रकार उस नदीमें भी पर्याप्त पय अर्थात् जल था, जिस प्रकार उत्तम गाय गम्भीर शब्द करती है उसी प्रकार वह भी गम्भीर कल-कल शब्द कर रही थी, उत्तम गाय जिस प्रकार जगत्को पवित्र करनेवाली है उसी प्रकार वह भी जगत्को पवित्र करनेवाली थी और उत्तम गाय जिस प्रकार पूज्य होती है उसी प्रकार वह भी पूज्य थी। अथवा जो जिनवाणीके समान जान पड़ती थी क्योंकि जिस प्रकार जिनवाणी गुरु-प्रवाह अर्थात् आचार्य परम्परासे प्रसूत हुई है उसी प्रकार वह भी गुरुप्रवाह अर्थात् बड़े भारी जलप्रवाहसे प्रसृत हुई थी-प्रवाहित हुई थी। जिस प्रकार जिन वाणी तीर्थ अर्थात् धर्मकी इच्छा करनेवाले पुरुषों के द्वारा उपासित होती है उसी प्रकार वह भी तीर्थ अर्थात् पवित्र तीर्थ स्थानकी इच्छा करनेवाले पुरुषों के द्वारा उपासित होती अथवा किनारेपर रहनेवाले मनुष्य उसमें स्नान आदि किया करते थे, जिस प्रकार जिनवाणीसे गंभीर शब्दोंकी उत्पत्ति होती है उसी प्रकार उससे भी गंभीर अर्थात् बड़े जोरके शब्दों की उत्पत्ति होती थी, और जिस प्रकार जिनवाणी मल अर्थात् पूर्वापर विरोध आदि दोषोंसे रहित होती है उसी प्रकार वह भी मल अर्थात् कीचड आदि गंदले पदार्थों से रहित थी । अथवा जो अपनी (भरतकी) विजयलक्ष्मी के समान जान पड़ती थी क्योंकि जिस प्रकार विजयलक्ष्मीकी उपासना राजहंस अर्थात् बड़े बड़े राजा लोग करते थे उसी प्रकार उस नदीकी भी उपासना राजहंस अर्थात् एक प्रकारके हंस विशेष करते थे, जिस प्रकार जय-लक्ष्मीका कोई उल्लंघन अनादर नहीं कर सकता था उसी प्रकार उस नदीका भी कोई उल्लंघन नहीं कर सकता था, जयलक्ष्मीका आयति अर्थात् भविष्यत्काल जिस प्रकार स्पष्ट प्रकट था इसी प्रकार उसकी आयति अर्थात् लम्बाई भी प्रकट थी, जयलक्ष्मी जिस प्रकार स्फीत अर्थात् विस्तृत थी उसी प्रकार वह भी विस्तृत थी और जयलक्ष्मी जिस प्रकार समुद्र तक गई थी उसी प्रकार वह गंगा भी समुद्र तक गई हुई थी। अथवा जो भरतकी राज्यलक्ष्मी के समान मालूम होती थी क्योंकि जिस प्रकार भरतकी राज्यलक्ष्मी शोभायमान पद्म अर्थात् पद्म नामकी निथिसे उत्पन्न हुई थी उसी प्रकार वह नदी भी पद्म अर्थात् पद्म नामके सरोवरसे उत्पन्न हुई थी, भरतकी राज्य-लक्ष्मी जिस प्रकार जनसमूहको आनन्द देनेवाली थी उसी प्रकार वह भी जनसमूहको आनन्द देनेवाली थी, भरतकी राज्यलक्ष्मी जिस प्रकार जगत्के भोगने योग्य थी उसी प्रकार वह भी जगत्के भोगने योग्य थी, और भरतकी लक्ष्मी जिस प्रकार आयति अर्थात् उत्तरकालसे सुशोभित थी उसी प्रकार वह आयति अर्थात् लम्बाईसे सुशोभित थी। अथवा जो भरतकी सेनाके समान थी, क्योंकि जिस प्रकार भरतकी सेना विजयार्थ पर्वतके तटपर आक्रमण करनेसे प्रशंसाको प्राप्त हुई थी उसी प्रकार वह नदी भी विजयार्थ पर्वतके तटपर आक्रमण करनेसे प्रशंसाको प्राप्त हुई थी (गङ्गा नदी विजयार्थ पर्वतके तटको आक्रान्त करती हुई बही है), जिस प्रकार भरतकी सेनाका वेग तेज था उसी प्रकार उस नदीका वेग भी तेज था। जिस प्रकार भरत की सेनाके फैलावको कोई नहीं रोक सकता था उसी प्रकार उसके फैलावको भी कोई नहीं रोक सकता था और भरतकी सेना जिस प्रकार दिव्य अर्थात् सुन्दर थी उसी प्रकार वह नदी भी सुन्दर थी । जो चंचल लहरों रूपी हाथोंसे स्पर्श किये गये और अंकुररूपी रोमांचोंको धारण किये हुए अपने किनारेके वनके वृक्षोंसे आश्रित थी और उससे ऐसी मालूम होती थी मानो कामी जनोंसे आश्रित कोई स्त्री ही हो। जो जलकणोंसे उत्पन्न हुए तथा चारों ओर फैलते हुए मनोहर शब्दोंसे अपनी इच्छानुसार किनारे परके लतागृहोंमें बैठे हुए देव देवांगनाओंकी हँसी करती हुई सी जान पड़ती थी। किन्नरोंके मधुर शब्दवाले गायन तथा वीणाकी भनकारसे सेवनीय किनारेकी पृथिवीपर बने हुए लतागृहोंसे जो बहुत ही अधिक सुशोभित हो रही थी।-किन्नर देवोंके मनोहर गानोंसे बुलाई हुई और सुखसे ग्रीवाको लम्बा कर बैठी हुई हरिणयों को जो अपने किनारेकी भूमिपर धारण कर रही थी। जिनपर सारस पक्षी कतार बांधकर मनोहर शब्द कर रहे हैं ऐसे अपने बड़े बड़े सुन्दर किनारोंसे जो देवांगनाओंके करधनी सहित नितम्बोंकी हँसी करती हुई सी जान पड़ती थी। जिन्होंने आलिंगन करनेके लिये तरंगरूपी भुजाएं ऊपरकी ओर उठा रखी हैं ऐसी सखियोंके समान जो चौदह हजार सहायक नदियोंसे सहित है। इस प्रकार जिसकी शोभा प्रकट दिखाई दे रही है और जो हिमवान् पर्वतके द्वारा समुद्रके लिये भेजी हुई कण्ठमालाके समान जान पड़ती है ऐसी गङ्गा नदी महाराज भरतने देखी ।।१२९-१४७।।
श्लोक 148 से 150 : गंगा की शोभा और भरत का आनंद
शरऋतुके द्वारा जिसकी कान्ति बढ़ गई है, किनारेके वनोंकी पंक्ति ही जिसके वस्त्र हैं, जो बालूके टीलेरूप नितम्बोंसे बहुत ही रमणीय जान पड़ती हैं, गंभीर भंवर ही जिसकी नाभि है और इस प्रकार जो एक तरुण स्त्रीके समान जान पडती है ऐसी गङ्गा नदीको देखते हुए राजा भरतने अनुपम आनन्द धारण किया था ।।१४८।। जो कमलोंकी मकरन्दसे सुगन्धित है, कुछ कुछ कम्पित हुए किनारेके यनके पल्लवोंके धीरे धीरे हिलनेसे जिसका मन्दपना प्रकट हो रहा है और जो गङ्गा नदीकी तरंगोंको बार-बार हिला रहा है ऐसा वहांका वायु रानियोंके मार्गके परिश्रमको हरण कर रहा था ॥१४९।। वह गङ्गा ठीक जिनेन्द्रदेवकी कीर्तिके समान थी क्योंकि जिस प्रकार जिनेन्द्र देवकी कीर्तिने समस्त दिशाओं को व्याप्त किया है उसी प्रकार गङ्गा नदीने भी पूर्व दिशाको व्याप्त किया था, जिनेन्द्र भगवान् की कीर्तिने जिस प्रकार रज अर्थात् पापोंका नाश किया है उसी प्रकार गङ्गा नदीने भी रज अर्थात् धूलिका नाश किया था, जिनेन्द्र भगवान्की कीति जिस प्रकार जगत्को पवित्र करती है उसी प्रकार गङ्गा नदी भी जगत्को पवित्र करती है, जिनेन्द्र भगवान्की कीति जिस प्रकार द्विज कुंजर अर्थात् श्रेष्ठ ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्योंके द्वारा सेवित है उसी प्रकार गङ्गा नदी भी द्विज कुंजर अर्थात् पक्षियों और हाथियोंके द्वारा सेवित है, जिनेन्द्र भगवान्की कीति जिस प्रकार निरन्तर संसार-भूमण-जन्य संतापको दूर करती है उसी प्रकार गङ्गा नदी भी सूर्यकी किरणोंसे उत्पन्न संतापको नष्ट करती थी और जिनेन्द्र भगवान्की कीति जिस प्रकार विस्तृत, निर्मल और सदा लोगोंको आनन्द देनेवाली है उसी प्रकार वह गङ्गा नदी भी विस्तृत, निर्मल तथा सदा लोगोंको आनन्द देती थी। इस प्रकार उस गङ्गा नदीको देखते हुए निधियोंके स्वामी भरत महाराज परम प्रीतिको प्राप्त हुए थे ।।१५०।।
इस प्रकार भगवज्जिनसेनाचार्य प्रणीत त्रिषष्टि लक्षण महापुराण संग्रहके हिन्दी-भाषानुवादमें भरतराजकी दिग्विजयके उद्योगको वर्णन करनेवाला छब्बीसवां पर्व पूर्ण हुआ ।
हिन्दी-भाषानुवाद
आदिपुराण सारांश
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27
Download PDF
आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena
आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena