आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81
श्लोक 82 से 91 देवियों की शोभा
एकावली से वे सखी सी शोभायमान थीं, जो कंठ और स्तनों को स्पर्श करती थी। नक्षत्रमाला उनके स्तनों के बीच हँसती सी लगती थी। उनकी भुजलताएँ नखों की किरणों से शोभायमान थीं। उनके मुखरूपी चंद्रमा मंद हास्य से चाँदनी बढ़ाते थे। उनके नेत्र भ्रमरों से युक्त कमल से शोभायमान थे। उनकी भौंहें कामदेव के धनुष से सुंदर थीं। उनके कान नीलकमल कर्णभूषणों से शोभायमान थे। उनके ललाट के अलक सुवर्णपट्टक पर इंद्रनील से लगते थे। उनके केशपाश काले साँपों से सफेद साँपों को उगलते से प्रतीत होते थे। वे मधुर और आभूषणों से उज्ज्वल कल्पलताएँ सी थीं।
English translation of Ādi purāṇa parv 15 – Shlok 82 to 91
श्लोक ( Shlok ) 82
एकावल्या स्तनोपान्तस्पर्शिन्या ते विरेजतुः । सख्येव कण्ठसंगिन्या स्वच्छया स्निग्धमुक्त्या ॥ ८२।
गले में पड़े हुए एकावली अर्थात् एकल के हार से वे दोनों ऐसी शोभायमान हो रही थीं मानो किसी सखी के संबंध से ही शोभायमान हो रही हों; क्योंकि जिस प्रकार सखी स्तनों के समीपवर्ती भाग का स्पर्श करती है उसी प्रकार वह एकावली भी उनके स्तनों के समीपवर्ती भाग का स्पर्श कर रही थी, सखी जिस प्रकार कंठ से संसर्ग रखती है अर्थात् कंठालिंगन करती है उसी प्रकार वह एकावली भी उनके कंठ से संसर्ग रखती थी अर्थात् कंठ में पड़ी हुई थी, सखी जिस प्रकार स्वच्छ अर्थात् कपटरहित―निर्मल हृदय होती है उसी प्रकार वह एकावली भी स्वच्छ―निर्मल थी और सखी जिस प्रकार स्निग्धमुक्ता होती है अर्थात् स्नेही पति के द्वारा छोड़ी―भेजी जाती हैं, उसी प्रकार वह एकावली भी स्निग्धमुक्ता थी अर्थात् चिकने मोतियों से सहित थी ।।82।।
“The single-strand pearl necklaces (ekāvalī) adorning their necks made them appear as if they were radiating beauty through the companionship of a dear friend. Just as a friend affectionately touches the area near the bosom, the ekāvalī too gently rested close to their breasts. Just as a friend embraces the neck in affection, the ekāvalī gracefully encircled their throats. Like a true friend, who possesses a pure and guileless heart, the ekāvalī was also pristine and untainted. And just as a devoted friend is lovingly sent forth by a caring husband, the ekāvalī too was adorned with smooth, lustrous pearls, exuding warmth and affection.” ( 82)
श्लोक ( Shlok ) 83
हारं नक्षत्रमालाख्यं ते स्तनान्तरलम्बिनम् । दधतुः कुचसंस्पर्शाद्धसन्तमिव रोचिषा ।।८३।।
वे देवियाँ अपने स्तनों के बीच में लटकते हुए जिस नक्षत्रमाला अर्थात् सत्ताईस मोतियों के हार को धारण किये हुई थीं वह अपनी किरणों से ऐसा मालूम होता था मानो स्तनों का स्पर्श कर आनंद से हँस ही रहा हो ।।83।।
“The celestial maidens wore a nakshatra-mala—a necklace of twenty-seven pearls—gracefully hanging between their breasts. The radiant glow of the pearls made it seem as if the necklace itself was laughing with joy upon touching their bosoms.” ( 83)
श्लोक ( Shlok ) 84
मृदू भुजलते चार्व्या वधिषातां सुसंहते । नखांशुकुसुमोद्भेदै र्दधाने हसितश्रियम् ।।८४।।
वे देवियाँ नखों की किरणोंरूपी पुष्पों के विकास से हास्य की शोभा को धारण करने वाली कोमल, सुंदर और सुसंगठित भुजलताओं को धारण कर रही थीं ।।84।।
“The divine maidens possessed delicate, beautiful, and gracefully proportioned arms, resembling creeping vines. Their hands radiated the charm of a blossoming smile, as if adorned with flower-like rays emanating from their nails.” ( 84)
श्लोक ( Shlok ) 85
मुखेन्दुरेनयोः कान्तिमधान्मुग्धस्मितांशुभिः । ज्योत्स्नालक्ष्मी समातन्वन् जगतां कान्तदर्शनः ॥८५
उन दोनों के मुखरूपी चंद्रमा भारी कांति को धारण कर रहे थे, वे अपने सुंदर मंद हास्य की किरणों के द्वारा चाँदनी की शोभा बढ़ा रहे थे, और देखने में संसार को बहुत ही सुंदर जान पड़ते थे ।।85।।
“Their moon-like faces radiated a brilliant glow, enhancing the beauty of moonlight with the soft beams of their gentle smiles. Their appearance made the world seem even more enchanting.” ( 85)
श्लोक ( Shlok ) 86
सुपक्ष्मणी तयोर्नेत्रे रेजाते स्निग्धतारकें । यथोत्पले समुत्फुल्ले केसरालग्नषट्पदे ।॥८६॥
उत्तम बरौनी और चिकनी अथवा स्नेहयुक्त तारों से सहित उनके नेत्र ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो जिनके केश पर भ्रमर आ लगे हैं ऐसे फूले हुए कमल ही हों ।।86।।
“Their eyes, adorned with exquisite eyelashes and smooth, glistening pupils, shone beautifully, resembling fully bloomed lotuses upon which bees had gently settled.” (86)
श्लोक ( Shlok ) 87
‘नामकर्मविनिर्माणरुचिरे सुभ्रुवोर्भुवौ । चापयष्टिरनङ्गस्य नानुयातुमलं तराम् ॥८७॥
सुंदर भौंहों वाली उन देवियों की दोनों भौंहें नामकर्म के द्वारा इतनी सुंदर बनी थीं कि कामदेव की धनुषलता भी उनकी बराबरी नहीं कर सकती थीं ।।87।।
“The beautifully browed divine maidens had such exquisitely shaped eyebrows that even the delicate bow of Kamadeva (the god of love) could not compare to their elegance.” (87)
श्लोक ( Shlok ) 88
नीलोत्पलवतंसेन तरकर्णों दधतुः श्रियम् । मिथः प्रमित्सुने वोच्चैरायतिं नयनाब्जयोः ॥८८॥
उन महादेवियों के कान नीलकमलरूपी कर्ण-भूषणों से ऐसी शोभा धारण कर रहें थे मानो नेत्ररूपी कमलों की अतिशय लंबाई को परस्पर में नापना ही चाहते थे ।।88।।
“The ears of those divine maidens, adorned with blue-lotus-shaped earrings, appeared so enchanting as if they wished to measure the extraordinary length of their lotus-like eyes.” ( 88)
श्लोक ( Shlok ) 89
ते ललाटतटालम्बानलकानू हतुर्भ्रंशम् । सुवर्णपट्टपर्यन्तखचितेन्द्रोपलत्विषः ॥८९॥
वे देवियाँ अपने ललाट-तट पर लटकते हुए जिन अलकों को धारण कर रही थीं वे सुवर्णपट्टक के किनारे पर जड़े हुए इंद्रनील मणियों के समान अत्यंत सुशोभित हो रहे थे ।।89।।
“The divine maidens had locks of hair gracefully falling upon their foreheads, appearing as exquisite as sapphire gems embedded along the edge of a golden diadem.” ( 89)
श्लोक ( Shlok ) 90
स्त्र स्तस्त्रक्कबरीबन्धस्तयोरुत्प्रेक्षितो जनैः । कृष्णाहिरिव शुक्लाहिं निगीर्य पुनरुद्रि रन् ॥९०॥
जिन पर की पुष्प मालाएँ ढीली होकर नीचे की ओर लटक रही थीं ऐसे उन देवियों के केशपाशों के विषय में लोग ऐसी उत्प्रेक्षा करते थे कि मानो कोई काले साँप सफेद साँप को निगलकर फिर से उगल रहे हों ।।90।।
“The flower garlands adorning their hair had loosened and gracefully hung downward. Observing this, people imagined that it was as if black serpents had swallowed white serpents and were now regurgitating them.” ( 90)
श्लोक ( Shlok ) 91
इति स्वभावमधुरामाकृति भूषणोज्ज्वलाम् । दधाने दधतुर्लीलां कल्पवल्ल्योः स्फुरत्विषोः ॥९१॥
इस प्रकार स्वभाव से मधुर और आभूषणों से उज्जवल आकृति को धारण करने वाली वे देवियाँ कांतिमती कल्पलताओं की शोभा धारण कर रही थीं ।।91।।
“Thus, possessing naturally sweet dispositions and radiant appearances adorned with jewels, those divine maidens shone with the splendor of luminous celestial creepers.” ( 91)
श्लोक 92 से 101
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81