आदिपुराण पर्व 30 – पश्चिम समुद्र के द्वारका विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 34
श्लोक 35 से 50 : दक्षिण और पश्चिम की विजय
भरत ने चोल, केरल और पाण्ड्य राजाओं को परास्त कर उनसे प्रणाम करवाया। कलिंग के विशाल हाथियों ने मलय के छोटे पर्वतों को व्याप्त किया। भरत के हाथियों ने दिग्गजों को अधीन कर लिया। पश्चिम समुद्र तट के राजाओं को जीतकर उनकी सेना समुद्र के दोनों किनारों तक फैली। समुद्र की लहरें सेना के भय से आकुल प्रतीत हुईं। सह्य पर्वत की गोद में लहराता समुद्र दुखी और पराजित जान पड़ा। सेना के आघात से सह्य पर्वत के वृक्ष टूटे, शिखर क्षतिग्रस्त हुए और वह नाममात्र का अचल रहा। भरत के हाथी सह्य से तुंगवरक तक घूमे, पर्वतों को पार किया।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 30 – Shlok 35 to 50
श्लोक ( Shlok ) 35
प्रसाध्य दक्षिणामाशां विभुस्त्रैराज्य “पालकान् । समं प्रणमयामास विजित्य जयसाधनैः ॥३५॥
इस प्रकार महाराज भरतने अपनी विजयी सेनाके द्वारा दक्षिण दिशाको वश कर चोल, केरल और पाण्ड्य इन तीन राजाओंको एक साथ जीता और एक ही साथ उनसे प्रणाम कराया ।। ३५॥
“Thus, Maharaja Bharata, with his victorious army, subdued the southern direction, conquering the three kings—Chola, Kerala, and Pandya—and made them offer their obeisances to him in unison.” ॥35॥
श्लोक ( Shlok ) 36
कालिङ्ग ‘कैर्गजैरस्य मलयोपान्त भूधराः । तुलयद्भिरिवोन्मानमाक्रान्ताः स्वेन वर्ष्मणा ॥३६॥
जो अपने शरीरसे मानो मलय पर्वतकी ऊँचाईकी ही तुलना कर रहे हैं ऐसे कलिंग देशके हाथियोंने मलय पर्वतके समीपवर्ती अन्य समस्त छोटे छोटे पर्वतोंको व्याप्त कर लिया था ।।३६।।
“The elephants of the Kalinga region, whose stature seemed to rival the very height of the Malaya mountains themselves, had spread across all the smaller mountains near the Malaya range.” ॥36॥
श्लोक ( Shlok ) 37
दिशां प्रान्तेषु विश्रान्तै र्दिग्जयेऽस्य चमूगजेः । दिग्गजत्वं स्वसाच्चक्रे शोभाये तत्कथान्तरम् ॥३७॥
दिग्विजयके समय दिशाओंके अन्त भागमें विश्राम करनेवाले भरतके हाथियोंने दिग्गजपना अपने आधीन कर लिया था अर्थात् स्वयं दिग्गज बन गये थे इसलिये अन्य आठ दिग्गजोंकी कथा केवल शोभा के लिये ही रह गई थी ॥ ३७॥
“During his conquest of the quarters, Bharata’s elephants, resting at the farthest edges of the directions, had themselves assumed the stature of the mythical guardians of the quarters—diggajas—rendering the legends of the eight directional elephants mere ornamentation in comparison.” ॥37॥
श्लोक ( Shlok ) 38
ततोऽ परान्तमारुह्यं सह्याचलतटोपगा । पश्चिमार्णववेद्यान्त पालकानजयद् विभुः ॥३८॥
तदनन्तर पश्चिमी भागपर आरूढ़ होकर सह्य पर्वतके किनारे के समीप होकर जाते हुए भरत ने पश्चिम समुद्रके किनारेके राजाओंको जीता ॥३८॥
“Thereafter, ascending the western region and passing near the edge of the Sahya mountains, Bharata subdued the kings dwelling along the shores of the western ocean.” ॥38॥
श्लोक ( Shlok ) 39
जयसाधनमस्याब्धेरारात्तीरे व्यजृम्भतः । महासाधनमप्युच्चैः परं पारमवाष्टभत् ॥३९॥
भरत की वह विजयी सेना समुद्रके समीप किनारे किनारे सव जगह फैल गई थी और वह इतनी बड़ी थी कि उसने समुद्र का दूसरा किनारा भी व्याप्त कर लिया था ।। ३९॥
“Bharata’s victorious army had spread along the very edge of the sea, and so vast was its expanse that it seemed to reach and cover even the far shore of the ocean.” ॥39॥
श्लोक ( Shlok ) 40
उपसिन्धुरिति व्यक्तमुभयोस्तीरयोर्बलम् । दृष्ट्वास्य साध्वसात्क्षुभ्यन्निवाभूदाकुलाकुलः ॥४०॥
उस समय हवासे लहराता हुआ उपसमुद्र ऐसा जान पड़ता था मानो दोनों किनारेपर भरतकी सेना देखकर भयसे ही अत्यन्त आकुल हो रहा हो ॥४०॥
“At that time, the wind-stirred coastal waters seemed as though they were trembling in great agitation, struck with fear upon beholding Bharata’s army stationed on both shores.” ॥40॥
श्लोक ( Shlok ) 41
ततः स्म बलसङ्क्षोभादितो वार्धिः प्रसर्पति । इतः स्म बलसंक्षोभात् ततोऽब्धिः प्रतिसर्पति ॥४१॥
उस किनारेका उपसमुद्र सेनाके क्षोभसे इस किनारेकी ओर आता था और इस किनारेका उपसमुद्र सेनाके क्षोभसे उस किनारेकी ओर जाता था ।॥४१॥
“The coastal waters on that shore, disturbed by the army’s tumult, surged toward this shore, while the waters on this shore, likewise agitated, seemed to flee toward the other—each retreating from the might of Bharata’s forces.” ॥41॥
श्लोक ( Shlok ) 42
हरिन्मणिप्रभोत्सर्पेंस्ततमब्धेर्बभौ जलम् । चिराद् विवृत्तमस्यैव” सशैवलमधस्तलम् ॥४२॥
ऊपर फैली हुई हरे मणियोंकी कान्तिसे व्याप्त हुआ वह समुद्रका जल ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो इस समुद्रका शेवाल सहित नीचेका भाग ही बहुत समय बाद उलट-कर ऊपर आ गया हो ॥४२॥
“The waters of the ocean, radiant with the lustre of scattered green gems upon their surface, appeared as though the sea’s moss-laden depths had, after a long time, turned upward to reveal themselves in splendor.” ॥42॥
श्लोक ( Shlok ) 43
पद्मरागांशुभिर्भिन्नं क्वचनाब्धेर्व्यभाज्जलम् । क्षोभादिवास्य हृच्छीर्णमुच्चल “च्छोणितच्छटम् ॥४३॥
कहीं कहींपर पद्मराग मणियोंकी किरणोंसे व्याप्त हुआ समुद्रका जाल ऐसा जान पड़ता था मानों सेनाके क्षोभसे समुद्रका हृदय ही फट गया हो और उसीसे खूनकी छटाएँ निकल रही हों ।॥४३॥
“In places where the ocean was suffused with the crimson rays of padmarāga gems, its waters appeared as though, distressed by the army’s tumult, the very heart of the sea had burst open, spilling forth hues of blood.” ॥43॥
श्लोक ( Shlok ) 44
सह्योत्सङगे लुठन्नब्धिर्नूनं दुःखं न्यवेदयत् । सोऽपि सन्धारयन्नेनं बन्धुकृत्यमिवातनोत् ॥४४।।
सह्य पर्वतकी गोदमें लोटता हुआ (लहराता हुआ) वह समुद्र ऐसा जान पड़ता था मानो उससे अपना दुःख ही कह रहा हो और सहह्य पर्वत भी उसे धारण करता हुआ ऐसा मालूम होता था मानो उसके साथ अपना बन्धुभाव (भाई-चारा) ही बढ़ा रहा हो ॥४४।।
“That ocean, tossing and turning in the lap of the Sahya mountain, seemed as though it were pouring out its sorrow to it; and the Sahya mountain, embracing its waves, appeared to deepen its bond of kinship with the troubled sea.” ॥44॥
श्लोक ( Shlok ) 45
असह्यैर्बलसङ्घट्टै सह्यः सह्यतिपीड़ितः । शाखोद्धारमिव व्यक्तमकरोद् रुग्णपादपैः ।॥४५॥
सेनाके असह्य संघटनोंसे अत्यन्त पीड़ित हुआ वह सह्य पर्वत अपने टूटे हुए वृक्षोंसे ऐसा जान पड़ता था मानो अपने मस्तकपर लकड़ियोंका गट्ठा रख- कर भरतके प्रति अपनी पराजय ही स्वीकृत कर रहा हो (पूर्व कालमें यह एक पद्धति थी कि पराजित राजा शिरपर लकड़ियोंका गट्ठा रखकर गलेमें कुल्हाड़ी लटकाकर अथवा मुखमें तृण दबाकर विजयी राजाके सामने जाते थे और उससे क्षमा मांगते थे । ॥४५।।
“Afflicted by the relentless assault of the army, the Sahya mountain—its trees broken and scattered—seemed as though bearing a bundle of wood upon its head, it stood before Bharata in silent submission, acknowledging its defeat.
(In ancient tradition, a vanquished king would carry a bundle of wood upon his head and a hatchet at his neck—or a blade of grass in his mouth—as a gesture of surrender before the victor.)” ॥45॥
श्लोक ( Shlok ) 46
चलत्सत्त्वो ‘गुहारन्ध्रैर्विमुञ्चन्नाकुलं स्वनम् । महाप्राणोऽद्रिरुत्क्रान्तिमियायेव बलक्षतः ॥४६॥
वह पर्वत-रूपी बड़ा भारी प्राणी सेनाके द्वारा घायल हो गया था, उसके शिखर टूट-फूट गये थे, उसका सत्त्व अर्थात् धैर्य विचलित हो गया था उसके सब सत्त्व अर्थात् प्राणी इधर-उधर भाग रहे थे, वह गुफाओंके छिद्रोंसे व्याकुल शब्द कर रहा था और इन सब लक्षणोंसे ऐसा जान पड़ता था मानो बहुत शीघ्र मरना ही चाहता हो ।।४६।।
“That mountain, as though a great living being, lay wounded by the army’s assault—its peaks shattered, its spirit shaken, its creatures fleeing in all directions. From the hollows of its caves rose distressed sounds, and all these signs made it seem as if it longed only for swift release in death.” ॥46॥
श्लोक ( Shlok ) 47
चलच्छाखी चलत्सत्त्वः चलच्छिथिलमेखलः । नाम्नैवाचलतां भेजे सोऽद्रिरेवं चलाचलः ॥४७॥
उस पर्वतके सब वृक्ष हिलने लगे थे, सब प्राणी इधर-उधर चंचल हो रहे थे- भाग रहे थे और उसके चारों ओरका मध्यभाग भी शिथिल होकर हिलने लगा था इस प्रकार वह पर्वत नाममात्रसे ही अचल रह गया था, वास्तवमें चल हो गया था ।।४७।।
“The trees of that mountain began to sway, and all its creatures, restless and scattering in all directions, were fleeing. Even the very heart of the mountain’s surroundings loosened and began to tremble. Thus, though still named a mountain, it had, in reality, become as restless and mobile as the very winds.” ॥47॥
श्लोक ( Shlok ) 48
गजतावन” सम्भोगैस्तुरङ्गखुरघट्टनैः। सह्योत्सङ्गभुवः क्षुण्णाः स्थलीभावं क्षणाद् ययुः ॥४८॥
लोगोंकी वनक्रीड़ाओंसे तथा घोड़ोंके खुरोंके संघटनसे उस सह्य पर्वतके ऊपरकी भूमि चूर चूर होकर क्षण भरमें स्थलपनेको प्राप्त हो गई थी अर्थात् जमीनके समान सपाट हो गई थी ॥४८॥
“The ground atop the Sahya mountain, shattered by the forest revelries of the people and the pounding of horse hooves, had in an instant been reduced to dust, becoming level and flat as if it were no more than the very earth itself.” ॥48॥
श्लोक ( Shlok ) 49 – 50
आपश्चिमार्णवतटादा च मध्यमपर्वतात् । आतुङ्गवरकादद्रेः तुङ्गगण्डोपलाङ्कितात् ॥४९॥ तं कृष्णगिरिमुल्लङ्घय तं च शैलं सुमन्दरम् । मुकुन्द चाद्रिमुद् द्दप्ता जयेभास्तस्य बभ्रमुः ॥५०॥
चक्रवर्ती भरतके मदोन्मत्त विजयी हाथी, पश्चिम समुद्रके किनारे से लेकर मध्यम पर्वत तक और मध्यम पर्वतसे लेकर ऊंची ऊंची चट्टानोंसे चिह्नित तुंगवरक पर्वत तक, कृष्ण गिरि, सुमन्दर तथा मुकुन्द नामके पर्वतको उल्लंघन कर, चारों ओर घूम रहे थे ।।४९-५०।।
“The victorious elephants, maddened by triumph under the command of Emperor Bharata, roamed far and wide—from the shores of the western ocean to the Middle Mountain, and from there to the towering peaks marked by the high cliffs, beyond the Krishna Hill, Sumandara, and Mukunda mountains, encircling all in their path.” ॥49-50॥
श्लोक 51 से 63
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