आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 |
श्लोक 192 से 201 क्रीड़ा और विनोद
गीत-नृत्य-वादित्र गोष्ठी। मयूर रूप में देवों को नृत्य, तोते को श्लोक, हंस को मृणाल। हाथी, मुर्ग, मल्ल, क्रौंच रूप में क्रीड़ा। दंड क्रीड़ा, यश स्तुति सुनी। रत्न चित्रावलि देखी।
English translation of Ādi purāṇa parv 14 – Shlok 192 to 201
श्लोक ( Shlok ) 192
कर्हिंचिद् गीतगोष्ठीभिर्नृत गोष्ठीभिरेकदा । कदाचिद् वाद्यगोष्टी भिर्वीणागोष्ठीभिरन्यदा ॥१९२॥
कभी गीतगोष्ठी, कभी नृत्यगोष्ठी, कभी वादित्रगोष्ठी और कभी वीणागोष्ठी के द्वारा समय व्यतीत करते थे ।।192।।
“At times, He spent His time in musical gatherings, sometimes in dance assemblies, occasionally in instrumental music sessions, and at other times in veena recitals.”
श्लोक ( Shlok ) 193
कर्हिचिद् बर्हिरूपेण नटतः सुरचेटकान् । नटयन् करतालेन लयमार्गानुयायिना ॥ १९३॥
कभी मयूरों का रूप धरकर नृत्य करते हुए देवकिंकरों को लय के अनुसार हाथ की ताल देकर नृत्य कराते थे ।।193।।
“Sometimes, taking the form of a peacock, He danced gracefully while guiding the celestial attendants to dance in rhythm with His hand gestures.”
श्लोक ( Shlok ) 194
कांश्चिच्च शुक्ररूपेण समासादितविक्रियान् । संपाठं पाठयंछलोकानम्लिष्ट मधुराक्षरम् ॥१९४॥
कभी विक्रिया शक्ति से तोते का रूप धारण करने वाले देवकुमारों को स्पष्ट और मधुर अक्षरों से श्लोक पढ़ाते थे ।।194।।
“Sometimes, using His transformative power, He taught verses with clear and melodious pronunciation to celestial youths who had taken the form of parrots.”
श्लोक ( Shlok ) 195
हंसविक्रियया कांश्चित् कूजतो मन्द्रगद्गदम् । बिसभङ्गेः स्वहस्तेन दत्तैः संभावयन्मुहुः ॥१९५॥
कभी हंस की विक्रिया कर धीरे-धीरे गद्गद बोली से शब्द करते हुए हंसरूपधारी देवों को अपने हाथ से मृणाल के टुकड़े देकर सम्मानित करते थे ।।195।।
“Sometimes, assuming the graceful movements of a swan, He uttered soft, melodious words with deep emotion and honored the celestial beings in swan form by offering them lotus stalks with His own hands.”
श्लोक ( Shlok ) 196
राजविक्रियया कांश्चिद् दक्षतः कालभीं दशाम्। “सान्त्वयन्मुहुराना र्त्थ्य [राना ध्य] करभा क्रीडयन्मुदा ॥१९६॥
कभी विक्रिया से हाथियों के बच्चों का रूप धारण करन वाले देवों को सांत्वना देकर या कुंद में प्रहार कर उनके साथ आनंद से क्रीड़ा करते थे ।।196।।
“Sometimes, comforting celestial beings who had taken the form of young elephants through His transformative power, He joyfully played with them, either by consoling them or playfully striking them with lotus stalks.”
श्लोक ( Shlok ) 197
मणिकुट्टिमसंक्रान्तैः स्वैरेव प्रतिबिम्बकैः । ‘कृकवाकूयितान् कांश्चिद् योद्धुकामान् परामृशन् ॥१९७
कभी मुर्गों का रूप धारणकर रत्नमयी जमीन में पड़ते हुए अपने प्रतिबिंबों के साथ ही युद्ध करने की इच्छा करने वाले देवों को देखते थे या उन पर हाथ फेरते थे ।।197।।
“Sometimes, taking the form of roosters, He observed celestial beings who, seeing their own reflections on the jewel-studded ground, wished to engage in battle with them, or He gently stroked them with His hand.”
श्लोक ( Shlok ) 198
मल्लविक्रियया कांश्चिद् युयुत्सूननभिद्रहः । प्रोत्साहयन्कृतास्फोटवल्गनानभिनृत्यतः ॥१९८॥
कभी विक्रिया शक्ति से मल्ल का रूप धारण कर बैर के बिना ही मात्र क्रीड़ा करने के लिए युद्ध करने की इच्छा करने वाले गंभीर गर्जना करते हुए और इधर-उधर नृत्य-सा करते हुए देवों को प्रोत्साहित करते थे ।।198।।
“Sometimes, assuming the form of a wrestler through His transformative power, He encouraged celestial beings who, without enmity, wished to engage in combat purely for play, roaring deeply and dancing around as they sparred.”
श्लोक ( Shlok ) 199
क्रौञ्चसारसरूपेण तारक्रेङ्कारकारिणाम् । शृण्वन्मनुगतं शब्दं केषांचित् श्रुतिपेशलम् ॥१९९॥
कभी क्रौंच और सारस पक्षियों का रूप धारण कर उच्च स्वर से क्रेंकार शब्द करते हुए देवों के निरंतर होने वाले कर्णप्रिय शब्द सुनते थे ।।199।।
“Sometimes, taking the form of kraunch and saras birds, He uttered loud, melodious calls while listening to the continuous, sweet sounds of the celestial beings.”
श्लोक ( Shlok ) 200
स्रग्विणः शुचिलिप्ताङ्गान् समेतान् सुरदारकान् । ‘दाण्डां क्रीडां समायोज्य नर्त्तंयंश्च कदाचन ॥२००
कभी माला पहने हुए, शरीर में चंदन लगाये हुए और इकट्ठे होकर आये हुए देव बालकों को दंड क्रीड़ा (पड़गर का खेल) में लगाकर नचाते थे ।।200।।
“Sometimes, He engaged celestial children—adorned with garlands, anointed with sandalwood paste, and gathered together—in the game of stick play (Padgar), making them dance with joy.”
श्लोक ( Shlok ) 201
अनारतं च कुन्देन्दुमन्दाकिन्यप्छटामलम् । सुरवन्दिभिरुद्रीतं स्वं समाकर्णयन् यशः ॥२०१॥
कभी स्तुति पढ़ने वाले देवों के द्वारा निरंतर गाये गये और कुंद, चंद्रमा तथा गंगा नदी के जल के छींटों के समान निर्मल अपने यश को सुनते थे ।।201।।
“Sometimes, He listened to His own pristine glory, as continuously sung by praising celestial beings, which was as pure as jasmine flowers, the moon, and the sprinkling waters of the Ganga River.”
श्लोक 202 से 209
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131