आदिपुराण पर्व 28 – पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211
श्लोक 212 से 221
भरत की विजय और पुण्य की महिमा
लोगों ने भरत को शत्रु-विजय और चिरायु होने के आशीर्वाद दिए, जो पुनरुक्त थे, क्योंकि वे पहले ही ये प्राप्त कर चुके थे। पुण्य के प्रभाव से भरत ने अगाध समुद्र को पार कर मागधदेव को वश किया। पुण्य ही जल-स्थल में शरण और सुख देता है। जिनेन्द्र द्वारा बताए गए पुण्यकर्मों—जिनपूजा, दान, व्रत, उपवास—का संचय करने की सलाह दी गई। भरत सभाभवन में सिंहासन पर विराजते हैं और गंगा के किनारे सेना के साथ सुखपूर्वक निवास करते हैं, जिनेन्द्र का स्मरण करते हुए।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 28 – Shlok 212 to 221
श्लोक ( Shlok ) 212
जीयादरीनिह भवानिति निर्जितारिर्देव प्रशाधि वसुधामिति सिद्धरत्नः । त्वं जीवताच्चिरमिति प्रथमं चिरायुरायोजि मङ्गलधिया पुनरुक्तवाक्यैः ॥२१२॥
यद्यपि भरतेश्वर शत्रुओंको पहले ही जीत चुके थे तथापि उस समय उन्हें आशीर्वाद दिया गया था कि देव, आप शत्रुओं को जीतिये, यद्यपि उन्होंने चौदह रत्नोंको पहले ही प्राप्त कर लिया था तथापि उन्हें आशीर्वाद मिला था कि हे देव ! आप पृथिवी का शासन कीजिये, और इसी प्रकार वे पहले हीसे चिरायु थे तथापि आशीर्वाद में उनसे कहा गया था कि हे देव, आप चिरकाल तक जीवित रहें-चिरायु हों । इस प्रकार मंगल समझकर लोगोंने उन्हें पुनरुक्त (कार्य हो चुकनेपर उसी अर्थको सूचित करनेके लिये फिरसे कहे हुए,) वचनोंसे युक्त किया था ॥२१२॥
Although Maharaja Bharat had already defeated his enemies, he was still blessed with the words, “O Lord, may you conquer your enemies!” Even though he had already acquired the fourteen jewels, he was still blessed with the words, “O Lord, may you rule the earth!” And though he was already long-lived, the blessings continued, saying, “O Lord, may you live for a long time!” Thus, the people, considering it auspicious, repeated these words, reaffirming their blessings after the task was accomplished. 212
श्लोक ( Shlok ) 213
देवोऽयमम्बुधिमगाधमलङ्घयपारमुल्लङ्घय लब्धविजयः पुनरप्युपायात् । पुण्यं कसारथिरिहेति विनान्तरायैः पुण्ये प्रसेदुषि नृणां किमिवास्त्यलङ्घयम् ॥२१३॥
अगाध और पार रहित समुद्रको उलंघनकर तथा योग्य उपाय से विजय प्राप्त कर बिना किसी विघ्न-बाधाके यहां वापिस आ गये हैं सो ठीक ही है क्योंकि निर्मल पुण्यके रहते हुए मनुष्योंको क्या अलंघनीय (प्राप्त न होने योग्य) रह जाता है ? अर्थात् कुछ भी नहीं ॥२१३॥
Having crossed the vast and impassable ocean and achieved victory through proper means, they have returned here without any hindrance. This is only right, for when one possesses pure merit, what remains unattainable for humans? Indeed, nothing at all.213
श्लोक ( Shlok ) 214
पुण्यादयं भरतचक्रधरो जिगीषुरुद्भिन्नवेलमनिलाहतवीचिमालम् । प्रोल्लङ्घय वार्धिममरं सहसा विजिग्ये पुण्ये बलीयसि किमस्ति जगत्यजय्यम् ।।२१४।॥
सबको जीतनेकी इच्छा करनेवाले भरत चक्रवर्ती ने पुण्यके प्रभावसे, जिसमें ज्वार-भाटा उठ रहे हैं और जिसमें लहरोंके समूह वायुसे ताड़ित हो रहे हैं ऐसे समुद्रको उल्लंघन कर शीघ्र ही मागध देवको जीत लिया सो ठीक ही है क्योंकि अतिशय बलवान् पुण्यके रहते हुए संसारमें अजय्य अर्थात् जीतने के अयोग्य क्या रह जाता है ? अर्थात् कुछ भी नहीं ।॥२१४।।
Bharat Chakravarti, desiring to conquer all, swiftly overcame the ocean — in which tides are rising and waves are being lashed by the wind — through the power of his merit. He then quickly defeated the Magadha deity. This is only right, for when one possesses immense strength in merit, what remains unconquerable in the world? Indeed, nothing at all.214
श्लोक ( Shlok ) 215
पुण्योदयेन मकराकरवारिसीम’ पृथ्वीं स्वसादकृत चक्रधरः पृथुश्रीः । दुर्लङ्घयमब्धिमवगाह्य विनोपसर्गेः पुण्यात् परं न खलु साधनमिष्टसिद्ध्यै ॥२१५॥
बहुत भारी लक्ष्मीको धारण करनेवाले चक्रवर्ती भरतने पुण्यकर्म के उदयसे ही बिना किसी उपद्रवके उल्लंघन करनेके अयोग्य समुद्रको उल्लंघन कर समुद्रका जल ही जिसकी सीमा है ऐसी पृथिवी को अपने आधीन कर लिया, सो ठीक ही है क्योंकि इष्ट पदार्थोकी सिद्धिके लिये पुण्यसे बढ़कर और कोई साधन नहीं है ।।२१५।।
The Chakravarti Bharat, who bears immense wealth, through the rise of his virtuous deeds, crossed the ocean — which is impossible to surpass — without any disturbance, and brought the earth, whose limit is the ocean’s waters, under his control. This is only right, for there is no greater means than virtue to attain desired outcomes.215
श्लोक ( Shlok ) 216
चक्रायुधोऽयमरिचक्रभयङ्करश्री राक्रम्य सिन्धु मतिभीषणनक्रचक्रम् । चक्रे वशे सुरमवश्यमनन्यवश्यं पुण्यात् परं न हि वशीकरणं जगत्याम् ॥२१६॥
शत्रुओंके समूहके लिये जिनकी सम्पत्ति बहुत ही भयंकर है ऐसे चक्रवर्ती भरत ने अत्यन्त भयंकर मगर-मच्छोंके समूहसे भरे हुए समुद्र को उल्लंघन कर अन्य किसी के वश न होने योग्य मागध देव को निश्चित रूपसे वश कर लिया, सो ठीक ही है क्योंकि लोक में पुण्यसे बढ़कर और कोई वशीकरण (वश करनेवाला) नहीं है ॥२१६।।
Chakravarti Bharat, whose wealth is formidable to the enemies, crossed the ocean, filled with fierce crocodiles, and firmly brought the Magadha deity — who could not be controlled by anyone else — under his sway. This is only right, for in the world, there is no greater force of control than virtue.216
श्लोक ( Shlok ) 217
पुण्यं जले स्थलमिवाभ्यवपद्यते नृन् पुण्यं स्थले जलमिवाशु नियन्ति तापम् । पुण्यं जलस्थलभये शरणं तृतीयं पुण्यं कुरुध्वमत एव जना जिनोक्तम् ॥२१७।।
पुण्य ही मनुष्योंको जलमें स्थलके समान हो जाता है, पुण्य ही स्थलमें जलके समान होकर शीघ्र ही समस्त संतापको नष्ट कर देता है और पुण्य ही जल तथा स्थल दोनों जगहके भयमें एक तीसरा पदार्थ होकर शरण होता है, इसलिये हे भव्य जनो, तुम लोग जिनेन्द्र भगवान् के द्वारा कहे हुए पुण्यकर्म करो ॥ २१७।।
Virtue becomes like the land in water for humans, and like water on land, it swiftly destroys all suffering. Virtue also acts as a third refuge, providing protection from both the fears of water and land. Therefore, O noble ones, perform virtuous deeds as taught by Lord Jinendra.217
श्लोक ( Shlok ) 218
पुण्यं परं शरणमापदि दुर्विलङ्घयं पुण्यं दरिद्रति जने धनदायि पुण्यम् । पुण्यं सुखार्थिनि जने सुखदायि रत्नं पुण्यं जिनोदितमतः सुजनाश्चिनुध्वम् ॥२१८।।
पुण्य ही आपत्तिके समय किसीके द्वारा उल्लंघन न करनेके योग्य उत्कृष्ट शरण है, पुण्य ही दरिद्र मनुष्योंके लिये धन देनेवाला है और पुण्य ही सुखकी इच्छा करनेवाले लोगोंके लिये सुख देनेवाला है, इसलिये हे सज्जन पुरुषों ! तुम लोग जिनेन्द्र भगवान्के द्वारा कहे हुए इस पुण्यरूपी रत्नका संचय करो ।।।। २१८।।
Virtue is the supreme refuge that cannot be surpassed in times of distress. Virtue is the giver of wealth to the poor and the provider of happiness to those who desire joy. Therefore, O righteous ones, gather this gem of virtue, as instructed by Lord Jinendra.218
श्लोक ( Shlok ) 219
पुण्यं जिनेन्द्र परिपूजनसाध्यमाद्यं पुण्यं सुपात्रगतदानसमुत्थमन्यत् । पुण्यं व्रतानु चरणादुपवासयोगात् पुण्यार्थिनामिति चतुष्टयमर्जनीयम् ॥२१९ ।।
जिनेन्द्र भगवान् की पूजा करनेसे उत्पन्न होनेवाला पहला पुण्य है, सुपात्रको दान देनेसे उत्पन्न हुआ, दूसरा पुण्य है व्रत पालन करनेसे उत्पन्न हुआ, तीसरा पुण्य है और उपवास करनेसे उत्पन्न हुआ, चौथा पुण्य है इस प्रकार पुण्यकी इच्छा करनेवाले पुरुषोंको ऊपर लिखे हुए चार प्रकारके पुण्योंकासंचय करना चाहिये ।। २१९।।
The first type of virtue arises from the worship of Lord Jinendra, the second from giving charity to the deserving, the third from observing vows, and the fourth from fasting. Therefore, those who wish to acquire virtue should gather these four types of virtue as described above.219
श्लोक ( Shlok ) 220
इत्थं स्वपुण्यपरिपाक’ जमिष्टलाभं संश्लाघयन् जनतया श्रुतपुण्यघोषः ।चक्री सभागृहगतो नृपचक्रमध्ये शक्रोपमः पृथुनृपासनमध्यवात्सीत् ॥ २२०॥
इस प्रकार जिसने लोगोंके समूहसे पुण्यकी घोषणा सुनी है ऐसे चक्रवर्ती भरत, अपने पुण्यकर्मके उदयसे प्राप्त हुए इष्ट वस्तुओंके लाभकी प्रशंसा करते हुए सभा-भवनमें पहुंचे और वहां राजाओंके समूहके मध्यमें इन्द्रके समान बड़े भारी राज-सिहासन पर आरूढ़ हुए ॥ २२० ।।
Thus, Chakravarti Bharat, who had heard the declaration of virtue from the assembly of people, entered the royal hall, praising the benefits of the desirable things gained through the rise of his virtuous deeds. There, amidst a gathering of kings, he ascended a grand royal throne, as mighty as Indra’s.220
श्लोक ( Shlok ) 221
धुततटवने रक्ताशोकप्रवालपुटोद्भिदि स्पृशति पवने मन्दं मन्वं तरङगविभेदिनि । अनुसरसरित्सैन्यैः सार्धं प्रभुः सुखमावसज्जलनिधिजयश्लाघाशीर्भिर्जिनाननुचिन्तयन् ।।२२१॥
जिस समय किनारे के वनको हिलानेवाला, रक्त अशोक वृक्षकी कोंपलोंके संपुटको भेदन करनेवाला और लहरोंको भिन्न भिन्न करनेवाला वायु धीरे धीरे बह रहा था उस समय समुद्रको जीतनेकी प्रशंसा और आशीर्वाद के साथ साथ जिनेन्द्र भगवान्का स्मरण करते हुए भरतने गङ्गा नदीके किनारे किनारे ठहरी हुई सेनाके साथ सुख से निवास किया था ।। २२१।।
At the time when the wind, shaking the forest on the shore, piercing the buds of the red ashoka tree, and disturbing the waves, was blowing gently, Bharat, with praise and blessings for his victory over the ocean and remembering Lord Jinendra, resided peacefully along the banks of the Ganga with his army, which was stationed there.221
इत्यार्षे भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षणमहापुराणसङग्रहे पूर्वार्णवद्वारविजयवर्णनं नामाष्टाविशं पर्व ।
इस प्रकार भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीत त्रिषष्टिलक्षणमहापुराणसंग्रहके भाषानुवादमें पूर्वसमुद्रके द्वारको विजय करनेका वर्णन करनेवाला अट्ठाईसवां पर्व समाप्त हुआ ।
Thus, the twenty-eighth chapter, which describes the victory over the eastern sea gate in the translation of the commentary on the Trishashtilakshan Mahapurana compiled by Bhagwan Jin Senacharya, has concluded.
आदिपुराण पर्व 29 – दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला
पर्व 29 – श्लोक 1 से 11
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
आदिपुराण पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150
आदिपुराण पर्व 27 – भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152
आदिपुराण पर्व 28 – पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211