आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121
श्लोक 122 से 131 नृत्य का प्रभाव
हजार भुजाओं से नृत्य, पृथ्वी हिली, कुलपर्वत चंचल, समुद्र लहराया। भुजाएँ कल्पवृक्ष सा, रत्न किरणों से बिजली सा आकाश। तारे मोती सा, मेघ आँसू सा। फिरकी से मणि अलातचक्र सा। पृथ्वी-समुद्र क्षुभित, दिशाएँ प्रक्षालित। इंद्रजाल सा चंचल नृत्य।
English translation of Ādi purāṇa parv 14 – Shlok 122 to 131
श्लोक ( Shlok ) 122 –123
तस्मिन्बाहुसहस्त्राणि विकृत्य’ प्रणिनृत्यति । धरा चरणविन्यासैः स्फुटन्तीव तदाचलत् ॥१२२॥
कुलाचलाश्रलन्ति स्म तृणानामिव राशयः । अभूज्जलधिरुद्वेलः प्रमदादिव निर्घ्वनन् ॥ १२३॥
जिस समय वह इंद्र विक्रिया से हजार भुजाएँ बनाकर नृत्य कर रहा था, उस समय पृथ्वी उसके पैरों के रखने से हिलने लगी थी मानो फट रही हो, कुलपर्वत तृणों की राशि के समान चंचल हो उठे थे और समुद्र भी मानो आनंद से शब्द करता हुआ लहराने लगा था ।।122-123।।
As Indra danced, creating the illusion of a thousand arms through his dynamic movements, the Earth trembled under the force of his steps, as if it were splitting apart. The great mountains swayed like mere blades of grass, and the ocean, seemingly overwhelmed with joy, surged with waves, producing a resonant sound. ||122-123||
श्लोक ( Shlok ) 124
लसद् बाहुर्महोदग्रविग्रहः सुरनायकः । कल्पांघ्रिप इवानर्तीचलदंशुकभूषणः ॥१२४॥
उस समय इंद्र की चंचल भुजाएं बड़ी ही मनोहर थीं, वह शरीर से स्वयं ऊँचा था और चंचल वस्त्र तथा आभूषणों से सहित था इसलिए ऐसा जान पड़ता था मानो जिसकी शाखाएँ हिल रही हैं, जो बहुत ऊँचा है और जो हिलते हुए वस्त्र तथा आभूषणों से सुशोभित है ऐसा कल्पवृक्ष ही नृत्य कर रहा हो ।।124।।
At that moment, Indra’s swift-moving arms appeared extremely enchanting. His body stood tall, adorned with fluttering garments and shimmering ornaments. He seemed like a divine Kalpavriksha (wish-fulfilling tree), whose branches swayed gracefully, towering high, and whose leaves and jewels shimmered as if the tree itself were dancing. ||124||
श्लोक ( Shlok ) 125
चलत्तन्मौलिरत्नांशुपरिवेषैर्नभःस्थलम् । तदा विदिद्युते विद्युत्सहस्त्रैरिव सन्ततम् ॥ १२५॥
उस समय इंद्र के हिलते हुए मुकुट में लगे हुए रत्नों की किरणों के मंडल से व्याप्त हुआ आकाश ऐसा जान पड़ता था मानो हजारों बिजलियों से ही व्याप्त हो रहा हो ।।125।।
At that moment, the sky, illuminated by the radiant beams of the gems embedded in Indra’s swaying crown, appeared as if it were filled with thousands of flashing lightning bolts. ||125||
श्लोक ( Shlok ) 126
विक्षिप्ता बाहुविक्षेपैस्तारकाः परितोऽभ्रमन् । भ्रमणाविद्धविच्छिन्नहारमुक्ताफलश्रियः ॥ १२६॥
नृत्य करते समय इंद्र की भुजाओं के विक्षेप से बिखरे हुए तारे चारों ओर फिर रहे थे और ऐसे मालूम होते थे मानो फिरकी लगाने से टूटे हुए हार के मोती ही हो ।।126।।
As Indra danced, the stars, scattered by the movements of his outstretched arms, whirled in all directions. They appeared like pearls from a broken necklace, spinning due to the force of a rapidly twirling spindle. ||126||
श्लोक ( Shlok ) 127
नृत्यत्तोऽस्य भुजोल्लासैः पयोदाः परिघट्टिताः । पयोलवच्युतो रेजुः शुचेव क्षरदश्रवः ॥१२७
नृत्य करते समय इंद्र की भुजाओं के उल्लास से टकराये हुए तथा पानी की छोटी-छोटी बूंदों को छोड़ते हुए मेघ ऐसे मालूम होते थे मानो शोक से आँसू ही छोड़ रहे हो ।।127।।
As Indra danced, the clouds, struck by the joyous movements of his arms and releasing tiny droplets of water, appeared as if they were shedding tears of sorrow. ||127||
श्लोक ( Shlok ) 128
रेचकेऽस्य चलन्मोलिप्रोच्छलन्मणिरीत्तयः ।” “बेगाविद्धाः समं भ्रेमुरलातवलयायिताः ॥१२८॥
नृत्य करते-करते जब कभी इंद्र फिरकी लेता था तब उसके वेग के आवेश से फिरती हुई उसके मुकुट के मणियों की पंक्तियाँ अलातचक्र की नाई भ्रमण करने लगती थी ।।128।।
As Indra spun gracefully during his dance, the rows of gems on his crown, driven by the force of his movement, began to revolve like a blazing Alata Chakra (a firebrand whirling in a circle). ||128||
श्लोक ( Shlok ) 129
नृत्तक्षोभान्महीक्षोभै क्षुभिता जलराशयः । क्षालयन्ति स्म दिग्भितीः प्रोच्चलज्जलशीकरः ॥१२९॥॥
इंद्र के उस नृत्य के होम से पृथ्वी क्षुभित हो उठी थी, पृथ्वी के क्षुभित होने से समुद्र भी क्षुभित हो उठे थे और उछलते हुए जल के कणों से दिशा की भित्तियों का प्रक्षालन करने लगे थे ।।129।।
The sacrificial intensity of Indra’s dance caused the Earth to tremble. As the Earth quaked, the oceans too became agitated, and their surging waves splashed water droplets, cleansing the walls of the directions. ||129||
श्लोक ( Shlok ) 130 – 131
क्षणादेकः क्षणान्नैकः क्षणाद् व्यापी क्षणादणुः । क्षणादारात् क्षणाद् दूरे क्षणाद् व्योम्नि क्षसाद् भुवि ।१३०
इति प्रतन्वतात्मीयं सामर्थ्य विक्रियोत्थितम् । इन्द्रजालमिवेन्द्रेण प्रयुक्तमभवत् तदा ॥ १३१
नृत्य करते समय वह इंद्र क्षण-भर में एक रह जाता था, क्षण-भर में अनेक हो जाता था, क्षण-भर में सब जगह व्याप्त हो जाता था, क्षण-भर में छोटा-सा रह जाता था, क्षण-भर में पास ही दिखाई देता था, क्षण-भर में दूर पहुंच जाता था, क्षण-भर में आकाश में दिखाई देता था, और क्षण-भर में फिर जमीन पर जाता था, इस प्रकार विक्रिया से उत्पन्न हुई अपनी सामर्थ को प्रकट करते हुए उस इंद्र ने उस समय ऐसा नृत्य किया था मानो इंद्रजाल का खेल ही किया हो ।।130-131 ।।
As Indra danced, he appeared to be one in a moment and many in the next. At times, he seemed to pervade all directions, while at other times, he shrank into a tiny form. One moment, he was near; the next, he had moved far away. Sometimes, he appeared in the sky, and in an instant, he was back on the ground. Displaying his extraordinary power through these illusory movements, Indra’s dance at that moment seemed no less than a spectacle of magical illusion (Indrajaal). ||130-131||
श्लोक 132 से 141
Concise summary of Shlokas 122–131 from Canto 14 of the Ādi Purāṇa by Acharya Jinasena in both Hindi and English, describing Indra’s magnificent dance during the celebration:
Hindi Summary of Shlokas 122–131 from Canto 14 of the Ādi Purāṇa :
इंद्र ने नृत्य करते हुए हजार भुजाएँ बनाईं, जिससे पृथ्वी हिली, पर्वत तृणों जैसे चंचल हुए, और समुद्र आनंद से लहराया (श्लोक 122-123)। उसकी चंचल भुजाएँ, ऊँचा शरीर, और हिलते वस्त्र-आभूषण उसे नृत्यशील कल्पवृक्ष जैसे बनाते थे (श्लोक 124)। उसके मुकुट के रत्नों की किरणों से आकाश बिजलियों से भरा प्रतीत हुआ (श्लोक 125)। उसकी भुजाओं से तारे बिखरे, जो टूटे हार के मोतियों जैसे लगे (श्लोक 126)। उसकी भुजाओं से टकराकर मेघ जल की बूंदें छोड़ते थे, मानो शोक में हों (श्लोक 127)। फिरकी लेते समय उसके मुकुट के मणि अलातचक्र की तरह घूमते थे (श्लोक 128)। नृत्य से पृथ्वी और समुद्र क्षुभित हुए, और जल कण दिशाओं को धोने लगे (श्लोक 129)। वह क्षण में एक, अनेक, व्यापक, छोटा, पास, दूर, आकाश में और भूमि पर दिखता था, मानो इंद्रजाल खेल रहा हो (श्लोक 130-131)।
English Summary of Shlokas 122–131 from Canto 14 of the Ādi Purāṇa :
As Indra danced, manifesting a thousand arms, the Earth trembled as if splitting, mountains swayed like blades of grass, and the ocean surged joyfully with waves (Shloka 122-123). His swift arms, tall stature, and fluttering garments and ornaments made him resemble a dancing Kalpavriksha (Shloka 124). Rays from the gems in his swaying crown lit the sky like thousands of lightning bolts (Shloka 125). His arm movements scattered stars, resembling pearls from a broken necklace (Shloka 126). Clouds, struck by his joyous arms, released droplets like tears of sorrow (Shloka 127). As he spun, his crown’s gems whirled like an Alata Chakra (Shloka 128). His dance shook the Earth and oceans, with water droplets cleansing the directions (Shloka 129). In moments, he appeared as one, then many, vast, then small, near, then far, in the sky, then on the ground, performing a dance akin to a magical illusion (Indrajaal) (Shloka 130-131).
In essence, these verses vividly portray Indra’s dynamic and awe-inspiring dance, transforming the cosmos with his divine power and creating a spectacle of celestial wonder.
श्लोक 132 से 141
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121