आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161
श्लोक 162 से 171 व्रतों की भावनाएँ
भगवान ने अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, और परिग्रह त्याग के लिए भावनाएँ धारण कीं। मनोगुप्ति आदि से अहिंसा की रक्षा की। क्रोध त्याग से सत्य पाला। संतोष से अचौर्य रखा। स्त्री कथा त्याग से ब्रह्मचर्य साधा। इंद्रिय विषयों से परिग्रह छोड़ा। मुनियों को भी व्रत पालन करना चाहिए।
English translation of Ādi purāṇa parv 20 – Shlok 162 to 171
श्लोक ( Shlok ) 162
क्रोधलोभ भयत्यागा हास्यासंग विसर्जनम्। सूत्रानुगाच वाणीति द्वितीयव्रतभावनाः ॥१६२॥
क्रोध, लोभ, भय और हास्य का परित्याग करना तथा शास्त्र के अनुसार वचन कहना ये पांच द्वितीय सत्यव्रत की भावनाएं हैं ।।162।।
“Renouncing anger, greed, fear, and excessive laughter, and speaking in accordance with the scriptures—these five are the contemplations associated with the second vow of truth.” ( 162)
श्लोक ( Shlok ) 163
मितोचिता भ्यनु ज्ञातग्रहणान्य ग्रहोऽन्यथा । संतोषो अक्तपाने च तृतीयव्रतभावनाः ॥१६३॥
परिमित―थोड़ा आहार लेना, तपश्चरण के योग्य आहार लेना, श्रावक के प्रार्थना करने पर आहार लेना, योग्यविधि के विरुद्ध आहार नहीं लेना तथा प्राप्त हुए भोजन-पान में संतोष रखना ये पाँच तृतीय अचौर्यव्रत की भावनाएँ हैं ।।163।।
Taking limited food, consuming food suitable for ascetic practice, accepting food only when offered by a devoted householder, not eating in a manner contrary to proper conduct, and being content with whatever food and drink is received—these five are the contemplations associated with the third vow of non-stealing.” ( 163)
श्लोक ( Shlok ) 164
स्त्री कथालोकसंसर्गं प्राग्रतस्मृतयोजनाः । वर्ज्या वृष्य रसेनामा चतुर्थ व्रतभावनाः ॥१६४॥
स्त्रियों की कथा का त्याग, उनके सुंदर अंगोपांगों के देखने का त्याग, उनके साथ रहने का त्याग, पहले भोगे हुए भोगों के स्मरण का त्याग और गरिष्ठ रस का त्याग इस प्रकार ये पाँच चतुर्थ ब्रह्मचर्यव्रत की भावनाएं हैं ।।164।।
“Renouncing discussions about women, avoiding the sight of their beautiful features, abstaining from their company, letting go of memories of past sensual pleasures, and refraining from rich and indulgent foods—these five are the contemplations associated with the fourth vow of celibacy.” ( 164)
श्लोक ( Shlok ) 165
बाह्याभ्यन्तरभेदेषु सचित्ताचितवस्तुपु। इन्द्रियायेंप्वना “संगो “नैस्संग्यव्रतभावनाः ॥१६५॥
जिनके बाह्य आभ्यंतर इस प्रकार दो भेद हैं ऐसे पाँचों इंद्रियों के विषयभूत सचित्त अचित्त पदार्थों में आसक्ति का त्याग करना सो पाँचवें परिग्रह त्याग व्रत की पाँच भावनाएँ हैं ।।165।।
“Renouncing attachment to both animate and inanimate objects related to the five senses, which are of two kinds—external and internal—these are the five contemplations associated with the fifth vow of non-possessiveness.” (165)
श्लोक ( Shlok ) 166
धृतिमत्ता क्षमावत्ता ध्यानयोगैकतानता । परीषहैरभङ्गश्च व्रतानां भावनोत्तरा ॥१६६॥
धैर्य धारण करना, क्षमा रखना, ध्यान धारण करने में निरंतर तत्पर रहना और परीषहों के आने पर मार्ग से च्युत नहीं होना ये चार उक्त व्रतों की उत्तर भावनाएँ हैं ।।166।।
“Maintaining patience, practicing forgiveness, remaining constantly engaged in meditation, and not deviating from the path when facing hardships—these four are the higher contemplations associated with the aforementioned vows.” (166)
श्लोक ( Shlok ) 167
भावनासंस्कृतान्येवं व्रतान्ययमपालयत् । “क्षालने “स्वागसां सर्वप्रजानामनुपालकः ॥१६७॥
समस्त जीवों की रक्षा करने वाले भगवान् वृषभदेव अपने पापों को नष्ट करने के लिए ऊपर लिखी हुई भावनाओं से सुसंस्कृत (शुद्ध) ऐसे व्रतों का पालन करते थे ।।167।।
“Lord Rishabhadev, the protector of all living beings, observed these vows with purity, enriched by the aforementioned contemplations, to annihilate his sins.” (167)
श्लोक ( Shlok ) 168
समातृकापदान्येवं सहोतरपदानि च । व्रतानि भावनीयानि मनीषिभिरतन्द्रितम् ॥१६८॥
इसी प्रकार अन्य बुद्धिमान् मनुष्यों को भी आलस्य छोड़कर मातृकापद अर्थात् पाँच समिति और तीन गुप्तियों से युक्त तथा चौरासी लाख उत्तरगुणों से सहित अहिंसा आदि पाँचों महाव्रतों का पालन करना चाहिए ।।168।।
“Likewise, other wise individuals should also abandon laziness and observe the five great vows—non-violence and others—accompanied by the foundational principles of five Samitis (careful practices), three Guptis (restraints), and eighty-four lakh superior virtues.” ( 168)
श्लोक ( Shlok ) 169
यानि कान्यपि शल्यानि गर्हिंतानि जिनागमे । व्युत्सृज्य तानि सर्वाणि निःशल्यो “विहरेन्मुनिः ॥१६९॥
इसी प्रकार जैन-शास्त्रों में जो निंदनीय माया मिथ्यात्व और निदान ऐसी तीन शल्य कही है उन सबको छोड़कर और निःशल्य होकर ही मुनियों को विहार करना चाहिए ।।169।।
“Similarly, as stated in Jain scriptures, monks should renounce the three harmful afflictions—deceit (Maya), false belief (Mithyatva), and desire for future fruition (Nidana)—and wander free from these impurities.” ( 169)
श्लोक ( Shlok ) 170
इति स्थविरकल्पोऽयं जिनकल्लेऽपि योजितः । : । यथागममि होच्चित्य जैनः कल्पोऽनुगम्य तान् ॥१७०॥
इस प्रकार ऊपर कहे हुए व्रतों का पालन करना स्थविर कल्प है, इसे जिनकल्प में भी लगा लेना चाहिए । आगमानुसार स्थविर कल्प धारण कर जिनकल्प धारण करना चाहिए । भावार्थ―ऊपर कहे हुए व्रतों का पालन करते हुए मुनियों के साथ रहना, उपदेश देना, नवीन शिष्यों को दीक्षा देना आदि स्थविरकल्प कहलाता है और व्रतों का पालन करते हुए अकेले रहना, हमेशा आत्मचिंतवन में ही लगे रहना जिनकल्प कहलाता है । तीर्थंकर भगवान जिनकल्पी होते हैं और यही वास्तव में उपादेय है । साधारण मुनियों को यद्यपि प्रारंभ अवस्था में स्थविरकल्पी होना पड़ता है परंतु उन्हें भी अंत में जिनकल्पी होने के लिए उद्योग करते रहना चाहिए ।।170।।
“Observing the aforementioned vows is known as Sthavirakalpa, but it should also be incorporated into Jinkalpa. According to the scriptures, one should first adopt Sthavirakalpa and then progress toward Jinkalpa.
Meaning: Living among monks, giving teachings, and initiating new disciples into monkhood is called Sthavirakalpa. In contrast, living in solitude while strictly following vows and remaining immersed in self-contemplation is known as Jinkalpa.
Tirthankaras follow Jinkalpa, which is the ideal and truly worth adopting. Although ordinary monks initially follow Sthavirakalpa, they should ultimately strive to attain Jinkalpa.” ( 170)
श्लोक ( Shlok ) 171
अप्रतिक्रमणे धर्में जिनाः सामायिकाह्वये । चरन्त्येकयमें प्रायश्चतुर्ज्ञानविलोचनाः ॥१७१॥
मति, श्रुत, अवधि और मन:पर्यय इस प्रकार चार ज्ञानरूपी नेत्रों को धारण करने वाले तीर्थंकर परमदेव प्राय: प्रतिक्रमणरहित एक सामायिक नाम के चारित्र में ही रत रहते हैं । भावार्थ―तीर्थकर भगवान् के किसी प्रकार का दोष नहीं लगता इसलिए उन्हें प्रतिक्रमण-छेदोपस्थापना चारित्र धारण करने की आवश्यकता नहीं पड़ती, वे केवल सामायिक चारित्र ही धारण करते हैं ।।171।।
“The Tirthankara, the Supreme Lord, who possesses the four kinds of knowledge—Mati (sensory perception), Shruta (scriptural knowledge), Avadhi (clairvoyance), and Manahparyaya (telepathy)—remains engaged solely in the conduct of Samayik (equanimity), without the need for Pratikraman (repentance) or any other form of atonement.
Meaning: Since the Tirthankara is completely free from any faults or transgressions, there is no need for them to undertake Pratikraman (repentance) or Cheddopasthapana (atonement). They observe only Samayik Charitra, the conduct of pure equanimity.” (171)
श्लोक 172 से 183
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275
आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 257
आदिपुराण पर्व 18 – धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202 | श्लोक 203 से 209
आदिपुराण पर्व 19 – नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192
आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161