आदिपुराण पर्व 28 – पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121
श्लोक 122 से 131
मागधदेव का क्रोध और प्रतिक्रिया
बाण का भारी शब्द मागधदेव की सेना में क्षोभ उत्पन्न करता हुआ उनके निवास में जा गिरा। व्यन्तरदेवों ने इसे कल्पान्त या भूकंप समझकर मागधदेव को घेर लिया। मागधदेव ने क्रोधित होकर बाण को चूर करने और शत्रु को नष्ट करने की बात कही। उन्होंने कहा कि पराभव सहन करना पुरुष के लिए कलंक है और सच्चा पुरुष पराक्रम से कुल को पवित्र करता है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 28 – Shlok 122 to 131
श्लोक ( Shlok ) 122
जितनिर्वातनिर्वोषं नि कुर्वन्नभस्तलात् । न्यपप्तन्मागधावासे तत्सैन्यं क्षोभमानयन् ॥१२२॥
और जिसने वज्रपात के शब्द को जीत लिया है ऐसा भारी शब्द करता हुआ तथा मागध देवकी सेनामें क्षोभ उत्पन्न करता हुआ वह बाण आकाश-तल से मागध देव के निवासस्थान में जा पड़ा ।।१२२।।
“Making a mighty sound that even surpassed the roar of a thunderbolt, and creating turmoil in the army of the Magadha gods, that arrow shot through the sky and fell into the dwelling place of the Magadha deity.” (122)
श्लोक ( Shlok ) 123 –124
किमेष क्षुभितोऽम्भोधिः कल्पान्तपवनाहतः । निर्घातः किंस्विदुद्ध्वान्तो भूमिकम्पो नु जृम्भते ॥ १२३॥
इत्याकुला कुल धियः तन्नि कायोपगाः सुराः । परिववुरुपेत्यैनं सन्नद्धा मागधं प्रभुम् ॥१२४॥
क्या यह कल्पान्त काल के वायुसे ताड़ित हुआ समुद्र ही क्षोभको प्राप्त हुआ है ? अथवा जोर से शब्द करता हुआ वजू पड़ा है? अथवा भूमिकंप ही हो रहा है? इस प्रकार जिनकी बुद्धि अत्यन्त व्याकुल हो रही है ऐसे उसके समीप रहनेवाले व्यन्तरदेव तैयार होकर मागध देवके पास आये और उसे घेरकर खड़े हो गये ।।१२३-१२४।।
“Has the ocean been agitated by the wind at the end of the age? Or has a mighty thunderclap struck? Or is it an earthquake shaking the ground? — thus, with their minds extremely disturbed, the nearby Vyantara deities gathered themselves and came before the Magadha deity, surrounding him closely.” (123–124)
श्लोक ( Shlok ) 125
देव दीप्रः शरः कोऽपि पतितोऽस्मत्सभाङ्गणे । तेनायं प्रकृतः क्षोभो न किञ्चित्कारणान्तरम् ।।१२५।।
हे देव, हमारे सभा-भवनके आंगनमें कोई देदीप्यमान बाण आकर पड़ा है उसीसे यह क्षोभ हुआ है इसका दूसरा कारण नहीं है ।।१२५।।
“O Lord, a radiant arrow has fallen into the courtyard of our assembly hall, and it is because of that that this great disturbance has arisen — there is no other cause for it.” (125)
श्लोक ( Shlok ) 126
येनायं प्रहितः पत्री नाकिना दानवेन वा। तस्य कर्तुं प्रतीकारमिम सज्जा वयं प्रभो ॥१२६॥
हे प्रभो, जिस किसी देव अथवा दानवने यह बाण छोड़ा है हम सब लोग उसका प्रतिकार करनेके लिये तैयार हैं ।। १२६ ।।
“O Lord, whichever god or demon has shot this arrow, we are all ready to counter him.” (126)
श्लोक ( Shlok ) 127
इत्यारक्षि भटैस्तूर्णमेत्य विज्ञापितः प्रभुः । अलमाध्वं भटालापै रित्युच्चैः प्रत्युवाच तान् ॥१२७॥
इस प्रकार रक्षा करनेवाले वीर योद्धाओं ने शीघ्र ही आकर अपने स्वामी मागध देवसे निवेदन किया और मागध देवने भी बड़े जोर से उन्हें उत्तर दिया कि चुप रहो, इस प्रकार वीर वाक्योंसे कुछ लाभ नहीं है ।।१२७।।
“Thus, the brave warriors who had come to offer protection quickly spoke to their lord, Māgadh Deva, but Māgadh Deva forcefully replied, ‘Be silent; such brave words are of no use now.'” (127)
श्लोक ( Shlok ) 128
यूयं त एव मद्ग्राह्याः सोऽहमेवास्मि मागधः । श्रुतपूर्वमिदं कि वः सोढपूर्वो मयेत्यरिः ॥१२८॥
तुम लोग वे ही मेरे अधीन रहनेवाले देव हो और में भी वही मागध देव हूं, क्या मुझे कभी पहले अपना शत्रु सहन हुआ है ? यह बात तुम लोगोंने पहले भी कभी सुनी है ? ॥ १२८॥
“You are the same gods who have always been under my command, and I am the same Māgadh Deva. Have I ever tolerated an enemy before? Have you ever heard of such a thing in the past?” (128)
श्लोक ( Shlok ) 129
विभर्ति यः पुमान् प्राणान् परिभूतिमलीमसान्। न गुणैर्लिङ्गमात्रेण पुमानेष प्रतीयते ॥१२९॥
जो पुरुष पराभव से मलिन हुए हुए अपने प्राणों को धारण करता है वह गुणों से पुरुष नहीं कहलाता किन्तु केवल लिङ्ग से ही पुरुष कहलाता है ॥ १२९।।
“A man who, stained by defeat, merely preserves his life, is not called a true man by his virtues, but only by his physical form.” (129)
श्लोक ( Shlok ) 130
स चित्रपुरुषो वास्तु चञ्चापुरुष एव च। यो विनापि गुणैः पौंस्तैर्नाम्नैव पुरुषायते ॥१३०॥
जो पुरुष, पुरुषों में पाये पाये जाने वाले गुणोंके बिना केवल नाम से ही पुरुष बनना चाहता है वह या तो चित्र में लिखा हुआ पुरुष है अथवा तूण काष्ठ वगैरह से बना हुआ पुरुष है ।।१३०।।
“A man who wishes to be called a man merely by name, without possessing the virtues found among true men, is like a man drawn in a painting or one carved out of wood.” (130)
श्लोक ( Shlok ) 131
स पुमान् यः पुनीते स्वं कुलं जन्म च पौरुषै । भटब्रुवो जनो यस्त्तु तस्यास्त्व भवनिर्भुवि ॥ १३१॥
जो अपने पराक्रमसे अपने कुल और जन्म को पवित्र करता है वास्तव में वही पुरुष कहलाता है, इसके विपरीत जो मनुष्य झूठमूठ ही अपने को वीर कहता है पृथिवी पर उसका जन्म न लेना ही अच्छा है ।। १३१।।
“He who sanctifies his lineage and birth through his own valor is truly called a man; but one who falsely claims to be a hero would have been better off never being born on this earth.” (131)
श्लोक 132 से 141
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2
आदिपुराण पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 128 | श्लोक 129 से 147 | श्लोक 148 से 150
आदिपुराण पर्व 27 – भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152
आदिपुराण पर्व 28 – पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121