आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51
श्लोक 52 से 61 लोगों की भक्ति और उत्साह
भगवान तीन लोक के स्वामी होकर अकेले विहार करते थे। लोग उनकी वंदना करना चाहते थे। एक स्त्री दासी को बालक सौंप दर्शन को गई। दूसरी ने स्नान सामग्री छोड़ भगवान के दृष्टि जल से स्नान का विचार किया। तीसरी ने भोजन छोड़ अर्घ ले पूजा को गई। लोग स्नान-भोजन सामग्री हटाकर दर्शन को गए। भक्ति और कौतुक से लोग तत्पर हुए।
English translation of Ādi purāṇa parv 20 – Shlok 52 to 61
श्लोक ( Shlok ) 52
इदमाश्रर्थमाश्चर्य बदेष जगतां पतिः। विहरत्येवमेकाको त्यसर्वपरिच्छदः ॥५२॥
यह बड़ा भारी आश्चर्य है कि ये भगवान् तीन लोक के स्वामी होकर भी सब परिग्रह छोड़कर इस तरह अकेले ही विहार करते हैं ।।52।।
“It is truly astonishing that this Lord, the master of the three worlds, has renounced all possessions and wanders alone in this manner.” ( 52)
श्लोक ( Shlok ) 53 – 54
अथवा श्रुतमस्माभिः “स्वाधीनसुलकाम्यया। करीब यूथयो नाथो वनं प्रस्थित वानिति ॥५३॥
तत्सत्यमधुना स्वैरं मुक्तसंगो निरम्बरः । अव्यथो विरहत्येवमेककः परमेश्वरः ॥५४॥
अथवा जो हम लोगों ने पहले सुना था कि भगवान् ने स्वाधीन सुख प्राप्त करने की इच्छा से झुंड की रक्षा करने वाले हाथी के समान वन के लिए प्रस्थान किया है सो वह इस समय सत्य मालूम होता है क्योंकि ये परमेश्वर भगवान् समस्त परिग्रह और वस्त्र छोड़कर बिना किसी कष्ट के इच्छानुसार अकेले ही विहार कर रहे हैं ।।53-54।।
“Or what we had previously heard—that the Lord departed for the forest like a leader-elephant seeking the bliss of self-sovereignty—now seems true. For this Supreme Lord, having renounced all possessions and garments, wanders freely and effortlessly, entirely at His will.” ( 53-54)
श्लोक ( Shlok ) 55
यथास्वं विहरन् देशानस्मद्भाग्यादिहागतः । वन्द्यः पूज्योऽभिगम्यश्चेत्येके श्लाघ्यं वचो जगुः ॥५५॥
ये भगवान अपनी इच्छानुसार अनेक देशो में विहार करते हुए हम लोगों के भाग्य से ही यहाँ आये हैं इसलिए हमें इनकी वंदना करनी चाहिए, पूजा करनी चाहिए और इनके सम्मुख जाना चाहिए, इस प्रकार कितने ही लोग प्रशंसनीय वचन कह रहे थे ।।55।।
“This Lord, wandering freely across many lands at His will, has come here solely due to our good fortune. Therefore, we should offer our reverence, worship Him, and approach Him.” Thus, many people were speaking words of praise. (55)
श्लोक ( Shlok ) 56
चेटि बालकमादाय स्तन्यं पायय याम्यहम् । द्रष्टुं मगवतः पादावित्ति काचित् स्त्र्यभाषत ॥५६॥
उस समय कोई स्त्री अपनी दासी से कह रही थी कि हे दासी, तू बालक को लेकर दूध पिला, मैं भगवान् के चरणों का दर्शन करने के लिए जाती हूँ ।।।56।।
“At that time, a woman was telling her maid, ‘O maid, feed the child milk, for I am going to behold the Lord’s feet.'” ( 56)
श्लोक ( Shlok ) 57
प्रसाधनमिदं तावदास्तां मे सहमज्जनम् । पूतैर्दृष्टिजलैर्भर्तुः स्नास्यामीत्यपरा जगुः ॥५७॥
अन्य कोई स्त्री कह रही थी कि यह स्नान की सामग्री और यह आभूषण पहनने की सामग्री दूर रहे, मैं तो भगवान् के दृष्टिरूपी पवित्र जल से स्नान करूंगी ।।57।।
“Another woman was saying, ‘Let these bathing essentials and ornaments remain aside; I shall bathe in the sacred waters of the Lord’s gaze.'” ( 57)
श्लोक ( Shlok ) 58
भगवन्मुखबालार्कदर्शनान्नो मनोऽम्बुजम् । चिरं प्रबोधमायातु पश्यामोऽय जगद्गुरुम् ॥५८॥
भगवान् के मुखरूपी बालसूर्य के दर्शन से हमारा यह मनरूपी कमल चिरकाल तक विकास को प्राप्त रहे, चलो, आज जगद्गुरु भगवान् वृषभदेव के दर्शन करें ।।58।।
“May our lotus-like hearts remain forever blossomed by the sight of the Lord’s face, which is like the rising sun. Come, let us behold the Universal Teacher, Lord Rishabhadeva, today.” ( 58)
श्लोक ( Shlok ) 59
खलु भुक्त्वा लघूतिष्ठ गृहाणार्घ मिमं सखि । पूजयामो जगत्पूज्यं गत्वेत्यन्या जगौ गिरम् ॥५९॥
अन्य कोई स्त्री कह रही थी कि हे सखि, भोजन करना बंद कर, जल्दी उठ और यह अर्घ हाथ में ले, चलकर जगत् पूज्य भगवान् की पूजा करें ।।59।।
“Another woman was saying, ‘O friend, stop eating, get up quickly, take this offering in your hands, and let us go worship the universally revered Lord.'” ( 59)
श्लोक ( Shlok ) 60
स्नानाशनादिसामग्रीमवमत्य पुरोगताम् । गता एव तदा पौराः प्रभुं द्रष्टुं पुरोगतम् ॥६०॥
उस समय नगरनिवासी लोग सामने रखी हुई स्नान और भोजन की सामग्री को दूर कर आगे जाने वाले भगवान के दर्शन के लिए जा रहे थे ।।60।।
“At that time, the townspeople set aside their bathing and dining necessities and hurried forward to behold the advancing Lord.” ( 60)
श्लोक ( Shlok ) 61
गतानुगतिकाः केचित् केचिद् भक्तिमुपागताः। परे कौतुकसाद्भूता भूतेशं द्रप्टुमुद्यताः ॥६१॥
कितने ही लोग अन्य लोगों को जाते हुए देखकर उनकी देखादेखी भगवान् के दर्शन करने के लिए उद्यत हुए थे । कितने ही भक्तिवश और कितने ही कौतुक के अधीन हो जिनेंद्रदेव को देखने के लिए तत्पर हुए थे ।।61।।
“Many people, seeing others going, were inspired to set out to behold the Lord. Some were driven by devotion, while others were eager out of curiosity to witness Lord Jinedra.” ( 61)
श्लोक 62 से 71
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275
आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 257
आदिपुराण पर्व 18 – धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202 | श्लोक 203 से 209
आदिपुराण पर्व 19 – नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192
आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51