आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21
श्लोक 22 से 31 इंद्र की स्तुति (भाग 1)
इंद्र ने स्तुति की: भगवान परमानंददायक, कमल प्रबोधक सूर्य। मिथ्याज्ञान से उद्धारक, वचन से अंधकार नाशक। आदि देव, गुरु, विधाता, नायक। चंद्रमा सा पवित्र, वचन से नीरोगी। क्लेश नष्ट कर तीर्थंकर पद प्राप्त, कूटस्थ में गुण वृद्धि।
English translation of Ādi purāṇa parv 14 – Shlok 22 to 31
श्लोक ( Shlok ) 22
वतस्तं स्तोतुमिन्द्राद्याः प्राक्रमन्त सुरोत्तमाः । वत्स्य॑त् तीर्थकरत्वस्य प्राभवं तद्धि पुष्कलम् ॥२२॥
तदनंतर इंद्र आदि श्रेष्ठ देव उनकी स्तुति करने के लिए तत्पर हुए सो ठीक ही है तीर्थंकर होने वाले पुरुष का ऐसा ही, अधिक प्रभाव होता है ।।22।।
Thereafter, Indra and the other great gods eagerly prepared to offer praises to Him, which was only natural, for a being destined to become a Tirthankara possesses such immense divine influence. ॥22॥
श्लोक ( Shlok ) 23
स्वं देव परमानन्दमस्माकं कर्तुमुद् गतः । किमु प्रबोधमायान्ति विनार्कात् कमलाकराः ॥२३॥
हे देव, हम लोगों को परम आनंद देने के लिए ही आप उदित हुए हैं । क्या सूर्य के उदित हुए बिना कभी कमलों का समूह प्रबोध को प्राप्त होता है ? ।।23।।
O Lord, You have arisen solely to bestow supreme bliss upon us. Can a cluster of lotuses ever bloom without the rising of the sun? ॥23॥
श्लोक ( Shlok ) 24
मिथ्याज्ञानान्धकूपेऽस्मिन् निपतन्वमिमं जनम् । स्वमुद्धर्तुमना धर्महस्तालम्बं प्रदास्यसि ॥२४॥
हे देव, मिथ्याज्ञानरूपी अंधकूप में पड़े हुए इन संसारी जीवों के उद्धार करने की इच्छा से आप धर्मरूपी हाथ का सहारा देनेवाले हैं ।।24।।
O Lord, You extend the supporting hand of righteousness to uplift these worldly beings who have fallen into the dark well of false knowledge. ॥24॥
श्लोक ( Shlok ) 25
तव वाक्किरणैर्नुन मस्मच्चेतोगतं तमः । पुरा प्रलीयते देव तमो भास्वत्करैरिव ॥ २५॥
दे देव, जिस प्रकार सूर्य की किरणों के द्वारा उदय होने से पहले ही अंधकार नष्टप्राय कर दिया जाता है उसी प्रकार आपके वचनरूपी किरणों के द्वारा भी हम लोगों के हृदय का अंधकार नष्ट कर दिया गया है ।।25।।
O Lord, just as the darkness begins to fade even before the sun fully rises with its radiant rays, in the same way, the darkness of our hearts has already been dispelled by the luminous rays of Your divine words. ॥25॥
श्लोक ( Shlok ) 26
त्वमादिर्दै वदेवानां स्वमादिर्जगतां गुरुः । स्वमादिर्जगतां स्रष्टा त्वमादिर्धर्मनायकः ॥२६॥
हे देव, आप देवों के आदि देव हैं, तीनों जगत् के आदि गुरु हैं, जगत् के आदि विधाता है और धर्म के आदि नायक हैं ।।26।।
O Lord, You are the primordial deity of the gods, the first preceptor of the three worlds, the original creator of the universe, and the supreme leader of righteousness. ॥26॥
श्लोक ( Shlok ) 27
त्वमेव जगतां भर्ता त्वमेव जगतां पिता । स्वमेव जगतां त्राता त्वमेव जगतां गतिः ॥२७॥
हे देव, आप ही जगत् के स्वामी हैं, आप ही जगत् के पिता है, आप ही जगत् के रक्षक हैं, और आप ही जगत् के नायक हैं ।।27।।
O Lord, You are the master of the universe, the father of the world, its protector, and its supreme guide. ॥27॥
श्लोक ( Shlok ) 28
त्वं पूतात्मा जगद् विश्वं पुनासि परमैर्गुणैः । स्वयं धौतों यथा लोकं धवलीकुरुते शशी ॥२८॥
हे देव, जिस प्रकार स्वयं धवल रहनेवाला चंद्रमा अपनी चाँदनी से समस्त लोक को धवल कर देता है उसी प्रकार स्वयं पवित्र रहने वाले आप अपने उत्कृष्ट गुणों से सारे संसार को पवित्र कर देते हैं ।।28।।
O Lord, just as the moon, being pure itself, spreads its soothing moonlight to illuminate the entire world, in the same way, You, being inherently pure, sanctify the whole universe with Your supreme virtues. ॥28॥
श्लोक ( Shlok ) 29
स्वत्तः कल्याणमाप्स्यन्ति संसारामयलङ्घिताः । उल्लाघिता भवद्वाक्यभेषजैरमृतोपमैः ॥२९॥
हे नाथ, संसाररूपी रोग से दुःखी हुए ये प्राणी अमृत के समान आपके वचनरूपी औषधि के द्वारा नीरोग होकर आप से परम कल्याण को प्राप्त होंगे ।।29।।
O Lord, these beings, afflicted by the disease of worldly existence, will be healed by the nectar-like medicine of Your divine words and thus attain supreme welfare through You. ॥29॥
श्लोक ( Shlok ) 30
त्वं पूत्तस्त्वं ‘पुनानोऽसि परं ज्योतिस्त्वमक्षरम् । निर्द्धं य निखिलं क्लेशं यत्प्राप्तासि परं पदम् ॥३०॥
हे भगवन᳭ आप संपूर्ण कोशों को नष्ट कर इस तीर्थंकररूप परम पद को प्राप्त हुए हैं अतएव आप ही पवित्र हैं, आप ही दूसरों को पवित्र करने वाले हैं और आप ही अविनाशी उत्कृष्ट ज्योतिःस्वरूप हैं ।।30।।
O Bhagavan, having destroyed all karmic coverings, You have attained the supreme state of a Tirthankara. Therefore, You alone are truly pure, You alone sanctify others, and You are the eternal, supreme divine light. ॥30॥
श्लोक ( Shlok ) 31
“कूटस्योऽपि न कूटस्थस्त्वमद्य प्रतिभासि नः । त्वय्येव स्फातिमेष्यन्ति यदमी योगजा गुणाः॥ ३१।
हे नाथ, यद्यपि आप कूटस्थ हैं―नित्य हैं तथापि आज हम लोगों को कूटस्थ नहीं मालूम होते क्योंकि ध्यान से होने वाले समस्त गुण आप में ही वृद्धि को प्राप्त होते रहते हैं । भावार्थ―जो कूटस्थ (नित्य) होता है उसमें किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं होता अर्थात् न उनमें कोई गुण घटता है और न बढ़ता है, परंतु हम देखते हैं कि आप में ध्यान आदि योगाभ्यास से होने वाले अनेक गुण प्रति समय बढ़ते रहते हैं, इस अपेक्षा से आप हमें कूटस्थ नहीं मालूम होते ।।31।।
O Lord, though You are immutable and eternal, today You do not appear so to us, for all virtues arising from deep meditation continue to grow within You.
(Explanation) – That which is immutable (kūṭastha) undergoes no change—its qualities neither decrease nor increase. However, we observe that through meditation and spiritual practice, numerous virtues in You keep expanding every moment. In this sense, You do not seem immutable to us. ॥31॥
श्लोक 32 से 41
आदिपुराण Ādi purāṇa
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21