आदिपुराण भाग – 2 पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101
श्लोक 92 से 101
मार्ग की प्राकृतिक शोभा
भरत ने शरद् ऋतु की शोभा देखी। सरोवर, हंस, चकवा-चकवी, और नदियों के किनारे मनोहर थे। हंस और चकवी की गतिविधियां भरत के मन को प्रसन्न करती थीं। नदियों और लतागृहों की शोभा ने उनके हृदय में प्रीति जागृत की।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 26 – Shlok 102 to 111
श्लोक ( Shlok ) 102
लतालयेषु रम्येषु रतिरस्य प्रपश्यतः । स्वयं गलत्प्रसूनौघर चितप्रस्तरेष्वभूत् ॥१०२॥
जिनमें अपने आप गिरे हुए फूलोंके समूहसे शय्याएं बनी हुई हैं ऐसे रमणीय लतागृहोंको देखते हुए भरतको उनमें भारी प्रीति उत्पन्न हुई थी ।॥१०२॥
“King Bharata felt great affection upon seeing the charming vine-covered bowers, where beds seemed to have been formed naturally from clusters of fallen flowers.”(Verse 102)
श्लोक ( Shlok ) 103
क्वचिल्लतागृहान्तःस्थचन्द्रकान्तशिलाश्रितान्। त्वयशोगानसंसक्तान् किन्नरान् प्रभुरैक्षत ॥१०३॥
उन भरत महाराज ने कहीं कहींपर लतागृहों के भीतर पड़ी हुई चन्द्रकान्ति मणिकी शिलाओंपर बैठे हुए और अपना यशगान करने में लगे हुए किन्नरों को देखा था ।।१०३।।
“King Bharata saw, here and there, celestial Kinnaras seated within the vine-covered bowers on moonstone slabs, engaged in singing his praises.”(Verse 103)
श्लोक ( Shlok ) 104
क्वचिल्लताः प्रसूनेषु विलीनमधुवावलीः। विलोक्य स्त्रस्तकेशीनां सस्मार प्रिययोषिताम् ॥१०४॥
कहीं कहींपर लताओंके फूलोंपर बैठे हुए भ्रमरों के समूहों को देखकर जिनकी चोटियां ढीली होकर नीचेकी ओर लटक रही हैं ऐसी प्रिय स्त्रियोंका स्मरण करता था ।।१०४।।
“Upon seeing clusters of bees sitting on the flowers of the vines here and there, King Bharata was reminded of his beloved women, whose loosened braids hung gracefully downward.”(Verse 104)
श्लोक ( Shlok ) 105
सुमनोवर्षमातेनुः प्रीत्येवास्याधिमूर्धजम्। पवनाधूतशाखाग्राः प्रफुल्ला मार्गशाखिनः ॥१०५।।
जिनकी शाखाओंके अग्रभाग वायुसे हिल रहे हैं ऐसे फूले हुए मार्गके वृक्ष मानो वड़े प्रेमसे ही भरत महाराज के मस्तकपर फूलोंकी वर्षा कर रहे थे ।।१०५।।
“The blooming trees lining the path, whose branch tips swayed gently in the breeze, seemed as if they were lovingly showering flowers upon King Bharata’s head.”(Verse 105)
श्लोक ( Shlok ) 106
सच्छायान् सफलान् तुङ्गान् सर्वसम्भोग्यसम्पदः । मार्गद्रुमान् समद्राक्षीत् स नृपाननुकुर्वतः ॥१०६॥
यह भरत मार्ग के दोनों ओर लगे हुए जिन वृक्षोंको देखते जाते थे वे वृक्ष राजाओंका अनुकरण कर रहे थे क्योंकि जिस प्रकार राजा सच्छाय अर्थात् उत्तम कान्तिसे सहित होते हैं उसी प्रकार वे वृक्ष भी सच्छाय अर्थात् उत्तम छांहरी से सहित थे, जिस प्रकार राजा सफल अर्थात् अनेक प्रकारको आयसे सहित होते हैं उसी प्रकार वे वृक्ष सफल अर्थात् अनेक प्रकारके फलोंसे सहित थे, जिस प्रकार राजा तुङ्ग अर्थात् उदार प्रकृतिके होते हैं उसी प्रकार वे वृक्ष भी तुङ्ग अर्थात् ऊंचे थे और जिस प्रकार राजाओंकी सम्पदाएं सबके उपभोगमें आती हैं उसी प्रकार उन वृक्षोंकी फल पुष्प पल्लव आदि सम्पदाएं भी सबके उपभोगमें आती थीं ।॥१०६ll
“The trees lining both sides of the path that King Bharata passed seemed to emulate royal qualities: just as kings possess splendid brilliance, so too did the trees have rich, cooling shade; just as kings are prosperous with various sources of wealth, the trees were laden with diverse fruits; just as kings are noble and lofty in nature, the trees stood tall and grand; and just as the wealth of kings is enjoyed by all, so too were the trees’ fruits, flowers, and foliage freely available for all to enjoy.”(Verse 106)
श्लोक ( Shlok ) 107
सरस्तीरभुवोऽपश्यत् सरोजरजसा तताः । सुवर्णकुट्टि माशङ्का मध्वन्यहृदि तन्वतीः ॥१०७॥
जो सरोवरोंके किनारेकी भूमियां कमलोंकी परागसे व्याप्त हो रही थीं और इसीलिये जो पथिकोंके हृदयमें क्या यह सुवर्णकी धूलियोंसे व्याप्त हैं, इस प्रकार शंका कर रहीं थीं; उन्हें भी महाराज भरत देखते जाते थे ।।१०७।।
“King Bharata also beheld the banks of the lakes, which were covered in lotus pollen and, because of this golden hue, seemed to make travelers wonder whether they were in fact sprinkled with golden dust.”(Verse 107)
श्लोक ( Shlok ) 108
बलरेणुभिरारुद्धे दोषांमन्ये नभस्यसौ । करुणं रुदतीं वीक्षाञ्चक्रे चक्राह्वकामिनीम् ॥१०८॥
सेनाकी धूलिसे भरे हुए और इसीलिये रात्रिके समान जान पड़नेवाले आकाशमें रात्रि समझ कर रोती हुई चकवीको देखकर महाराज भरतके हृदय में बड़ी दया उत्पन्न हो रही थी ॥ १०८॥
“Seeing the chakravāka bird crying in the dust-filled sky—mistaking it for night due to the army’s dust—King Bharata felt great compassion arise in his heart.”(Verse 108)
श्लोक ( Shlok ) 109
गवां गणानथापश्यद्गोष्पदारण्य चारिणः । क्षीरमेघानिवाजस्त्रं क्षरत्क्षीरप्लुतान्तिकान् ॥१०९।।
कुछ आगे चलकर उन्होंने जंगलोंकी गोचरभूमिमें चरते हुए गायोंके समूह देखे, वे गायों के समूह दूधके मेघों के समान निरन्तर झरते हुए दूधसे अपनी समीपवर्ती भूमिको तर कर रहे थे ।।१०९॥
“A little further ahead, he saw herds of cows grazing in the pasture lands of the forest. These herds, like clouds of milk, were continuously soaking the nearby ground with the streams of milk flowing from them.”(Verse 109)
श्लोक ( Shlok ) 110
सौरभेयान् स श्रृङ्गाग्रसमुत्खातस्थलाम्बुजान् । मुणालानि यशांसीव किरतोऽपश्यदुन्मदान् ॥११०।।
जिन्होंने अपने सींगों के अग्रभागसे स्थलकमल उखाड़ डाले हैं और जो अपने यशके समान उनकी मृणालोंको जहां तहां फेंक रहे हैं ऐसे उन्मत्त बैल भी भरत महाराजने देखे थे ।। ११०।।
“Maharaj Bharat also saw frenzied bulls who, with the tips of their horns, had uprooted land-lotuses and were scattering their stalks here and there, just like their fame being spread in all directions.”
(Verse 110)
श्लोक ( Shlok ) 111
वात्सकं क्षीरसम्पोषादिव निर्मलविग्रहम् । सोऽपश्यचापलस्येव परां कोटि कृतोत्प्लुतिम् ॥१११॥
दूधसे पालन पोषण होनेके कारण ही मानो जिनका निर्मल सफेद शरीर है, जो चंचलताकी अन्तिम सीमाके समान जान पड़ते हैं और जो बार बार उछल-कूद रहे हैं ऐसे गायोंके बछडोंके समूह भी भरतेश्वर देखते जाते थे ।।१११।।
Maharaj Bharata also kept observing the groups of calves, whose pure white bodies seemed to be the result of being nourished by milk, who appeared to be the very limit of playfulness, and who were repeatedly leaping and frolicking about.(Verse 111)
श्लोक 112 से 121
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आदिपुराण भाग – 2
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