आदिपुराण पर्व 25 – भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 144 से 155 | श्लोक 156 से 167 | श्लोक 168 से 178 | श्लोक 179 से 190 | श्लोक 191 से 203 | श्लोक 204 से 217 | श्लोक 218 से 231 | श्लोक 232 से 244 | श्लोक 245 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281
श्लोक 1 से 11
चक्रवर्ती भरत का उत्सव और शरद् ऋतु की शोभा
महाराज भरत ने विधिपूर्वक चक्ररत्न की पूजा की और पुत्र जन्म का आनंद मनाया। उनके उत्सव में कोई दरिद्र नहीं रहा, क्योंकि दान से याचक संतुष्ट होकर याचना छोड़ चुके थे। नगर में रत्नों के ढेर लगाए गए, जो याचकों को दे दिए गए। चक्ररत्न की पूजा शत्रुओं के लिए हिंसक और पुत्र जन्म उत्सव संसार के लिए शांति कर्म समान था। शरद् ऋतु की निर्मल शोभा, सप्तपर्ण फूलों की पराग, स्वच्छ जल, हंसों की पंक्तियां, और कमलों से सुशोभित सरोवर प्रकृति की सुंदरता को दर्शाते थे।
श्लोक 12 से 21
चक्रवर्ती भरत का उत्सव और शरद् ऋतु की शोभा
महाराज भरत ने विधिपूर्वक चक्ररत्न की पूजा की और पुत्र जन्म का आनंद मनाया। उनके उत्सव में कोई दरिद्र नहीं रहा, क्योंकि दान से याचक संतुष्ट होकर याचना छोड़ चुके थे। नगर में रत्नों के ढेर लगाए गए, जो याचकों को दे दिए गए। चक्ररत्न की पूजा शत्रुओं के लिए हिंसक और पुत्र जन्म उत्सव संसार के लिए शांति कर्म समान था। शरद् ऋतु की निर्मल शोभा, सप्तपर्ण फूलों की पराग, स्वच्छ जल, हंसों की पंक्तियां, और कमलों से सुशोभित सरोवर प्रकृति की सुंदरता को दर्शाते थे।
श्लोक 22 से 31
शरद् ऋतु की प्राकृतिक सौंदर्यता
शरद् ऋतु में नदियों के किनारे स्वच्छ हो गए, सरोवर कमलों से और खेत नीलोत्पलों से सुशोभित थे। हंस और सारस पक्षियों के मधुर शब्द तालाबों को और आकर्षक बनाते थे। शरद् ऋतु लक्ष्मी रूपी स्त्री के समान थी, जिसके नेत्र नीलोत्पल और मुख कमल थे। पके चावल के खेत हल्दी से स्नान किए हुए से प्रतीत होते थे। हंसों को शरद् की शोभा से हर्ष और मयूरों को दुख हुआ, जो शुद्ध और अशुद्ध स्वभाव को दर्शाता है। बंधूक पुष्पों ने वनों की शोभा बढ़ाई।
श्लोक 32 से 41
प्रकृति और भरत की शोभा
मेघों के नष्ट होने से दिशाएं प्रसन्न थीं और हंसों से अलंकृत थीं। मयूरों ने कलहंसों के मधुर शब्दों से पराजित होकर अपनी वाणी छोड़ दी। शरद् ऋतु चांदनी और नक्षत्रों से सुशोभित थी। चंद्रमा कीर्ति फैलाता हुआ राजा के समान था। शरद् ऋतु नवोढ़ा स्त्री की तरह बंधूक फूलों से लालिमा धारण किए थी। आकाश, नदियां और दिशाएं स्वच्छ और निर्मल थीं। वन-पंक्तियां सुगंधित फूलों और भौंरों से आकर्षक थीं।
श्लोक 42 से 51
ग्रामीण जीवन और प्रकृति
मदोन्मत्त बैल स्थलकमलों को खोद रहे थे और गायें दूध से भूमि को तर कर रही थीं। गायें और उनके बछड़े शरद् ऋतु की शोभा के समान थे। मेघों के नष्ट होने से मयूरों को दुख हुआ। फूले हुए वृक्ष और झरने पर्वतों को हंसते और फाग खेलते हुए दर्शाते थे। कलमी धान और सहजना वृक्ष प्रकृति की समृद्धि को दर्शाते थे।
श्लोक 52 से 61
प्रकृति और भरत का दिग्विजय उद्योग
सहजना वृक्ष और मेघ-मुक्त दिशाएं नेत्रों को आनंद देती थीं। पर्वत सफेद बादलों से नवीन वस्त्र धारण किए थे। मेघरूपी हाथी और तोताओं की पंक्तियां प्रकृति की शोभा बढ़ाती थीं। सूर्य भरत के समान प्रतापी और तेजस्वी था। शरद् ऋतु की निर्मलता में भरत ने चक्ररत्न के साथ दिग्विजय का उद्योग किया।
श्लोक 62 से 71
भरत का राजसी वैभव
भरत ने चांदनी जैसे वस्त्र, ब्रह्मसूत्र, और मुकुट धारण किए। उनके कुण्डल सूर्य-चंद्र के समान थे। कौस्तुभ मणि और छत्र विजयलक्ष्मी के प्रतीक थे। स्थपति रत्न ने सुवर्ण और मणियों से युक्त रथ तैयार किया, जिसमें वेगशाली घोड़े जोते गए।
श्लोक 72 से 81
भरत की सेना का प्रस्थान
भरत ने दिग्विजय के लिए प्रस्थान किया। जय-जयकार से आकाश गूंज उठा। राजा और सेनापति उन्हें घेरे थे। सेना पैदल, घुड़सवार, रथ, और हाथियों के क्रम में थी। सुवर्णमय धूलि से आकाश सुशोभित था। नगर की गलियां खाली हो गईं, और स्त्रियां पुष्पांजलि अर्पित कर रही थीं।
श्लोक 82 से 91
नगर से प्रस्थान और सेना की शोभा
नगरवासी आशीर्वाद दे रहे थे। भरत रत्नों से देदीप्यमान गोपुरद्वार से निकले। सेना असंख्य और विशाल थी, मानो नवीन सृष्टि हो। देवता आश्चर्य से इसे देख रहे थे। चक्ररत्न और दण्डरत्न के नेतृत्व में सेना पूर्व दिशा की ओर बढ़ी।
श्लोक 92 से 101
मार्ग की प्राकृतिक शोभा
भरत ने शरद् ऋतु की शोभा देखी। सरोवर, हंस, चकवा-चकवी, और नदियों के किनारे मनोहर थे। हंस और चकवी की गतिविधियां भरत के मन को प्रसन्न करती थीं। नदियों और लतागृहों की शोभा ने उनके हृदय में प्रीति जागृत की।
श्लोक 102 से 111
मार्ग के दृश्य
भरत ने लतागृहों में किन्नरों, भौंरों, और फूलों से सजे वृक्षों को देखा। सरोवरों की भूमि सुवर्ण धूलि सी प्रतीत होती थी। सेना की धूलि से चकवी को रात्रि का भ्रम हुआ। गायें, बैल, और बछड़े ग्रामीण जीवन की शोभा बढ़ाते थे।
श्लोक 112 से 121
खेतों और ग्रामीण जीवन की शोभा
पके धान के खेत और कमल सूंघते पौधे भरत को आनंदित करते थे। धान की समृद्धि गायों के समान थी। धान की रखवाली करने वाली स्त्रियां गीत गाती थीं। किसान खेतों की रक्षा करते थे। गांव के मार्ग और बगीचे मनोहर थे।
श्लोक 122 से 128
ग्रामों और गंगा की ओर प्रस्थान
भरत ने गांवों के मुखिया, बगीचे, और लताओं से सजे ग्राम देखे। गांववासी घी, दही, और फल भेंट करते थे। सेना के साथ भरत गंगा नदी के समीप पहुंचे।
श्लोक 129 से 147
गंगा नदी का वर्णन
गंगा नदी भरत की कीर्ति, जिनवाणी, विजयलक्ष्मी, और राज्यलक्ष्मी के समान थी। इसके किनारे वन, लहरें, हंस, और भंवर इसे स्त्री, गाय, और सेना के समान शोभायमान करते थे। किन्नरों के गीत और हरिणों की उपस्थिति इसकी शोभा बढ़ाते थे।
श्लोक 148 से 150
गंगा की शोभा और भरत का आनंद
शरद् ऋतु में गंगा की कान्ति, वन, बालू के टीले, और भंवर इसे तरुण स्त्री समान बनाते थे। कमलों की सुगंध और वायु रानियों के परिश्रम को हरते थे। गंगा जिनेन्द्र की कीर्ति के समान पवित्र और आनंददायी थी, जिसे देखकर भरत परम प्रीति को प्राप्त हुए।
English translation of Ādi purāṇa parv 26 – Shlok 1 to 11
श्लोक ( Shlok ) 1
अथ चक्रधरः पूजां चक्रस्य विधिवद् व्यधात्। सुतोत्पत्तिमपि श्रीमान् भ्यनन्ददनुक्रमात् ॥१॥
अथानन्तर श्रीमान् चक्रवर्ती भरत महाराजने विधिपूर्वक चक्ररत्नकी पूजा की और फिर अनुक्रमसे पुत्र उत्पन्न होनेका आनन्द मनाया ॥१॥
Thereafter, the illustrious Emperor Bharata duly worshipped the divine discus (Chakraratna), and then rejoiced at the birth of sons in succession.

श्लोक ( Shlok ) 2
ना’दरिद्रीज्जनः कश्चिद् विभोस्तस्मिन् महोत्सवें । दारिद्य् मर्थिलाभे तु जातं विश्वाशितं भवे ॥२॥
राजा भरतके उस महोत्सव के समय संसार भरमें कोई दरिद्र नहीं रहा था किन्तु दरिद्रता इस बातकी हो गई थी कि धन देने पर भी उसे कोई लेनेवाला नहीं मिलता था । भावार्थ-महाराज भरतके द्वारा दिये हुए दानसे याचक लोग इतने अधिक संतुष्ट हो गये कि उन्होंने हमेशाके लिये याचना करना छोड़ दिया ॥२॥
During that grand festival of King Bharata, there was no poverty left anywhere in the world; rather, the poverty was such that even after offering wealth, there was no one to receive it.
Meaning – The gifts given by King Bharata were so generous that the seekers became completely satisfied and gave up begging forever.
श्लोक ( Shlok ) 3
चतुष्केषु च रथ्यासु’ पुरस्यान्तर्बहिः पुरम् । पुञ्जीकृतानि रत्नानि तदार्थिभ्यो ददौ नृपः ॥३॥
उस समय राजाने चौराहोंमें, गलियोंमें, नगरके भीतर और बाहर सभी जगह रत्नोंके ढेर किये थे और वे सब याचकोंके लिये दे दिये थे ।।३।।
At that time, the king had piled up heaps of gems at crossroads, in lanes, and throughout the city, both inside and outside, and all of them were given away to the seekers.
श्लोक ( Shlok ) 4
अभिचार” क्रियेवासीच्चक्रपूजास्य विद्विषाम्। जगतः शान्तिकर्मेव जातकर्माप्यभूत्तदा ॥४।॥
उस समय भरतने जो चक्ररत्नकी पूजा की थी वह उसके शत्रुओंके लिये अभिचार क्रिया अर्थात् हिसाकार्यके समान मालूम हुई थी और पुत्र-जन्मका जो उत्सव किया था वह संसारको शान्ति कर्मके समान जान पड़ा था ।।४।।
At that time, the worship of the divine discus (Chakraratna) performed by Bharata appeared like a hostile ritual (a destructive act) to his enemies, while the celebration of his sons’ birth seemed to the world like an act of peace and harmony.
श्लोक ( Shlok ) 5
ततोऽस्य दिग्जयोद्योगसमये शरदापतत् । जयलक्ष्मीरिवामुप्य प्रसन्ना विमलाम्बरा ॥५॥
तदनन्तर भरतने दिग्विजयके लिये उद्योग किया, उसी समय शरऋतु भी आ गई जो कि भरतकी जयलक्ष्मीके समान प्रसन्न तथा निर्मल अम्बर (आकाश) को धारण करनेवाली थी ।।५।।
Thereafter, Bharata set out for a campaign of world conquest, and at the same time, the autumn season arrived—radiant and cheerful like the goddess of victory (Jayalakshmi) of Bharata, adorned with a clear and spotless sky.
श्लोक ( Shlok ) 6
अलका इव संरेजुः रस्या मधुकरव्रजाः । सप्तच्छदप्रसूनोत्थरजोभूषित “विग्रहाः ॥६॥
उस समय सप्तपर्ण जातिके फूलोंसे उठी हुई परागसे जिनुके शरीर सुशोभित हो रहे हैं ऐसे भूमरोंके समूह इस शरद् ऋतुके अलकों (केशपाश) के समान शोभाय-मान हो रहे थे ॥ ६॥
At that time, swarms of bees, whose bodies were adorned with the pollen rising from the flowers of the Saptaparna trees, appeared as splendid as the flowing locks (hair) of the autumn season.

श्लोक ( Shlok ) 7
प्रसन्नमभवत्तोयं सरसां सरितामपि। कवीनामिव सत्काव्यं जनताचित्तरञ्जनम् ।।७।।
जिस प्रकार कवियोंका उत्तम काव्य प्रसन्न अर्थात् प्रसाद गुणसे सहित और जनसमूहके चित्तको आनन्दित करनेवाला होता है उसी प्रकार तालाबों और नदियोंका जल भी प्रसन्न अर्थात् स्वच्छ और मनुष्योंके चित्तको आनन्द देनेवाला बन गया था ।।७।।
Just as the finest poetry of poets is endowed with the quality of clarity and delights the hearts of the masses, in the same way, the water of ponds and rivers had also become clear and pleasing, bringing joy to people’s hearts.
श्लोक ( Shlok ) 8
सितच्छदावली रेजे सम्पतन्ती समन्ततः । स्थूलमुक्तावली नद्धा कण्ठिकेव शरच्छ्रिय ॥८॥
चारों ओर उड़ती हुई हंसोंकी पंक्तियां ऐसी सुशोभित हो रही थीं मानो शरऋतुरूपी लक्ष्मी की बड़े बड़े मोतियोंकी मालासे बनी हुई कण्ठमाल (गलेमें पहननेका हार) ही हो ॥८॥
“The rows of flying swans all around were appearing so beautiful, as if they were a garland (necklace) made of large pearls, adorning the goddess of the autumn season (Sharad Ritu).” ( 8)
श्लोक ( Shlok ) 9
सरोजलमभूत्कान्तं सरोजरजसा ततम् । सुवर्णरजसाकीर्णमिव कुट्टिमभूतलम् ॥ ९ ॥
कमलोंकी परागसे व्याप्त हुआ सरोवरका जल ऐसा सुन्दर जान पड़ता था मानो सुवर्णकी धूलिसे व्याप्त हुआ रत्नजटित पृथिवीका तल ही हो ॥९॥
“The lake water, filled with the pollen of lotuses, appeared so beautiful as if it were the surface of a jewel-studded earth covered with golden dust.” ( 9)

श्लोक ( Shlok ) 10
सरः सरोजरजसा परितः स्थगितोदकम्। कादम्ब जायाः सम्प्रेक्ष्य मुमुहुः स्थलशंकया ।।१०।।
जिसका जल चारों ओरसे कमलों की परागसे ढका हुआ है ऐसे सरोवरको देखकर कादम्ब जातिके हंसोंकी स्त्रियां स्थलका संदेह कर बार बार मोहमें पड़ जाती थीं अर्थात् सरोवरको स्थल समझने लगती थीं ॥१०॥
“Seeing the lake whose water was covered all around with lotus pollen, the female swans of the Kadamba species were repeatedly confused, mistaking it for land.” ( 10)
श्लोक ( Shlok ) 11
कञ्जकिञ्जल्कपुञ्जेन पिञ्जरा षट्पदावली । सौवर्णमणिदृब्धेव शरदः कण्ठिका बभौ ॥११॥
जो भूमरोंकी पंक्तियां कमलोंके केशरके समूहसे पीली पीली हो गई थीं वे ऐसी जान पड़ती थीं मानो सुवर्णमय मनकाओंसे गूंथा हुआ शरद् ऋतुका कंठहार ही हो ।।११।।
“The rows of bumblebees, turned yellow by the clusters of lotus filaments, appeared as if they were a golden beaded necklace adorning the autumn season.” ( 11)
श्लोक 12 से 21
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196
आदिपुराण पर्व 24 – भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 172 | श्लोक 173 से 181 | श्लोक 182 से 186
आदिपुराण पर्व 25 – भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 110 | श्लोक 111 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 143 | श्लोक 144 से 155 | श्लोक 156 से 167 | श्लोक 168 से 178 | श्लोक 179 से 190 | श्लोक 191 से 203 | श्लोक 204 से 217 | श्लोक 218 से 231 | श्लोक 232 से 244 | श्लोक 245 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281