आदिपुराण भाग – 2 पर्व 27 – भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131
श्लोक 132 से 141
शिबिर और बाजार की शोभा
शिबिर की कटीली बाड़ियां भरत के निष्कंटक राज्य का प्रतीक थीं। वृक्षों पर टंगे पलान और डेरे शोभा बढ़ाते थे। बाजार में तोरण, ध्वजाएं, और रत्नों की राशि थी। भरत ने रत्नों को देखकर निधियों की संख्या को प्रसिद्धि मात्र माना। बाजार समुद्र सा था, जिसमें घोड़े लहरें, तलवारें मछलियां, और हाथी मगर थे। राजमार्ग राजकुमारों से भरा था।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 27 – Shlok 132 to 141
श्लोक ( Shlok ) 132
सामन्तानां निवेशेषु कायमानानि” नेकधा । निवेशितानि विन्यासै र्निदध्यौ प्रभुरग्रतः ॥१३२॥
सामन्त लोगोंकी ठहरनेकी जगहपर अनेक प्रकारकी रचना कर जो तम्बू वगैरह बनाये गये थे उन्हें भी महाराज भरतने सामनेसे देखा था ।॥१३२॥
“King Bharata also saw, from the front, the various tents and structures that had been set up for the accommodations of the vassals.” ॥132॥
श्लोक ( Shlok ) 133
परितः कायमानानि वीक्ष्य कण्टकिर्नार्वृतीः। निष्कण्टके निजे राज्ये मेने तानेव कण्टकान् ॥१३३।।
तम्बुओंके चारों ओर जो कटीली बाड़ियां बनाई गई थीं उन्हें देखकर महाराज भरतने अपने निष्कण्टक राज्यमें ये ही कांटे हैं ऐसा माना था । भावार्थ-भरतके राज्यमें बाड़ी के कांटे छोड़कर और कोई कांटे अर्थात् शत्रु नहीं थे ।।१३३।।
“Seeing the thorny fences erected around the tents, King Bharata thought, ‘These are the only thorns in my kingdom.’
Meaning: In King Bharata’s realm, these thorns were the only adversaries, as there were no other enemies.” ॥133॥
श्लोक ( Shlok ) 134
तरुशाखाग्रसंसक्त पर्याणादि’ परिच्छदान् । स्कन्धावारावद् बहिः कांश्चिदावासान् प्रभुर्रैक्षत ॥१३४।।
जहां पर वृक्षों की डालियों के अग्र भाग पर घोड़ों के पलान आदि अनेक वस्तुएं टंगी हुई हैं और जो शिबिर के बाहिर बने हुए हैं ऐसे कितने ही डेरे महाराज भरतने देखे ॥१३४।।
“King Bharata saw many camps outside the encampment, where various items such as horse saddles and other goods were hanging from the branches of trees.” ॥134॥
श्लोक ( Shlok ) 135
बहिर्निवेशमित्यादीन् विशेषान् स विलोकयन् । प्रवेशे शिबिरस्यास्य महाद्वारमथासदत् ।।१३५।।
इस प्रकार शिबिर के बाहर बनी हुईं अनेक प्रकार की विशेष वस्तुओंको देखते हुए महाराज शिबिरमें प्रवेश करनेके लिये उसके बड़े दरवाजे पर जा पहुंचे ॥१३५॥
“Thus, after observing the various unique items outside the camp, King Bharata reached the grand gate to enter the encampment.” ॥135॥
श्लोक ( Shlok ) 136
तदतीत्य समं सैन्यैः संगच्छन् किञ्चिदन्तरम् । महाब्धिसमनिर्घोषमाससाद वणिक्पथम् ॥१३६॥
बड़े दरवाजेको उल्लंघन कर सैनिकोंके साथ कुछ दूर और गये तथा जिसमें समुद्रके समान गंभीर शब्द हो रहे हैं ऐसे बाजार में वे जा पहुंचे ॥ १३६॥
“Passing through the grand gate, he went a little further with his soldiers and reached a marketplace where there were sounds as deep and resonant as the sea.” ॥136॥
श्लोक ( Shlok ) 137
कृतोपशोभमाबद्धतोरणं चित्रकेतनम् । वणिग्भिरूढरत्नार्घ जगाहे वणिक्पथम् ॥१३७৷৷
जिसकी बहुत अच्छी सजावट की गई है जिसमें तोरण बंधे हुए हैं, अनेक प्रकारकी ध्वजाएं फहरा रही हैं और व्यापारी लोग जिसमें रत्नों का अर्थ लेकर खड़े हैं ऐसे उस बाजार में महाराज ने प्रवेश किया ॥१३७।।
“King Bharata entered that marketplace which was beautifully decorated, adorned with festoons, fluttering with various flags, and where merchants stood displaying their jewels and treasures.” ॥137॥
श्लोक ( Shlok ) 138
प्रत्यापणमसौ तत्र रत्नराशीन्निधीनिव । पश्यन् मेने निधीयत्तां प्रसिद्धयैव तथास्थिताम् ॥१३८॥
वहां पर प्रत्येक दुकान पर निधियों के समान रत्नों की राशि देखते हुए महाराज भरत ने माना था कि निधियों की संख्या प्रसिद्धि मात्र से ही निश्चित की गई है। भावार्थ प्रत्येक दूकान पर रत्नोंकी राशियां देखकर उन्होंने इस बातका निश्चय किया था कि निधियोंकी संख्या नौ है यह प्रसिद्धि मात्र है, वास्तवमें वे असंख्यात हैं ।॥ १३८।।
“Seeing heaps of gems on every shop, resembling treasures themselves, King Bharata concluded that the famed number of ‘nine treasures’ must be mere hearsay—for in truth, the treasures are countless.” ॥138॥
श्लोक ( Shlok ) 139
समौक्तिकं स्फुरद्रत्नं जनतोत्कलिकाकुलम् । रथा वणिक्पथाम्भोधि पोता इव ललङघिरे ॥ १३९।।
जो मोतियों से सहित है, जिसमें अनेक रत्न देदीप्यमान हो रहे हैं और जो मनुष्योंके समूहरूपी लहरों से व्याप्त हो रहा है ऐसे उस बाजाररूपी समुद्र को रथोंने जहाज के समान पार किया था ॥ १३९॥
“Adorned with pearls, gleaming with countless jewels, and filled with waves of people, that marketplace resembled a vast ocean—which the chariots crossed like ships upon the sea.” ॥139॥
श्लोक ( Shlok ) 140
चलदश्वीयकल्लोलैः स्फुरन्नि स्त्रिशरोहितैः । राजमार्गोऽम्बुधेर्लीलां महेभमकररधात् ॥१४०॥
उस समय वह राजमार्ग चलते हुए घोड़ों के समुदायरूपी लहरों से, चमकती हुई तलवाररूपी मछलियों से और बड़े बड़े हाथीरूपी मगरों से ठीक समुद्रकी शोभा धारण कर रहा था ।। १४०।।
“At that time, the royal road took on the appearance of a sea—its waves formed by the moving groups of horses, its shining swords like glimmering fish, and its great elephants resembling mighty crocodiles.” ॥140॥
श्लोक ( Shlok ) 141
राजन्यकेन संरुद्धः समन्तादानृपालयम् । तदासौ विपणीमार्गः सत्यं राजपथोऽभवत् ॥१४१।।
उस समय वह बाजार का रास्ता महाराज के तम्बू तक चारों ओरसे अनेक राजकुमारों से भरा हुआ था इसलिये वास्तव में राजमार्ग हो रहा था ।।१४१।।
“At that time, the path through the marketplace, filled on all sides with numerous princes, truly became a royal road leading to the king’s pavilion.” ॥141॥
श्लोक 142 से 152
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2
आदिपुराण पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 128 | श्लोक 129 से 147 | श्लोक 148 से 150
आदिपुराण पर्व 27 – भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131