आदिपुराण पर्व 19 – नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 |
श्लोक 142 से 151 वन और शिखरों की महिमा
भ्रमर और कोयल वन में शब्द करते थे। मयूरों के प्रतिबिंब कमल सी शोभा देते थे। पर्वत की पवित्रता समुद्र को तिरस्कृत करती थी। वन की पंक्ति मेघ संदेह से मयूरों को नचाती थी। उपवन देवों से क्रीड़ा करते थे। सूर्य मणियों से रंगीन होता था। शिखर दिशाओं को आच्छादित करते थे। अजगर गुफा से वन जलाता था। संध्या की लालिमा मेरु सी थी।
English translation of Ādi purāṇa parv 19 – Shlok 142 to 151
श्लोक ( Shlok ) 142
कूजद्विरेफा वनराजिरेषा प्रोद्गातुकामेव महीध्रमेनम् पुष्पान्जलिं विक्षिपतीव विश्वग्विकीर्यमाणैः सुमनः प्रतानैः ॥ १४२॥
जिसमें अनेक भ्रमर गुंजार कर रहे हैं ऐसी यह वनों की पंक्ति ऐसी मालूम होती है मानो इस पर्वत का यश ही गाना चाहती हो और जो इसके चारों ओर फूलों के समूह बिखरे हुए हैं उनसे यह ऐसी जान पड़ती है मानो इस पर्वत को पुष्पांजलि ही दे रही हो ।।142।।
“This row of forests, filled with the humming of countless bees, appears as if it wishes to sing the praises of this mountain. And with clusters of flowers scattered all around, it seems as though it is offering a floral tribute to the mountain.”
श्लोक ( Shlok ) 143
वनद्रुमाः षट्पदचौरवृन्दैर्विलुप्यमानप्रसवार्थसाराः । चोकू यमाना इव भान्त्यमुष्मिन् समु च्चरत्कोकिलकूजितेन ॥१४३॥
इस वन के वृक्षों पर बैठे हुए भ्रमर पुष्परस का पान कर रहे हैं और कोयलें मनोहर शब्द कर रही हैं जिससे ऐसा मालूम होता है मानो भ्रमररूपी चोरों के समूह ने इन वन-वृक्षों का सब पुष्प-रसरूपी धन लूट लिया है और इसीलिए वे बोलती हुई कोयलों के शब्दों के द्वारा मानो हल्ला ही मचा रहे हों ।।143।।
“The bees perched on the trees of this forest are drinking the nectar of the flowers, while the cuckoos sing melodiously. It seems as if a group of bee-like thieves has looted all the flower-nectar from the forest trees, and the cuckoos, with their calls, are raising an outcry in protest.”
श्लोक ( Shlok ) 144
महाद्रेरमुष्य स्थलीः कालधौतीरुपेत्य स्फुटं नृत्यतां बर्हिणानाम् । प्रतिच्छायया तन्य ते व्यक्तमस्मिन् समुत्फुल्लनीलाब्जषण्डस्य लक्ष्मीः ॥१४४॥
इस पर्वत के चाँदी के बने हुए प्रदेशों पर आकर जो मयूर खूब नृत्य कर रहे हैं उनके पड़ते हुए प्रतिबिंब इस पर्वत पर खिले हुए नीलकमलों के समूह की शोभा फैला रहे हैं । भावार्थ―चाँदी की सफेद जमीन पर पड़े हुए मयूरों के प्रतिबिंब ऐसे पड़ते हैं मानो पानी में नील कमलों का समूह ही फूल रहा हो ।।144।।
“The peacocks, dancing joyfully upon the silver-covered regions of this mountain, cast their reflections on the ground. These reflections enhance the beauty of the mountain, resembling clusters of blooming blue lotuses. (Implied meaning: The reflections of the peacocks on the silver-white ground appear as if blue lotuses are blossoming in water.)“
श्लोक ( Shlok ) 145
अतुलितमहिमा हिमावदावद्युतिरनतिक्रमणीयपुण्यमूर्तिः । रजतगिरिरयं विलङ्गिताब्धिः सुरसरिदोघ इवावभाति पृथ्व्याम् ॥१४५॥
इसका माहात्म्य अनुपम है, इसकी कांति बर्फ के समान अतिशय स्वच्छ है, इसकी पवित्र मूर्ति का कोई भी उल्लंघन नहीं कर सकता अथवा यह किसी के भी द्वारा उल्लंघन न करने योग्य पुण्य की मूर्ति है और इसने स्वयं समुद्र तक पहुँचकर उसे तिरस्कृत कर दिया है इन सभी कारणों से यह चाँदी का विजयार्ध पर्वत पृथिवी पर गंगा नदी के प्रवाह के समान सुशोभित हो रहा है ।।145।।
“Its greatness is unparalleled, its radiance is as pure and pristine as snow, and its sacred form cannot be violated by anyone—or rather, it stands as an embodiment of merit, inviolable by all. Moreover, having reached the ocean itself, it has even surpassed it in majesty. For all these reasons, this Silver Victory Peak shines upon the earth like the flowing stream of the sacred Ganga.”
श्लोक ( Shlok ) 146
अस्य महाद्रेरनुतटमुच्चैः प्रेक्ष्य विनीलामुपवनराजीम् । नृत्यत्ति हृष्टो जलदविशङ्की बर्हिंगणोऽयं विरचितबर्हः ॥१४६॥
इस महापर्वत के प्रत्येक ऊँचे तट पर लगी हुई हरी-हरी वनपंक्ति को देखकर इन मयूरों को मेघों की शंका हो रही है जिससे वे हर्षित हो पूँछ फैलाकर नृत्य कर रहे हैं ।।146।।
“Seeing the lush green rows of forests lining the high edges of this great mountain, the peacocks mistake them for rain clouds. Overjoyed by this sight, they spread their tails and dance in delight.”
श्लोक ( Shlok ) 147
अस्यानुसानु सुरपन्नगखेचराणामा क्रीडनान्युपवनाति विभान्त्यमूनि । नानालतालयसरः सिकतोच्च यानि नित्यप्रवालकुसुमोज्ज्वळपादपानि ॥ १४७॥
जिनमें देव, नागेंद्र और धरणेंद्र सदा क्रीड़ा किया करते हैं, जिनमें नाना प्रकार के लतागृह, तालाब और बालू के टीले (क्रीड़ाचल) बने हुए हैं और जिनके वृक्ष कोमल पत्ते तथा फूलों से निरंतर उज्ज्वल रहते हैं ऐसे ये उपवन इस पर्वत के प्रत्येक शिखर पर सुशोभित हो रहे हैं ।।147।।
“These groves, where Devas, Nagendras, and Dharanendras constantly engage in playful pastimes, where various vine-covered pavilions, ponds, and sand dunes serve as delightful playgrounds, and whose trees remain ever-bright with tender leaves and blossoms, adorn every peak of this mountain with their beauty.”
श्लोक ( Shlok ) 148
अस्य महाद्रेरुपतटमृ ध्छन् मूर्च्छति नानामणिकिरणौघैः । चित्रितमूर्तिर्वियति पतङ्गः चित्र पतङ्गच्छविमिहधत्ते ॥१४८॥
इधर, यह सूर्य चलता-चलता इस महापर्वत के किनारे आ गया है और वहाँ अनेक प्रकार के मणियों के किरणसमूह से चित्र-विचित्र होने के कारण आकाश में किसी अनेक रंग वाले पक्षी की शोभा धारण कर रहा है ।।148।।
“Here, as the sun moves along, it reaches the edge of this great mountain. There, due to the dazzling rays of various gemstones, it appears in the sky with the splendor of a multicolored bird.”
श्लोक ( Shlok ) 149
मणिद्युतितान्तरैः प्रमुदितोरगव्यन्तरे र्निरुद्धरविमण्डलैः स्थगितविश्वदिङ्मण्डलैः । “मरुद्गतिनिवारिभिः सुरवधूमनोहारिभिर्विभाति शिखरैर्धनैगिरिरयं नभोलङ्घनैः ॥१४९॥
जिनके मध्यभाग रत्नों की कांति से व्याप्त हो रहे हैं, जिनमें नागकुमार और व्यंतर जाति के देव प्रसन्न होकर क्रीड़ा करते हैं, जिन्होंने सूर्यमंडल को भी रोक लिया है, जिन्होंने सब दिशाएँ आच्छादित कर ली हैं, जो वायु की गति को भी रोकने वाले हैं, देवांगनाओं के मन का हरण करते हैं और आकाश को उल्लंघन करने वाले हैं ऐसे बड़े-बड़े सघन शिखरों से यह पर्वत कैसा सुशोभित हो रहा है ।।149।।
“How magnificent this mountain appears with its towering, dense peaks—whose midsections glow with the radiance of gemstones, where Nagakumaras and Vyantara deities joyfully engage in play, which have even obstructed the sun’s path and enveloped all directions, which can halt the wind’s movement, captivate the hearts of celestial maidens, and seem to defy the very sky itself.”
श्लोक ( Shlok ) 150
एष भीषणो महाहिरस्य कन्दराद् गिरेरीषदुन्मि षन्पयोनिधेरिवायत स्तिमिः । काषपेषितान्तिकस्थलस्थगुल्मपादपोरोषशु “त्कृतोष्मणा दहत्युपान्तकाननम् ॥१५०॥
इधर देखो, जिस प्रकार कोई महामत्स्य समुद्र में से धीरे-धीरे निकलता है उसी प्रकार इस पर्वत की गुफा में से यह भयंकर अजगर धीरे-धीरे निकल रहा है । इसने अपने शरीर से समीपवर्ती लता, छोटे-छोटे पौधे और वृक्षों को पीस डाला है तथा यह क्रोधपूर्वक की गयी फूत्कार की गरमी से समीपवर्ती वन को जला रहा है ।।150।।
“Look here! Just as a great fish slowly emerges from the ocean, in the same way, this terrifying python is slithering out of the cave of the mountain. With its massive body, it has crushed the nearby creepers, small plants, and trees, and with the heat of its furious hiss, it is scorching the surrounding forest.”
श्लोक ( Shlok ) 151
रत्नालोकैः कृतपर भागे तटभागे सन्ध्यारागे प्रसरति सान्द्रारुणरागे । रौप्योदीप्रां प्रकृतिविरुद्धामपि धत्ते प्रेक्ष्यां लक्ष्मी कनकमयाद्रेरयमद्रिः ॥१५१॥
इधर इस पर्वत के किनारे पर अनेक प्रकार के रत्नों के प्रकाश से मिली हुई संध्याकाल की गहरी ललाई फैल रही है जिससे यह रूपमय होने पर भी अपनी प्रकृति से विरुद्ध सुवर्णमय मेरु पर्वत की दर्शनीय शोभा धारण कर रहा है ।।151।।
“Here, along the edge of this mountain, the deep crimson glow of dusk mingles with the radiance of various gemstones. As a result, though naturally resplendent in its own form, the mountain now takes on the mesmerizing golden brilliance of the legendary Mount Meru, displaying an extraordinary beauty.”
श्लोक 152 से 161
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