आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141
श्लोक 142 से 151 मेरु पर जलप्रवाह
जलप्रवाह मेरु को नापता सा, शिखरों से खकारा, गुफाओं से उगला। झरनों से स्वर्ग को धिक्कार। आकाश, ज्योतिष, पृथ्वी ढका। वनों में विश्राम, फिर फैला। वृक्षों से रुककर शीघ्र विस्तृत। मेरु को सफेद वस्त्र सा ढका, आकाशगंगा सा, शब्दाद्वैत सिद्ध करता सा।
English translation of Ādi purāṇa parv 13 – Shlok 142 to 151
श्लोक ( Shlok ) 142
दूरमुत्सारयन् स्वैरमासीनान् सुरदम्पतीन् । स्नानपूरः स पर्यन्ता न्मेरोराशिश्रियद् द्रुतम् ।।१४२।।
वह अभिषेकजल का प्रवाह अपनी इच्छानुसार बैठे हुए सुरदंपतियों को दूर हटाता हुआ शीघ्र ही मेरुपर्वत के निकट जा पहुँचा ।।142।।
The stream of consecration water, pushing aside the seated divine couples at will, swiftly made its way toward Mount Meru. ॥142॥
श्लोक ( Shlok ) 143
उदभारः पयोवार्द्धेरापतन्मन्दरादधः । आभूतलं तदुन्मानं मिमान इव दिद्युते ॥१४३।।
और मेरु पर्वत से नीचे भूमि तक पड़ता हुआ वह क्षीरसागर के जल का प्रवाह ऐसा शोभायमान हो रहा था मानो मेरु पर्वत को खड़े नाप से नाप ही रहा हो ।।143।।
d as the stream of water from the Milk Ocean descended from Mount Meru to the earth below, it appeared resplendent, as if measuring the height of Mount Meru with a vertical scale. ॥143॥
श्लोक ( Shlok ) 144
गुहामुखैरिवापीतः शिखरैरिव खात्कृतः । कन्दरैरिव निष्ठयुतः प्रार्ध्नोन्मेरौ पयःप्लवः ।।१४४।।
उस जल का प्रवाह मेरु पर्वत पर ऐसा बढ़ रहा था मानो शिखरों के द्वारा खकारकर दूर किया जा रहा हो, गुहारूप मुखों के द्वारा पिया जा रहा हो और कंदराओं के द्वारा बाहर उगला जा रहा हो ।।144।।
The stream of that water surged over Mount Meru as if it were being repelled by its peaks, consumed by its cave-like mouths, and then expelled through its crevices. ॥144॥
श्लोक ( Shlok ) 145
किं गौर्यस्त्रिदशैर्मुक्तो युक्ता मे स्वर्गताधुना । नूनमित्यकखी न्मेरुः दिवं स्नानाम्बुनिर्झरैः ॥१४५।।
उस समय मेरु पर्वत पर अभिषेक जल के जो झरने पड़ रहे थे उनसे ऐसा मालूम होता था मानो वह यह कहता हुआ स्वर्ग को धिक्कार ही दे रहा हो कि अब स्वर्ग क्या वस्तु है ? उसे तो देवों ने भी छोड़ दिया है । इस समय समस्त देव हमारे यहाँ आ गये हैं इसलिए हमें ही साक्षात् स्वर्ग मानना योग्य है ।।145।।
At that moment, the streams of consecration water cascading down Mount Meru seemed to proclaim in disdain for heaven: “What is heaven now? Even the gods have abandoned it! At this time, all the deities have gathered here, so it is we who should be considered the true heaven.” ॥145॥
श्लोक (Shlok ) 146
अह्लगीदखिलं व्योम ज्योतिश्चक्रं समस्थगीत् । प्रोर्णंबवीन्मेरुमारुन्धम् क्षीरपुरः स रोदसी ॥१४६
उस जल के प्रवाह ने समस्त आकाश को ढक लिया था, ज्योतिष्पटल को घेर लिया था, मेरु पर्वत को आच्छादित कर लिया था और पृथिवी तथा आकाश के अंतराल को रोक लिया था ।।146।।
The flow of that water had enveloped the entire sky, surrounded the celestial sphere, covered Mount Meru, and filled the space between the earth and the heavens. ॥146॥
श्लोक (Shlok ) 147
क्षणमक्षणनीयेषु वनेषु कृतविश्रमः । प्राप्तक्षण इवान्यत्र व्याप सोऽम्मःप्लवः क्षणात् ॥१४७।
उस जल के प्रवाह ने मेरुपर्वत के अच्छे वनों में क्षण-भर विश्राम किया और फिर संतुष्ट हुए के समान वह दूसरे ही क्षण में वहाँ से दूसरी जगह व्याप्त हो गया ।।147।।
The stream of that water rested for a moment in the beautiful forests of Mount Meru, and then, as if satisfied, it swiftly spread to another place the very next moment. ॥147॥
श्लोक (Shlok ) 148
तरुषण्डनिरुद्धत्वादन्तर्वणमनुल्वणः । वयवीथीरतीत्यारात्” प्रससार महाप्लवः ।।१४८।।
वह जल का बड़ा भारी प्रवाह वन के भीतर वृक्षों के समूह से रुक जाने के कारण धीरे-धीरे चलता था परंतु ज्यों ही उसने वन के मार्ग को पार किया त्यों ही वह शीघ्र ही दूर तक फैल गया ।।148।।
That mighty stream of water, slowed down within the forest due to the clusters of trees blocking its path, flowed gently. But as soon as it crossed the forest’s boundary, it swiftly spread far and wide. ॥148॥
श्लोक (Shlok ) 149
स बभासे पयःपूरः प्रसर्पन्नधिशैलराट् । सितैरिवांशुकैरेनं स्थगयन् स्थगिताम्बरः ।॥१४९।
मेरु पर्वत पर फैलता और आकाश को आच्छादित करता हुआ वह जल का प्रवाह ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो मेरु पर्वत को सफेद वस्त्रों से ढक ही रहा हो ।।149।।
Spreading over Mount Meru and covering the sky, that stream of water appeared resplendent, as if draping Mount Meru in white garments. ॥149॥
श्लोक (Shlok ) 150
विष्वगद्रीन्द्र मूर्णित्वा [मूर्णुत्वा]पयोऽर्णवजलप्लवः । “प्रवहन्नवह च्छायां स्वःस्रवन्ती पयःस्त्रुतेः l१५०l
सब ओर से मेरुपर्वत को आच्छादित कर बहता हुआ वह क्षीरसागर के जल का प्रवाह आकाशगंगा के जलप्रवाह की शोभा धारण कर रहा था ।।150।।
Completely enveloping Mount Meru as it flowed, the stream of water from the Milk Ocean bore the magnificent appearance of the celestial Ganga. ॥150॥
श्लोक (Shlok ) 151
शब्दाद्वैतमिवातन्वन् कुर्वन् सृष्टिमिवाम्मयीम् । विललास पयःपूरः प्रध्वनन्निद्धकुक्षिषु ।।१५१l
मेरु पर्वत की गुफाओं में शब्द करता हुआ वह जल का प्रवाह ऐसा मालूम होता था मानो शब्दाद्वैत का ही विस्तार कर रहा हो अथवा सारी सृष्टि को जलरूप ही सिद्ध कर रहा हो ।। भावार्थ―शब्दाद्वैतवादियों का कहना है कि संसार में शब्द ही शब्द है शब्द के सिवाय और कुछ भी नहीं है । उस समय सुमेरु की गुफाओं में पड़ता हुआ जलप्रवाह भी भारी शब्द कर रहा था इसलिए ऐसा जान पड़ता था मानो शब्दाद्वैतवाद का समर्थन ही कर रहा हो । ईश्वर सृष्टिवादियों का कहना है कि यह समस्त सृष्टि पहले जलमयी थी, उसके बाद ही स्थल आदि की रचना हुई है उस समय सब ओर जल-ही-जल दिखलाई पड़ रहा था इसलिए ऐसा मालूम होगा था मानो वह सारी सृष्टि को जलमय ही सिद्ध करना चाहता हो ।।151।।
The stream of water, resounding as it flowed through the caves of Mount Meru, seemed as if it were expanding the philosophy of Shabdadvaita (the doctrine that only sound exists in the universe) or proving that the entire creation is nothing but water. ॥151॥
Explanation:
According to Shabdadvaita philosophers, the entire universe consists solely of sound, with nothing existing beyond it. At that moment, as the water cascaded into Mount Meru’s caves, producing a loud resonance, it appeared as if it were affirming their doctrine.
Similarly, according to creationists, the world was initially filled with water, and only later did land and other elements emerge. Since water was now seen everywhere, it seemed as though the stream was reinforcing the belief that the entire creation is fundamentally water.
श्लोक 152 से 161
आदिपुराण Ādi purāṇa
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141