आदिपुराण भाग – 2 पर्व 27 – भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31
श्लोक 32 से 41
वन और देव क्रीड़ा
गंगा का पवन जल की बूंदों से अतिथि सत्कार करता प्रतीत होता है। वन दुर्गम और देवों द्वारा अधिष्ठित है, जहां लतागृह फूलों की शय्याओं से सुशोभित हैं। देव और देवांगनाएं मंदार वृक्षों की छाया में चंद्रकांत शिलाओं पर क्रीड़ा करते हैं। किन्नर, सिद्ध, और विद्याधरियां संगीत, नृत्य, और विलास से वन की शोभा बढ़ाते हैं। ऋतुओं का समूह वन में एकत्र होकर उत्सव जैसा प्रतीत होता है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 27 – Shlok 32 to 41
श्लोक ( Shlok ) 32
आतिथ्यमिव” नस्तन्वन् हृतगङ्गाम्बुशीकरः। अभ्येति” पवमानोऽयं वनवीथीर्विधूनयन् ॥३२॥
वनकी पंक्तियोंको हिलाता हुआ यह वायु ग्रहण की हुई गङ्गाके जलकी बूंदोंसे ऐसा जान पड़ता है मानो हम लोगोंका अतिथि सत्कार करता हुआ ही आ रहा हो ।॥ ३२॥
“Stirring the rows of forest trees, this breeze, moistened with droplets of Ganga’s sacred water, seems to be approaching as though it comes to welcome and honor us as guests.” (Verse 32)
श्लोक ( Shlok ) 33
अगोष्पदमिदं देव देवैरध्युषितं वनम् । लतालयैर्विभात्यन्तः कुसुमप्रस्तराञ्चितैः ॥३३॥
हे देव, जो गायोंके संचारसे रहित है अर्थात् अत्यन्त दुर्गम है और जो देवों के द्वारा अधिष्ठित है अर्थात् जहां देव लोग आकर क्रीड़ा करते हैं ऐसा यह वन फूलों के बिछौनोंसे सुशोभित इन लतागृहोंसे अतिशय सुशोभित हो रहा है ॥३३॥
“O Lord, this forest—though devoid of the movement of cows and thus extremely remote—is sanctified by the presence of the gods who dwell and sport here. Adorned with these leafy bowers and the beds of blooming flowers, it appears exceedingly beautiful.” (Verse 33)
श्लोक ( Shlok ) 34
मन्दारवनवीथीनां सान्द्रच्छायाः समाश्रिताः। चन्द्रकान्तशिलास्वेते रंरम्यन्ते नभः सदः ॥३४।।
इधर मन्दार वृक्षोंकी वन-पंक्तियोंकी घनी छायामें बैठे हुए ये देव लोग चन्द्रकान्त मणियोंकी शिलापर बार-बार क्रीड़ा कर रहे हैं ।॥ ३४।।
“Over here, the gods are sitting in the deep shade of mandara tree groves, playfully enjoying themselves again and again on slabs of moonstone.” (Verse 34)
श्लोक ( Shlok ) 35
अहो तटवनस्यास्य रामणीयकमद्भूतम् । ‘अवधूतनिजावासारिरंसन्तेऽत्र यत्सुराः ॥३५॥
अहा, इस किनारेके वनकी सुन्दरता कैसी आश्चर्य-जनक है कि देव लोग भी अपने अपने निवासस्थान छोड़कर यहां क्रीड़ा करते हैं ।॥ ३५।।
“Ah! How astonishing is the beauty of this riverside forest, that even the gods leave their heavenly abodes to come and play here.” (Verse 35)
श्लोक ( Shlok ) 36
मनोभवनिवेशस्य लक्ष्मीरत्र वितन्यते। सुरदम्पतिभिः स्वैरभारब्धरतिविभ्रमेः ॥३६॥
जिन्होंने अपनी इच्छानुसार रति-क्रीड़ा प्रारम्भ की है ऐसे देव देवांगनाओंके द्वारा यहां काम-देवके घरकी शोभा बढ़ाई जा रही है। भावार्थ देव देवांगनाओंकी स्वच्छंद रतिक्रीडाको देखकर मालूम होता है कि मानो यह कामदेवके रहनेका घर ही हो ।। ३६।।
“The gods and celestial maidens, freely engaging in their playful love-sports, are enhancing the beauty of this place—making it seem as if it is the very home of Kamadeva, the god of love.” (Verse 36)
श्लोक ( Shlok ) 37
इयं निधुवनासक्ताः सुरस्त्रीरतिकोमलाः। हसतीव तरङ्गोत्थै शीकरैरमरापगा ॥३७॥
यह गङ्गा अपनी तरंगोंसे उठी हुई जलकी बूंदोंसे ऐसी जान पड़ती है मानो संभोग करनेमें असमर्थ होकर दीनता भरे अस्पष्ट शब्द करनेवाली देवांगनाओंकी हंसी ही कर रही हो ।। ३७।।
“The Ganga, with water droplets rising from her waves, seems to echo the soft, helpless laughter of celestial maidens—like those unable to continue in love-play, speaking in faint, delicate tones.” (Verse 37)
श्लोक ( Shlok ) 38
इतः किन्नरसंगीतमितः तः सिद्धोपवीणितम् । इतो विद्याधरीनृत्तमि तस्तद्गतिविभ्रमः ॥३८॥
इधर किन्नरोंका संगीत हो रहा है, इधर सिद्ध लोग वीणा बजा रहे हैं, इधर विद्यारियां नृत्य कर रही हैं और इधर कुछ विद्याधरियां विलासपूर्वक टहल रही हैं ।॥ ३८॥
“Over here, the Kinnaras are singing; over there, the Siddhas are playing the veena. In one place, celestial maidens are dancing, while in another, some are gracefully strolling about.” (Verse 38)
श्लोक ( Shlok ) 39
नृत्तमप्सरसां पश्यन् शृण्वंस्तद् गीतनिःस्वनम् । वाजिवक्त्रोऽयमुद् ग्रीवः सममास्ते रवकान्तया ॥३९॥
इधर यह किन्नर अपनी कान्ता के साथ साथ अप्सराओंका नृत्य देखता हुआ, और उनके संगीत शब्दोंको सुनता हुआ सुखसे गला ऊंचा कर बैठा है ।॥३९॥
“Here, this Kinnara, sitting joyfully with his beloved, lifts his head in delight as he watches the dance of the Apsaras and listens to their melodious singing.” (Verse 39)
श्लोक ( Shlok ) 40
“निष्पर्यायं वनेऽमुष्मि नृतुवर्गो विवर्धते। परस्परमिव द्रष्टुमुत्सुकायितमानसः ॥४०॥
परस्परमें एक दूसरेको देखनेके लिये जिसका मन उत्कण्ठित हो रहा है ऐसा ऋतुओंका समूह इस वनमें एक साथ इकट्ठा होता हुआ बढ़ रहा है ।॥४०।।
“A group of seasons, eager to gaze upon each other, is gathering together and growing in this forest.” (Verse 40)
श्लोक ( Shlok ) 41
अशोकतरुरत्रायं तनुते पुष्पमञ्जरीम् । लाक्षारक्तैः खगस्त्रीणां चरणैरभिताडितः ॥४१॥
लाखसे रंगे हुए विद्याधरियोंके चरणोंसे ताड़ित हुआ यह अशोक वृक्ष इस वनमें पुष्प-मंजरियों को धारण कर रहा है ।।४१।।
“This Ashoka tree, struck by the feet of the Vidyadharas adorned in red, is holding clusters of flowers in this forest.” (Verse 41)
श्लोक 42 से 51
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 |
आदिपुराण पर्व 25 – भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 110 | श्लोक 111 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 143 | श्लोक 144 से 155 | श्लोक 156 से 167 | श्लोक 168 से 178 | श्लोक 179 से 190 | श्लोक 191 से 203 | श्लोक 204 से 217 | श्लोक 218 से 231 | श्लोक 232 से 244 | श्लोक 245 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281
आदिपुराण भाग – 2
आदिपुराण पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 128 | श्लोक 129 से 147 | श्लोक 148 से 150
आदिपुराण पर्व 27 – भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31