आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41
श्लोक 42 से 51 इंद्र की स्तुति और प्रस्थान
भगवान केवलज्ञान सूर्य, भव्य कमलों को प्रबोधक। गुरुओं के गुरु, गुण समुद्र। चरणों में मस्तक धर श्रद्धा। मुक्ति स्नेह रखती, गुण बढ़ते। इंद्र ने गोद में लिया, मेरु की ओर संकेत। जय-शब्द से दिशाएँ बहरी। अप्सराएँ नृत्य करतीं, आकाश नेत्र खोले सा।
English translation of Ādi purāṇa parv 13 – Shlok 42 to 51
श्लोक ( Shlok ) 42
स्यामामनन्ति सुधियः केवलज्ञानभास्वतः । उदयाद्रिं मुनीन्द्राणामभिवन्धं महोन्नतिम् ॥४२॥
हे नाथ, विद्वान् लोग, केवलज्ञानरूपी सूर्य का उदय होने के लिए आपको ही बड़े-बड़े मुनियों के द्वारा वंदनीय और अतिशय उन्नत उदयाचल पर्वत मानते हैं ।।42।।
“O Lord, scholars regard You as the most venerable and exalted Mount Udayachal, the rising peak, which is revered by great ascetics for the dawn of the sun of supreme knowledge.”
श्लोक ( Shlok ) 43
त्वया जगदिदं मिथ्याज्ञानान्धतमसावृतम् । प्रबोधं नेष्यते भव्यकमलाकरबन्धुना ॥४३॥
हे नाथ, आप भव्य जीवरूपी कमलों के समूह को विकसित करने के लिए सूर्य के समान हैं । मिथ्याज्ञानरूपी गाढ़ अंधकार से ढका-हुआ यह संसार अब आपके द्वारा ही प्रबोध को प्राप्त होगा ।।43।।
“O Lord, You are like the sun, nurturing the vast lotuses of living beings. This world, enveloped in the dense darkness of false knowledge, will now receive enlightenment through You.”
श्लोक ( Shlok ) 44
तुभ्यं नमोऽधिगुरवे नमस्तुभ्यं महाधिये । तुभ्यं नमोऽस्तु भव्याब्जबन्धुवे गुणसिन्धवे ॥४४॥
हे नाथ, आप गुरुओं के भी गुरु हैं इसलिए आपको नमस्कार हो, आप महाबुद्धिमान् हैं इसलिए आपको नमस्कार हो, आप भव्य जीवरूपी कमलों को विकसित करने के लिए सूर्य के समान हैं और गुणों के समुद्र हैं इसलिए आपको नमस्कार हो ।।44।।
“O Lord, You are the guru of even the greatest of gurus, and so we bow to You. You are supremely wise, and so we bow to You. You are like the sun, nurturing the vast lotuses of living beings, and You are the ocean of virtues, and so we bow to You.”
श्लोक ( Shlok ) 45
त्वत्तः प्रबोधमिच्छन्तः प्रबुद्धभुवनत्रयात् । तव पादाम्बुजं देव मूर्ध्ना दध्मो धृतादरम् ॥४५॥
हे भगवन् आपने तीनों लोकों को जान लिया है इसलिए आप से ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा करते हुए हम लोग आपके चरणकमलों को बड़े आदर से अपने मस्तक पर धारण करते हैं ।।45।।
“O Lord, since You have knowledge of the three worlds, we, desiring to receive wisdom from You, humbly place Your lotus feet upon our heads with great reverence.”
श्लोक ( Shlok ) 46
त्वयि प्रणयमाधत्ते मुक्तिलक्ष्मीः समुत्सुका । त्वयि सर्वे गुणाः स्फातिं यान्त्यब्धौ मणयो यथा ॥४६॥
हे नाथ, मुक्तिरूपी लक्ष्मी उत्कंठित होकर आपमें स्नेह रखती है और जिस प्रकार समुद्र में मणि बढ़ते रहते हैं उसी प्रकार आप में अनेक गुण बढ़ते रहते हैं ।।46।।
“O Lord, the goddess of liberation, Lakshmi, eagerly holds affection for You, and just as gems continuously increase in the ocean, in the same way, countless virtues continue to grow in You.”
श्लोक ( Shlok ) 47
स्तुत्वेति स तमारोप्य स्वमङ्क सुरनायकःl हस्तमुच्चालयामास मेरुप्रस्थान संभ्रमी ॥४७॥
इस प्रकार देवों के अधिपति इंद्र ने स्तुति कर भगवान् को अपनी गोद में धारण किया और मेरु पर्वत पर चलने की शीघ्रता से इशारा करने के लिए अपना हाथ ऊँचा उठाया ।।47।।
“In this way, Indra, the lord of the gods, praised the Lord, placed Him in His lap, and raised His hand high to signal the quick ascent of Mount Meru.”
श्लोक ( Shlok ) 48
जयेश नन्द वर्द्धस्व स्वमित्युच्चैर्गिरः सुराः । तदा कलकलं चक्रुर्वधिरीकृत दिङ्मुखम् ॥४८॥
हे ईश ! आपकी जय हो, आप समृद्धिमान् हो और आप सदा बढ़ते रहें इस प्रकार जोर-जोर से कहते हुए देवों ने उस समय इतना अधिक कोलाहल किया था कि उससे समस्त दिशा बहरी हो गयी थीं ।।48।।
“O Lord! Victory to You, You are prosperous, and may You always grow!” Saying this loudly, the gods created such a tremendous uproar that it made all the directions deaf.
श्लोक ( Shlok ) 49
नमोऽङ्गणमथोत्पेतुरुच्चरज्जयघोषणाः । सुरचापानि तन्वन्तः प्रसरभूषणांशुभिः ॥४९॥
तदनंतर जय-जय शब्द का उच्चारण करते हुए और अपने आभूषणों की फैलती हुई किरणों से इंद्रधनुष को विस्तृत करते हुए देव लोग आकाशरूपी आंगन में ऊपर की ओर चलने लगे ।।49।।
“Afterward, chanting words of victory and expanding the rainbow with the spreading rays of their jewels, the gods began to ascend upward in the sky-like courtyard.”
श्लोक ( Shlok ) 50
गन्धर्वारब्धसंगीता नेटुरप्सरसः पुरः । भ्रूपताका समुत्क्षिप्य नभोरङ्गे चलत्कुचाः ॥५०॥
उस समय जिनके स्तन कुछ-कुछ हिल रहे हैं ऐसी अप्सराएँ अपनी भौंहरूपी पताकाएं ऊपर उठाकर आकाशरूपी रंगभूमि में सबके आगे नृत्य कर रही थीं और गंधर्व देव उनके साथ अपना संगीत प्रारंभ कर रहे थे ।।50।।
“At that time, the Apsaras, whose breasts were slightly swaying, were lifting their flag-like tresses and dancing in the sky-like arena before everyone, while the Gandharva gods began playing their music along with them.”
श्लोक ( Shlok ) 51
इतोऽमुतः समाकीर्ण विमानैर्द्युसदां नभः । सरत्नैरुन्मिषन्नेत्रमिव रेजे विनिर्मलम् ॥५१॥
रत्न-खचित देवों ने विमानों से जहाँ-तहाँ सभी ओर व्याप्त हुआ निर्मल आकाश ऐसा शोभायमान होता था मानो भगवान के दर्शन करने के लिए उसने अपने नेत्र ही खोल रखे हो ।।51।।
“The sky, adorned with gems and spread out in all directions by the divine chariots, appeared so radiant, as if it had opened its eyes to behold the Lord.”
श्लोक 52 से 62
आदिपुराण Ādi purāṇa
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41