आदिपुराण पर्व 18 – धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 202 | श्लोक 203 से 209
आदिपुराण पर्व 19 – नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 11 |
श्लोक 32 से 41 दक्षिण श्रेणी के नगरों का परिचय
पूर्व दिशा में किन्नामित नगर गगनचुंबी था। किन्नरगीत नगर किन्नर गीतों से सेवित था। नरगीत में उत्सव होते थे। बहुकेतुक पताकाओं से बुलाता सा था। पुंडरीक में हंस गाते थे। सिंहध्वज सिंह चिह्नों से शोभायमान था। श्वेतकेतु सफेद ध्वजाओं से था। गरुडध्वज आकाश को व्याप्त करता था। श्रीप्रभ और श्रीधर लक्ष्मी से सुंदर थे। लोहार्गल और अरिंजय दुर्गम और विजयी थे।
English translation of Ādi purāṇa parv 19 – Shlok 32 to 41
श्लोक ( Shlok ) 32
इतः किं नामितं नाम्ना पुरं भाति पुरो दिशि । सौधैरभ्रङ्कषैः स्वर्गमिवास्पृष्टुं समुद्यतैः ॥३२॥
इधर यह पूर्व दिशा में 1 किन्नामित नाम का नगर है जो कि मानो स्वर्ग को छूने के लिए ही ऊँचे बढ़े हुए गगनचुंबी राजमहलों से सुशोभित हो रहा है ।।32।।
Here, in the eastern direction, there is a city named Kinnamita, which appears adorned with towering, sky-high palaces, as if reaching out to touch heaven itself. ॥32॥
श्लोक ( Shlok ) 33
ततः किन्नरगीताख्यं पुरमिद्धद्धिं लक्ष्यते। यस्योद्यानानि सेव्यानि गीतैः किन्न रयोषिताम् ॥३३॥
वह बड़ी विभूति को धारण करने वाला 2 किन्नरगीत नाम का नगर दिखाई दे रहा है जिसके कि उद्यान किन्नर जाति की देवियों के गीतों से सदा सेवन करने योग्य रहते हैं ।।33।।
That magnificent city named Kinnarageet can be seen, whose gardens are always enchanting, resonating with the melodious songs of Kinnara maidens. ॥33॥
श्लोक ( Shlok ) 34
नरगीतं विभातीतः पुरमेतन्महर्द्धिकम् । सदा प्रमुदिता यत्र नरा नार्यश्च सोत्सवाः ॥३४॥
इधर यह बड़ी विभूति को धारण करने वाला 3 नरगीत नाम का नगर शोभायमान है, जहाँ के कि स्त्री-पुरुष सदा उत्सव करते हुए प्रसन्न रहते हैं ।।34।।
Here, the splendid city named Narageet shines beautifully, where men and women always rejoice in celebrations, remaining ever blissful. ॥34॥
श्लोक ( Shlok ) 35
बहु केतुकमेतच्च प्रोल्लसद्बहुकेतुकम् । केतुबाहुभिराह्वा तुमस्मानिव समुद्यतम् ॥३५॥
इधर यह अनेक पताकाओं से सुशोभित 4 बहुकेतुक नाम का नगर है जो कि ऐसा मालूम होता है मानो पताकारूपी भुजाओं से हम लोगों को बुलाने के लिए ही तैयार हुआ हो ।।35।।
Here is the city named Bahuketuka, adorned with numerous flags, appearing as if it has raised its flag-like arms to invite us. ॥35॥
श्लोक ( Shlok ) 36
पुण्डरीकमिदं यत्र पुण्डरीकवनेष्वमी। हंसाः कलरुतैर्मन्द्रं स्वनन्ति श्रोतृहारिभिः ॥३६॥
जहाँ सफेद कमलों के वनों में ये हंस, कानों को अच्छे लगने वाले मनोहर शब्दों-द्वारा सदा गंभीर रूप से गाते रहते हैं ऐसा यह 5 पुंडरीक नाम का नगर है ।।36।।
This is the city named Pundarika, where swans in forests of white lotuses constantly sing in a deep, melodious voice, pleasing to the ears. ॥36॥
श्लोक ( Shlok ) 37
सिंहध्वजमिदं सेंहैर्ध्वजैः सौधाप्रवर्तिभिः । निरुणद्धि सुरेभाणां मार्ग सिंहविशङ्किनाम् ॥३७॥
इधर यह 6 सिंह ध्वज नाम का नगर है जो कि महलों के अग्रभाग पर लगी हुई सिंह के चिह्न से चिह्नित ध्वजाओं के द्वारा सिंह की शंका करने वाले देवों का मार्ग रोक रहा है ।।37।।
Here is the city named Simha Dhwaja, which, with its lion-emblazoned flags adorning the fronts of its palaces, stands as if blocking the path of gods who might doubt the presence of a lion. ॥37॥
श्लोक ( Shlok ) 38
श्वेतकेतुपुरं भाति श्वेतैः केतुभिराततैः । सौधाग्रवर्तिभिर्दूराज्झषकेतु मिवाह्वयत् ॥३८॥
इधर यह 7 श्वेतकेतु नाम का नगर सुशोभित हो रहा है जो कि महलों के अग्रभाग पर फहराती हुई बड़ी-बड़ी सफेद ध्वजाओं से ऐसा मालूम होता है मानो दूर से कामदेव को ही बुला रहा हो ।।38।।
Here shines the city named Shwetaketu, adorned with large white flags fluttering at the fronts of its palaces, appearing as if it is calling out to Kamadeva from afar. ॥38॥
श्लोक ( Shlok ) 39
गरुडध्वजसंज्ञं च पुरमाराद्विराजते । गरुडग्रावनिर्माणैः सौधाग्रैर्ग्रस्तखाङ्गणम् ॥३९॥
इधर यह समीप में ही, गरुडमणि से बने हुए महलों के अग्रभाग से आकाशरूपी आंगन को व्याप्त करता हुआ 8 गरुडध्वज नाम का नगर शोभायमान हो रहा है ।।39।
Here, nearby, the magnificent city named Garudadhwaja shines brilliantly, with the fronts of its palaces made of Garuda gems, extending into the sky like a celestial courtyard. ॥39॥
श्लोक ( Shlok ) 40
श्रीप्रभं श्रीप्रभोपेतं श्रीधरं च पुरोत्तमम् । भातीदं द्वयमन्योन्यस्पर्धयेव श्रियं श्रितम् ॥४०॥
इधर ये लक्ष्मी की शोभा से सुशोभित 9 श्रीप्रभ और 10 श्रीधर नाम के उत्तम नगर हैं, ये दोनों नगर ऐसे सुशोभित हो रहे हैं मानो इन्होंने परस्पर की स्पर्धा से ही इतनी अधिक शोभा धारण की हो ।।40।।
Here shine the two magnificent cities named Shriprabha and Shridhara, adorned with the splendor of Goddess Lakshmi. These two cities appear so resplendent, as if they have attained such immense beauty through a mutual rivalry. ॥40॥
श्लोक ( Shlok ) 41
लोहार्गल मिदं लौहरर्गलैरतिदुर्गमम् । अरिंजयं च जित्वारीन् हसतीव स्वगोपुरैः ॥४१॥
जो लोहे के अर्गलों से अत्यंत दुर्गम है ऐसा यह 11 लोहार्गल नाम का नगर है और यह 12 अरिंजय नगर है जो कि अपने गोपुरों के द्वारा ऐसा मालूम होता है मानो शत्रुओं को जीतकर हँस ही रहा हो ।।41।।
This is the city named Lohargala, which is extremely impregnable with its iron gates. And here is Arinjaya, a city that, with its towering gateways, appears as if it is laughing triumphantly after conquering its enemies. ॥41॥
श्लोक 42 से 51
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 275
आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 257
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