आदिपुराण पर्व 18 – धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 |
English translation of Ādi purāṇa parv 18 – Shlok 142 to 151
श्लोक ( Shlok ) 142
“तदुतिष्ठतमापृच्छय भगवन्तं जगत्सृजम्। युवयोर्भोगमद्याहं दास्यामि गुरुदेशिताम् ॥१४२॥
इसलिए जगत् की व्यवस्था करने वाले भगवान से पूछकर उठो । आज मैं तुम दोनो के लिए भगवान् के द्वारा बतलायी हुई भोगसामग्री दूँगा ।।142।।
“Therefore, arise after seeking permission from the Lord, who governs the world. Today, I shall provide you both with the pleasures as prescribed by Him.” ॥142॥
श्लोक ( Shlok ) 143
इत्यस्य वचनात् प्रीतौ कुमारौ तमवोचताम् । सत्यं गुरुः प्रसन्नो नौ भोगान् दिस्सति वाञ्छितान् ।।१४३॥
इस प्रकार धरणेंद्र के वचनों से वे कुमार बहुत ही प्रसन्न हुए और उससे कहने लगे कि सचमुच ही गुरुदेव हम पर प्रसन्न हुए हैं और हम लोगों को मनवांछित भोग देना चाहते हैं ।।143।।
“Upon hearing Dharaṇendra’s words, the young princes became exceedingly delighted and said to him, ‘Indeed, our revered Guru is pleased with us and wishes to grant us the desired pleasures.’” ॥143॥
श्लोक ( Shlok ) 144
तद् ब्रूहि धरणाधीश यत्सत्यं मतमीशितुः । गुरोर्मताद्विना भोगा नावयोरभिसम्मताः ॥१४४॥
हे धरणेंद्र, इस विषय में भगवान् का जो सत्य मत हो वह हम लोगों से कहिए क्योंकि भगवान के मत अर्थात् सम्मति के बिना हमें भोगोपभोग की सामग्री इष्ट नहीं है ।।144।।
“O Dharaṇendra, please tell us the true opinion of the Lord on this matter, for without His consent, we do not desire any material pleasures.” ॥144॥
श्लोक ( Shlok ) 145
इत्युक्तवन्तौ प्रत्याय्य सोपायं फणिनां पतिः। भगवन्तं प्रणम्याशु युवानावनयत् समम् ॥१४५॥
इस प्रकार कहते हुए कुमारों को युक्तिपूर्वक विश्वास दिलाकर धरणेंद्र भगवान् को नमस्कार कर उन्हें ही अपने साथ ले गया ।।145।।
“Speaking in this manner and logically assuring the princes, Dharaṇendra bowed to the Lord and took Him along with him.” ॥145॥
श्लोक ( Shlok ) 146
स ताभ्यां फणिनां भर्ता रेजे गगनमुत्पतन् । युतस्तापप्रकाशाभ्यामिव भास्वान महोदयः ॥१४६॥
महान् ऐश्वर्य को धारण करने वाला वह धरणेंद्र उन दोनों कुमारों के साथ आकाश में जाता हुआ ऐसा शोभायमान हो रहा था मानो ताप और प्रकाश के साथ उदित होता हुआ सूर्य ही हो ।।146।।
“Possessing great splendor, Dharaṇendra, traveling through the sky with the two princes, appeared as magnificent as the rising sun with its heat and radiance.” ॥146॥
श्लोक ( Shlok ) 147
बभौ फणिकुमाराभ्यामिव ताभ्यां समन्वितः । प्रश्रयप्रशमाभ्यां वा युक्तो योगीव भोगिराट् ॥१४७॥
अथवा जिस प्रकार विनय और प्रशम गुण से युक्त हुआ कोई योगिराज सुशोभित होता है उसी प्रकार नागकुमारों के समान उन दोनों कुमारों से युक्त हुआ वह धरणेंद्र भी अतिशय सुशोभित हो रहा था ।।147।।
“Or, just as a great yogi adorned with humility and tranquility appears radiant, in the same way, Dharaṇendra, accompanied by the two princes resembling Nāga princes, shone with extraordinary brilliance.” ॥147॥
श्लोक ( Shlok ) 148
स व्योममार्गमुत्पत्य विमानमधिरोप्य तौ । द्राक् प्राप विजयार्द्धाद्रिं भूदेव्या हसितोपमम् ॥१४८॥
वह दोनों राजकुमारों को विमान में बैठाकर तथा आकाशमार्ग का उल्लंघन कर शीघ्र ही विजयार्ध पर्वत पर जा पहुंचा, उस समय वह पर्वत पृथ्वीरूपी देवी के हास्य की उपमा धारण कर रहा था ।।148।।
“He seated both princes in the celestial chariot and, swiftly traversing the sky, reached the Vijayarḍha Mountain. At that moment, the mountain appeared as if it were an embodiment of the Earth goddess’s laughter.” ॥148॥
श्लोक ( Shlok ) 149
स्वपूर्वापरकोटिभ्यां विगाह्य लवणार्णवम् । मध्ये भारतवर्षस्य स्थितं तन्मानदण्डवत् ॥१४९॥
वह विजयार्ध पर्वत अपने पूर्व और पश्चिम की कोटियों से लवण समुद्र में अवगाहन (प्रवेश) कर रहा था और भरतक्षेत्र के बीच में इस प्रकार स्थित था मानो उसके नापने का एक दंड ही हो ।।149।।
“That Vijayarḍha Mountain extended into the Lavana Ocean from both its eastern and western edges and stood in the center of Bharat Kshetra, appearing as if it were a measuring rod for the region.” ॥149॥
श्लोक ( Shlok ) 150
विराजमानमुत्तुङ्गैर्नानारत्नांशुचित्रितैः । मकुटैरिव कूटैः स्वैः स्वैरमारुद्धखाङ्गणैः ॥ १५०॥
वह पर्वत ऊँचे, अनेक प्रकार के रत्नों की किरणों से चित्र-विचित्र और अपनी इच्छानुसार आकाशांगण को घेरने वाले अपने अनेक शिखरों से ऐसा जान पड़ता था मानो मुकुटों से ही सुशोभित हो रहा हो ।।150।।
“That mountain, adorned with towering peaks, was illuminated by the rays of various precious gems, creating a mesmerizing spectacle. With its numerous summits reaching into the sky at will, it appeared as if it were crowned with radiant diadems.” ॥150॥
श्लोक ( Shlok ) 151
निपतन्निर्झरारावैरापूरितगुहा मुखम् । व्याजुहूषुमिवातान्तं” विश्रान्त्यै सुरदम्पतीन् ॥१५१॥
पड़ते हुए निर्झरनों के शब्दों से उसकी गुफाओं के मुख आपुरित हो रहे थे और उनमें ऐसा मालूम होता था मानो अतिशय विश्राम करने के लिए देव-देवियों को बुला ही रहा हो ।।151।।
“The entrances of its caves were filled with the echoes of cascading waterfalls, creating a resonance that seemed as if the mountain itself was inviting the celestial beings to rest peacefully within its serene embrace.” ॥151॥
श्लोक 152 से 161
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273 भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216 भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 202 से 209 | श्लोक 210 से 213
आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 224
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 208 | श्लोक 209 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 275
आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 257
आदिपुराण पर्व 18 – धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 |