आदिपुराण भाग – 2 पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81श्लोक 82 से 91
नगर से प्रस्थान और सेना की शोभा
नगरवासी आशीर्वाद दे रहे थे। भरत रत्नों से देदीप्यमान गोपुरद्वार से निकले। सेना असंख्य और विशाल थी, मानो नवीन सृष्टि हो। देवता आश्चर्य से इसे देख रहे थे। चक्ररत्न और दण्डरत्न के नेतृत्व में सेना पूर्व दिशा की ओर बढ़ी।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 26 – Shlok 82 to 91
श्लोक ( Shlok ) 82
जयेश विजयिन् विश्वं विजयस्व दिशो दश। पुष्याशिषां शतैरित्थं पौराः प्रभुमयूयुजन् ॥ ८२॥
हे ईश, आपकी जय हो, हे विजय करनेवाले महाराज, आप संसारका विजय करें और दशों दिशाओंको जीतें; इस प्रकार सैकड़ों पुण्याशीर्वादोंके द्वारा नगरनिवासी लोग भरतकी पूजा कर रहे थे उनके प्रति सन्मान प्रकट कर रहे थे ।।८२।।
“‘Victory to you, O Lord! Victory to you, O conquering king! May you triumph over the world and conquer all ten directions!’—With such hundreds of auspicious blessings, the citizens were honoring and worshiping King Bharata.”(Verse 82)
श्लोक ( Shlok ) 83
सम्राट् पश्यन्नयोध्यायाः परां भूतिं तदातनीम्। शनैः प्रतोलीं सम्प्रापद् रत्नतोरणभासुराम् ॥८३॥
इस प्रकार उस समय होनेवाली अयोध्याकी उत्कृष्ट विभूतिको देखने हुए सम्राट् भरत धीरे धीरे रत्नोंके तोरणोंसे देदीप्यमान गोपुरद्वारको प्राप्त हुए ॥८३॥
“Thus, beholding the splendid grandeur of Ayodhya at that moment, Emperor Bharata slowly reached the main city gate, adorned with archways sparkling with gems.”(Verse 83)
श्लोक ( Shlok ) 84
पुरो बहिः पुरः पश्चात् समं च विभुनाऽमुना। ददृशे दृष्टिपर्यन्तम् सङ्खयमिव तद्बलम् ॥८४॥
उस समय महाराज भरतको नगरके बाहर अपने आगे पीछे और साथ साथ जहांतक दृष्टि पड़ती थी वहां तक असंख्यात सेना ही सेना दिखाई पड़ती थी ॥८४।।
“At that time, as far as the eye could see beyond the city—before him, behind him, and all around—King Bharata beheld nothing but an innumerable expanse of army upon army.”(Verse 84)
श्लोक ( Shlok ) 85
जगतः प्रसवागारादिव तस्मात् पुराद् बलम् । निरियाय निरुच्छ्वासं शनैरारुद्धगोपुरम् ॥८५॥
जगत्की उत्पत्ति के घरके समान उस अयोध्यापुरीसे वह सेना गोपुरद्वारको रोकती हुई बड़ी कठिनतासे धीरे धीरे बाहर निकली ।।८५।।
“That army, like the very source of creation itself, moved slowly and with great difficulty out of Ayodhya—its vastness so great that it blocked the main city gate as it emerged.”(Verse 85)
श्लोक ( Shlok ) 86 – 87
किमिदं प्रलयक्षोभात् क्षुभितं वारिधेर्जलम् । किमुत त्रिजगत्सर्गः प्रत्यग्रोऽयं विजृम्भते ॥८६॥
इत्याशङ्कय नभोभाग्भिः सुरैः साश्चर्यमीक्षितम्। प्रससार बलं विष्वक्पुरान्निर्याय चक्रिणः ॥८७॥
क्या यह प्रलय कालके क्षोभसे क्षोभको प्राप्त हुआ समद्रका जल है ? अथवा यह तीनों लोकोंकी नवीन सृष्टि उत्पन्न हो रही है? इस प्रकार आशंका कर आकाशमें खड़े हुए देव लोग जिसे बड़े आश्चर्यके साथ देख रहे हैं ऐसी चक्रवर्तीकी वह सेना नगरसे निकल कर चारों ओर फैल गई ।।८६-८७।।
“Is this the agitated water of the ocean stirred by the end-time deluge? Or is it the creation of a new universe across the three worlds?” — Thus wondered the gods standing in the sky, gazing in awe and amazement as the army of the Universal Emperor spread out in all directions after departing from the city.(Verses 86–87)
श्लोक ( Shlok ) 88
ततः प्राजीं दिशं जेतुं कृतोद्योगो विशाम्पतिः । प्रययौ प्राङ्मुखो भूत्वा चक्ररत्नमनुव्रजन् ।॥८८॥
तदनन्तर जिन्होंने सबसे पहले पूर्व दिशाको जीतनेका उद्योग किया है ऐसे महाराज भरतने चक्ररत्नके पीछे-पीछे जाते हुए पूर्वकी ओर मुखकर प्रयाण किया ॥८८॥
“Thereafter, King Bharata, who had first resolved to conquer the eastern direction, set out facing the east, following behind the divine discus (chakra-ratna).”(Verse 88)
श्लोक ( Shlok ) 89
चक्रमस्य ज्वलद्व्योम्नि प्रयाति स्म पुरो विभोः। सुरैः परिष्कृतं विश्वम्भास्व द्विम्बप्रभास्वरम् ॥८९॥
सूर्य मण्डल के समान देदीप्यमान और चारों ओरसे देव लोगोंके द्वारा घिरा हुआ जाज्वल्यमान चक्ररत्न आकाशमें भरतेश्वरके आगे-आगे चल रहा था ॥८९॥
“Radiant like the solar orb and surrounded on all sides by celestial beings, the blazing divine discus (chakra-ratna) moved ahead of King Bharata through the sky.”(Verse 89)
श्लोक ( Shlok ) 90
चक्रानुयायि तद्भ्रेजे निधीनामीशितुर्बलम् । गुरोरिच्छानुर्वातष्णु मुनीनामिव मण्डलम् ॥९०॥
जिस प्रकार मुनियोंका समूह गुरुकी इच्छानुसार चलता है उसी प्रकार निधीयोंके स्वामी महाराज भरतकी वह सेना चक्ररत्न की इच्छानुसार उसके पीछे पीछे चल रही थी । ९०।।
“Just as a group of sages follows the will of their guru, in the same way, the army of King Bharata, lord of great treasures, followed behind the divine discus (chakra-ratna), moving according to its will.”(Verse 90)
श्लोक ( Shlok ) 91
दण्डरत्नं पुरोधाय सेनानीरग्रणीरभूत् ।स्थ पुटानि समीकुर्वन् स्थलदुर्गाण्ययत्नतः ॥९१॥
दण्डरत्नको आगे कर सेनापति सबसे आगे चल रहा था और वह ऊंचे नीचे दुर्गम वनस्थलों को लीलापूर्वक एकसा करता जाता था ।।९१।।
“With the divine staff (Danda-ratna) carried in front, the commander-in-chief led the march, effortlessly leveling the high and low, difficult forest terrains as he advanced.”(Verse 91)
श्लोक 92 से 101
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण भाग – 2
आदिपुराण पर्व 26 – भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81


