आदिपुराण पर्व 18 – धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41
श्लोक 42 से 51 तप से विरक्ति
कई अभिमानी वहाँ रहे। कुछ अशक्त हो भगवान के चरण स्मरण करते थे। वे तप से विरक्त हो जीविका सोचने लगे। कुछ लज्जा से मुख फेरकर चले। कुछ प्रदक्षिणा कर प्राणयात्रा सोचने लगे। वे भगवान को शरण मानते थे। कुछ काँपते हुए व्रत छोड़ गए। कुछ रक्षा माँगते हुए चले गए। वे तप में असमर्थ हो भ्रष्ट हुए। वे फल-पानी के लिए वन में फैले।
English translation of Ādi purāṇa parv 18 – Shlok 42 to 51
श्लोक ( Shlok ) 42
अभिमानधनाः केचिद् भूयोऽपि स्थातुमुद्यताः । पतित्वाप्यवशं भूमौ संस्मरुगुरुपादयोः ॥४२॥
अभिमान ही है धन जिनका ऐसे कितने ही पुरुष फिर भी वहाँ रहने के लिए तैयार हुए थे और निर्बल होने के कारण परवश जमीन पर पड़कर भी भगवान् के चरणों का स्मरण कर रहे थे ।।42।।
“Many men, whose only wealth was their pride, were still willing to stay there. Being weak and helpless, they lay on the ground, remembering the Lord’s feet.” ( 42)
श्लोक ( Shlok ) 43
इत्युच्चावच संजल्पैः संकल्पेश्च पृथग्विधैः । विरम्यते तपःक्लेशाज्जीविकायां मतिं व्यधुः ॥४३॥
इस प्रकार राजा अनेक प्रकार के ऊंचे-नीचे भाषण और संकल्प-विकल्प कर तपश्चरण संबंधी क्लेश से विरक्त हो गये और जीविका में बुद्धि लगाने लगे अर्थात् उपाय सोचने लगे ।।43।।
“In this way, the king, after contemplating various lofty and lowly thoughts and debating within himself, became disillusioned with the hardships of asceticism and began to focus his mind on securing a livelihood.” ( 43)
श्लोक ( Shlok ) 44
“मुखोन्मुखं विभोर्दत्तदृष्टयः पृष्ठतोमुखाः । अशक्त्या लज्जया चान्ये भेजिरे स्खलितां गतिम् ॥४४॥
कितने ही लोग अशक्त होकर भगवान् के मुख के सम्मुख देखने लगे और कितने ही लोगों ने लज्जा के कारण अपना मुख पीछे की ओर फेर लिया । इस प्रकार धीरे-धीरे स्खलित गति को प्राप्त हुए अर्थात्, क्रम- क्रम से जाने के लिए तत्पर हुए ।।44।।
“Some, having become weak, kept gazing at the Lord’s face, while others, out of shame, turned their faces away. In this way, they gradually began to falter and prepared to leave one by one.” ( 44)
श्लोक ( Shlok ) 45
अनापृच्छय गुरुं केचित् केचिदापृच्छय योगिनम् । परीत्य प्रणताः प्राणयात्रायां मतिमादधुः ॥४५
कितने ही लोग योगिराज भगवान् वृषभदेव से पूछकर और कितने ही बिना पूछे ही उनकी प्रदक्षिणा देकर और उन्हें नमस्कार कर प्राणयात्रा (आजीविका) के उपाय सोचने लगे ।।45।।
“Some people, after seeking permission from Lord Rishabhadeva, and others without asking, circumambulated Him, bowed down to Him, and then began contemplating ways to sustain their livelihood.” ( 45)
श्लोक ( Shlok ) 46
केचित्वमेव शरणं नान्या गतिरिहास्ति नः । इति ब्रुवाणा विद्राणाः प्राणत्राणे मतिं व्यधुः ।।४६।।
हे देव, आप ही हमें शरणरूप हैं इस संसार में हम लोगों की और कोई गति नहीं है, ऐसा कहकर भागते हुए कितने ही पुरुष अपने प्राणों की रक्षा में बुद्धि लगा रहे थे―प्राणरक्षा के उपाय विचार रहे थे ।।46।।
“O Lord, You alone are our refuge; in this world, we have no other shelter.” Saying this, many men fled, focusing their minds on protecting their own lives and contemplating ways to survive.” (46)
श्लोक ( Shlok ) 47
अपत्रपिप्णवः केचिद् वेपमानप्रतीककाः । गुरोः पराङ्मुखीभूय जाता व्रतपराङ्मुखाः ॥४७॥
जिनके प्रत्येक अंग थरथर काँप रहे हैं ऐसे कितने ही लज्जावान पुरुष भगवान से पराङ्मुख होकर व्रतों से पराङ्मुख हो गये थे अर्थात् लज्जा के कारण भगवान के पास से दूसरी जगह जाकर उन्होंने व्रत छोड़ दिये थे ।।47।।
“Many shame-faced men, whose entire bodies trembled, turned away from the Lord and abandoned their vows. Out of embarrassment, they moved away from Him and renounced their austerities.” ( 47)
श्लोक ( Shlok ) 48
पादयोः पतिताः केचित् परित्रायस्व नः प्रभोः । क्षुत्क्षामाङ्गान् क्षमस्वेति ब्रुवन्तोऽन्तर्हिंता गुरोः ॥४८॥
कितने ही लोग भगवान के चरणों पर पढ़कर कह रहे थे कि हे प्रभो हमारी रक्षा कीजिए, हम लोगों का शरीर भूख से बहुत ही कृश हो गया है अत: अब हमें क्षमा कीजिए इस प्रकार कहते हुए वहाँ से अंतर्हित हो गये थे―अन्यत्र चले गये थे ।।48।।
“Many fell at the Lord’s feet, saying, ‘O Lord, protect us! Our bodies have become extremely weak due to hunger. Please forgive us.’ Saying this, they disappeared from there and went elsewhere.” ( 48)
श्लोक ( Shlok ) 49 –50
अहो किमृषयो भग्ना महर्षेर्गन्तुमक्षमाः । पदवीं तामनालीडामन्यैः सामान्यमर्त्यकैः ॥४९॥
किं महादन्तिनो भारं निर्वोढुं कलभाः क्षमाः । पुंगवेर्वा भरं कृष्टं कर्षेयुः किमु दम्यकाः ॥५०॥
खेद है कि जिसे अन्य साधारण मनुष्य स्पर्श भी नहीं कर सकते ऐसे भगवान् के उस मार्ग पर चलने के लिए असमर्थ होकर वे सब खोटे ऋषि तपस्या से भ्रष्ट हो गये सो ठीक ही है क्योंकि बड़े हाथी के बोझ को क्या उसके बच्चे भी धारण कर सकते हैं अथवा बड़े बैलों द्वारा खींचे जाने योग्य बोझ को क्या छोटे बछड़े भी खींच सकते हैं ? ।।49-50।।
“Alas! It is only natural that those inferior sages, unable to follow the path of the Lord—whom ordinary men cannot even touch—fell from their austerities. After all, can the young of an elephant bear the weight carried by a mighty one? Or can small calves pull the load meant for strong bulls?” ( 49-50)
श्लोक ( Shlok ) 51
ततः परोषहैर्भग्नाः फलान्याहर्तुमिच्छवः । “प्रसस्रुर्वन षण्डेपु सरस्सु च पिपासिताः ॥५१॥
तदनंतर परीषहों से पीड़ित हुए वे लोग फल खाने की इच्छा से वनखंडों में फैलने लगे और प्यास से पीड़ित होकर तालाबों पर जाने लगे ।।51।।
“After that, tormented by hardships, they began to scatter across the forest in search of fruits to eat, and, suffering from thirst, they made their way to the ponds.” ( 51)
श्लोक 52 से 61
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आदिपुराण पर्व 18 – धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41