आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121
श्लोक 122 से 131 बंदीजनों का मंगल पाठ
बंदीजन मंगल गीत गाते हुए मरुदेवी को जगाते हैं: प्रभात समय है, चंद्र कांतिरहित, कमल प्रफुल्लित, सारस-भौंरे स्तुति करते, चकवा-चकवी सूर्य की प्रतीक्षा करते हैं।
English translation of Ādi purāṇa parv 12 – Shlok 122 to 131
श्लोक ( Shlok ) 122
सुखप्रबोधमाधातुमेतस्याः पुण्यपाठकाः । तदा प्रपेठुरित्युच्चेर्मङ्गलान्यस्खलद्रिरः ॥१२२॥
उस समय मरुदेवी को सुख-पूर्वक जगाने के लिए, जिनकी वाणी अत्यंत स्पष्ट है ऐसे पुण्य पाठ करने वाले बंदीजन उच्च स्वर से नीचे लिखे अनुसार मंगल पाठ पढ़ रहे थे ।।122।।
At that time, to awaken Marudevi gently, the court bards, whose voices were exceptionally clear, recited auspicious chants in a loud and melodious tone, as described below. ||122||
श्लोक ( Shlok ) 123
प्रबोधसमयोऽयं ते देवि सम्मुखमागतः । रचयन् ‘दरविश्र्लिष्टदलैरब्जैरिवाञ्जलिम् ॥ १२३॥
हे देवि, यह तेरे जागने का समय है जो कि ऐसा मालूम होता है मानो कुछ-कुछ फूले हुए कमलों के द्वारा तुम्हें हाथ ही जोड़ रहा हो ।।123।।
O Devi, this is the time for you to wake up, which seems as if the slightly bloomed lotuses themselves are joining their hands in reverence before you. ||123||
श्लोक ( Shlok ) 124
विभावरी विभात्येषा दधती विश्वमैन्दवम् । जितं स्वन्मुखकान्त्येव गलज्ज्योत्स्नापरिच्छदम् ॥१२४॥
तुम्हारे मुख की कांति से पराजित होने के कारण ही मानो जिसकी समस्त चाँदनी नष्ट हो गयी है ऐसे चंद्रमंडल को धारण करती हुई यह रात्रि कैसी विचित्र शोभायमान हो रही है ।।124।।
How wondrously radiant this night appears, bearing the moon, whose entire glow seems to have faded as if vanquished by the brilliance of your face. ||124||
श्लोक ( Shlok ) 125
विच्छाथतां गते चन्द्रबिम्बे मन्दीकृतादरम् । जगदानन्दयत्वद्य विबुद्धं त्वन्मुखाम्बुजम् ॥१२५॥
हे देवि, अब कांतिरहित चंद्रमा में जगत् का आदर कम हो गया है इसलिए प्रफुल्लित हुआ यह तेरा मुख-कमल ही समस्त जगत् को आनंदित करे ।।125।।
O Devi, now that the moon has lost its radiance, the world’s admiration for it has diminished. Therefore, let your blooming lotus-like face alone bring joy to the entire world. ||125||
श्लोक ( Shlok ) 126
दिगङ्गनामुखानीन्दुः संस्पृशन्नस्फुटैः करैः । आपिपृच्छिषते नूनं प्रवसन्स्वप्रियाङ्गनाः ॥ १२६॥
चंद्रमा छिपी हुई किरणों (पक्ष में हाथों) से अपनी दिशारूपी स्त्रियों के मुख का स्पर्श कर रहा है जिससे ऐसा मालूम होता है मानो परदेश जाने के लिए अपनी प्यारी स्त्रियों से आज्ञा ही लेना चाहता हो ।।126।।
The moon, with its hidden rays (like veiled hands), gently touches the faces of its beloved direction-like maidens, appearing as if it seeks their permission before departing for a distant land. ||126||
श्लोक ( Shlok ) 127
ताराततिरियं व्योम्नि विरलं लक्ष्यतेऽधुना । विप्रकीर्णैव हारश्रीर्यामिन्या गतिसंभ्रमात् ॥ १२७॥
ताराओं का समूह भी अब आकाश में कहीं-कहीं दिखाई देता है और ऐसा जान पड़ता है मानो जाने की जल्दी से रात्रि के हार की शोभा ही टूट-टूटकर बिखर गयी हो ।।127।।
The cluster of stars is now scarcely visible in the sky, appearing as if, in the haste of departure, the beauty of the night’s garland has shattered and scattered. ||127||
श्लोक ( Shlok ) 128
रूयते कलमामन्द्रमितः सरसि सारसैः । स्तोतुकामैरिवास्माभिः समं त्वाम्नात मङ्गलैः ॥१२८॥
हे देवि, इधर तालाबों पर ये सारस पक्षी मनोहर और गंभीर शब्द कर रहे हैं और ऐसे मालूम होते हैं मानो मंगल-पाठ करते हुए हम लोगों के साथ-साथ तुम्हारी स्तुति ही करना चाहते हों ।।128।।
O Devi, over the ponds, these cranes are producing melodious and deep sounds, appearing as if they wish to join us in reciting auspicious hymns and praising you. ||128||
श्लोक ( Shlok ) 129
उच्छ्यसत्कमलास्येयमितोऽधिगृह दीर्घिकम् ।भवन्ती गायतीवोच्चैरब्जिनी भ्रमरारबैः ॥१२९॥
इधर घर की बावड़ी में भी कमलिनी के कमलरूपी मुख प्रफुलित हो गये हैं और उन पर भौंरे शब्द कर रहे हैं जिससे ऐसा मालूम होता है मानो कमलिनी उच्च-स्वर से आपका यश गा रही हो ।।129।।
Here, in the household well, the lotus flowers of the water lilies have also bloomed, and bees are humming over them, making it seem as if the lotus itself is singing your praises in a melodious voice. ||129||
श्लोक ( Shlok ) 130
निशाविरह संतप्तमितश्चक्राह्वयोर्युगम् । सरस्तरङ्गसंस्पर्शेरिदमाश्र्वास्यतेऽधुना ॥१३०॥
इधर रात्रि में परस्पर के विरह से अतिशय संतप्त हुआ यह चकवा-चकवी का युगल अब तालाब की तरंगों के स्पर्श से कुछ-कुछ आश्वासन प्राप्त कर रहा है ।।130।।
Here, the pair of chakva and chakvi birds, greatly tormented by their separation during the night, are now finding some solace in the gentle touch of the rippling waves of the pond. ||130||
श्लोक ( Shlok ) 131
रथाङ्गमिधुनैरद्य प्रार्थ्यते “मित्रसन्निधिः । तीव्रमायासितैरन्तः करैरिन्द्रोर्विदाहिभिः ॥१३१॥
अतिशय दाह करने वाली चंद्रमा की किरणों से हृदय में अत्यंत दुःखी हुए चकवा-चकवी अब मित्र (सूर्य) के समागम की प्रार्थना कर रहे हैं, भावार्थ―जैसे जब कोई किसी के द्वारा सताया जाता है तब वह अपने मित्र के साथ समागम की इच्छा करता है वैसे ही चकवा-चकवी चंद्रमा के द्वारा सताये जाने पर मित्र अर्थात् सूर्य के समागम की इच्छा कर रहे हैं ।।131।।
The chakva and chakvi birds, deeply tormented by the burning rays of the moon, now long for the arrival of their friend, the sun.
Interpretation – Just as one who is tormented by another seeks the company of a dear friend for solace, in the same way, the chakva and chakvi, distressed by the moon, yearn for the presence of their friend, the sun. ||131||
श्लोक 132 से 141
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318 आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121