आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21
श्लोक 22 से 31 मरुदेवी के अंगों की शोभा
मरुदेवी के चरण नुपूरों से शोभायमान, जंघाएँ एक-दूसरे की उपमा, घुटने सुंदर, ऊरु देवांगनाओं से स्पर्धायुक्त थे। नितंब कामदेव का स्थान, कटि किला, उदर रोमपंक्ति से शोभित थी।
English translation of Ādi purāṇa parv 12 – Shlok 22 to 31
श्लोक ( Shlok ) 22
मणिनूपुरसङ्कारमुखरौ सुभ्रुवः क्रमौ । पद्माविव रणद्भृङ्गसंगतौ रुचिमापतुः ॥२२॥
सुंदर भौंहों वाली उस मरुदेवी के दोनों चरण मणिमय नुपूरों की झंकार से सदा शब्दायमान रहते थे इसलिए गुंजार करते हुए भ्रमरों से सहित कमलों के समान सुशोभित होते थे ।।22।।
The feet of that Marudevi, with beautiful eyebrows, were always resonating with the sound of jeweled anklets, making them constantly echo. Therefore, they adorned like lotuses, accompanied by buzzing bees, creating a harmonious display. ( 22)
श्लोक ( Shlok ) 23
निगूढगुल्फसंधित्वात् युक्तपाष्णिपरिग्रहात् । श्रितौ यानासनाभ्यां च तत्क्रमौ विजिगीषुताम् ॥२३॥
उसके दोनों चरण किसी विजिगीषु (शत्रु को जीतने की इच्छा करने वाले) राजा की शोभा धारण कर रहे थे, क्योंकि जिस प्रकार राजा संधिवार्ता को गुप्त रखता है अर्थात् युद्ध करते हुए भी मन में संधि करने की भावना रखता है, पार्ष्णि (पीछे से सहायता करने वाली) सेना से युक्त होता है, शत्रु के प्रति यान (युद्ध के लिए प्रस्थान करता है) और आसन (परिस्थितिवश अपने ही स्थान पर चुपचाप रहना) गुण से सहित होता है उसी प्रकार उसके चरण भी गाँठों की संधियां गुप्त रखते थे अर्थात् पुष्टकाय होने के कारण गांठों की संधियां मांसपिंड में विलीन थीं इसलिए बाहर नहीं दिखती थीं, पार्ष्णि (एड़ी) से युक्त थे, मनोहर यान (गमन) करते और सुंदर आसन (बैठना आदि से) सहित थे । इसके सिवाय जैसे विजिगीषु राजा अन्य शत्रु राजाओं को जीतना चाहता है वैसे ही उसके चरण भी अन्य स्त्रियों के चरणों की शोभा जीतना चाहते थे ।।23।।
Her feet carried the grandeur of a victorious king, one who desires to conquer enemies. Just as a king keeps his peace talks secret, maintaining the intention to negotiate even during war, aligns with a supporting army from behind, and exhibits qualities of both setting out for battle and remaining still when needed, her feet also kept the ties of their knots hidden. Being full-bodied, these knots merged into the flesh and were not visible externally. They were accompanied by graceful heels, moved with beauty, and held a poised stillness, much like a king’s subtle power. Moreover, just as a conquering king wishes to defeat other rival kings, her feet desired to win the beauty of other women’s feet. ( 23)
श्लोक ( Shlok ) 24
शोभा जङ्घाद्वये यास्याः काप्यन्यत्र न सास्त्यतः । अन्योऽन्योपमयैवाप्तवर्णनं तन्न वण्यते ॥२४॥
उसकी दोनों जंघाओं में जो शोभा थी वह अन्यत्र कहीं नहीं थी । उन दोनों की उपमा परस्पर ही दी जाती थी अर्थात् उसकी वाम जंघा उसकी दक्षिण जंघा के समान थी और दक्षिण जंघा वाम जंघा के समान थी । इसलिए ही उन दोनों का वर्णन अन्य किसी की उपमा देकर नहीं किया जा सकता था ।।24।।
he beauty of her thighs was unparalleled elsewhere. The comparison of those two thighs was made with each other, meaning her left thigh was like her right thigh, and her right thigh was like her left thigh. Therefore, their description could not be made by comparing them to any other. ( 24)
श्लोक ( Shlok ) 25
जानुद्वयं समाश्लिष्टं यदस्याः कामनीयकम् । तदेवालं जगज्जेतुं किं तरां चिन्तयानया ॥२५॥
अत्यंत मनोहर और परस्पर में एक दूसरे से मिले हुए उसके दोनों घुटने ही क्या जगत् को जीतने के लिए समर्थ है इस चिंता से कोई लाभ नहीं था क्योंकि वे अपने सौंदर्य से जगत को जीत ही रहे थे ।।25।।
Her two knees, which were incredibly beautiful and perfectly aligned with each other, were more than capable of conquering the world. Worrying about this was of no use, for they were already winning the world with their beauty. ( 25)
श्लोक ( Shlok ) 26
ऊरुद्वयमुदारश्रि चारु हारि सुखावहम् । स्पर्द्धयेव सुरस्त्रीभिरतिरम्यं बभार सा ॥२६॥
उसके दोनों ही ऊरु उत्कृष्ट शोभा के धारक थे, सुंदर थे, मनोहर थे और सुख देनेवाले थे, जिससे ऐसा मालूम पड़ता था मानो देवांगनाओं के साथ स्पर्धा करके ही उसने ऐसे सुंदर ऊरु धारण किये हो ।।26।।
Both of her thighs were holders of supreme beauty, graceful, charming, and bringers of delight. It seemed as though she had competed with celestial nymphs to acquire such beautiful thighs. (26)
श्लोक ( Shlok ) 27
वामोरुरिति या रूढिस्तां स्वसात् कर्तुमन्यथा । वामवृती कृतावूरू मन्येऽन्यस्त्रीजयेऽमुया ॥२७॥
मैं ऐसा मानता हूँ कि अभी तक संसार में जो ‘वामोरु’ (मनोहर ऊरु वाली) शब्द प्रसिद्ध था उसे उस मरुदेवी ने अन्य प्रकार से अपने स्वाधीन करने के लिए ही मानो अन्य स्त्रियों के विजय करने में अपने दोनों ऊरुओं को वामवृत्ति (शत्रु के समान बरताव करने वाले) कर लिया था । भावार्थ―कोशकारों ने स्त्रियों का एक नाम ‘वामोरु’ भी लिखा है जिसका अर्थ होता है सुंदर ऊरु वाली स्त्री । परंतु मरुदेवी ने ‘वामोरु’ शब्द को अन्य प्रकार से (दूसरे अर्थ से) अपनाया था । वह ‘वामोरु’ शब्द का अर्थ करती थी ‘जिसके ऊरु शत्रुभूत हों ऐसी स्त्री’ । मानो उसने अपनी उक्त मान्यता को सफल बनाने के लिए ही अपने ऊरुओं को अन्य स्त्रियों के ऊरुओं के सामने वामवृत्ति अर्थात् अनुरूप बना लिया था । संक्षेप में भाव यह है कि उसने अपने ऊरुओं की शोभा से अन्य स्त्रियों को पराजित कर दिया था ।।27।।
I believe that the term ‘Vamoru’ (meaning a woman with beautiful thighs), which was famous in the world until now, was redefined by Marudevi in a different way to make it her own. It seems as if, in order to conquer other women, she had made her thighs appear ‘Vamavritti’ (acting like an enemy, as in showing qualities of a rival).
Interpretation: Lexicographers had written the word ‘Vamoru’ to refer to a woman with beautiful thighs. However, Marudevi adopted the word with a different meaning. For her, ‘Vamoru’ referred to a woman whose thighs were like those of an enemy. It was as if she had adjusted her thighs to match this definition, making them appear in a way that defeated the beauty of other women’s thighs. In short, the essence is that with the beauty of her thighs, she had defeated other women. ( 27)
श्लोक ( Shlok ) 28
कलत्रस्थानमेतस्याः स्थानीकृत्य मनोभुवा । विनिर्जितं जगन्नूनमनून परिमण्डलम् ॥२८॥
। इसमें कोई संदेह नहीं कि कामदेव ने मरुदेवी के स्थूल नितंबमंडल को ही अपना स्थान बनाकर इतने बड़े विस्तृत संसार को पराजित किया था ।।28।।
There is no doubt that Kamadeva (the god of love) had made Marudevi’s large, rounded hips his domain, and through them, he had conquered such a vast and expansive world. (28)
श्लोक ( Shlok ) 29
कटीमण्डलमेतस्याः काञ्चीसालपरिष्कृतम् । मन्ये दुर्गमनङ्गस्य जगड्डुमरकारिणः ॥२९॥
करधनीरूपी कोट से घिरा हुआ उसका कटिमंडल ऐसा मालूम होता था मानो जगत्-भर में विप्लव करने वाले कामदेव का किला ही हो ।।29।।
Her waist, surrounded by a girdle-like ornament, seemed as though it were the fortress of Kamadeva, the one who causes upheaval across the world. ( 29)
श्लोक ( Shlok ) 30
लसदंशुकसंसक्तं काञ्चीवेष्टं बभार सा । फणिनं स्त्रस्तनिर्मोकमिव चन्दनवल्लरी ॥३०॥
जिस प्रकार चंदन की लता, जिसकी काँचली निकल गयी है ऐसे सर्प को धारण करती है उसी प्रकार वह मरुदेवी भी शोभायमान अधोवस्त्र से सटी हुई करधनी को धारण कर रही थी ।।30।।
Just as a sandalwood vine, after shedding its bark, embraces a serpent, in the same way, Marudevi gracefully adorned a shining girdle that clung to her exquisite lower garment. ( 30)
श्लोक ( Shlok ) 31
रोमराजो विनीलास्या रेजे मध्येतनूदरम् । हरिनीलमयीवावष्टम्मयष्टिर्मनोभुवः ॥३१॥॥
उस मरुदेवी के कृश उदरभाग पर अत्यंत काली रोमों की पंक्ति ऐसी सुशोभित होती थी मानो इंद्रनील मणि की बनी हुई कामदेव की आलंबनयष्टि (सहारा लेने की लकड़ी) ही हो ।।31।।
On Marudevi’s slender waist, the line of extremely dark body hair appeared so enchanting, as if it were Kamadeva’s staff of support, made entirely of sapphire gems. (31)
श्लोक 32 से 41
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318 आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21