आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 |
श्लोक 202 से 211 दीक्षा और पूजा
चैत्र कृष्ण नवमी को दीक्षा ली। इंद्र ने केश क्षीरसमुद्र में स्थापित किए। 4000 राजाओं ने भी दीक्षा ली।
English translation of Ādi purāṇa parv 17 – Shlok 202 to 211
श्लोक ( Shlok ) 202
कृत्स्नाद् विरम्य सात्रद्याच्छितः सामायिकं यमम् । व्रतगुप्तिसमित्यादीन् तद्भेदानां ददे विभुः ॥२०२॥
भगवान ने समस्त पापारंभ से विरक्त होकर सामायिक-चारित्र धारण किया तथा व्रत गुप्ति समिति आदि चारित्र के भेद ग्रहण किए ।।202।।
The Lord, completely detached from all sinful activities, embraced Sāmāyika-Charitra (equanimity in conduct) and adopted the various aspects of ascetic discipline, including vows (vrata), restraints (gupti), and careful conduct (samiti). (202)
श्लोक ( Shlok ) 203
चैत्रे मास्यसिते पक्षे सुमुहूर्ते शुभोदये। नवम्यामुत्तराषाढे” साया ह्ने प्राव्रजद् विभुः ॥२०३॥
भगवान वृषभदेव ने चैत्र मास के कृष्ण पक्ष को नवमी के दिन सायंकाल के समय दीक्षा धारण की थी । उस दिन शुभ मुहूर्त था, शुभ लग्न थी और उत्तराषाढ़ नक्षत्र था ।।203।।
Lord Rishabhadeva accepted diksha (renunciation) on the ninth day of the Krishna Paksha (waning phase of the moon) in the month of Chaitra, during the evening. The moment was marked by an auspicious muhurta, a favorable lagna, and the presence of the Uttarashada Nakshatra. ( 203)
श्लोक ( Shlok ) 204
. केशान् भगवतो मूर्ध्नि चिरवासात्पवित्रितान्। प्रत्यैच्छन्मघवा रत्नपटल्यां प्रीतमानसः ॥२०४॥
भगवान् के मस्तक पर चिरकाल तक निवास करने से पवित्र हुए केशों को इंद्र ने प्रसन्नचित्त होकर रत्नों के पिटारे में रख लिया था ।।204।।
With great joy, Indra reverently placed the sacred hair of the Lord—purified by having long adorned his divine head—into a casket studded with precious gems. ( 204)
श्लोक ( Shlok ) 205
सितांशुकप्रतिच्छन्ने पृथौ रत्नसमुद् गकें । स्थिता रेजुर्विभोः केशा यथेन्दोर्लक्ष्मलेशकाः ॥२०५॥
सफेद वस्त्र से परिवृत उस बड़े भारी रत्नों के पिटारे में रखे हुए भगवान् के काले केश ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो चंद्रमा के काले चिह्न के अंश ही हों ।।205।।
The black hair of the Lord, placed inside the grand gem-studded casket wrapped in a white cloth, shone beautifully—resembling the dark marks on the moon. ( 205)
श्लोक ( Shlok ) 206 – 209
विभूतमाङ्ग संस्पर्शादिमे मूर्धन्यतामिताः । स्थाप्याः समुचिते देशे कस्मिंश्चिदनु पद्रुते ॥२०६॥
पञ्चमस्यार्णवस्यातिपवित्रस्य निसर्गतः । नीत्वोपायनतामेते स्थाप्यास्तस्य शुचौ जले ॥ २०७।।
धन्याः केशा जगद् भर्तुर्येऽधिमूर्धमधिष्ठिताः । धन्योऽसौ क्षीरसिन्धुश्च यस्ताना प्स्यत्युपायनम् ॥२०८।।
इत्याकलय्य नाकेशाः केशानादाय सादरम् । विभूत्या परया नीत्वा क्षीरोदे तान्विचिक्षिपुः ॥२०९॥
‘ये केश भगवान् के मस्तक के स्पर्श से अत्यंत श्रेष्ठ अवस्था को प्राप्त हुए हैं इसलिए इन्हें उपद्रवरहित किसी योग्य स्थान में स्थापित करना चाहिए । पांचवाँ क्षीरसमुद्र स्वभाव से ही पवित्र है इसलिए उसकी भेंट कर उसी के पवित्र जल में इन्हें स्थापित करना चाहिए । ये केश धन्य हैं जो कि जगत् के स्वामी भगवान् वृषभदेव के मस्तक पर अधिष्ठित हुए थे तथा यह क्षीरसमुद्र भी धन्य है जो इन केशों को भेंट स्वरूप प्राप्त करेगा ।’ ऐसा विचारकर इंद्रों ने उन केशों को आदरसहित उठाया और बड़ी विभूति के साथ ले जाकर उन्हें क्षीरसमुद्र में डाल दिया ।।206-209।।
“These sacred locks of hair, having been in contact with the divine head of Lord Rishabhadeva, have attained the highest purity. They must be enshrined in a place free from all disturbances. The fifth Kshira Sagar (Ocean of Milk) is naturally pure; therefore, these locks should be respectfully offered to its holy waters.”
Reflecting on this, Indra and the other celestial beings reverently lifted the sacred hair and, with great grandeur, carried them to the Kshira Sagar, where they ceremoniously immersed them.
“Blessed are these strands that once adorned the head of the Lord of the Universe, Rishabhadeva, and blessed too is the Ocean of Milk, which shall receive them as an offering!”( 206-209)
श्लोक ( Shlok ) 210
महतां संश्रयान्नूनं यान्तीज्यां मलिना अपि । मलिनैरपि यत्केशैः पूजावाप्ता श्रितैर्गुरुम् ॥२१०।।
महापुरुषों का आश्रय करने से मलिन (नीच) पुरुष भी पूज्यता को प्राप्त हो जाते हैं यह बात बिलकुल ठीक है क्योंकि भगवान् का आश्रय करने से मलिन (काले) केश भी पूजा को प्राप्त हुए थे ।।210।।
Even the impure or lowly become worthy of worship by seeking refuge in great souls—this truth is undeniable. For even the dark hair of the Lord, merely by being associated with Bhagwan Rishabhadeva, became an object of veneration and reverence. ( 210)
श्लोक ( Shlok ) 211
वस्त्राभरणमाल्यानि यान्युन्मुक्तान्यधीशिना । तान्यप्यनन्यसामान्यां निन्युरत्युन्नतिं सुराः ।।२११।।
भगवान् ने जिन वस्त्र आभूषण तथा माला वगैरह का त्याग किया था देवों ने उन सबकी भी असाधारण पूजा की थी ।।211।।
The celestial beings performed extraordinary worship of the garments, ornaments, garlands, and other objects that Bhagwan Rishabhadeva had renounced. ( 211)
श्लोक 212 से 221
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 209 | श्लोक 210 से 213
आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 224
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 208 | श्लोक 209 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 275
आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 |