आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 |
श्लोक 92 से 101 पालकी पर प्रस्थान
भगवान ने पृथ्वी बाँटी और इंद्र की सुदर्शन पालकी पर सवार हुए। उनकी शोभा तप लक्ष्मी की तरह थी। राजा, विद्याधर, और देव पालकी ले चले। यक्ष फूल बरसाते थे।
English translation of Ādi purāṇa parv 17 – Shlok 92 to 101
श्लोक ( Shlok ) 92
शेषेभ्योऽपि स्वसूनुभ्यः संविभज्य महीमिमाम् । विभुर्विश्राणयामास निर्मुमुक्षुरसंभ्रमी ॥९२॥
मोक्ष की इच्छा करने वाले भगवान् ने संभ्रम―आकुलता से रहित होकर अपने शेष पुत्रों के लिए भी यह पृथिवी विभक्त कर बाँट दी थी ।।92।।
“Desiring liberation, Lord Rishabhadeva, free from hesitation and worry, also divided and distributed the remaining lands among His other sons.”
श्लोक ( Shlok ) 93
सुरेन्द्रनिर्मितां दिव्यां शिविकां स सुदर्शनाम् । सनामीन्नाभिराजादीनापृच्छयारुक्षदक्षरः ॥९३॥
तदनंतर अक्षर―अविनाशी भगवान महाराज नाभिराज आदि परिवार के लोगों से पूछकर इंद्र के द्वारा बनायी हुई सुंदर सुदर्शन नाम की पालकी पर बैठे ।।93।।
“Then, the eternal and indestructible Lord, after seeking the consent of King Nabhi and other family members, gracefully seated Himself on the splendid Sudarshana palanquin, which had been exquisitely crafted by Indra.”
श्लोक ( Shlok ) 94
सादरं च शचीनाथदत्तहस्तावलम्बनः । प्रतिज्ञामिव दीक्षायामारूढः शिविकां विभुः ॥९४॥
बड़े आदर के साथ इंद्र ने जिन्हें अपने हाथ का सहारा दिया था ऐसे भगवान वृषभदेव दीक्षा लेने की प्रतिज्ञा के समान पालकी पर आरूढ़ हुए थे ।।94।।
“With great reverence, Indra offered his hand in support as Lord Rishabhadeva ascended the palanquin, just as one solemnly embraces the vow of renunciation.”
श्लोक ( Shlok ) 95
दीआङ्गनापरिष्वङ्ग परिवर्धितकौतुकः । प्रशय्यां नु समारूढः स धाता शिबिकाछलात् ॥९५॥
दीक्षारूपी अंगना के आलिंगन करने का जिनका कौतुक बढ़ रहा है ऐसे भगवान वृषभदेव उस पालकी पर आरूढ़ होते हुए ऐसे जान पड़ते थे मानो पालकी के छल से दीक्षारूपी अंगना की श्रेष्ठ शय्या पर ही आरूढ़ हो रहे है ।।95।।
“Lord Rishabhadeva, whose eagerness to embrace the ascetic path was growing, appeared as though He was not merely ascending the palanquin but, through its illusion, was actually taking His place on the exalted bed of renunciation itself.”
श्लोक ( Shlok ) 96
स्त्रग्वी मलयजालिप्तदीप्तमूर्तिरलंकृतः । स रेजे शिविकारूढस्तपोलक्ष्म्या वरोत्तमः ॥९६॥
जो मालाएँ पहने हुए है, जिनका दैदीप्यमान शरीर चंदन के लेप से लिप्त हो रहा है और जो अनेक प्रकार के वस्त्राभूषणों से अलंकृत हो रहे हैं ऐसे भगवान् वृषभदेव पालकी पर आरूढ़ हुए सुशोभित हो रहे थे मानो तपरूपी लक्ष्मी के उत्तम वर ही हों ।।96।।
“Adorned with garlands, His radiant body anointed with sandalwood paste, and decorated with various exquisite garments and ornaments, Lord Rishabhadeva ascended the palanquin, appearing as if He were the most worthy groom of the divine Lakshmi of austerity.”
श्लोक ( Shlok ) 97
परां विशुद्धिमारूढ प्राक् पश्चाच्छिविकां विभुः । तदाकरोदिवाभ्यासं गुणश्रेण्यधिरोहणे ॥९७॥
भगवान वृषभदेव पहले तो परम विशुद्धता पर आरूढ़ हुए थे अर्थात् परिणामों की विशुद्धता को प्राप्त हुए थे और बाद में पालकी पर आरूढ़ हुए थे इसलिए वे उस समय ऐसे जान पड़ते थे मानो गुणस्थानों की श्रेणी चढ़ने का अभ्यास ही कर रहे हों ।।97।।
“Lord Rishabhadeva had first ascended the supreme purity—attaining the purity of His inner disposition—before ascending the palanquin. Thus, at that moment, He appeared as if He were practicing the gradual ascent through the stages of spiritual elevation (gunasthanas).”
श्लोक ( Shlok ) 98
पदानि सप्त तामू हुः शिबिकां प्रथमं नृपाः । ततो विद्याधरा निन्युर्ब्योंम्नि सप्तपदान्तरम् ॥९८॥
भगवान् की उस पालकी को प्रथम ही राजा लोग सात पैड तक ले चले और फिर विद्याधर लोग आकाश में सात पैड तक ले चले ।।98।।
“The kings first carried Lord’s palanquin for seven steps on the ground, and then the Vidyadharas lifted it into the sky and carried it for another seven steps.”
श्लोक ( Shlok ) 99
स्कन्धाधिरोपितां कृत्वा ततोऽमूमविलम्बितम् । सुरासुराः खमुत्पेतुरारूढप्रमदोदयाः ।॥९९॥
तदनंतर वैमानिक और भवनत्रिक देवों ने अत्यंत हर्षित होकर वह पालकी अपने कंधों पर रखी और शीघ्र ही उसे आकाश में ले गये ।।99।।
“After that, the celestial beings (Vaimanik and Bhavanatrika gods), filled with immense joy, lifted the palanquin onto their shoulders and swiftly carried it into the sky.”
श्लोक ( Shlok ) 100
पर्याप्तमिदमेवास्य प्रभोर्माहात्म्यशंसनम् । यत्तदा त्रिदिवाधीशा जाता युग्यकवाहिनः ॥१००॥
भगवान् वृषभदेव के माहात्म्य की प्रशंसा करना इतना ही पर्याप्त है कि उस समय देवों के अधिपति इंद्र भी उनकी पालकी ले जाने वाले हुए थे अर्थात् इंद्र स्वयं उनकी पालकी ढो रहे थे ।।100।।
“Praising the greatness of Lord Rishabhadeva is sufficient by stating that, at that time, even Indra, the lord of the gods, became a bearer of His palanquin—Indra himself was carrying it.”
श्लोक ( Shlok ) 101
तदा विचकरुः पुष्पवर्षमामोदि गुह्यकाः । ववौ मन्दाकिनीसीकराहारः शिशिरो मरुत् ॥१०१॥
उस समय यक्ष जाति के देव सुगंधित फूलों की वर्षा कर रहे थे और गंगानदी के जलकणों को धारण करने वाला शीतल वायु बह रहा था ।।101।।
At that time, the Yaksha deities were showering fragrant flowers, and a cool breeze carrying the droplets of the Ganges River was blowing. ॥101॥
श्लोक 102 से 111
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 224
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