आदिपुराण पर्व 25 – भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71
श्लोक 72 से 81 गुणों के नाम और नमस्कार
वे त्रिनेत्र, अंधकांतक, अर्धनारीश्वर, शिव, हर, शंकर, वृषभ आदि नामों से पुकारे जाते हैं। वे चार शरणों के मूर्तिस्वरूप और पंच परमेष्ठी हैं। उनके कल्याणकों और कर्म-विनाश के लिए सौधर्मेंद्र नमस्कार करते हैं।
English translation of Ādi purāṇa parv 25 – Shlok 72 to 81
श्लोक ( Shlok ) 72
त्रिकालविषयाशेषतत्त्वभेदात् त्रिधोत्थितम् । केवलाख्यं दधच्चक्षुस्त्रिनेत्रोऽसि त्वमीशितः ॥७२॥
हे ईश्वर, जो तीनों कालविषयक समस्त पदार्थों को जानने के कारण तीन प्रकार से उत्पन्न हुआ कहलाता है ऐसे केवलज्ञान नामक नेत्र को आप धारण करते हैं इसलिए आप ही ‘त्रिनेत्र’ कहे जाते हैं ।।72।।
O Lord, you possess the eye of Kevalgyan (absolute knowledge), which comprehends all substances related to the three times—past, present, and future. Therefore, you are rightfully called Trinetra—the one with three eyes. ॥72॥
श्लोक ( Shlok ) 73
त्वामन्धकान्तकं प्राहुर्मोहान्धासुरमर्दनात् । अर्ध ते नारयो यस्मादर्धनारीश्वरोऽस्यतः ॥७३॥
आपने मोहरूपी अंधासुर को नष्ट कर दिया है इसलिए विद्वान् लोग आपको ही ‘अंधकांतक’ कहते हैं, आठ कर्मरूपी शत्रुओं में से आपके आधे अर्थात् चार घातियाकर्मरूपी शत्रुओं के ईश्वर नहीं है इसलिए आप ‘अर्धनारीश्वर’ कहलाते हैं ।।73।।
You have destroyed the demon of delusion (Moha), therefore the wise call you Andhakantak—the destroyer of darkness. Among the eight karmic enemies, you have conquered half, namely the four destructive Karmas. Thus, you are called Ardhanarishwar—one who has overcome half of the enemies. ॥73॥
श्लोक ( Shlok ) 74
शिवः शिवपदाध्यासाद् दुरितारिहरो हरः । शंकरः कृतशं लोके शंभवस्त्वं भवन्सुखे ॥७४॥
आप शिवपद अर्थात् मोक्षस्थान में निवास करते हैं इसलिए ‘शिव’ कहलाते हैं, पापरूपी शत्रुओं का नाश करने वाले हैं इसलिए ‘हर’ कहलाते हैं, लोक में शांति करने वाले हैं इसलिए ‘शंकर’ कहलाते हैं और सुख से उत्पन्न हुए हैं इसलिए ‘शंभव’ कहलाते हैं ।।74।।
You reside in the state of liberation (Shivapad), hence you are called Shiv. You destroy enemies in the form of sins, therefore you are called Har. You bring peace to the world, thus you are known as Shankar. And you are born from bliss, so you are called Shambhav. ॥74॥
श्लोक ( Shlok ) 75
वृषभोऽसि जगज्ज्येष्ठः पुरुः पुरुगुणोदयैः । नाभेयो नाभिसंभूतेरिक्ष्वाकुकुलनन्दनः ॥७५॥
जगत् में श्रेष्ठ हैं इसलिए ‘वृषभ’ कहलाते हैं, अनेक उत्तम-उत्तम गुणों का उदय होने से ‘पुरु’ कहलाते हैं, नाभिराजा से उत्पन्न हुए हैं इसलिए ‘नाभेय’ कहलाते हैं और इक्ष्वाकु-कुल में उत्पन्न हुए हैं इसलिए ‘इक्ष्वाकुकुलनंदन’ कहलाते हैं ।।75।।
You are supreme in the world, hence you are called Vrishabh. Due to the manifestation of countless noble virtues, you are known as Puru. Being born of King Nabhi, you are called Nabheya. And, since you were born in the Ikshvaku lineage, you are called Ikshvaku-Kula-Nandan. ॥75॥
श्लोक ( Shlok ) 76
त्वमेकः पुरुषस्कन्ध स्त्वं द्वे लोकस्य लोचने । स्वं त्रिधा बुद्धसन्मार्गस्त्रिज्ञस्त्रिज्ञानधारकः ॥७६॥
समस्त पुरुषों में श्रेष्ठ आप एक ही हैं, लोगों के नेत्र होने से आप दो रूप धारण करने वाले हैं तथा आप सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र के भेद से तीन प्रकार का मोक्षमार्ग जानते हैं अथवा भूत, भविष्यत् और वर्तमानकाल संबंधी तीन प्रकार का ज्ञान धारण करते हैं इसलिए आप त्रिज्ञ भी कहलाते हैं ।।76।।
You are the supreme among all beings, hence you are considered one. As the guide and vision of all people, you appear in two forms. You know the path of liberation divided into three parts: Samyak Darshan (Right Faith), Samyak Gyan (Right Knowledge), and Samyak Charitra (Right Conduct), or you possess knowledge of the three times—past, present, and future. Therefore, you are also called Trijna—the knower of threefold truths. ॥76॥
श्लोक ( Shlok ) 77
“चतुः शरणमाङ्गल्य मूर्तिस्त्वं चतुरस्रधीः । पञ्चब्रह्ममयो देव पावनस्त्वं पुनीहि माम् ॥७७॥
अरहंत, सिद्ध, साधु और केवली भगवान् के द्वारा कहा हुआ धर्म ये चार शरण तथा मंगल कहलाते हैं आप इन चारों की मूर्तिस्वरूप हैं, आप चतुरस्रधी हैं अर्थात् चारों ओर की समस्त वस्तुओं को जलाने वाले हैं, पंच परमेष्ठीरूप हैं और अत्यंत पवित्र हैं । इसलिए हे देव, मुझे भी पवित्र कीजिए ।।77।।
The Arihant, Siddha, Sadhu, and the teachings of the Kevali Bhagwan are considered the four refuges and auspicious entities. You are the embodiment of all these four. You possess Chaturasradhi—the ability to perceive and understand all things in all directions. You embody the Panch Paramesthi and are supremely pure. Therefore, O Lord, please purify me as well. ॥77॥
श्लोक ( Shlok ) 78
स्वर्गावतरणे तुभ्यं सद्योजातात्मने नमः । जन्माभिषेकामाय वामदेव नमोऽस्तु ते ॥७८॥
हे नाथ, आप स्वर्गावतरण के समय सद्योजात अर्थात् शीघ्र ही उत्पन्न होने वाले कहलाये थे इसलिए आपको नमस्कार हो, आप जन्माभिषेक के समय बहुत सुंदर जान पड़ते थे इसलिए हे वामदेव, आपके लिए नमस्कार हो ।।78।।
O Lord, during your descent from heaven, you were called Sadyajat—one who manifests instantly. Therefore, I offer my salutations to you. During your birth consecration, you appeared exceedingly beautiful; hence, O Vamadev, I bow to you. ॥78॥
श्लोक ( Shlok ) 79
“सन्निष्क्रान्तावघोराय परं प्रशममीयुषे । केवलज्ञानसंसिद्धावीशानाय नमोऽस्तु ते ॥७९॥
दीक्षा कल्याणक के समय आप परम शांति को प्राप्त हुए और केवलज्ञान के प्राप्त होने पर परम पद को प्राप्त हुए तथा ईश्वर कहलाये इसलिए आपको नमस्कार हो ।।79।।
At the time of Diksha Kalyanak (initiation), you attained supreme peace, and upon attaining Kevalgyan (absolute knowledge), you achieved the highest state and were called Ishwar (Lord). Therefore, I offer my salutations to you. ॥79॥
श्लोक ( Shlok ) 80
पुरस्तत्पुरुषत्वेन विमुक्तिपदभागिने । नमस्तत्पुरुषावस्थां भाविनीं तेऽद्य बिभ्रते ॥८०॥
अब आगे शुद्ध आत्मस्वरूप के द्वारा मोक्षस्थान को प्राप्त होंगे, इसलिए आगामी काल में प्राप्त होने वाली सिद्ध अवस्था को धारण करने वाले आपके लिए मेरा आज ही नमस्कार हो ।।80।।
Soon, you will attain the state of liberation through your pure soul nature. Therefore, I offer my salutations today itself to your future state of Siddhahood—the ultimate state of perfection and liberation. ॥80॥
श्लोक ( Shlok ) 81
ज्ञानावरणनिर्ह्र सान्नमस्तेऽनन्तचक्षुषे । दर्शनावरणोच्छेदान्नमस्ते विश्वदृश्वने ॥८१॥
ज्ञानावरण कर्म का नाश होने से जो अनंतचक्षु अर्थात् अनंतज्ञानी कहलाते हैं ऐसे आपके लिए नमस्कार हो और दर्शनावरण कर्म का विनाश हो जाने से जो विश्वदृश्वा अर्थात् समस्त संसार को देखने वाले कहलाते हैं ऐसे आपके लिए नमस्कार हो ।।81।।
Salutations to you, who are called Anantachakshu—the possessor of infinite knowledge—due to the destruction of Jnanavarana Karma (knowledge-obscuring karma). And salutations to you, who are known as Vishvadrik—the one who sees the entire universe—due to the annihilation of Darshanavarana Karma (perception-obscuring karma). ॥81॥
श्लोक 82 से 91
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268
आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 316
आदिपुराण पर्व 23 – समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 196
आदिपुराण पर्व 24 – भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 172 | श्लोक 173 से 181 | श्लोक 182 से 186
आदिपुराण पर्व 25 – भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71