आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142
श्लोक 143 से 151 अहमिंद्र की प्रकृति
अहमिंद्र असूया, निंदा, ईर्ष्या से मुक्त, सुखी रहते थे। वज्रनाभि का अहमिंद्र 33 सागर आयु, समचतुरस्र, हंस समान श्वेत शरीर, दिव्य वस्त्रों से युक्त था। उसकी वेषभूषा शांत, ललित, उदात्त थी।
English translation of Ādi purāṇa parv 11 – Shlok 143 to 151
श्लोक ( Shlok ) 143
अहमिन्द्रोऽस्मि नेन्द्रोऽन्यो मत्तं ऽस्तीत्यात्त कत्थनाः । अहमिन्द्राख्यया ख्यातिं गतास्ते हि सुरोत्तमाः ॥१४३
मैं ही इंद्र हूँ, मेरे सिवाय अन्य कोई इंद्र नहीं है’ इस प्रकार वे अपनी निरंतर प्रशंसा करते रहते हैं और इसलिए वे उत्तम देव अहमिंद्र नाम से प्रसिद्धि को प्राप्त होते हैं ।।143।।
“They continuously praise themselves, thinking, ‘I alone am Indra; there is no other Indra besides me.’ Because of this, these supreme deities are renowned as Ahmindras.”
श्लोक ( Shlok ) 144
नासूया परनिन्दा वा नात्मश्लाघा न मत्सरः । केवलं सुखसाद्भूता दीव्यन्ते ते प्रमोदिनः ॥१४४॥
उन अहमिंद्र के न तो परस्पर में असूया है, न परनिंदा है, न आत्मप्रशंसा है और न ईर्ष्या ही है । वे केवल सुखमय होकर हर्षयुक्त होते हुए निरंतर क्रीड़ा करते रहते हैं ।।144।।
“Among those Ahmindras, there is neither jealousy nor criticism of others, nor self-praise or envy. They simply remain joyful, immersed in bliss, and continuously engage in playful activities.”
श्लोक ( Shlok ) 145
स एष परमानन्दं स्वसाद्भुतं समुद्रहन् । त्रयस्त्रिंशत्ययोराशिप्रमितायुर्महाद्युतिः ॥१४५॥
वह वज्रनाभि का जीव अहमिंद्र अपने आत्मा के अधीन उत्पन्न हुए उत्कृष्ट सुख को धारण करता था, तैंतीस सागर प्रमाण उसकी आयु थी और स्वयं अतिशय दैदीप्यमान था ।।145।।
“That being, who was Vajranabhi in his past life, as Ahmindra, experienced supreme bliss that arose naturally from his own soul. His lifespan was thirty-three ocean-measured periods, and he radiated an extraordinary brilliance.”
श्लोक ( Shlok ) 146
समेन चतुरस्त्रेण संस्थानेनातिसुन्दरम् । हस्तमात्रोच्छितं देहं हंसाभं धवलं दधत् ॥१४६॥
वह समचतुरस्र संस्थान से अत्यंत सुंदर, एक हाथ ऊँचे और हंस के समान श्वेत शरीर को धारण करता था ।।146।।
“He possessed an extremely beautiful, perfectly symmetrical form, standing one hand-span tall, with a body as white as a swan.”
श्लोक ( Shlok ) 147
सहजांशुकदिव्य स्त्रगूविभूषाभिरलङ्कृतम् । सौन्दर्यस्येव संदोहं दधानो रुचिरं वपुः॥१४७॥
वह साथ-साथ उत्पन्न हुए दिव्य वस्त्र, दिव्यमाला और दिव्य आभूषणों से विभूषित जिस मनोहर शरीर को धारण करता था वह ऐसा जान पड़ता था मानो सौंदर्य का समूह ही हो ।।147।।
Adorned with divine garments, celestial garlands, and radiant ornaments that manifested alongside him, his enchanting form appeared as if it were the very embodiment of beauty itself.”
श्लोक ( Shlok ) 148
प्रशान्तललितोदात्तधीरनेपथ्यविभ्रमः । स्वदेहप्रसरज्योस्नाक्षोराब्धौ मग्नविग्रहः॥१४८॥
उस अहमिंद्र की वेषभूषा तथा विलास-चेष्टाएँ अत्यंत प्रशांत थी, ललित (मनोहर) थी, उदात्त (उत्कृष्ट) थीं और धीर थीं । इसके सिवाय वह स्वयं अपने शरीर की फैलती हुई प्रभारूपी क्षीरसागर में सदा निमग्न रहता था ।।148।।
“The attire and graceful mannerisms of that Ahmindra were exceedingly serene, elegant, exalted, and dignified. Moreover, he remained ever immersed in the vast ocean of radiant splendor emanating from his own body.”
श्लोक ( Shlok ) 149
स्फुरदाभरणोद्योतद्योतिताखिलदिङ्मुखः । तेजोराशिरिबैकध्यमुपनीतोऽतिभास्वरः ॥१४९॥
जिसने अपने चमकते हुए आभूषणों के प्रकाश से दशों दिशाओं को प्रकाशित कर दिया था ऐसा वह अहमिंद्र ऐसा जान पड़ता था मानो एकरूपता को प्राप्त हुआ अतिशय प्रकाशमान तेज का समूह ही हो ।।149।।
“That Ahmindra, who illuminated all ten directions with the brilliance of his radiant ornaments, appeared as if he were a unified embodiment of pure, resplendent light.”
श्लोक ( Shlok ) 150
विशुद्धलेश्यः शुद्धेद्धदेहदीधितिदिग्वदिक् । सोधेनेव रसेनाप्तनिर्माणः सुख निर्वृतः॥१५०॥
वह विशुद्ध लेश्या का धारक था और अपने शरीर की शुद्ध तथा प्रकाशमान किरणों से दसों दिशाओं को लिप्त करता था, इसलिए सदा सुखी रहने वाला वह अहमिंद्र ऐसा मालूम होता था मानो अमृतरस के द्वारा ही बनाया गया हो ।।150।।
“Possessing a pure Leshya, he enveloped all ten directions with the radiant and pristine rays of his body. Always immersed in bliss, that Ahmindra appeared as if he were crafted entirely from the essence of nectar itself.”
श्लोक ( Shlok ) 151
सुधाशिनां सुनासीरप्रमुखाणामगोचरम् । संप्राप्तः परमानन्दप्रदं पदमनुत्तरम् ॥१५१॥
इस प्रकार वह अहमिंद्र ऐसे उत्कृष्ट पद को प्राप्त हुआ जो इंद्रादि देवों के भी अगोचर है, परमानंद देनेवाला है और सबसे श्रेष्ठ है ।।151।।
“Thus, that Ahmindra attained an exalted state that remains beyond the perception of even Indra and other deities, a state that grants supreme bliss and is the most superior of all.”
श्लोक 152 से 161
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318 आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142