भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41
श्लोक 42 से 51 राज्य और वज्रसेन की दीक्षा
राज्यलक्ष्मी वज्रनाभि से बंधी। वज्रसेन ने मुकुट उसे सौंपा। लौकांतिक देवों ने वज्रसेन को दीक्षा के लिए प्रेरित किया। वज्रसेन और 1,000 राजाओं ने दीक्षा ली। वज्रनाभि राज्य और वज्रसेन तप में संतुष्ट थे।
English translation of Ādi purāṇa parv 11 – Shlok 42 to 51
श्लोक ( Shlok ) 42
वक्षसि प्रणयं लक्ष्मीर्दृढमस्याकरोत्तदा । पट्टबन्धापदेशेन तस्मिन् प्राध्वंकृतेव सा ।।४२।।
उस समय राज्यलक्ष्मी भी उसके वक्षःस्थल पर गाड़ प्रेम करती थी और ऐसी मालूम होती थी मानो पट्टबंध के छल से वह उस पर बाँध ही दी गयी हो ।।42।।
At that moment, the Goddess of Royal Fortune clung to his chest with deep affection, appearing as if she had been bound to him through the illusion of the coronation ceremony itself. ( 42)
श्लोक ( Shlok ) 43
“मकुटं मूर्ध्नि तस्याधान् नृपैर्नृपवरः समम् । स्वं भारमवतार्यास्मिन् ससाक्षिकमिवार्पयत् ।।४3
राजाओं में श्रेष्ठ वज्रसेन महाराज ने अनेक राजाओं के साथ अपना मुकुट वज्रनाभि के मस्तक पर रखा था । उस समय वे ऐसे जान पड़ते थे मानो सबकी साक्षीपूर्वक अपना भार ही उतारकर उसे समर्पण कर रहे हों ।।43।।
The eminent King Vajrasena, along with many other kings, placed his crown upon Vajranabhi’s head. At that moment, he appeared as if he were publicly relinquishing his burden and entrusting it to him. ( 43)
श्लोक ( Shlok ) 44
हारेणालंकृतं वक्षो भुजावस्याङ्गदादिभिः । पट्टिकाकटिसूत्रेण कटी पट्टांशुकेन च ।।४४।।
उस समय उसका वक्षःस्थल हार से अलंकृत हो रहा था, भुजाएँ बाजूबंद आदि आभूषणों से सुशोभित हो रही थीं और कमर करधनी तथा रेशमी वस्त्र की पट्टी से शोभायमान हो रही थी ।।44।।
At that moment, his chest was adorned with a radiant garland, his arms gleamed with armlets and other ornaments, and his waist was beautifully decorated with a jeweled girdle and a band of silken fabric. ( 44)
श्लोक ( Shlok ) 45
कृती कृताभिषेकाय सोऽस्मै नार्पत्यमार्पिपत् । नृपैः समं सभाशास्य महान् सम्राड्र भवेत्यमुम् ॥४५॥
अत्यंत कुशल वज्रसेन महाराज ने, जिसका राज्याभिषेक हो चुका है ऐसे वज्रनाभि के लिए तू बड़ा भारी चक्रवर्ती हो इस प्रकार अनेक राजाओं के साथ-साथ आशीर्वाद देकर अपना समस्त राज्यभार सौंप दिया ।।45।।
The highly skilled King Vajrasena, along with many other kings, bestowed blessings upon Vajranabhi—who had already been coronated—saying, “May you become a great Chakravarti (universal ruler).” With this, he entrusted him with the entire responsibility of the kingdom. ( 45)
श्लोक ( Shlok ) 46
अनन्तरं च लौकान्तिकामरैः प्रतिबोधितः । वज्रसेनमहाराजो न्यधाग्निष्क्रमणे मतिम् ॥४६॥
तदनंतर लौकांतिक देवों ने आकर महाराज वज्रसेन को समझाया जिससे प्रबुद्ध होकर उन्होंने दीक्षा धारण करने में अपनी बुद्धि लगायी ।।46।।
Thereafter, celestial deities (Laukāntika Devas) appeared and enlightened King Vajrasena. Upon realizing the truth, he resolved to renounce the world and embrace ascetic initiation. ( 46)
श्लोक ( Shlok ) 47
यथोचितामपचितिं तन्वत्सूत्तमनाकिषु । परिनिष्क्रम्य चक्रेऽसौ मुक्तिफलक्ष्मी प्रमोदिनीम् ॥४७॥
जिस समय इंद्र आदि उत्तम-उत्तम देव भगवान् वज्रसेन की यथायोग्य पूजा कर रहे थे उसी समय उन्होंने दीक्षा लेकर मुक्तिरूपी लक्ष्मी को प्रसन्न किया था ।।47।।
At the very moment when Indra and other exalted deities were reverently worshiping the divine King Vajrasena, he took initiation and pleased the Goddess of Liberation (Moksha-Lakshmi). ( 47)
श्लोक ( Shlok ) 48
समं भगवतानेन सहस्त्रगणनामिताः । महस्यास्रवनोद्याने नृपाः प्रावाजिषुस्तदा ॥४८॥
उस समय भगवान् वज्रसेन के साथ-साथ आसवन नाम के बड़े भारी उपवन में एक हजार अन्य राजाओं ने भी दीक्षा ली थी ।।48।।
At that time, along with Lord Vajrasena, a thousand other kings also took initiation in the grand Asavana garden. ( 48)
श्लोक ( Shlok ) 49
राज्यं निष्कण्टकीकृत्य वचनाभिरपालयत् । भगवानपि योगीन्द्रस्तपश्चक्रे विकल्मषम् ॥४९॥
इधर राजा वज्रनाभि राज्य को निष्कंटक कर उसका पालन करता था और उधर योगिराज भगवान् वज्रसेन भी निर्दोष तपस्या करते थे ।।49।।
On one hand, King Vajranabhi ruled the kingdom peacefully, free from obstacles, while on the other, Lord Vajrasena, the supreme ascetic, engaged in flawless penance. ( 49)
श्लोक ( Shlok ) 50
राज्यलक्ष्मीपरिष्वङ्गाद् वज्रनाभिस्तुतोष सः । तपोलक्ष्मीसमासंगाद् गुरुरस्यातिपिप्रिये ॥५०॥
इधर वज्रनाभि राज्यलक्ष्मी के समागम से अतिशय संतुष्ट होता था और उधर उसके पिता भगवान् वज्रसेन भी तपोलक्ष्मी के समागम से अत्यंत प्रसन्न होते थे ।।50।।
On one hand, Vajranabhi found immense satisfaction in the embrace of royal fortune, while on the other, his father, Lord Vajrasena, experienced profound joy through the pursuit of ascetic fortune. ( 50)
श्लोक ( Shlok ) 51
भ्रातृभिर्धृतिरस्यासीद् वज्रनाभेः समाहितैः । गुणैस्तुधृतिमातेने योगी श्रेयोऽनुबन्धिमिः ॥५१॥
इधर वज्रनाभि को अपने सम्मिलित भाइयों से बड़ा धैर्य (संतोष) प्राप्त होता था और उधर भगवान् वज्रसेन मुनि कल्याण करने वाले गुणों से धैर्य (संतोष) को विस्तृत करते थे ।।51।।
On one hand, Vajranabhi found great contentment through the support of his united brothers, while on the other, Lord Vajrasena expanded his patience through virtues that led to the welfare of ascetics. (51)
श्लोक 52 से 62
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41