आदिपुराण पर्व 24 – भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 172 | श्लोक 173 से 181
श्लोक 182 से 186 भरत का अयोध्यापुरी में प्रवेश
भगवान् की पूजा कर भरत बाहुबली आदि के साथ अयोध्या लौटते हैं। वे सूर्य के समान प्रभावशाली और विजयी प्रतीत होते हैं। अयोध्या जिनवाणी की तरह शोभित होती है, जिसमें पदार्थों का विस्तार, पवित्रता और आनंद भरा है।
English translation of Ādi purāṇa parv 24 – Shlok 182 to 186
श्लोक ( Shlok ) 182
मरीचिवर्ज्याः सर्वेऽपि तापसास्तपसि स्थिताः । भट्टारकान्ते संबुद्धय महाप्राव्राज्यमास्थिताः ॥१८२॥
जो तपस्वी पहले भ्रष्ट हो गये थे उनमें से मरीचि को छोड़कर बाकी सब तपस्वी लोग भगवान् के समीप संबोध पाकर तत्त्वों का यथार्थ स्वरूप समझकर फिर से दीक्षित हो तपस्या करने लगे थे ।।182।।
Except for Marichi, all the ascetics who had previously deviated from their path attained enlightenment from Lord Rishabha. Understanding the true nature of the principles, they took initiation again and resumed their austerities. — 182.
श्लोक ( Shlok ) 183
ततो भरतराजेन्द्रो गुरुं संपूज्य पुण्यधीः । स्वपुराभिमुखो जज्ञे चक्रपूजाकृतत्वरः ॥१८३॥
तदनंतर जिन्हें चक्ररत्न की पूजा करने के लिए कुछ जल्दी हो रही है और जो पवित्र बुद्धि के धारक हैं ऐसे महाराज भरत जगद्गुरु की पूजा कर अपने नगर के सम्मुख हुए ।।183।।
After that, the highly intelligent King Bharata, eager to worship the divine Chakra Ratna, paid homage to the World Teacher (Lord Rishabha) and proceeded towards his city. — 183.
श्लोक ( Shlok ) 184
युवा बाहुबली श्रीमानन्ये च भरतानुजाः । तमन्वीयुः कृतानन्दमभिवन्द्य जगद्गुरुम् ॥१८४॥
युवावस्था को धारण करने वाला बुद्धिमान् बाहुबली तथा और भी भरत के छोटे भाई आनंद के साथ जगद्गुरु की वंदना करके भरत के पीछे-पीछे वापस लौट रहे थे ।।184।।
The wise Bahubali, who was in his youthful prime, along with Bharata’s younger brother Ananda, offered their salutations to the World Teacher (Lord Rishabha) and followed Bharata as they returned. — 184.
श्लोक ( Shlok ) 185
भरतपतिमथाविर्भूतदिव्यानुभावप्रसरमुदयरागं प्रत्युपाता भिमुख्यम् । विजयिनमनुजग्मुर्भ्रातरस्तं दिनादौ दिनपमिव मयूखा दिङ्मुखाक्रान्त भाजः ॥१८५॥
अथानंतर उस समय महाराज भरत ठीक सूर्य के समान जान पड़ते थे क्योंकि जिस प्रकार सूर्य के दिव्य प्रभाव का प्रसार (फैलाव) प्रकट होता है, उसी प्रकार भरत के भी दिव्य―अलौकिक प्रभाव का प्रसार प्रकट हो रहा था, सूर्य जिस प्रकार उदय होते समय राग अर्थात् लालिमा धारण करता है उसी प्रकार भरत भी अपने राज्य-शासन के उदयकाल में प्रजा से राग अर्थात् प्रेम धारण कर रहे थे, सूर्य जिस प्रकार आभिमुख्य अर्थात् प्रधानता को धारण करता है उसी प्रकार भरत भी प्रधानता को धारण कर रहे थे, सूर्य जिस प्रकार विजयी होता उसी प्रकार भरत भी विजयी थे, और सायंकाल के समय जिस प्रकार समस्त दिशाओं को प्रकाशित करने वाली किरणें सूर्य के पीछे-पीछे जाती है ठीक उसी प्रकार समस्त दिशा में आक्रमण करने वाले भरत के छोटे भाई उनके पीछे-पीछे जा रहे थे ।।185।।
At that time, King Bharata appeared just like the sun. Just as the divine radiance of the sun spreads far and wide, Bharata’s own divine and extraordinary influence was also spreading. Just as the sun, during its rise, takes on a red hue symbolizing attachment, Bharata too, at the dawn of his reign, displayed affection and love towards his subjects. Just as the sun holds supremacy and prominence, Bharata too possessed unmatched authority. Just as the sun emerges victorious in dispelling darkness, Bharata too was victorious. And just as, in the evening, the rays illuminating all directions follow the sun, similarly, Bharata’s younger brothers, who conquered all directions, were following him. — 185.
श्लोक ( Shlok ) 186
स्वान्तर्नीतसमस्तवस्तुविसरां प्रास्तीर्णवर्णोज्ज्वलाम् निर्णिक्तां नयचक्र सन्निधिगुरुं स्फी तप्रमोदाहृतिम् ।
विश्वास्यां निलिलाङ्गभृत्परिचितां जैनीमिव व्याहृतिं प्राविक्षत्परया मुदा निधिपतिः स्वामुत्पताकां पुरीम् ॥१८६॥
इस प्रकार निधियों के अधिपति महाराज भरत ने बड़े भारी आनंद के साथ अपनी अयोध्यापुरी में प्रवेश किया था । उस समय उसमें अनेक ध्वजाएँ फहरा रही थीं और वह ठीक जिनवाणी के समान सुशोभित हो रही थी क्योंकि जिस प्रकार जिनवाणी के भीतर समस्त पदार्थों का विस्तार भरा रहता है उसी प्रकार उस अयोध्या में अनेक पदार्थों का विस्तार भरा हुआ था । जिस प्रकार जिनवाणी फैले हुए वर्णों अर्थात् अक्षरों से उज्ज्वल रहती है उसी प्रकार वह अयोध्या भी फैले हुए―जगह-जगह बसे हुए क्षत्रिय आदि वर्णों से उज्ज्वल थी । जिस प्रकार जिनवाणी अत्यंत शुचिरूप-पवित्र होती है उसी प्रकार वह अयोध्या भी शुचिरूप―कर्दम आदि से रहित पवित्र थी । जिस प्रकार जिनवाणी समूह के सन्निधान से श्रेष्ठ होती है उसी प्रकार वह अयोध्या भी नीतिसमूह के सन्निधान से श्रेष्ठ थी । जिस प्रकार जिनवाणी विस्तृत आनंद को देने वाली होती है उसी प्रकार वह अयोध्या भी सबको विस्तृत आनंद की देने वाली थी, जिस प्रकार जिनवाणी विश्वास्य अर्थात् विश्वास करने योग्य होती है अथवा सब ओर मुखवाली अर्थात् समस्त पदार्थों का निरूपण करने वाली होती है उसी प्रकार वह अयोध्या भी विश्वास करने के योग्य अथवा सब ओर हैं अत्यय अर्थात् मुख जिसके ऐसी थी―उसके चारों ओर गोपुर बने हुए थे, और जिस प्रकार जिनवाणी सभी अंग अर्थात् द्वादशांग को धारण करने वाले मुनियों के द्वारा परिचित―अभ्यस्त रहती है उसी प्रकार वह अयोध्या भी समस्त जीवों के द्वारा परिचित थी―उसमें प्रत्येक प्रकार के प्राणी रहते थे ।।186।।
In this way, King Bharata, the lord of treasures, entered his city of Ayodhya with immense joy. At that time, many flags were fluttering over the city, and it appeared just as splendid as the Jinavani (the divine teachings of the Tirthankaras).
Just as Jinavani encompasses a vast array of knowledge about all substances, similarly, Ayodhya was filled with a wide variety of resources and prosperity. Just as Jinavani shines brightly with its extensive letters and words, Ayodhya too shone with the presence of numerous Kshatriyas and other communities settled across the city.
Just as Jinavani is supremely pure and free from impurities, Ayodhya too was clean, devoid of filth and impurities. Just as Jinavani attains greatness through the presence of numerous virtues, Ayodhya too was elevated by the presence of righteous principles.
Just as Jinavani offers boundless joy to all, Ayodhya too provided widespread happiness to everyone. Just as Jinavani is trustworthy and capable of explaining all aspects of existence, Ayodhya too was reliable and well-fortified, surrounded by grand gateways.
And just as Jinavani is understood and practiced by monks who have mastered all its sections (the twelve Angas), Ayodhya was known and inhabited by all kinds of beings—diverse creatures and people lived there. — 186.
इत्यार्ष भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षण महापुराणसंग्रहे भगवद्धर्मोपदेशनोपवर्णनं नाम चतुविंशतितमं पर्व ॥२४॥
इस प्रकार भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराणसंग्रह में भगवत्कृत
धर्मोपदेश का वर्णन करने वाला चौबीसवां पर्व समाप्त हुआ ।।24।।
Thus ends the twenty-fourth chapter, describing the teachings of Dharma delivered by the revered Lord, in the Triṣaṣṭi-lakṣaṇa Mahāpurāṇa Saṅgraha composed by the venerable Acharya Jinaseṇa. — 24.
आदिपुराण पर्व 25 – भगवान के विहार का दर्शन करने वाला
पर्व 25 – श्लोक 1 से 12
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268
आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 316
आदिपुराण पर्व 23 – समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 196
आदिपुराण पर्व 24 – भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 172 | श्लोक 173 से 181