आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 208 | श्लोक 209 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271
श्लोक 272 से 275 पुण्य और धर्म की महिमा
पुण्य से सुख और मोक्ष की प्राप्ति का उपदेश। भगवान सिंहासन पर विराजमान हो पृथ्वी का शासन करते रहे।
English translation of Ādi purāṇa parv 16 – Shlok 272 to 275
श्लोक ( Shlok ) 272 – 273
पुण्यात् सुरासुरनरोरगभोगसाराः श्रीरायुरप्रमितरूपसमृद्धयो धीः ।
साम्राज्य मैन्द्र मपुन “र्भवभावनिष्ठम् आर्हन्त्यमन्त्यरहिता’ खिलसौख्यमग्य्रम्
॥२७२॥
तस्माद् बुधाः कुरुत धर्ममवाप्तुकामाः स्वर्गापवर्ग सुखमग्प्रमचिन्त्य सारम् ।
प्रापय्य” सोऽभ्युदय भोगमनन्तसौख्य-मानन्त्यमापयति धर्मफलं हि शर्म ॥२७३॥
सुर, असुर, मनुष्य और नागेंद्र आदि के उत्तम-उत्तम भोग, लक्ष्मी, दीर्घ आयु, अनुपम रूप, समृद्धि, उत्तम वाणी, चक्रवर्ती का साम्राज्य, इंद्रपद, जिसे पाकर फिर संसार में जन्म नहीं लेना पड़ता ऐसा अरहंत पद और अंतरहित समस्त सुख देने वाला श्रेष्ठ निर्वाण पद इन सभी की प्राप्ति एक पुण्य से ही होती है इसलिए हे पंडितजन, यदि स्वर्ग और मोक्ष के अचिंत्य महिमा वाले श्रेष्ठ सुख प्राप्त करना चाहते हो तो धर्म करो क्योंकि वह धर्म ही स्वर्गों के भोग और मोक्ष के अविनाशी अनंत सुख की प्राप्ति कराता है । वास्तव में सुख प्राप्ति होना धर्म का ही फल है ।।272-273।।
he greatest pleasures—whether they belong to gods, demons, humans, or celestial beings—are all attained only through merit (punya). These include:
- Wealth and prosperity
- Long life
- Unparalleled beauty
- Success and abundance
- Eloquent speech
- The sovereignty of a universal emperor
- The position of Indra (king of gods)
- The supreme Arhant state, where one is free from the cycle of rebirth
- The ultimate liberation (Nirvana), which bestows eternal bliss
Therefore, O wise ones, if you desire the profound joys of heaven and liberation, follow the path of righteousness (dharma). For dharma alone leads to the imperishable and infinite bliss of celestial pleasures and ultimate salvation (moksha).
Indeed, true happiness is the fruit of dharma. (272-273)
श्लोक ( Shlok ) 274
दानं प्रदत्त मुदिता मुनिपुङ्गवेभ्यः पूजां कुरुध्वमुपनम्य च तीर्थकृद् भ्यः ।
शीलानि पालयत पर्वदिनोपवासान् *”विष्मार्ष्टं मा स्म सुधियः सुखमीप्सवश्चेत् ॥२७४।।
हे सुधीजन, यदि तुम सुख प्राप्त करना चाहते हो तो हर्षित होकर श्रेष्ठ मुनियों के लिए दान दो, तीर्थंकरों को नमस्कार कर उनकी पूजा करो, शीलव्रतों का पालन करो और पर्व के दिन में उपवास करना नहीं भूलो ।।274।।
O wise ones! If you desire true happiness, then with a joyful heart:
- Give alms to the noble monks.
- Bow to the Tirthankaras and worship them with devotion.
- Observe vows of morality and discipline.
- Do not forget to fast on sacred occasions.
These righteous acts lead to supreme bliss and spiritual elevation. (274)
श्लोक ( Shlok ) 275
स श्रीमानिति नित्यभोगनिरतः पुत्रैश्च पौत्रैर्निंजै “रारूढप्रणयैरुपा हितधृतिः सिंहासनाध्यासितः । शक्रार्क्केन्दुपुरस्सरैः सुरवरैर्व्यू ढोल्लसच्छासनः शास्ति स्माप्रतिशासनो भुवमिमामासिन्धुसीमां जिनः ॥ २७५॥
इस प्रकार जो प्रशस्त लक्ष्मी के स्वामी थे, स्थिर रहनेवाले भोगों का अनुभव करते थे, स्नेह रखने वाले अपने पुत्र पौत्रों के साथ संतोष धारण करते थे । इंद्र सूर्य और चंद्रमा आदि उत्तम-उत्तम देव जिनकी आज्ञा धारण करते थे, और जिन पर किसी की आज्ञा नहीं चलती थी ऐसे भगवान् वृषभदेव सिंहासन पर आरूढ़ होकर इस समुद्रांत पृथ्वी का शासन करते थे ।।275।।
Thus, Lord Rishabhadeva, the master of immense prosperity, enjoyed abundant and enduring pleasures while remaining content in the company of his beloved sons and grandsons. The great deities such as Indra, Surya (the Sun), and Chandra (the Moon) humbly obeyed his commands, while he himself remained unbound by anyone’s authority. Seated upon his royal throne, he ruled over the entire earth, extending up to the vast oceans. (275)
इत्यार्षे भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षणश्रीआदिपुराणसंयहे भगवत्साम्राज्यवर्णनं नाम षोडशं पर्व ॥१६॥
इस प्रकार आर्ष नाम से प्रसिद्ध भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीत त्रिषष्टिलक्षण आदिपुराणसंग्रह में भगवान् के साम्राज्य का वर्णन करने वाला सोलहवां पर्व समाप्त हुआ ।।16।।
Thus, the sixteenth canto, which describes the sovereignty of Lord Rishabhadeva, concludes in the Śri Triṣaṣṭi-lakṣaṇa Ādipurāṇa Saṅgraha, composed by the revered Bhagavān Jinaseṇāchārya. (16)
आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन
पर्व 17 – श्लोक 1 से 11
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 209 | श्लोक 210 से 213
आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 224
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 208 | श्लोक 209 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271