भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151
श्लोक 152 से 161 राजपुत्र और दीक्षा
चार राजपुत्र—वरदत्त, वरसेन, चित्रांगद, प्रशांतमदन—समान संपत्ति के साथ भोग भोगे। सभी ने अभयघोष संग विमलवाह जिन की वंदना कर दीक्षा ली। सुविधि श्रावक बना।
English translation of Ādi purāṇa parv 10 – Shlok 152 to 161
श्लोक ( Shlok ) 152
प्रभञ्जननृप। चित्रमालिन्यां स मनोरथः । प्रशान्तमश्रमः सूनुरजनिष्ट दिवश्च्युतः ॥१५२॥
और नकुल का जीव―मनोरथ नाम का देव स्वर्ग से च्युत होकर प्रभंजन राजा की चित्रमालिनी रानी के प्रशांतमदन नाम का पुत्र हुआ ।।152।।
“The soul of the mongoose, who was the celestial being Manoratha, having fallen from heaven, was born as Prashantamadan, the son of King Prabhanjana and Queen Chitramalini.”
श्लोक ( Shlok ) 153
ते सर्वे सदृशाकाररूपलावण्यसंपदः । स्वोचितां श्रियमासाद्य चिरं भोगानभुञ्जत ॥१५३॥
समान आकार, समान रूप, समान सौंदर्य और समान संपत्ति के धारण करने वाले वे सभी राजपुत्र अपने-अपने योग्य राज्यलक्ष्मी पाकर चिरकाल तक भोगों का अनुभव करते रहे ।।153।।
“Possessing similar forms, appearances, beauty, and wealth, all those royal princes attained their respective kingdoms and enjoyed luxuries for a long time.”
श्लोक ( Shlok ) 154
ततोऽमी चक्रिणान्येद्यभिवन्ध समं जिनम् । भक्त्या विमलवाहाख्यं महाप्राव्राज्य माश्रिताः ॥ १५४॥
तदनंतर किसी दिन वे चारों ही राजा, चक्रवर्ती अभयघोष के साथ विमलवाह जिनेंद्र देव की वंदना करने के लिए गये । वहाँ सबने भक्तिपूर्वक वंदना की और फिर सभी ने विरक्त होकर दीक्षा धारण कर ली ।।154।।
“Then, one day, the four kings, along with Emperor Abhayaghosha, went to pay homage to Lord Vimalavaha Jinedra. There, they all offered their reverent salutations with deep devotion, and thereafter, renouncing worldly attachments, they embraced ascetic initiation.”
श्लोक ( Shlok ) 155
नृपैरष्टादशाभ्यस्त सहस्रप्रमितैरमा । सहस्त्रे पञ्चभिः पुत्रैः प्राव्राजीचक्रवर्त्यसौ ॥१५५॥
वह चक्रवर्ती अठारह हजार राजाओं और पाँच हजार पुत्रों के साथ दीक्षित हुआ था ।।155।।
“The emperor was initiated into asceticism along with eighteen thousand kings and five thousand sons.”
श्लोक ( Shlok ) 156
परं संवेगनिर्वेदपरिणाममुपागतः । ते तेपिरे तपस्तीव्रं मार्गः स्वर्गापवर्गयोः ॥१५६॥
वे सब मुनीश्वर उत्कृष्ट संवेग और निर्वेदरूप परिणामों को प्राप्त होकर स्वर्ग और मोक्ष के मार्गभूत कठिन तप तपने लगे ।।156।।
“All those great sages, having attained supreme zeal and deep detachment, engaged in rigorous penance, which led them on the path to heaven and liberation.”
श्लोक ( Shlok ) 157
संवेगः परमा प्रीतिर्धर्में धर्मफलेषु च । निर्वेदो देहभोगेषु संसारे च विरक्तता ॥१५७॥
धर्म और धर्म के फलों में उत्कृष्ट प्रीति करना संवेग कहलाता हे और शरीर, भोग तथा संसार से विरक्त होने को निर्वेद कहते हैं ।।157।।
“Deep love for righteousness and its fruits is called samvega (spiritual urgency), while detachment from the body, pleasures, and the world is known as nirveda (dispassion).”
श्लोक ( Shlok ) 158
नृपस्तु सुविधिः पुत्रस्नेहाद् गार्हस्थ्यमत्यजन् । उत्कृष्टोपासकस्थान तपस्तेपे सुदुश्च रम् ॥ १५८॥
राजा सुविधि केशव पुत्र के स्नेह से गृहस्थ अवस्था का परित्याग नहीं कर सका था, इसलिए श्रावक के उत्कृष्ट पद में स्थित रहकर कठिन तप तपता था ।।158।।
“King Suvidhi was unable to renounce household life due to his affection for his son Keshava. Therefore, he remained in the exalted position of a Shravaka (devout lay follower) and practiced intense austerities.”
श्लोक ( Shlok ) 159 – 161
सद्दर्शनं व्रतोद्योत समतां प्रोषधव्रतम् । सचितसेवाविरति महःस्त्रीसंगवर्जनम् ॥१५९॥
ब्रह्मचर्यमथारम्भपरिग्रहपरिच्युतिम् । तत्रानुमननत्यागं स्वोद्दिष्टपरिवर्जनम् ॥१६०॥
स्थानानि गृहिणां प्राहुरेकादशगणाधिपाः । स तेषु पश्चिमं स्थानमाससाद क्रमान्नृपः ॥१६१॥
जिनेंद्रदेव ने गृहस्थों के नीचे लिखे अनुसार ग्यारह स्थान या प्रतिमाएँ कही हैं (1) दर्शनप्रतिमा (2) व्रतप्रतिमा (3) सामायिकप्रतिमा (4) प्रोषधप्रतिमा (5) सचित्तत्यागप्रतिमा (6) दिवामैथुनत्यागप्रतिमा (7) ब्रह्मचर्यप्रतिमा (8) आरंभत्यागप्रतिमा (9) परिग्रह-त्यागप्रतिमा (10) अनुमतित्यागप्रतिमा और (11) उद्दिष्टत्यागप्रतिमा । इनमें से सुविधि राजा ने क्रम-क्रम से ग्यारहवाँ स्थान―उद्दिष्टत्यागप्रतिमा धारण की थी ।।159-161।।
“Lord Jinedra has described eleven stages or vows (Pratimas) for householders, which are as follows:
- Darshan Pratima (Faith in Jain principles)
- Vrat Pratima (Observance of vows)
- Samayik Pratima (Practicing periodic meditation)
- Proshadh Pratima (Observing periodic fasting)
- Sachittatyag Pratima (Renouncing living food)
- Divamaithunatyag Pratima (Renouncing daytime sexual activity)
- Brahmacharya Pratima (Observing complete celibacy)
- Arambhatyag Pratima (Renouncing harmful occupations)
- Parigrahatyag Pratima (Renouncing material possessions)
- Anumatityag Pratima (Not approving of sinful acts)
- Uddishtatyag Pratima (Renouncing food prepared specifically for oneself)
Among these, King Suvidhi gradually attained the eleventh and highest stage, Uddishtatyag Pratima.”
श्लोक 162 से 171
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151