आदिपुराण पर्व 24 – भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 |
श्लोक 82 से 91 भगवान् की दिव्यध्वनि और तत्त्व वर्णन
भगवान् की दिव्यध्वनि बिना प्रयत्न के प्रकट होती है। वे जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश, और काल द्रव्यों का वर्णन करते हैं। तत्त्व को सम्यग्ज्ञान और मुक्ति का आधार बताते हुए इसके भेदों (दो, तीन, चार, पाँच, छह) का विवेचन करते हैं।
English translation of Ādi purāṇa parv 24 – Shlok 82 to 91
श्लोक ( Shlok ) 82
ताल्वोष्ठमपरिस्पन्दि नच्छायान्तरमानने । अस्पृष्ट करणा वर्णा मुरखादस्य विनिर्ययुः ॥८२॥
उस समय भगवान के न तो तालू, ओठ आदि स्थान ही हिलते थे और न उनके मुख की कांति ही बदलती थी । तथा जो अक्षर उनके मुख से निकल रहे थे उन्होंने प्रयत्न को छुआ भी नहीं था―इंद्रियों पर आघात किये बिना ही निकल रहे थे ।।82।।
At that time, neither the palate, lips, nor other parts of the Lord’s mouth moved, nor did the radiance of His face change. The words that emerged from His mouth were untouched by effort—they were spoken without any impact or exertion on the senses. ( 82)
श्लोक ( Shlok ) 83
स्फुरद् गिरिगुहोद्भूत प्रतिश्रुद् ध्वनिसन्निभः । प्रस्पष्टवर्णो निरगाद् ध्वनिः स्वायम्भुवान्मुखात् ॥८३॥
जिसमें सब अक्षर स्पष्ट है ऐसी वह दिव्यध्वनि भगवान के मुख से इस प्रकार निकल रही थी जिस प्रकार कि किसी पर्वत की गुफा के अग्रभाग से प्रतिध्वनि निकलती है ।।83।।
The divine sound, in which all words are clear, was emerging from the Lord’s mouth just like an echo emanates from the front of a mountain cave. ( 83)
श्लोक ( Shlok ) 84
विवक्षा मन्तरेणास्य विविक्तासीत् सरस्वती। मही यसामचिन्त्या हि योगजाः शक्तिसंपदः ॥८४॥
भगवान की वह वाणी बोलने की इच्छा के बिना ही प्रकट हो रही थी सो ठीक ही है क्योंकि योगबल से उत्पन्न हुई महापुरुषों का शक्तिरूपी संपदाएं अचिंतनीय होती हैं―उनके प्रभुत्व का कोई चिंतवन नहीं कर सकता ।।84।।
The speech of the Lord was manifesting without any desire to speak, which is appropriate because the power and abilities of great beings born from yogic strength are beyond comprehension—no one can fathom their supremacy. ( 84)
श्लोक ( Shlok ) 85
आयुष्मन् श्रुणु तत्त्वार्थान् वश्यमाणाननुक्रमात् । जीवादीन् कालपर्यन्तान् सप्रभेदान् सपर्ययान् ॥८५॥
भगवान् कहने लगे कि हे आयुष्मन्, जिनका स्वरूप आगे अनुक्रम से कहा जायेगा, ऐसे भेद-प्रभेदों तथा पर्यायों से सहित जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल इन द्रव्यों को तू सुन ।।85।।
The Lord began to speak: O blessed one, listen to the substances—soul, matter, motion, rest, space, and time—along with their various distinctions and modifications, which will be described sequentially. (85)
श्लोक ( Shlok ) 86
जीवादीनां पदार्थानां याथात्म्यं तत्त्वमिष्यते । सम्यग्ज्ञानाङ्गमेतद्धि विद्धि सिद्धयङ्गमङ्गिनाम् ॥८६॥
जीव आदि पदार्थों का यथा स्वरूप ही तत्त्व कहलाता है, यह तत्त्व ही सम्यग्ज्ञान का अंग अर्थात् कारण है और यही जीवों की मुक्ति का अंग है ।।86।।
The true nature of substances like soul and others is called Tattva (reality). This Tattva is the cause of right knowledge and also the means of liberation for beings. ( 86)
श्लोक ( Shlok ) 87
तदेकं तत्त्वसामान्याज्जीवाजीवाविति द्विधा । त्रिधा मुक्तेतराजीव विभागात्परिकीर्त्यते ॥८७॥
वह तत्त्व सामान्य रीति से एक प्रकार का है, जीव और अजीव के भेद से दो प्रकार का है तथा जीवों के संसारी और मुक्त इस प्रकार दो भेद करने से संसारी जीव, मुक्त जीव और अजीव इस प्रकार तीन भेद वाला भी कहा जाता है ।।87।।
That Tattva is generally of one kind, but it is of two kinds based on the distinction between Jiva (living beings) and Ajiva (non-living substances). Furthermore, by classifying living beings into Samsari (worldly) and Mukta (liberated), it is also said to be of three kinds: Samsari Jiva, Mukta Jiva, and Ajiva. ( 87)
श्लोक ( Shlok ) 88
जीवो मुक्तश्च संसारी संसार्यात्मा द्विधा मतः । भव्यो ऽभव्यश्च साजीवास्ते चतुर्धा विभाविताः ॥८८॥
संसारी जीव दो प्रकार के माने गये हैं―एक भव्य और दूसरा अभव्य, इसलिए मुक्त जीव, भव्य जीव, अभव्यजीव और अजीव इस तरह वह तत्त्व चार प्रकार का भी माना गया है ।।88।।
Worldly beings (Samsari Jivas) are considered to be of two types—Bhavya (those capable of attaining liberation) and Abhavya (those incapable of attaining liberation). Therefore, the Tattva is also considered to be of four types: Mukta Jiva (liberated beings), Bhavya Jiva (liberation-capable beings), Abhavya Jiva (non-liberation-capable beings), and Ajiva (non-living substances). (88)
श्लोक ( Shlok ) 89
मुक्तेतरात्मको जीवो मूर्तामूर्तात्मकः परः । इति वा तस्य तत्वस्य चातुर्विध्यं विनिश्चितम् ॥८९॥
अथवा जीव के दो भेद हैं एक मुक्त और दूसरा संसारी, इसी प्रकार अजीव के भी दो भेद हैं एक मूर्तिक और दूसरा अमूर्तिक, दोनों को मिला देने से भी तत्त्व के चार भेद निश्चित किये गये हैं ।।89।।
Alternatively, the Jiva (soul) is divided into two types: Mukta (liberated) and Samsari (worldly). Similarly, Ajiva (non-living substances) is also divided into two types: Moortika (tangible or physical) and Amoortika (intangible or non-physical). Combining these categories, the Tattva (substance or reality) is determined to have four divisions. (Verse 89)
श्लोक ( Shlok ) 90
पञ्चास्तिकायभेदेन तत्तत्वं पञ्चधा स्मृतम् । ते वपुद्गलाकाशधर्माधर्माः सपर्ययाः ॥९०॥
पाँच अस्तिकायों के भेद से वह तत्त्व पाँच प्रकार का भी स्मरण किया है । अपनी-अपनी पर्यायोंसहित जीवास्तिकाय, पुद्गलास्तिकाय, आकाशास्तिकाय, धर्मास्तिकाय और अधर्मास्तिकाय ये पाँच अस्तिकाय कहे जाते हैं ।।90।।
Based on the distinction of the five Astikayas (substances having extension in space), the Tattva (reality) is also remembered as of five types. These five Astikayas along with their respective Paryayas (modifications) are:
- Jivastikaya (the substance of soul or consciousness)
- Pudgalastikaya (the substance of matter)
- Akashastikaya (the substance of space)
- Dharmastikaya (the substance that assists motion)
- Adharmastikaya (the substance that assists rest)
These are known as the five Astikayas. ( 90)
श्लोक ( Shlok ) 91
तः एवं कालसंयुक्ताः षोढा तत्त्वश्य भेदकाः । इत्यनन्तो भवेदस्य प्रस्तारो विस्तरैषिणाम् ॥९१॥
उन्हीं पाँच अस्तिकायों में काल के मिला देने से तत्त्व के छह भेद भी हो जाते हैं, इस प्रकार विस्तारपूर्वक जानने की इच्छा करने वालों के लिए तत्त्वों का विस्तार अनंत भेद वाला हो सकता है ।।91।।
By including Kala (Time) along with those five Astikayas, the Tattva (reality) is classified into six types. Thus, for those who wish to understand in detail, the expansion of Tattvas can have infinite distinctions. ( 91)
श्लोक 92 से 101
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