आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 |
श्लोक 162 से 171 गाँव और नगरों का वर्णन
नगर, ग्राम, खेट, पत्तन आदि की परिभाषाएँ और विशेषताएँ। ग्रामों की सीमा और संरचना का उल्लेख।
English translation of Ādi purāṇa parv 16 – Shlok 162 to 171
श्लोक ( Shlok ) 162
मध्ये जनपदं रेजू राजधान्यः परिष्कृताः । वप्रप्राकारपरिखा गोपुराट्टालकादिभिः ॥१६२॥
उन देशों के मध्यभाग में कोट, प्राकार, परिखा, गोपुर और अटारी आदि से शोभायमान राजधानी सुशोभित हो रही थीं ।।162।।
“In the central parts of those regions, the capital cities shone beautifully, adorned with forts, ramparts, moats, grand gateways, and watchtowers.”
श्लोक ( Shlok ) 163
तानि स्थानीयसंज्ञानि दुर्गाण्यावृत्य सर्वतः । ग्रामादीनां निवेशोऽभूद् यथामिहितलक्ष्मणाम् ॥ १६३।
जिनका दूसरा नाम स्थानीय है ऐसे राजधानीरूपी किले को घेरकर सब ओर शास्त्रोक्त लक्षण वाले गाँवों आदि की रचना हुई थी ।।163।।
“The fortress-like capital cities, also known as Sthaniya, were surrounded by villages and settlements, established according to the characteristics prescribed in the scriptures.”
श्लोक ( Shlok ) 164
ग्रामावृतिपरिक्षेपमात्राः स्युरुचिता “श्रयाः । शुद्रकर्षकभूयिष्टाः ” सारामाः सजलाशया ॥ १६४॥
जिनमें बाड़ से घिरे हुए घर हों, जिनमें अधिकतर शूद्र और किसान लोग रहते हों तथा जो बगीचा और तालाबों से सहित हों, उन्हें ग्राम कहते हैं ।।164।।
“Settlements with fenced houses, primarily inhabited by Shudras and farmers, and adorned with gardens and ponds are known as villages (Gram).”
श्लोक ( Shlok ) 165
ग्रामाः [ग्रामः ] “कुलशतेनेष्टो “निकृष्टः समधिष्ठितः। परस्तत्पञ्च शत्या स्यात् सुसमृद्धकृषीवलः १६५
जिसमें सौ घर हो उसे निकृष्ट अर्थात् छोटा गाँव कहते हैं तथा जिसमें पाँच सौ घर हों और जिसके किसान धनसंपन्न हो उसे बड़ा गाँव कहते हैं ।।165।।
“A settlement with one hundred houses is considered a small or inferior village, while a settlement with five hundred houses, where farmers are wealthy, is regarded as a large village.”
श्लोक ( Shlok ) 166
क्रोशद्विक्रोशसीमानो ग्रामाः स्युरधमोत्तमाः । सम्पन्नसस्यसुक्षेत्राः प्रभूतयवसोदकाः ॥१६६।॥
छोटे गाँवों की सीमा एक कोस की और बड़े गाँवों की सीमा दो कोस की होती है । इन गाँवों के धान के खेत सदा संपन्न रहते हैं और इनमें घास तथा जल भी अधिक रहता है ।।166।।
“The boundary of small villages extends up to one kos, while the boundary of large villages extends up to two kos. The paddy fields in these villages always remain fertile, and they have an abundance of grass and water.”
श्लोक ( Shlok ) 167
सरिद् गिरिदरी गृष्टिक्षीरकण्टकशाखिनः । वनानि सेतवश्चेति तेषां सीमोपलक्षणम् ॥१६७॥
नदी, पहाड़, गुफा, श्मशान, क्षीरवृक्ष अर्थात् थूवर आदि के वृक्ष, बबूल आदि कँटीले वृक्ष, वन और पुल ये सब उन गाँवों की सीमा के चिह्न कहलाते हैं अर्थात् नदी आदि से गाँवों की सीमा का विभाग किया जाता है ।।167।।
“Rivers, mountains, caves, cremation grounds, Kshiravriksha (such as fig trees), thorny trees like acacia, forests, and bridges are considered the boundary markers of these villages. That is, the limits of villages are defined by these natural and structural features.”
श्लोक ( Shlok ) 168
तत्क र्तृभोक्तृनियमो योगक्षेमानुचिन्तनम् । विष्टिदण्डकराणां च निवन्धो “राजसाद्भ वेत् ॥१६८॥
गाँव के बसाने और उपभोग करने वालों के योग्य नियम बनाना, नवीन वस्तु के बनाने और पुरानी वस्तु की रक्षा करने के उपाय, वहाँ के लोगों से बेगार कराना, अपराधियों का दंड करना तथा जनता से कर वसूल करना आदि कार्य राजाओं के अधीन रहते थे ।।168।।
“Framing rules for the settlement and management of villages, making provisions for the creation of new structures and the preservation of old ones, imposing labor duties on the inhabitants, punishing criminals, and collecting taxes from the people— all these responsibilities were under the authority of the kings.”
श्लोक ( Shlok ) 169 –170
परिखागोपुराट्टाल वप्रप्राकारमण्डितम् । नानाभवनविन्यासं सोद्यानं सजलाशयम् ।।१६९॥
पुरंमेवंविधं शस्तमुचितोद्देशसुस्थितम् । पूर्वोत्तरप्लवाम्भस्कं प्रधानपुरुषोचितम् ।।१७०॥
जो परिखा, गोपुर, अटारी, कोट और प्राकार से सुशोभित हों, जिसमें अनेक भवन बने हुए हों, जो बगीचे और तालाबों से सहित हो, जो उत्तम रीति से अच्छे स्थान पर बसा हुआ हो, जिसमें पानी का प्रवाह पूर्व और उत्तर के बीच वाली ईशान दिशा की ओर हो और जो प्रधान पुरुषों के रहने के योग्य हो वह प्रशंसनीय पुर अथवा नगर कहलाता है ।।169-170।।
“A settlement adorned with moats, grand gateways, watchtowers, forts, and ramparts, filled with numerous buildings, enriched with gardens and ponds, well-established in an excellent location, with water flow directed towards the northeastern (Ishana) direction, and suitable for the residence of distinguished individuals is praised as a Pur (town) or Nagar (city).”
श्लोक ( Shlok ) 171
सरिद् गिरिभ्यां संरुद्धं खेटमाहुर्मनीषिणः । केवलं गिरिसंरुद्धं खर्वटं तत्प्रचक्षते ॥१७१॥
जो नगर नदी और पर्वत से घिरा हुआ हो उसे बुद्धिमान् पुरुष खेट कहते हैं और जो केवल पर्वत से घिरा हुआ हो उसे खर्वट कहते हैं ।।171।।
“A settlement surrounded by both a river and mountains is called a Kheta by wise men, while a settlement surrounded only by mountains is known as a Kharvata.”
श्लोक 172 से 182
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 209 | श्लोक 210 से 213
आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 224
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 |