आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61
श्लोक 62 से 71 आभूषणों की विविधता
हार के और भेदों (फलकहार, सोपान, मणिसोपान) का वर्णन। भगवान ऋषभदेव के पुत्र-पुत्रियाँ इन आभूषणों से सुशोभित थे। भरत सूर्य, बाहुबली चंद्रमा, और अन्य पुत्र नक्षत्रों की तरह शोभायमान थे। भगवान स्वयं मेरु पर्वत की तरह विराजते थे।
English translation of Ādi purāṇa parv 16 – Shlok 62 to 71
श्लोक ( Shlok ) 62
इन्द्रच्छन्द्रादिहारास्ते यदा स्युर्मणिमध्यमाः । माणयाख्या विभूषाः स्युस्तत्पदोपपदास्तदा ॥६२॥
ऊपर कहे हुए इंद्रच्छंद आदि हारों के मध्य में जब माणि लगा दिया जाता है तब उन नामों के साथ माणव शब्द और भी सुशोभित होने लगता है अर्थात् इंद्रच्छंदमाणव, विजयछंदमाणव आदि कहलाने लगते हैं ।।62।।
When a gem (māṇi) is placed in the middle of the previously mentioned necklaces, such as Indrachhanda and others, their names become even more distinguished by adding the word Māṇava, making them Indrachhanda-Māṇava, Vijayachhanda-Māṇava, and so on. ||62||
श्लोक ( Shlok ) 63
य एकशीर्षकः शुद्धहारः स्याच्छीर्षकात्परः । इन्द्रच्छन्दाद्युपपदः स चैकादशभेदभाक् ॥६३॥
जो एक शीर्षक हार है वह शुद्ध हार कहलाता है । यदि शीर्षक के आगे इंद्रच्छंद आदि उपपद भी लगा दिये जायें तो वह भी ग्यारह भेदों से युक्त हो जाता है ।।63।।
The necklace with a single central gem (Śīrṣaka Hāra) is called a pure necklace (Śuddha Hāra). If the term Indrachhanda and other similar qualifiers are added before Śīrṣaka, then it too is classified into eleven different types. ||63||
श्लोक ( Shlok ) 64
तथोपशीर्षकादीनामपि शुद्धात्मनां भिदा । तर्क्याः शुद्धास्ततो हाराः पञ्चपञ्चाशदेव हि ॥६४॥
इसी प्रकार उपशीर्षक आदि शुद्ध हारों के भी ग्यारह-ग्यारह भेद होते हैं । इस प्रकार सब हार पचपन प्रकार के होते हैं ।।64।।
Similarly, the Upaśīrṣaka (secondary central gem) and other pure necklaces also have eleven variations each. Thus, in total, all types of necklaces amount to fifty-five varieties. ||64||
श्लोक ( Shlok ) 65
भवेत् फलकहाराख्यो मणिमध्योऽर्द्धमाणवे । त्रिहेमफलकः पञ्चफलको वा यदा तदा ॥६५॥
सोपानमणिसोपानद्वैविध्यात् स मतो द्विधा । सोपानाख्यस्तु फलकैरोक्मैरन्यः सरत्न कैः ॥६६॥
अर्धमाणव हार के बीच में यदि मणि लगाया गया हो तो उसे फलकहार कहते हैं । उसी फलकहार में जब सोने के तीन अथवा पाँच फलक लगे हों तो उसके सोपान और मणिसोपान के भेद से दो भेद हो जाते हैं । अर्थात् जिसमें सोने के तीन फलक लगे हों उसे सोपान कहते हैं और जिसमें सोने के पाँच फलक लगे हों उसे मणिसोपान कहते हैं । इन दोनों हारों में इतनी विशेषता है कि सोपान नामक हार में सिर्फ सुवर्ण के ही फलक रहते हैं और मणिसोपान नाम के हार में रत्नों से जड़े हुए सुवर्ण के फलक रहते हैं । (सुवर्ण के गोल दाने-गुरिया-को फलक कहते है) ।।65-66।।
The Ardhamāṇava necklace, when adorned with a central gem (maṇi), is called Phalakahaara (plated necklace).
Furthermore, if the Phalakahaara contains either three or five golden plates, it is classified into two types based on its structure:
- Sopāna (Stepped Necklace) – This type features three golden plates.
- Maṇisopāna (Gem-Stepped Necklace) – This variation consists of five golden plates, but with an added embellishment of gem-studded gold plates instead of plain gold.
(Here, “Phalak” refers to small spherical gold beads, forming the plated structure of the necklace.) ||65-66||
श्लोक ( Shlok ) 67
इत्यमूनि युगारम्भे कण्ठोरोभूषणानि वै। स्रष्टासृजत् स्वपुत्रेभ्यो यथास्वं ते च तान्यधुः ॥६७॥
इस प्रकार कर्मयुग के प्रारंभ में भगवान् वृषभदेव ने अपने पुत्रों के लिए कंठ और वक्षःस्थल के अनेक आभूषण बनाये, और उन पुत्रों ने भी यथायोग्य रूप से वे आभूषण धारण किये ।।67।।
Thus, at the beginning of the Karmayuga, Lord Rishabhadeva created numerous neck and chest ornaments for his sons. In accordance with their status and suitability, his sons gracefully adorned themselves with these ornaments. ||67||
श्लोक ( Shlok ) 68
इत्याद्याभरणैः कण्टयैरन्यैश्चान्यत्रभाविभिः । ते राजन्या व्यराजन्त ज्योतिर्गणमया इव ॥६८॥
इस तरह काठ तथा शरीर के अन्य अवयवों में धारण किये हुए आभूषणों से वे राजकुमार ऐसे सुशोभित होते थे मानो ज्योतिषी देवों का समूह हो ।।68।।
Thus, adorned with wooden ornaments and various other jewelry on different parts of their bodies, those princes appeared as resplendent as a celestial assembly of luminous deities. ||68||
श्लोक ( Shlok ) 69
तेषु तेजस्विनां धुर्यो भरतोऽर्क इवाद्युतत् । शशीव जगतः कान्तो युवा बाहुबली बभौ ॥६९॥
उन सब राजकुमारों में तेजस्वियों में भी तेजस्वी भरत सूर्य के समान सुशोभित होता था और समस्त संसार से अत्यंत सुंदर युवा बाहुबली चंद्रमा के समान शोभायमान होता था ।।69।।
Among all those princes, the most radiant of the radiant, Bharat, shone like the sun, while the exceedingly handsome and youthful Bahubali illuminated the world like the moon. ||69||
श्लोक ( Shlok ) 70
शेषाश्च ग्रहनक्षत्रतारागणनिभभा बभुः ।ब्राह्मी दीप्तिरिवैतेषामभूज्ज्योत्स्नेव सुन्दरी ॥७०॥
शेष राजपुत्र ग्रह, नक्षत्र तथा तारागण के समान शोभायमान होते थे । उन सब राजपुत्रों में ब्राह्मी दीप्ति के समान और सुंदरी चाँदनी के समान सुशोभित होती थी ।।70।।
The remaining princes shone like planets, constellations, and stars. Among them, Brahmi radiated like brilliant light, while Sundari was as luminous as the moonlight. ||70||
श्लोक ( Shlok ) 71
स तैः परिवृतः पुत्रैः भगवान् वृषभो बभौ । ज्योतिर्गणैः परिक्षिप्तो यथा मेरुर्महोदयः ॥७१॥
उन सब पुत्र-पुत्रियों से घिरे हुए सौभाग्यशाली भगवान् वृषभदेव ज्योतिषी देवों के समूह से घिरे हुए ऊँचे मेरु पर्वत की तरह सुशोभित होते थे ।।71।।
Surrounded by all his sons and daughters, the fortunate Lord Rishabhdev shone like the lofty Mount Meru, encircled by a host of celestial luminaries. ||71||
श्लोक 72 से 81
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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