आदिपुराण पर्व 13 सारांश
Summary of Ādi purāṇa Parv 13 by Acharya Jinasena
पर्व 13 में ऋषभदेव के जन्म, इंद्र द्वारा अभिषेक और मेरु पर्वत पर उत्सव का वर्णन हैं।
संक्षिप्त सारांश (श्लोक 1 से 216)
मरुदेवी ने नौ माह पूर्ण होने पर चैत्र कृष्ण नवमी को सूर्योदय के समय, उत्तराषाढ़ नक्षत्र और ब्रह्म योग में भगवान ऋषभदेव को जन्म दिया। वे मति, श्रुति और अवधि ज्ञान से युक्त, गुणों से परिपूर्ण और तीनों लोकों के स्वामी थे। उनका तेज सूर्य-सा था, जो नाभिराज रूपी उदयाचल से उदित हुआ। जन्म के समय दिशाएँ स्वच्छ, आकाश निर्मल और प्रजा हर्षित हुई। देव आश्चर्यचकित थे, कल्पवृक्षों से फूल बरस रहे थे, दुंदुभि स्वयं बज उठे, शीतल वायु बही, पृथ्वी नृत्य-सी करने लगी और समुद्र आनंदित हुआ।
इंद्र ने सिंहासन के कंपन से ऋषभदेव के जन्म को जाना और उनके जन्माभिषेक का संकल्प लिया। देवों के आसन कांपने लगे, उनके मस्तक नम्र हुए और घरों में घंटा-शंख स्वतः बज उठे। देवों ने समुद्र की लहरों-सा शब्द करते हुए सेनाएँ निकालीं। सौधर्म इंद्र ऐरावत पर सवार होकर, देवों से घिरा अयोध्या पहुँचा। वहाँ कोलाहल, नृत्य और जयघोष से वातावरण गूँज उठा। आकाश देवों के विमानों से भर गया।
इंद्राणी ने प्रसूतिगृह में प्रवेश कर मरुदेवी और ऋषभदेव के दर्शन किए। उसने मरुदेवी की स्तुति की, उन्हें त्रिलोक की कल्याणकारी माता कहा। फिर मायामयी नींद से मरुदेवी को सुलाकर, ऋषभदेव को उठाया और इंद्र को सौंपा। इंद्र ने उनकी स्तुति की, उन्हें त्रिलोक का स्वामी, गुरु और ज्योति कहा। देवों ने जयघोष के साथ मेरु पर्वत की ओर प्रस्थान किया। वहाँ अप्सराएँ नृत्य करने लगीं, गंधर्व संगीत करने लगे।
मेरु पर्वत सुवर्णमय, ऊँचा और चार वनों से सुशोभित था। इंद्र ने ऋषभदेव को पांडुकशिला पर विराजमान किया। यह शिला पवित्र, विशाल और अभिषेक के योग्य थी। देवों ने क्षीरसागर के जल से भरे सुवर्ण कलशों से उनका अभिषेक शुरू किया। जल की धाराएँ उनके शरीर पर पड़ीं, आकाश में उछलीं और मेरु को पवित्र किया। अभिषेक जल से सूर्य, चंद्र और तारे प्रभावित हुए। पृथ्वी और आकाश शुद्ध हो गए।
अभिषेक के बाद सुगंधित जल से स्नान कराया गया। देवों ने पूजा की, मंगलगान किया और नृत्य-संगीत से उत्सव मनाया। इंद्र ने शांति मंत्र पढ़े। फूलों की वर्षा हुई, वायु मंद गति से बहने लगा। ऋषभदेव का जन्मोत्सव त्रिलोक में कल्याणकारी बना। वे प्रथम तीर्थंकर के रूप में जयवंत हुए, जिनका अभिषेक मेरु पर इंद्रों, देवियों और मुनियों ने श्रद्धा से देखा।
श्लोक 1 से 11 ऋषभदेव का जन्म
मरुदेवी ने 9 माह बाद चैत्र कृष्ण नवमी, सूर्योदय, उत्तराषाढ़ नक्षत्र में ऋषभदेव को जन्म दिया। वह तीन ज्ञानों से युक्त, गुणों में वृद्ध, तीन लोक स्वामी बालक था। दिशाएँ स्वच्छ, प्रजा हर्षित, देव आश्चर्यचकित। कल्पवृक्ष फूल बरसाते, दुंदुभि बिना बजाये बजी, पृथ्वी-समुद्र आनंदित। इंद्र ने सिंहासन कंपन से जन्म जाना, अभिषेक का विचार किया।
श्लोक 12 से 21 देवों का आगमन
देवों के मस्तक नम्र, घरों में घंटा-शंख बजे। समुद्र लहरों सा शब्द सुन देवों ने जन्म पहचाना। सौधर्मेंद्र ऐरावत पर, सेनाएँ (हाथी, रथ आदि) निकलीं। सामानिक आदि देवों ने घेरा। जय-शब्द, नृत्य, गान से कोलाहल। विमानों से आकाश व्याप्त।
श्लोक 22 से 32 अयोध्या में उत्सव
आकाश अप्सराओं से कमलिनी सा, हाथियों से मगरमच्छ सा। सेनाएँ अयोध्या पहुँची, सैनिकों ने घेरा। इंद्राणी ने प्रसूतिगृह में मरुदेवी-जिनबालक के दर्शन किए। प्रेम से प्रदक्षिणा, स्तुति: मरुदेवी तीन लोक माता। माया से नींद देकर, मायामयी बालक रख, ऋषभदेव को उठाया।
श्लोक 33 से 41 इंद्राणी का हर्ष
इंद्राणी ने स्पर्श से तीन लोक ऐश्वर्य माना। बार-बार मुख देखा, सूँघा, नेत्र प्रफुल्लित। सूर्य सा जिनबालक लेकर शोभित। दिक्कुमारियाँ अष्ट मंगलद्रव्य लिए चलीं। भगवान की दीप्ति से दीपक मंद। इंद्राणी ने इंद्र को सौंपा। इंद्र ने स्तुति की: तीन लोक ज्योति, गुरु, स्वामी।
श्लोक 42 से 51 इंद्र की स्तुति और प्रस्थान
भगवान केवलज्ञान सूर्य, भव्य कमलों को प्रबोधक। गुरुओं के गुरु, गुण समुद्र। चरणों में मस्तक धर श्रद्धा। मुक्ति स्नेह रखती, गुण बढ़ते। इंद्र ने गोद में लिया, मेरु की ओर संकेत। जय-शब्द से दिशाएँ बहरी। अप्सराएँ नृत्य करतीं, आकाश नेत्र खोले सा।
श्लोक 52 से 62 मेरु यात्रा
बादल-पताकाएँ बगुला सा। मेघ विमानों से चूर, भौंरे मद से आकृष्ट। इंद्र कांति से सूर्य फीका। ऐरावत दाँतों पर अप्सराएँ नृत्य करतीं। किन्नर संगीत, देव नेत्र-कर्ण सफल। इंद्र ने छत्र-चमर सेवा की। सौधर्मेंद्र गोद में, ऐशानेंद्र छत्र, अन्य चमर ढोते।
श्लोक 63 से 71 मेरु का वर्णन (भाग 1)
मिथ्यादृष्टि देवों में श्रद्धा। नीली मणि सीढ़ियाँ आकाश सा। ताराएँ कुमुदिनी सा। मेरु 99,000 योजन ऊँचा। चूलिका मुकुट सा, भद्रशाल धोती सा, नंदन करधनी सा, सौमनस दुपट्टा सा, पांडुक फूलों से अलंकृत।
श्लोक 72 से 81 मेरु का वर्णन (भाग 2)
चार जिनमंदिर विमानों सा। सुवर्णमय, जंबूद्वीप मुकुट सा। अभिषेक से पवित्र, चारण मुनि सेवा करते। भोगभूमियाँ रक्षित। गुफाओं में देव-धरणेंद्र। पांडुक शिलाएँ स्फटिक सा। सौधर्मेंद्र सा तुंग, विबुध सेवित। प्रदक्षिणा देकर ऋषभदेव शिखर पर विराजित।
श्लोक 82 से 91 पांडुक शिला
ऐशान दिशा में पांडुक शिला: पवित्र, रमणीय, 100x50x8 योजन, अर्धचंद्राकार। क्षीर जल से प्रक्षालित, माता सा। मुक्ताफल सा उज्ज्वल, पुष्प छिपते। सिंहासन-आसन धारण। देव पूजा, मंगल संगीत से शोभित। अष्ट मंगलद्रव्य युक्त।
श्लोक 92 से 101 अभिषेक तैयारी
शिला शीलव्रत सा, पुण्य खान। रत्न प्रकाश से इंद्रधनुष। देव-दिक्पाल शिला घेरे। सेना पांडुक वन में व्याप्त, स्वर्ग खाली सा। सौधर्मेंद्र ने सिंहासन पर ऋषभदेव को रखा। दुंदुभि बजी, अप्सराएँ नृत्य करतीं।
श्लोक 102 से 112 अभिषेक का प्रारंभ
कालागुरु धूप से पुण्य शोभा। देवों ने अर्घ्य चढ़ाया। विशाल मंडप रचना, कल्पवृक्ष मालाएँ, भ्रमर संगीत से यश गान। सौधर्मेंद्र ने प्रथम कलश, ऐशानेंद्र ने चंदन कलश उठाया। इंद्र-इंद्राणियाँ परिचर्या में। क्षीरसागर जल लाने देव निकले, भगवान के लिए योग्य माना।
श्लोक 113 से 122 कलश और जलधारा
8 योजन गहरे सुवर्ण कलशों से अभिषेक। कलश पाप नाशक, मोतियों से शोभित। इंद्र ने बहु-भुजाएँ बनाई, कल्पवृक्ष सा शोभित। सौधर्मेंद्र ने पहली जलधारा छोड़ी, कोलाहल। जलधारा आकाशगंगा सा, अन्य इंद्रों ने एक साथ जल छोड़ा, भगवान स्थिर रहे।
श्लोक 123 से 131 जल की शोभा
जल बूँदें उछलकर पापरहित सी। दिशाओं में छींटे, कर्णफूल सा। भगवान पर प्रतिबिंबित धारा भाग्यशाली सी। क्षीर जल झरना सा, स्वर्ग को पवित्र करता। भगवान ने जल, संसार को पवित्र किया। सेना क्षीरसागर में डूबी सी।
श्लोक 132 से 141 जल का प्रभाव
कमलों संग जल मेरु पर बहस सा। अशोक पल्लवों से मूँगा सा। स्फटिक सिंहासन पर स्वच्छतर। रत्न किरणों से इंद्रधनुष सा, पद्मराग से संध्या बादल सा, इंद्रनील से अंधकार सा, मरकत से हरा वस्त्र सा। आकाश हँसता सा, बूँदें स्वर्ग से फाग खेलतीं।
श्लोक 142 से 151 मेरु पर जलप्रवाह
जलप्रवाह मेरु को नापता सा, शिखरों से खकारा, गुफाओं से उगला। झरनों से स्वर्ग को धिक्कार। आकाश, ज्योतिष, पृथ्वी ढका। वनों में विश्राम, फिर फैला। वृक्षों से रुककर शीघ्र विस्तृत। मेरु को सफेद वस्त्र सा ढका, आकाशगंगा सा, शब्दाद्वैत सिद्ध करता सा।
श्लोक 152 से 161 मेरु की नव शोभा
मेरु जल से अपरिचित सा, मृणाल सा सफेद, चाँदी पर्वत सा। अमृत, स्फटिक, लक्ष्मी महल संदेह। बूँदें छत्र सा, हार-कमल सा यश प्रवाह। कर्णफूल सा, स्वर्ग तक फैला। तारे मोती सा, ओले सा।
श्लोक 162 से 171 ज्योतिष पर प्रभाव
सूर्य ठंडा, लोह गोला सा। चंद्र हंस सा तैरता। ग्रह वक्रगति में। सूर्य को चंद्र समझ तारे सेवा करते। ज्योतिश्चक्र कांतिरहित, चक्कर सा। जलप्रवाह ने मनुष्यलोक पवित्र किया, प्रजा कल्याणमय। शांत जल दिशाएँ भरा।
श्लोक 172 से 181 उत्सव का समापन
मेरु गुफाएँ रिक्त, विश्राम। धूप, दीपक प्रज्वलित। बंदीजन स्तोत्र, किन्नरी गीत। मंगल गान से कान उत्सव। नृत्य, संगीत, मृदंग ध्वनि। अप्सराएँ केसर-हार संग नृत्य। जय-घोष से मेरु स्तुति सा।
श्लोक 182 से 191 सुगंधित जल अभिषेक
वायु स्वेद चुंबन करता। द्वारपाल सभा नियंत्रित करते। सुगंधित जल से अभिषेक, धारा लज्जित सी। सुवर्ण झारी से नमस्कार सा, प्रभा से अग्नि आहुति सा। भगवान गुणों से धारा चरितार्थ।
श्लोक 192 से 201 सुगंधित जल की महिमा
श्वेत धारा रत्नत्रय संतुष्ट करे, विघ्न नाशक, मुनियों को मान्य। शांति-मंत्र पाठ। देवों ने गंधोदक लगाया, स्वर्ग ले गए। चूर्ण जल से फाग। प्रदक्षिणा, पूजा (जल, गंध, अक्षत आदि) से अमंगल नाश।
श्लोक 202 से 211 अभिषेक समापन
इंद्र-इंद्राणी ने प्रदक्षिणा, नमस्कार। फूल-अश्रु वर्षा। वायु पराग बरसाता। भगवान मेरु सा, देव कुलाचल सा। पवनकुमार भक्ति, मेघकुमार जलवृष्टि। वायु प्रदक्षिणा सा। दुंदुभि से कल्याण घोषणा।
श्लोक 212 से 216 अंतिम स्तुति
फूल वर्षा भ्रमर खींचती, लक्ष्मी नेत्र सा। देवांगनाएँ नृत्य, इंद्र-धरणेंद्र अभिषेक। वृषभनाथ जयवंत हों। सूर्य उष्णता छोड़े, चंद्र शीतल, तारे क्रीड़ा करते। जलप्रवाह सबकी रक्षा करे।
पर्व 14
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द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय – आदिपुराण
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