भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51
श्लोक 62 से 71 क्रूर यातनाएँ और चिंतन
नारकियों को चोटी से पटककर मुट्ठियों से पीटा जाता है, मुद्गरों से मस्तक फोड़ा जाता है। असुरकुमार लड़ाते हैं। नारकी सोचते हैं कि यह भूमि दुरासद, अग्नि वायु असह्य, और दिशाएँ जलती हैं।
English translation of Ādi purāṇa parv 10 – Shlok 52 to 61
श्लोक ( Shlok ) 52
“भस्त्राग्निदीपितान् केचिदा यसान् शाल्मलीद्रमान्। “आरोप्यन्ते हठात् कैश्चित् तीक्ष्णोर्ध्वाधोऽग्रकण्टकान ll52ll
कितने ही नारकी, जिन पर ऊपर से नीचे तक पैने काँटे लगे हुए हैं और जो धौंकनी से प्रदीप्त किये गये हैं ऐसे लोहे के बने हुए सेमर के वृक्षों पर अन्य नारकियों को जबरदस्ती चढ़ाते हैं ।।52।।
“Many hellish beings force others to climb iron Simul trees, which are covered from top to bottom with sharp thorns and have been heated with blazing bellows.” (52)
श्लोक ( Shlok ) 53
ते तदारोपणोर्ध्वाधः कर्षणैरतिकर्षिताः । मुच्यन्ते नारकैः कृष्छात् क्षरत्क्षतजमूर्तयः ॥५३॥
वे नारकी उन वृक्षों पर चढ़ते हैं, कोई नारकी उन्हें ऊपर से नीचे की ओर घसीट देता है और कोई नीचे से ऊपर को घसीट ले जाता है । इस तरह जब उनका सारा शरीर छिल जाता है और उससे रुधिर बहने लगता है तब कहीं बड़ी कठिनाई से छुटकारा पाते हैं ।।53।।
“The hellish beings climb those trees, some dragging them from top to bottom while others pull them from bottom to top. In this process, their entire bodies get scraped, causing blood to flow profusely. Only after enduring immense suffering do they barely manage to escape.” (53)
श्लोक ( Shlok ) 54
अरुष्करद्रवापूर्णनदीरन्ये विगाहिताः । क्षणाद् विशीर्णसर्वाङ्गा विलुप्यन्ते ऽ॔म्बु चारिभिः ॥५४॥
कितने ही नारकियों को भिलावे के रस से भरी हुई नदी में जबरदस्ती पटक देते हैं जिससे क्षण भर में उनका सारा शरीर गल जाता है और उसके खारे जल की लहरें उन्हें लिप्त कर उनके घावों को भारी दुःख पहुँचाती हैं ।।54।।
Many hellish beings are forcefully thrown into a river filled with the sap of marking nut trees (bhilava). Within moments, their entire bodies dissolve, and the salty waves of the river cling to their wounds, causing unbearable agony.” (54)
श्लोक ( Shlok ) 55
विस्फुलिङ्गमयीं शय्यां ज्वलन्तीमधिशायिताः । शेरते प्लुप्यमाणाङ्गा दीर्घनिद्रा सुखेप्सया ॥५५॥
कितने ही नारकियों को फुलिंगों से व्याप्त जलती हुई अग्नि की शय्या पर सुलाते हैं । दीर्घनिद्रा लेकर सुख प्राप्त करने की इच्छा से वे नारकी उस पर सोते हैं जिससे उनका सारा शरीर जलने लगता है ।।55।।
“Many hellish beings are forced to lie down on blazing fire beds filled with sparks. Desiring restful sleep for comfort, they lie on these beds, only for their entire bodies to catch fire and burn intensely.” (55)
श्लोक ( Shlok ) 56 – 57
असिपत्रवनान्यन्ये श्रयन्त्युष्णार्दिता यदा । तदा वाति मरुतीव्रो विस्फुलिङ्गकणान् किरन् ll56ll
तेन पत्राणि पात्यन्ते सर्वायुधमयान्यरम् । तैश्छिन्नभिन्नसर्वाङ्गा पूत्कुर्वन्ति वराककाः ॥५७॥
गरमी के दुःख से पीड़ित हुए नारकी ज्यों ही असिपत्र वन में (तलवार की धार के समान पैने पत्तों वाले वन में) पहुँचते हैं त्यों ही वहाँ अग्नि के फुलिंगों को बरसाता हुआ प्रचंड वायु बहने लगता है । उस वायु के आघात से अनेक आयुधमय पत्ते शीघ्र ही गिरने लगते हैं जिनसे उन नारकियों का संपूर्ण शरीर छिन्न-भिन्न हो जाता है और उस दुःख से दुःखी होकर बेचारे दीन नारकी रोने-चिल्लाने लगते हैं ।। 56-57 ।।
श्लोक ( Shlok ) 58
‘वल्लूरीकृत्य शोष्यन्ते ‘शूल्यमांसीकृताः परेः । पात्यन्ते च गिरेरग्रादधःकृतमुखाः परैः ॥५८॥
वे नारकी कितने ही नारकियों को लोहे की सलाई पर लगाये हुए मांस के समान लोहदंडों पर टाँगकर अग्नि में इतना सुखाते हैं कि वे सूखकर बल्लूर (शुष्क मांस) की तरह हो जाते हैं और कितने ही नारकियों को नीचे की ओर मुँह कर पहाड़ की चोटी पर से पटक देते हैं ।।58।।
“Many hellish beings hang others on iron rods, much like skewered meat, roasting them over fire until they dry out and resemble charred flesh. Some are thrown headfirst from the peaks of towering mountains.” (58)
श्लोक ( Shlok ) 59
दार्यन्ते क्रकचैस्तीक्ष्णैः केचिन्मर्मास्थिसन्धिषु । तप्तायः सूचिनिरर्भिन्ननखाग्रोल्व णवेदनाः ॥५९॥
कितने ही नारकियों के मर्मस्थान और हड्डियों के संधिस्थानों को पैनी करोत से विदीर्ण कर डालते हैं और उनके नखों के अग्रभाग में तपायी हुई लोहे की सूइयाँ चुभाकर उन्हें भयंकर वेदना पहुँचाते हैं ।।59।।
“Many hellish beings pierce the vital points and joints of others with sharp tools, causing severe pain. They also drive red-hot iron needles under their nails, inflicting excruciating agony.” (59)
श्लोक ( Shlok ) 60
कांश्चिन्निशातशूलाग्र प्रोतॉल्लम्बा न्त्रसन्ततीन् । भ्रमयत्युच्छलच्छोणशोणितारुणविग्र हान् ॥६०॥
कितने ही नारकियों को पैने शूल के अग्रभाग पर चढ़ाकर घुमाते हैं जिससे उनकी अंतड़ियां निकलकर लटकने लगती हैं और छलकते हुए खून से उनका सारा शरीर लाल-लाल हो जाता है ।।60।।
“Many hellish beings are impaled on the sharp tips of spears and spun around, causing their intestines to spill out and dangle, while their entire body becomes drenched in flowing blood.” (60)
श्लोक ( Shlok ) 61
व्रणजर्जरितान् कांश्चित् सिञ्चन्ति क्षारवारिभिः । “तत्किलाप्यायनं तेषां मूर्च्छाविह्व लितात्मनाम् ॥ ६१॥
इस प्रकार अनेक घावों से जिनका शरीर जर्जर हो रहा है ऐसे नारकियों को वे बलिष्ठ नारकी खारे पानी से सींचते हैं । जो नारकी घावों की व्यथा से मूर्च्छित हो जाते हैं खारे पानी के सींचने से वे पुन: सचेत हो जाते हैं ।।61।।
“In this way, the powerful hellish beings douse the severely wounded bodies of other hellish beings with salty water. Those who lose consciousness due to the pain of their wounds regain consciousness upon being drenched with the salty water.” (61)
श्लोक 62 से 71
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51