भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20
श्लोक 21 से 31 शयनागार और मृत्यु
वज्रजंघ सुगंधित, रत्नमय शयनागार में श्रीमती के साथ शयन करता था। धूप से सुगंध बढ़ी, पर झरोखा बंद रहने से दोनों मूर्च्छित हो मृत्यु को प्राप्त हुए। शरीर निष्प्रभ हो गए। भोग ही मृत्यु का कारण बने।
English translation of Ādi purāṇa parv 9- Shlok 21 to 31
श्लोक ( Shlok ) 21 – 24
अथ कालागुरूद्दामधूपधूमाधिवासिते । मणिप्रदीपकोधोतदूरीकृततमस्तरे ॥२१॥
प्रतिपादिकविन्यस्तरत्नमञ्चोपशोभिनि । दधत्यालम्विभिर्मुक्ता जालकैर्ह सितश्रियम् ॥२२॥
कुन्देन्दीवरमन्दार सान्द्रामोदाश्रितालिनि । चित्रभितिगतानेकरूपकर्ममनोहरे ॥२३
वासगेहेऽन्यदा शिश्ये तल्पे मृदुनि हारिणि । गङ्गास्सैकतनिर्भासि दुकूल प्रच्छदोज्ज्वले ॥ 24॥
अथानंतर एक दिन वह वज्रजंघ अपने शयनागार में कोमल, मनोहर और गंगा नदी के बालूदार तट के समान सुशोभित रेशमी चद्दर से उज्ज्वल शय्या पर शयन कर रहा था । जिस शयनागार में वह शयन करता था वह कृष्ण अगुरु की बनी हुई उत्कृष्ट धूप के धूम से अत्यंत सुगंधित हो रहा था, मणिमय दीपकों के प्रकाश से उसका समस्त अंधकार नष्ट हो गया था । जिनके प्रत्येक पाये में रत्न जड़े हुए हैं ऐसे अनेक मंचों से वह शोभायमान था । उसमें जो चारों ओर मोतियों के गुच्छे लटक रहे थे उनसे वह ऐसा मालूम होता था मानो हस ही रहा हो । कुंद, नीलकमल और मंदार जाति के फूलों की तीव्र सुगंधि के कारण उसमें बहुत से भ्रमर आकर इकट्ठे हुए थे । तथा दीवालों पर बने हुए तरह-तरह के चित्रों से वह अतिशय शोभायमान हो रहा था ।।21-24।।
One day, King Vajrajangha was resting in his bedchamber on a radiant silk bed adorned like the sandy banks of the Ganga River, soft and delightful. The chamber was filled with the captivating fragrance of exquisite incense made from black agarwood, and the light from gem-studded lamps dispelled all darkness.
The room was adorned with numerous platforms, each embellished with jewel-studded supports, adding to its splendor. Strings of pearls hanging from all sides made it appear as if the chamber itself were smiling. The intense fragrance of flowers like Kunda, blue lotuses, and Mandara attracted swarms of bees that gathered within. The walls, decorated with various artistic paintings, enhanced the chamber’s extraordinary beauty.
श्लोक ( Shlok ) 25
प्रि यास्तनतटस्पर्श सुखामीलितलोचनः । मेरुकन्दरमाश्लिष्यन् स विद्युदिव वारिदः ॥२५॥
श्रीमती के स्तन तट के स्पर्श से उत्पन्न हुए सुख से जिसके नेत्र निमीलित (बंद) हो रहे हैं ऐसा वह वज्रजंघ मेरु पर्वत की कंदरा का स्पर्श करते हुए बिजलीसहित बादल के समान शोभायमान हो रहा था ।।
King Vajrajangha, whose eyes were gently closing from the blissful touch of Shrimati’s bosom, appeared as magnificent as a cloud adorned with lightning touching the caves of Mount Meru.
श्लोक ( Shlok ) 26
तत्र वातायनद्वारपिधानारुद्धधूनके । केशसंस्कारधूपोद्यद्धूमेन क्षणमूर्च्छितौ ॥२६॥
शयनागार को सुगंधित बनाने और केशों का संस्कार करने के लिए उस भवन में अनेक प्रकार का सुगंधि धूप जल रहा था । भाग्यवश उस दिन, सेवक लोग झरोखे के द्वार खोलना भूल गये थे इसलिए वह धूम उसी शयनागार में रुकता रहा । निदान, केशों के संस्कार के लिए जो धूप जल रहा था उसके उठते हुए धूम से वे दोनों पति-पत्नी क्षण-भर में मूर्च्छित हो गये ।।26।।
In the chamber, various fragrant incenses were burning to perfume the room and anoint the hair. By chance, that day, the attendants forgot to open the windows, causing the smoke to remain trapped inside. As a result, the rising fumes from the incense meant for hair anointment overwhelmed them, and both husband and wife fainted within moments.
श्लोक ( Shlok ) 27
निरुद्धोच्छ्वासदौः स्थित्यादन्तः किञ्चिदिवाकुलौ । दम्पती तौ निशामध्ये दीर्घनिद्रामुपेयतुः ॥२७॥
उस धूम से उन दोनों के श्वास रुक गये जिससे अंतःकरण में उन दोनों को कुछ व्याकुलता हुई । अंत में मध्य रात्रि के समय वे दोनों ही दंपत्ति दीर्घनिद्रा को प्राप्त हो गये―सदा के लिए सो गये―मर गये ।।27।।
The dense smoke obstructed their breathing, causing distress in their hearts. Ultimately, at midnight, both husband and wife fell into a deep, eternal sleep — they passed away forever.
श्लोक ( Shlok ) 28
जीवापाये तयोर्देहौ क्षणाद् विच्छायतां गतौ । प्रदीपापायसंवृद्ध तमस्कन्धो यथा गृहौ ॥२८॥
जिस प्रकार दीपक बुझ जाने पर रुके हुए अंधकार के समूह से मकान निष्प्रभ―मलीन―हो जाते हैं, उसी प्रकार जीव निकल जाने पर उन दोनों के शरीर क्षण-भर में निष्प्रभ―मलीन―हो गये ।।28।।
Just as a house becomes dull and lifeless when enveloped in lingering darkness after a lamp is extinguished, similarly, their bodies became pale and lifeless within moments after their souls departed.
श्लोक ( Shlok ) 29
विद्युतासुरसौ छायां न लेभे सहकान्तया । पर्यस्त इव कालेन सलतः कल्पपादपः ॥29॥
जिस प्रकार समय पाकर उखड़ा हुआ कल्पवृक्ष लता से सहित होने पर भी शोभायमान नहीं होता उसी प्रकार प्राणरहित वज्रजंघ श्रीमती के साथ रहते हुए भी शोभायमान नहीं हो रहा था ।।29।।
Just as an uprooted Kalpavriksha (wish-fulfilling tree) loses its splendor despite being entwined with vines, similarly, the lifeless Vajrajangha, even in the company of Shrimati, no longer appeared radiant.
श्लोक ( Shlok ) 30
भोगाङ्गेनापि धूपेन तयोरासीत् परासुता । धिगिमान् भोगि भोगाभान् भोगान् प्राणापहारिणः ॥ ३० ॥
यद्यपि वह धूप उनके भोगोपभोग का साधन था तथापि उससे उनकी मृत्यु हो गयी इसलिए सर्प के फण के समान प्राणों का हरण करने वाले इन भोगों को धिक्कार हो ।।30।।
Although that incense was meant for their pleasure, it ultimately caused their death. Therefore, cursed be such pleasures that, like a serpent’s hood, snatch away life.
श्लोक ( Shlok ) 31
तौ तथा सुखसाद्भूतौ संभोगैरुपलालितैः । प्राप्तावेकपदे शोच्यां दशांधिक्संसृ तिस्थितिम् ॥३१॥
जो श्रीमती और वज्रजंघ उत्तम-उत्तम भोगों का अनुभव करते हुए हमेशा सुखी रहते थे वे भी उस समय एक ही साथ शोचनीय अवस्था को प्राप्त हुए थे इसलिए संसार की ऐसी स्थिति को धिक्कार हो ।।31।।
Shrimati and Vajrajangha, who always lived joyfully, experiencing the finest pleasures, both met a sorrowful fate simultaneously. Therefore, cursed be the transient nature of this world.
श्लोक 32 से 41
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20