भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171
श्लोक 172 से 184 मुनियों की पूजा और पूर्वभव
वज्रजंघ ने मुनियों को आहार दिया, जिससे पंचाश्चर्य (रत्न-पुष्पवर्षा आदि) हुए। कंचुकी ने बताया कि मुनि उनके पुत्र हैं। वज्रजंघ ने धर्म सुना और पूर्वभव पूछा। दमधर मुनि ने बताया कि वज्रजंघ चौथे भव में श्रीषेण का पुत्र था, दीक्षा ली पर भोगों में मृत्यु पाई, फिर महाबल और ललितांगदेव हुआ, अब वज्रजंघ है।
English translation of Ādi purāṇa parv 8- Shlok 172 to 184
श्लोक ( Shlok ) 172 – 175
प्रक्षालिताङघ्री संपूज्य मान्ये स्थाने निवेश्य तौ । प्रणिपत्य मनःकायवचोभिः सुद्धिमु द्वहन् ॥१७२॥
श्रद्धादिगुणसंपत्त्या गुणवद्भ्यां विशुद्धिभाक । दत्वा विधिवदाहारं पञ्चाश्चर्याण्यवाप सः ॥१७३॥
वसुधारों दिवो देवाः पुष्पवृष्ठ्या सहाकिरन् । मन्दं व्योमापगावारि कणकीर्मरुदाववौ ॥१७४॥
मन्द्रदुन्दुभिनिर्घोषैः घोषणां च प्रचक्रिरे । अहो दानमहो दानमित्युच्चैरुद्धदिङमुखम् ॥१७५॥
वहाँ वज्रजंघ ने उन्हें ऊँचे स्थानपर बैठाया, उनके चरणकमलों का प्रक्षालन किया, पूजा की, नमस्कार किया, अपने मन, वचन, काय को शुद्ध किया और फिर श्रद्धा, तुष्टि, भक्ति, अलोभ, क्षमा, ज्ञान और शक्ति इन गुणों से विभूषित होकर विशुद्ध परिणामों से उन गुणवान् दोनों मुनियों को विधिपूर्वक आहार दिया । उसके फलस्वरूप नीचे लिखे हुए पंचाश्चर्य हुए । देव लोग आकाश से रत्नवर्षा करते थे, पुष्पवर्षा करते थे, आकाशगंगा के जल के छींटों को बरसाता हुआ मंद-मंद वायु चल रहा था, दुंदुभि बाजों की गंभीर गर्जना हो रही थी और दिशाओं को व्याप्त करने वाले ‘अहो दानम् अहो दानम्’ इस प्रकार के शब्द कहे जा रहे थे ।।172-175।।
There, King Vajrajangha seated the sages on a high platform, washed their lotus feet, performed their worship, and offered salutations. He purified his mind, speech, and body, and adorned with qualities such as devotion, satisfaction, faith, non-greed, forgiveness, knowledge, and strength, he served the virtuous sages food with pure intentions and according to proper rituals.
As a result, five extraordinary events occurred:
- The gods rained precious jewels from the sky.
- A shower of flowers descended.
- A gentle breeze carried the refreshing droplets of the celestial Ganga.
- The deep, resonant sound of celestial drums echoed.
- Voices filled the air proclaiming, “Ah, what a noble gift! Ah, what a noble gift!”
श्लोक ( Shlok ) 176
ततोऽभिवन्ध संपूज्य विसज्यं मुनिपुङ्गवौ । काञ्चक्रीयादबुध्दैनौ चरमावात्मनः सुतौ ॥ १७६॥
तदनंतर वज्रजंघ, जब दोनों मुनिराजों को वंदना और पूजा कर वापस भेज चुका तब उसे अपने कंचुकी के कहने से मालूम हुआ कि उक्त दोनों मुनि हमारे ही अंतिम पुत्र हैं ।।176।।
Thereafter, after offering obeisance and worship to the two sages and respectfully sending them off, Vajrajangha learned from his attendant that those two sages were, in fact, his own youngest sons.
श्लोक ( Shlok ) 177
श्रीमत्या सह संश्रित्य संप्रीत्या निकटं तयोः । म धर्ममश्रृणोत् पुष्यकामः सद्गृहमेधिनाम् ॥ १७७
राजा वज्रजंघ श्रीमती के साथ-साथ बड़े प्रेम से उनके निकट गया और पुण्य प्राप्ति की इच्छा से सद्गृहस्थों का धर्म सुनने लगा ।।177।।
King Vajrajangha, accompanied by Queen Shrimati, approached them with great affection and began listening to the righteous duties of virtuous householders, seeking spiritual merit.
श्लोक ( Shlok ) 178
दानं पूजां च शीलं च प्रोषधं च प्रपञ्चतः । श्रुत्वा धर्म ततोऽपृच्छत् सकान्तः स्वां भवावलीम् ॥178
दान, पूजा, शील और प्रोषध आदि धर्मों का विस्तृत स्वरूप सुन चुकने के बाद वज्रजंघ ने उनसे अपने तथा श्रीमती के पूर्वभव पूछे ।।178।।
After listening to the detailed discourse on virtues such as charity, worship, moral conduct, and fasting, Vajrajangha inquired about the past lives of himself and Shrimati from the sages.
श्लोक ( Shlok ) 179
मुनिर्दमवरः प्राख्यत् तस्य जन्मावलीमिति । दशनांशुभिरुद्योतमातन्वन् दिङ्मुखेषु सः ॥ १७९॥
उनमें से दमधर नाम के मुनि अपने दाँतों की किरणों से दिशाओं में प्रकाश फैलाते हुए उन दोनों के पूर्वभव कहने लगे ।।179।।
Among them, the sage named Damdhara, spreading light in all directions with the radiance of his teeth, began narrating the past lives of both Vajrajangha and Shrimati.
श्लोक ( Shlok ) 180 –184
चतुर्थे जन्मनीतस्त्वं जम्बूद्वीपविदेहगे । गन्धिले विषये सिंहपुरे श्रीषेणपार्थिवात् ॥१८०॥
सुन्दर्यामतिसुन्दर्यां ज्यायान् सूनुरजायथाः । निर्वेदादार्हंतीं दीक्षामादायाव्यक्तसंयतः ॥१८१॥
विद्याधरेन्द्रभोगेषु न्यस्तधीर्मृतिमापिवान् । प्रागुक्ते गन्धिले रूप्यगिरेरुत्तरसत्तटे ॥१८२॥
नगर्यामलकाख्यायां व्योमयानामधीशिता । महाबलोऽभूर्भागांश्च यथाकामं त्वमन्वभूः ॥१८३॥
स्वयंबुद्धात् प्रबुद्धात्मा जिनपूजापुरस्सरम् । त्यक्त्वा संन्यासतो देहं ललिताङ्गः सुरोऽभवः ॥१८४
हे राजन्, तू इस जन्म से चौथे जन्म में जंबूद्वीप के विदेह क्षेत्र में स्थित गंधिल देश के सिंहपुर नगर में राजा श्रीषेण और अतिशय मनोहर सुंदरी नाम की रानी के ज्येष्ठ पुत्र हुआ था । वहाँ तूने विरक्त होकर जैनेश्वरी दीक्षा धारण की । परंतु संयम प्रकट नहीं कर सका और विद्याधर राजाओं के भोगों में चित्त लगाकर मृत्यु को प्राप्त हुआ जिससे पूर्वोक्त गंधिल देश के विजयार्ध पर्वत की उत्तर श्रेणी पर अलका नाम की नगरी में महाबल हुआ । वहाँ तूने मनचाहे भोगों का अनुभव किया । फिर स्वयंबुद्ध मंत्री के उपदेश से आत्मज्ञान प्राप्त कर तूने जिनपूजा कर समाधिमरण से शरीर छोड़ा और ललितांगदेव हुआ । वहाँ से च्युत होकर अब वज्रजंघ नाम का राजा हुआ है ।।180-184।।
O King, in the fourth birth before this one, you were born as the eldest son of King Shrisena and the exceedingly beautiful Queen Manohari in the city of Singhpur, located in the Gandhila region of Videha in Jambudweep. There, you renounced worldly life and adopted Jain monkhood. However, you failed to maintain self-restraint and, indulging in the pleasures of Vidyadhara kings, met your death.
As a result, you were reborn in the city of Alka on the northern slopes of the Vijayaradha mountain in the same Gandhila region, as a powerful being named Mahabal. There, you enjoyed boundless pleasures. Later, under the guidance of the self-enlightened minister Swayambuddha, you attained self-realization and, after worshipping the Jinas, left your body through a peaceful meditative death, becoming Lalitangadev.
After descending from that existence, you were reborn as the current King Vajrajangha.
श्लोक 185 से 201
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171