वज्रबाहु का वैराग्य
वज्रबाहु ने बादल के विलीन होने से वैराग्य पाया। उन्होंने राज्य वज्रजंघ को सौंपकर यमधरमुनि से दीक्षा ली। श्रीमती के 98 पुत्रों ने भी दीक्षा ली। वज्रबाहु ने केवलज्ञान प्राप्त कर मोक्ष पाया। वज्रजंघ भोग भोगता रहा।
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51
English translation of Ādi purāṇa parv 8- Shlok 52 to 61
श्लोक ( Shlok ) 52
पश्य नः पश्यतामेव कथमेष शरद्धनः । प्रासादाकृतिरुद्भूतो विलीनश्च क्षणान्तरे ॥५२॥
देखो, यह शरद् ऋतु का बादल हमारे देखते-देखते राजमहल की आकृति को धारण किये हुए था और देखते-देखते ही क्षण-भर में विलीन हो गया ।।52।।
Look, this autumn cloud, right before our eyes, had taken the shape of a royal palace, and within a moment, it vanished completely.
श्लोक ( Shlok ) 53
संपदभ्रविलायं नः क्षणादेषां विलास्यते । लक्ष्मीस्तडिदविलोयं इत्वयों यौवनश्रियः ॥५३॥
ठीक, इसी प्रकार हमारी यह संपदा भी मेघ के समान क्षण-भर में विलीन हो जायेगी । वास्तव में यह लक्ष्मी बिजली के समान चंचल है और यौवन की शोभा भी शीघ्र चली जाने वाली है ।।53।।
Indeed, just like this cloud, our wealth will also disappear in a moment. In truth, prosperity is as fleeting as lightning, and the beauty of youth fades away just as quickly.
श्लोक ( Shlok ) 54
“आपातमात्ररम्याश्च भोगाः पर्यन्ततापिनः । प्रतिक्षणं गलत्यायुर्गंलन्नालिजलं यथा ॥५४॥
ये भोग प्रारंभ काल में ही मनोहर लगते हैं किंतु अंतकाल में (फल देने के समय) भारी संताप देते हैं । यह आयु भी फूटी हुई नाली के जल के समान प्रत्येक क्षण नष्ट होती जाती है ।।54।।
These pleasures may seem delightful at the beginning, but in the end, they bring immense sorrow. Life itself is like water flowing through a cracked channel, diminishing with every passing moment.
श्लोक ( Shlok ) 55
रूप मारोग्यमैश्वर्यमिष्टबन्धुसमागमः । प्रियाङ्गनारतिश्चेति सर्वमप्यनवस्थितम् ॥ ५५॥
रूप, आरोग्य, ऐश्वर्य, इष्ट-बंधुओं का समागम और प्रिय स्त्री का प्रेम आदि सभी कुछ अनवस्थित हैं―क्षणनश्वर हैं ।।55।।
Beauty, health, wealth, the company of beloved relatives, and the love of a cherished wife—all these are unstable and fleeting, perishing in mere moments.
श्लोक ( Shlok ) 56
विचिन्त्येति चलां लक्ष्मी प्रजिहासुः सुधीरसौ । अभिषिच्य सुतं राज्ये वञ्जजङ्गमतिष्टिपत् ॥56।।
इस प्रकार विचार कर चंचल लक्ष्मी को छोड़ने के अभिलाषी बुद्धिमान् राजा वज्रबाहु ने अपने पुत्र वज्रजंघ का अभिषेक कर उसे राज्यकार्य में नियुक्त किया ।।56।।
Reflecting in this manner and desiring to renounce the fickle goddess of wealth, the wise King Vajrabahu crowned his son Vajrajangha and appointed him to the responsibilities of the kingdom.
श्लोक ( Shlok ) 57
स राज्यभोगनिर्विण्णस्तूर्ण यमधरान्तिके । नृपैः सार्द्ध सहस्त्रार्द्ध “मितैर्दीक्षामुपाददे ॥५७॥
और स्वयं राज्य तथा भोगों से विरक्त हो शीघ्र ही श्री यमधरमुनि के समीप जाकर पाँच सौ राजाओं के साथ जिनदीक्षा ले ली ।।57।।
Renouncing the kingdom and worldly pleasures, King Vajrabahu quickly went to the revered Sage Yamadharmamuni and, along with five hundred other kings, accepted Jain initiation.
श्लोक ( Shlok ) 58
श्रीमतीतनयाश्चामी बीरबाहुपुरोगमाः । समं राजर्षिणाऽनेन तदा संयमिनोऽभवन् ॥५८॥
उसी समय वीरबाहु आदि श्रीमती के अट्ठानवे पुत्र भी इन्हीं राजऋषि वज्रबाहु के साथ दीक्षा लेकर संयमी हो गये ।।58।।
At the same time, Veerabahu and the other ninety-eight sons of Shrimati also took initiation alongside the royal sage King Vajrabahu, becoming ascetics.
श्लोक ( Shlok ) 59
यमैः सममुपारूढ शुद्धिभिविहरन्नसौ । क्रमानुत्यार्थ कैवल्यं परं धाम सभासदत् ॥५९॥
वज्रबाहु मुनिराज ने विशुद्ध परिणामों के धारक वीरबाहु आदि मुनियों के साथ चिरकाल तक विहार किया । फिर क्रम-क्रम से केवलज्ञान प्राप्त कर मोक्षरूपी परमधाम को प्राप्त किया ।।59।।
Muniraj Vajrabahu, along with the pure-hearted monks like Veerabahu, wandered for a long time in spiritual pursuits. Gradually, they attained absolute knowledge (Kevalgyana) and ultimately reached the supreme abode of liberation, Moksha.
श्लोक ( Shlok ) 60
वञ्जअङ्कस्ततो राज्यसंपदं प्राप्य पैतृकीम् । “निरविक्षचिरं भोगान् प्रकृतीरनुरञ्जयन् ।।६०॥
उधर वज्रजंघ भी पिता की राज्य-विभूति प्राप्त कर प्रजा को प्रसन्न करता हुआ चिरकाल तक अनेक प्रकार के भोग भोगता रहा ।।60।।
On the other hand, Vajrajangha, having inherited his father’s royal authority, pleased his subjects and enjoyed various pleasures for a long time.
श्लोक ( Shlok ) 61
अथान्यदा महाराजो वज्रदन्तो महर्दिकः । सिंहासने सुखासीनो नरे न्द्रैः परिवेष्टितः ॥६१॥
अनंतर किसी एक दिन बड़ी विभूति के धारक तथा अनेक राजाओं से घिरे हुए महाराज वज्रदंत सिंहासन पर सुख से बैठे हुए थे ।।61।।
One day, the greatly illustrious Maharaja Vajradanta, surrounded by numerous kings, sat comfortably on the throne, enjoying his prosperity.
श्लोक 62 से 71
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 |
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51
आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
Download PDF