Aryika Shri Subhushanmati Mataji परमपूज्य बाल्योग्नी आर्यिका रत्न श्री सुभूषणमति माता जी तमिल तीर्थ यात्रा दर्शन 1990
Aryika Shri Subhushanmati Mataji परमपूज्य बाल्योग्नी आर्यिका रत्न श्री सुभूषणमति माता जी तमिल तीर्थ यात्रा दर्शन 1990
Kalghatgi (ಕಲಘಟಗಿ ) Dharwad district, Karnataka 18 to 25 Jan 1996
परमपूज्य गणिनी आर्यिका रत्न 105 श्री सुभूषणमति माताजी के सानिध्य में सर्वतोभद्र महामंडल विधान कलघटगी धारवाड़ जिला, कर्नाटक 18 से 25 जनवरी 1996 संपन्न हुआ
जैन आगम में वर्णित पाॅंच प्रकार की पूजाओं में से एक यह सर्वतोभद्र विधान पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा सन् 1987 में लिखित सबसे बडा विधान है। इसमें 101 पूजाएॅं है, इसको लिखने में 40 छन्दों का प्रयोग किया गया है। तीन लोक का मंडल बनाकर 8, 11 या 15 दिनों में इस विधान को पूर्ण किया जाता है।
सर्वतोभद्र विधान में तीन लोक में स्थित आठ करोड़ 72 लाख 756 कृत्रिम और अकृत्रिम जीनालयों की पूजा बड़े भक्ति के साथ की गई। तीन लोक के मंडप पर इंद्र तथा इंद्रानी ने मिलकर करीब तीन हजार श्रीफल चढ़ाए । विधान के समापन के बाद हवन हुआ।
सिरगुप्पी गांव के लोग शोभायात्रा के साथ अपने गांव लाए और माताजी की प्रेरणा से नूतन मंदिर निर्माण का संकल्प लिया। उनकी प्रेरणा से दक्षिण के अनेक नगरों में निर्माण की भावना का संचार हुआ, फलत: जब वे मल्लीग्वाड़ पहुंची तब वहां के भक्तों ने भी नूतन मंदिर की प्रेरणा प्राप्त की चरण बढ़ते ही जा रहे थे, लक्ष्मीश्वर में सहस्वकूट चैत्यालय के दर्शन किए फिर मिश्री कोट होते हुए पुनः कालघटगी पहुंचीं। समाज पूर्व परिचित था अतः चार्तुमास की प्रार्थना करने लगा। माताजी 5 जुलाई 1995 को नगर में पहुंच चुकी थीं, उचित समय पर अपनी दीक्षा के बाद ग्यारहवां चार्तुमास स्थापित किया। इसके पूर्व कलघटगी में कभी किसी संघ का वर्षायोग नहीं हुआ था अतः लोगों में कुछ अधिक ही उत्साह था। उस समय माताजी के साथ दो अन्य आर्यिका माताएँ भी संघ में विराजित थीं। दीदी धर्म एवं दीपक भैया भी थे। माताजी की चर्चा और परम्परा से समाज में धार्मिक भावना दृढ हुई और मंगलमय प्रवचनों से आत्मोत्साह बढ़ा। कुल मिलाकर हर दिन सुबह शाम और मध्यान्ह प्रभावना की, पताकाएं खूब लहराई। युवक-युवतियों ने जाग्रति का परिचय देते हुए। ‘आर्यिका सुभूषणमति मंडल’ की स्थापना की तो समाज के वरिष्ठ कार्यकताओं ने माताजी से नवीन मंदिर की प्रेरणा पाकर, उन्हीं के सानिध्य में शिलान्यास समारोह सम्पन्न किया।
उसी क्रम में जब माताजी ने ‘सर्वतो भद्र विधान’ कराया तब वृद्ध भक्तों ने उत्साह पूर्वक अपने आनंद को स्पष्ट करते हुए बतलाया कि कर्नाटक प्रांत में यह विधान पहली बार हुआ है, जिससे कलघटगी नगर गौरवान्वित हुआ है। माताजी काही प्रभाव है कि विधान के अवसर पर हमारे प्रदेश के राज्य मंत्री श्री सिद्ध आशीर्वाद लेने आए और उनके निमित्त से अनेक गणमान्य जन पधारे।
दीपोस्त्सव के पूर्व प्रात: बेला में संघ ने विधि पूर्वक निष्ठापना की। उसी समीपस्थ दासीकोपा गांव जाकर माताजी ने समाज में 17 वर्ष से चल रहे विवाद को सुलझाया और परस्पर मैत्री की स्थापना की। दी फिर मंदिर निर्माण की प्रेरणा समाज ने खुशी मनाते हुए उसी दिन शिलान्यास समारोह सम्पन्न किया। उसी दिन माताजी ने स्वामी अकलंक देव की निषद्या-स्थली स्वादीमठ की वंदना हेतु बिहार किया। कलघटगी में वर्षायोग के दौरान अनेक भक्तों के साथ- साथ श्री शरद पट्टन सेट्टी, सौभाग्यवती सुमंगला, श्री रवि, श्रीमति सुधा अम्मा, श्रीमान अण्णा राव आदि के नाम भक्ति और सेवा के नए कीर्ति मान रच गए।
लगभग सात माह का स्वर्णिम अवसर प्रदान कर संघ ने 4 फरवरी 1996 को बिहार कर दिया। नगर की बहिन बेटियां रोती रह गयीं, माताजी निर्मोह का पाठ पढ़ाकर आगे बढ़ गयीं।
तत्वार्थ सूत्र जी के दशम अध्याय में आचार्यश्री उमास्वामी जी ने ९ सूत्रों के माध्यम से हमारे लिएउपा देय और लक्षित सातवें मोक्ष तत्व को ९ सूत्रों के माध्याम से उपदेशित किया है !प्रथम सूत्र मे उन्होंने केवलज्ञानकी उत्पत्ति के क्रम ,दुसरे सूत्र में मोक्ष तत्व को परिभाषा,तीसरे सूत्र में जीव के मोक्ष में भावों का अभाव ,चौथे मे जीवों के भाव ,सूत्र ५ में मुक्त होते समय कार्य ,सूत्र ६ में जीव के उर्ध्व गमन के कारण,सूत्र ७ में सूत्र छ का दृष्टांत पूर्वक ,सूत्र ८ में जीव का लोकांत से आगे गमन नहीं होने के कारण और सूत्र ९ में सिद्धात्मोंके भेद उपदेशित किये है! हमें इन सूत्रों के अर्थः,भावो को समझकर श्रद्धान करते हुए कंठस्थ कर स्वात्म कल्याण हेतु पुरुषार्थ करना चाहिए
केवल ज्ञान प्राप्त होने का क्रम –
मोहक्षयाज्ज्ञानदर्शनावरणान्तरायक्षयाच्चकेवलनम् ! १!
संधि विच्छेद-मोह+क्षयात् +ज्ञानावरण +दर्शनावरण+अन्तराय+क्षयात् +च +केवलनम्
शब्दार्थ-मोहक्षयात्-मोहनीयकर्म के क्षय होने पर,ज्ञानावरण-ज्ञानावरण ,दर्शनावरण-दर्शनावरण, अन्तराय- अंतराय कर्म, क्षयात्-क्षय,च-और , केवलनम्-केवल ज्ञान उत्पन्न होता है !
अर्थ-मोहनीयकर्म के क्षय होने के बाद,ज्ञानावरण ,दर्शनावरण, अन्तराय कर्म के क्षय से केवल ज्ञान उत्पन्न होता है!
भावार्थ-मोहनीय के दर्शनमोहनीयकर्म का क्षय,४थे अविरतगुणस्थान से ७वे अप्रमत्तगुणस्थान तक और चारित्र मोहनीयकर्म का सर्वथा क्षय क्षपकश्रेणी आरोहित जीव १०वे गुणस्थान के उपांत/अंतिम समय में करने के बाद;१२वे क्षीणकषाय गुणस्थान,केउपांत समय में,मुनिराज अंतर्मूर्हतकाल रहकर (लगभग १/१२ सैकंड) में ज्ञानावरण,दर्शनावरण और अन्तराय,तीनों घातिया कर्मों का युगपत क्षय कर केवलज्ञान प्राप्त कर,१३वे गुणस्थान में केवली हो जाते है!
विशेष-१ -सूत्र में मोह क्षयात् ,शेष तीनों घातिया कर्मों से पहिले अलग से रखने का कारण,मोहनीयकर्म का क्षय सबसे पहिले १०वे गुणस्थान में होकर तत्पश्चात मुनिराज बारहवे क्षीणकषाय गुणस्थान में अन्तर्मुहूर्त काल (लगभग १/१२ सैकंड) रहकर शेष तीनों घातियाकर्मों ज्ञानावरण,दर्शनावरणऔर का क्षय युगपत कर केवलज्ञान प्राप्त कर,अनन्तचतुष्क;अनन्तदर्शन,अनन्तज्ञान,अनन्तसुख और अनन्तवीर्य गुणों से सुशो भित होकर पृथ्वी से ५००० धनुष उप्र आकाश में विराजमान १३वे गुणस्थानवर्ती योगकेवली हो जाते है !
आयु कर्म की स्थिति रहने तक केवली अरिहंत अवस्था में रहते है !इस अवस्था तक उनका भाव मोक्ष होता है ,आयु कर्म तथा नाम,गोत्र और वेदनीय अघातिया कर्मों के क्षय करने पर अरिहंत भगवान् मुक्त होकर द्रव्य मोक्ष प्राप्तकर सिद्ध होकर सिद्धालय में लोकांत पर स्थित तनु वातवलय के अंत को शीर्ष स्पर्श करते हुए अनंतकाल तक रहते है!
३-अरिहंत ७ प्रकार के होते है!केवलज्ञान होने पर तीर्थंकर अरिहंतो की वाह्यविभूति;समवशरण की रचना इंद्र की आज्ञा से कुबेर करते है!शेष अरिहंतों की गंधकुटी ही होती है
मोक्ष की परिभाषा-
बंधहेत्वभावनिर्जराभ्यांकृत्स्नकर्मविप्रमोक्षो मोक्षः ! २!
संधि विच्छेद-बंध+हेत्वभाव+ निर्जराभ्यां+कृत्स्न+कर्म+वि+प्र+मोक्षो+मोक्षः
शब्दार्थ-बंध-बंध,हेत्वभाव-कारणों का अभाव होने से,निर्जराभ्यां-निर्जरा होने से,कृत्स्न-सम्पूर्ण रूप से , कर्म+,कर्मों ,वि-विशेष,प्र-प्रकृष्ट रूप से ,मोक्षो-छूट जाएणा, मोक्षः -मोक्ष है !
अर्थ -बंध हेत्वभाव-बंध के कारणों का अभाव,निर्जराभ्यां-निर्जरा होने से,कृत्स्न-सम्पूर्ण रूप से ,वि प्र मोक्ष-विशेष और प्रकृष्ट रूप से छूट जाना ,मोक्षः-मोक्ष है!
भावार्थ-बंध के कारणों;मिथ्यादर्शन,अविरति,प्रमाद,कषाय और योगों का अभाव होने से आस्रव बंध के रुकने से और आत्मा के साथ लगे कर्मों का तपश्चर्ण आदि से निर्जरा के द्वारा,विशेष और प्रकृष्ट रूप से पूर्णतया पृथक होने से,आत्मा के परम शुद्ध होने से मोक्ष होता है!अर्थात आत्मा का समस्त कर्मों बंधनो से मुक्त हो जाती है उसकी यह शुद्ध अवस्था ही मोक्ष है!
विशेष-कर्मों का अभाव दो प्रकार से होता है-कुछ कर्मों तिर्यंचायु,नरकायु,देवायु का अभाव तो चर्मशरीरी के स्वयं हो जाता है क्योकि इनका उनमे सत्व नहीं होता है! शेष प्रकृतियों के अभाव के लिए उन्हें पुरुषार्थ करना पड़ता है!अत:चौथे से सातवे,किसीभी एक गुणस्थान में मोहनीयकर्म की सात प्रकृतियों का क्षय कर जीव क्षायिकसम्यग्दृष्टि हो जाते है!तदुपरांत क्षपकश्रेणी आरोहण कर ९वे अनिवृत्तिकरण गुणस्थान में ३६ कर्म प्रकृतियों का क्षय कर दसवे सूक्ष्मसम्प्राय गुणस्थान में प्रवेश कर संज्वलन लोभकषाय को क्षय कर क्षीणकषाय १२वे गुणस्थान में ज्ञानावरण की-५,दर्शनावरण की-६ और अंतराय कर्म की ५ प्रकृतियों कुल १६ प्रकृतियों का क्षय करते है इस प्रकार ३+७+३६+१+१६ =६३ कर्म प्रकृतियों का जिसमे ४७ घातिकर्मों की १ ३ नामकर्म की और ३ आयु कर्म की प्रकृतियों का क्षय कर केवल ज्ञान प्राप्त कर वे १३वे गुणस्थान,योग केवली में प्रवेश करते है!शेष ८५ प्रकृतियों का क्षय आयोगकेवली नामक १४वे गुणस्थान में होता है ,उसके काल के अंतिम समय में १३ और उससे पहिले समय में ७२ प्रकृतियों का क्षय होता
मोक्ष में जीव में भावों का अभाव-
औपशमिकादिभव्यत्वानां च । ३!
संधि विच्छेद-औपशमिकादि+भव्यत्वानां+च
अर्थ -औपशमिकादि+भव्यत्वानां +च
औपशमिकादि-औपशमिक,क्षयोपशमिक,औदायिक भावों,भव्यत्वानां-भव्यत्व भाव से,च-और जीव मुक्त हो जाता है!
भावार्थ-मोक्ष अवस्था में जीव;औपशमिक,क्षयोपशमिक,औदायिक और भव्यत्व भाव से मुक्त हो जाता है!विशेष-जीव के औपशमिक,आदि भावों और पारिणामिक भावों में से भव्यत्व भाव के अभाव में मोक्ष होता है!आशय है कि औपशमिक,क्षयोपशमिक,औदायिक तीनों भाव पूर्णतया नष्ट हो जाते है पारिणामिक भावों में से मोक्षगामी जीव के अभव्यत्व भाव पहिले से ही नहीं होता है,जीवत्व् नामक पारिणामिक भाव मोक्ष में भी रहता है अत: भव्यत्व पारिणामिकभाव तथा औपशमिक,क्षयोपशमिक और औदायिक भावों का अभाव मोक्ष में हो जाता है!
जीव के मोक्ष होने पर भव्यत्व भाव समाप्त होने का कारण-
भव्यत्व भाव का तात्पर्य सम्यग्दर्शन और रत्नत्र्य प्राप्त करने की योग्यता से है,मोक्ष होने पर इस योग्यता कीआवश्यकता नहीं रहती इसलिए जीव के मोक्ष प्राप्त करने के बाद भव्यत्व भाव नहीं रहता! उद्धारहण के लिए जैसे रेल से यात्रा करते हुए गंतव्यस्थान पर पहुँचने के बाद टिकट की उपयोगिता नहीं रहती , टिकट केवल हमें यात्रा करने की योग्यता देता है उसके बाद बेकार हो जाता है !
जीव के मोक्ष में रहने वाले भाव-
अन्यत्रकेवलसम्यक्त्वज्ञानदर्शनसिद्धत्वेभ्य:! ४!
संधि विच्छेद:-अन्यत्र+ केवल+(सम्यक्त्व+ज्ञान+दर्शन)+सिद्धत्वेभ्य:
शब्दार्थ-अन्यत्र-अतिरिक्त अन्य भावों का मोक्ष में अभाव!केवल सम्यक्त्व, केवलज्ञान, केवलदर्शन, सिद्धत्वेभ्य:-सिद्धत्व के,
अर्थ- मोक्ष में जीव के केवलसम्यक्तव,केवलज्ञान,केवलदर्शन एवं सिद्धत्व के अतिरिक्त समस्त भावों का अभाव रहता है!
भावार्थ-सिद्ध होने पर मोक्ष में जीव के केवल सम्यक्त्व,केवलज्ञान केवल दर्शन और सिद्धत्व के आलावा कोई अन्य भाव नहीं होता है !
विशेष:-
शंका-सिद्ध होने के बाद ९ क्षायिक और १ परिणामिक भाव रह जाता है,यहाँ तो ४ ही भाव बताये गए है,ऐसा क्यों ? ऐसे तो अन्नंत वीर्य,अनंत सुख आदि भावों का अभाव हो गया-
समाधान-ऐसा नही है ,क्योकि अनन्तज्ञान और अनन्तदर्शन के साथ ही अनन्तवीर्य होता है,अनन्तवीर्य के अभाव में अनंतज्ञान और अनन्तदर्शन नहीं होता है!अत:जब केवलसम्यक्त्व,केवलज्ञान,केवलदर्शन होगा,अनंतवीर्य साथ में अवश्य होगा!अनन्तसुख तो अनन्तज्ञानमय है क्योकि ज्ञान के अभाव में सुख का अनुभव नहीं होता!केवलज्ञान,केवलदर्शन है तो जीवत्व और क्षायिकभाव भी होगा ही,क्षायिकभाव उत्पत्ति के समय था,वास्तविक गुण तो सम्यक्त्व है!क्षायिकसम्यक्त्व,सम्यक्त्व विरोधी कर्मों का क्षयं होने के कारण,वह क्षायिकभाव है इन चारों भावों में १० भाव समावेशित है!
अष्ट कर्मो का आत्मा से पृथक होना द्रव्यमोक्ष और ४ घातिया कर्मों का पृथक होना भावमोक्ष है!
सिद्धावस्था में द्रव्य और भाव मोक्ष दोनों हो जाते है!
शंका-मुक्त जीवों निराकार होते है,अत:उनका अभाव ही समझना चाहिए क्योकि निराकार वस्तु ,वस्तु नहीं है !
समाधान-मुक्त जीव का आकार,मुक्ति से पूर्व छोड़े गए अंतिम शरीर जैसा होता है !
शंका-यदि मुक्त जीव का आकार,अंतिम शरीर जैसा होता है ,तो मुक्त जीव के शरीर के अभाव में , आत्मप्रदेश समस्त लोकाकाश में फ़ैल जाने चाहिए ?
समाधान-आत्मा के प्रदेशों में संकोच विस्तार का कारण नाम कर्म था और उस नाम कर्म के अनुसार जैसे शरीर जीव को मिलता था उसके अनुसार आत्म प्रदेशों में संकोच विस्तार होता था !मुक्त होने पर जीव में नाम कर्म के अभाव से संकोच विस्तार का अभाव हो गया ,इसलिए मुक्त जीव के आत्म प्रदेश मुक्ति से पूर्व अंतिम शरीर से कुछ कम बने रहते है!
शंका -यदि कारण का अभाव होने से मुक्त जीव में संकोच -विस्तार नही होता तो गमन का भी कोई कारण नहीं होने से,जैसे जीव नीचे,तिरछा नहीं जाता ,ऊपर भी नहीं -ऊपर जाना चाहिए ?
समाधान -अगला सूत्र -५
मोक्ष होने के बाद के कार्य-
तदन्तरमूर्ध्वंगच्छ्त्यालोकान्तात् !५!
संधि विच्छेद -तदन्तरं+ऊर्ध्वं +गच्छ्त्या+लोकान्तात्
शब्दार्थ:तदन्तर-उसके पश्चात(कर्मों के क्षय) के पश्चात,ऊर्ध्वं-ऊपर,गच्छ्त्या-जाते है,,लोकान्तात् -लोक के अंत तक
अर्थ:-कर्मों के क्षय के उपरान्त जीवात्मा लोक के अंत तक ऊपर की ओर गमन करती है !
भावार्थ-समस्त द्रव्य,भाव और नोकर्म के नष्ट होने के बाद आत्मा लोक के अंत तक ऊपर चला जाता है!
है!इसके बाद वे मोक्ष प्राप्त कर लेते है !
मुक्त जीव का ऊर्ध्व-गमन का कारण –
पूर्वप्रयोगादसङ्गत्वाद् बंधच्छेदात् तथागतिपरिणामाच्च !६!
संधि विच्छेद-पूर्वप्रयोगात्+असङ्गत्वाद्+बंधच्छेदात् तथा+गतिपरिणामाच्च
शब्दार्थ-पूर्वप्रयोगात-पूर्व संस्कारवश ,असङ्गत्वाद्-संग का अभाव अर्थात बंधे कर्मों का अभाव होने से, बंधच्छेदात्-बंध का छेद होने से, तथा-और ,गतिपरिणाम -गमन स्वभावी होने ,से उच्च -उर्ध्व !
भावार्थ-मुक्तात्मा पूर्व संस्कारवश,कर्मों के अभाव में,कर्मबंध का छेदन/क्षय होने से तथा ऊर्ध्व गमन स्वभावी होने के कारण,ऊर्ध्व गमन करती है!
विशेष-इस सूत्र में आचर्यश्री बता रहे है कि मुक्त जीवात्मा केवल उर्ध्व गमन ही, उक्त चार कारणों से करती है ,सांसारिक आत्माओं के समान तिर्यक गमन नहीं करती! कर्मों से बन्धित संसारिक आत्मा ,उनके भार के कारण जैसे कोई वजनदार वस्तु नीचे ही आती है ऊपर नहीं जाती ,कर्मों के भार के कारण उर्ध्व गमन नहीं करती किन्तु मुक्त, सिद्धात्मा बन्धित कर्मों के क्षय होने से उनके भार से रहित होती है तथा अपने स्वभाव अनुसार उर्ध्व गमन करती है !
सूत्र ६ का दृष्टांतो से विश्लेषण –
आविद्धकुलालचक्रवद्व्यपगतलेपालांबुवदरेण्डबीजवदग्निशिखावच्च! ७!
संधि विच्छेद-आविद्ध+कुलाल+चक्रवद्+व्यपगतलेप+अलांबुवत+अरेण्ड+बीजवत+अग्नि शिखावत्+च
शब्दार्थ-आविद्ध-घुमाए गए चलते हुए ,कुलाल-कुम्हार के द्वारा,चक्रवद्-चक्र के समान,व्यपगत-जिसका हट गया है,लेप- लेप,अलाम्बुवत -ऐसी तुम्बी की तरह ,ऐरेण्ड-एरंडी के,बीजवत -बीज की तरह, अग्नि-अग्नि की,शिखावत्-शिखा के सामान,च-और
अर्थ-जीव,कुम्भकार के द्वारा घुमाए हुए चाक के समान,मिटटी के लेप से मुक्त तुम्बी के समान,कर्म बंध से मुक्त होने के कारण एरण्ड बीज के समान,स्वभावत:अग्नि शिखा के समान उर्ध्व गमन करता है !
भावार्थ-इस सूत्र को समझने के लिए हमे सूत्र ६ को क्रमश इस सूत्र से दृष्टांत हेतु अवलोकन करना होगा !
आविद्धकुलालचक्रवत-पूर्वप्रयोगात्-जिस प्रकार कुम्हार डंडे को चाक के ऊपर रख कर घुमाता है,वह चाक डंडा हटाने के बाद भी पूर्व प्रयोग वश(संस्कारवश) तब तक घूमता रहता है जब तक उसमे पुराना संस्कार रहता है,ठीक इसी प्रकार अनादिकाल से जीव मुक्ति के लिए बार बार प्रयास करता है,मुक्ति के बाद वह भावना और प्रयास दोनों ही नहीं करता,फिर भी पूर्व संस्कार वश वह जीव गमन करता है!
व्यपगतलेपअलांबुवत-असङ्गत्वाद्-जिस प्रकार मिटटी के भार से लदी हुई तुम्बी,तालाब के पानी में डाल ने पर उसमें डूबी रहती है,किन्तु जैसे जैसे मिटटी का लेप गल कर हटता जाता है,जल में वह ऊपर आती जाती है,उसी प्रकार कर्मों के भार से डूबा जीव संसार सागर में डूबा रहता है,कर्म के भार से मुक्त होने पर वह मिटटी से रहित तुम्बी के समान जल में उर्ध्व गमन कर ऊपर आ जाता है,वह लोक में उर्ध्व गमन करता है!कर्म हट जाने से आत्मा ऊर्ध्व गमन करता है,
उक्त दृष्टान्तों से स्पष्ट है कि कर्मभाराधीन आत्मा,उनके आदेशानुसार अनियम से संसार में भ्रमण करता है किन्तु उसके संग से मुक्त होने पर उर्ध्व गमन ही करता है !
एरण्ड बीजवत् बन्धच्छेदात्-जैसे एरंड के बीज एरंड के डोढा में बंद रहता है!डोढ़ा के सूखने पर जब वह फटता है तो एरण्ड का बीज उर्ध्व गमन ही करता है इसी प्रकार आत्मा अनादिकाल से जाति,गति,शरीर आदि समस्त कर्मों के बंधन तक संसार में रहता है किन्तु उनसे मुक्त होने पर ही वह भी ऊपर की ऒर उर्ध्व गमन करता है!
अग्निशिखावच्च गतिपरिणामाच्च-तिर्यग् वहन स्वभाव वाली वायु के अभाव में जिस प्रकार दीपक की लौ(अग्नि की शिखा) उर्ध्वगमन स्वभावत: ही होती है उसी प्रकार मुक्त आत्मा/जीव ,अनेक गतियों ,जाति आदि में लेजाने वाले कर्मों के अभाव में स्वभावत: ऊर्ध्व गमन करती है!अत: अग्नि की शिखा के सामान आत्मा उर्ध्व गमन करता है !
मुक्त जीव का लोकांत से आगे नहीं जाने का कारण-
धर्मास्तिकायाभावात् !८ !
संधि विच्छेद-धर्म+अस्तिकाय+अभावात्
शब्दार्थ-धर्म-धर्म,अस्तिकाय-अस्तिकार द्रव्य का,अभावात्-अभाव है !
अर्थ-धर्मास्तिकाय द्रव्य के अभाव में जीव/आत्मा अनंत शक्तिवान होने पर भी,लोकाग्रभाग से ऊपर लोक से बहार अनंत अलोकाकाश में नहीं है !
विशेष-गतिरूप उपकारी धर्मास्तिकाय द्रव्य लोकांत तक ही है उसे आगे अनंत अलोकाकाश में नहीं है,इसलिए अनंत शक्ति सम्पन्न युक्त ,मुक्त जीव लोकांत में तनुवातवलय को स्पर्श करते हुए रुक जाते है !
सिद्धों में भेद –
क्षेत्रकालगतिलिंगतीर्थचारित्रप्रत्येकबुद्धबोधितज्ञानावगाहानान्तरसंख्याल्पबहुत्वत:साध्या:!९!
संधि विच्छेद-
क्षेत्र+काल+गति+लिंग+तीर्थ+चारित्र+प्रत्येकबुद्धबोधित+ज्ञान+अवगाहान+अन्तर+संख्या+अल्पबहुत्वत :+साध्या:-जानने योग्य है !
अर्थ-यद्यपि सिद्धों मे आत्मिक गुणों की अपेक्षा रंचमात्र भी अंतर नहीं होता,किन्तु सिद्धों में बाह्य निमित्त की अपेक्षा भेदो की कल्पना करी है!ये जीव जाति ,गति आदि के भेद के कारणों के अभाव में,इन भेदो के व्यवहार से रहित होते है, किन्तु क्षेत्र, काल, गति, लिंग, तीर्थ, चारित्र, प्रत्येकबुद्ध बोधित, ज्ञान, अवगाहान, अन्तर,संख्या और अल्पबहुत्वत:,इन १२ अनुयोगो की अपेक्षा सिद्धों में भेद का विचार करना चाहिए!
भावार्थ- प्रत्युत्पन्न (जो नय केवल वर्तमान पर्याय ग्रहण करता है अथवा यथार्थ वस्तु स्वरुप को ग्रहण करता है) नय जैसे ऋजुनय,निश्चयनय और भूतप्रज्ञापन नय (जो नय अतीत पर्याय को ग्रहण करता है ) जैसे व्यवहारनय की विवक्षा से उक्त १२ अनुयोगों का विवेचन किया जाता है!
सिद्धों में बाह्य निमित्त की अपेक्षा भेदो की कल्पना करी है,आत्मिक गुणों की अपेक्षा उनमे रंचमात्र भी अंतर नहीं है !
निम्न १२ अनुयोगो की अपेक्षा सिद्धों में भेद जानने योग्य है –
१-क्षेत्र-इसमें मुक्ति के क्षेत्र का विचार किया जाता है!वर्तमान नय की अपेक्षा सिद्धि क्षेत्र में अपने आत्म प्रदेशों में अपना आकाश प्रदेश,जिनमे मुक्ति से पूर्व जीव स्थित था या उन आकाश प्रदेशों में मुक्ति होती है!भूतप्रज्ञापन की अपेक्षा १५ कर्मभूमियों से ही जीव मुक्त होता है जैसे जीव भरत,ऐरावत और विदेहक्षेत्रों से मुक्त होते है!कर्मभूमि से अपहरण की अपेक्षा मनुष्य,समस्त मनुष्यलोक से मुक्त होते है!इस प्रकार क्षेत्रों की अपेक्षा सिद्धों में अंतर है !
२-काल-काल की अपेक्षा से किस काल में सिद्धि है?
वर्तमान नय की अपेक्षा एक समय में ही मुक्ति होती है!भूतप्रज्ञापननय की अपेक्षा,जन्म की अपेक्षा समय रूप से,अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी में उत्पन्न जीव सिद्ध होते है विशेष रूप से अवसर्पिणी के सुखमा-दुःखमा,तीसरे काल के अंत और दुःखमा सुखमा चतुर्थकाल में उत्पन्न जीव सिद्ध होते है,!इस काल के अतिरिक्त अन्य काल में सिद्ध नहीं होते !उत्सर्पिणी के तीसरे काल में उत्पन्न , सुखमा-दुःखमा काल में जीव मुक्त होते है !
तीसरे काल में ऋषभदेव भगवान्,चतुर्थ काल में भगवान् महावीर और पंचमकाल में जम्बू स्वामी सिद्ध हुए है !
३-गति-वर्तमाननय की अपेक्षा सिद्धगति में ही सिद्ध होते है!किन्तु भूतप्रज्ञापननय की अपेक्षा मनुष्यगति में ही मुक्ति होती है कोई जीव देवगति से,जैसे ऋषभदेव मनुष्यगति प्राप्त कर सिद्ध हुए और कोई नरक गति से जैसे राजाश्रेणिक का जीव आगामी उत्सर्पिणी के तीसरे काल में महापद्म तीर्थंकर,मनुष्यगति प्राप्त कर सिद्ध होंगे!नियम से जीव मनुष्य गति से ही सिद्ध होता है !
४-लिंग-प्रत्युपन्न;वर्तमाननय की अपेक्षा वेदरहित अवस्था में मुक्ति होती है!भूतप्रज्ञापननय की अपेक्षा तीनों ही भाव वेदों से मुक्ति होती है किन्तु द्रव्य से पुल्लिंग होना ही चाहिए!कोई जीव द्रव्यलिंग की अपेक्षा पिच्छी,कमंडल और कोई पिच्छी सहित तथा कोई दोनों के बिना ही सिद्ध होते है!जैसे तीर्थंकर के पास पिच्छी कमंडल दोनों ही नहीं होते,चक्रवर्ती के पास कमंडलू नहीं होता !
५-तीर्थ-तीर्थ सिद्धि दो प्रकार की है तीर्थकरसिद्ध और इतरसिद्ध!अनेकों जीव तीर्थंकर के रहते हुए सिद्ध हो जाते है और कुछ तीर्थंकर के अभाव में,जैसे बाहुबली भगवान ऋषभदेव के तीर्थ में उनके रहते हुए मुक्त हुए ,कोई भगवान् सीमंधर स्वामी के तीर्थ में और कोई महावीर भगवान् के तीर्थ में!या जम्बू स्वामी, महावीर भगवान तीर्थंकर की अनुपस्थित में सिद्ध हुए!इस प्रकार तीर्थ की अपेक्षा सिद्धों में भेद है !
६-चारित्र-प्रत्युपन्न(वर्तमान)नय की अपेक्षा जिस भाव से मुक्ति होती है उसे चारित्र भी नहीं कहा जा सकता और अचारित्र भी नहीं,अत: नाम रहित चारित्र से मुक्ति होती है!भूतप्रज्ञापननय से अव्यवहित रूप से यथाख्यात चारित्र से मुक्ति होती है!व्यवहित रूप से सामायिकी, छेदोपस्थापना, सूक्ष्मसाम्पराय , यथाख्यात चारित्र से मोक्ष प्राप्त होता है!जिन्हे परिहार विशुद्धि चारित्र होता है उन्हें पांचों चारित्र से मुक्ति होती है !अर्थात सामायिक,छेदोपस्थापना,यथाख्यातचरित्र ,या पांचों चारित्र धारण कर मुक्त होते है !
७-प्रत्येकबुद्धबोधित–अपने शक्ति रूप निमित्त से होने वाले ज्ञान के भेद से प्रत्येक बुद्ध होते है और परोपदेश रूप निमित्त से होने वाले ज्ञान के भेद से बोधितबुद्ध होते है!अर्थात किसी मुक्त जीव को स्वयं वैराग्य होता है और किसी को किसी के उपदेश द्वारा वैराग्य होता है!
८-ज्ञान-प्रत्युपन्न,वर्तमाननय की अपेक्षा जीव केवलज्ञान से ही सिद्ध होते है किन्तु भूतप्रज्ञापननय की अपेक्षा कोई मति-श्रुतज्ञानपूर्वक,कोई मति-श्रुत-अवधिज्ञानपूर्वकऔर कोई मति-श्रुत-अवधि-और मन: पर्यय ज्ञान पूर्वक,ज्ञान होता है अर्थात कोई एक ही ज्ञान से और कोई ३-४ ज्ञान से सिद्ध होते है!
९-अवगाहान-आत्मप्रदेश के फैलाव को अवगाहना कहते है!उत्कृष्ट अवगाहना ५२५ धनुष और जघन्य कुछ कम ३.५ हाथ है!प्रत्युपन्न ,वर्तमाननय की अपेक्षा,मुक्त जीव की अवगाहना अंतिम शरीर से कुछ कम होती है!किसी जीव,जैसे बाहुबली भगवान की अवगाहान उत्कृष्ट ५२५ धनुष और कोई जघन्य ३.५ हाथ से मोक्ष प्राप्त करते है!भगवान महावीर की सात हाथ थी!तीर्थंकरों की उत्कृष्ट अवगाहना ५०० धनुष होती है(ऋषभ देव भगवान)
१०-अंतर-एक सिद्ध से दुसरे सिद्ध होने का जघन्य अंतर २ समय और उत्कृष्टता से ८ समय है तथा विरह काल जघन्य से १ समय और उत्कृष्टता से ६ माह है!अर्थात यदि कोई जीव मुक्त नहीं हो रहा हो तो कम से कम १ समय और अधिक से अधिक ६ माह का अंतर(लगातार मोक्ष होने वाले जीवों में) पड़ सकता है
११-संख्या-जघन्य से १ समय में १ जीव ही सिद्ध होते है और उत्कृष्टता से १०८ जीव सिद्ध होते है !
१२-अल्पबहुत्वत:-वर्तमान नय की अपेक्षा सिद्ध क्षेत्रों में सिद्ध होने वाले जीवों का अल्पबहुत्व नहीं है!
क्षेत्रो आदि की अपेक्षा भेदों को प्राप्त जीवों की संख्या लेकर,परस्पर तुलना करना अल्पबहुत्व है!भूतपूर्व नय की अपेक्षा क्षेत्र सिद्ध के दो भेद जन्मसिद्ध और संहरण सिद्ध! इनमे संहरण सिद्ध न्यूनतम है,इनसे जन्म सिद्ध संख्यातगुणे है!
क्षेत्र का विभाग-कर्मभूमि,अकर्मभूमि,समुद्र,द्वीप,उर्ध्वलोक,मध्यलोक,अधोलोक और तिर्यगलोक है!उर्ध्व लोक से मुक्त थोड़े है,उनसे संख्यातगुणे जीव अधोलोक,इनसे संख्यातब गुणे तिर्यग/मध्य लोकसिद्ध है !
समुद्र से मुक्त जीव सबसे कम है!उससे संख्यातगुणे जीव द्वीपसिद्ध है यह सामान्य कथन है!
विशेष कथन से लवण समुद्रसिद्ध सबसे कम है इनसे कालोदधिसिद्ध संख्यातगुणे है,इनसे जम्बूद्वीपसिद्ध संख्यात गुणे है!इनसे धातकीखण्डसिद्ध संख्यातगुणे है!इनसे पुष्कार्द्धद्वीपसिद्ध संख्यातगुणे है!यह क्षेत्र की अपेक्षा अल्प बहुत्व हुआ !विदेह क्षेत्र से, भरत और ऐरावत क्षेत्र से अधिक जीव मुक्त होते है
काल की अपेक्षा अल्पबहुत्व-उत्सर्पिणी काल में न्यूनतम जीव सिद्ध होते है ,उससे अधिक अवसर्पिणी काल में इनसे संख्यात गुणे इन दोनों कालों की अपेक्षा रहित काल में सिद्ध जीव होते है क्योकि विदेह क्षेत्र में ये दोनों ही काल नहीं होते और वहां से जीव निरंतर मुक्त होते रहते है !वर्तमान की अपेक्षा ,एक समय में ही मुक्ति होती है अत:वहां अल्पबहुत्व नहीं है!भूतनय की अपेक्षा तिर्यंच से मनुष्यगति से सिद्ध जीव न्यूनतम है मनुष्य से मनुष्यगति प्राप्त मुक्त जीव उससे संख्यात गुणे है!देवगति से मनुष्य गति प्राप्त कर सिद्ध उससे संख्यात गुणे ,है !
वेद की अपेक्षा वर्तमाननय से वेद रहित जीव मुक्त होते है!भूतनय से नपुंसक से श्रेणी चढ़ कर मुक्त जीव सबसे कम स्त्री वेद से श्रेणी चढ़ कर उससे संख्यात गुणे और पुरुष वेद से श्रेणी चढ़ कर मुक्त जीव उससे संख्यात गुणे है !
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण
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उमास्वामीआचार्यश्री नवम अध्याय में ४७ सूत्रों के माध्यम से पांचवे;”संवर”और छटे”निर्जरा ” तत्वों को उपदेशित किया है!सूत्र १ में,संवरतत्व ,सूत्र २ में,संवर के उपाय,सूत्र-३ में निर्जरा तत्व,सूत्र ४ में -गुप्ती के भेद,सूत्र ५ में-समितियों के भेद,सूत्र ६ में -दसधर्मो के भेद,सूत्र ७ में-अनुप्रेक्षाओ के भेद,सूत्र ८-१७ तक परिषहजय और उनके भेद,सूत्र १८ में चारित्र के भेद,१९-२८ तक तप के भेद,२९-४४ तक ध्यान के भेद,४५ सूत्र में सम्यग्दृष्टि से जिनेन्द्र भगवान् के कर्मों की निर्जरा ,सूत्र ४६ में मुनियों के भेद,सूत्र ४७ में मुनि के संयम लब्धि के स्थानों का उल्लेख किया है!अपने कर्मों का संवर और निर्जरा आचर्यश्री के उपदेशों का पालन कर कल्याण के लिए पुरुषार्थ करना चाहिए !
संवर का लक्षण :-
आस्रव: निरोध: संवर: !!१!!
संधि विच्छेद:-आस्रव:+निरोध:+संवर:
शब्दार्थ-आस्रव:-आस्रव का ,निरोध:-रुकना ,संवर:-संवर है
अर्थ-आस्रव का निरोध संवर है!कर्मो का आत्मा में आना आस्रव और उन कर्मों के आने के कारणों को दूर कर रुकना संवर है!
विशेष:
१-आस्रव के दो भेद;
१-द्रव्यास्राव:कार्माणवर्गणाओ/पुद्गल परमाणुओं का आत्मा की ऒर आना द्रव्यास्राव है और
२-भावास्रव-जिन परिणामों के कारण द्रव्यस्रव होता है वह भावास्रव है!\
संवर के भी दो भेद ,१-द्रव्यसंवर-कार्माण वर्गणाओ का आत्मा की ऒर आने से रुकना द्रव्यसंवर
और
२–भावसंवर-आत्मा के जिन परिणामों के कारण द्रव्यसंवर होता है;भावसंवर है!
२-मिथ्यादर्शन से प्रथमगुणस्थान तक,बारहअविरति के कारण चौथे गुणस्थान तक,त्रस अविरति को छोड़कर,शेष ११ अविरति के कारण पाचवे गुणस्थान तक,प्रमाद के कारण छठे गुणस्थान तक,कषाय के कारण दसवें गुणस्थान तक,योग के कारण तेरहवे गुणस्थान तक आस्रव होता है !मिथ्यात्व के कारण पहले गुणस्थान तक आस्रव होता है और उसके बाद के शेष गुणस्थानों में मिथ्यात्व के अभाव में तत संबंधी मिथ्यात्व के कारण पड़ने वाली सोलह प्रकृतियों;मिथ्यात्व,नपुंसकवेद, नरकायु, नरकगति, एक सेचतुरेंद्रिय-४जाति,हुँडकसंस्थान,असंप्राप्तासृपाटिकासहनन,नरकगत्यानुपूर्वी, आतप,स्थावर, सूक्ष्म, अपर्याप्तक, और साधारण शरीर का संवर हो जाता है!
३-असंयम के तीन भेद-अनंतानुबंधी,अप्रत्यख्यानवरण,प्रत्याख्यावरण के उदय के निमित्त जिन कर्मों का आस्रव होता है,उनके अभाव में,उन कर्मों का संवर है!जैसे अनंतानुबंधी कषायोदय में असंयम की मुख्यता से,आस्रव को प्राप्त होने वाली निंद्रानिंद्रा,प्रचलाप्रचला,स्त्यानगृद्धि,अन्नतानुबन्धी (क्रोध,मान, माया,लोभ),स्त्रीवेद,तिर्यंचायु,तिर्यंचगति,चारमध्य के सहनन(वज्रनाराच,नाराच, अर्द्धनाराच और कीलित),चारसंस्थान(नयोगोध्रपरिमंडल,स्वाति,कुब्जक,वाम),तिर्यंचगत्यानुपूर्वी,उद्योत, अप्रशस्त विहायोगगति,दुर्भाग,दू:स्वर,अनादेय और नीच गोत्र , ये २५ प्रकृतियाँ एकेन्द्रिय से सासादान सम्यग्दृष्टि गुणस्थान तक के जीव के बंधती है,अत:अनंतानुबंधी के उदय से होने वाले असंयम के अभाव में आगे इनका संवर होता है !
४-अप्रत्याख्यान कषायोदय से होने वाले असंयम की मुख्यता से आस्रव को प्राप्त होने वाली अप्रत्याख्यान (क्रोध,मान,माया,लोभ),मनुष्यायु,मनुष्यगति,मनुष्यगत्यानुपूर्वी,औदारिकशरीर,औदारिकअंगोपांग, वज्रऋषभनाराचसहनन,इन दस प्रकृतियों का एकेन्द्रिय से असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान तक के जीव बंध करते है!अत:अप्रत्याख्यानावरण कषाय के उदय से होने वाले असंयम के अभाव में आगे इनका संवर होता है!विशेष बात है कि सम्यग्मिथ्यात्व गुणस्थान में आयुकर्म का बंध नहीं होता !
५-प्रत्याख्यानावरण कषाय के उदय में होने वाले असंयम की मुख्यता से आस्रव को प्राप्त होने वाली प्रत्या ख्यावरण(क्रोध,मान,माया,लोभ),इन चार प्रकृतियों का एकेन्द्रिय से पंचम गुणस्थान तक के जीव बंध करते है !अत:प्रत्यख्यानावरण के कषायोदय से होने वाले असंयम के अभाव में इनका संवर हो जाता है!प्रमाद के निमित्त से होने वाले कर्मो के आस्रव का संवर,उस प्रमाद के अभाव में छठे गुणस्था के आगे हो जाता है !
६-ये असातावेदनीय,अरति,शोक,अस्थिर,अशुभ और अयशकीर्ति ,छ प्रकृतियाँ है!देवायु के बंध का आरम्भ प्रमाद और उसके नजदीकी अप्रमाद हेतु भी होता है !अत:इसका अभाव होने पर उसका संवर जानना चाहिए!जिस कर्म का आस्रव मात्र कषाय के निमित्त से होता है,प्रमादादि के निमित्त से नहीं,उसका कषाय के अभाव में संवर ही है!प्रमादादि के आभाव में होने वाली कषाय तीव्र,मध्यम एवं जघन्य,तीन गुणस्थानों में अवस्थित है!उसमे अपूर्वकरण(८वे )गुणस्थान के प्रारम्भिक असंख्येय भाग में निद्रा और प्रचला प्रकृतियाँबंध को प्राप्त होती है!इसके आगे के संख्येय भाग में ३० प्रकृतियाँ-देव गति,पंचेन्द्रियजाति,(वैक्रियिक,आहारक,तेजस,कार्माण)शरीर,(वैक्रयिक,आहारक)अंगोपाग.समचतुर संस्थान(वर्ण,गंध, रस)शरीर,देवगत्यानुपूर्वी,अगुरुलघु,उपघात,परघात,उच्छ्वास, प्रशस्तविहायोग गति, त्रसबादर,पर्याप्त, प्रत्येक शरीर,स्थिर,शुभ,सुभग,सुस्वर,आदेय,निर्माण और तीर्थंकर बंध को प्राप्त होती है तथा इसी गुणस्थान में हास्य,रति,भय,जुगुप्सा चार प्रकृतियाँ बंध को प्राप्त होती है!ये तीव्र कषाय से आस्रव को प्राप्त होने वाली प्रकृतियाँ है इसलिए तीव्र कषाय का उत्तरोत्तर अभाव होने के कारण विवेक्षित भाग के आगे इनका संवर हो जाता है!
७-अनिवृत्ति बादर सम्प्राय,नौवे गुणस्थान के प्रथम समय से लेकर उसके संख्यात भागों में पुरुषवेद और संज्वलनक्रोध,दो प्रकृतियों का,इससे आगे शेष संख्यात भागों में संज्वलन मान और माया,दो प्रकृतियों का और उसी के अंतिम समय में संज्वलन लोभ का बंध होता है!इन प्रकृतियों का आस्रव मध्यम कषाय के निमित्त से होता है,अत:मध्यम कषाय का उत्तरोत्तर अभाव होने के कारण,विवक्षित भागों के आगे इन प्रकृतियों का संवर हो जाता है!मंदकषाय के निमित्त से आस्रव को प्राप्त करने वाली ज्ञानावरण की ५,दर्शनावरण की ४,यश कीर्ति,उच्च गोत्र और अंतराय कर्म की ५ ,कुल १६ प्रकृतियों का बंध जीव सूक्ष्म सम्प्राय १० वे गुणस्थान में करता है!अत: मंद कषाय का अभाव होने पर इनका आगे संवर हो जाता है!
८-केवल योग निमित्त से आस्रव को प्राप्त होने वाली सातावेदनीय का उपशांतकषाय(११वेगुणस्थान), क्षीणकषाय(१२वेगुणस्थान)और सयोगकेवली(१३वेगुणस्थान)में जीव के बंध होता है!१४वे गुण स्थान अयोगकेवली में,योग के अभाव में इनका संवर हो जाता है!वास्तव में ११,१२,१३ वे गुण स्थान में जो बंध उपचार से कहा है क्योकि यहाँ ईर्यापथ आस्रव होता है अर्थात एक समय में आत्मा में आने वाले कर्म बिना फल दिए अगले समय में ही चले जाते है !
९-संवर,जीवन में नए दोषों और उन दोषो के कारणों को एकत्रित नहीं होने देने का मार्ग है!संवर होने पर ही संचित दोषों व उनके कारणों का परिमार्जन किया जा सकता है!उसके बाद ही मुक्ति प्राप्त हो सकती है प्राणी मात्र को अपने कल्याण हेतु आस्रव के कारणों को समझकर उनसे बचकर संवर करना चाहिए संवर उपादेय है
संवर के उपाय-
सगुप्तिसमितिधर्मानुप्रेक्षापरीषहजयचारित्रैः!!२!!
संधि विच्छेद:-स+गुप्ति+समिति+धर्म+अनुप्रेक्षा+परीषहजय+चारित्रै:
शब्दार्थ-स-वह(संवर),गुप्ति,समिति,धर्म,अनुप्रेक्षा,परीषहजय और चारित्र से होता है !
अर्थ:-संवर ३ गुप्तियों-(मन,वचन,काय की प्रवृति रोकना गुप्ति है ),
समितियों-(जीवों की हिंसा से बचने के लिए मन,वचन,काय की प्रवृत्तियां (चलना,उठना,बैठना,ग्रहण करना,रखना,मोचन आदि) यत्नाचार पूर्वक करना समिति है!समिति के पांच भेद है-
ईर्यासमिति,भाषासमिति,ऐषणासमिति,आदाननिक्षेपणसमिति,प्रतिष्ठापन/व्युत्सर्गसमिति!
धर्म-जो संसार के दुखों दूर कर अभीष्ट स्थान,मोक्ष पहुंचा दे,वह धर्म है!धर्म के १० भेद है-
उत्तमक्षमा,उत्तममार्दव,उत्तमार्जव,उत्तमशौच,उत्तम सत्य उत्तामसंयम,उत्तमतप,उत्तमत्याग, उत्तम आकिंचन,उत्तम ब्रह्मचर्य !
अनुप्रेक्षा-संसार,शरीरादि के स्वरुप का पुन:पुन:चिंतवन करना अनुप्रेक्षा है,अनुप्रेक्षा/भावना १२ भेद है –
अनित्यभावना,अशरणभावना,संसारभावना,एकत्वभावना,अन्यत्वभावना,अशुचिभावना,आस्रवभावना, संवरभावना,निर्जराभावना,लोकभावना,बोधिदुर्लभभावना,धर्मभावना!
परीषहजय-क्षुधा,तृषा,ठंड,गर्मी आदि की वेदना होने पर,कर्मों की निर्जरा के लिए,शांति पूर्वक सहना परीषहजय है.इसके २२ भेद है-शुधा,तृषा,शीत, उष्ण,दंशमशक,नग्नता,अरति, स्त्री,चर्या, निषधा, शैया, आक्रोश,वध,याचना,अलाभ,रोग,तृण स्पर्श,मल,सत्कार पुरूस्कार,प्रज्ञा,अज्ञान,अदर्शन !
चारित्र-संसार भ्रमण से बचने के लिए,कर्म बंध योग्य क्रियाओं का त्यागना चारित्र है !इसके ५ भेद है –
सामयिक,छेदोपस्थापना,परिहारविशुद्धि,सूक्ष्म सम्प्राय और यथाख्यात
भावार्थ-गुप्ति,समिति,धर्म,अनुप्रेक्षा,परीषहजय और चारित्र धारण करने से कर्मों का आस्रव रुकेगा, इन्ही से संवर होगा,जो की सूत्र में ‘स’ पद से सूचित होता है!इस कथन से तीर्थयात्रा करने,अभिषेक करने,दीक्षालेने,उपहार स्वरुप शीर्ष अर्पण करने अथवा देवताओं की आराधना आदि करने का निराकरण हो जाता है!मन,वचन काय की प्रवृत्ति के कारण आस्रव होता है,इनकी प्रवृत्ति को रोकने से कर्मों का संवर होता है! उक्त छ: संवर में कारण है
निर्जरा-संवर के कारण
तपसा निर्जराच !!३!!
संधि विच्छेद-तपसा+निर्जरा+च
शब्दार्थ-तपसा -तप से,निर्जरा-कर्मों की निर्जरा भी होती हैं ,च-और संवर भी होता है
अर्थ:-तप से निर्जर भी होती है !
भावार्थ-तप से संवर होता है और निर्जर भी होती है
विशेष-यद्यपि तप का अंतर्भाव १० धर्मों में हो जाता है किन्तु तप को अलग से कहने का भाव है कि इससे नवीन कर्मों का आना भी रुक जाता है और पूर्व बंधे कर्मों की निर्जरा भी होती है तथा तप संवर का मुख्य कारण है !
शंका-तप को सांसारिक अभ्युदय का कारण माना है क्योकि उसे देवेन्द्रादि पदों के प्राप्ति का कारण माना है,अत: वह निर्जरा का कारण कैसे हो सकता है ?
समाधान-तप का प्रमुख फल,कर्मों का क्षय ही है और गौण फल सांसारिक अभ्युदय की प्राप्ति है जैसे, गेहूं की खेती मे प्रधान फल गेहूं उत्पन्न करना है,और गौण फल भूस है!इसी प्रकार तप भी अनेक कार्य करता है!अत:तप अभ्युदय एवं कर्म क्षय,दोनों का हेतु है !
गुप्ति के लक्षण और भेद-
सम्यग्योगनिग्रहोगुप्ति:!!४ !!
संधि विच्छेद-सम्यग्योग+निग्रहो+ गुप्ति:
शब्दार्थ-सम्यग्योग-भली प्रकार,अर्थात प्रशंन्सा/वाहवाही के लिए नहीं वरन आत्मकल्याण के लिए ,योग – मन,वचन,काय के की प्रवृत्ति,निग्रहो -को रोकना ,गुप्ति -गुप्ति है!
भावार्थ-मन की प्रवृत्ति रोकना मनोगुप्ति.वचन की प्रवृत्ति को रोकना वचनगुप्ति और काय के प्रवृत्ति रोकना कायगुप्ति है!आचार्यों ने यहाँ अशुभ प्रवृत्ति को रोककर शुभ प्रवृत्ति करना भी गुप्ति कहा है!
विशेष-योग अर्थात मन,वचन,काय की स्वछन्द प्रवृति रोकना निग्रह है सम्यक विशेषण से लौकिक प्रतिष्ठा अथवा विषय सुख की अभिलाषा से मन वचन काय की प्रवृत्ति का निषेध किया है!अर्थात लौकिक प्रतिष्ठा अथवा सुख की वांछा से मन वचन काय की प्रवृत्ति को रोकना गुप्ती नहीं है !अत: जिसमे परिणामों में किसी प्रकार का संक्लेश पैदा नहीं हो,इस रीति से मन वचन काय की स्वेच्छा चारिता को रोकने से,उसके निमित्त से होने वाले कर्मों का आस्रव नहीं होता ,उस गुप्ती के मनोगुप्ति, वचनगुप्ति और कायगुप्ती तीन भेद है!
यद्यपि मुनिराज मन,वचन,काय की प्रवृत्ति को रोकते है किन्तु उन्हें भी आहार,निहार और विहार के लिए प्रवृत्ति अवश्य करनी पड़ती है !
समिति के भेद –
ईर्या-भाषैषणादान-निक्षेपोत्सर्गाःसमितयः ५
संधि विच्छेद-ईर्या +भाषा+ऐषणा+आदान+निक्षेपण+उत्सर्गा+समितय:
अर्थ-ईर्यासमिति,भाषासमिति,ऐषणासमिति,आदाननिक्षेपणसमिति और उत्सर्गसमिति ,५ समितियां है! यहाँ भी सम्यक पद की पुनरावृत्ति होती है!
सम्यक ईर्यासमिति-चार-हाथ जमीन देखकर इस भाव से चलना की किसी जीव की हिंसा नहीं हो जाये,ईर्या समिति है !
सम्यकभाषासमिति-हित-मित.प्रिय वचन बोलना, भाषासमिति है!
सम्यकऐषणासमिति -४६ दोषों से रहित निरन्तराय आहार ग्रहण करना ऐषणा समिति है!
सम्यकआदाननिक्षेपणसमिति-सावधानी पूर्वक,इस भाव से कि किसी जीव की हिंसा नहीं हो जाए वस्तु स्थान से उठाना और पीछी से स्थान साफ़ कर वस्तु रखना,आदाननिक्षेपण समिति है !
सम्यकउत्सर्गसमिति-मल,मूत्र ,कफ आदि क्षेपण करने से पहले उस स्थान को पिच्ची से साफ कर जीव रहित करना,उत्सर्ग समिति है!
पिच्छी के बिना गमन नहीं करना है अन्यथा समितियों का पालन न हो सकेगा,आज कल पिच्ची को आशीर्वाद देने का उपकरण बना लिया गया है,गलत है ,ऐसे नहीं है,वह तो मुनिराज के पास भूमिस्थान आदि के शोधन हेतु होती है! संयम का उपकरण है!
धर्म के भेद –
उत्तमक्षमामार्दवार्जवशौचसत्यसंयमतपस्त्यागाकिञ्चन्यब्रह्मचर्याणि धर्म: !!६!!
संधि विच्छेद:-
उत्तम+(क्षमा+ मार्दव+आर्जव+शौच+सत्य+संयम +तप+स्त्याग+आकिञ्चन्य +ब्रह्मचर्याणि+धर्म:
शब्दार्थ:-_
उत्तमक्षमा-सम्यग्दर्शन सहित,आत्मकल्याण के लिए क्षमा,क्रोधादि का प्रसंग आने पर रोक देना।क्रोध के निमित्त होने पर भी परिणामों में मलिनता को नियंत्रित कर क्रोधित नही होना !जैसे कोई भिक्षु आहार आदि लेने जाते समय किसी के द्वारा अपशब्द कहने पर (गाली आदि देने पर ),परिणामों में कलुषता नहीं आने दे, उत्तम क्षमा है !
उत्तममार्दव-सम्यग्दर्शन सहित ज्ञान,उत्तम कुल,उत्तम जाति,रूप,ऐश्वर्य,/ सम्पत्ति आदि होने पर घमंड नहीं करना, मार्दव धर्म है ,मार्दव से अभिप्राय मान/घमंड नही करने से है!
उत्तमआर्जाव-सम्यग्दर्शन सहित योगों (मन,वचन,काय) की कुटिलता नहीं होना उनमे सरलता होना /मायाचारी का अभाव होना/छल कपट नहीं करना,उत्तम आर्जव धर्म है
उत्तमशौच-सम्यग्दर्शन सहित लोभ का अत्यंत त्यागी होना,चार लोभ-जीवन,निरोगता,इन्द्रियों और योग्य सामग्री का भी लोभ नहीं होना ,उत्तम शौच धर्म है !
उत्तमसत्य -सम्यग्दर्शन सहित झूठ नहीं बोलना अर्थात रागद्वेष पूर्वक असत्य वचन का बोलने का त्यागी होना,हित -मीत वचन बोलना, उत्तम सत्य धर्म है !
उत्तमसंयम-सम्यग्दर्शन सहित,अर्थात ईर्या आदि समितियों का पालन करते हुए प्रवृत्त रहते हुए एकेंद्रिय स्थावर जीव से पंचेन्द्रिय षटकाय जीवों को किसी प्रकार की पीड़ा नहीं देते हुए उनकी रक्षा करना,प्राणी संयम है !स्वयं का पंचेंद्रियो और मन के विषयों में राग नहीं होना इन्द्रिय संयम है इन दोनों संयम का पालन उत्तम संयम है !
उत्तमतप-सम्यग्दर्शनसहित,अर्थात;अनशन,अवमौर्द्य,रसपरित्याग,वृत्तिपरिसंख्यान,विविक्तशय्या- सन,कायाकलेश,प्रायश्चित,विनय,वैयावृत्य,व्युत्सर्ग और ध्यान,१२ तपों को कर्मों के क्षय के लिए तपना, उत्तम तप है!
उत्तमत्याग- सम्यग्दर्शन सहित,चेतन और अचेतन परिग्रहों को/ममत्व को त्यागना ,त्याग है!यह उत्तम त्याग है !संयत के लिए चार प्रकार का दान देना,वस्तुओं से ममत्व छोडना त्याग है !
उत्तमआकिञ्चनय-सम्यग्दर्शन सहित;पर पदार्थों शरीर आदि से ममत्व भाव त्यागना ,पिच्ची,कमंडल से ममत्व छोड़,सिर्फ आत्मा को अपनी मानना ,उत्तम आकिंचन है
उत्तमब्रह्मचर्य-सम्यग्दर्शन सहित, स्त्री के साथ पूर्व में भोगे सुखों को स्मरण नहीं करना ,उन की कथा सुनने से विरत होकर और उनके साथ एक ही शैय्या पर नही बैठकर केवल स्वआत्मस्वरुप में लीन रहना,उत्तमब्रह्मचर्य है!
धर्म:-ये धर्म है!
भावार्थ-उत्तमक्षमा,उत्तममार्द्व,उत्तमआर्जव,उत्तमशौच,उत्तमसत्य,उत्तमसंयम,उत्तमतप,उत्तम त्याग, उत्तमआकिंचन,उत्तमब्रह्मचर्य ,ये दस धर्म संवर के कारण है !
विशेष-
१-इन १० धर्मों से, प्रतिकूल प्रवृत्ति होने से उत्पन्न परिणामो से जो आस्रव होता है,वह इनके अनुरूप प्रवृत्ति होने से,उत्पन्न परिणामो से रुक जाता है!अर्थात क्षमा धारण करने से क्रोध के द्वारा होने वाले आस्रव का निरोध होता है!
२-दसधर्म आत्मा के स्वभाव है,सत्य या शौच को पहले या पीछे रखने से कोई फर्क नहीं पड़ता ,तत्वार्थ सूत्र की परम्परा में पहले शौच है और बाद में सत्य है,दसों धर्म आत्मा में प्रति समय रहने चाहिए !
३-‘उत्तम’ विशेषण का अभिप्राय है की यदि क्षमा आदि किसी लौकिक प्रसिद्धि केप्रयोजन से करी जा रही है तो वह उत्तम क्षमा नहीं है
शंका-सत्य धर्म का अंतर्भाव भाषा समिति के अंतर्गत हो जाता है फिर इसमें क्या अंतर है?
समाधान-संयमी मनुष्य किसी साधूजनों/असाधुजनों से भी बातचीत करते हुए हितमित वचन ही बोलता है अन्यथा बहुत बातचीत करने से अनर्थदण्ड आदि दोष का भागी होता है,यह भाषा समिति है !
सत्य धर्म में प्रवृत्त मुनि/सज्जनपुरुष/दीक्षित अपनेके भक्तो में,सत्य वचन बोलता हुआ भी,ज्ञान चारित्र के शिक्षण के निमित्त से बहुविध कर्तव्यों की सूचना देते है!वह ये सब धर्मवृद्धि के अभिप्राय से करता है !इसलिए सत्य धर्म का, भाषासमिति में अंतर्भाव नहीं होता है!अर्थात सत्यधर्म में संयमीजनों को ,श्रावक को ज्ञान चरित्र की शिक्षा देने के उद्देश्य से अधिक बोलना पड़ता है जो की उचित है!
बारह अनुप्रेक्षाये –
अनित्याशरणसंसारैकत्वान्यत्वाशुच्यास्रव-संवर-निर्जारा-लोकबोधिदुर्लभधर्मस्वाख्यातत्त्वानु चिंतनमनुप्रेक्षा !!७ !!
संधिविच्छेद-अनित्य+अशरण+संसार+ऐकत्व+अन्यत्व+अशुचि+आस्रव+संवर+निर्जारा+लोक+बोधिदुर्लभ+धर्म+ स्वाख्या +तत्त्वानु+चिंतनं +अनुप्रेक्षा
शब्दार्थ-
अनित्य अशरण-संसार एकत्व अन्यत्व अशुचि आस्रव संवर-निर्जारा-लोक+बोधिदुर्लभ धर्म
स्वाख्या-इनका जैसे स्वरुप कहा गया है,तत्त्वानुचिंतन-उसी के अनुसार चिंतवन करना, अनुप्रेक्षा -अनुप्रेक्षा है!
भावार्थ-
अनित्य,अशरण,संसार,एकत्व,अन्यत्व,अशुचि,आस्रव,संवर,लोक,बोधिदुर्लभ और धर्म भावनाओं का जैसे स्वरुप कहा गया है तदानुसार (पुन:पुन:) चिंतवन करना अनुप्रेक्षा है !
उक्त बारह भावनाओ का आगमानुसार चिंतवन करना अनुप्रेक्षा है !
संवेग वैराग्य भाव के लिए इन १२ भावनाओ का चिंतवन हम सबको प्रात; काल उठकर करना चाहिए !
परीषह सहना –
मार्गाच्यवननिर्जरार्थपरिषोढव्याःपरीषहा:!८!
संधि विच्छेद-मार्ग+अच्यवन+निर्जरार्थ+परिषोढव्याः+परीषहा:
शब्दार्थ-मार्ग-मार्ग (संवरमार्ग से),अच्यवन-अच्युत होने के लिए,निर्जरार्थ-कर्मों की निर्जरा के लिए परिषोढव्याः-जो सहने योग्य है,परीषहा-परीषह है !
अर्थ-मार्ग से अच्युत रहने और कर्मों की निर्जरा हेतु सहने योग्य को परिषह: कहते है!
भावार्थ-संवर का प्रसंग होने से, संवर के मार्ग(लेना चाहिए) से अच्युत तथा कर्मों की निर्जरा रहने हेतु सहने योग्य को,परीषह है !
विशेष-जिनेन्द्र भगवान द्वारा सहने योग्य क्षुधा,तृषा,शीत,उष्ण,दंशमंडक,अरति आदि परीषहों के २२ भेद अगले सूत्र में बताये गए है!संवर से च्युत नहीं होकर कर्मों की निर्जरा के लिए आवश्यक है !यदि परीषह सहने का अभ्यास नहीं होगा तो मुनिराज के महाव्रतों का पालन,साधना आदि भली भांति नहीं हो पायेगी!जैसे मान लीजिये किसी दिन मुनिराज को आहार नहीं मिला और क्षुधा.तृषा आदि परीषह सहने का अभ्यास नहीं है तो साधना,तप समायिकी,ध्यान आदि में एकाग्रचित हो कर बैठ नहीं पायेगे क्योकि भूख और प्यास के कारण मन बार २ विचलित होगा,साधना में विघ्न पड़ेगा!
परीषहों के भेद -क्षुत्पिपासाशीतोष्णदंतमशकनाग्न्यारतिस्त्रीचर्यानिषध्याशय्याक्रोश वधयाचनालाभरोगतृणस्पर्शमलसत्कारपुरुस्कारप्रज्ञाज्ञानादर्शनानि ९ संधि विच्छेद -क्षुत+पिपासा शीत+उष्ण+दंतमशक+नाग्न्य+ अरति+स्त्री+चर्या+निषध्या+शय्या +आक्रोश +वध +याचना +लाभ +रोग + तृणस्पर्श+मल+सत्कारपुरुस्कार+प्रज्ञा+अज्ञान +अदर्शनानि
अर्थ -क्षुधा परीषह-आहार नहीं मिलने पर भूख को समता पूर्वक सहना क्षुधा परीषह जय है
पिपासा परीषह-प्यास को समता पूर्वक सहना पिपासा परीषह जय है!
शीतपरीषह-ठण्ड को बिना हीटर आदि का प्रयोग करे समतापूर्वक सहना,शीत परीषहजय है अन्यथा त्रस /स्थावर जीवों की हिंसा होती है,जिस से मुनिराज के अहिंसा महाव्रत का पालन नहीं हो पायेगा,!
उष्ण परीषह-गर्मी;बिना पंखे,कूलर,ए.सी चलाये समता पूर्वक सहना,उष्ण परीषहजयहै !अन्यथा त्रस/स्थावर जीवों की हिंसा होगी,जिस से अहिंसामहाव्रत का पालन नहीं होगा !
दंतमशक परीषह-मच्छर आदि के काटने पर भी समता परिणाम होना,दंतमशक परीषह जय है!
नाग्न्य परीषह-अपने नग्न स्वरुप के कारण ग्लानि का अनुभव नहीं करना,अपनी नग्नता को पिच्छी आदि से शर्म के कारण नहीं ढकना,नाग्न्य परीषह जय है!
अरति परीषह-कोई अरुचिकर ठहरने का स्थान मिलने पर उसके प्रति अरति भाव नहीं होना,जैसे पहले इस स्थान को ठीक करो अन्यथा मै यहाँ कैसे रहूंगा,ऐसा नहीं कहना ,अरति परीषह जय है !
स्त्री परीषह-स्त्रियों के द्वारा दूषित हाव भाव अथवा प्रदर्शन से रंचमात्र विकारी भावों को मन में नहीं आने देना स्त्रीपरीषह जय है !
चर्या परीषह गमन के समय थकने पर,रात्रि निकट होने पर,खेद खिन्न नहीं होना चर्यापरीषह जय है !
निषध्यापरीषह-ध्यान हेतु नियमितकाल पर्यन्त स्वीकृत आसन से विचलित नहीं होना,निषध्या परीषह जय है!
शय्यापरिषह-जीवों की रक्षा के लिए विषम कठोर,कंकरीले आदि स्थानों पर एक करवट से निंद्रा लेना और उनसे कष्ट होने पर भी शरीर को चलायमान नहीं करना शय्या परिषह जय है जय है
आक्रोश परीषह-दुष्ट जीवों के द्वारा अपशब्द कहे जाने क्रोधित नहीं होना,समता भाव से सहना आक्रोश परीषह जय है!
वध परीषह-किसी के द्वारा तलवार से प्रहार किये जाने पर भी उससे द्वेष रूप परिणाम नहीं होना वध परीषह जय है !
याचना परीषह-प्राणों का वियोग की स्थिति होने पर भी किसी से आहारादि की याचना नहीं करना,याचना परीषह जय है!
अलाभ परीषह-भिक्षा नहीं मिलने पर भी समता पूर्वक सहना ,अलाभपरीषह जय है!
रोग परीषह-शरीर में रोग हो जाने पर ऐलोपथिक इलाज़ नहीं कराना,उसकी वेदना शांत परिणामों से सहना रोगपरीषह जय है
तृणस्पर्श परीषह-चलते समय पैरों में कंकड़,पत्थर आदि चुभे तो उन्हें शांत परिणामों के साथ सहना,तृणस्पर्श परीषह जय है
मल परीषह-मुनि महाराजों के शरीर में,त्रस/स्थावर जीवों की हिंसा से बचने के लिए,स्नान का त्याग होने के कारण,मल जमने पर भी उसको हटाने की व्यवस्था नहीं करवाना,उससे ग्लानी नहीं करना,मलपरीषह जय है !
सत्कारपुरुस्कार परीषह-किसी स्थान पर जाने पर कोई स्वागत सत्कारपुरुस्कार करने वाला नहीं मिलने पर रंचमात्र भी मन में कलुषता नहीं आने देना! यदि २०००-३०००-आदमी सत्कार के लिए आये तब भी तनिक मात्र घमंड नहीं करना,सत्कार पुरुस्कार परीषह जय है!प्रज्ञा परीषह-ज्ञान की अधिकता होने पर भी घमंड नहीं ,सत्कार पुरूस्कारपरिषहजय है!
प्रज्ञा परिषह-शास्त्र का ज्ञान होने पर भी कोई कहे कि इन्हे कुछ नहीं आता ,ऐसे वचनों को सहना प्रज्ञा परिषह जय है !
अज्ञानपरीषह-ज्ञान की कमी होनेपर,अन्य ज्ञानियों द्वारा तिरिस्करित होने पर शांत भाव से सहना, अज्ञान परीषह जय है!
अदर्शनपरीषह -बहुत समय तक तपश्चरण करने पर भी ज्ञान,ऋद्धियों आदि उपलब्ध नहीं होने पर,भी अश्रद्धान भाव नहीं होना ,अदर्शन परीषह जय है!
इस प्रकार आचार्य उमा स्वामी जी ने आगमानुसार २२ परीषह बताये है जिन पर मुनिराजों को जय करना अत्यंत आवश्यक है!
१०वे ,११वे,एवं १२वे वें गुणस्थानों में परिषह:-
सूक्ष्म-साम्प्रायच्छद्मस्थवीतरागयो श्चतुर्दशा !!१० !!
संधि विच्छेद-सूक्ष्म-साम्प्राय:+ छद्मस्थ+वीतरागयो: चतुर्दशा
शब्दार्थ-सूक्ष्मसाम्प्राय-सूक्ष्मसाम्पराय(१०वेगुणस्थान), छद्मस्थवीतराग अर्थात उपशांतमोह ११वे गुण स्थान -वीतरागयो-वीतराग -क्षीण मोह ;१२वे गुणस्थान में, चतुर्दशा-चार+दस अर्थात १४ परिषह होते है !
अर्थ-१०वे सूक्ष्मसाम्पराय,११वे उपशांतमोह और १२वे वीतराग (क्षीणकषाय गुणस्थानों) में १४ परिषह ही होते है !
इन गुणस्थानों में १४ परिषह; क्षुधा,तृषा,शीत,उष्ण दंशमशक,चर्या,शय्या,वध,अलाभ,रोग, तृणस्पर्श, मल, प्रज्ञा और अज्ञान होती है
शंका-११वे और १२वे गुणस्थान में मोहनीयकर्म का पूर्णतया क्षय होजाने से,उसके उदय में होने वाले ८ परिषह नही होते किन्तु दसवे गुणस्थान में तो मोहनीय कर्म के संज्वलन लोभ का उदय होता है फिर ये ८ परिषह क्यों नहीं होते ?
समाधान-१० वे गुणस्थान में चूँकि संज्वलनलोभ कषाय का अत्यंक सूक्ष्म उदय रहता है इसलिए वह भी वीतराग छद्मस्थ के तुल्य है ,अत; मोहनीय कर्म के उदय में होने वाली ८ परिषह वहां नहीं होती !
शंका -इन स्थानों में मोह के उदय की सहायता नही होने से और मंद उदय होने से क्षुधादि वेदना का अभाव है इसलिए इनके कार्य रूप से ‘परिषह सज्ञा युक्ति को प्राप्त नहीं होती !
समाधान-ऐसा नहीं है क्योकि यहाँ शक्ति मात्र विवक्षित है! जिस प्रकार सर्वार्थसिद्धि के देव के सातवी पृथ्वी तक गमन के सामर्थ्य के निर्देश है उसी प्रकार यहाँ भी जानना चाहिए !
सयोगकेवली १३ वे गुणस्थान में परिषह –
एकादशजिने!!११ !!
सन्धिविच्छेद -एकादश+जिने
शब्दार्थ-एकादश-ग्यारह परिषह संभव है ,जिने-जिनेन्द्र भगवान् के
अर्थ-जिनेन्द्र भगवान के ११ परिषह होती है
भावार्थ-संयोगकेवली ,१३वे गुणस्थान में जिनेन्द्र भगवान के उक्त १४ परीषहों में से अलाभ,प्रज्ञा और अज्ञान के अतिरिक्त शेष ११ परिषह होती है
विशेष-जिनेन्द्र भगवान ने यद्यपि चार घातिया कर्मों का क्षय कर लिया है किन्तु वेदनीयकर्म का सद्भाव होने के निमित्तक से ११ परिषह होते है !
शंका-केवली ११ परिषह में क्षुधा /प्यास भी है तो उन्हें भूख प्यास की बांधा होनी चाहिए ?
समाधान-मोहनीयकर्म के क्षय से,उसके उदय का अभाव होने पर वेदनीयकर्म में भूख-प्यास की वेदना उत्पन्न करने की शक्ति नहीं रहती है!घतियाकर्मों के क्षय से उत्पन्न चतुष्टाय से युक्त केवली भगवान के अंतरायकर्मों का अभाव होता है और निरंतर शुभ नो कर्म वर्गणाओं का संचय होता है इन परिस्थिति यों में निसहाय वेदनीय कर्म अपना कार्य नहीं कर पाता इसलिए केवली भगवान को भूख /प्यास की वेदना नही होती !केवली के वेदनीय कर्म का सद्भाव है इस अपेक्षा उपचार से उनके ११ परिषह कहे गए है वास्तव में उनके एक भी परिषह नहीं होता !
युक्ति पूर्वक प्रमाण,केवली भगवन के क्षुधा,पिपासा आदि परिषह नहीं होते!
१-केवली जिन के शरीर में निगोदिया और त्रस जीव का अभाव १२वे,क्षीणमोह गुणस्थान में होकर वे परमौदारिक शरीर धारक होते है!अत:भूख,प्यास,रोगादि के कारणों का अभाव होने से उन्हें इनकी वेदना नहीं होती!देवों के शरीर में इन जीवों के अभाव में जी विशेषता होती है,उससे अनंतगुणी इनके शरीर में होती है !
२-श्रेणी आरोहण पर प्रशस्त प्रकृतियों का अनुभाग उत्तरोत्तर अनन्तगुणा प्रति समय बढ़ता है और अप्रशस्त प्रकृतियों का अनुभाग प्रति समय अनंत गुणा घटता जाता है ;सलिए १३वे गुणस्थान में असाता वेदनीय प्रकृति का उदय इतना प्रबल ही नहीं रहता की वह क्षुधा/पिपासा आदि परिषह से पीड़ित करे,जिससे उसे क्षुधादि जैसे कार्य का सूचक माना जा सके!
३-असातावेदनीय की उदीरणा छट्ठेगुणस्थान तक ही होती है,आगे नही,अत:उदीरणा के अभाव में वेदनीय कर्म क्षुधादि का वेदन कराने में असमर्थ है!जब केवली जिन के शरीर को पानी/भोजन की आवश्यकता ही नहीं है,तो इनके नहीं मिलने पर उन्हें शुधा/तृषा आदि कैसे हो सकती है?वेदनीयकर्म का कार्य शरीर में पानी और भोजन तत्व का अभाव करना नहीं है,उनका अभाव अन्य कारणों से होता है!हाँ इनके अभाव में वेदना का आभास होना वेदनीयकर्म का कार्य है!अब केवली जिन के शरीर को उनकी आवश्यकता ही नहीं रहती तब वेदनीयकर्म के निमित्त से तज्जनित वेदना कैसे हो सकती है!
४-केवली जिन के सातास्रव सदा काल होने से उसकी निर्जरा भी सदा काल होती है!इसलिए जिस काल में असाता का उदय होता है,उस काल में सिर्फ उसी का उदय नहीं होता बल्कि उसके साथ अनन्तगुणी साता के साथ वह उदय में आता है!यद्यपि उसका स्वमुख उदय होता है किन्तु वह प्रति समय बंधने वाले कर्म परमाणुओं की निर्जरा सहित होता रहता है!इसलिए असाता उदय वहां क्षुद्धादि रूप वेदना का कारण नहीं होता !
५-सुखदुख वेदन का वेदनीय कर्म का कार्य है किन्तु मोहनीयकर्म के अभाव में नहीं होता अर्थात मोहनीय कर्म के अभाव में सुख दुःख का वेदन कराने में वेदनीय कर्म असहाय है!केवली जिन के मोहनीय कर्म का अभाव होता है अत:क्षुधा,पिपासा रूप वेदनाओं का सद्भाव होना युक्ति संगत नहीं है !
उक्त पांच प्रमाणों से प्रमाणित होता है कि केवली भगवंतों को क्षुद्धादि ११ परिषह नहीं होते !सूत्र में उपचार से कहे गए है क्योकि वेदनीय कर्म का सद्भाव तो केवली को है!
छठे गुणस्थान तक परिषह-
बादरसाम्परायेसर्वे!!१२!!
संधि विच्छेद:-बादर+साम्पराये+सर्वे
शब्दार्थ-बादर-स्थूल,साम्पराये-कषाय तक,सर्वे-सभी परिषह होते है
अर्थ-स्थूल कषाय तक /छठे गुणस्थान तक सभी परिषह होते है !
भावार्थ-जीव के स्थूल कषाय अर्थात छठे गुणस्थान तक सभी २२ परिषह होते है!
विशेष-बादरसाम्पराय,अनिरिवृत्तिकरण नामक नौवे गुणस्थान का अन्त्दीपक न्याय से दूसरा नाम है!सूत्र में ‘बादरसाम्प्राय पद’ से इस गुणस्थान के ग्रहण के निषेध के लिए टीकाकार ने कथन किया है क्योकि बादर साम्प्राय(स्थूलकषाय) में तो २२ परिषह संभव है,किन्तु इस बादरसाम्प्राय नामक नौवे गुणस्थान में नहीं क्यो कि इस गुणस्थान में दर्शनमोहनीय का उदय नहीं होता!दर्शनमोहनीय की तीन प्रकृतियों में से,सम्यक्त्व मोहनीय का उदय ७ वे अप्रमत्त गुणस्थान तक ही सम्भव है क्योकि यही तक वेदक सम्यक्त्व होता है,इसलिए बादरसंपारायसम्प्राय अर्थात स्थूल कषाय में सब परिषह संभव है,यही अर्थ लेना चाहिए न की नौवे गुणस्थान तक !
ज्ञानावरण के उदय में होने वाली परिषह –
ज्ञानावरणेंप्रज्ञाज्ञाने!!१३!!
संधि विच्छेद-ज्ञान+आवरणें+प्रज्ञा+अज्ञाने
शब्दार्थ-ज्ञाना-ज्ञान,आवरणें-आवरण से,प्रज्ञा-प्रज्ञा और अज्ञान- दो परिषह होते है
अर्थ:-ज्ञानावरण के उदय में प्रज्ञा और अज्ञान,दो परिषह होते है !
शंका-ज्ञानावरण के उदय में अज्ञान परिषह होना ठीक है किन्तु प्रज्ञा कैसे हो सकता है क्योकि प्रज्ञा का अर्थ ज्ञान है,और ज्ञान आत्मा का स्वभाव है !
समाधान-प्रज्ञा परिषहजय का अर्थ ज्ञान का मद न होने देना है;मद,ज्ञानावरण उदय में ही होता है जिसके सम- स्त ज्ञानावरण नष्ट हो जाते है उसको ज्ञान का मद नहीं होता,अत; प्रज्ञा परिषह ज्ञानावरण के उदय में होता है
दर्शनमोह और अंतराय कर्म के उदय में होने वाले परिषह –
दर्शन-मोहान्तराययोरदर्शनालाभौ !!१४!!
संधि विच्छेद -दर्शन+मोहनीययो+अंतराययो:+अदर्शन+अलाभौ
शब्दार्थ-दर्शन-दर्शन,मोहनीययो-मोहनीय के,अंतराययो-अंतराय के उदय में,क्रमश:अदर्शन-अदर्शन,अलाभौ -अलाभ परिषह होते है !
अर्थ-दर्शन मोहनीय कर्म के उदय में अदर्शन और अंतराय कर्म के उदय में अलाभ परिषह होते है !
विशेष-
अदर्शन भाव मोहनीय कर्म और अलाभ भाव अंतराय करण के उदय में होते है का प्रमाण –
यहाँ दर्शन मोहनीय की सम्यक्त्वप्रकृति ली है जिसके उदय में चल,मल,अगाढ़ दोष उत्पन्न होते है!सम्यक्त्व रहते हुए भी आप्त,आगम और पदार्थों में नाना विकल्प होना चल दोष है!जिस प्रकार जल के स्थिर होते हुए भी, उसमे वायु के निमित्त से तरंगमाला उठती है उसी प्रकार सम्यग्दृष्टि अपने स्वरुप में स्थित रहता है किन्तु सम्यक्त्व मोहनीय के उदय में शंकादि के निमित्त से उसकी बुद्धि आप्त,आगम और पदार्थ के सदर्भ में चलाय मान रहती है,यह चल दोष है!मोहनीय के उदय में शंकादि के निमित्त सेसम्यक्त्व/ सम्यग्दर्शन का मलीन होना मल दोष है!सम्यग्दृष्टि जीव लौकिक प्रयोजनवश कदाचित तत्व चलायमान है यह अगाढ़ दोष है !जैसे सम्य ग्दृष्टि भली प्रकार जानता है की अन्य अन्य नहीं होता किन्तु रागवश वह स्थिर नहीं रह पाता !ये तीनों एक ही है फिर भी विभिन्न अभिप्राय की दृष्टि से पृथक पृथक इन्हे परिगणित किया है !प्रकृत में इसी दोष को ध्यान में रखते हुए अदर्शन परिषह का निर्देश दिया है!यह दर्शन मोहनीय के उदय में ही होता है यह दर्शन मोह का कार्य है!भोजन आदि पदार्थों का प्राप्त न होना अन्य बात है किन्तु भोजन आदि पदार्थ न मिलने पर जिस के ‘अलाभ’ परिणाम होता है उसका वह परिणाम लाभान्तराय कर्म का कार्य कहा है!पर के लाभ को स्व का लाभ मानना मिथ्यात्व दर्शन मोहनीय का कार्य है,इसकी विवक्षा यहाँ नहीं है !यहाँ तो अलाभ परिणाम किसके उदय में होता है,मात्र इतना ही विचारणीय है!इस प्रकार अदर्शन भाव मोहनीय कर्म और अलाभ लाभान्तराय कर्म का कार्य निश्चित हुए !
चारित्र मोह के उदय में होने वाले परिषह –
चारित्रमोहेनागन्यारतिस्त्रीनिषध्याक्रोशयाचनासत्कारपुरुस्कारा:!!१५!!
सन्धिविच्छेद-चारित्र +मोहे +नागन्या+अरति+स्त्री+निषध्य+आक्रोश+याचना+सत्कार पुरुस्कारा:
शब्दार्थ-चारित्र मोहे-चारित्र मोहनीय के,उदय में,नागन्या-नगनत्व ,अरति अरति ,स्त्री-स्त्री,निषध्य-निषध्या ,आक्रोश-आक्रोश,याचना-याचना,और सत्कार पुरुस्कारा:-सत्कार पुरूस्कार परिषह होते हैं !
अर्थ-चारित्र मोहनीय के उदय में नाग्न्य,अरति,स्त्री,निषध्या,आक्रोश,याचना और सत्कारपुरूस्कार सात परिषह होते है !
शंका-नाग्न्यादि परिषह पुंवेदोदय आदि के निमत्त से होने के कारण महोदय कहते है किन्तु निषध्या परिषह मोह के उदय के निमित्त से कैसे होता है ?
उसमे प्राणी पीड़ा के परिहार की मुख्यता होने से वह मोहोदयनिमित्तिक माना गया है,क्योकि महोदय के होने पर प्राणि के पीड़ा रूप परिणाम होते है !
यदि चर्या और शय्या,वेदनीय नैमित्तिक है तो इसे वेदनीय निमित्तक क्यों नहीं है जब कि ये दोनों एक ही श्रेणी के है !इसका उत्तर है कि प्राणी पीड़ा रूप परिणाम मोहोदय से होता है और निषध्या परिषह जय में इस प्रकार के परिणामों पर विजय पाने की मुख्यता है इसलिए इसे चारित्रमोह निमित्तक माना है!इस विवक्षा से शय्या और चर्या को भी मोहोदय निमित्तक मान सकते थे किन्तु वहां लंत्कादिक के निमित्त से होने वाली वेदना की मुख्यता करके उक्त दोनों को परिषह को वेदनीय निमित्तक कहा है!तातपर्य है कि चर्या,शय्या और निष ध्या,इनमे प्राणिपीड़ा और कण्टकादि निमित्तक वेदना,ये दोनों कार्य सम्भव है!इसलिए इन दोनों कार्यों का परिज्ञान कराने के लिए निषध्या मोहनिमित्तक और शेष दो को वेदनीय निमित्तक कहा है !
वेदनीय के उदय में होने वाले परिषह –
वेदनीये शेषा:!!१६!!
संधि विच्छेद-वेदनीय+शेषा:
शब्दार्थ-वेदनीय-वेदनीय के उदय में ,शेषा:-शेष ग्यारह परिषह होते है!
अर्थ-वेदनीय कर्म के उदय में शेष ग्यारह क्षुधा,तृषा,शीत,उष्ण,दंशमशक,चर्या,शय्या,वध,रोग,तृणस्पर्श,और मल परिषह होते है !
एक साथ होने वाले परिषह –
विशेषार्थ-
शरीर में भोजन/जल का कम होना,कंठ का सूखना,ठंडा /गर्म लगना किसी के द्वारा मारना,गाली गलौज करना, रोगग्रस्त होना,तिनकादि चुभना,शरीर में मल एकत्र होनादि अपने २ कारणों से होते है इनका कारण वेदनीय कर्म का उदय नहीं है,किन्तु इन कामों के होने पर भूख की/प्यास की वेदना कराना,वेदनीयकर्मोद्य का कार्य है
एकादयो भाज्या युगपदेकस्मिन्नैकोनविंशते:!!१७!!
सन्धिविच्छेद-एकादय:+भाज्य:+युगपत्+एकस्मिन्+आ+ऐकोनविंशते:
शब्दार्थ-एकादय:-एक को आदि लेकर,भाज्य:-विभक्त करना चाहिये,युगपत्-एक साथ,एकस्मिन्-एक जीव में,आ ऐकोनविंशते:-एक कम बीस अर्थात उन्नीस परिषह हो सकते है!
अर्थ-एक साथ एक जीव मे एक को आदि लेकर उन्नीस परिषह तक विभक्त करना चाहिए !
भावार्थ-एक जीव में एक समय में एक से लेकर अधिकतम १९ परिषह हो सकते है क्योकि शीत और उष्ण में से एक तथा शय्या,चर्याऔर निषध्या-तीन में से एक काल में ही परिषह होगा!अत: २२-५ +२ =१९ परिषह एक काल में किसी जीव के अधिकत्तम हो सकते है!
चारित्र के भेद –
सामायिकच्छेदोपस्थापनापरिहारविशुद्धिसूक्ष्मसाम्पराययथाख्यातमिति चारित्रम्!!१८!!
संधि विच्छेद-सामायिक:+छेदोपस्थापना+परिहारविशुद्धि+सूक्ष्मसाम्पराय+यथाख्यातं+इति+चारित्रम्
शब्दार्थ -सामायिक:+ छेदोपस्थापना +परिहारविशुद्धि+सूक्ष्मसाम्पराय +यथाख्यातं+इति+चारित्रम्
अर्थ-सामायिक:,छेदोपस्थापना,परिहारविशुद्धि,सूक्ष्मसामपराय और यथाख्यात चारित्र के ५ भेद है !
सामयिक चारित्र-सम्पूर्ण सावध्य योग अर्थात समस्त पापरूप कार्यों का त्याग कर,धारण किया चारित्र सामायिकचारित्र है,छठे से नौवे गुणस्थान के मुनिराज के होता है!सामयिकी स्वाध्याय नियतकाल और ईर्या पथ अनियतकाल दो भेद की है !
छेदोपस्थापना चारित्र-प्रमादवश सामायिकचारित्र में लगे दोषों का प्रायश्चित से निवारण/छेदन कर,निर्दोष चारित्र धारण करना छेदोपस्थापना चारित्र है!समस्त सावद्य योगों का भेद सहित;हिंसा,झूठ,चोरी,कुशील और परिग्रह का त्याग छेदोपस्थापना चारित्र है!ये भी छठे से नौवें गुणस्थानवर्ती मुनिराज के होता है!
परिहारविशुद्धि चारित्र-जिस चारित्र में प्राणि को हिंसा की सर्वथा निवृत्ति होने से विशेष विशुद्धि प्राप्त होती है वह परिहारविशुद्धि चारित्र है!जिसने अपने जन्म से ३० वर्ष आयु तक सुख पूर्वक जीवन व्यतीत कर,जिन दीक्षा ले कर तीर्थंकर के पादमूल में रह कर,८ वर्ष तक प्रत्याख्यान नामक ९वे पूर्व को पढ़ा हो और तीनो सांध्य कालों को छोड़ कर २ कोस विहार करने का नियम लिया हो,ऐसे दुर्धर चर्या के पालक मुनिराज का ही परिहारविशुद्धि चारित्र होता है!इस चारित्र के धारक के शरीर से जीवो का घात नहीं होता है!इसीलिए इसे परिहारविशुद्धि चारित्र कहते है ये छठे से नौवे गुणस्थानवर्ती मुनिराज के होता है!
सूक्ष्मसाम्पराय चारित्र-अत्यंत सूक्ष्म लोभकषायवश,१०वें गुणस्थान में रहने वाले चारित्र को सूक्ष्म साम्पराय चारित्र कहते है!जैसे मुझे तपस्या के फल स्वरुप मुक्ति ही मिल जाए,यह सूक्ष्म लोभ है !
यथाख्यात चारित्र-समस्त मोहनीयकर्म के उपशम या क्षय से आत्मा का निर्विकार स्वभाव होना यथाख्यात चारित्र है!इसको अथाख्यात चारित्र भी कहते है क्योकि अथ का अर्थ अनन्तर है और यह समस्त मोहनीय के क्षय अथवा उपशम के अंतर ही होता है!यथाख्यात इसलिए कहते है क्योकि आत्मा के स्वरुप के अनुरूप इस चारित्र का स्वरुप है !
सूत्र में ‘इति’ पद से सूचित होता है कि यथाख्यात चारित्र में सकल कर्मों के क्षय की पूर्ती हो जाती है!ये ११वे से १४वे गुणस्थानवर्ती मुनिराज के तथा गुणस्थान रहित सिद्ध परमेष्ठी के होता है !
विशुद्धि लब्धि-
१-सामयिकी चारित्र और छेदोपस्थापना चारित्र की जघन्य विशुद्धि अतिअल्प होती है,
२-परिहार विशुद्धि की जघन्य विशुद्धि सामयिकी चारित्र और छेदोपस्थापना चारित्र से अनन्तगुणी होती है,तथा उत्कृष्ट विशुद्धि लब्धि जघन्य से अनन्तगुणी होती है!
३-सूक्ष्म साम्पराय चारित्र की जघन्य विशुद्धिलब्धि,परिहार विशुद्धि की उत्कृष्ट विशुद्धि से अनंतगुणी होती है और जघन्य विशुद्धि लब्धि से उत्कृष्ट विशुद्धि लब्धि अनन्त गुणी होती है!\
४-यथाख्याचारित्र की विशुद्धि लब्धि ,सूक्ष्म साम्पराय चारित्र की उत्कृष्ट विशुद्धि लब्धि से अन्नंतगुणी होकर एक समान हो जाती है!
वृद्धिगत विशुद्धि के कारण ही सूत्र में चरित्रों को यथाक्रम रखा है!दस धर्म के अंतर्गत संयमधर्म में चारित्र का अंतर्भाव हो जाता है इसलिए वहां चारित्र को अलग से नहीं रखा!किन्तु समस्त कर्मों का क्षय चारित्र से ही होता है,यह दिखलाने के लिए यहां चारित्र का पृथक रूप से व्याख्यान किया है !
बाह्य तप के भेद –
अनशनावमौर्दयवृत्तिपरिसंख्यानरसपरित्यागविविक्तशय्यासनकायक्लेशबाह्यंतप:!!१९!!
संधिविच्छेद-अनशन+अवमौर्दय+वृत्तिपरिसंख्यान+रसपरित्याग+विविक्तशय्यासन+कायक्लेश+बाह्यं+तप:
अर्थ-बाह्य तप के अनशन,अवमौर्दय,वृत्तिपरिसंख्यान,रसपरित्याग,विविक्तशय्यासन,कायक्लेश छ भेद है!
भावार्थ-
१-अनशनतप-लौकिक फल;धन-सम्पत्ति,ख्याति,मंत्र सिद्धि आदि की अपेक्षा से रहित,राग द्वेष के उच्छेद, कर्मों के क्षय,ध्यान और संयम की सिद्धि के लिए चार प्रकार के आहार:-खाद्य,पेय,स्वाद्य और चाटय का त्याग करना अनशन तप है!
२-अवमौर्दयतप-राग भाव के लिए तथा स्वाध्याय एवं विचारों की शांति तथा संतोष के लिए भूख से अल्प आहार ग्रहण करना अवमौर्दय तप है!भूख से एक कौर भी कम लेने से यह तप होता है!
३-वृत्तिपरिसंख्यान तप-भिक्षा ग्रहण करने के लिए जाते हुए मुनिराज कोई आंकडी (विधि)लेकर चलते है ,जिस चौके में वह विधि मिल जाती है उस में वे आहार ग्रहण करते है अन्यथा निराहार लौट जाते है!यह तप,भोजन की आशा को रोकने के लिए मुनिराज करते है! भगवान महावीर स्वामी,जब आहार लेने के लिए निकले तो उन्होंने बिधि ली,कि ” बेड़ियों से बंधी राजकुमारी से ही आहार लूँगा अन्यथा नहीं” उनके कर्मों के संयोग से,उन्हें चंदन बाला आहार देने के लिए मिलि ,विधि मिलने पर ही उन्होंने आहार ग्रहण किया!
४-रसपरित्याग तप-इन्द्रियों के दमन और निंद्रा पर विजय एवं सुख पूर्वक स्वाध्याय के लिए इसमें मुनिराज १,२,३,४,५,अथवा ६ (घी,दूध,दही,तेल,मीठा,नमक) रसों का त्याग कर आहार ग्रहण करते है!इन छ रसों में से किसी एक का त्याग करना रस परित्याग तप है!
५-विविक्तशय्यासन तप-ब्रह्मचर्य,स्वाध्याय एवं ध्यान की सिद्धि के लिए एकांत और पवित्र स्थान पर सोना, आसन लगाकर बैठना विविक्तशय्यासन तप है!
६-कायक्लेश तप -कष्ट सहने के अभ्यास तथा धर्म की प्रभावना की अभिवृद्धि हेतु ग्रीष्म ऋतू में वृक्ष के नीचे, बैठकर अथवा सर्दियों में खुले मैदान में ध्यान में लीन रहना,किसी पर्वत पर शीला पर में बैठकर ध्यान करना ,ये कायक्लेश तप के अंतर्गत है !
ये तप बाह्य में दीखते है तथा बाह्य द्रव्य भोजनादि के त्याग की अपेक्षा से किये जाते है इसलिए इन्हे बाह्य तप कहा जाता है !
परिषह और कायक्लेश में अंतर-परिषह स्वयं अपनी मर्ज़ी से आते है जबकि कायक्लेश स्वेच्छा से निमंत्रण देकर किया जाता है !
अभ्यंतर तप के भेद-
प्रायश्चित्तविनयवैय्यावर्त्यस्वाध्यायव्युत्सर्गध्यानान्युत्तरम्!!२०!!
संधि विच्छेद-प्रायश्चित्त+विनय+वैय्यावर्त्य+स्वाध्याय+व्युत्सर्ग+ध्यान+अन्युत्तरम्
शब्दार्थ-प्रायश्चित्त,विनय ,वैय्यावर्त्य, स्वाध्याय, व्युत्सर्ग ,ध्यान अभ्यंतर तप है
अर्थ-प्रायश्चित्त,विनय,वैय्यावर्त्य,स्वाध्याय,व्युत्सर्ग और ध्यान छ आभ्यांतर तप है !
भावार्थ-ये अभ्यंतर तप, मन को वश में करने के लिए किये जाते है और बाह्य में दीखते नहीं इसलिए इन्हे अभ्यांतर तप कहते है !इनके छ भेद निम्न है !
१-प्रायश्चित्त तप- में प्रमाद /अज्ञानतावश लगे दोषों के निवारण हेतु,दोषों को आचर्यश्री से बताकर ,समुचित प्रायश्चित लिया जाता है!
२-विनयतप- में पूजनीय पुरषों,रत्नत्रय और उनके धारको का यथायोग्य आदर सत्कार किया जाता है !
३-वैय्यावर्त्यतप- में शरीर अथवा अपने सहधर्मी मुनियों की सेवा करी जाती है !
४ -स्वाध्यायतप- में आलस्य त्याग कर आराधना करी जाती है
५-व्युत्सर्गतप -में बाह्य और अभ्यंतर २४ परिग्रहों का त्यागनाकिया जाता है और
६-ध्यानतप- में चित्त की चंचलता को नियंत्रित /रोककर उससे किसी एक पदार्थ पर एकाग्रचित कर उसका चिंतवन किया जाता है !
अभ्यन्तर तपों के उत्तर भेद-
नव-चतुर्दश पञ्च द्विभेदा यथाक्रमं प्रागध्यानात् !!२१!!
संधि विच्छेद-नव+चतु:+दश+पञ्च+द्वि+भेदा+यथाक्रमं+प्रागध्यानात्
शब्दार्थ-९,४,१०,५,२ भेद-भेद,यथाक्रमं -क्रमश, प्राग्- पहिले ,ध्यानात् -ध्यान से
अर्थ-ध्यान तप से पहिले क्रमश: प्रायश्चित के ९,विनय के चार,वैय्यावृत्य के १०,स्वाध्याय के ५ और व्युत्सर्ग तप के २ भेद है !
प्रायश्चित तप के भेद –
आलोचनाप्रतिक्रमणतदुभयविवेकव्युत्सर्गतपश्छेदपरिहारोपस्थापना: !!२२!!
सन्धिविच्छेद-
आलोचना+प्रतिक्रमण+तदुभय+विवेक+व्युत्सर्ग+तप:+छेद+परिहार+उपस्थापना:
शब्दार्थ-
आलोचना+प्रतिक्रमण +तदुभय +विवेक+ व्युत्सर्ग +तप:+छेद+परिहार+उपस्थापना:
अर्थ-आलोचना,प्रतिक्रमण,तदुभय (आलोचना और प्रतिक्रमण दोनों का),विवेक,व्युत्सर्ग , तप:,छेद,परिहार,उपस्थापना प्रायश्चित तप के भेद है !
भावार्थ-प्रायश्चित तप के निम्न ९ भेद है !
१-आलोचना प्रायश्चित तप-गुरु के समक्ष,दस दोषों रहित अपने प्रमाद के लिए प्रायश्चित का निवेदन करना,आलोचना प्रायश्चित तप है !
दस दोष-
१- अकम्पित दोष-आचार्य को पिच्छी कमण्डलु इस भाव से भेट करना की वे दया कर कम से कम प्रायश्चित दे !
२-अनुमापित दोष-गुरु से बातचीत कर प्रायश्चित का अनुमान लगाकर दोष के लिए प्रायश्चित का निवेदन करना !
३-दृष्ट दोष-किसी के दोष देखने पर ही प्रायश्चित का निवेदन करना किन्तु किसी के नही देखने पर प्रायश्चित का निवेदन नहीं करना !
४-बादर दोष-केवल स्थूल दोषों के लिए ही प्राश्चित के लिए निवेदन करना !
५-सूक्ष्म दोष-महान प्रायश्चित के भय से महान दोषों को छुपाकर सूक्ष्म दोषों के लिए प्रायश्चित का निवेदन करना !
६-छन दोष-महाराज से दोष का प्रायश्चित जानने के बाद,उनसे दोष के प्रायश्चित के लिए निवेदन करना!
७- शब्दा कुलित दोष-प्रतिक्रमण के दिन जब बहुत साधु आये हो,खूब शोर हो रहा हो रहा हो,उस समय दोष का निवेदन कर प्रायश्चित मांगना जिससे कोई सुन नहीं सके !८ -बहुजन दोष-अपने गुरु/आचर्य द्वार दिए गए प्रायश्चित को शंकित होकर अन्य साधुओं से पूछना,प्रायश्चित ठीक दिया या नही !
९ अव्यक्तदोष-अपने गुरु के समक्ष अपना दोष नहीं कह कर अन्य साधुओं से कहना!
१०-तत्सेवी दोष-गुरु से प्रमाद का निवेदन नहीं कर के,जिस साधु ने अपने समान अपराध किया ,उससे पूछना की तुम्हे गुरु ने क्या प्रायश्चित दिया था क्योकि तुम्हारे समान ही मेरा अपराध है !
२-प्रतिक्रमण प्रायश्चित तप -प्रमाद से जो दोष मुझ से हुआ वह मिथ्या हो!
इस प्रकार अपने दोष पर पश्चाताप कर गुरु से निवेदन करना,प्रतिक्रमण प्रायश्चित तप है !
३-तदुभय प्रायश्चित तप (आलोचना और प्रतिक्रमण दोनों का)-कोई दोष/अपराध केवल आलोचना अथवा प्रतिक्रमण से दूर हो जाता है और कोई इन दोनों से होता है,वही तदुभय प्रायश्चित है !
४-विवेक प्रायश्चित तप -सदोष आहार और उपकरणों का नियमित समय पर त्यागना विवेक प्रायश्चित तप है !
५-व्युत्सर्ग प्रायश्चित तप -कुछ समय के लिए कायोत्सर्ग करना व्युत्सर्ग प्रायश्चित तप है
६- तप प्रायश्चित तप -उपवासादि करना तप प्रायश्चित तप है !
७ छेद प्रायश्चित तप -दीक्षा को कुछ वर्षों के लिए छेदित कर, दीक्षा पुन: छेदित काल के अनुसार,लेना छेदित दीक्षा है!इसमें दीक्षा की प्राचीन वरिष्टता समाप्त होकर जितने समय का दीक्षा छेदन किया है,वहां से दीक्षा काल माना जार्ता है !
८-परिहार प्रायश्चित तप -कुछ समय के लिए संघ से पृथक करना परिहार प्रायश्चित तप है
९-उपस्थापना प्रायश्चिततप-पुरानी पूरी दीक्षा छेद कर नवीन तरह से दीक्षा लेना उपस्थापना प्रायश्चित तप है !
विशेष-प्रायश्चित =प्राय:+चित्त ,प्राय: का अर्थ अपराध और चित्त का अर्थ शुद्धि है अर्थात प्रायश्चित का अर्थ शोधन करना है !
विनय तप के भेद-
ज्ञानदर्शनचारित्रोपचारा: !!२३!!
सन्धिविच्छेद -ज्ञान+दर्शन+चारित्र+उपचारा:
शब्दार्थ-ज्ञानविनय,दर्शनविनय,चारित्रविनय और उपचार विनय,विनय तप के चार भेद है !
अर्थ-ज्ञान विनय,दर्शन विनय,चारित्र विनय और तपस्वियों की विनय ,विनय तप के चार भेद है !
भावार्थ-१-ज्ञानविनय तप-यथायोग्य काल में आदर पूर्वक,आलस्य त्याग कर,मोक्ष के लिए सम्यग्ज्ञान की प्राप्ति हेतु शास्त्रों के स्वाध्याय और स्मरण करना,ज्ञान विनयतप है
२-दर्शनविनय तप-शंकादि २५ दोषो रहित,सम्यग्दर्शन के आठ अंगों सहित,तत्वार्थ श्रद्धानदर्शन विनयतप है !
३-चारित्र विनय तप-सम्यग्दृष्टि के १३ भेद सहित चारित्र का निर्दोष धारण करना ,चारित्र विनय तप है और
४-उपचार विनयतप -आचार्यों और पूज्य पुरुषों के आने पर आदरपूर्वक खड़े होना ,उनके पीछे चलना,नमोस्तु ,उनके गुणों का स्मरण करना आदि उपचार विनयतप है
वैय्याव्रत्य तप के भेद –
आचार्योपाध्यायतपस्वीशैक्ष्यग्लानगणकुलसंघसाधुमनोज्ञानाम् !!२४!!
सन्धिविच्छेद-आचार्य+उपाध्याय+तपस्वी+शैक्ष्य+ग्लान+गण+कुल+संघ+साधु+मनोज्ञानाम्
शब्दार्थ-आचार्य+उपाध्याय+तपस्वी+शैक्ष्य+ग्लान+गण+कुल+संघ+साधु+मनोज्ञानाम्
अर्थ-आचार्य वैय्यावृत्य,उपाध्याय वैय्यावृत्य,तपस्वी वैय्यावृत्य,शैक्ष्य वैय्यावृत्य,ग्लान वैय्यावृत्य,गण वैय्यावृत्य,कुलवैय्यावृत्य,संघवैय्यावृत्य,साधुवैय्यावृत्य और मनोज्ञ वैय्यावृत्य,वैय्यावृत्य तप के १० भेद है !
भावार्थ- वैय्याव्रत्य तप १०-भेद है –
१-आचार्य वैय्यावृत्य- जो पंचाचार का स्वयं पालन करते हुए संघ के अन्य मुनियों से करवाते है,आचार्य है !
२-उपाध्याय वैय्यावृत्य-मोक्ष के लिए जिन मुनि के पास जाकर शास्त्रों को अभ्यास करते है वे उपाध्याय है !
३-तपस्वी वैय्यावृत्य-महोपवास आदि का अनुष्ठान करने वाले तपस्वी है
४-शैक्ष्य वैय्यावृत्य-शिक्षा लेने वाले साधु शैक्ष्य है !
५-ग्लान वैय्यावृत्य-रोग से ग्रस्त साधु ग्लान कहलाते है !
६-गण वैय्यावृत्य-वृद्ध मुनियों के अनुसार चलने वाले साधु गण है !
७-कुल वैय्यावृत्य-एक ही आचार्य द्वारा दीक्षित शिष्य कुल है !
८-संघ वैय्यावृत्य-ऋषि,यति,मुनि,अंगार इन चार प्रकार के मुनियों का समूह संघ है
९-साधु वैय्यावृत्य-से दीक्षित मुनि साधु है और
१०-मनोज्ञ वैय्यावृत्य-लोक में ख्याति प्राप्त साधु है !
उक्त दस प्रकार के साधु की वैयावृत्य तप के १० भेद साधुओं के भेद की अपेक्षा है !
स्वाध्याय तप के भेद-
वाचनाप्रच्छनानुप्रेक्षाम्नायधर्मोपदेशा:!!२५!!
सन्धिविच्छेद-वाचना+प्रच्छना+अनुप्रेक्षा+आम्नाय+धर्मोपदेशा:
शब्दार्थ-वाचना-वाचन करना, प्रच्छना-प्रश्नो पूछने,अनुप्रेक्षा-स्वधाय का पुन :चिंतवन करना,आम्नाय-सूत्रों/ गाथाओं का शुद्धता से पाठन करना,धर्मोपदेशा:- स्वाध्याय द्वारा योग्यता प्राप्त करने के बाद धर्मोपदेश देना
अर्थ-स्वाध्याय तप के वाचना ,प्रच्छना,अनुप्रेक्षा,आम्नाये धर्मोपदेश ,५ भेद है !
भावार्थ-स्वाध्यात्य तप के निम्न पांच भेद है !
१-वाचना स्वाध्याय तप-निर्दोष धर्म ग्रंथों को इच्छुक, विनयशील पात्रों को देना/ उनका अर्थ बताना/या दोनों करना वाचना स्वाध्याय तप है
२-प्रच्छना स्वाध्याय तप-संशय के दूर करने के उदेश्य से अथवा कृत निर्णय की दृढ़ता करने के लिए विशिष्ट ज्ञानियों से प्रश्न करना,प्रच्छना स्वाध्याय तप है !
३-अनुप्रेक्षा स्वाध्याय तप -स्वाध्याय द्वारा जाने गए पदार्थों का मन ही मन बार बार चिंतवन करना,अनुप्रेक्षा स्वाध्याय तप है
४-आम्नाये स्वाध्याय तप-शुद्धता पूर्वक शब्दों का उच्चारण करते हुए पाठन करना ,आम्नाये स्वाध्याय तप है !तथा
५-धर्मोपदेश स्वाध्याय तप -जीवों के कल्याण की भावना से धर्मोपदेश देना, धर्मोपदेश स्वाध्याय तप है !
विशेष-स्वाध्याय से ज्ञान ,वैराग्य भावना की अभिवृद्धि होती है और वह व्रतों का निर्दोष अतिचार रहित पालन में सहायक होता है!मन की स्थिरता के लिए स्वाध्याय से बढ़कर अन्य उपाय नहीं है क्योकि इससे आप सही शास्त्र जी का स्वाध्याय करने से,वस्तु स्थिति की वास्तविकता को ज्ञात करते है और जो शास्त्रों में फर्जी वाड़ा चल बचते हुए जिनवाणी के असली मर्म को जान पाते है !
व्युत्सर्ग तप के भेद –
बाह्याभ्यन्तरोपध्यो: !!२६!!
संधि विच्छेद-बाह्य+अभ्यन्तर+उपध्यो:
शब्दार्थ- बाह्य-बाह्य,अभ्यन्तर-अभ्यंतर,उपध्यो:-उपधि -त्याग
अर्थ-व्युत्सर्ग का अर्थ त्याग है!इसके बाह्य और अभ्यंतर त्याग दो भेद है !
बाह्य (त्याग) व्युत्सर्ग तप-धन ,सम्पत्ति आदि का त्याग करना बाह्य त्याग व्युत्सर्ग तप है !
अभ्यंतर (त्याग) व्युत्सर्ग तप-क्रोध मान माया लोभ अभ्यंतर कषायों का त्याग करना अभ्यंतर त्याग व्युत्सर्ग तप है!कुछ समय के लिए अथवा जीवन पर्यन्त ममत्व/काय का त्याग करना अभ्यंतर उपधि (त्याग) व्युत्सर्ग तप है!इस से जीव के तृष्णा नहीं रहती,वह निर्भय होकर हल्का हो जाता है !
शंका-पञ्च महाव्रतों में परिग्रह का त्याग,दस धर्मों में त्याग धर्म,और नौ प्रायश्चितों में व्युत्सर्ग प्रायश्चित का उपदेश दिया है फिर व्युत्सर्ग तप अलग से क्यों कहा है?इसमें एक ही तत्व का पुन;पुन:कहने से पुनरोक्त दोष लगता है !
समाधान-पञ्च महाव्रतों में,परिग्रह त्याग महाव्रत में गृहस्थ संबंधी उपधि-त्याग की त्याग धर्म में आहारादि विषयक आसक्ति कम करने की,व्युत्सर्ग प्रायश्चित में परिग्रह धर्म में लगने वाले दोषों के परिमार्जन की और व्युत्सर्ग तप में आत्मा से जुदा धन/धान्य बाह्य व मनोविकार तथा शरीर आदि के अभ्यंतरउपधि में आसक्ति के त्याग की प्रधानता है!अत:पुनरोक्त दोष नहीं आता !
ध्यान तप के लक्षण –
उत्तमसंहननस्यैकाग्र चिन्ता निरोधो ध्यानमान्तर्मुहूर्तात् !!२७!!
संधि विच्छेद-उत्तम+संहननस्य+एकाग्र+चिन्ता+निरोध:+ ध्यानम्+अन्तर्मुहूर्तात्
शब्दार्थ-उत्तम-उत्तम,संहननस्य-सहनन वाले का ,एकाग्र-एकाग्रता से,चिन्ता-चिंता को ,निरोध:-रोकना , ध्यानम्-ध्यान है,अन्तर्मुहूर्तात्-अन्तर्मुहूर्त पर्यन्त
अर्थ-उत्तम सहनन से युक्त जीव का अन्तर्मुहूर्त पर्यन्त चिंता रोकना ध्यान है !
भावार्थ-उत्तम सहनन,से युक्त मनुष्यों द्वारा अपने चित्त की वृत्ति को,समस्त विकल्पों से हटाकर किसी एक विषय पर अधिकत्तम एक अन्तर्मुर्हूत एकाग्रता पूर्वक लगाना,ध्यान है
विशेष-
१-ध्यान-अपने चित्त को समस्त विकल्पों से हटाकर एक ही विषय/पदार्थ पर एकाग्रचित करना,ध्यान है
२-ध्याता -ध्यान; तीन उत्तम सहनन;वज्रऋषभनाराचसहनन,वज्रनाराचसहनन और नाराचसहनन में से किसी एक से युक्त मनुष्य ही ध्यान लगा सकते है !ध्यान लगाने वाला ध्याता कहलाता है
३-उत्तम सहनन से युक्त मनुष्य के ध्यान अन्तर्मुर्हूत से अधिक समय नहीं लग सकता !
४- तीन में से किसी एक उत्तम सहनन से युक्त मनुष्य ध्यान तो लगा सकता है किन्तु मोक्ष के लिए वज्रऋषभ नाराच आवश्यक है !
शंका- ध्यान अधिकतम अन्तर्मुर्हूत समय तक लग सकता है फिर भगवान ऋषभदेव ने ६ माह तक ध्यान कैसे लगाया ?
समाधान -ध्यान की संतान को भी ध्यान कहते है!एक विषय पर ध्यान, अधिकतम अन्तर्मुर्हूत समय तक ही हो सकता है किन्तु उसके बाद ध्येय(ध्यान का विषय) बदल जाता है और ध्यान की संतान चलती है!जब विचार का विषय,एक पदार्थ नहीं होकर,नाना प्रकार के पदार्थ होते है तब वह विचार ‘ज्ञान’ कहलाता है !जब वह ज्ञान एक विषय में स्थिर हो जाता है तब वह ‘ध्यान’ कहलाता है !उस ध्यान का काल अन्तर्मुहूर्त है!
ध्यान के भेद –
आर्त्तरौद्रधर्म्यशुक्लानि !!२८!!
संधि विच्छेद-आर्त्त+रौद्र+धर्म:+शुक्लानि
शब्दार्थ-आर्त्त+रौद्र+धर्म्य+शुक्लानि
अर्थ-ध्यान के आर्त्त,रौद्र,धर्म और शुक्ल ध्यान चार भेद है !
भावार्थ-आर्त्त और रौद्र ध्यान अशुभ,संसार के कारण है, त्याज्य है ,धर्मध्यान और शुक्ल ध्यान शुभ है !वर्तमान में शुभ ध्यान में सिर्फ धर्म ध्यान सम्भव् है,शुक्लध्यान सहनन के अभाव में असंभव है !अशुभ ध्यानों से हमें सर्वथा बचना चाहिए क्योकि ये दोनों अधोगति के आस्रव/ बंध के कारण है
धर्मध्यान और शुक्ल ध्यान का फल –
परे मोक्ष हेतू !!२९!!
संधि विच्छेद -परे+मोक्ष+हेतू
शब्दार्थ-परे-अंत के,मोक्ष-मोक्ष के,हेतू-हेतू है
अर्थ-उक्त सूत्र में बाद के २ अर्थात धर्म और शुक्ल ध्यान मोक्ष के कारण है !
भावार्थ-धर्म ध्यान परम्परा से और शुक्ल साक्षात मोक्क्ष का कारण है !
अनिष्ट संयोगज आर्त्त ध्यान का लक्षण –
आर्तममनोज्ञस्यसंप्रयोगेतद्विप्रयोगायस्मृतिसमन्वाहार:!!३०!!
संधि विच्छेद-आर्तम्+अमनोज्ञस्य+संप्रयोगे+तद्विप्रयोगाय+स्मृति+ समन्वाहार:!!
शब्दार्थ-आर्तम्-आर्त्त ध्यान है,अमनोज्ञस्य-अप्रिय वस्तु(विष,काँटा,शत्रु आदि) के,संप्रयोगे-समागम से, तद्विप्रयोगाय-उनसे पीच्छा छुड़ाने के लिए,स्मृति-चिंतवन करते हुए उनके वियोग का ,समन्वाहार:-विचार करना मेरे यह कैसे न हो,!
अर्थ-अप्रिय वस्तुओं जैसे विष,शत्रु,कांटे आदि के संयोग होने पर निरंतर उनसे छूटने के उपायों का चिंतवन करना,अनिष्ट संयोजक नामक आर्त्तध्यान है!
इष्टवियोगज आर्तध्यान का लक्षण-
विपरीतं मनोज्ञस्य !!३१!!
संधि विच्छेद-विपरीतं-उक्त सूत्र से विपरीत अर्थात वियोग होना,मनोज्ञस्य-प्रिय वस्तुओं (पुत्र पत्नी आदि का,इष्ट वियोगज है!
अर्थ-प्रिय/इष्ट वस्तुओं पुत्र.पत्नी,सम्पत्ति आदि के वियोग होने पर निरंतर चिंतवन करना कि उनको कैसे प्राप्त किया जा सकता है ,इष्ट वियोगज आर्त्त ध्यान है !
वेदनाजन्य आर्तध्यान का लक्षण –
वेदनायाश्च !!३२!!
संधि विच्छेद -वेदना:+च
शब्दार्थ-वेदना:-वेदन से भी,च-और
अर्थ-रोगग्रस्त होने के कारण,शरीर में उत्पन्न पीड़ा की वेदना का निरंतर चिंतवन करना वेदनाजनित आर्त्त ध्यान है !
निदान आर्तध्यान का लक्षण –
निदानंच !!३३!!
संधि विच्छेद-निदानं+ च
शब्दार्थ-निदानं+च
अर्थ-भोगो की तृष्णा से पीड़ित होकर आगामी भोगों की प्राप्ति का चिंतवन करते रहना निदान आर्त्त ध्यान है !
विशेष-आर्त्त ध्यान के चार भेद क्रमश: सूत्र ३०,३१,३२,३३,में बताये है
१-अनिष्ट संयोग जनित आर्त् ध्यान,२-ईष्ट वियोग जनित आर्त्त ध्यान,३-वेदना जनित आर्त्त ध्यान और
४-निदान आर्त्त ध्यान !
गुणस्थानों की अपेक्षा आर्त्तध्यान के स्वामी है
तदविरत देशविरत प्रमत्तसंयतानाम् !!३४!!
संधि विच्छेद -तद्+अविरत+देशविरत +प्रमत्तसंयतानाम्
शब्दार्थ-तद्-वह(आर्त्त ध्यान), अविरत- अविरत( चार )गुणस्थानों में,देशविरत -पंचम गुणस्थान ,प्रमत्तसंयतानाम् – प्रमत्त संयत (छठे) गुणस्थान में होता है !
अर्थ-वह आर्त्त ध्यान अविरत (चार )गुणस्थानो,देशविरत-संयतासंयत पंचम गुणस्थान और (१५) प्रमादो के कारण प्रमत्त संयत छटे गुणस्थान में होता है !
विशेष-१ से ६ गुणस्थान तक अनिष्ट संयोगज,इष्ट वियोगज और वेदनाजनित;निदानज आर्त्तध्यान पंचम गुणस्थानवर्ती के होता है किन्तु प्रमत्तसंयत गुणस्थान में निदान आर्त्तध्यान नहीं होता क्योकि भावलिंगी साधु को आगामी भोगों की आकांक्षा नहीं रहती अर्थात ४थे ,५वे और छटे गुण स्थानवर्ती जीवों के यह ध्यान किंचित् कदाचित हो सकते है हमेशा नहीं किन्तु प्रथमादि गुणस्थान में हमेशा रहते है
रौद्र ध्यान के भेद व स्वामी-
हिंसानृतस्तेयविषयसंरक्षणेभ्योरौद्रमविरतदेशविरतयो:!!३५!!
सन्धिविच्छेद -हिंसा+अनृत+स्तेय+विषय+संरक्षणेभ्यो +रौद्रम्+अविरत+देशविरतयो:
शब्दार्थ-हिंसा-हिंसा,अनृत-झूठ,स्तेय-चोरी,विषय-परिग्रह,संरक्षणेभ्यो-संचय की भावना से रौद्रम्-रौद्र ध्यान,अविरत-अविरतादि चार और देशविरतयो-देशविरत गुणस्थानों में होता है !
अर्थ-हिंसा,झूठ,चोरी और परिग्रहों के संचय की भावना से उत्पन्न रौद्रध्यान ,पहले चारअविरत और पांचवे देशविरत गुणस्थानों में होता है !
विशेष-निमित्त के आधार से रौद्र ध्यान के चार भेद-
१-हिंसानन्दी-हिंसा में आनंद मानकर उसके साधनो को जुटाने का यत्न करना हिंसानन्दी रौद्रध्यान है
२-मृषानन्दि-असत्य बोलने मे आनंद मानकर उसका चिंतवन करना मृषानन्दि रौद्रध्यान है!
३-चौर्यनन्दि -चोरी में आनंद मानकर उसी का चिंतवन करना चौर्यानंदी रौद्रध्यान है और
४-परिग्रहनन्दी-परिग्रहों में आनंद मानकर उनके रक्षण का चिंतवन करना परिग्रहनन्दि रौद्रध्यान है !
संयमी मुनि ,अर्थात छटे गुणस्थानवर्ती मुनि के रौद्र ध्यान नहीं होता अन्यथा वे असंयमी हो जाएंगे !
शंका-अविरत,वर्ती नहीं है,अत:रौद्रध्यान होना ठीक है किन्तु पंचम गुणस्थानवर्ती श्रावक के रौद्र ध्यान कैसे हो सकता है ?
समाधान-श्रावक को अपने धर्मायतनों;स्त्री,धन,इत्यादि की रक्षा का भार होता है जिस की रक्षा हेतु,कभी हिंसा के आवेश में आकर रौद्रध्यान हो सकता है किन्तु सम्यग्दृष्टि होने से उसे नरकगति में ले जाने योग्य रौद्रध्यान नहीं होता है
धर्मध्यान का स्वरुप और चार भेद –
आज्ञापाय विपाक संस्थान विचयाय धर्म्यम् !!३६!!
संधि विच्छेद-आज्ञा+अपाय+विपाक+संस्थान+विचयाय+धर्म्यम्
शब्दार्थ-आज्ञा-आगम आज्ञानानुसार ही है,अपाय-मिथ्यात्व में उलझे किन्तु मोक्ष के अभिलाषियोंके छुड़ाने के उपाय का विचार करना,विपाक-द्रव्य,क्षेत्र,काल,भव और भाव के निमित्त से कर्मोंदय पर फल का विचार करना,संस्थान -लोक के आकार और दशा का निरंतर चिंतवन करना, विचयाय-विचार करना /मानना धर्म्यम्-धर्मध्यान है
अर्थ-आज्ञा,अपाय,विपाक और संस्थान का निरंतर विचार/चिंतवन करना ,धर्मध्यान है !
भावार्थ-
१-आज्ञाविचय-उत्कृष्ट उपदेशों/दृष्टान्तों के अभाव में/स्वयं मंदबुद्धि होने से /कर्मोंदय में /पदार्थों के अति सूक्ष्म या दूरवर्ती होने से,सर्वज्ञ देव द्वारा कहे वचनो पर ‘यह ऐसा ही है”पर दृढ श्रद्धान करना,आज्ञा विचय धर्मध्यान है क्योकि ‘जिन’ अन्यथावादी नहीं होते!स्वयं तत्वों का ज्ञाता होते हुए अन्यों को समझाने के लिए युक्तियों और दृष्टान्तों का निरंतर चिंतवन करना,आज्ञा विचय धर्मध्यान है क्योकि मूल भावना जिनेन्द्र भगवान की आज्ञा का प्रचार करना है !
२-अपायविचय-मोक्ष अभिलाषी ,मिथ्यात्व के वशीभूत कुमार्गों पर चल रहे संसारी जीव को मिथ्यात्व से मुक्त करवाने के उपायों का निरंतर चिंतवन करना,अपायविचाय धर्मध्यान है !
३-विपाक विचय-ज्ञानावरणीय कर्मों के द्रव्य, क्षेत्र,काल,भाव और भव के अनुरूप उदय पर उनके फलों का निरंतर चिंतवन करना विपाक विचय धर्मध्यान है !
४-संस्थानविचय-लोक के स्वरुप,आकार एवं स्थिति का निरंतर चिंतवन करना संस्थान विचयधर्मध्यान है
उक्त चार धर्म ध्यान के भेद है !
विशेष-
१-आचार्य पूजयपादस्वामी के अनुसार,उत्तम क्षमादि दस धर्मों से युक्त उक्त धर्मध्यान चौथे अविरत से ,७वे अप्रमत्त गुणस्थान तक होता है जबकि धवलाकार,आचार्यश्री वीरसैनस्वामी के मतानुसार १०वे सूक्ष्म साम्परायगुणस्थान तक होता है, शुक्ल ध्यान उसके बाद होता है !
२-संसार,भोग एवं शरीर से विरक्ति के फलस्वरूप उत्पन्न भावों की स्थिरता के लिए उत्तम क्षमादि १० धर्मों से युक्त ध्यान,धर्मध्यान है!इनके निमित्त के भेद से आज्ञाविचय-तत्व निष्ठां में,अपायविचय-संसार, शरीर एवं भोगो से विरक्ति में,विपाकविचय-कर्मफल और उसके कारणों की विचित्रता का ज्ञान कराने में,तथा संस्थान विचय -लोक के स्वरुप /आकार ,स्थिति के ज्ञान में सहायक होते है!इससे उनके ज्ञान में दृढ़ता आती है !
३-विपाकविचय के स्वरुप में कर्मों के द्रव्य,क्षेत्र,क़ाल,भाव और भव के निमित्त से कर्मोंदय का विचारकरने से अभिप्राय है कि यद्यपि कर्मोंदय या उदीरणा से जीव के औदायिकभाव एवं विभिन्न प्रकार के शरीरादि प्राप्त होते है किन्तु इन कर्मों का उदय अथवा उदीरणा किसी अन्य निमित्त के बिना नहीं होती है!जैसे: -द्रव्यनिमित्तता-कोई व्यक्ति अपने परिवार के साथ घर की छत्त के नीचे बैठा मनोरंजन कर रहा है ,अक- स्मात् छत गिरने से वह घायल होकर दुःख का वेदन करने लगता है,यहाँ उसके दुःख में असातावेदनीय कर्म का उदय /उदीरणा में छत का टूट कर गिरना संयोग निमित्त है!गिरने वाली छत के निमित्त से उस व्यक्ति के असातावेदनीय की उदय/उदीरणा हुई जिसके फलस्वरूप उस व्यक्ति को असाता /दुःख का फल मिला!यही उक्त कथन का अभिप्राय है!इसी प्रकार अन्य कर्मों के उदय-उदीरणा में बाह्य द्रव्य के निमित्त का विचार कर लेना चाहिए !
काल निमित्त का विचार दो प्रकार से किया जाता है!
१-प्रत्येक कर्म का उदय उदीरणा काल,२-वह काल जिसके निमित्त से,बीच में ही कर्मों की उदय उदीरणा बदल जाती है!आगम में अध्रुवोदय रूप कर्म के उदय उदीरणा काल का निर्देश दिया है,उसके समाप्त होते ही विवक्षित कर्म के उदय उदीरणा का अभाव होकर,उसका स्थान दुसरे कर्म की उदय-उदीरणा ले लेती है!जैसे हास्य और रति का उत्कृष्ट उदय-उदीरणा काल छह माह है ,उस के बाद इनकी उदय/उदीरणा नहीं होकर शोक और अरति की उदय उदीरणा होने लगती है !किन्तु छ माह के अंदर ही हास्य और रति के विरुद्ध निमित्त मिलता है तो बीच में ही उनकी उदय उदीरणा बदल जाती है!यह कर्म का उदय उदीरणा काल है!उद्धाहरण के लिए कोई व्यक्ति देशान्तर के लिए निर्भयता पूर्वक जा रहा है किन्तु किसी दिन मार्ग में रात्रि जंगल में ही,हिंसक पशुओं के बीच हो जाती है तथा उसे विश्राम के लिए सुरक्षित स्थान नहीं मिलता है!दिन भर वह निर्भय था रात्रि होते ही वह भयभीत होता है!इससे उसकी असाता, अरति,भय,शोक का उदय-उदीरणा होने लगती है!यह काल निमितिक उदय उदीरणा है!इसी प्रकार क्षेत्र, भव,भाव निमित्तिक उदय उदीरणा को समझ सकते है !
उदय काल प्राप्त परमाणुओं के अनुभव (फल) को उदय कहते है !
उदीरणा-उद्यावली के बहार स्थित कर्म परमाणुओं को कषाय सहित /कषाय रहित योग;मन,वचन विशेष काय,वीर्य विशेष दवरा उद्यावली में लाकर उनका उदय प्राप्त परमाणु के साथ फल देने को उदीरणा कहते है!इस प्रकार कर्मपरमाणुओ का अनुभव उदय और उदीरणा दोनों में लिया जाता है !उदय में काल प्राप्त कर्म परमाणु और उदीरणा में अकाल प्राप्त कर्म परमाणु रहते है,दोनों में अंतर यही है !
सामान्य नियम है की जहाँ जिस कर्म का उदय होता है वहां उसकी उदीर्ण अवश्य होती है फिर भी इसमें कुछ विशेषताए है –
१-मिथ्यात्व का उदय/उदीरणा मिथ्यात्व गुणस्थान में ही होता है!किन्तु उपशम सम्यक्त्व के अभिमुख हुए जीव को अंतिम आवली प्रमाण काल में मिथ्यात्व की उदीरणा नहीं होती,वहां उसका मात्र उदय ही होता है!एकेन्द्रिय से चतुरिंद्रिय जाति,आतप,स्थावर,सूक्ष्म,अपर्याप्त,और साधारण इन ९ प्रकृतियों की उदय उदीरणा मिथ्यात्वगुणस्थान में ही होती है,अनंतानुबंधी चतुष्कक की उदय उदीरणा प्रथम २ गुणस्थानों में होती है आगे नहीं !सम्यग्मिथ्यात्व की उदय उदीरणा तीसरे गुणस्थान तक है,अन्य में नहीं!
४ थेगुणस्थान में अप्रयाख्यान चतुष्कक,नरकगति,देवगति,वैक्रयिक(शरीर,अंगोपांग),दुर्भग,अनादेय, अयशकीर्ति,(११) तथा नरकायु और देवायु कर्मप्रकृतियों का उदय उदीरणा होता है,इसके आगे नहीं !मात्र मरण के समय,आयु के अंतिम आंवलि काल में उदय उदीरणा नही होती!चार अनुपूर्वियों की उदय उदीरणा पहिले,दुसरे और चौथे गुणस्थानों में होती है उसके आगे नहीं !पांचवे संयतासंयत गुण स्थान में प्रत्याख्यान चतुष्कक,तिर्यंच गति,उद्योत और नीच गोत्र (७)प्रकृतियों की उदय उदीरणा होती है उससे आगे नहीं !तिर्यंचायु के भी पांचवे गुणस्थान में मरण से पूर्व अंतिम आंवलि काल में उदीर्ण नहीं होती , उदय होता है!मनुष्य आयु की छठे गुणस्थान तक उदीरणा और चौदवे गुणस्थान तक उदय रहता है !
आदि के दो शुक्ल ध्यान के स्वामी
शुक्लेचाद्येपूर्विद: ३७
संधि विच्छेद -शुक्ले+च+आद्ये+पूर्विद:
शब्दार्थ-शुक्ले-शुक्ल ध्यान के,च,आद्ये-आदि के,पूर्विद-पुर्वज्ञानधारी के होते है
अर्थ-आदि के दो ,पृथकत्व वितर्क और एकत्ववितर्क शुक्ल ध्यान पूर्व ज्ञानधारी श्रुतकेवली के होता है उनके श्रेणी आरोहण से पूर्व ‘च’ का अभिप्राय,धर्मध्यान और बाद में क्रम से पृथकत्व वितर्क और एकत्व वितर्क शुक्लध्यान होता है!
बाद के शुक्ल ध्यान के स्वामी
परे केवलिन : ३८
शब्दार्थ- परे -बाद के दो,केवलिन -केवली के होते है
अर्थ-परे -बाद के दो अर्थात सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति शुक्लध्यान और व्युपरतक्रियानिवर्ती शुक्ल ध्यान केवालिन:-सयोगकेवली और योग केवली के होते है
शुक्ल ध्यान के चार भेद-
पृथक्त्वैकत्ववितर्कसूक्ष्मक्रियाप्रतिपातिव्युपरतक्रिर्यानिवर्तीनि ३९
संधिविच्छेद-पृथकत्ववितर्क+एकत्ववितर्क+सूक्ष्मक्रिया+अप्रतिपाति+व्युपरतक्रिया: +निवर्तिनि
अर्थ-पृथकत्ववितर्क,एकत्ववितर्क,सूक्ष्मक्रियाअप्रतिपाति,व्युपरतक्रिया:निवर्तिनि शुक्लध्यान के ४ भेद है
भावार्थ-
पृथकत्ववितर्क-वितर्क श्रुतज्ञान,उस के अवलंबन के साथ पृथक्त्व होना जैसे कभी ॐ ,कभी ह्रीं,कभी श्रीं का ध्यान करना !
एकत्ववितर्क-श्रुत का अवलंबन एकत्व के साथ होना,जैसे ॐ पर ध्यान केन्द्रित रहना ,उस से हटना नहीं,एकत्ववितर्क शुक्लध्यान है! यह पृथक्त्व वितर्क शुक्लध्यान से उत्कृष्ट है!
सूक्ष्मक्रिया अप्रतिपाति-सूक्ष्मक्रिया-शरीर की क्रिया सूक्ष्म रह गयी हो,अर्थात १३वे गुणस्थान के अंतिम अन्तर्मुहूर्त में,जहाँ सूक्ष्म काययोग शेष रह गया हो और जहा से अप्रतिपाती-नीचे गिरना असंभव हो,सूक्ष्म क्रिया अप्रतिपति शुक्ल ध्यान होता है!
व्युपरतक्रिया:निवर्तिनि-व्युप्रतक्रिया निवर्तिनि-जहा मन,वचन,काय की समस्त क्रिया समाप्त हो गयी हो ऐसे १४वे गुणस्थानवर्ती केवली भगवान् के व्युपरत क्रिया:निवर्तिनि शुक्ल ध्यान होता है!
यद्यपि केवली भगवान् के ध्यान होता नहीं है,आचार्यों ने कहा है कि १३वे गुणस्थान के अंत और १४वे गुणस्थान में केवल उपचार से ध्यान कहा है,क्योकि ध्यान का कारण निर्जरा वहां देखी जा रही है!केवली भगवान् संसार के समस्त पदार्थों को एक साथ देखते जानते है जब कि ध्यान की परिभाषा है एकाग्र चिंतन योग! इन समस्त वस्तुओं पर चिंतन को वे रोके,तब ध्यान होगा जो असंभव है!
शुक्लध्यान का लक्षण-
त्र्येक योग काय योगायोगानाम् ४०
संधि विच्छेद-त्रियोग+एकयोग+काययोग+अयोगानाम्
अर्थ -पृथकत्व वितर्क शुक्ल ध्यान तीनो योगो के,एकत्व वितर्क शुक्ल ध्यान किसी एक योग के,सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाती शुक्लध्यान, सूक्ष्म काय योग के, और व्युपरत क्रिया निवर्ती शुक्ल ध्यान बिना किसी योग के अवलंबन से होता है !चौथा शुक्ल ध्यान अयोगकेवली के होता है
भावार्थ-त्रियोग -तीन योगो के आवलंबन से पृथकत्व वितर्क, एकयोग- किसी एक योग के अवलंबन से एकत्व वितर्क, काययोग -सिर्फ सूक्ष्म काय योग के अवलंबन से सूक्ष्मक्रिया आप्रतिपाति ,अयोगानाम्-और बिना किसी योग के अवलंबन से व्युपरत क्रिया: निवर्ती शुक्लध्यान,अयोग केवली के होता है!
विशेष-चारों शुक्लध्यानों का काल अलग-अलग अंतर्मूर्हत है!पृथकत्ववितर्क और एकत्व वितर्क शुक्लध्यान का काल १ मिनट से भी बहुत कम है!सूक्ष्म क्रियाप्रतिपति का भी बहुत कम काल है और व्युप्रतक्रिय निवर्ति का काल तो मात्र ५ लघु अक्षर बोलने के समय प्रमाण ,१४वे गुण स्थान का काल है !
आदि के दो शुक्ल ध्यान की विशेषता-
एकाश्रयेसवितर्कवीचारेपूर्वे !! ४१!
संधि विच्छेद-एकाश्रये+सवितर्क+वीचारे+पूर्वे
शब्दार्थ-एकाश्रये -जिन्हे पहिले दो ध्यान का आश्रय होता है वे एकाश्रय कहलाते है,सवितर्क-वितर्क सहित श्रुतज्ञान है!वीचारे-विचार वाले है-अर्थात पलटन सहित है.कभी कुछ विचार करना और कभी कुछ अन्य विचारना,पूर्वे -पहिले के दो (शुक्ल ध्यान )
अर्थ-सम्पूर्ण श्रुत ज्ञानीयों द्वारा ही दो ,पृथक वितर्क और एकत्ववितर्क ध्याये जाते है
जो वितर्क और विचार के साथ रहते है वे सवितर्क विचार है !
विशेष -प्रथम दो शुक्ल ध्यान का आधार/आश्रय मात्र एक,श्रुत ज्ञानी ही है ,अत: दोनों ही वितर्क और वीचार सहित है!अर्थात उन्हें श्रुतज्ञान के अवलंबन और पलटन सहित होते है!
अवीचारं द्वितीयम् !!४२ !
शब्दार्थ-अवीचारं-वीचार अर्थात पलटन रहित है, द्वितीयम् -दुसरे शुक्ल ध्यान -एकत्ववितर्क
अर्थ-दूसरा अर्थात +एकत्ववितर्क शुक्लध्यान अवीचारं-पलटने रहित है!एक आश्रय है श्रुतज्ञानियों को श्रुतज्ञान के अवलंबन से बिना पलटन के होता है!
विशेष-पहिले शुक्लध्यान पृथक्त्ववितर्क,सवितर्क और सविचार है जबकि दूसरा एकत्व वितर्क-सवितर्क एवं अविचार है !
वितर्क का लक्षण –
वितर्क:श्रुतम् !!४३!!
संधि विच्छेद-वितर्क:+श्रुतम्
शब्दार्थ-वितर्क:-तर्क करने को वितर्क कहते है ,श्रुतम् -वितर्क श्रुतज्ञान है !
अर्थ-श्रुतज्ञान को वितर्क कहते है,श्रुत का विशेष विचार होना वितर्क है,ॐ,ह्रीं श्रीं आदि के ध्यान को वितर्क कहते है !
विशेष-एकत्व वितर्कादि शुक्लध्यान कषाय रहित उत्तम संहनन युक्त जीवों के ही होता है,हमारे कषाय होती ही है,उत्तम सहनन नहीं है इसलिए हमारे ध्यान की योग्यता के अभाव में , हमे शुक्लध्यान होना असंभव है!
वीचार का लक्षण-
वीचारोऽर्थव्यञ्जनयोगसंक्रांति !!४३!!
संधि विच्छेद-वीचार:+अर्थ+व्यञ्जन+योग+संक्रांति
शब्दार्थ-वीचार:-विचार है,अर्थ-अर्थ अर्थात कभी द्रव्य,कभी पर्याय का चिंतवन करना , व्यञ्जन-व्यञ्जन अक्षरों अ,आ ,इ , ई आदि,योग-मन,वचन ,काय योग , संक्रांति-पलटने को कहते है
अर्थ-वीचारो- वीचार
अर्थसंक्रांति- अर्थ का पलटना अर्थात कभी द्रव्य का चिंतन ,कभी पर्याय का चिंतन करना
व्यञ्जनसंक्रांति -व्यंजन का पलटना अर्थात कभी अ ,कभी आ कभी इ ,कभी ई का चिंतवन, ॐ,ह्रीं श्रीं आदि से चिंतवन करना व्यंजन संक्रांति है
योगसंक्रांति-योग का पलटना, अर्थात कभी मन से,कभी वचन से और कभी काय से चिंतवन करना योग संक्रांति है!
भावार्थ-इन तीनो के पलटने को अर्थ, व्यंजन और योग संक्रांति कहते है!इन तीनों प्रकार की संक्रांति को वीचार कहते है !
एकत्ववितर्क में अर्थ,व्यंजन,योग की संक्रांति नहीं होती,एक आधार से ही ध्यान होता है!
पृथकत्ववितर्क में तीनो संक्रांति होती है!पृथकत्ववितर्क शुक्लध्यान का फल मोहनीय कर्म का क्षय अथवा उपशम है!एकत्ववितर्क शुक्लध्यान का फल १२ वे गुणस्थान में ज्ञानावरण, दर्शनावरण .और अन्तराय कर्म का क्षय है!जिन आचार्यों ने एकत्ववितर्क शुक्लध्यान ११ वे १२ वे गुणस्थान में माना है उनकी अपेक्षा यह कथन है! ८,९,१०.११ वे गुणस्थान में पृथकवितर्क शुक्लध्यान हुआ उसने मोहनीयकर्म का क्षय या उपशम फल हुआ !
सूक्षमक्रियाप्रतिपाती शुक्लध्यान केवली भगवान् को होता है,जब वे योग निरोध करते है तो उनकी दिव्यध्वनि बंद हो जाती है,वे निर्वाण स्थल के लिए विहार करते है,निर्वाण स्थल पर पहुँच कर वे ध्यान में एकाग्रचित हो जाते है!जब उनकी आयु अंतर्मूर्हत शेष रह जाती है तब वे केवली समुदघात,अन्य तीन अघातिया कर्मों; नाम,गॊत्र और वेदनीय की ८५ कर्म प्रकृतियों की स्थिति को आयुकर्म की शेष स्थिति,अंतर्मूर्हत के बराबर लाने के लिए, करते है!
आचार्य वीरसेन स्वामी के अनुसार सभी केवलीयों को समुदघात करना पड़ता है किन्तु कुछ आचार्यों की मान्यता है कि जिन केवलीयों की केवलज्ञान के बाद ६ माह से अधिक आयु रहती है उन्हें समुदघात करने या नहीं करने का कोई नियम नहीं है किन्तु जिनकी आयु ६ माह से कम रह जाती है उन्हें समुदघात करने का नियम है !
शंका-केवली भगवन शेष ३ अघातिया कर्मों की स्थिति आयुकर्म की अंतर्मूर्हत स्थिति करने के बाद क्या करते है?
समाधान-अंतर्मूर्हत स्थिति होने के बाद,केवली अल्प विश्राम लेकर बादर काययोग के द्वारा, बादर वचनयोग,बादर मनोयोग,बादर श्वासोच्छ्वास को समाप्त कर फिर विश्राम कर सूक्ष्म काययोग से सूक्ष्म वचनयोग,सूक्ष्म मनोयोग और सूक्ष्म श्वासोच्छवास को समाप्त करते है. फिर विश्राम कर,मात्र सूक्ष्म काययोग से सूक्ष्म क्रियाप्रतिपाती शुक्लध्यान ध्याते है जिसके द्वारा शेष तीन कर्मो की स्थिति जो अंतर्मूर्हत हो गयी थी उस,अंतर्मूर्हत को आयुकर्म के बराबर कर लेते है!
शंका-केवली के कौन से काययोग होते है?
समाधान- केवली भगवान् के दंड समुदघात में औदारिककाययोग होता है, कपाट समुदघात में औदारिकमिश्रकाययोग,प्रतर और लोकपूर्ण समुदघात में कार्मणकाययोग होता है,शरीर में आत्मप्रदेश रहते है किन्तु शरीर से सम्बन्ध नहे रहता ! लौटते हुए कपट में औदारिकमिश्रकाययोग और दंड समुद घात में औदारिककाययोग होता है! उसके बाद वे आत्म प्रदेश शरीर में प्रवेश कर जाते है!
शंका-केवली भगवान् के कितने प्राण होते है ?
समाधान-केवली भगवन के १३ वे गुणस्थान में,समवशरण में भी पञ्च इंद्र और मन,६ के अतिरिक्त चार प्राण,वचनबल प्राण,कायबलप्राण,आयुप्राण और श्वासोच्छवास प्राण होते है!प्रतर और लोकपूर्ण समुदघात में उनके दो प्राण,कायबल और आयुप्राण रहते है,१४वे गुणस्थान में कायबल प्राण भी समाप्त हो जाता है, मात्र आयुप्राण शेष रह जाता है !
शंका-केवली भगवान् पर्याप्तक है या अपर्याप्तक ?
समाधान -दंड समुदघात में पर्याप्तक है,कपाट समुद्घात में औदारिक मिश्रकाययोग होने के कारण निवर्तपर्याप्तक है,प्रतर और लोकपूर्ण समुदघात में कार्मणकाययोग है इसलिए अपर्याप्तक है !
शंका-समुद घात का क्या काम है?
समाधान-गीली धोती को यदि निचोड़ कर रख दे तो उसे सूखने मे फ़ैलाने के अपेक्षाकृत अधिक समय लगेगा,यदि दोनों छोर से पकड़ कर, फैलाकर उसे हिलाते रहे तो जल्दी सुख जायेगी! इसी प्रकार केवली भगवान् आत्म प्रदेशों को निकालकर,लोक में फैलाकर अपने अघातियाकर्मों की स्थिति, अंतर्मूर्हत प्रमाण कर लेते है!
शंका-सामान्य केवली और तीर्थंकर केवली में कोई अंतर होता है?
समाधान-गुणों की अपेक्षा कोई अंतर नहीं रहता,समुदघात दोनों को ही करना होता है!प्राण,पर्याप्तियां भी सामान होते है! १३ वे गुण स्थान के अंत से १४ वे गुणस्थान की समस्त क्रियाये दोनों को करनी होती है!सामान्य केवली भी अनेक प्रकार के होते है किन्तु इन सब की अपेक्षा उन में भी कोई अंतर नहीं होता!
शंका-१४ वे गुणस्थान का समय ५ लघु अक्षर सामान है,किन्तु हर जीव की बोलने की गति भिन्न भिन्न है ,फिर यह समय कैसे निर्धारित होता है?
समाधान- जो मुनि राज वचनबल ऋद्धि के द्वारा द्वादशांग का पाठ अंतर्मूर्हत में कर लेते है, उन्हें जितना समय ५ लघु ह्रस्व अक्षर बोलने में लगता है वह १४ वे गुणस्थान का काल है!यह काल वचन,बल ऋद्धिधारी मुनिमहाराजों का एक सामान होता ह
पात्रों की अपेक्षा निर्जरा का क्रम
सम्यग्दृष्टिश्रावकविरतानन्तवियोजकदर्शनमोहक्षपकोपशमकोपशांतमोहक्षपकक्षीणमोहजिना: क्रमशोऽसंख्येयगुणनिर्जरा:!! ४५ !!
संधि विच्छेद-सम्यग्दृष्टि+श्रावक+विरत+अनन्तवियोजक+दर्शनमोहक्षपक+उपशमक+उपशांत मोह+क्षपक+क्षीणमोह+जिना: +क्रमश:+असंख्येयगुणनिर्जरा अर्थ-सम्यग्दृष्टि,श्रावक,विरत,अनंतवियोजक,दर्शनमोहक्षपक,उपशमक,उपशांतमोह,क्षपक,क्षीणमोह,जिना:-जिनेन्द्र भग वान् की उत्तरोतर वृद्धिगत,क्रमशो -क्रमश:,असंख्येयगुण-असंख्यात गुणी-असंख्यातगुणी निर्जरा प्रति समय होती है ! भावार्थ-अविपाक निर्जरा का प्रारंभ प्रथमगुणस्थान,जिस समय,मिथ्यादृष्टिजीव सम्यक्त्व के सम्मुख होता है,उसके करण लब्धि में प्रवेश होने पर,अध:करण के उपरान्त,अपूर्वकरण के पहले समय से हो कर,प्रतिसमय वृद्धिगत असंख्यातगुणी निर्ज रा होती है!अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण तक बढ़ती है,अनिवृत्ति के अंतिम समय के उपरान्त वह जीव प्रथमोपशम सम्य ग्दृष्टि हो जाता है!मिथ्यादृष्टि जीव के अविपक निर्जरा,अनिवृत्तिकरण के अंतिम समय में जितनी होती है,उससे असंख्यात गुणी निर्जरा सम्यगदृष्टि जीव की होती है!प्रथमोपशम सम्यग्दृष्टि जीव की जब तक विशुद्धि बढ़ती है तब तक निर्जरा प्रति समय,असंख्यात गणी वृद्धिगत होती है और विशुद्धि के घटने के साथ साथ निर्जरा घटने लगती है!
पंचम गुणस्थानवर्ती श्रावक,१ से ११वॆ प्रतिमाधारी तक,आर्यिकामाताजी की २४ घंटे,प्रतिसमय निर्जरा,सम्यग्दृष्टि की उत्कृष्ट निर्जरा से असंख्यातगुणी होती है और परिणामों के अनुसार घटती-बढ़ती है!सम्यगदृष्टि के निर्जरा प्रति समय सदा नहीं होती केवल विशुद्धि के बढ़ने तक ही होती है! प्रथमोपशम सम्यग्दृष्टि जीव,क्षयोपशमिक या क्षयिक सम्यग्दृष्टि भी हो जाये तब भी उसके प्रतिसमय निर्जरा होने का विधान नहीं है!
६-७ वे गुणस्थानवर्ती विरत मुनिमहाराज की निर्जरा श्रावक से असंख्यात गुणी,चारों गतियों के अनन्तानुबन्धी वियोजक जीवों की इनसे असंख्यात गुणी निर्जरा होती है,अनन्तानुबन्धी वियोजक,नारकी जीव की निर्जरा विरतमुनिराज से अधिक होती है किन्तु नारकी की निर्जरा उस अन्तर्मुहूर्त तक ही होगी.बाद में समाप्त हो जायेगी उस अन्तर्मुहूर्त में वह नारकी अनंतानुबंधी के द्रव्य का परिणमन अप्रत्याख्यानावरण,प्रत्याख्यानावरण और संज्वलन में कर लेगा!किन्तु मुनिराज की निर्जरा २४ घंटे होगी!दर्शनमोह के क्षपणा करने वाले जीव की निर्जरा इनसे असंख्यातगुणी होती है,यह चौथे गुणस्थानवर्ती भी हो सकता है,जिसके निर्जरा मात्र अन्तर्मुहूर्त होती है!इनसे असंख्यातगुणी निर्जरा उपशमक श्रेणी पर चढ़ने वाले,८वे -९वे ,१०वे गुणस्थानवर्ती मुनिमहाराजों की होती है!इससे असंख्यात गुणी उपशांत मोह अर्थात ११वे गुण स्थान वर्ती मुनि महाराज की होती है!उससे असंख्यात गुणी निर्जरा क्षपक श्रेणी पर चड़ने वाले ८-९-१० गुणस्थान वर्ती मुनिराज की होती है!उससे असंख्यात गुणी निर्जरा १२वे क्षीणमोह गुणस्थानवर्ती मुनिमहाराज की होती है!इनसे असंख्यात गुणी निर्जरा १३वे गुणस्थानवर्ती जिनेन्द्र भगवान् की होती है,इनसे असंख्यात गुणी निर्जरा केवली भगवान् की १४वे गुण स्थान में होती है! इनके क्रमस: असंख्य असंख्यात गुणी निर्जरा होती है!
शंका- ८वे गुणस्थान वर्ती मुनिराज,क्षपकश्रेणी पर चढ़ते मुनिराज,सामायिक छेदोपस्थापना चरित्र वालों की निर्जरा उपशम मोह ११वे गुणस्थानवर्ती मुनिराज,यथाख्यात चरित्र वालों से, असंख्यात गुणी कैसे हो सकती है क्योकि इनके तो कषाय का उदय अभी है?
समाधान-यद्यपि संयम लब्धि स्थान ११वे गुणस्थान वाले का उच्च है,किन्तु विशुद्धिलब्धि स्थान ८ वे गुणस्थानवर्ती क्षपक का ऊँचा है!इसलिए ८ वे गुणस्थानवर्ती की निर्जरा अधिक होती है!
शं का-पंचम गुणस्थानवर्ती जीव पंचेन्द्रिय विषयों का सेवन करते है फिर उनकी प्रति समय निर्जरा कैसे होती है?
समाधान-प्रथम प्रतिमाधारी से ११वॆ प्रतिमाधारी ,आर्यिका माता जी के संयामसंयम है,देश चारित्र है,उन्होंने जीवन पर्यन्त नियम व्रत लिए है उनके इस संयम के कारण प्रति समय निर्जरा होती ही है क्योकि उनके सदा भाव रहते ही की उनसे कोई हिंसा नहीं हो जाए,इन्ही भावों के कारण वे घर गृहस्थी के कार्य में लगे रहने के बावजूद भी प्रति समय निर्जरा करते है!
उनका देश संयम निर्जरा में कारण है! चौथे गुणस्थानवर्ती क्षायिकसम्यग्दृष्टि के प्रति समय निर्जरा नहीं होती,किन्तु पंचम गुणस्थानवर्ती चाहे क्षयोपशमिक समयगदृष्टि है,देश संयमी है तो उसके असंख्यात गुणी निर्जरा प्रति समय होती है!
अनन्तानुबंधी की विसंयोजना का क्या तात्पर्य है ?
आत्मा के परिणामों की विशुद्धि से,जो क्षयोपशामिकसम्यगदृष्टि जीव अनंतानुबंधी के समस्त द्रव्य को आत्मा से अलग कर,अप्रत्याख्यान,प्रत्याख्यान,और संज्वलन और नोकषाय रूप करने को अनंतानुबंधी की विसंयोजना कहते है!यद्यपि यह विसंयोजना क्षय जैसी ही है,क्षय नहीं कहा है क्योकि यदि विसंयोजना वाला जीव मिथ्यात्व में आ जाता है तो अनंतानुबंधी की पुन:संयोजना हो जाती है और यदि क्षय हो जाए तो वह सत्ता में नहीं आती!वि संयाज्नो मात्र अनंतानुबंधी की ही होती है,अन्य किसी प्रकृति की नहीं!
असंख्यात गुणी से क्या तात्पर्य है?
पहले समय में जितनी निर्जरा हुई उससे असंख्यात गुणी निर्जरा दुसरे समय में,उससे अगले/ तीसरे समय में दुसरे समय की निर्जरा से असंख्यात गुणी !
विशेषार्थ-दस गुण स्थान को प्राप्त जीवों के परिणाम उत्तरोत्तर अधिक विशुद्ध होते जाते है इसलिए उनके कर्मों की निर्जरा उत्तरोत्तर असंख्यात गुनी होती है इतना ही नहीं वहां निर्जरा काल असंख्यत्व भाग -असंख्यत्व भाग भी उत्तरोत्तर घटता जाता है !जिनेन्द्र भगवान का निर्जरा काल न्यूनतम है उससे संख्यात गुना क्षीण कषाय का है !इस प्रकार ,यद्यपि निर्जरा काल सातिशय मिथ्यादृष्टि तक अधिकाधिक होता है किन्तु सामान्य से प्रत्येक का निर्जरा काल अन्तर्मुहूर्त ही है !इस उत्तरोत्तर कम में निर्जरा उत्तरोत्तर अङ्कधिक होती है !
सम्यग्दृष्टि को गुण श्रेणी निर्जरा (उक्त वर्णित) में जो अन्तर्मुहूर्त काल लगता है उससे श्रावक को संख्यात गुणा हीन काल लगता है !किन्तु सम्यग्दृष्टि द्वारा जितने कर्मप्रदेशों की निर्जरा होती है उससे संख्यात गुणे कर्म परमाणुओं की निर्जरा श्रावक करता है !इस सूत्र में दस गुणश्रेणी निर्जरा का निर्देश दिया है !असंख्यात गुणी कम ,श्रेणी रूप से कर्मों की निर्जरा होना गुणश्रेणी निर्जरा है
निर्ग्रन्थ मुनि महाराज के भेद-
पुलाकवकुशकुशीलनिर्ग्रन्थस्नातकानिर्ग्रन्था: ४६
संधि विच्छेद -पुलाक+वकुश+कुशील+निर्ग्रन्थ+स्नातका+निर्ग्रन्था:
अर्थ-निर्ग्रन्थमुनि ५ है- पुलाक, वकुश,कुशील,निर्ग्रन्थ,स्नातक होते है
पुलाक-जिन के उत्तर गुणों की भावना होती ही नहीं और उनके मूल गुणों में भी किसी क्षेत्र अथवा काल में कथित-कदाचित दोष लग जाते है,वे पुलाक मुनि महाराज होते है!
वकुश-जो मुनिराज मूलगुणों (बाह्य एवं अभ्यंतर परिग्रहों के त्याग)का निर्दोष पालन करते है किन्तु अपने शरीर उपकरणों पिच्छी, कमंडलादि से स्नेह रखते है, उनकी शोभा बढाने में लगे रहते है,वे परिग्रह से घिरे रहते है,वकुश मुनिराज है! वकुश का अर्थ है चितकबरा !जैसे सफ़ेद कपड़े पर काले धब्बों का लग जान उसी प्रकार मुनि के निर्मल आचार विचार में मोह के धब्बे होते है !उत्तर गुणों का पालन करते है,उत्तर गुणों में कथित-कदाचित दोष लग जाते है!
कुशील साधु के दो भेद प्रतिसेवना कुशील और कषाय कुशील है !
कुशील प्रतिसेवना-इन मुनिराजों के मूल और उत्तरगुण परिपूर्ण होते है किन्तु उत्तरगुणों में कथित कदाचित कभी दोष लग जाता है वे प्रतिसेवना कुशील मुनि होते है!
कषाय कुशील-संजवलन कषाय के अतिरिक्त अन्य कषायों का कोई प्रभाव नहीं होता,उनके उदय को उन्होंने वश में कर लिया हो ,वे कषाय कुशील साधु कहलाते है
निर्ग्रन्थ-जिन्होंने मोहनीय कर्मों का क्षय कर लिया हो तथा शेष घातिया कर्मों का उदय भी जल में रेखाके समान रह जाता है.तथा अन्तर्मुहूर्त के समय बाद ही उन्हें केवल ज्ञान एवं दर्शन प्रकट होने वाला हो उन १२वे गुणस्थानवर्ती कषाय रहित मुनिराज को निर्ग्रन्थ साधु कहते है!,
स्नातक-चारों घातिया कर्मों का क्षय करने वाले केवली भगवान् को स्नातक कहते है
निर्ग्रन्था- ये ५ प्रकार के निर्ग्रन्थ मुनि राज है!
ये पांचों प्रकार के ६-७ और इनसे ऊपर के गुणस्थान वाले भावलिंगी मुनि होते है! द्रव्य लिंगी के नहीं !
वर्तमान समय में मुनिराज जो मूल गुणों का पालन नहीं करते उन्हें पुलाक मुनि में ले सकते है या नहीं?
पुलाक मुनि वे है जिनमे उत्तर गुणों के पालने की तो भावना होती ही नहीं है तथा उनके मूलगुणों में कथित-कदाचित दोष लग जाते है!जिन मुनिराज के दोष नित्य प्रति लग रहे है,जिन्हें मूलगुणों की चिंता ही नहीं है, उनको पुलाक मुनि में नहीं ले सकते! जैसे वर्तमान में जो मुनिराज लैपटॉप,मोबाइल,आदि रखते है,कूलर.पंखे वातानुकुलित उपकरणों,हीटर का प्रयोग करते हों, उन्हें मूलगुणों की चिंता ही नहीं है,आचार्यों ने कथित-कदाचित मूलगुणों में दोष लगने पर पुलाक मुनि कहा है न की निरंतर दोष लगने पर! इन उपकरणों के प्रयोग से त्रस-स्थावर जीवों की बहुत हिन्सा होती है जिससे उनके अहिंसा महाव्रत का पालन नहीं होगा!सचित फल का सेवन करने से अहिंसामहाव्रत का पालन नहीं हो सकेगा!
जिनको मूलगुणों की चिंता ही नहीं उन्हें भावलिंगी या पुलाक कैसे कह सकते है!
वर्तमान के मुनि, ऐसा आचरण करने वाले,इन पांचों में से किसी में भी नहीं आयेगे!ये तो द्रव्यलिंगी भी नहीं है! द्रव्यलिंगी मुनिराज मूलगुणों का पूर्ण पालन करते है किन्तु उनके सम्यग्दर्शन नहीं होता!द्रव्यलिंगी मुनिराज का गुणस्थान यद्यपि आचार्यों ने १-५ तक बताया है,किन्तु जिनके मूलगुणों का पालन ही नहीं है उनका गुण स्थान पहला ही है!
पुलाकादि मुनियों की विशेषता –
संयमश्रुतप्रतिसेवनातीर्थलिंगलेश्योपपादस्थानविकल्पत:साध्य: !! ४७ !!
संधि विच्छेद -संयम-श्रुत-प्रतिसेवना-तीर्थ-लिंग-लेश्योपपाद-स्थान-विकल्पत:साध्य:
अर्थ-निर्ग्रथ पुलाकादि मुनिराज में संयम,श्रुत,प्रतिसेवना,तीर्थ,लिंग,लेश्या उपपाद,स्थान ;इन आठ अनुयोग के अपेक्षा विशेषता-भेद है!
१-संयम-पुलाक,वकुश और प्रतिसेवनकुशील के सामायिक और छेदोपस्थापना चारित्र (२ संयम) ,कषाय-कुशील के इन दोनों सहित परिहारविशुद्धि और सूक्ष्मसाम्पराय चारित्र (४ संयम) और निर्ग्रन्थ और स्नातक के यथाख्यातचारित्र (१-संयम) होता है यद्यपि ये पाँचों मुनिराज निर्ग्रन्थ है किन्तु संयम की अपेक्षा इनमे भेद है !
२-श्रुत-पुलाक,वकुश और प्रतिसेवना कुशील का,उत्कृष्ट श्रुत;अभिन्नाक्षर,१० पूर्व के ज्ञाता,कषायकुशील और निर्ग्रन्थ का उत्कृष्ट श्रुत १४ पूर्व के ज्ञाता,पुलाक का जघन्य श्रुत;आचारांग के ज्ञाता मात्र,वकुश,कुशील और निर्ग्रन्थ का जघन्य श्रुत अष्टप्रवचन मात्र पांच समिति और तीन गुप्ती मात्र ,स्नातक श्रुतज्ञान से रहित केवलज्ञानी होते है,उनके श्रुत के अभ्यास का प्रश्न ही नहीं उठता !
३-प्रतिसेवना -से तातपर्य व्रतों का दूषित हो जाना !पुलाक मुनिराज पंच महाव्रतों में से किसी एक अथवा रात्रि भोजन त्याग व्रत में परवश कदाचित दोष लगा लेते है!वकुश मुनिराज की शरीर और उपकरणों की सुंदरता में आसक्ति होने के कारण विराधना होती है !
लिंग-इनमे भावलिंग की अपेक्षा कोई अंतर नहीं होता किन्तु द्रव्यलिंग की अपेक्षा,कोई मुनिराज पिच्छी, कमंडल दोनों रखते है!प्रतिसेवना कुशील अपने उत्तर गुणों में कभी कदाचित दोष लगा लेते है !कषाय कुशील,निर्ग्रन्थ और स्नातक के प्रतिसेवना नहीं होती क्योकि वे त्यागी वस्तुओं का सेवन कभी नहीं करते !
४-तीर्थ -तीर्थ अर्थात सभी तीर्थंकरों के तीर्थ (काल)में पांचो प्रकार के साधु होते है !
५-लिंग-द्रव्य और भाव लिंग के दो भेद है!भावलिंग की अपेक्षा पांचों साधु भावलिंगी है क्योकि संयमी और सम्यग्दृष्टि है!द्रव्य लिंग की अपेक्षा सभी साधु दिगंबर होते हुए भी स्नातक पिच्छी कमंडल नही रखते,जैसे तीर्थंकर प्रभु के पास मुनि होने पर पिच्ची,कमंडल दोनों नहीं होते,चक्रवर्ती के मल,मूत्र नहीं होता इसलिए मुनि दीक्षा धारण करने पर उनके पास कमंडल नहीं होता,मात्र पिच्छी रखते है,शेष दोनों रखते है !इस प्रकार अंतर्लिंग की अपेक्षा इनमे अंतर नहीं है,किन्तु बाह्य लिंग की अपेक्षा अंतर है!
६-लेश्या-साधारणतया पुलाक मुनि के पीत,पदम्,शुक्ल तीन शुभ लेश्याये होती है किन्तु कभी उपकरण में आसक्ति वश अशुभ लेश्याए भी हो सकती है!वकुश और प्रतिसेवना कुशील के कदाचित छ: लेश्याये होती है,कषायकुशील के कापोत,पीत.पद्म और शुक्ल चार लेश्याये होती है!स्नातक और निर्ग्रन्थ के मात्र शुक्ल लेश्या होती है!आयोगकेवली लेश्या रहित होते है !
७-उपपाद-पुलाक मुनिराज का उत्कृष्ट उपपाद सहस्रार,१२वे कल्प के उत्कृष्ट देवों की स्थिति में होता है!वकुश और प्रतिसेवना कुशील का उत्कृष्ट उपपाद आरण्य और अच्युत कल्प १६वे स्वर्ग में २२ सागर स्थिति वाले देवों में होता है!कषाय कुशील और निर्ग्रन्थ का उत्कृष्ट उपपाद सर्वार्थसिद्धि में ३३ सागर स्थिति वाले देवों में होता है !११वे गुणस्थान तक के निर्ग्रन्थ सर्वार्थसिद्धि तक उत्पन्न होते है,१२वे गुण स्थान वर्ती और स्नातक का पुनर्जन्म नहीं होता!पांचो साधु का जघन्य उपपाद सौधर्मेन्द्र कल्प में २ सागर की स्थिति वाले देवों में होता है!
८-स्थान-कषाय निमित्तक अन्य संयम स्थान है!पुलाक और कषायकुशील के जघन्यतम लब्धिस्थान है वे दोनों असंख्यात स्थानों तक एक साथ जा सकते है!इसके बाद पुलाक की व्युच्छिति होती है!आगे कषाय कुशील असंख्यात स्थानो तक अकेला जाता है इसके आगे कषायकुशील प्रतिसेवनकुशील और बकुश असंख्यात स्थानों तक एक साथ जाते है!यहाँ बकुश की व्युच्छिति होती है!इससे भी असंख्यात स्थान आगे जाकर प्रतिसेवनकुशील की व्युच्छिति होती है!पुन: इससे भी असंख्यात स्थान आगे जाकर कषायकुशील की व्युच्छिति होती है!इससे आगे अकषाय स्थान है जिनहे निर्ग्रन्थ प्राप्त करता है!इससे असंख्यात स्थान आगे जाकर इनकी व्युच्छिति हो जाती है!इससे एक स्थान आगे जाकर स्नातक निर्वाण को प्राप्त करता है !इनकी संयम लब्धि अनंत गुनी होती है !
पुलाक मुनि से ऊपर उत्तरोतर विशुद्धि वृधिगत होती है!
वर्तमान में तीन प्रकार के मुनि दृष्टिगोचर होते है!पुलाक,बकुश और प्रतिसेवना कुशील,इनकी उत्पत्ति १६ वे स्वर्ग तक है!वर्तमान में जीवों के ३ ही संहनन है,कषाय कुशील,मिर्ग्रंथ और स्नातक नहीं होते!जो मुनि राज मूलगुणों का पालन करते हो और जिनके अन्तरंग में भावलिंग हो,जिसका ज्ञान हमें नहीं हो सकता!उनका गुणस्थान हमें नहीं मालूम क्योकि पहले गुणस्थान वाले महाराजो में भी मूलगुणों का पालन उत्कृष्ट रूप से पाया जाता है!हम तो ऊपर से उनके २८ मूल गुण देख सकते है!केवल २८ मूल गुणधारी मुनि ही पूजनीय है,वे इन तीन रूप हो सकते है!वर्तमान में,आचार्यों के अनुसार पुलाक, वकुश और प्रतिसेवना कुशील अत्यंत बिरले ही पाए जाते है!
मुनि श्री 108 प्रणम्यसागरजी तत्वार्थ सूत्र with Animation
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण
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कर्मों के बंध का कारण-
मिथ्यादर्शनाविरतिप्रमादकषाययोगाबंधहेतव: १ !
संधिविच्छेद-मिथ्यादर्शन+अविरति+प्रमाद+कषाय+योगा+बंध+हेतव:
शब्दार्थ-मिथ्यादर्शन-मिथ्यादर्शन,अविरति १२ प्रकार की अविरती,प्रमाद-धार्मिक क्रियाओं अरुचि होना, कषाय-आत्मा को कषने वाला,और योगा -योग;मन वचन काय ,बंध कर्मबंध,हेतव:- के कारण है
अर्थ-मिथ्यादर्शन,अविरति,प्रमाद,कषाय,और योग (मन वचन काय ) कर्म बंध के कारण है !
भावार्थ
मिथ्यादर्शन:मिथ्यात्व कर्मोदय से सात तत्वों, नौ पदार्थों में अश्रद्धान होना अथवा अतत्वों में श्रद्धान होना मिथ्यादर्शन है! मिथ्यादर्शन के दो भेद:-१-गृहित और २- अगृहित है!
१-गृहित मिथ्यादर्शन-परोपपदेश द्वारा अतत्वों में श्रद्धान होना गृहित मिथ्यादर्शन है –
२ अगृहित मिथ्यादर्शन- परोपपदेश के अभाव में मिथ्यात्व कर्मोदय से,अगृहित मिथ्यादर्शन होता है!मिथ्यदर्शन के पांच भेद है-
१एकांतमिथ्यादर्शन-वस्तु का स्वरुप अनेकांतमय है-किसी एक अपेक्षा से वस्तु नित्य है और दूसरी अपेक्षा से अनित्य है,किसी अपेक्षा से हेय है तथा किसी अन्य अपेक्षा से उपादेय है,किसी अपेक्षा से भिन्न है और किसी अन्य अपेक्षा से अभिन्न है! उसका स्वरुप अनेकांतमय नहीं मानकर,एकांतमय ही मानना जैसे,वस्तु नित्य हीहै अथवा अनित्य ही है अथवा उपादेय ही है हेय नहीं है,वह भिन्न ही है अथवा अभिन्न ही है, इस प्रकार दोनों विपरीत गुणों में से एक ही मानना,एकांत मिथ्यादर्शन है !
२-विपरीत मिथ्यादर्शन-वस्तु के स्वरुप को आगम के विरुद्ध मानना जैसे केवली कवालाहार करते है,परिगृह सहित भी गुरु होते है ,स्त्री को भी मोक्ष प्राप्त हो सकता है,मात्र सम्यक् चारित्र से मोक्ष हो सकता है, सम्यग्दर्शन व सम्यगज्ञान की मोक्ष प्राप्ति के लिए आवश्यकता नहीं है, इत्यादि मान्यताएं विपरीत मिथ्यादर्शन है!
३-संशय मिथ्यादर्शन-भगवान् के उपदेशित वचनों में संशय करना, जैसे भगवान् ने लोक में ७ नरक और १६ स्वर्गों का उपदेश दिया ,अथवा रत्नत्रय मोक्षमार्ग है;मध्यलोक में असंख्यात द्वीप समूह है,जिनेन्द्र देव के वचनों मे संशय करना कि,ऐसा है भी या नहीं है,संशय मिथ्यादर्शन है !
४-विनय मिथ्यादर्शन-
अन्य मतियों के सभी देवी-देवताओं को जैनागम में प्रणीत देवों के सामान मानकर , सच्चे -झूठे का भेद जाने बिना,विनय,आदर श्रद्धान करना,विनय मिथ्यात्व है !
५-अज्ञान मिथ्यादर्शन-अपने हेतु कल्याणकारी अथवा अकल्याणकारी ज्ञान को प्राप्त करने में उदासीन रहना !जैसे कही सच्चे धर्म पर प्रवचन चलरहा हो वहाँ कहना कि धर्म में क्या रखा है,धर्म कुछ नहीं होता ,बस परोपकार रूप कार्य करना ही धर्म है!यह अज्ञान मिथ्यादर्शन है!
अविरति- संयम का अभाव अविरति है इसके १२ भेद है !
संयम-
१- प्राणी संयम- षटकाय जीवों की रक्षा करना प्राणी संयम, है इन की रक्षा नहीं करना प्राणी अविरति है और
२-इन्द्रिय संयम-पञ्च इन्द्रियों और एक मन को संयमित करना इन्द्रिय संयम है!इनको संयमित नहीं करना इन्द्रिय अविरति है!अर्थ पंच इन्द्रिय और मन के विषयों में रोकना !
प्रमाद -मोक्षमार्ग के कार्यों में /आत्मकल्याण कार्यों में अनादर होना,रूचि /उत्साह नहीं होना प्रमाद है!प्रमाद के १५ भेद है!
४ विकाथाओं-स्त्री कथा,राजकथा ,भोगकथा और,चोरकथ
४ कषायों-सामान्य से ४ कषाय क्रोध मान,माया ,लोभ ,
५ इन्द्रियां-स्पर्शन,रसना,घ्राण,चक्षु और कर्ण तथा ,स्नेह और निंद्रा १५ भेद प्रमाद के है!कषाय-कषाय-२५ भेद ;चरित्र मोहनीय के-१६;क्रोध,मान,माया,लोभ,प्रत्येक की अनंतानुबंधी,अप्रत्याख्यानावर ण,प्रत्याख्यानवरण,संज्वलन तथा ९ नोकर्मकषाय;हास्य,रति,अरति,शोक,भय,जुगुप्सा स्त्रीवेद,पुरुषवेद,नपुंसक वेद,भेदहै !
अनन्तानुबन्धी (क्रोध,मान,माया,लोभ) कषाय-आत्मा के सम्यक्त्व और चरित्र गुणों का घात करती है !अप्रत्याख्यानावरण (क्रोध,मान,माया,लोभ) कषाय-आत्मा के देश चारित्र नहीं होने देतीप्रत्याख्यानावरण (क्रोध,मान,माया,लोभ) कषाय आत्मा के सकल चारित्र को नहीं होने देती,मुनि पद नही धारण करने देती।
संज्वलन(क्रोध,मान,माया,लोभ) कषाय -यथाख्यात,संपूर्ण चारित्र को नहीं होने देती।
नोकर्म कषाय-हास्य,रति,अरति, शोक,भय,जुगुप्सा, स्त्री वेद,पुरुष वेद,नपुंसकवेद,इस प्रकार कुल २५ भेद कषाय के है !
हास्य-कर्म के उदय से हंसी आती है,किसी का मज़ाक उड़ाते है।
रति- कर्म के उदय से किसी के प्रति राग उत्पन्न होता है
अरति-कर्म के उदय से किसी के प्रति द्वेष उत्पन्न होता ।
शोक-कर्म के उदय से इष्ट वस्तु के वियोग से दुःख रूप परिणाम होते है।
भय-कर्म के उदय से डर रूप परिणाम होते है।
जुगुप्सा- कर्म के उदय से ग्लानि रूप परिणाम होते है।
स्त्रीवेद,-कर्म के उदय से पुरूष से रति रूप परिणाम होते है।
पुरुषवेद,-,-कर्म के उदय से स्त्री से रति रूप परिणाम होते है।
नपुंसकवेद-कर्म के उदय से स्त्री और पुरूष दोनो मे रति रूप परिणाम होते है।
ये सब कर्म बंध के कारण है।प्रमाद में कषाय सामान्य से ली गयी है जबकि कषाय में विशेष रूप से ले गयी है!
योग-मन,वचन,काय की क्रिया से जो आत्मप्रदेशों में परिस्पंदन होता है उसे योग कहते है! इन योगो के कारण भी कर्म आत्मा में आकर चिपकते है!इसलिए योग को बंधका कारण कहा है!
योग के भेद १५ –
४ मनोयोग-सत्य मनोयोग,असत्य मनोयोग,उभय मनोयोग और अनुभय मनोयोग
४ वचनयोग-सत्य वचनयोग,असत्यवचन,उभय वचनयोग और अनुभय वचनयोग
७ काययोग-औदारिक,औदारिकमिश्र,वैक्रियिक,वैक्रियिकमिश्र,आहारक,आहारकमिश्र,कर्माण काययोग
शंका -क्या संसार के सभी जीवों में बंध के पाँचों कारण पाए जाते है?
समाधान-नहीं,इन्हें गुणस्थानों की अपेक्षा समझना चाहिये जीवों में कर्मबंध का प्रथम कारण मिथ्यात्व,पहले गुणस्थान तक ही है!पहले गुणस्थान में बंध के पाँचों कारण है!
२, ३, ४ गुण स्थानों में मिथ्यात्व के अतिरिक्त;शेष चार अविरति,प्रमाद,कषाय और योग बंध के कारण है!
पांचवे गुण स्थान में क्योकि ६ काय के जीवों की रक्षा करने की प्रवृत्ति में त्रस जीवों की रक्षा से प्रारंभ हो जाते त्रस काय के जीवों की रक्षा करनी है,इसलिए १२ प्रकार की विरति में से त्रस अविरति को छोड़कर ११ अविरति,प्रमाद,कषाय,योग बंध के चार कारण है!इसलिए पांचवे गुणस्थान का नाम संयमासंयम रखा है!
छठे गुणस्थानव्रती मुनिमहाराज के अविरति नहीं होगी मात्र;प्रमाद,कषाय और योग बंध के,तीन कारण है!सप्तम गुणस्थानव्रती मुनिमहाराज के कर्मबंध के कारण मात्र कषाय और योगहै!१०वे गुणस्थान के बाद ११वे,१२वे और१३वे गुणस्थान में बंध का कारण मात्र योग है!१४ वे गुणस्थान में बंध का कोई भी कारण नहीं है!
मिथ्यादर्शन,दर्शनमोहनीय है!अवरति,प्रमाद और कषाय,चरित्र मोहनीय है,योग-योग है!अर्थात बंध के कारण मोह और योग है!पहले गुणस्थान में दर्शन मोहनीय,अन्य गुणस्थानों में चरित्र मोहनीय ऊपर तक है
इस प्रकार कर्मों के आने के ५७ द्वार है और वो ही बंध के कारण है!
बंध ,दो प्रकार का द्रव्यबंध और भावबंध !
द्रव्य बंध -कर्मों का आत्म प्रदेशों के साथ बंध जाना !
भाव बंध- आत्मा के जिन परिणामों के कारण द्रव्यबंध होता है,वे परिणाम भावबंध है!आत्मा के परिणाम;मिथ्यात्व,अविरति,प्रमाद,कषाय वयोग से कर्मों की बंध की अर्थात भावबंध की चर्चा हुई है !
द्रव्यबंध-
सकषायत्वाज्जीवःकर्मणोयोग्यान् पुदगलानादत्तेसबन्ध: २ ।
संधि विच्छेद-सकषाय त्वात्+जीव:+कर्मणा:+योग्यान्+पुद्गलान+आदत्ते +स +बन्ध:
शब्दार्थ:-सकषायत्वात्-कषाय सहित,जीव:-जीव के ,कर्मणा:-कर्म बनने के,योग्यान्-क्षमता रखने वाले ,पुद्गलान-पुद्गल परमाणुओं का ,आदत्ते-ग्रहण करना ,स -वह ,बन्ध:-बंध है !
अर्थ-जीव के कषाय(क्रोध,मान,माय ,लोभ,नोकषाय; हास्य,रति,आरती आदि ९ ) सहित कर्म बनने योग्य पुद्गल परमाणुओं को ग्रहण कर,जीव के प्रदेशों के साथ एक क्षेत्रवगाह होकर बंधना द्रव्यबंध है
भावार्थ :-आत्मा प्रदेशों पर अनंतानत विष्रोपचय/आगामी समय में आत्मा से साथ बंधने वाली कार्माण(कर्म रूप परिणमन करने योग्य) वर्गणाए विराजमान है!आत्मा में कषाय रूप परिणाम होते ही उनका आत्मा के साथ एक में एक हो कर बंधना द्रव्य बंध है!
बंध -तीन प्रकार से होता है
१-संयोग सम्बन्ध-जैसे कमीज में बटन लगाना!
२ संश्लेष सम्बन्ध-दो वस्तुओं में एक क्षेत्रवगाह सम्बन्ध,एक में एक होकर समाजाना जैसे आत्मा और कर्मों मेंएक क्षेत्रवागाह सम्बन्ध होना,आत्मा व कर्मों में यही बंध होता है! !
३-तादात्म सम्बन्ध-गुण और गुणीमें होता है!आत्मा में ज्ञान गुण है!आत्मा और ज्ञान गुण का तादात्मकसम्बन्ध-आत्मा है तो ज्ञान दर्शन है,ज्ञान-दर्शन है तो आत्मा है!
कर्मों का और आत्मा का एक क्षेत्रवागाह सम्बन्ध अनादि काल से है!
एक बार आत्मा कर्मों से मुक्त हो जाए तो उससे कर्म कभी बंधेगे ही नहीं क्योकि आत्मा के परिणाम कर्म बंध के योग्य होगे ही नहीं !
शंका-आत्मा अमूर्तिक है और कर्म मूर्तिक है तो इन दोनों का बंध कैसे संभव है?
समाधान-
संसारी जीव की आत्मा अनादिकाल से कर्मों के साथ बंधी होने के कारण व्यवहार नय से मूर्तिक ही है, इसकी पुष्टि धवलाकार आचार्य वीरसैन स्वामी ने भी करी है,शुद्ध निश्चय नय से ,शुद्धात्मा की तरह अमूर्तिक नहीं है,यद्यपि उसका स्वाभाविक परिणमन शुद्ध सिद्धावस्था में अमूर्तिक ही है!इसलिए सांसारिक अवस्था में तो आत्मामूर्तिक ही है और उसका मूर्तिक पुद्गल से बंध हो जाता है!बहुत से लोग एकांत से, आगम के विरुद्ध, अपनी आत्मा को त्रिकाल अमूर्तिक मानते है यह अनुचित है!
पुद्गल वर्गनणाये २३ प्रकार की होते है उनमे से ५ प्रकार की वर्गनणाये हमारी आत्मा के ग्रहण करने योग्य है !
१-नो कर्म वर्गनणाये- शरीर के योग्य नोकर्म आहार वर्गणाये.इनसे शरीर निर्मित होता है!
२-कार्मणवर्गनणाये – पौद्गालिक कार्मण वर्गनणाये,इनसे कर्म बनते है !
३-भाषा वर्गनणाये-शब्द भी भाषा पौद्गालिक वर्गनणाये है !
४-मनो वर्गनणाये-हमारा मन भी पौद्गालिक मनो वर्गनणाओ से बना है!
५-तेजस वर्गनणाये-तेजस शरीर जो की हमें कान्तिदेता है, भोजन पचता है, पौद्गालिक तेजस वर्गनणाओ से निर्मित है!विश्व में,आठ प्रकार की ज्ञानावरण,दर्शनावरण आदि कार्माणवर्गणाये है,ज्ञानावरण योग्य ज्ञानावरण होंगी, दर्शनावरण योग्य दर्शनावरण बनेगी इसलिय उन उन कर्मो के योग्य वर्गणाये आत्मा ग्रहण करती है! इसी का नाम बंध है!जीव कषाय सहित दोनों कर्म के योग्य कार्माण वर्गणाये और शरीर के योग्य नोकर्म वर्गणाये ग्रहण करता है!आस्रव और बंध दोनों एक ही समय में होते है,द्रव्य बंध और भाव बंध भी उसी समय होता है!
बंध के भेद –
प्रकृतिस्थित्यनुभवप्रदेशास्तद्विधय:! ३
सन्धिविच्छेद:-प्रकृति+स्थिति+अनुभव+प्रदेशा:+तत्+विधय:
शब्दार्थ-प्रकृति-प्रकृति,स्थिति-स्थिति,अनुभव-अनुभव/अनुभाग,प्रदेशा:-प्रदेश का,तत्-उसके,विधय:-भेद है
अर्थ-उस(द्रव्यबंध)के;अथिति,अनुभव/अनुभाग,स्थिति और प्रदेश,चार भेद है !
भावार्थ:-प्रकृतिबंध-आत्मा की ओर अग्रसर कार्मण वर्गणाओ का कर्मरूप परिणमन कर उनका स्व भाव निश्चित/कार्य नियत होना,प्रकृतिबंध है!जैसे;ज्ञानावरण=ज्ञान+आवरण,कर्म का स्वभाव,आत्मा के ज्ञानगुण को आवृत करना है!ज्ञानावरण कर्म की प्रकृतियों में ज्ञान आवृत करने के स्वभाव को प्रकृति बंध कहते है!
स्थितिबंध-इन कर्मरूप परिणमन करने वाली वर्गणाए/बंधे कर्म का आत्मा के साथ जुड़े रहने का समय,स्थितिबंध है!आने वाली कार्मणवर्गणाओ में ठहरने वाले काल का निश्चित होना स्थितिबंध है!
अनुभव/अनुभाग बंध-बंधेकर्मों की फलदान शक्ति,तीव्र/मंद को अनुभव/अनुभागबंध कहते है!
प्रदेशबंध-आत्मा और कार्मणवर्गणाओ का एक दूसरे में एक में एक हो कर मिलना/आत्मा और कर्मों के प्रदेशों को एक दूसरे में समाजाना /आने वाली कार्मणवर्गणाओ की संख्या का ज्ञानावरण, दर्शना वरण,वेदनीय,मोहनीय आदि का विभाजन होना,प्रदेशबंध है!
शंका:-क्या सब जीवों में बंध एक सामान होता है या अलग- अलग ?
समाधान- प्रकृतिबंध-संसार का प्रत्येक जीव १०वे गुणस्थान तक प्रतिसमय आयुकर्म के अतिरिक्त, (जिसका बंध सातवे गुणस्थान तक ही होता है) का बंध करता है उसके बाद ग्रहण की गयी कर्म वर्गणाओ में आयुकर्म का स्वभाव नहीं पड़ता,शेष सातकर्मों के योग्य वर्गणाओ को ग्रहण करता है!कषाय रूप परिणाम दसवे गुणस्थान तक होते है!मोहनीय और आयुकर्म के अतिरिक्त अन्य छ:कर्मों के योग्य वर्गणाओ का ग्रहण १०वें गुणस्थान तक होता है!११वें,से १३वें गुणस्थान तक,कर्मों के बंध योग्य वर्गणाओ को ग्रहण कर उनका मात्र सातावेद्नीय में बंध होता है!जैसे परिणाम होते है तदानु सार कर्मोंबंध होता है!
स्थिति बंध-प्रत्येक जीव में स्थितिबंध भिन्न भिन्न प्रकार का होता है!कर्म प्रकृतियों की १४८ प्रकृतियों को दो भागों;देवायु,तिर्यन्चायु,मनुष्यायु को एक तरफ और बाकी १४५ को दूसरी तरफ रखे !जीव के तीव्रकषाय,परिणामों की कम विशुद्धि के कारण,इन तीन शुभायु में से किसी एक के बंध का अपकर्ष काल(समय) होने से इन तीन शुभायु का स्थितिबंध कम और शेष १४५ प्रकृतियों का अधिक होगा!किन्तु मंदकषाय में,परिणामों की अधिक विशुद्धि के कारण इन तीन शुभायु का स्थिति बंध अधिक और शेष १४५ प्रकृतियों का कम स्थितिबंध होगा !
प्रत्येक जीव के भिन्न भिन्न परिणाम होते है इसलिए उनका स्थिति बंध भी भिन्न भिन्न होता है!
अनुभाग बंध-कर्मो के फल देने की शक्ति भी आत्मा के परिणामों पर निर्भर करती है!इसके लिए हम समस्त १४८ कर्मप्रकृतियों को शुभ-पुन्य १०० और पाप ६८ प्रकृतियों में विभाजित करते है!४७ घातिया कर्मों की समस्त प्रकृतिया पापरूप है.बाकी अघातियाकर्मों की १०१ प्रकृतियों में कुछ पापरूप जैसे; सातावेदनीय,उच्चगोत्र आदि तथा कुछ पाप रूप जैसे असातावेदनीय नीच्चगोत्र आदि है!२०-स्पर्श,रस, गंध और वर्ण की प्रकृतिया पाप और पुन्य दोनों रूप है इसलिए कुल प्रकृतियाँ १६८ हो जाती है!जीव के तीव्रकषाय के समय उसके बंधे पापकर्मों की फल देने की शक्ती अधिक होगी,पुन्य कर्मों की शक्ति कम होगी! इसके विपरीत मंद कषाय के साथ बंधे पापकर्मों में फल देने की शक्ति कम होगी और पुन्य कर्मों की शक्ति अधिक होगी!अर्थात पापकर्मो का फल कम और पुन्य कर्मों का अधिक होगा!
४-प्रदेश बंध-जीव के प्रदेशबंध हीनाधिक होता है!एक समय एक जीव कितनी (संख्या) वर्गणाओ को बांधता है!आचार्यों ने कहा है समयप्रबद्ध (अनंतानंत) वर्गणाओ को जीव प्रति समय बांधता है!प्रदेश बंध में सदा एक सी वर्गणाओ की संख्या नहीं आती है!मन,वचन,काय तीन योगो में किसी की क्रिया से यदि आत्मप्रदेशों का परिस्पंदन कम है तो आने वाले कर्म कम आयेगे किन्तु यदि अधिक है तो कर्म अधिक आयेगे!यह प्रदेशबंध-वर्गणाओ की संख्या-समयप्रबद्ध,आत्मा के प्रदेशों के परिस्पंदन पर निर्भर करता है!अत: प्रदेशबंध जीव के योग पर निर्भर करता है!जैसे जब जीव सामायिक में ध्यान मग्न होकर बैठा है तो आने वाले कर्म के प्रदेश कम आयेगें,छोटा समयप्रबद्ध और इसके विपरीत यदि किसी के साथ वह झगडा कर रहा है तो कर्म प्रदेश अधिक आयेंगे,बड़ा समयप्रबद्ध! इसलिए कर्मो की संख्या-समय प्रबद्ध,हमारे आत्मा के परिणामों पर निर्भर करती है
योग से प्रकृति और प्रदेशबंध तथा कषाय से स्थिति और अनुभाग बंध होता है! इन चारो बंधों में मिथ्यात्व का कोई रोल नहीं है! ये चारो प्रकार का बंध १३वे गुणस्थान तक होता है!
शंका:-कुछ लोगो का मत है की ११,१२,१३वे गुणस्थान में कषाय का सद्भाव है नहीं फिर स्थिति और अनुभाग बंध कैसे होता है?
समाधान-इसके लिए धवलाकर आचार्य वीरसैन स्पष्ट करते है किजब भी बंध होगा, चारों प्रकार का ही होगा!१३वें गुणस्थान में अर्हन्त भगवान् के योग है,मन,वचन,काय की क्रिया है,वे बैठते है,खड़े होते है,विहार करते है,उनकी दिव्य्ध्वानी होती है,श्वासोच्छ्वास होता है,इन सब के कारण योग है जो की बंध का कारण है!जब बंध है तो असंभव है की स्थिति और अनुभागबंध न हो!इसलिए कषाय रहित जीवों के बंध तो चारों प्रकार का होगा,प्रकृतिबंध मात्र सातावेद्नीय का होगा,प्रदेशबंध पूरा समयप्रबद्ध होगा,स्थितिबंध एक समय मात्र होगा और अनुभाग बंध १०वें गुणस्थान से असंख्यात्व भागहीन होगा!बहुत थोडा!अत: चारो प्रकार के बंध १३वें गुणस्थान तक प्रत्येक जीव के होगा!
प्रकृतिबंध भेद-
आद्योज्ञानदर्शनावरण वेदनीयमोह्नीयायुर्नामगोत्रान्तराय: ४
संधिविच्छेद-आद्य:+ज्ञानावरण+दर्शनावरण+वेदनीय+मोह्नीय+आयु:+नाम+गोत्र+अन्तराय:
शब्दार्थ-आद्य:-पहले/प्रकृतिबंध के;ज्ञानावरण,दर्शनावरण,वेदनीय,मोह्नीय,आयु,नाम,गोत्र और अन्तराय: कर्म भेद है
अर्थ
ज्ञानावरणकर्म-आत्मा के ज्ञानगुण को स्वभावत: आवृत करता है,आयी कार्मण वर्गणाए मे से कुछ में ज्ञानगुण को ढकने का स्वभाव पड़ने से,उन्हें ज्ञानावरण कर्म कहते है !
दर्शनावरण-आत्मा के दर्शन-सामान्य अवलोकन गुण को स्वभावत: आवृत करता है,आयी कार्मण वर्गणाए मे से कुछ में दर्शनगुण को ढकने का स्वभाव पड़ने से,उन्हें दर्शनावरण कर्म कहते है वेदनीयकर्म-आत्मा को सुख और दुःख का स्वभावत: वेदन कराने वाला वेदनीय कर्म है!
मोहनीयकर्म-आत्मा को स्वभावत: मोहित कर ५-आस्तिकाय,६ द्रव्यों ७ तत्वों,नव पदार्थों के परिचय में बाधक,मिथ्यात्व/कषायों को प्रेरित करने वाला मोहनीयकर्म है!
आयुकर्म-आत्मा को नरक,तिर्यंच,मनुष्य व देव के शरीर में स्वभावत: निश्चित समय तक रोकता है नामकर्म-आत्मा को स्वभावत:नाम देता है;उसके शरीर;देव,तिर्यंच,मनुष्य,नारकी का निर्माण करता है
गोत्रकर्म-आत्मा को उच्च या नीच्च कुल में स्वाभावत:उत्पन्न कराता है!
अन्तरायकर्म-आत्मा के दान,लाभ,भोगोपाभोग,वीर्य गुण में स्वभावत: बाधक होता है!
भावार्थ-प्रकृतिबंधकर्म के सामान्यत:;ज्ञानावरण,दर्शनावरण,वेदनीय,मोह्नीय,आयु,नाम,गोत्र और अन्तराय,८ भेद है!
प्रकृतिबंध के उत्तर भेद-
पञ्चनवद्व्यष्टाविंशतिचतुदर्विचत्वारिंशद्-द्विपञ्चभेदायथाक्रमम् ५
संधिविच्छेद-पञ्च+नव+द्वि+अष्टा+विंशति+चतु:+द्वि+चत्वारिंशद्+द्वि+पञ्च+भेदा+यथा+क्रमम्
शब्दार्थ-पञ्च-५,नव-९,द्वि-२,{अष्टा-८,विंशति-२०)}=२८,चतु:-४,द्वि -२ {चत्वारिंशद्-४x१०+द्वि-२)}-४२,पञ्च-५,भेदा-भेद,यथा-उक्त सूूत्र मे कहे गये,क्रमम्-क्रमश:
अर्थ-ज्ञानवरणीय-५,दर्शनावरणीय-९,वेदनीय-२,मोहनीय-२८,आयु-४,नाम-४२,गोत्र-२,अंतरायकर्म-५ भेद है!
भावार्थ-प्रकृतिबंध;ज्ञानावरण-५,दर्शनावरण-९,वेदनीय-२,मोहनीय-२८,आयु-४,नाम-४२,गोत्र-२ और अन्तराय -५ उत्तर भेद है !
विशेष-४ घातियाकर्म;ज्ञानावरण,दर्शनावरण,मोहनीय और अन्तराय आत्मा के अणुजीवी गुणों का घात करते है,४ अघातिया कर्म:वेदनीय,आयु,नाम और गोत्र कर्म प्रीतिजीवी गुणों,(जिनके अभाव में भी जीव का जीवत्व,सुरक्षित रहता है),का ही घात करते है!
इन कर्मों को इसी क्रम में रखने का कारण-
वेदनीयकर्म का अनुभव मोहनीय के साथ ही होता है,इसलिए उसे मोहनीय से पहले रखा है! अन्तराय कर्म अंत में इसलिए रखा है क्योकि यह घातियाकर्म;दान,लाभ,भोगोपभोग और वीर्य का घात पूर्णतया नहीं करता,संसार में कोई जीव ऐसे नहीं है जिनका इन ५ गुणों का क्षयोपशम नहीं हो,अंत: पूर्णतया नाश न करने से अघातियाकर्म के सामान ही कार्य करता है!अन्तराय कर्म;अपना फल तभी देता है जब आयु,गोत्र और नामकर्म अपना कार्य करते है!
कर्म के तीन भेद है!-
१-द्रव्यकर्म-आत्मा के साथ संश्लेषित होने वाली पुद्गल कार्मण वर्गणाए द्रव्यकर्म है!जैसे ज्ञानावरण, दर्शनावरण आदि ‘अजीव’ द्रव्यकर्म है !
२-भावकर्म-उन द्रव्य कर्मो के उदय से जीव के जो भाव होते है या जिन भावों के कारण द्रव्य कर्म आत्मा से संलेषित होते है,वे भावकर्म जीव के अत: ‘जीव’ है
३-नोकर्म-शरीर को नोकर्म कहते है!ये ‘अजीव’ है!
पुद्गलकार्मणवर्गणाए,आत्मा के राग-द्वेष आदि परिणामों के निमित्त से,कर्मरूप परिणमन कर,आत्मा से बंधती है और द्रव्य क्षेत्र,काल,भाव के अनुसार फल देती है!इनमे पुद्गल होने पर भी फल देने की शक्ति होती है!कार्मण वर्गणाओ के अतिरिक्त अन्य वर्गणा में फल देने की शक्ति नहीं होती है!
ज्ञानावरणप्रकृति बंध के ५ भेद –
मतिश्रुतावधिमन:पर्यायकेवलानाम् ६
सन्धिविच्छेद-मति+श्रुत+अवधि+मन:पर्याय+केवलानाम्
शब्दार्थ-मति,श्रुत,अवधि,मन:पर्याय और+केवल ज्ञानवरण उनके(ज्ञानावरण कर्म प्रकृति के)नाम् है
अर्थ:-मतिज्ञानावरण-जिस कर्म के उदय में,मन और इन्द्रियों द्वारा होने वाले मतिज्ञान का आवरण होता है,मतिज्ञानावरण कर्म है!
श्रुत ज्ञानावरण-पदार्थों के मतिज्ञानपूर्वक जाने गए विशेषज्ञान को श्रुतज्ञान कहते है!जो कर्म श्रुतज्ञान का आवरण करता,वह श्रुतज्ञानावरणकर्म है!
अवधिज्ञानावरण-जिस कर्म के उदय से जीव के अवधिज्ञान का आवरण होता है,उसे होने नहीं देता, वह अवधिज्ञानावरणकर्म है!अवधिज्ञान;द्रव्य,क्षेत्र,काल,भाव की मर्यादा सहित रुपी पदार्थों को इन्द्रियों और मन की सहायता के बिना,आत्मा से स्पष्ट जानता है!
मन:पर्यायज्ञानावरण-जिस कर्म के उदय में मन:पर्ययज्ञान का आवरण होता है,मन;पर्यायज्ञानावरण कर्म है!मन: पर्ययज्ञान दूसरे के मन को जानकर,उसके चिंतित और अचिंतित पदार्थों को जानता हैकेवलज्ञानावरण-केवल ज्ञान त्रिकालवर्ती समस्त द्रव्यों की अनंतांत पर्याय को क्रम रहित,आत्मा से युगपत स्पष्ट जानना है!जो कर्म केवलज्ञान का आवरण करता है वह केवलज्ञानावरण कर्म है!
भावार्थ-ज्ञानावरण प्रकृति कर्म के;मति,श्रुत,अवधि,मन:पर्याय और केवलज्ञानावरण ५ भेद है!
क्या हमारे पाँचों ज्ञानों का उदय रहता है?
समाधान-हमारे पाँचों ज्ञानों का उदय रहता है!घातियाकर्मों के दो भेद;
१-देशघाती प्रकृति:-गुण का एकदेश और सर्वदेश दोनों तरह से घात करती है;मति,श्रुत,अवधि और मन:पर्यय देशघाती कर्म प्रकृति है और
२-सर्वघाती प्रकृति:-गुण का पूर्ण रूप से घात करती है! ज्ञानावरण की मात्र केवलज्ञानावरण सर्वघाती प्रकृति है!हमारे केवल ज्ञानावरण का उदय है इसलिए केवलज्ञान नही है,उसने केवलज्ञान को पूर्णतया आवृत कर रखा है!
हमें मन:पर्यायज्ञानावरण और अवधिज्ञानावरण के सर्वघाती स्पर्धकों का उदय है,इसलिए मन:पर्याय और अवधिज्ञान नहीं है!हमारे सिर्फ मति और श्रुतज्ञान का उदय,इन दोनों के देशघाती स्पर्धकों का उदय होने के कारण है,पूर्णतया ढका हुआ नहीं है,इसलिए आंशिक मति और श्रुतज्ञान है!उदय पाँचों ज्ञान का है!अवधि,मन:पर्यय के सर्वघाती स्पर्धकों का,केवलज्ञान के सर्वघातीप्रकृति का,मति और श्रुत के देशघाती स्पर्धकों का उदय रहता है जिस के कारण मति और श्रुतज्ञान थोडा थोडा हमें रहता है !
शंका-अभव्य जीव के मन:पर्ययज्ञान और केवलज्ञान की शक्ति होती है या नही?यदि है तो अभव्य नही और यदि नही है तो उसके ये दोनों के ज्ञानावरण मानना व्यर्थ है!
समाधान- द्रव्यार्थिकनय की अपेक्षा इन दोनों ज्ञान की शक्ति अभव्य जीवों में होती है किन्तु पर्यार्थिक नय की अपेक्षा नहीं होती है !
शंका-यदि भव्य और अभव्य दोनों में ही इन ज्ञानो को प्रगट करने की शक्ति होती है तो भव्य और अभव्य
का भेद नहीं बनता !समाधान-शक्ति होने या नहीं होने की अपेक्षा भव्य और अभव्य का भेद नहीं है बल्कि उन् शक्तियों को प्रगट करने और नहीं करने की क्षमता की अपेक्षा भव्य और अभव्य जीव में भेद है!जिस जीव के कभी सम्यग्दर्शनादि गुण प्रगट होंगे वे भव्य और जिनके प्रगट नहीं होंगे उन्हें अभव्य जीव कहते है!
दर्शनावरण प्रकृति के ९ भेद –
चक्षुरचक्षुरवधिकेवलानाम् निद्रा निद्रा निद्राप्रच्ला प्रच्ला प्रच्ला स्त्यांगृद्धयश्च ७
संधि विच्छेद:-चक्षु:+अचक्षु:+अवधि+केवलानाम्+निद्रा+निद्रानिद्रा+प्रच्ला+प्रच्लाप्रच्ला+स्त्यांगृद्धि:+च
शब्दार्थ:-चक्षु:,अचक्षु:,अवधि,केवलानाम्,निद्रा,निद्रानिद्रा,प्रच्ला,प्रच्लाप्रच्ला और स्त्यानगृद्धि दर्शनावरण कर्म के ९ भेद है
अर्थ-चक्षु,अचक्षु,अवधि,केवल,निद्रा,निद्रानिद्रा,प्रचला,प्रचलाप्रचला व स्त्यानगृद्धि दर्शनावरण प्रकृति के ९ भेद है
भावार्थ-
चक्षु:दर्शनावरण-चक्षुइन्द्रिय द्वारा होने वाले ज्ञान से पूर्व होने वाले सामान्य अवलोकन को चक्षुदर्शन कहते है,जो कर्म उस चक्षुदर्शन को आवृत करे,चक्षुदर्शनावरण कर्म है!
अचक्षुदर्शनावरण-चक्षु इन्द्रिय के अतिरिक्त शेष चारों इन्द्रियों तथा मन से होने वाले ज्ञान से पूर्व जो सामान्य अवलोकन होता है उसे अचक्षुदर्शन कहते है और जो कर्म उस अचक्षुदर्शन को आवृत करे, अचक्षुदर्शनावरण कर्म है !
अवधिदर्शनावरण-अवधिज्ञान से पूर्व होने वाले सामान्य अवलोकन,को अवधिदर्शन कहते है और जो कर्म,उस अवधिदर्शन को आवृत करे,अवधिदर्शनावरणकर्म है!
केवलदर्शनावरण-केवलज्ञान के साथ होने वाले सामान्य अवलोकन को केवलदर्शन कहते है और जो कर्म उस केवलदर्शन को आवृत करे,केवल केवलदर्शनावरण कर्म है!
निद्रादर्शनावरण-जिस कर्म के उदय से नींद आती है,निद्रादर्शनावरण कर्म है
निद्रानिद्रादर्शनावरण-जिस कर्म के उदय से गहरी नींद आती है,निद्रानिद्रा दर्शनावरण कर्म है
प्रचलादर्शनावरण-जिस कर्म के उदय से कुछ जागे से,कुछ सोये से रहते है प्रचला दर्शनावरण है!
प्रचलाप्रचलादर्शनावरण-जिस कर्म के उदय से नींद में मुह विकृत हो जाता है और लार आती है वह प्रचलाप्रचलादर्शनावरण कर्म है!
स्त्यानगृद्धिदर्शनावरण-जिस कर्म के उदय से जीव सोते सोते नदी भी तैर कर दुसरे छोर पहुँच कर कार्य कर लौट आता है,पुन:सो जाता है किन्तु उसे स्मरण नहीं रहता,वह स्त्यानगृद्धिदर्शनावरण है!
दर्शनावरण प्रकृति कर्म के ये ९ भेद है
विशेष-
१-दर्शन-सामान्य अवलोकन,जहा आत्मा का ज्ञान की ऒर प्रयास तो होता है,किन्तु ज्ञान नहीं होता, उसे आत्मा का दर्शन गुण कहते है!जो कर्म दर्शन गुण को आवृत करे उसे दर्शनावरण कहते है! २-चक्षु,अचक्षु,अवधि और केवलदर्शन पहले चार दर्शनोपयोग में बाधक है,उसे आवृत करते है और शेष पांच दर्शनोपयोग होने पर उसका क्षय करते रहते है,इस लिए इन्हें सूत्र में अलग अलग रखा है!
३-दर्शनावरण के,पहले चार का उदय १२वे गुणस्थान तक सब जीवों में रहता है!इनके क्रमश उदय उन के दर्शनों को क्रमश आवृत करते है!हमारे केवलदर्शनावरण और अवधिदर्शनावरण का उदय होने से हमारे केवलदर्शन और अवधिदर्शन नहीं है!चक्षुदर्शनावरण और अचक्षुदर्शनावरण के देशघाती स्पर्धकों का उदय होने,उसका क्षयोपशम होने से चक्षु और अचक्षु दर्शन है,इसलिए इन चारों का उदय प्रत्येक जीव;निगोदिया,एकेंद्रिय के भी रहता है!शेष पंचों निद्राओं में से एक समय में,जीव के एक का ही उदय रहता है!उससे अधिक का नहीं!जब निद्रा का उदय होगा तो अन्य चार का नहीं,जब प्रचला का उदय होगा तो अन्य चार का नहीं,इसी प्रकार सब निद्राओं में है,इसलिए हमारे पहली चार का निरंतर और बाकी पांच में से किसी एक का उदय रहता है!कोई भी जीव एक अंतरमूहर्त से अधिक लगातार न तो जाग सकता है और न ही सो सकता है,अर्थात पांच निद्राओं में कोई भी अंतर्मूर्हत से अधिक नहीं रह सकती,अंतर्मूर्हत के बाद इनमे से किसी का उदय आयेगा ही और अंतरमूहूर्त से अधिक रहता भी नहीं!अत: एक अंतरमूहूर्त के बाद जीव जागेगा ही,उसे कोई रोक नहीं सकता!
वेदनीय प्रकृति कर्म के भेद –
सदसद्वेद्ये !!८!!
संधिविच्छेद-सद्+असद्+वेद्ये
शब्दार्थ-सद्-साता,असद्-असाता,वेद्ये-वेदनी
अर्थ-वेदनीय कर्म के दो भेद है!
साता वेदनीय-जिस कर्म के उदय से सुखमय सामग्री की प्राप्ति होती है तथा
२-असाता वेदनीय-जिस कर्म के उदय से दुखमय सामग्री प्राप्त होती है, !
भावार्थ-संसार में जितनी भी सुख का अनुभव कराने वाली वस्तु जैसे गुणवान पत्नी,पुत्र,पुत्री,संपन्न परिवार,धन-दौलत,यश आदि साता वेदनीय कर्म के उदय से मिली है और जितनी दुःख देने वाली वस्तुये जैसे अपयश,रोग,खराब पति,पुत्र,पुत्री,दरिद्रपरिवार आदि असाता वेदनीय कर्म के उदय से मिली है!
विशेष-सातावेदनीयकर्म और असातावेदनीयकर्म की जघन्य स्थिति १२ अंतर्मूर्हत और उत्कृष्ट स्थिति क्रमश १५ कोड़ा कोडी सागर तथा ३० कोड़ाकोडीसागर है!सातावेदनीय कर्मबंध प्रथम गुणस्थान से १० वे गुणस्थान तक और ईर्यापथ आस्रव के साथ १३वे गुणस्थान तक १ समय स्थिति का,अत्यंत क्षीण अनुभाग का केवलीभगवान के होता है जबकि असातावेदनीयबंध प्रथम से छठेगुणस्थान तक होता है!
दर्शनचारित्रमोहनीयाकषायकषायवेद्नीयाख्यासत्रि-द्वि-नव-षोडशभेदा: सम्यक्त्वमिथ्यात्वतदुभयान्यकषायकषायौहास्यरत्यरतिशोकभयजुगुप्सा स्त्रीपुन्नपुंसकवेदाअनन्तानुबन्ध्यप्रत्याख्यानप्रत्याख्यानसंज्जवलन विकल्पाश्चैकशःक्रोधमानमायालोभः !!९!!
संधिविच्छेद:-
(दर्शन+चारित्र)+मोहनीय+(अकषाय+कषाय)वेद्नीय+आख्यास+त्रि+द्वि-नव+षोडश+भेदा:+सम्यक्त्व+मिथ्यात्व+तत्+उभयानि+(अकषाय+,कषाय)वेद्नीय+हास्य+रति+अरति+शोक+भय+जुगुप्सा+स्त्रीवेदा+ पुरूषवेदा+नपुंसकवेदा+अनन्तानुबन्धि+अप्रत्याख्यान+प्रत्याख्यान+ संज्जवलन+विकल्पा:+च+ऐकशः+क्रोध+मान+माया+लोभः
शब्दार्थ-दर्शन-दर्शनमोहनीय,चारित्र-चारित्रमोहनीय;अकषाय-अकषायवेदनीय और कषाय वेद्नीय,आख्यास-कहे है,त्रि-तीन,द्वि-दो,नव-नौ,षोडश-१६,भेदा:-भेद हैं,सम्यक्त्व+मिथ्यात्व+तत्+उभयानि+अकषायवेद्नीय कषायौवेद्नीय;हास्य,रति,अरति,शोक,भय,जुगुप्सा,स्त्रीवेदा,पुरूषवेदा,नपुंसकवेदा;अनन्तानुबन्धि,अप्रत्याख्यान,प्रत्याख्यान,संज्जवलन,विकल्पा:-विकल्प से,चैकशः-चार-प्रत्येक के;क्रोध,मान,माया,लोभः
अर्थ-मोहनीयकर्म के दो भेद;
१-दर्शनमोहनीय -तीन भेद; (क)सम्यक्त्वप्रकृति,
(ख)मिथ्यात्वप्रकृति और
(ग) (तत्-उनके,उभायानि-उनके उभय )-अर्थात सम्यक-मिथ्यात्व प्रकृति है!और
२-चरित्र मोहनीय-दो भेद;
(क)अकषाय वेदनीय के ९- हास्य रति, अरति,शोक,भय,जुगुप्सा, स्त्रीवेद,पुरुषवेद और नपुंसक वेद है! और
(ख) कषायवेदनीय के १६ भेदअनंतानुबंधी,अप्रत्याख्यान,प्रत्याख्यान और संज्वलन के विकल्प से प्रत्येक के चार- चार भेद क्रोध,मान,माया,लोभ है,!
भावार्थ-
मोहनीय कर्म-जो कर्म आत्मा को मोहित करे,आत्मा के दर्शन,चरित्रगुण का घात करे!
१-दर्शनमोहनीय-जो कर्म आत्मा के सम्यक्त्व गुण का घात करता है,दर्शनमोहनीय कर्म है!
(क) सम्यक्त्व प्रकृति-सम्यक्त्वप्रकृति,सम्यक्त्व का घात तो नहीं करती,किन्तु सम्यक्त्व को सदोष करती है!सम्यगदर्शन में चल,मल,अगाढ़ दोष जिसके उदय में लगते हैं वह सम्यक्त्वप्रकृतिहै!
चलदोष-शांतीनाथ भगवान् शांति प्रदान करते है पार्श्वनाथ भगवान् संकट मोचक है,अमुक हमारी बिरादरी का मंदिर है,आदि मानना चलदोष है!
मल दोष-सम्यक्त्व के २५ दोष में से किसी का कदाचित कभी सम्यक्त्व में लग जाना!
अगाढ़ दोष-श्रद्धान है किन्तु प्रगाढ़ नहीं होना,अगाढ़ दोष है!जैसे किसी वृद्ध की लाठी चलते समय हिलती डुलती रहना!
(ख)मिथ्यात्व प्रकृति- के उदय में तत्वों में श्रद्धान समाप्त अथवा विपरीत हो जाता है
(ग) सम्यक-मिथ्यात्व प्रकृति-जहा आत्मा के कुछ परिणाम सम्यक्त्व रूप होते है और कुछ मिथ्यात्व रूप होते है जैसे अपने सच्चे देव वन्दनीय है ही,किन्तु अन्य मतियों के देवों का चमत्कार देख ने पर मानना की इनके पास इतन्रे भीड़ आती है ये भी सच्चेदेव से ही है,ऐसे मानते ही चतुर्थ गुणस्थान से तीसरे गुणस्थान में जीव आजाते है जिसका अधिकत्तम काल अंतरमूहूर्त है!यदि वह यही मानते रहे की अन्य मती के देव अपने जैसे सच्चे है तो तीसरे से प्रथम मिथ्यात्वगुणस्थान में,मिथ्यात्व के उदय के कारण गिर जायेगे किन्तु यदि पुन: अपने को संभाल कर विचार आया की नहीं अपने वीत रागी,हितोपदेशी,सर्वज्ञ ही सच्चे देव है अन्य नहीं तो तीसरे से फिर चौथे गुणस्थान में पहुँच जायेगे क्योकि मिथ्यात्व का उदय नहीं रहेगा!
२-चरित्र मोहनीय-जो आत्मा के चरित्र गुण का घात करता है,चरित्र मोहनीय है!
(क)अकषाय वेदनीय–किंचित (मंद) कषाय का वेदन कराये!(१) हास्य -जिसके उदय से हस्सी आवे ,२-रति-जिसके उदय से कोई वस्तु अच्छी लगे,३-अरती-जिसके उदय से कोई वस्तु अच्छी नहीं लगे,४-शोक-जिसके उदय से इष्ट वस्तु के वियोग में शोक अनुभव हो,५- भय-जिसके उदय से भय लगे,६-जुगुप्सा-जिसके उदय से घृणा का भाव जागृत हो,७-स्त्री वेद-जिसके उदय में पुरुष से रति के भाव जागृत हो,८-पुरुष वेद-जिसके उदय में स्त्री से रति के भाव जागृत हो,९-नपुंसकवेद-जिसके उदय में स्त्री और पुरुष दोनों के प्रति रति के भाव जागृत हो !
(ख) कषाय वेदनीय-जो कर्म कषाय का वेदन कराये!
अनंतानुबंधी-क्रोध,मान,माया,लोभ.-अनंतानुबंधी कषाय आत्मा के सम्यक्त्व और चारित्र,दोनों गुणों का घात करती है!अनंतानुबंधी कषाय के उदय में विपरीत अभिप्राय होने से या अभिप्राय के दोषित होने से,सम्यक्त्व का घात होता है,तत्वों का श्रद्धान समाप्त हो जाता है!इसीलिए चतुर्थगुणस्थान में उपशम सम्यगदृष्टि जीव के कदाचित अनंतानुबंधी का उदय होसे वह सम्यक्त्व से छूट कर दूसरे गुणस्थान ससदान में आकर सम्यक्त्व रहित हो जाता है!अभी मिथ्यादृष्टि तो नहीं कहेगे,क्योकि मिथ्यात्व का उदय नहीं आया!अनंतानुबंधी कषाय चारित्र की घात करने वाली अन्य तीन अप्रत्याख्यानावरण, प्रत्या ख्यानावरण और संज्वलन कषाय के प्रवाह को अनंत बनाये रखती है,कहती है जब तक मैं हूँ तुम्हारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता! जो क्रोध,मान,माया,लोभ रूप परिणाम ६ माह से अधिक रह जाए जैसे किसी से लड़ाई होने पर बैर भाव बाँध लिया ६ माह तक क्षमा याचना नहीं हुई तो वह अनंतानुबंधी कषाय बन जाती है
अप्रत्याख्यान कषाय-क्रोध,मान,माया,लोभ.-के उदय में देशचारित्र लेने के योग्य परिणाम नहीं होते, अर्थात कोई कहे की एक-दो प्रतिमा ले लीजिये तो कहना की हम प्रतिमा नहीं ले सकते,ये परिणाम अप्रत्याख्यान कषाय के उदय से होते है!यदि ये परिणाम १५ दिन से अधिक चल जाए तो अप्रत्या ख्यानावरण कषाय बन जाती है!
प्रत्याख्यान कषाय-क्रोध,मान,माया,लोभ- के उदय में सकल चारित्र धारण करने अर्थात मुनित्व योग्य परिणाम नहीं होते!यदि ये परिणाम अंतरमुर्हूर्त से अधिक चले तो प्रत्याख्यानावरण कषाय कहलाती है
संज्वलन कषाय -क्रोध,मान,माया,लोभ- जिस के उदय में यथाख्यात चारित्र नहीं होपाता,यदि ये परिणाम अंतरमूर्हूर्त तक ही रहे तो संज्वलन कषाय होती है! अनंतानुबंधी कषाय आत्मा के साथ करोड़ो,सागरों वर्षो तक चलती है! इन चारों कषायों का वासना काल उत्तरोत्तर बढता जाता है!इसीलिए क्षमावाणी पर्व वर्ष में तीन बार माघ,चैत्र और भादों में मनाया जाता है जिससे किसी भी जीव के प्रति ६ माह से अधिक ये कषाय नहीं रहे! आपस में अपने ह्रदय का मैल साफ़ करते रहे! जिससे अनंतानुबंधीकषाय नहीं बन सके और मिथ्यात्व से दूर रह सके! अनंतानुबंधी कषाय होने से मिथ्यात्व का साहचर्य होता ही है!मोहनीय कर्म की सबसे हानि कारक दर्शनमोहनीय की तीन प्रकृतिया मिथ्यात्व,सम्यक मिथ्यात्व और सम्यक प्रकृतियाँ है!इनमे भी सबसे खराब मिथियात्व प्रकृति है!इससे बचने के लिए जिनवानी का स्वाध्याय करना चाहिए उससे सात तत्वों,९ पदार्थों का स्वरुप,सच्चे देव शास्त्र गुरु का स्वरुप समझकर प्रगाढ़ श्रद्धांन होना चाहिए की जिनवाणी,हमारे शास्त्रों में जो लिखा है,उसके अनुसार ही पदार्थों,देव शास्त्र,गुरु आदि का स्वरुप है, सब कुछ वैसे ही है जैसा की तीर्थंकरों की दिव्यध्वनि से गणधरदेव ने प्राप्त कर द्वादशांग रूप श्रुत गुथा!वही,श्रुतकेवली,पूर्वज्ञानी,अंगधारीयों और आचार्यों के माध्यम से हमारे पास जिनवानी के रूप में पहुंचा!ऐसा ज्ञान होने से हमें भेद ज्ञान होगा कि आत्मा और शरीर भिन्न भिन्न है!जब हमें मालूम होगा की शरीर क्या है और मै क्या हूँ,कौन हूँ?जब उस पर दृढ श्रद्धां होगा तो दर्शनमोहनीय का उपशम होने से प्रथमोपशम सम्यगदर्शन होगा और दर्शनमोहनीय से पीछा छुट जाएगा !
सबसे पहले प्रथमोपशम समय्क्त्व ही होता है!प्रथमोपशम समय्क्त्व से तात्पर्य दर्शन मोहनीय की तीन और अनंतानुबंधी की चार प्रकृतियों के दब जाने से,इनके उदय का अभाव हो जाने से,आत्मा में सम्यक्त्व गुण प्रकट हो जाता है!हमारा लक्ष्य इस जीवन में प्रथमोपशम सम्यक्त्व की प्राप्ति अवश्य होना चाहिए!यह लक्ष्य प्राप्त करते ही हमारा अनंत संसार भ्रमण बहुत थोडा रह जायेगा तथा आगामी भवों में से कभी न कभी तो मोक्ष प्राप्त होगा ही!
सम्यगदर्शन प्राप्त करने के लिए पूरा प्रयास करना चाहिए! साधारणतया हमें ज्ञात नहीं होता की सम्यगदर्शन हमें हुआ या नहीं!जो कहते है की सम्यगदर्शन होने पर आत्मा दिखने लगती है,यह गलत है क्योकि आत्मा तो अमूर्तिक है!
यदि हमें सात तत्वों,नव पदार्थों,सच्चे देवशास्त्र,गुरु में श्रद्धां दृढ है तो निश्चित रूप से सम्यगदर्शन हुआ है! हमें निरंतर इस जीवन में सम्यगदर्शन प्राप्त करने के लिय प्रयास करते रहना चाहिए और ध्यान रखना चाहिए की हमारे सम्यक्त्व में २५ दोषों-८ शंकादि, ८ मद,६ अनायतन,३ मूढ़ताओं ,में से कोई लगने नहीं दे !सम्यगदर्शन प्राप्त करने के साथ साथ अपना आचरण भी हमें अच्छा रखना चाहिए, सप्तव्यसन का त्याग करे,अष्ट मूलगुण धारण करे तत्पश्चात अपना खाना-पीना ,व्यापार आदि अहिंसक बनाये!फिर धीरे धीरे १,२,३,४-११ प्रतिमा धारण करने का प्रयास करे जहाँ तक पहुँच सके उतना अच्छा है!स्त्री पर्याय हो तो आर्यिका तक पहुचने का प्रयास करे!पुरुष पर्याय है तो मुनि महाराज तक बन्ने का प्रयास करे!ये अनंत संसार काटने के उपाय है!इन्हें जीवन में उतारने का प्रयास करना चाहिए!
नव-गृह पूजा मिथ्यात्वी है,कालसर्प विधान का जैन शास्त्रों में कोई विधान नहीं है!शनि को परास्त करने के लिए मुनिसुव्रत भगवान् की पूजा करना मिथ्यात्व का पोषण है!समस्त भगवन की शक्ति एक सामान है फिर यह भेद क्यों?देवी देवताओं की पूजाओं का बोलबाला हो रहा है जिससे मिथ्यात्व का ही पोषण हो रहा है!हमें इन सब को छोड़ना पडेगा तभी आगे बढ़ सकेगे,मात्र तत्वार्थ सूत्र का अध्ययन सुनने,पढ़ने से कुछ नहीं होगा उसे जीवन में भी उतारना पडेग!हमें अपने बच्चों को संस्का रित करना चाहिए,आजकल बच्चों को धर्म में रूचि नहीं रह गयी है,मंदिर नहीं जाते,जाते है तो आधे मन से,वे अंतर्जातीय विवाह करने लगे है,ऐसे ही चलता रहा तो जैन धर्म का विनाश समय से पूर्व शीघ्र हो जाएगा! मोहनीयकर्म के कारण ही हम संसार भ्रमण करते है!इसको ही नष्ट करने का प्रयास करना है!
आयुकर्म के भेद-
नारकतैर्यग्योनमानुषदैवानि!!१०!!
संधिविच्छेद-नारक+तैर्यग्योन+मानुष+दैवानि
शब्दार्थ -नारक-नारक ,तैर्यग्योन-तिर्यंच योनि ,मानुष-मनुष्य और दैवानि-देव भेद है
अर्थ-नारकी,देव,तिर्यंच या मनुष्य शरीर में आत्मा को निश्चित समय तक रोकने वाला आयु कर्म है उसके क्रमश:नारकायु,तिर्यंचायु,देवायु,और मनुष्यायु भेद है!
विशेष-ये चारो भव विपाकी कर्म प्रकृति है !जिस पर्याय में जीव उतपन्न होता है वहां उसका जीना मरना उस पर्याय संबंधी आयुकर्म के आधीन है ,प्राणों में आयु कर्म मुख्य है भव धारण का मुख्य कारण आयुकर्म है
नामकर्म प्रकृति बंध के भेद-
गतिजातिशरीरान्गोपांगनिर्माणबंधनसंघातसंस्थानसंहननस्पर्शरसगंध वर्णानुपूर्व्यागुरुलघूपघातपरघातातपोद्योतोच्छ्वासविहायोगतयप्रत्येक शरीरत्रससुभगसुस्वरशुभसूक्ष्मपर्याप्तिस्थिरादेययश:कीर्तिसेतराणितीर्थं करत्वं च!!११!!
संधिविच्छेद-गति+जाति+शरीर+अंगोपांग+निर्माण+बंधन+संघात+संस्थान+संहनन+स्पर्श+रस+गंध+वर्ण+आनुपूर्वि+अगुरुलघु+उपघात+आतप+उद्योत+उच्छ्वास+विहायोगतय-:+प्रत्येक+शरीर+त्रस+सुभग+सुस्वर+ शुभ+सूक्ष्म+पर्याप्ति+स्थिर+आदेय+यश:कीर्ति+सेतराणि+तीर्थंकरत्वं+च!
अर्थ-नामकर्म के भेद:-
१-गति नामकर्म-के उदय से जीव को नरक,देव,तिर्यंच या मनुष्य गति मिलती है!नरक,देव,तिर्यंच और मनुष्यगति,गतिनाम कर्म के ४ भेद है !
२-जाति नामकर्म-के उदय से जीव पांच में से किसी एक जाति में उत्पन्न होते है! जाति के एक,द्वि,त्रि,चार और पंचेन्द्रिय ५ भेद है!
३-शरीर नामकर्म-के उदय से जीव को औदारिक,वैक्रियिक,आहारक,तेजस और कार्मण शरीर मिलता है! सांसारिक जीव के तेजस और कार्माण और पहिले दो में से कोई एक शरीर प्राप्त होता है!आहारक शरीर,छठे गुणस्थानवर्ती मुनिराज को ततपश्चरण फलस्वरूप मिलता है !
४-अंगोपांग नामकर्म-के उदय से प्राप्त शरीर के अंगो और उपांगों का निर्माण होता है!
५-निर्माण नामकर्म-के उदय से प्राप्त शरीर में यथास्थान,यथाप्रमाण अंगो का निर्माण होता है!
६-बंधन नामकर्म-के उदय से शरीर के योग्य प्राप्त नोकर्म वर्गणाये आपस में एक में एक होकर जुडती है!पांचों शरीर के पञ्च बंधन; क्रमश:औदारिकबंधन,वैक्रियिकबंधन,आहारकबंधन,तेजसबंधन और कार्मणबंधन,भेद है
७-संघात नामकर्म-के उदय से,बंधन नाम कर्म द्वारा प्राप्त नोकर्म वर्गणाओ का बंधन,छिद्र रहित चिकना,एक में एक होकर मिल जाता है,पांचों शरीर के पञ्च संघात क्रमश:औदारिकसंघात,,वैक्रियिक[b]संघात,आहारक[/b][b]संघात,तेजससंघातऔर कार्मणसंघात,[/b]भेद है
८-संस्थान नामकर्म-के उदय से शरीर को आकार मिलता है,इसके ६ भेद है
१-समचतुरस्र संस्थान-शरीर के सम्पूर्ण आकार-प्रकार का अनुपात,समुचितशास्त्रों के अनुसार सर्वो त्कृष्ट होता है!
२-न्यग्रॊधपरिमंडल संसथान-शरीर ऊपर से बढ़ के पेड़ की तरह बड़ा और नीचे छोटा होता है!
३-स्वाति संस्थान-शरीर ऊपर छोटा और नीचे बड़ा होता है!
४-कुब्जक संस्थान-कुबड़ा शरीर मिलता है!
५-बामन संस्थान -इस के उदय से बोना शरीर मिलता है
६-हुन्डकसंस्थान-शरीर के अंग उपांग अस्त व्यस्त होते है कोई एक बार देखने पर पुंन: नहीं देखना चाहेगा!
९-संहनन नामकर्म-के उदय से शरीर में अस्थियों का बंधन प्राप्त होता है,इसके ६ भेद है!
१-बज्रऋषभ नाराच संहनन-अस्थियों,कीले और अस्थियों के ऊपर वेष्ठन वज्र का होता है!
२-वज्र नाराच संहनन-कीले और अस्थियाँ वज्र की होती है किन्तु वेष्ठन वज्र का नहीं होता!
३-नाराच संहनन-अस्थियोंकी संधि कीलीत होती है!वेष्ठन सामान्य होता है!
४-अर्धनाराच संहनन- अस्थियों की संधि अर्ध कीलित होती है
५-कीलित संहनन- के उदय से अस्थिया परस्पर में कीलित होती है
६-असंप्राप्तासृपाटिका संहनन- के उदय से शरीर की अस्थियाँ नसों से बंधी होती है!
प्रथम तीन उत्तम सहनन कहलाते है ,वर्तमान में हम सब का छटा सहनन है !
१०-स्पर्श नामकर्म-के उदय से ८ प्रकार के स्पर्श मिलते है,इसके स्निग्ध-रुक्ष,शीत-उष्ण,नरम कठोर और हल्का-भारी ८ भेद है!
११-रस नामकर्म- के उदय से ५ प्रकार के रस मिलते है इसके मीठा,नमकीन,कड़ुवा,केसला ,चरपरा ५ भेद है !
१२-गंध नामकर्म-के उदय से २ प्रकार की गंध मिलती है सुगंध/दुर्गन्ध प्राप्त होती है
१३-वर्ण नामकर्म-के उदय से ५ प्रकार के वर्ण काला,सफ़ेद,पीला,नीला,लाल में से एक वर्ण मिलता है जैसे नीबू को गंध उसके गंध नामकर्म के उदय से,वर्ण पीला, वर्णनामकर्म के उदय से,रस खट्टा रस नामकर्म के उदय से और कठोरता तथा चिकना स्पर्श,स्पर्श नामकर्म के उदय से मिला है!
१४-आनुपूर्विनामकर्म- के उदय से,आत्मा वर्तमान शरीर त्यागकर नवीन शरीर ग्रहण करने के लिए गमन करती है तो उस समय,आकार पूर्व शरीर के अनुसार रहता है!
१५-अगुरुलघुनामकर्म -के उदय से शरीर न तो अत्यंत भारी होता है और नहीं रुई की तरह अत्यंत हल्का!इसी नामकर्म के उदय में हम पानी में तैर सकते है अथवा कूद सकते है!
१६-उपघात नामकर्म–के उदय से अपना शरीर ही अपनी मृत्यु का कारण बनता है!जैसे मोती का बनना,नाभी में कस्तूरी आदि होना!
१७-परघातनामकर्म-के उदय से ऐसे अंगोपांग मिलते है जिससे अपना बचाव और दुसरे का घात हो सकता है जैसे गाय के सींग!
१८-आतपनामकर्म-के उदय से मूल ठंडा हो किन्तु प्रकाश गर्म हो!सूर्य में जो एकेंद्रिये जीव होते है उनके इसका उदय रहता है!
१९-उद्योत नामकर्म-के उदय से ठंडा प्रकाश हो अथवा शरीर चमकवाला हो इसका उदय तिर्यन्चों में होता है!
२०-उच्छ्वासनामकर्म -के उदय से श्वासोच्छ्वास करने योग्य शरीर का निर्माण होता है!
२१-विहायोगति नामकर्म-के उदय से आकाश में गमन करने की योग्यता प्राप्त होती है!
१-प्रशस्तविहायोगति-चाल अच्छी होना और
२-अप्रशस्तविहायोगगति-चाल अच्छी नहीं होना!
२२-प्रत्येक शरीर नामकर्म-के उदय से जीव एक शरीर का एक ही स्वामी होता है! जैसे मनुष्य
२३-साधारण शरीर नामकर्म-के उदय से एक शरीर के स्वामी अनंत जीव होते है! जैसे आलू ,में अनंत आत्माए निवास करती है !
२४-त्रस नामकर्म-के उदय से जीव को त्रस पर्याय मिलते है! जैसे एकेन्द्रिय से पंचेन्द्रिय जीव!
२५ स्थावरनामकर्म -के उदय से जीव को स्थावर पर्याय मिलती है!जैसे जीव का जलकायिक आदि एकेन्द्रिय में जन्म होना !
२६-सुभगनाम कर्म-के उदय से लोगो को जीव के अंगोपांग लोकप्रिय होते है!
२७-असुभग नामकर्म-के उदय से अंगोपांग अच्छे होने पर भी लोकप्रिय नहीं होते
२८-सुस्वर नामकर्म -के उदय से जीव का स्वर अच्छा होता है,कर्ण प्रिय होता है
२९-दु:स्वर नामकर्म -के उदय से जेव का स्वर अच्छा नहीं होता,कर्ण प्रिय स्वर नहीं होता है!
३०-शुभनामकर्म -के उदय से जीव के मस्तक आदि अंगोपांग सुंदर होते है
३१-अशुभनामकर्म -के उदय से जीव के मस्तक आदि अंगोपांग सुंदर नहीं होते है
३२-सूक्ष्मनामकर्म-के उदय से सूक्ष्म शरीर मिलता है जो किसी वस्तु से बाधित नहीं होता और नहीं किसी को बाधित करता है!
३३-बादर नामकर्म-के उदय से ऐसे स्थूल शरीर मिलता है जो वस्तु से बाधित भी होता है और उन्हें बाधित भी करता है!
३४-पर्याप्ति नामकर्म-के उदय से प्राप्त अपनी योग्यतानुसार छ पर्याप्तियाँ,आहार,शरीर,इन्द्रिय,श्वासो च्छ्वास, भाषा,मन पूर्ण होती है ,जीव पर्याप्तक कहलाते है !
३५-अपर्याप्ति नामकर्म-के उदय से पर्याप्तियाँ पूर्ण नहीं होती है जीव अपर्याप्तक कहलाते है !
३६-स्थिरनामकर्म -के उदय से शरीर के रस,रुधिर,मांस मेदा ,हाड,मज्जा और शुक्र,सप्त धातुएं स्थिर होती है!उपवास आदि करने पर भी शरीर की क्षमता में गड़बड़ी नहीं होती है !
३७-अस्थिर नामकर्म-के उदय से शरीर के रस,रुधिर,मांस मेदा,हाड,मज्जा और शुक्र,सप्त धातुएं अस्थिर होती है,वे सुचारू रूप से नहीं बनती!
३८-आदेय नामकर्म-के उदय से शरीर प्रकाश युक्त होता है व्यक्तित्व आकर्षक होता है
३९-अनादेय नाम कर्म-के उदय से व्यक्तित्व आकर्षक नहीं बनता है
४०-यशकीर्ति नामकर्म-के उदय से गुणों का यश फैलता है !
४१-अपयशकीर्ति नामकर्म -के उदय से गुणों का यश नहीं फैलता है!
सेतराणि -विपरीत च-और
४२ तीर्थंकरत्वं नामकर्म-के उदय से पञ्च कल्याणक रूप देवों और इन्द्रों के द्वारा पूजा और महिमा प्राप्त होती है !
पंचमकाल में पाए जाने वाले संहनन-शास्त्रों के अनुसार अर्धनाराचसंहनन,कीलितसंहनन और असंप्राप्ता सृपाटिका संहनन,इस काल में पाए जाते है!वर्तमान में हम सब के असंप्राप्तासृपाटिका संहनन दृष्टि गोचर होता है!क्योकि हमारी अस्थियाँ नसों से बंधी हुई है! इनमे से पहले दो संहनन संभवत: उनके होते होंगे जिनका शरीर बहुत मज़बूत होता है!
हमारा समचतुरस्रसंस्थान हीन अनुभाग के साथ है क्योकि अन्य पाँचों संस्थानों में से निश्चित रूप से हमारा कोई सा संस्थान नहीं है!जिनका शरीर कुबड़ा है उनका हुन्डक संस्थान है !
किस नामकर्म के उदय से हाथी ,घोडा आदि बनते है?
आचार्य विद्यासागरजी के अनुसार हाथी नामकर्म के उदय से हाथी, घोडा नामकर्म से घोडा बनता है!नामकर्म के असंख्यात भेद है,यहाँ संक्षेप में प्रमुख नामकर्म के भेद बताये है! ये नामकर्म की पिंड प्रकृतियाँ है!प्रकृति से तात्पर्य जैसे गति,जाति,आदि लेंगे तो,एक नामकर्म के ४२ भेद हुए किन्तु चारो गति,पञ्च जाति जब लेंगे तो ९३ भेद हो जायेगे!
आनुपूर्वि नाम कर्म का कार्य-कोई आत्मा हाथी की पर्याय समाप्त कर देव पर्याय प्राप्त करने को जा रही है तो रास्ते में आत्मा के आत्मप्रदेशों का आकार हाथीवत बनाये रखना आनुपूर्वि नामकर्म का कार्य है!आनुपूर्वि नामकर्म,विग्रहगति में,जीव के आत्मप्रदेशों का आकार छोड़े हुए शरीररूप बनाये रखता है! इसके चार भेद है!यदि कोई जीव तिर्यंचगति में जा रहा है,तो तिर्यंचगत्यानुपूर्वी,देवगति में जा रहा है तो देवगत्यानुपूर्वी,नरकगति में जा रहा है तो नारकगत्यानुपूर्वी और मनुष्यगति में जा रहा है मनुष्यगत्यानुपूर्वी !
सेतराणि ‘ का सम्बन्ध विहायोगति के बाद के नामकर्मों से जोड़ना है!
औदारिक,वैक्रियक,आहारक के अंगोपांग होते है इसलिए अंगोपांग के तीन भेद बताये है! तेजस और कार्मण के अंगोपांग नहीं होते!
देव और नरक पर्याय में संहनन नामकर्म का उदय नहीं होता क्योकि उनके शरीर में अस्थियाँ नहीं होती है!संस्थान नामकर्म का उदय होता है!
हम सब आकाश में ही चलते है!इसलिए हमारे विहायोंगति का उदय है
तिर्यंचआयु शुभ और तिर्यंचगति अशुभ क्यों है?
कोई भी जीव तिर्यंच बनना नहीं चाहता इसलिए अशुभगति कहा है किन्तु कोई तिर्यंच मरना भी नहीं चाहता इसलिए तिर्यंचायु को शुभ कहा है! नरकायु अशुभ है क्योकि कोई नारकी वहां जीना भी नही चाहता, गति तो अशुभ है ही क्योकि कोई नरकगति में नहीं जाना चाहते है!
पहले तीन संहनन उत्तम है क्योकि इनसे ग्रैवयक आदि में उत्पत्ति होती है!लेकिन शुभ केवल वज्र ऋषभनाराचसंहनन है! बाकी पंचों अशुभ है!
देवों के प्रकाशवान शरीर क्यों मिलता है?
आदेय नामकर्म के उदय से उन्हें प्रकाशवान शरीर मिलता है और वर्ण नामकर्म के उदय से शरीर उन्हें वैसा मिलता है!
अधिकतर महाराजो के अनुसार अंगोपांग नामकर्म का उदय एकेंद्रियों में नहीं होता किन्तु अकलंक स्वामी राजवार्तिक में लिखते है की एकेंद्रियों के अंगोपांग नामकर्म का उदय होता है!
गोत्र कर्म के भेद –
उच्चैर्नीचैश्च !!१२!!
संधि विच्छेद उच्चै:+नीचै:+च
शब्दार्थ-उच्चै:-उच्च , नीचै:-नीच ,च-और
अर्थ:-उच्च और नीच गोत्र कर्म के दो भेद है !
भावार्थ -प्राणी ऊँच और नीच गोत्र कर्म के उदय में क्रमश: लोकमान्य ऊँचे (प्रतिष्ठित )और नीचे (निंदनीय )कुल में उत्पन्न होता है !इस प्रकार गोत्र कर्म के उच्च और नीच दो भेद है !
विशेष-१-नीच गोत्र कर्मबंध प्रथम और द्वितीय गुणस्थान में तथा उच्चगोत्र का प्रथम से दसवे गुणस्थान तक होता है !नीचगोत्र कर्म का उदय प्रथम से पांचवे गुणस्थान तक होता है !
२-गोत्र कर्म इस जीव को उच्च अथवा नीचे गोत्र में उत्पन्न करवाता है!यह निमित्त नैमित्तिक संबंध है!यहाँ उच्च और नीच से अभिप्राय है-जिस कुल में माता-पिता द्वारा सदाचार की प्रवृत्ति हो,उस ओर झुकाव हो, जिन धर्म की प्रभावना,संस्कार,रत्नत्रय का पालन हो(यह संबंध शरीर रक्त से नही है,आचार-विचार से है),श्रद्धान से परिपूर्ण उच्चगोत्र में जन्म कहा जाता है,इस प्रकार उच्च कुल है जिस कुल में यह प्रभावना,आचरण, श्रद्धान नहीं है वह नीच कुल है !
अंतराय प्रकृतिबंध कर्म के भेद-
दानलाभभोगोपभोगवीर्याणाम् !!१३!!
संधि विच्छेद-दान+लाभ+भोग+उपभोग+वीर्याणाम्
शब्दार्थ-दान-दान,लाभ-लाभ,भोग-भोग,उपभोग-उपभोग, वीर्याणाम्-वीर्यान्तराय कर्म
अर्थ:-दान,लाभ,भोग,उपभोग और वीर्यान्तराय,अंतराय कर्म के ५ भेद है !
भावार्थ-किसी के द्वारा दान,लाभ,भोग,उपभोग और वीर्य में विघ्न डालने से क्रमश:दानन्तराय,लाभान्तराय, भोगान्तराय,उपभोगान्तराय,और वीर्यान्तराय कर्मबंध होता है !
विशेष:-१-दानन्तराय-कोई व्यक्ति किसी संस्था अथवा धार्मिक कार्य में दान देना चाहता है,आप उसके दान देने की प्रवृत्ति को कहकर बाधित कर दे कि,यहाँ दान देने से कोई लाभ नहीं है,क्योकि सब दान दिया द्रव्य खाया पीया जाता है,ऐसा करने से आपके दानान्तराय कर्मबंध होगा जिससे,आप जब दान देना चाहेंगे तब नहीं दे पाएंगे
२-लाभान्तराय कर्म-आप किसी प्रतिद्वंदी/सगे संबंधी के व्यापार अथवा उसके अन्य किसी प्रकार होने वाले लाभ को बाधित करते है तो आपको लाभान्तराय कर्मबंध होगा!जैसे किसी प्रतिद्वंदी का आर्डर निरस्त करवा ने,उसके लाभको बाधित करने से,आपके लाभ में भी इस कर्म के उदय में लाभ नहीं होगा !
३-भोगान्तराय-किसी वस्तु जैसे भोजन का एक ही बार उपयोग करना भोग है !घर/कार आदि बार बार भोगना उपभोग है!किसी के भोजन/जल आदि की प्राप्तिको बाधित करने पर,जैसे अपने कर्मचारी को समय पर भोजन ग्रहण करने के लिए, अधिक कार्य में व्यस्त रखने के कारण,अनुमति नहीं देने से आपको भोगान्तराय कर्मबंध होगा!आपके भी भोग की सामग्री / भोजन /जल ग्रहण करने के समय,इस कर्म के उदय में विघ्न पड़ेगा !
४-उपभोगान्तराय-किसी के उपभोग की सामग्री को बाधित करने से आपके उपभोग अंतराय कर्मबंध होता है !इस कर्म के उदय में आपके भी उपभोग की सामग्री ग्रहण करने में विघ्न पड़ेगा!जैसे;कोई आपका कोई मित्र घर या कार खरीदना जा रहा है,आप उसकी खरीद को यह कह कर बाधित कर दे कि यह कार अथवा घर बिलकुल बेकार हैक्या करोगे लेकर, तो आपके उपभोग अंतराय कर्मबंध होगा जिसके उदय के समय आपके भी उपभोग की सामग्री संचित करने में विघ्न पडेगा!और
५-वीर्यान्तराय कर्म-किसी की शक्ति को कम करने से वीर्यान्तराय कर्मबंध होता है जिसके उदय में आपकी भी शक्ति में विघ्न पड़ता है!जैसे सर्प के दांत निकलवा कर,सपेरा उस की काटने की शक्ति से उसे विहीन कर देता है,उस सपेरे के वीर्यान्तराय कर्मबंध होता है!अथवा कोई विद्यार्थी किसी प्रतियोगिता परीक्षा में बैठना चाह रहा हो,आप उसे यह कहकर रोक दे की तुम इसमें उत्तीर्ण नहीं हो पाओगे,तुम्हारे बस का नहीं है,ऐसा करने से आप के वीर्यान्तराय कर्मबंध होता है !
मोहनीयकर्म के बाद सबसे खराब अंतराय कर्म है क्योकि यह कब आता है,पता ही नहीं लगता, कब चुपके से आकर अपना काम कर चला जाता है अत:अत्यंत सावधानी की आवश्यकता है !
कर्मों का उत्कृष्ट स्थितिबंध –
आदितस् तिसृणामन्तरायस्यचत्रिंशत्सागरोपमकोटिकोट्य:परास्थिति:!१४!!
संधि विच्छेद:-आदितस्+तिसृणाम्+अन्तरायस्य+च +त्रिंशत्सागरोपम+कोटि+कोट्य:+परा+स्थिति:
शब्दार्थ:-
आदितस् -आदि के तीन (ज्ञानावरण,दर्शनावरण और वेदनीय ) तिसृणाम -इन तीन ,अन्तरायस्य -अंतराय ,च -और ,त्रिंशत्सागरोपम -तीस सागरोपम , कोटि-कोड़ा, कोट्य: -कोडी ,परा-उत्कृष्ट ,स्थिति:- बंध की अवधि है
भावार्थ-ज्ञानावरण,दर्शनावरण,वेदनीय ,इन तीन कर्म और अंतराय कर्म के बंध की उत्कृष्ट स्थिति ३० कोड़ा कोडी सागर है !
विशेष-१-इस उत्कृष्ट स्थिति का बंध सैनी पंचेन्द्रिय पर्याप्तक मिथ्यादृष्टि जीव के ही होता है !
२- कोड़ा कोडी =१ करोड़ X १ करोड़ ,सागर=दस कोड़ा कोडी अद्धा पल्य !
मोहनीय कर्म की उत्कृष्ट स्थिति –
सप्ततिर्मोहनीयस्य !!१५!!
संधि विच्छेद -सप्तति: +मोहनीयस्य
शब्दार्थ-सप्तति:-७० ,मोहनीयस्य -मोहनीय कर्म की उत्कृष्ट स्थितिबंध -(सूत्र १४ से लिया परास्थिति:)है
अर्थ-मोहनीय कर्म के बंध की उत्कृष्ट स्थिति ७० कोड़ा कोडी सागर है !
विशेष-१-मोहनीय कर्म के मोहनीय और चारित्र मोहनीय आदि २८ भेदों में दर्शन मोहनीय की उत्कृष्ट स्थिति ७० कोड़ा कोडी सागर और चारित्र मोहनीय की४० कोड़ा कोडी सागर तथा जघन्य स्थिति अंतर्मूर्हत है !
२-अनंतानुबंधी क्रोधादि कषायों की स्थिति संख्यात,असंख्यात और अनंत भव हो सकती है!क्रोध का जघन्य स्थितिबंध २ माह,मान का १ माह,माया का १५ दिन और लोभ का अंतर्मूर्हत प्रमाण है!
नाम और गोत्रकर्म की उत्कृष्ट स्थिति –
विंशतिर्नामगोत्रयो :!!१६!!
विच्छेद-विंशति:+नाम+गोत्रयो
शब्दार्थ-विंशति-बीस,नाम, गोत्र कर्म : की उत्कृष्ट स्थिती (उत्कृष्ट स्थितिबंध है-सूत्र १४ से लिया परास्थिति:) है
अर्थ-नाम और गोत्र कर्म के बंध की उत्कृष्ट स्थिति २० कोड़ा कोडी सागर है!
विशेष-नीच गोत्रकर्म की उत्कृष्ट स्थिति २० कोड़ाकोडीसागर और उच्च गोत्रकर्म की १० कोड़ाकोडीसागर है
आयुकर्म की उत्कृष्ट स्थितिबंध –
त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाण्यायुष:!!१७!!
संधि विच्छेद:-त्रयस्त्रिंशत्+सागरोपमाण्य +आयुष :
शब्दार्थ-त्रयस्त्रिंशत्-३३,सागरोपपमाण्य-सागर प्रमाण,आयुष:-आयु कर्म की (उत्कृष्ट स्थितिबंध है-सूत्र १४ से लिया परास्थितिSmile
अर्थ-आयुकर्म का उत्कृष्ट स्थितिबंध ३३ सागर है!(यह देवायु और नारकायु है)
मनुष्यायु और तिर्यगायु की उत्कृष्ट ३ पल्य और जघन्य स्थिति अंतर्मूर्हत है!नारकी की जघन्य आयु १०००० वर्ष है !
वेदनीय कर्मों का जघन्य स्थितिबंध :-
अपराद्वादशमुहूर्तावेदनीयस्य !!१८!!
संधि विच्छेद -अपरा+द्वादश+मुहूर्ता+वेदनीयस्य
शब्दार्थ-अपरा-जघन्य स्थिति, द्वादश-बारह,मुहूर्ता-मूर्हूत ,वेदनीयस्य -वेदनीय कर्म की है !
अर्थ:-वेदनीय कर्म की जघन्य स्थिति बारह मुर्हूत है !
भावार्थ-वेदनीय कर्म बंध कम से कम १२ मुर्हूत का होता है!
नाम और गोत्र कर्म का जघन्य स्थिति बंध-
नामगोत्रयोरष्टौ !!१९ !
संधि विच्छेद-नाम+गोत्र:+अरष्टौ
शब्दार्थ- नाम-नाम ,गोत्र:-गोत्र कर्म की,अरष्टौ-आठ मुर्हूत जघन्य स्थित बंध(सूत्र १८ से अपरा ,स्थिति: सूत्र १४ से लिया) है !
अर्थ:नाम और गोत्र कर्म के जघन्य स्थितिबंध आठ मुर्हूत है !
भावार्थ -नाम और गोत्र कर्म का स्थिति बंध न्यूनतम/जघन्य ८ मुर्हूत का होता है !
शेष पांचों कर्मों का जघन्य स्थिति बंध-
शेषाणामन्तर्मुहूर्ता: !!२० !!
संधिविच्छेद :-शेषाणाम्+अन्तर्मुहूर्ता:
शब्दार्थ:-शेषाणाम शेष कर्मों की,अन्तर्मुहूर्ता:-अन्तर्मुहूर्त है !
अर्थ:-
शेष ५ कर्मों;ज्ञानावरण,दर्शनावरण,मोहनीय,आयु और अंतरायकर्मों का स्थितिबंध जघन्य अन्तर्मुहूर्त (सूत्र १४ से स्थित: और अपरा १८ से लिया)है!
भावार्थ:-
ज्ञानावरण,दर्शनावरण,मोहनीय,आयु और अंतरायकर्म का स्थितिबंध न्यूनतम/जघन्य अन्तर्मुहूर्त होगा!
अनुभाग बंध का लक्षण:-
विपाकोऽनुभवः !२१!
संधि-विच्छेद:-विपाक:+अनुभवः
शब्दार्थ:विपाक-कर्मोदय विपाक है,अनुभवः-विपाक का अनुभव ही अथवा अनुभागबंध है!
अर्थ-विपाक-द्रव्य,क्षेत्र,काल,भाव के अनुसार कर्म का अपने समय पर पक कर फल देना विपाक है! अनुभव/अनुभाग-कर्म की फल देने की शक्ति अनुभव/अनुभाग बंध है!
भावार्थ-अनुभव/अनुभाग बंध,कर्म का फल कैसा अनुभव किया जाता है या कर्म की फलदान शक्ति कैसी है! कर्मोदय का फल स्वमुख और परमुख,दो प्रकार से मिलता है!कोई कर्म स्वमुख से उदय में आये तो स्वमुख होता है जैसे असातावेदनीय स्वमुख के उदय से आये और दुःख देने में कारण बने तो स्वमुख और यदि असाता वेदनीय द्रव्य,क्षेत्र,काल और भाव के अनुसार परमुख से उदय में आये तो परमुख! जैसे किसी जीव के शरीर में वेदना असातावेद्नीय के उदय से है,तो स्वमुख उदय है !यदि वही जीव समवशरण में प्रवेश कर जाता है तो वही असाता, साता वेदनीय रूप फल देने लगेगी असातावेदनीय का असाता रूप फल देना स्वमुख उदय है और असतावेदनीय का सातावेद्नीय रूप संक्रमण होकर,सतावेद्नीय रूप फल देना परमुख उदय है!
विशेष-शुभ परिणामों की अधिकता होने पर शुभ प्रकृतियों में अधिक, अशुभ प्रकृतियों में कम अनुभाग होता है किन्तु अशुभपरिणामों की अधिकता में अशुभप्रकृतियों में अधिक,शुभप्रकृतियों में कम अनुभागबंध होता है !
अनुभाग बंध की बदलती अवस्थाये
अनुभाग बंध,बंधकाल में जैसा प्राप्त होता है सदैव वैसा ही नहीं रहता है!वह अपनी अवस्था काल में बदल भी सकता है और नहीं भी बदल सकता!बदलने में संक्रमण,उत्कर्षण,अपकर्षण तीन अवस्थाये होती है!संक्रमण मात्र उत्तर प्रकृतियों में होता है,मूल प्रकृतियों में नहीं होता है!आयुकर्म की उत्तर प्रकृतियों,दर्शन मोहनीय का चारित्र मोहनीय रूप और चारित्र मोहनीय का दर्शन मोहनीय रूप में संक्रमण नहीं होता है !
संक्रमण के चार भेद;प्रकृति संक्रमण,प्रदेश संक्रमण अनुभाग संक्रमण और स्थिति संक्रमण है!जहा प्रकृति और प्रदेश संक्रमण की प्रमुखता होती है वहां संक्रमण शब्द से और जहाँ मात्र स्थिति और अनुभाग संक्रमण होता है वहां उत्कर्षण और अपकर्षण से सम्बोधित किया जाता है !
बंधकाल में जो स्थिति और अनुभाग प्राप्त होते है उसको कम करना अपकर्षण और बढ़ाना उत्कर्षण है !इस प्रकार विविध अवस्थाओं से गुजरते हुए उदयकाल में अनुभाग रहता है उसे परिपाक कहते है!अनुद्य अवस्था को प्राप्त प्रकृतियों का,परिपाक उदय अवस्था को प्राप्त सजातीय प्रकृति रूप से होता है!इस विषय में नियम है कि उद्यावली प्रकृतियों का फल स्वमुख से मिलता है और अनुद्यावली प्रकृतियों का फल परमुख से प्राप्त होता है! जैसे साता का उदय रहने पर उसका भोग साता रूप ही रहता है किन्तु असाता स्तिबुक संक्रमण द्वारा साता रूप में परिणमन करती रहती है,इसलिए उसका उदय परमुख से होता है!उदयकाल से एक समय पहिले,अनुद्य रूप प्रकृति के निषेक का उदय को प्राप्त हुई प्रकृति रूप से परिणमन कर जाना स्तिबुक संक्रमण है!जो प्रकृतियाँ जिस काल में उदय में नही होती,किन्तु सत्ता रूप में विध्यमान रहती है उनका प्रति समय इसी प्रकार परिणमन होता रहता है !
शंका-प्रकृति और अनुभाग बंध अलग-२ क्यों है?अनुभाग बंध स्वतंत्र क्यों है ?
समाधान-अनुभव,अनुभाग,फलदान शक्ति पर्यायवाची है !कर्म बंध के समय जिस कर्म की योग-मन,वचन काय के निमत्त से जो प्रकृति होती है तदानुसार उसका कषाय के निमित्त से अनुभागबंध होता है,उस कर्म की /फल देने की शक्ति उसे प्राप्त होती है!जैसे ज्ञानवरण की प्रकृति ज्ञान को ढकने की है इसलिए इसे इसी के अनुरूप फलदान शक्ति मिलती है!प्रकृति से अभिप्राय कर्म का स्वभाव से तथा अनुभाग/अनुभवबंध से उस कर्म के स्वभाव अनुरूप फल भोगने से है!यदि प्रकृति और अनुभाग/अनुभव का इतना ही मतलब है तब साधारणतया मान सकते है की दोनों को अलग अलग रखना अनुचित है क्योकि जिस कर्म की जैसी प्रकृति का बंध होगा उसे तदानुसार भोगना स्वयं सिद्ध है!इसलिए प्रकृति और अनुभव/अनुभागबंध स्वतंत्र सिद्ध नहीं होते बल्कि प्रकृति बंध में ही अनुभाग/अनुभव बंध का समावेश हो जाता है!यदि यहाँ कहा जाए कि ज्ञानावरणीयादि रूप की कर्म प्रकृतियाँ फलदान शक्ति के निमित्त से होती है इसलिए प्रकृति बंध में अनुभव बंध का अंतर्भाव नहीं किया जा सकता तो इसका प्रकृति बंध योग के निमित्त से और अनुभव बंध हीनाधिक कषाय के निमित्त से होता है फिर फलदान की शक्ति के निमित्त से प्रकृति बंधती है,नहीं माना जा सकता!थोड़ी देर के लिए यदि मान भी ले तब प्रकृति और अनुभाग अलग क्यों माना गया है तथा उनके स्वन्तंत्र कारण योग और कषाय क्यों माने गये है ?सूत्रकार ने भी बंध के ४ भेद करके विपाक अर्थात कर्म भोग को अनुभव कहा है और उसे प्रकृति अनुरूप बताया है इससे यह सिद्ध होता है कि यह दो नहीं एक ही है,बंध समय की अपेक्षा जो प्रकृति है उसे ही उदय काल की अपेक्षा अनुभव कहते है !
इसका समाधान है कि कर्मबन्ध के समय,कर्म का विविध रूप से विभाग योग के निमित्त से ही होता है और विभाग को प्राप्त कर्मों में हीनाधिक फलदान शक्ति कषाय के निमित्त से प्राप्त होती है इसलिए दोनों को अलग अलग माना गया है!यद्यपि यह भी सही है की शक्ति के अभाव में किसी कर्म की प्रकृति नहीं बन सकती!स्वतंत्र प्रकृति कहने से उसका शक्ति बोध तो हो ही जाता है फिर भी ऐसी शक्तियों की एक सीमा होती है!उसका उल्लघ न करके जो हीनाधिक शक्ति प्राप्त करी जाती है उसका बोध करना अनुभागबंध का कारण है!उद्धाहरण के लिए ११, १२,१३ वे गुणस्थानों में सातावेदनीय का प्रकृति बंध होता है,यह प्रकृतिबंध एक नियत मर्यादा में अनुभाग को लिए होता है फिर भी यहाँ अनुभाग बंध का निषेध किया है क्योकि जो अनुभाग सकषाय अवस्था में साता वेदनीय को प्राप्त होता था वह यहाँ प्राप्त नहीं होता है!सकषाय अवस्था में प्राप्त जघन्य अनुभाग से भी अनंतवे भाग मात्र होता है!जो की सकषाय अवस्था में भी प्राप्त नहीं होता!इस से प्रकृति और अनुभाग बंध को अलग अलग कहने की उपयोगिता सिद्ध हो जाती है!अभिप्राय है कि प्रकृतिबंध में कर्म भेद को स्वीकार करके भी न्यूना धिक फलदान शक्ति स्वीकार नहीं करी है किन्तु अनुभागबंध में,इसका और इसके कारण का स्वतंत्र रूप विचार किया जाता है इसीलिए पकृतिबंध व अनुभागबंध का स्वतंत्र कारण है,यह निश्चित होता है!सूत्रकार ने विपाक को अनुभव इसलिए कहा है क्योकि सभी जीवों का विपाक न्यूनाधिक होता है,एक समान नहीं होता!यही कारण है की सूत्रकार अनुभागबंध की स्वतंत्र परिगणना करते है और उसकी पुष्टि विपाक के माध्यम से करते है !
अनुभाग बंध कर्म के नाम के अनुसार होता है –
सयथानाम !!२२!!
संधि विच्छेद-स+यथानाम
शब्दार्थ -स-वह,अनुभागबंध,यथानाम-कर्मोके नाम अनुसार होता है !
अर्थ स -वह (कर्मों के फल).यथानाम- अपने अपने कर्म के नाम के अनुसार होता है
भावार्थ-ज्ञानावरणकर्म का फल,आत्मा के ज्ञानगुण को आवृत करने रूप होगा!दर्शनावरणकर्म का फल आत्मा के दर्शन गुण को आवृत करने रूप होगा!वेदनीयकर्म का फल उसे सुख या दुःख का अनुभव कराने रूप होगा!मोहनीयकर्म आत्मा को मोहित करने रूप होगा अर्थात मिथ्यात्व रूप परिणाम कराने वाला,सम्यक्त्व को हटाने वाला,चारित्र मोहनीय-कषाय रूप परिणाम कराने वाला होगा!आयुकर्म का फल,आत्मा को एक शरीर में से निश्चित अवधि(आयु) तक निकलने नहीं देगा! नामकर्म का फल विभिन्न प्रकार के नाम देने रूप होगा,जैसे मनुष्य है/देव है/तिर्यंच है/नारकी है,विभिन्न शरीर आदि का निश्चय नामकर्म से होता है! गोत्रकर्म विशेष उच्च या निच्च कुल में जीव को उत्पन्न कराता है!अन्तराय कर्म आत्मा के दान,लाभ,भोग उपभोग और शक्ति गुण में विघ्न डालता है!
घातिया कर्म का अनुभाग कितने प्रकार का होता है?
घातियाकर्मों का अनुभाग चार प्रकार शैल.अस्थि,दारु और लता रूप होता है! इन चारो में कठोरता उत्तरोत्तर हीन है!जैसे शैल-पत्थर सबसे अधिक कठोर है,अस्थि-हड्डी उससे मुलायम है,दारु-लकड़ी उससे मुलायम हैऔर लता सबसे मुलायम है!अर्थात जो घातियाकर्म सबसे कठोर फल देते है उन्हें शैल,जो उससे कम कठोर फल देते है उन्हें अस्थि,जो उससे भी कम कठोर फल देते है उन्हें दारु और जो उससे भी कम कठोर फल देते है उन्हें लता रूप कहते है!
अघातियाकर्म दो प्रकार के पाप-पुण्य रूप होते है!-पापरूप कर्मो का फल उत्तरोत्तर नीम,कांजीर,विष और हलालल रूप अधिकाधिक होता है!नीम में कडवापन सबसे कम है,उससे अधिक कडवी कांजीर होती है, उससे अधिक कडवा विष होता है और उससे भी अधिक कडवा हलालल होता है!पाप कर्मों का फल यदि अधिकतम कठोर है तो हलालाल उससे कम कठोर है तो विष,उससे कम कठोर है तो कांजीर और उससे भी कम कठोर है तो नीम रूप होता है !
अघातिया कर्मों की पुण्यरूप प्रक्रितियों का फल-गुड,खांड,शक्कर और अमृत रूप होते है!अघातियाकर्मों की प्रकृतिय पुण्य का सबसे कम गुड,उससे अधिक खांड,उससे अधिक शक्कर और सबसे अधिक अमृत सामान देती है!
कर्मों के फल देने के बाद उनकी निर्जरा होती है –
ततश्चनिर्जरा-!!२३!!
संधि विच्छेद-ततश्च +निर्जरा
शब्दार्थ-ततश्च -उसके बाद (कर्मों के फल देने के बाद) ,निर्जरा-कर्म आत्मा से पृथक हो जाते है
अर्थ-इसके बाद(फल देने के बाद),वे कर्म आत्मा से पृथक हो जाते है;कर्मोद्य में आकर कर्म,फल देने के पश्चात आत्मा से पृथक हो जाते है अर्थात उनकी निर्जरा हो जाती है!
निर्जरा के भेद-दो !
१-सविपाक-कर्मों की स्थिति पूर्ण होकर,उदय में आकर(फल देकर) कर्मों का आत्मा से पृथक होना सविपाकनिर्जरा है!यहसंसार के समस्त जीवों, (निगोदिया) के भी होती है!
२-अविपाक निर्जरा-कर्मों की स्थिति पूर्ण होने से पूर्व ही, कर्म फल देने के समय से पूर्व ही,तपश्चरण द्वारा,उन्हें उदय में लाकर,फल लेकर,आत्मा से पृथक करना अविपाक निर्जरा है!यह सम्यकत्व के सम्मुख जीव के होती है,व्रतों के धारण करने वाले जीवों की होती है!
अविपाक निर्जरा का प्रारंभ पहले गुणस्थान से होता है!मिथ्यादृष्टि जीव जो सम्यक्त्व प्राप्त करने की ऒर अग्रसर हो रहा है,सम्यकत्व प्राप्ति के सम्मुख है,पञ्च लाब्धियों में से करणलब्धि में आगया है, उसे अध:करण में नहीं,अपूर्वकरण के प्रारम्भ से पहले ही,प्रथम गुणस्थान से अविपाक निर्जरा शुरू हो जाती है!अविपाक निर्जरा का प्रारंभ प्रथम गुणस्थान के उस जीव के हो जाता है,जो सम्यक्त्व प्राप्ति के लिए अपूर्वकरण में प्रवेश कर चुका है!अपूर्वकरणकाल और अनिवृतिकरणकाल में मिथ्यादृष्टि की असंख्यात-असंख्यात गुणी निर्जरा होती है!फिर वह चौथे गुणस्थान में पहुँचता है,वहा से अलग-अलग प्रकार से निर्जरा होती रहती है!दूसरे-तीसरे गुणस्थान में कोई अविपाक निर्जरा नहीं होती,मात्र सविपाक निर्जरा होती है!पहले गुणस्थान में भी यदि सम्यक्त्व के सम्मुख जीव करणलब्धि में नहीं है,उसने अपूर्वकरण में प्रवेश नहीं किया तब भी अविपाक निर्जरा नहीं होगी !
अकाम निर्जरा क्या होती है-अकाम निर्जरा-अकस्मात् कोई कष्ट आने पर शांति से सहना,अकाम निर्जरा है!संसार के सभी सम्यगदृष्टि,मिथ्यादृष्टि जीवों के यह हो सकती है!किन्तु यह अविपाकनिर्जरा नहीं है,अकामनिर्जरा है!
कर्मों की अविपाक निर्जरा प्रति समय-प्रत्येक जीव; वह एकेन्द्रि ही हो,समयप्रबद्ध कार्मण वर्गणाओ (अनंत कार्मण वर्गणाओ को) प्रति समय ग्रहण करता है,कर्म बंधते है तथा अनंत कार्मण वर्गणाये फल देकर झरती है!
कर्मो का अनुभाग तीव्र या मंद किस प्रकार होता है?
१४८ कर्म प्रकृतियों को पृथक-पृथक पुण्य और पाप प्रकृतियों में विभक्त करे! घातियाकर्मों की ४७ प्रकृतियां पापरूप ही है,अघातिया कर्मों की प्रकृतिया पाप और पुण्य,दोनो रूप है! पुण्य प्रकृतियों का कषाय कम होने पर अनुभाग अधिक होगा किन्तु कषाय अधिक है तो इन पुण्य प्रकृति का अनुभाग कम बंधेगा,अगर कषाय की मंदता से सातावेदनीय बंधी है तो फलदान अधिक होगा,यदि तीव्रकषाय से बंधी है तो सातावेदनीय का फलदान कम होगा!पापकर्मबंध के समय कषायों की तीव्रता होने पर पापकर्म में फलदान शक्ति अधिक होगी,कषायों मे मंदता होने पर पापकर्मों में फलदान शक्ति मंद होगी !
बंधे कर्मों का अनुभाग बदला जा सकता है-
किसी कर्म को कोई जीव तीव्रकषाय में बांधता है तो उसका पापबंध तीव्र फलदान वाला होगा किन्तु यदि वह क्षमा याचना कर लेता है अथवा प्रायश्चित ले लेता है तो उससे बंधेकर्म की फलदान शक्ति, मंद हो जाती है इसी कारण मुनिमहाराज दिन में तीन बार प्रतिक्रमण करते है जिसके फलस्वरूप अपने बंधेकर्मों का अनुभाग कम कर लेते है!इसीलिए प्रायश्चित करने का विधान है!बंधे कर्म का अनुभाग उदय के समय बढ़- घट सकता है!यदि पाप बंध मंद कषाय में बंधा है तो उसका अनुभाग मंद बंधेगा जो की बाद में परिणामों में तीव्र कषाय आने से बढ़ जाता है!कर्मों के अनुभाग का बढना उत्कर्षण और घटना अपकर्षण कहलाता है
प्रदेश बंध के लक्षण (कितनी कर्माणवर्गणाये आत्मा के साथ बंधती है)
नामप्रत्यया:सर्वतोयोगविशेषात् सूक्ष्मैकक्षेत्रावागाहस्थिता:सर्वात्म-प्रदेशेष्वनन्तानन्तप्रदेशाः !!२४!!
संधि विच्छेद-नामप्रत्यया:+सर्वत:+योगविशेषात्+सूक्ष्म+ऐकक्षेत्रावागाह+स्थिता:+सर्वात्मप्रदेशेषु+अनन्तानन्त+प्रदेशाः!
शब्दार्थ:-नामप्रत्यया:-अपने २ नाम में कारण रूप अर्थात जैसे दर्शनावरण/ज्ञानावरण प्रकृति के कारण ,जो कर्माण वर्गणाय़े परिणमन करने की योग्यता रखती है वे दर्शनावरण/ज्ञानावरनादि कर्म रूप बंधती है! यह नाम प्रत्यय से सूचित होता है कि कर्म प्रदेश ज्ञानावरणीयादि अष्टकर्म प्रकृतियों के कारण है !
सर्वत:- कर्माणवर्गणाये प्रति समय सभी भवों में बंधती है !अर्थात कर्म प्रदेश सब भवो में बंधते है !
योगविशेषात्:-योग;मन,वचन,काय की क्रिया द्वारा आत्मप्रदेशों के परिस्पंदन हीनाधिकता अनुसार क्रमश : हीन परिस्पन्दन होने पर, कम कर्म रूप पुद्गल ग्रहण किये जाते है अर्थात हीन कर्मों का प्रदेश बंध होता है , अधिक परिस्पंदन है तो अधिक कर्म प्रदेश बंधेंगे !
सूक्ष्म-किसी से नहीं रुकने वाली और किसी को नहीं रोक ने वाली सूक्ष्म कर्माणवर्गणाय़े ही कर्म रूप परिणमन करती है स्थूल नहीं अर्थात बंध सूक्ष्म ही है स्थूल नहीं !
ऐकक्षेत्रावागाह-आत्मा के प्रदेशों में एक क्षेत्रावगाह रूप,अर्थात पहले से अनेक वर्गणाए मोजूद होती है!क्षेत्र के अंतर के निराकरण के लिए एक क्षेत्रावगाह कहा है,अर्थात जिस आकाशप्रदेश में आत्मप्रदेश रहते है उसी आकाश प्रदेश में कर्म योग्य पुद्गल भी ठहर जाते है !
स्थिता:-रुकी हुई होती है!क्रियान्तर की निवृति के लिए स्थिता: कहा है अर्थात ग्रहण करने योग्य पुद्गल स्थिर होते है गमन नहीं करते!
सर्वात्म-प्रदेशेषु -कर्माणवर्गणाये,कर्म रूप होकर,सभी आत्मप्रदेशों में बंधती है! कर्म प्रदेश आत्मा के एक प्रदेश में नहीं वरन समस्त दिशाओं के प्रदेशों में व्याप्त होकर स्थिर रहते है!जैसे हमने एक हाथ से सामग्री चढ़ाई तो सातावेदनीय का बंध मात्र उसी हाथ में ही नहीं होता बल्कि शरीर के समस्त आत्म प्रदेशों में प्रदेश बंध होता है!अनन्तानन्त प्रदेशाः-अनंतानंत प्रदेश परमाणु प्रति समय बंधते है!
भावार्थ -संसार में आठ प्रकार के कर्माणवर्गणाये है,जो ज्ञानावरण योग्यता वाली आयेगी वे ज्ञानावरणकर्म रूप, दर्शनावरण योग्यता वाली दर्शनावरणकर्म रूप,आयु कर्म योग्यता वाली आयुकर्म रूप परिणमन करेगी इसी प्रकार अन्य पञ्च कर्मों की योग्यता वाली कर्माणवर्गणाये अपने अपने नामानुसार कर्म रूप परिणमन करेगी!अनन्तानन्त प्रति समय आने वाले पुद्गल कर्मो का विभाजन आयुकर्म अपकर्ष कालों के अतिरिक्त ,प्रति समय सातों कर्मों में होता है और अपकर्ष कालों में आठों कर्मों में होता है !
कर्माणवर्गणाओ का अष्ट कर्मों में विभाजन-सबसे अधिक कर्माणवर्गणाये वेदनीयकर्म के हिस्से में आती है क्योकि सबसे अधिक काम में सुख-दुःख रूप यही आता है!उससे कम मोहनीय कर्म को मिलती है क्योकि मोह्नीय कर्म का स्थितिबंध सर्वाधिक ७० कोड़ाकोडी सागर है,उस से कम ज्ञानावरण,दर्शनावरण और अन्तरायकर्म को बराबर मिलता है क्योकि इनका स्थितिबंध ३० कोड़ाकोडी सागर है!,इस से कम नामकर्म और गोत्रकर्म को बराबर मिलता है क्योकि उनका स्थितिबंध २०-कोड़ा कोडी सागर है!न्यूनतम आयुकर्म को,केवल अपकर्षकाल में मिलता है!
कर्माणवर्गणाये प्रति समय आती है!योग की विशेषता अर्थात मन,वचन ,काय की क्रिया द्वारा यदि आत्मप्रदेशो में परिस्पंदन अधिक होता है तो अधिक आयेगी और यदि कम होता है तो कम आयेगी!अत: योग की विशेषता से कर्म-प्रदेश बंध होता है!ये कर्माणवर्गणाये सूक्ष्म होती है,आत्मप्रदेशो के साथ एक क्षेत्रावागाह(एक में एक) होकर स्थित रहती है!ये समस्त आत्मप्रदेशों से बंधती है!
विशेष-उक्त सूत्र में प्रदेश बंध का विचार किया गया है जो पुद्गल परमाणु कर्म रूप जीव द्वारा सभी भवों में ग्रहण किये जाते है वे योग के निमित्त से ,आयुकर्म के आठ अपकर्ष कालों के अतिरिक्त ज्ञानावारणीयादि सात कर्मों में प्रति समय परिणमन करते है तथा अपकर्ष कालों में आठों कमो में परिणमन करते है !जिस क्षेत्र में आत्मा स्थित होती है उसी क्षेत्र के कर्म परमाणु को ग्रहण करती है अन्य के नही ग्रहण किये गए अनन्तानन्त कर्म परमाणु आत्मा के सभी प्रदेशों में व्याप्त होते है!
पुण्य प्रकृतियाँ-
सद्वेद्य -शुभायुर्नाम गोत्रणि पुण्यं !!२५!!
संधि विच्छेद -सद्वेद्य+शुभ( आयु:+नाम)+गोत्रणि+पुण्यं
शब्दार्थ -सद्वेद्य-साता वेदनीय,शुभआयु:,शुभनाम,गोत्रणि-शुभ/उच्च गोत्र कर्म,प्रकृतियाँ ,पुण्य प्रकृतियां है !
अर्थ-साता वेदनीय,शुभ आयु-अर्थात तिर्यंच,देव और मनुष्य आयु ,उच्च गोत्र, और शुभ नामकर्म की पुण्य प्रकृतियाँ है!
भावार्थ-
साता वेदनीय-१ ,शुभ ३-आयु कर्म अर्थात तिर्यंच,देव और मनुष्य आयु ,शुभनाम-३७ और उच्च गोत्र -१ पुण्य प्रकृतियाँ है! शुभ नाम कर्म की ३७ प्रकृतियाँ-
गति-मनुष्य और देव-२,जाति पंचेन्द्रिय-१,शरीर-५,अंगोपांग-३,समचतुरसंस्थान-१,वज्रऋषभनारांचसहनन-१, प्रशस्त (शुभ )रस,गंध,वर्ण,स्पर्श-४,मनुष्य और देवगत्यानुपूर्वी-२,अगुरुलघु-१,परघात-१,उच्छवास-१,आतप-१ उद्योत-१,प्रशस्त विहायोगति-१,त्रस-१,बादर-१,पर्याप्ति-१,प्रत्येकशरीर-१, स्थिर-१,शुभ-१, सुभग-१,सुस्वर-१, आदेय-१, यशकीर्ति -१,निर्माण-१,तीर्थंकर -१,ये ४२-पुण्य प्रकृतियाँ है !
पाप प्रकृतियाँ-
अतोऽन्यत्पापम् !!२६ !!
संधि विच्छेद- अतो अन्यत् +पापम्
शब्दार्थ-अतो अन्यत् -इसके अलावा सब ,पापम् -पाप प्रकृतियाँ है!
अर्थ-पुण्य प्रकृतियों के अतिरिक्त सभी पाप प्रकृतियाँ हैं !
भावार्थ-
घातिया कर्मो की सभी(ज्ञानावरण की ५,दर्शनावरण-९,मोहनीय -२६,अंतराय-५,)४५ प्रकृतियाँ पापरूप प्रकृतियाँ है!वेदनीय में असाता वेदनीय,गोत्र में नीच गोत्र, आयु में नरकायु,नाम कर्म की गति-नरक और तिर्यंच-२,जाति;एकेन्द्रिय से चतुरिंद्रिय-४,संस्थान-५,सहनन-५,अपर्याप्तक,अप्रशस्त(रस,गंध,वर्ण, [b])[/b]-[b]-४ ,साधारण शरीर-१ ,अस्थिर-१ ,अशुभ-१, दुर्भग-१ दुस्वर-१ , अनआदेय-१, अपयश-१ ,
मुनि श्री 108 प्रणम्यसागरजी तत्वार्थ सूत्र with Animation
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण
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इस अध्याय में उमास्वामी आचार्यश्री ३९ सूत्रों के माध्यम से तीसरे ‘आस्रव’ तत्व के शुभ आस्रव के उपायों;पंच पापो से अपने को सुरक्षित रखने के लिए व्रतों ,उनकी भावनाओं और उनमें लगने वाले अतिचारों पर उपदेश देते हुए प्रथम सूत्र में व्रतों के लक्षण बताते हुए कहते है-
व्रत का लक्षण –
हिंसाऽनृतस्तेयाबृह्मपरिग्रहेभ्यो विरतिर्व्रतम् !१!
संधि विच्छेद:-{(हिंसा+अनृत+स्तेय+अबृह्म+परिग्रहे+)भ्य:+विरति:}+व्रतम्
-हिंसाभ्य:विरति:+अनृतभ्य:विरति:+स्तेयभ्य:विरति:+अबृह्मभ्य:विरति:+परिग्रहेभ्य:विरति:+र्व्रतम्!
शब्दार्थ-हिंसाभ्य:-हिन्सा का,विरति:-त्याग,अनृतभ्य:-झूठ का,विरति:-त्याग,स्तेयभ्य:-चोरी का,विरति- त्याग,अबृह्मभ्य:-अब्रहम/कुशील का,विरति-त्याग,परिग्रहेभ्य:-परिग्रहों का,विरति-त्याग,व्रतम्-व्रत है!
अर्थ-हिंसा,झूठ,चोरी,कुशील और परिग्रहो;पंच पापों का जीवनपर्यन्त बुद्धिपूर्वक त्याग व्रत है!इनके त्याग से क्रमश पंचव्रत;अहिंसाव्रत,सत्यव्रत,अचौर्यव्रत बृह्मचर्यव्रत और अपरिग्रहव्रत,५ व्रत होते है!
विशेष-
१-पंचव्रतों में अहिंसाव्रत प्रधान है इसलिए,सूत्र में सर्वप्रथम रखा है क्योकि शेष चारो;अहिंसा की रक्षा के लिए खेत की बाढ़ के समान है!
शंका-व्रत संवर का कारण होते है,यहाँ आस्रव का कारण क्यों लिया?
समाधान-संवर निवृत्ति रूप होता है,जबकि व्रत यहाँ प्रवृत्तिरूप कहा है क्योकि यहाँ हिंसादि त्यागकर, अहिंसा रूप प्रवृत्ति की चर्चा हो रही है,वह शुभआस्रव का कारण है!इन व्रतों का अभ्यास/प्रवृत्ति भली भांति करने वाले ही संवर भी कर पाते है!मात्र निवृत्ति की चर्चा संवर का कारण होता !
व्रतों के भेद –
देशसर्वतोऽणुमहती !२!
संधिविच्छेद-देश+सर्वत:+अणु+महती
शब्दार्थ-देशत:-एकदेश/आंशिक त्याग-अणुव्रत,सर्वत:-सर्वदेश/सकल/पूर्णतया त्याग,महती-महाव्रत है !
अर्थ-व्रतों के दो भेद है!पांच पापों हिंसा,असत्य,चोरी,कुशील और परिग्रह का आंशिक रूप से त्याग अणु व्रत और सकल/पूर्णतया त्याग महाव्रत है!
भावार्थ-पञ्च पापों के एक देश त्याग से अणुव्रत और पूर्णतया त्याग से महाव्रत कहलाते है!
जैसे हिंसा के एक देश त्याग में-मात्र त्रसजीवों की हिंसा का त्याग करने से अहिंसाणुव्रत किन्तु पूर्णतया-स्थावर जीवों की भी हिंसा का त्याग करने से अहिंसामहाव्रत कहलाता है,यह महान कार्य महान पुरषों द्वारा होता है इनका एक देश पालक जीवों का पंचम देश विरत गुणस्थान,प्रतिमाधरियों से आर्यिका माता जी का और सर्वदेशपालक का,छठा-प्रमत /सातवाँ अप्रमत्त गुणस्थान,महान मुनि राजों का होता है!इन गुणस्थानों में इनका पालन करने से जीव की असंख्यात गुणी निर्जरा,प्रतिसमय होती है अर्थात संसार बंधन शिथिल पड़ता है!इसलिए इन का पालन अत्यंत महत्वपूर्ण है!
विशेष-(अणु-महाव्रत)
१-अहिंसाव्रत-संसारी जीव षट प्रकार,५ स्थावर और एक त्रस के है ,इनमे केवल त्रस जीवों की हिंसा /घात त्याग अणु अहिंसाव्रत है;स्थावर व त्रस दोनों की हिंसा/घात का त्याग महा(अहिंसा) व्रत है!कषायों के वशीभूत दस प्राणों का घात करना हिंसा है !
२-सत्य व्रत-स्थूल असत्य का त्याग सत्य अणु व्रत है जैसे किसी घटना को जस की तस कहना , बिना विचार किये की उस सत्य से किसी का घात भी हो सकता है!सूक्ष्म असत्य का त्याग,सत्य महाव्रत है जैसे ऐसे सत्य भी नहीं बोलना जिससे किसी जीव का घात हो जाए!कषायिक भाव पूर्वक अन्यार्थ भाषण करना असत्य है !
३-अचौर्यव्रत-किसी की वस्तु उसकी आज्ञा बिना ले लेना/गिरी हुई वस्तु उठाना आदि चोरी है!स्थूल चोरी का त्याग अचौर्य अणुव्रत है जैसे किसी से पुस्तक/वस्तु उसके पीछे उसके बैग से निकालना,इच्छा के विरु द्ध किसी को दान देने के लिए बाध्य करना,सरकारी राजस्व(टैक्सों)की चोरी करना आदि!सूक्ष्म चोरी का भी त्याग अचौर्य महाव्रत है,जैसे हाथ धोने के लिए मिटटी भी किसी के द्वारा दिए बिना नहीं लेना! कषाय के वशीभूत किसी का धन सम्पत्ति हड़पना चोरी है !
४-बृह्मचर्य व्रत-अबृह्म/कुशील का स्थूल रूप से त्याग अणु बृह्मचर्य व्रत है जैसे अपनी विवाहितपत्नी/पति से वासनात्मक संबंध छट्टी प्रतिमाधारी तक रखना!सूक्ष्म रूप त्याग में स्त्री/पुरुष मात्र से संबंध नहीं रखना बृह्मचर्य महाव्रत है !इसमें विपरीत लिंगी एक दुसरे के आसान/चादर पर भी नहीं बैठते,वे अपनी आत्मा में ही रमण करते है! कषाय वश किसी के साथ जबरदस्ती संबंध बनना अब्रह्म/कुशील है!
५-अपरिग्रह व्रत-किसी वस्तु रुपया पैसे जमीन जयदाद आदि होना परिग्रह नहीं है अपितु उसमे ममत्व बुद्धि होना कि यह मेरा है ‘परिग्रह’ है!क्योकि कोई भी वस्तु सदैव हमारे पास नहीं रहेगी/नहीं होगी वह किसी शुभ/अशुभ कर्म के उदय से है/नहीं है! इसलिए हमारे में परिग्रह के त्याग का भाव स्वेच्छा से होना चाहिए !परिग्रह का स्थूल त्याग अणु अपरिग्रह व्रत है जैसे अपने लाभ भोगोपभोग की सामग्री की एक सीमा निर्धारित क्र उस सीमा का उल्लंघन नहीं करना!परिग्रह का सूक्ष्मत: त्यागअपरिग्रह महाव्रत मुनि राज के होता है जिनके पास पिच्छी कमंडल और शस्त्र के अतिरिक्त अन्य कोई षगरह नहीं होता
उक्त पांचों व्रतों को यथा शक्ति पालन करने से ही हमे कल्याणकारी पथ मिलेगा! अत: इनको अपने जीवन में अंगीकार करना चाहिए!
आचर्यश्री उमास्वामी जी निम्न सूत्र में मन की चंचलता को रोककर पांच व्रतों की स्थिरता के लिए भावनाओं भाने का उपदेश देते है –
व्रतों की स्थिरता के लिए –
तत्स्थैर्यार्थं भावनाःपञ्च-पञ्च ! ३!
सन्धिविच्छेद-तत्+ स्थैरय:+अर्थं+भावनाः+पञ्च+पञ्च!
अर्थ-तत-उन(अणु/महा)व्रतों;की, स्थैरय:-स्थिरता,अर्थं-के लिए,
भावना:-भावनाए,पञ्च-पञ्च-पांच-पांच है!
भावार्थ-अणु/महाव्रतों की पुष्टि/निर्दोष पालन हेतु,प्रत्येक की पञ्च पञ्च भावनाए है!
विशेष-ये पांच-पांच भावनाए मुख्यतःमहाव्रतो तथा गौण रूप से अणुव्रतो की पुष्टि और निर्दोष पालन हेतु उपदेशित है,इन भावनाओं का ध्यान रखने से अणुव्रती अपने व्रतों को उत्कृष्टपालन कर सकेगें !
अहिंसाव्रत की पञ्च भावनाए-वाड्.मनोगुप्तिर्यादाननिक्षेपणसमित्यालोकितपानभोजनानि-पञ्च !!४!!सन्धिविच्छेद-वाड्.+मनोगुप्ति+ईर्या+आदाननिक्षेपण+समित्य+आलोकित+पान+भोजनानि+पञ्चशब्दार्थ-वाड्.गुप्ति-हितमित,पीड़ारहित,न्यूनतमव नियंत्रित वचन बोलना,वाग्गुप्तिहै,अन्यथा हिंसा हो ही जायेगी!मनोगुप्ति-मन में अवांछित चिंतवन होना भाव हिंसा है,अत:मन को भी वश में रखना चाहिए मन में अशुभ विचारों का चिंतवन नही करना मनोगुप्ती है मन से ,नियंत्रित और उचित चिंतवन करने से भाव-हिंसा नही होती!
ईर्या निक्षेपण समिति-चार हाथ जमीन देखकर चलना चाहिए जिससे जीव हिंसा न हो!
आदाननिक्षेपण समिति-किसी वस्तु को एक स्थान से दुसरे स्थान पर रखने/उठाने से पूर्व देख शोध कर उठाना/रखना आदान निक्षेपण समिति है!
आलोकित पान भोजन-सूर्य के प्रकाश में बनाया और उससे प्रकाशित समय में ही भोजन/आहार,जल ग्रहण करना!इसके विपरीत रात्रि /अन्धकार में,(जहा सूर्य का प्रकाश नहीं आ रहा है) बनाये/ग्रहण किये गए भोजन में जीव हिंसा से बचना असंभव है क्योकि वे दिखगे नहीं!जीव रक्षा का ध्यान रखना अनिवार्य है
पञ्च-इन पांच भावनाए का निरंतर ध्यान रहने से अहिंसामहाव्रत का दोषरहित पालन होता है,परिणामों की विशुद्धि के कारण कर्मों की असंख्यात गुणि निर्जरा होगी,महान पुन्यबंध होगा !
विशेष:-सूर्योदय होने के एक घड़ी पश्चात भोजन बनाने का विधान है,रसोई के समस्त कार्य चक्की की सफाई,आटा,मसाले की पिसाई,पीने का पानी,दुग्धादि गर्म करना सूर्योदय के एक घड़ी बाद ही करने चाहिए अन्यथा सूक्ष्म जीव जंतु देखना असंभव होगा और उनकी हिंसा से बच नहीं पायेगे तथा आलोकित पान भोजन नहीं कहलायेगा! अनेको जीव सूर्योदय होने के एक घड़ी के बाद तथा सूर्यास्त से १ घड़ी पूर्व तक उत्पन्न नहीं होते इसलिए रात्रि में उत्पन्न होने वाले सूक्ष्म जीवों की हिंसा के घात से तो हम दिन में भोजन ग्रहण करने से बच जाते है!
इन भावनाओं के भाने से व्रतों का निर्दोष पालन होता है,भावों की निरंतर विशुद्धता बढ़ती है!
सत्यव्रत की पांच भावनाये –
“क्रोधलोभभीरुत्वहास्यप्रत्याख्यानान्यनुवीचिभाषणं च पञ्च” !!५!!
संधि विच्छेद-(क्रोध+लोभ+भीरुत्व+हास्य)+प्रत्याख्यान+अनुवीचि+भाषणं+च+पञ्च
शब्दार्थ-क्रोधप्रत्याख्यान,लोभप्रत्याख्यान,भीरुत्वप्रत्याख्यान,हास्यप्रत्याख्यान,अनुवीचिभाषणं-आगमनुसार वचन बोलना,च-और,५-५ सत्यव्रत भावनायेहै!
अर्थ-क्रोधप्रत्याख्यान-क्रोध का त्याग;क्रोध में कठोर,कडवे,गाली रूप अभद्र वचन,विवेकहीन होने से असत्य है!
लोभ प्रत्याख्यान-लोभ का त्याग;लोभवश झूठ बोलकर,स्वर्ण में ताम्बा/पीतल मिलाकर बेचना असत्य हैभीरुत्व प्रत्याख्यान-भय का त्याग;डर के कारण असत्य बोला जाता है!जो की असत्य है!
हास्यप्रत्याख्यान-हास्य का त्याग;हसीं-मजाक में चुभने वाले असत्य वचन बोले जाते है!
अनुवीचिभाषणं-आगमानुसार निर्दोष सत्य वचन बोलना!जैसे किसी को अदरक की चाय रोग निवारण के लिए,लेने के लिए नहीं कहना क्योकि अदरक के सेवन से जीवहिंसा होती है या किसी को घस्स पर प्रांत अथवा सायंकालीन सहर के लिए नहीं कहना!
च पञ्च-ये पांच भावनाए सत्यव्रत की है!
भावार्थ-क्रोध,लोभ,भीरुत्व,हास्य के;प्रत्याख्यान और अनुवीचिभाषण,इन ५ भावनाओं के भाने से निर्दोष सत्यव्रत का पालन हो सकेगा,इसलिए इनका ध्यान रखना नितांत आवष्यक है!
विशेष-क्रोध,हास्य,भीरु,हास्यवश बोले,सत्यवचन भी असत्य होते है!वचन किसी को कष्ट देने वाले नहीं होने पर ही सत्य है!
अचौर्य व्रत की पञ्च भावनाए
शून्यागारविमोचितावासपरोपरोधाकरणभैक्ष्यशुद्धिसधर्माऽविसंवादापञ्च६
संधिविच्छेद-शून्यागार+विमोचित+आवास+पर+उपरोधाकरण+भैक्ष्यशुद्धि+सधर्मा+अविसंवादा+पञ्च।शब्दार्थ -शून्यागार-निर्जन स्थान,विमोचित-छोड़े हुए खाली,आवास-स्थान धर्मशालादि,पर उपरोधाकरण-अन्यों को,अपने द्वारा रोके हुए स्थान पर ठहरने से रोकना,भैक्ष्यशुद्धि-४६ दोषो रहित आहार ग्रहण करना,सधर्मा-सहधर्मी से,अविसंवादा- मेरा है./तेरा है जैसे विसंवाद नहीं करना,पञ्च-पांच
अर्थ-शून्यागारवास-निर्जन स्थान जैसे वृक्ष की कोटर,पर्वतों की गुफाओं,स्कूल में रहना!जिससे,गृहस्थ के साथ रहने से,उसकी किसी वस्तु के चोरी/ग्रहण करने के भाव ही जागृत नहीं हो!
विमोचित आवास-धर्मशालादि,छोड़े हुए खाली स्थानों में निवास करना!जिससे वहां भी,निमित्त के अभाव में विकारी भाव उतपन्न नहीं होवे !
परोधाकरण-अपने ठहरे हुए स्थान पर किसी अन्य के आने पर,उसके ठहरने में बाधा नहीं डालना क्यो कि वह स्थान आपका अपना नहीं है,उसे अपना नहीं माना जा सकता है!
भैक्ष्य शुद्धि-आहार की शुद्धि ४६ दोषों रहित,निर्दोष शुद्ध आहार लेना चाहिए!भोजन अशुद्ध है,अथवा अनुचित व्यवसाय/नौकरी से अर्जित धन से निर्मित है तो उसे ग्रहण करने से परिणाम दूषित होंगे!तपस्या में विघ्न पडेगा!
सधर्मा अविसंवादा-सधर्मियों के साथ यह तेरा/मेरा है,इस प्रकार का विसंवाद नहीं करना! मंदिर के फण्ड को हत्याने की कुचेष्टा/उसका दुरूपयोग करना!इनसे अचौर्यव्रत,व्रती नहीं रह पायेगा!
पञ्च-पञ्च भावनाए अचौर्य व्रत की है!
भावार्थ-शून्यागारवास,विमोचितआवास,परउपरोधाकरण,भैक्ष्यशुद्धि एवं सधर्मी अविसंवाद ,इन पांच भावनाएं भाने से, निर्दोष सत्य व्रत का पालन हो सकेगा,इसलिए इनका ध्यान रखना नितांत आवष्यक है!
ब्रह्मचर्यव्रत की पञ्च भावनाए -स्त्रीरागकथाश्रवणतन्मनोहरांगनिरीक्षणपूर्वरतानुस्मरणवृष्येष्टरसस्वशरीरसंस्कारत्यागाःपञ्च !!७!!
संधि विच्छेद-स्त्री+रागकथा+श्रवण+तत्+मनोह+अंग+निरीक्षण+पूर्वरत+अनुस्मरण+वृष्य+ईष्ट+रस+स्वशरीर+संस्कार)+त्यागाःपञ्च!
शब्दार्थ-स्त्रीरागकथा-स्त्री राग कथा,श्रवण-सुनने,तत्-उनके,मनोह-मनोहर +अंग- अंगों के,निरीक्षण-निरिक्षण,पूर्वरत-पूर्व में भोगे भोगों,अनुस्मरण-केस्मरण, वृष्य-गरिष्ट,ईष्ट-ईष्ट,रस- रस,स्वशरीर-अपने शरीर का,संस्कार-श्रृंगार करने,त्यागाः-का त्याग करना,पञ्च-पांच ब्रह्मचर्य व्रत की भावनाए है!
भावार्थ:-स्त्री राग कथा श्रवण त्यागाः-स्त्री में राग बढाने वाली कथाओं जैसे,सनीमा,टी.वी,पत्रिकाओं में उत्तेजक विज्ञापनों के सुनने/देखने का त्याग करना!
तन्मनोहर अंगनिरीक्षण का त्यागाः-उन(स्त्रियों/पुरुषों)के मनोहर अंगों को घूरने,अश्लील चित्रों, वीडि यो आदि के देखने का त्याग करना!
पूर्व रत अनुस्मरण त्यागाः-ग्रहस्थावस्था में भोगे गए भोगों के स्मरण का त्याग करना क्योकि उनके स्मरण करने से परिणाम दूषित होते है!!
वृष्य ईष्ट रस त्यागाः-वृष्ट-गरिष्ट जैसे;दाल-बाटी,बादाम के हलवे,घेवर आदि, इष्ट रसों -अपने को अच्छे लगने वाले रसों नमक.मीठा आदि का त्याग करना जिससे भोजन स्वादरहित होने से इन्द्रियां नियंत्रित रहेगी!
स्वशरीर संस्कार त्यागाः-अपने शरीर का सेंट आदि से श्रृंगारित करने का त्याग करना! व्रती के वस्त्र साधारण होने चाहिए! अन्यथा व्रतों में दोष लगता है!
पञ्च-ये ब्रह्मचर्य व्रत की पांच भावनाए है!
विशेष उक्त पंच भावनाएं निरंतर भाने से ब्रह्मचर्यव्रत का निर्दोष पालन होता है
परिग्रहत्यागव्रत की पांच भावनाए –
मनोज्ञामनोज्ञेन्द्रियविषयरागद्वेषवर्जनानिपञ्च !!८!!
संधिविच्छेद:-{(मनोज्ञ+अमनोज्ञ)+इन्द्रियविषय+राग}-द्वेष+वर्जनानि पञ्च
शब्दार्थ-मनोज्ञ-मन को अच्छे लगने वाले,अमनोज्ञ-मन को अच्छे नहीं वाले, इन्द्रियविषय-इन्द्रिय विषय,राग-द्वेष-राग और द्वेष रूप,वर्जनानि-त्याग करना,पञ्च-पांच
अर्थ-मनोज्ञ इन्द्रिय विषय राग वर्जनानि -मन को अच्छे लगने वाले इन्द्रिय विषयों में राग होने से परिग्रह आयेगा अतःपंचेन्द्रिय विषयों में राग का त्याग करना!
अमनोज्ञ इन्द्रिय विषय द्वेष वर्जनानि-मन को बुरे लगने वाले इन्द्रिय विषयों में द्वेष होने से भी परिग्रह आयेगा!अतः अमनोज्ञ पंचेन्द्रिय विषयों में द्वेष का त्याग करना,ऐसे नहीं करने पर पंचेन्द्रिय विषयों का संग्रह बढता ही जाएगा!
पञ्च -पांच परिग्रह व्रत की भावनाए है!
भावार्थ- इन्द्रिये पांच;स्पर्शन,रसना,घ्राण,चक्षु,कर्ण है! इन पांचो इन्द्रियो,के मन को अच्छे लगने वाले विषयों में राग का और बुरे लगने वाले विषयों में द्वेष का त्याग करना जैसे
१-स्पर्शन इन्द्रिय के मन को अच्छे लगने वाले विषयों में राग और बुरे लगने वाले विषयों में द्वेष का त्याग करना! किसी वस्तु को राग वश नहीं छोड़ना और अन्य वस्तु को द्वेष वश छोड़ना,इन दोनों का ही त्याग करना है !
२-रसना इन्द्रिय के मन को अच्छे लगने वाले विषयों में राग और बुरे लगने वाले विषयों में द्वेष का त्याग करना!जैसे जीव्हा को अच्छे लगने वाले मीठे रसों से राग होना तथा कड़वे रसों को द्वेष वश अच्छा नहीं लग्न -दोनों का ही त्याग करना है!
३-घ्राण इन्द्रिय के मन को अच्छे लगने वाले विषयों में राग और बुरे लगने वाले विषयों में द्वेष का त्याग करना!जैसे सुगंधित वस्तुओं को राग वष सूघना और दुर्गन्धित वस्तुओं को नहीं सूघना ,दोनों का ही त्याग करना है!
४-चक्षु इन्द्रिय के मन को अच्छे लगने वाले विषयों में राग और बुरे लगने वाले विषयों में द्वेष का त्याग करना!-जैसे खूबसूरत लोगों को राग वष देखने और कुरूप को नहीं देखा ,दोनों का ही त्याग करना है!
५-कर्ण इन्द्रिय के मन को अच्छे लगने वाले विषयों में, राग और बुरे लगने वाले विषयों में द्वेष का त्याग करना!जैसे मधुर संगीत को रागवश सुनने और भोंडे संगीत द्वेषवश न सुनने का त्याग !
उक्त पाँचों भावनाये भाने से निर्दोष अपरिग्रहव्रत का पालन होता है!
हिंसादि पंच पापों से विरक्त होने की भावना
हिंसादिष्विहामुत्रापायावद्यदर्शनम् !!९!!
संधिविच्छेद:-हिंसा+आदिषु+इह+अमुत्र+अपाय+अवद्य+दर्शनम्।
शब्दार्थ-हिंसा-हिंसा,आदिषु-आदि,इह-इस,अमुत्र-परलोक,अपाय-दुःख,अवद्य-निंदा,दर्शनम्-देखनी/होती है ।
भावार्थ-हिंसादि पांच पापों से,इस लोक और परलोक दोनों में हमें दुःख और निंदा प्राप्त होते है,ऐसे विचारने से हिंसा आदि पांच पापों की प्रवृत्ति में मन लगेगा ही नहीं!पांच भावनाए परिग्रहव्रत की है!पापों से विरक्ति की भावना
दु:खमेववा !!१०!!
संधिविच्छेद-दुखम+इव+वा
शब्दार्थ-दुखम-दुःख,इव-ये,वा-रूप ही है!
अर्थ-ये हिंसादि पाँचों पाप दुःख देने वाले ही है,अत: त्याज्य है!
विशेष- यहां कारण मे कार्य का उपचार है ,क्योकि हिंसादि दुःख के कारण है किन्तु उन्हें कार्य दुःख रूप कहा है !
व्रती सम्यग्दृष्टि की भावनाये –
मैत्रीप्रमोदकारुण्यमाध्यस्थानिचसत्त्वगुणाधिकक्लिश्यमानाऽविनयेषु!!११!!
संधि विच्छेद-मैत्री+प्रमोद+कारुण्य+माध्यस्थानि+च+सत्त्व+गुणाधिक+क्लिश्यमाना+अविनयेषु
शब्दार्थ-मैत्री- प्रमोद-प्रसन्नता,कारुण्य-करुणामय भाव,माध्यस्थानि-मध्यस्थ भाव च सत्त्व-समस्त जीवों ,गुणाधिक-अधिक गुणवानों,क्लिश्यमाना-दुखियों,/भिन्नमतियों और ,अविनयेषु-अविनय भाव रखना चाहिए
अर्थ- जीव मात्र के,अधिक गुणवानों,दुखियों और अविनयशील जीवों के प्रति क्रमश: मैत्री, प्रसन्ता, करुणा और मध्यस्था का भाव होना चाहिए!
भावार्थ-समस्त जीवों के प्रति मैत्री,रत्नत्रय की अपेक्षा अधिक गुणवानों के प्रति प्रमोद-प्रसन्नता का भाव चेहरे पर होना चाहिए जिसे अंतरंग से भक्ति भाव जागृत हो,जैसे; मुनिराज के पधारने से धर्मामृत की वर्षा होगी! , असता कर्म के उदय से दुखियों/क्लिष्टों के प्रति करुणा का भाव -अर्थात उनके कष्टों को दूर करने का भाव होना चाहिए तथा अविनयशील-जो तत्वार्थ श्रद्धानन रहित है /अन्य मतियों जिनसे हमारे रहन,सहन,खाने-पीने में तारतम्यता नही है,के प्रति मध्यस्थता;/अर्थात उनके अच्छे/उनकी समृद्धि बढ़ने पर,बुरा न लगे और उनके बुरा होने पर या कोई आपत्ति आने पर अच्छा न लगे,ऐसे विचार की उन्हें सदबुद्धि आये. के भाव होने चाहिए!
संसार व शरीर के स्वभाव का विचार
जगत्कायस्वभावौ वा संवेगवैराग्यार्थम् -!!१२!!
संधि विच्छेद-जगत्+काय +स्वभावौ+वा+संवग+वैराग्यार्थम्
शब्दार्थ-जगत-संसार,काय-शरीर ,स्वभावौ-स्वाभाव,वा-अथवा ,संवेग-संसार से भय,वैराग्यार्थम्-वैराग्य के लिए /राग-द्वेष के अभाव के लिए ,
अर्थ-संसार के स्वभाव,का चिंतवन करने से संवेग संसार से भय और काय के स्वरूप का चिंतवन करने से वैराग्य (राग-द्वेष से मुक्ति) होता है!
भावार्थ-संवेग के लिए संसार के स्वभाव/स्वरुप और वैराग्य के लिए काय के स्वरुप का चिंतवन करना चाहिए!इससे व्रतों का पालन निर्दोष होगा !
विशेष-१-यदि संवेगभाव,अर्थात संसार में अरुचि भाव है/संसार शरीर भोगों से वैराग्य हो गया/अथवा वैराग्य निरंतर वृद्धिगत है तो व्रतों का दोष रहित/समुचित पालन के लिए संवेग और वैराग्य परिणाम अत्यंत सहकारी है!संवेग परिणाम के लिए संसार स्वरुप का चिंतवन करना है!यह अनादिनिधन,अनादिकाल से है!वेत्रासन के ऊपर झालर और उसके ऊपर मृदंग के समान लोक का आकार है!इसमें अनंत काल से जीव नाना योनियों में दुःख भोग रहा है!इसमे कोई भी वस्तु नियत नहीं है!जीवन जल के बुलबुले समान नश्वर है!भोग संपदाये बिज ली के इन्द्रधनुष के समान भंगुर व् चंचल है यहाँ सभी स्वार्थवश अपने सगे संबंधी होते है,किन्तु कटु सत्य है कि यहाँ कोई किसी का नहीं है अत:संसार असार है इसलिए इसमें रूचि क्यों होनी चाहिए!इस प्रकार चिंतवन करने से संसार से अरुचि होती है वैराग्य के लिए शरीर के स्वभाव का चिंतवन करे,इससे क्या रति करनी,नश्वर है अशुचिता-मल,मूत्र,अस्थि,मांस रुधिर इत्यादि सप्त धातुओं का भंडार है!इसलिए निरंतर संसार और शरीर का चिंतवन करने से क्रमश संवेग और वैराग्य भावना वृद्धिगत होती है जिससे निर्दोष व्रतों का पालन होता है !
हिंसापाप का लक्षण-
प्रमत्त योगात्प्राण व्यपरोपणं हिंसा !!१३!!
संधि विच्छेद-प्रमत्त+योगात +प्राण + व्यपरोपणं+ हिंसा
शब्दार्थ-प्रमत्त-प्रमाद के योगात -योग से ,प्राण- दस प्राणों का, व्यपरोपणं-घात करना, हिंसा-हिंसा है !
अर्थ-प्रमाद वश योग से किसी के दस प्राणों का घात करना द्रव्य हिंसा है !
भावार्थ-कषाय युक्त अवस्था को प्रमाद (५ इन्द्रियों,४ कषाय ,४ विकथा,स्नेह और निंद्रा =१५ होते है ) कहते है!
इन प्रमादों में से किसी के वशीभूत, किसी प्राणी के पांच इन्द्रिय,३ बल,श्वासोच्छ्वास और आयु, इन दस प्राणों का घात होता है तो हिंसा है किन्तु प्रमादों के अभाव में प्राणघात होने से हिंसा पाप दोष नहीं लगता है!
संसार में सर्वत्र जीव है वे अपने निमित्तों से मरते भी है किन्तु उनके मात्र मरने से ही हिंसा पाप का दोष नहीं लगता! उद्धाहरण के लिए; कोई मुनि महाराज ईर्यासमिति का पालन करते हुए चार हाथ आगे की भूमि भली प्रकार देखते हुए इस भाव से चल रहे है कि उनके पैरों के नीचे आकर, किसी जीव की हिंसा नहीं हो जाये ,किन्तु फिर भी सूक्ष्म जीवो की हिंसा स्वाभाविक है,तब भी मुनिराज को हिंसा पाप नही लगेगा क्योकि उनका जीवों की हिंसा करने का भाव नहीं है,अत: यह हिंसा नहीं है क्योकि प्रमाद का योग नहीं है!किन्तु यदि वे ईर्यासमिति का पालन करते हुए नहीं चलते,तब जीव की हिंसा नहीं होने पर भी उन्हें हिंसा पाप का दोष लगता है चाहे किसी जीव के प्राणों का घात हो या नहीं हो क्योकि उनका भाव जीवों को बचाने का नहीं है और उनके प्रमाद का योग है!अत:हिसा रूप परिणाम होने पर ही हिंसा पाप दोष लगता है !
जैन दर्शन में हिंसा के दो भेद ;द्रव्य और भाव हिंसा है !द्रव्य हिंसा का भावहिंसा के साथ मात्र संबंध होने के कारण उसे हिंसा कहा है ,द्रव्य हिंसा होने पर भाव हिंसा होना आवश्यक नहीं है !
शंका-जैनेतर धर्मों में, भाव और द्रव्य हिंसा ,अलग अलग नहीं मानने के कारण,शंका उत्पन्न होती है कि समस्त लोक ,संसार के जल ,थल ,पर्वतोंकी चोटी पर जीव जंतु है फिर कोई जीव कैसे अहिसक हो सकता है ?
समाधान-जीव बादर और सूक्ष्म दो प्रकार के होते है !सूक्ष्म जीव तो किसी अन्य जीव से न तो बाधित होते है और उन्हें बाधित भी नहीं करते इसलिए उनका तो हिंसक होने का प्रश्न ही नही उठता !स्थूल /बादर जीवों की जिनकी रक्षा करनी संभव है उनकी रक्षा संयमी पु रुष करते है इसलिए उन्हें हिंसा पाप का दोष नहीं लगता
विशेष-१-कोई प्राणी किसी अन्य प्राणी को मारने की योजना बनाता है किन्तु उसको किसी कारणवश मार नहीं पाता;यद्यपि उसने दुसरे प्राणी को मारा नहीं है तब भी उसके हिंसा पाप का बंध होता है क्योकि वह प्रमाद सहित है और उससे अपने भाव प्राणों की हिंसा होती है !
२-जो लोग चीनी के बने पशु आकार के खिलौनों का सेवन दीपावली में कर ते है उन्हे भी हिंसा का दोष लगता है !टीवी पर बच्चे,पिस्तौल से किसी को मारने के दृश्य को देखकर आनंदित होने पर,यद्यपि उन्होंने किसी को मारा नहीं है,उन्हें हिंसा की अनोमोदना करने के कारण हिंसा पाप का दोष लगता है !
३-आहारदान के अवसर पर शुद्धि की प्रतिज्ञा लेने पर यदि आहार/जल शुद्ध नहीं है तब हिंसा पाप का दोष आहार दाता को लगता है,मुनिराज को नहीं क्योकि उन्होंने कोई प्रमाद नहीं किया है!किन्तु यदि मुनिराज जानते है कि आहारदाता मदिरा,मांस आदि का सेवन करता है,उसके आहार जल शुद्ध नहीं है.चाहे आहारदाता ने शुद्ध ही आहार क्यों नहीं निर्मित किया हो, तब उनके हिंसा पाप का दोष,उनके प्रमाद के कारण लगता है
४-अपनी स्वयं की आत्मा को भी किसी कषायवशीभूत कष्ट देना भाव हिंसा है!इससे भी हिंसा पाप दोष लगता
असत्य पाप के लक्षण-
असदभिधानमनृतम् !!१४!!
संधि विच्छेद-असत +अभिधानम्+अनृतम्
शब्दार्थ-असत -जो वस्तु जैसी है वैसी नही ,अभिधानम्-कहना,अनृतम्-झूठ है !
अर्थ-किसी वस्तु को उसके स्वरुप से भिन्न कहना,अथवा अकल्याणकारी वचनो का सत्य होने पर भी प्रति पादन करना झूठ /असत्य है !
भावार्थ-किसी को कर्कश,पीड़ादायक वचन,यद्यपि सत्य भी हो,कहना असत्य है जैसे काणे को काणा कहना!
किसी को आँखों की ज्योति बढ़ाने के लिए गाजर का सेवन अथवा गुलाब जल नेत्रों में डालने की सलाह देना भी असत्य है क्योकि आगम विरूद्ध वचन है क्योकि गाजर जमीकन्द है और गुलाब जल अनेक एकेन्द्रिय जीवों की हिंसा से बनता है!दोनों में अत्यंत जीव हिंसा है !अत:आगमनुकूल,हितमित,कल्याणकारी वचन ही बोलने चाहिए अन्यथा असत्य पाप का दोष लगता है!किसी छात्र को शिक्षक यदि उसे सुधारने की भावना से पीटता है तब वह असत्य दोष का भागी नहीं है क्योकि उसका भाव छात्र का कल्याण करना है!या किसी डाक्टर से ऑपरे- शन करते हुए मरीज की मृत्यु हो जाती है तो वह हिंसा तब तक नहीं है जब तक डाक्टर का भाव उसे ठीक करने का है किन्तु यदि उसका भाव ही इलाज़ के बहाने मरीज़ को मारने का है तो वह डाक्टर हिंसा पाप का दोषी होगा !आशय है कि प्रधान अहिंसाव्रत है ,बाकी चारों उसकी रक्षा के लिए है
चोरी पाप के लक्षण-
अदत्तादानंस्तेयम् !!१५!!
संधि विच्छेद-अदत्त+आदानं+स्तेयम्
शब्दार्थ-अदत्त-बिना दी हुई वस्तु,आदानं-ग्रहण करना,स्तेयम्-चोरी है
अर्थ-बिना दिए हुए कोई वस्तु ,गिरी ,पड़ी हुई ग्रहण करना चोरी है !
विशेषार्थ-प्रमाद योगवश अर्थात बुरे भाव से पराई वस्तु को ग्रहण करना चोरी है,चाहे उससे कोई लाभ हो या नहीं हो!जैसे किसी साथी की पुस्तक छुपा कर रख देना,यद्यपि इससे आपको कोई लाभ नहीं हुआ किन्तु दुसरे को हानि अवश्य हो गई!या किसी से, समाज के ५-७ कमेटी के लोग,उसकी इच्छा के विरुद्ध दान लेते है तो यह भी चोरी है !
शंका -कर्म और नो कर्म कोई देता नहीं ,तो यह भी चोरी ही हुई ?
समाधान- यह दोष नहीं है क्योकि जहां लेना देना संभव है वही चोरी होती है ,इस दृष्टात में लेना देना संभव नहीं है !यह सूत्र में अदत्त शब्त से फलहित होता है की जहाँ लेना देना सम्भव है वही चोरी है अन्यथा नहीं !
कुशील पाप का लक्षण-
मैथुनमब्रह्म !!१६!!
संधि विच्छेद -मैथुनं + अब्रह्म
शब्दार्थ-मैथुनं-मैथुन;स्त्री पुरुष के बीच रागवश वासना पूर्ण क्रिया को मैथुन कहते है,अब्रह्म-अब्र्ह्म /कुशील पाप है
अर्थ-मैथुन रूप परिणाम होना कुशील पाप है !
भावार्थ-चारित्र मोहनीय कर्म के उदय से स्त्री पुरुषों के बीच राग वश वासना रूप परिणाम होना कुशील पाप है !
विशेष-गृहस्थों को एक विवाहित स्त्री /पुरुष में एक दुसरे के प्रति वासना रूप परिणाम होना , कुशील पाप नहीं है किन्तु साधु परमेष्ठी को स्त्री मात्र के स्पर्श का निषेध है,अन्यथा उन्हें कुशील पाप का दोष लगता है !
परिग्रह पाप का लक्षण-
मूर्च्छा परिग्रह:!!१७!!
सन्धिविच्छेद:-मूर्च्छा+परिग्रह:!!
शब्दार्थ:-मूर्च्छा -बाह्य धनादि और अंतरंग क्रोधादि में ममत्व परिणाम होना /यह मेरा है ,परिग्रह:-परिग्रह है !
अर्थ-जो परिणाम आत्मा को चारों ओर से जकड ले वह परिग्रह है,किसी वस्तु अथवा राग द्वेष को कहना कि ये मेरे हैं,यही ममत्व परिणाम ,मूर्च्छा अर्थात परिग्रह है !
विशेष:-
१-मुनिमहाराज के पिच्छी ,कमंडल,एवं शास्त्र जी उनके परिग्रह में नहीं आते क्योकि प्रमाद नहीं है !चश्मा भी यदि आहार शोधन अथवा शास्त्र के स्वाध्याय हेतु प्रयोग में आ रहा है तो परिग्रह में तब तक नहीं आता जब तक उनका उपयोग विषयों के सेवन के लिए नहीं है !
२-प्रथमानुयोग के ग्रन्थ में एक दृष्टांत आता है,राजा श्रेणिक भगवान महवीर के समवशरण की ओर जाते हुए एक ध्यानस्थ मुनिराज को तपस्या में लींन देख कर,समवशरण में पहुँचने पर गौतम गणधर देव से प्रश्न करते है की इन मुनिराज को मोक्ष कब मिलेगा ,गढ़र देव कहते है ये तो अंतरंग परिणामों के कारण नरकगति का बंध कर रहे है क्योकि ओके मंत्रियों ने,इनके दीक्षा लेने के समय किये आश्वासन के विपरीत,इनके पुत्र को राज्य न देकर स्वयं राज्य हड़प लिया है !यहाँ मुनिराज के परिग्रह (राज्य ) में अभी तक मोह पड़ा हुआ है ,इस कारण उन्हें नरकगति का बंध हो रहा है!गौतम गंधार देव राजा श्रेणिक से इन्हे सम्बोधित कर, सँभालने का निर्देश देते है,तदानुसार राजा श्रेणिक उन मुनिराज को संभालते है ,उनके पास जाकर कहते है ‘ मुनिराज आप कहाँ राज्य आदि के चक्क र में पढ रहे हो आप अपना कल्याण तपस्या में लीन होकर करे अन्यथा आप नरक आयु का बंध कर रहे है ,तभी मुनिराज ने संभल कर अंतर्मूर्हत में मोक्ष लक्ष्मी को प्राप्त किया !यहाँ मुनिराज ने द्रव्य से तो परिग्रह का त्याग कर दिया था किन्तु भाव से नहीं इसलिए उनके नरकायु का बंध हो रहा था !
परिग्रह सहित मुनि के सन्दर्भ में आचार्य श्री कुन्दकुन्द महाराज जी कहते है कि ”मुनिराज थोड़ा भी परिग्रह रखते है तो वे निगोद जाते है’परिग्रह का त्याग द्रव्य और भाव दोनों से होना आवश्यक है !
व्रती का लाक्षण-
नि :शल्योवर्ती : !!१८ !!
सन्धिविच्छेद:- नि:+शल्यो+वर्ती :
शब्दार्थ:-नि -रहित :शल्यो-शल्य ,वर्ती: -व्रती है
अर्थ-व्रती शल्य रहित होता है !
भावार्थ -जो काँटों की तरह दुःख देता है,उसे शल्य कहते है!व्रती शल्य रहित होता है !
विशेष-
शल्य के तीन भेद है !
१-माया शल्य -दुसरे के प्रति छल कपट के भाव होना,जैसे प्रथमानुयोग में दृष्टांत आता है की एक चोर ने मंदिर से छत्र चोरी करने के लिए क्षुल्लक जीका वेश धारण किया। यह माया शल्य है!ऐसे जीव के सदा चुभता रहेगा कि वह क्षुल्लकजी तो है नहीं, उसने केवल उनका भेष धारण कर लिया है,सदा डरता रहेगा कि कोई मुझे पकड़ न ले !ऐसे में वह व्रती ,व्रतों का पालन नहीं कर पायेगा !
२-मिथ्या शल्य- तत्वार्थ और व्रतों में श्रद्धां नहीं होते हुए भी अन्यों के देखा देखी व्रत धारण कर लेना ,मिथ्या शल्य है !ऐसे जीव के श्रद्धां के अभाव में यह बात कांटे की तरह चुभती रहेगी व्रत तो ले लिया किन्तु कहाँ फस गए ,अत्यंत कठिन है इनका पालन !ऐसा व्यक्ति क्या व्रत लेगा !
३-निदान शल्य-अपनी प्रसिद्धि अथवा भविष्य में किसी सांसारिक वस्तु जैसे दुखों के छूटने के लिए अथवा स्वर्ग की प्राप्ति की वांछा से व्रत धारण करना,निदान शल्य है !
व्रती उक्त तीनों शल्य रहित होता है !
शंका -बाहुबली भगवान के युद्ध के पश्चात कौन सा शल्य था ?
समाधान उन्हें युद्ध के बाद कोई शल्य नहीं था केवल संताप था,दुःख था कि मैंने छोटे भाई भरत के साथ युद्ध क्यों किया,करना नही चाहिए था !वे सर्वार्थ सिद्धि से आये हुए महान मुनिराज तद्भव मोक्ष गामी जीव थे!वे नि:शल्य थे!उनके यह भाव नहीं था कि भरत की भूमि पर खड़ा हूँ !
व्रती केभेद –
अगार्यनगाराश्च !!१९!!
सन्धिविच्छेद:-अगारी+अनगारी:+च
शब्दार्थ:-अगारी-गृहस्थ अणुव्रती,घर सहित,अनगारी-गृह त्यागी अर्थात साधु आर्यिका,ऐलक आदि,च-और
अर्थ व्रती के अगारी (गृहस्थ -घरों में रहने वाले श्रावक )और अनगरी(ग्रह त्यागी मुनि,आर्यिका ,ऐल्लक जी ) दो भेद है !
शंका-साधु किसी देवालय या निर्जन खाली स्थान पर ठहरने से अगारी हो जाएंगे !यदि कोई गृहस्थ अपनी पत्नी से झगड़ कर वन में रहने लगे तो क्या वह अनगारी हो जायेगा ?
समाधान-अगारी का अर्थ मकान ही है किन्तु यहाँ पर अभिप्राय बाहरी मकान से नहीं लेकर आंतरिक मानसिक मकान से है !जिस व्यक्ति के मन से घर बसा कर रहने की भावना है वह जंगल में रहने पर भी अगारी ही है और जिसके मन में ऐसी भावना नहीं है वह कुछ समय के लिए मकान में रहने के बावजूद भी अनगारी ही है,अगारी नही !
शंका -अगारी पूर्णवर्ती नहीं है इसलिए व्रती नहीं हो सकता है ?
समाधान-यह दोष नहीं है क्योकि नैगमनयों की अपेक्षा ,नगरवास के समान,अगारी के भी व्रती पना बनता है जैसे कोई घर/झोपड़ी में रहने पर भी कहता है ‘मैं नगर में रहता हूँ’ !इसी प्रकार जिसके पूर्ण व्रत नहीं है वह नैगम ,संग्रह और व्यवहारनय की अपेक्षा व्रती है !
शंका -क्या जो हिंसादि एक से निवृत्त है ,वह अगारी व्रती है?
समाधान -नहीं !
शंका -वह क्या है?
समाधान -जिसके पाँचों प्रकार की एक देश विरती है ,वह अगारी है !
अगारी का लक्षण
अणु व्रतो अगारी !!२०!!
सन्धिविच्छेद:-अणु+व्रतो+अगारी
शब्दार्थ:-अणुव्रतो-अणुव्रती ,अगारी-
है!
अर्थ-अणुव्रती अर्थात एकदेश पांच अणुव्रतों;(अहिंसा,सत्या,अचौर्य,ब्रह्मचर्य,और परिग्रह परिमाण)का पालन करने वाले सम्यग्दृष्टि गृहस्थ जीव अगारी है अर्थात घर में रहते है!भावार्थ- एक देश पाँचों पापों के त्याग का नियम लेने वाले वाले अणुव्रती होते है!
अहिंसाणुव्रती- त्रस जीवों की संकल्पी हिंसा का सर्वथा त्यागी होता है !बाकी तीन हिंसाये उद्यमी-व्यापार आदि में, विरोधी-अपने बचाव में एवं आरंभी-घर के नित्य दिन के कार्य और व्यापार में वह नहीं चाहते हुए भी मजबूरी में करता है!
सत्यणुव्रती-राग-द्वेष,मोह,भय,आदि के वश बोले जाने वाले स्थूल झूठ बोलने का सर्वथा त्यागी होता है !
अचौर्याणुव्रती -स्थूल रूप से चोरी करने का सर्वथा त्यागी होता है,जैसे वह किसी की जेब से रूपये पैसे आदि निकाल कर चोरी नहीं करता है !
ब्रह्मचर्याणुव्रती-अपनी/अपने विवाहिता पत्नी /पति के अतिरिक्त किसी अन्य से स्त्री /पुरुष से वासना रूप परिणाम नहीं रखता उन्हें बहिन भाई,माता पिता समान समझता है !
परिग्रह परिमाण अणुव्रती -अपने परिग्रहों की सीमाये निर्धारित कर कभी उन सीमाओं का उल्लंघन नहीं करता है!जैसे वह नियम लेता है की एक खेत ,एक मकान ,एक कार ,लाख रूपये ,२ गाय, भैंस।१० जोड़ी कपड़े,साड़ी आदि से अधिक परिग्रह नहीं रखेगा तो वह जीवन पर्यन्त इस सीमा का उल्लंघन नहीं करता ,बल्कि शनै शनै उन्हें कम करने का प्रयास करता है !जो इन पाँचों अणुव्रतों का नियम पूर्वक पालन करता है तब वह अगारी व्रती है !जब कोई जीव ५ अणुव्रत,३ गुणव्रत और ४ शिक्षा व्रत धारण करता है तब उसे व्रती श्रावक कहते है!
श्रावक के अणुव्रतों के सहायक सात शीलव्रत –
दिग्देशानर्थदण्डविरतिसामयिकप्रोषधोपवासोपभोगपरिभोगपरिमाणातिथिसंविभागव्रतसम्पन्नश्च !!२१!!
सन्धिविच्छेद-दिग्+देश+अनर्थदण्ड+विरति+सामयिक+प्रोषधोपवास+उपभोगपरिभोग+परिमाण+अतिथि संविभाग+व्रत+सम्पन्न:+च
शब्दार्थ -दिग्व्रती,देशव्रती,अनर्थदण्डव्रती,सामयिक,प्रोषधोपवास,उपभोगपरिभोगपरिमाण,अतिथि संविभाग,व्रत,सम्पन्न:-सहित,च-सल्लेखना !
अर्थ-व्रती श्रावक,पांच अणु व्रतों की रक्षा के लिए सात शिक्षाव्रतों -तीन गुणव्रत; दिग़व्रत,देशव्रत,और अनर्थदण्डव्रत,तथा चार शिक्षा व्रतों;सामायिक,प्रोषधोपवास,उपभोगपरिभोग परिमाण और अतिथि संविभाग ,इस प्रकार कुल १२ व्रतों का धारी होता है!च-सूचित करता है की सल्लेखना द्वारा वह व्रती अपना शरीर त्यागने का नियम भी लेता है !
भावार्थ -श्रावक व्रती की संज्ञा पांच अणु व्रत,३ गुणव्रत और ४ शिक्षा व्रतों अर्थात १२ व्रतों के पालन करने पर ही प्राप्त करता है !
गुणव्रतों –
१-दिगव्रत-व्रती श्रावक,सूक्ष्म पापों से निवृत्ति के लिए दसों (पूर्व,दक्षिण,पश्चिम,उत्तर,तथा इन के मध्यस्थ एक-एक दिशा,ऊपर,नीचे) दिशाओं में अपने आवागमन की सीमा स्वयं निर्धारित करना दिग्व्रत है, वह जीवन पर्यन्त इस सीमा का उल्लंघन नहीं करता है! व्रती निर्धारित सीमा के बाहर व्यापारादि करने भी नहीं जाता ,जिससे वह निर्धारित सीमा के बाहर के क्षेत्र में, होने वाली हिंसा से सर्वथा बच !उद्धाहरण के लिए दिग्व्रती व्रत लेता है जैसे जीवन पर्यन्त भारत/उत्तर प्रदेश सहारनपुर/ से बहार नहीं जाऊँगा ,आकाश में ४०००० फट से ऊपर नहीं और ५००० फट से नीचे नहीं जाऊंगा
२-देशव्रत -दिग्व्रत में जीवन पर्यन्त के लिए निर्धारित करी गई,आवागमन की सीमा को देश व्रती कुछ समय;घंटे, दिन, सप्ताह,माह,अथवा वर्ष के लिए देश ,गली,मोहल्ले तक संकुचित कर लेता है !इसमें भी श्रावक ,इस नवीन निर्धारित क्षेत्र की सीमा से बाहर उपचार से महाव्रती हो जाता है !देश व्रत में ,दिग्व्रत में निर्धारित सीमा भारत से, संकुचित कर गली /मोहल्ले से बाहर दसलक्षण पर्व में नहीं जाऊँगा !इन व्रतों को धारण करने से , निर्धारित क्षेत्र के बाहर किसी भी प्रकार से,फोन//प्रेषक को भेजकर /इशारे से सम्पर्क नहीं कर सकते अन्यथा व्रत दूषित हो जाएगा !
३-अनर्थदण्ड व्रत -निष्प्रयोजन पापरूप क्रियाओं जैसे जमीन खोदना,फूल पत्ति तोडना,को त्यागना अनर्थदण्ड व्रत है !इसके ५ भेद है-
१-पापोपदेश अनतदण्ड व्रत -व्रती ,किसी को युद्ध के लिए प्रोत्साहित करने का त्यागी ,किसी को हिंसात्मक कार्य जैसे शास्त्र आदि बनाने की सलाह देने का त्यागी ,किसी को जीवहिंसा वाली क्रियाओं को बताने का त्यागी होता है
२-हिसादान अर्थदंड व्रती -किसे को भी तलवार शास्त्र आदि देने का त्यागी होता है !
३-अपध्यान अनर्थदण्ड व्रती -व्रती किसी के अहित का विचार ही नहीं करता !
४-दु :श्रुति अनर्थदण्ड व्रती -व्रती राग द्वेष ,वासना की अभिवृद्धि करने वाले शास्त्रों,साहित्य,सनीमा देखने ,गाने सुनने का सर्वथा त्यागी होता है !
५-प्रमादचर्य अनर्थदण्डव्रती -व्रती कभी भी निष्प्रयोजन कोई क्रिया नहीं करता जैसे निष्प्रयोजन चलना,फूल पत्ती तोडना,पंखे/कूलर चलते छोड़ देना आदि !
शिक्षा व्रत-जिन व्रतों के पालन से मूल धर्म की शिक्षा मिलती है ,उन्हे शिक्षा व्रत कहते है !उनके पालन से धर्म में आगे बढ़ने में प्रोत्साहन मिलता है !इनके चार भेद है-
१-सामायिक शिक्षा व्रत-समस्त पापो से विरत ,निर्विकल्प होकर किसी शांतएकांत स्थान पर मन वचन काय से एकाग्रचित होकर,तीनों सांध्य कालों में अथवा कम से कम सुबह और शाम २ घड़ी, तक स्व आत्म चिंतन करना, सामायिक शिक्षाव्रत है !इससे सामायिक काल के लिए, सांसारिक पाप रुपी कार्यों से निवृत्ति मिल जाती है,इस काल में व्रती उपचार से महाव्रती होता है !इससे संयम में वृद्धि होकर मोक्षमार्ग पर बढ़ते हुए मुनि बनने की प्रेरणा मिलती है!
शंका-क्या सामायिक में जाप कर सकते है ?
समाधान -सामायिक में णमो कार मंत्र की जाप नहीं कर सकते क्योकि इसमें अपनी आत्मा के स्वरुप का चिंतवन किया जाता है जैसे ,मैं कहाँ से आया हूँ ,कहाँ जाऊँगा क्या हूँ ,मेरे गुण आदि कौन से है ?
२-प्रोषधोपवास शिक्षा व्रत-प्रोषधोपवास=प्रोषध-पर्व+उपवास-जिसमे पांचों इन्द्रियाँ,अपने अपने विषयों को छोड़कर,उपवासी रहती है,उपवास है!स्थूल रूप से उपवास चारों प्रकार के आहार;-खाद्य,पेय, स्वाद्य, चटनी का त्याग है किन्तु वास्तव में सभी इन्द्रियों के विषय भोग आदि उपवास के अंतर्गत आते है!
इसलिए भोजन का, स्थूल रूप उपवास में,त्याग किया जाता है! इसमें सेंट,इत्र ,साबुन ,आदि शरीर के संस्कारों का त्याग किया जाता है अत: अष्टमी/चतुर्दशी के प्रोषधोपवास के लिए ,श्रावक को समस्त आरम्भ त्याग कर , सप्तमी/त्रियोदशी को एकसँ कर मंदिर जी /धर्मशाला में जाना चाहिए,अगले दिन अष्टमी चतुर्दशी को पूर्ण उपवास रखे,तीसरे दिन नवमी/अमावस्या/पूर्णिमा को एकसँ रख घर में आ जाए ,इन तीनो दिन मंदिर जी में रहकर धर्म ध्यान करता रहे !यह इस उपवास की उत्कृष्टता है !माध्यम से अष्टमी/चतुर्दशी को पूर्णव्रत तथा न्य से अष्टमी/चौदश को एकसँ किया जाता है किन्तु ये दोनों व्रत की कोटि में नहीं आते !
शंका-प्रोषधोपवास शिक्षा व्रती नौकरी,व्यापार आदि करने जा सकते है क्या ?
समाधान-इस व्रत में व्रती को निर्विकल्प होता है ,केवल धर्म ध्यान में लगता है ,इसलिए व्यापार/नौकरी पर नहीं जाना है !
शंका -प्रोषधोपवास शिक्षा व्रती क्या जल ग्रहण कर सकता है?
समाधान- उपवास चारो प्रकार के आहार का त्याग है! जल भी पेय है इसलिए जल ग्रहण करने पर आचार्यों ने इसे अनुपवास कहा है !अत:जल ग्रहण नहीं कर सकते ! –
३-उपभोगपरिभोगपरिमाण शिक्षाव्रत-अणु व्रत में जो परिग्रहों की सीमाये निर्धारित करी थी उन में से अना वश्यक वस्तुओं को इस व्रत में हटाते हैं !जैसे परिग्रह परिमाण व्रत में व्रती ने ३ टोपी की सीमा रखी थी तो इसमें वह १ ही टोपी पहनेगा,वहां ४-धोती/कुर्ते की सीमा निर्धारित करी थी तो इसमें २ धोती/कुर्ते ही धारण करेगा !वाहन के उपभोग(संख्या) की सीमा कम करेगा,तेल ,भोजन (जि तनी बार पहले लेता था उससे कम बार लेगा आदि के भोग की सीमा कम करेगा ! इस व्रत से परिग्रहों के कम होने से मुनि बनने की प्रेरणा मिलती है !
४-अतिथि संविभाग शिक्षा व्रत -अपने लिए बनाये गए भोजन में से ,किसी व्रती(मुनि,क्षुल्लक,क्षुल्लिका, ऐलक, आर्यिका माता जी अथवा अव्रती सम्यग्दृष्टि)अतिथि के स्वयं ,(बिना पूर्व में बताये हुए) आहार बेला (१०-१०,४५ प्रातSmile में आने पर आहार दान देना, अतिथि को आहार दान देकर स्वयं भोजन लेना ,अतिथिसंविभाग शिक्षाव्रत है ! यदि कोई चतुर्विध संघ से कोई सुपात्र आहार ग्रहण करने नहीं आते तो यह अतिथि संविभाग शिक्षा व्रती;अपने भोजन लेने से पूर्व भावना भायेगा कि ,मेरे भाग्य से कोई सुपात्र आहार ग्रहण करने नहीं आये किन्तु मेरी भावना है कि मनुष्य लोक के समस्त चतुर्विध संघ के सुपात्रों का आहार निरन्तराय हो !यह भावना भने से अतिथिसंविभाग शिक्षा व्रत श्रावक का हो जाता है !जहाँ चतुर्विध संघ के पात्रों का विहार नहीं है , श्रावक भी इस विधि से इस व्रत को कर सकते है !
मुनि महाराज/आर्यिका माता जी /ऐलक जी के लिए उनके निमित का आहार नही बनाया जाता अन्यथा आहार दूषित हो जाता है !इसी प्रकार क्षुल्लक अथवा ऐल्लक महाराज जी के निमित्त के धोती दुपटी नहीं दिए जाते ,पाहिले से रखे हुए दिए जाते !है
सूत्र में च- से सूचित होता है की इन बारह व्रतों के अतिरिक्त श्रावक सल्लेखना धर्म को भी मृत्यु से पूर्व धारण करेगा !
विशेष-
जिनका चित्त त्रस जीवों की हिंसा से निवृत्त है उन्हें मधु,मदिरा और मांस का सर्वथा त्याग कर देना चाहिए !केतकी अर्जुन के फूल,जमीकन्द,का त्याग कर देना चाहिए क्योकि ये बहुत जीव/जंतुओं की उत्पत्ति के आधार है ,इन्हे अन्तकाय कहते है ,इनके सेवन से लाभ कम और हिंसा अधिक है !
व्रती को सल्लेखना धारण का उपदेश –
मारणान्तिकींसल्लेखनाम् जोषिता !!२२!!
संधि विच्छेद-मारणान्तिकीं+सल्लेखनाम्+जोषिता
शब्दार्थ -मारणान्तिकीं-मरण काल उपस्थित होने पर,सल्लेखनाम् -सल्लेखना धारण करनी चाहिए,जोषिता-प्रीति/उत्साहपूर्वक
अर्थ -गृहस्थ श्रावक को मरण काल आने पर प्रीतिपूर्वक सल्लेखना धारण करनी चाहिए !
इस लोक और परलोक संबंधी किसी वांछा की अपेक्षा रहित ,बाह्य शरीर एवं कषायों को कृश/लेखना करना सल्लेखना है !
भावार्थ-व्रती मरण के समय भाव रखता है कि अब मेरा जीवनभर किये गए धार्मिक कार्यों की परीक्षा का समय आया है अत: विधिवत सल्लेखना धारण करूगा! सम्यक रीति से काय और कषायों को क्षीण करना सल्लेखना है !
विशेष -मृत्यु का काल आने पर गृहस्थों को सबसे से मोह त्यागना चाहिए,धीरे धीरे भोजन का त्याग,फिर पेय का त्याग कर शरीर को कृश करते हुए कषायों को कृश करना चाहिए !
सल्लेखना लेने की विधि –
गृहस्थ/श्रावक अपने शरीर में शिथिलता का आभास होने पर.की उसकी अब अधिक आयु शेष नहीं है, वह अपनी समस्त सम्पति,धन/दौलत का त्याग कर सबसे क्षमा याचना कर,निर्विकल्प होकर,पुरुष किसी अनुभवी आचार्य श्री और महिला अनुभवी आर्यिका माता जी के समक्ष जाकर निवेदन करते है कि प्रभु,मेरा शरीर शिथिलता की ओर अग्रसर हो रहा है,अत मैं सल्लेखना पूर्वक अपने शरीर को त्यागना चाहता/ चाहती हूँ ,मेरा/मेरी सलीखना पूर्वक शरीर त्याग करवा दीजिये ‘आचार्यश्री /आर्यिका माता जी शनै शनै आपका आहार ,जल का त्याग करवाते हुए उपवास करवाएंगे,उपवास करते हुए आप अपने शरीर को सहर्ष त्याग करेंगे
! यदि श्रावक युवावस्था में क्षुल्ल्क ,क्षुल्लिका ,ऐलक ,मुनि/आर्यिका पद धारण कर ले तो सल्लेखना के लिए बहेतर है !
शंका – इस प्रकार जानबूझकर मरणा क्या आत्म हत्या नहीं है?
समाधान- आत्महत्या,कोई स्त्री पुरुष,परस्पर में द्वेष वश,विषपान अथवा फांसी इत्यादि लगाकर करते है !सल्लेखना में ऐसा नहीं है
,जैसे किसी व्यापारी की दूकान/घर में आग लग जाने पर वह सर्प्रथम दूकान/घर को आग से बचने का प्रयत्न करता है ,यदि उसे नहीं बचा पाता तो वहां पर रखे धन को बचाने का प्रयास कर बचाता है,इसी प्रकार गृहस्थ शरीर के द्वारा धर्म को साधता है ,उसके वह नष्ट नहीं होने देना चाहता !इसलिए सर्वप्रथम शरीर को रोगग्रस्त से क्षीण होने से औषधियों द्वारा उपचार कर उसे बचने का भरसक प्रयत्न करता है ,किन्तु यदि उसे मृत्यु से बचाने का कोई उपाय नहीं मिलने पर,ध्रीर को नहीं बचाकर,उसके द्वारा अर्जित धर्म की रक्षा हेतु, शरीर को स्वेच्छा से, सहर्ष त्यागता है,इसलिए सल्लेखना, आत्म हत्या से सर्वथा भिन्न है ! पहली में कषाय का संयोग नहीं है जबकि दूसरी में कषायों की ही प्रधनता है !
शंका -किसी व्यक्ति के कोमा में आने पर कपड़े उतार देने से क्या उसकी सलेखना हो जाएगी ?
समाधान-
इस अवस्था में जीव को स्व विवेक नहीं है इसलिए सल्लेखना नहीं होगी !
श्रावक/व्रतियों द्वारा धारण किये ५ अणुव्रतो,३ गुणव्रतों और ४ शिक्षा व्रतों के निरतिचार पालन करने से उनका दोष रहित पालन होगा!इस के लिए,१२ व्रतों के अतिचार बताने से पूर्व,आचर्यश्री ने समयग्दर्शन के ५ अतिचारों का उल्लेख निम्न सूत्र में किया है,जिनके अभाव में उनका निरतिचार पूर्वक धारण करना असम्भव है !
सम्यग्दर्शन के अतिचार-
शंकाकांक्षा विचिकित्सान्यदृष्टि प्रशंसासंस्तवा:सम्यग्दृष्टेरतिचारा: !!२३!!
संधि विच्छेद -शंका+कांक्षा+विचिकित्सा+अन्यदृष्टि (प्रशंसा+संस्तवाSmile+सम्यग्दृष्टे अतिचारा:
शब्दार्थ:-शंका,कांक्षा,विचिकित्सा,अन्यदृष्टि प्रशंसा,अन्यदृष्टि संस्तवन, सम्यग्दृष्टे-सम्यग्दर्शन के , अतिचारा:-अतिचार हैं
अर्थ-शंका,कांक्षा,विचिकित्सा,अन्यदृष्टि प्रशंसा,अन्यदृष्टि संस्तवन (वचन से ),सम्यग्दर्शन के ५ अतिचारा हैं !
भावार्थ-उक्त सूत्र में सम्यग्दर्शन को दूषित करने वाले पांच अतिचार बताये है
१-शंकातिचार-जिनेन्द्र भगवान द्वारा प्रतिपादित वचनों ;तत्वों ,नव पदार्थों,भेद विज्ञान इत्यादि के स्वरुप में कदाचित शंका करना,जैसे शास्त्रों में ऐसा लिखा तो है किन्तु जमता नहीं है अथवा अपनी आत्मा को अखंड,अ- विनाशी जानते हुए भी मृत्यु से भयभीत होना,इस प्रकार के परिणाम होना से,सम्यग्दर्शन में शंकातिचार है!
२-कांक्षातिचार-सांसारिक अथवा परलोक के विषयों की वांच्छा होना,जैसे; इन को हम त्यागते है किन्तु होते तो अच्छे ही है,इस प्रकार के परिणाम होने से सम्यग्दर्शन में कांक्षातिचार होता है !
३-विचिकित्सातिचार-विचिकित्सा अर्थ है घृणा रूप भाव होना-दुखी,दरिद्र,रोगी जीवों को देखकर अथवा जैन मुनिराज की वैय्याव्रती करते हुए उनके मुख से दुर्गन्ध आने पर अथवा उनके मलीन शरीर को देखकर ,घृणा का भाव उत्पन्न होना,सम्यग्दर्शन में विचिकित्सातिचार है !
४-अन्यदृष्टिप्रशंसातिचार-अन्य मतियों के धर्मावलम्बियों की हृदय से प्रशंसा करना जैसे;”कुछ भी कहिये ये लोग बड़े अच्छे होते है क्योकि अपने धर्म के बड़े पक्के होते है,हम लोग तो कच्चे होते है”!इस प्रकार के परिणाम होना सम्यग्दर्शन में अन्यदृष्टिप्रशंसातिचार है क्योकि अन्य मतियों के धर्म की मन से अनोमोदना है!
५-अन्यदृष्टिसंस्तवनातिचार-अन्य मतावलम्बियों के धर्म का,वचन से गुणगान करना वचन से अनुमोदना है!जैसे टी.वी पर बैठे बैठे अन्य मतियों के संत के आत्मा पर प्रवचन बड़े मनोयोग से सुनकर, अंत में कहना कि यह भी तो आत्मा पर अच्छे प्रवचन देते है,यह सम्यग्दर्शन में, मन वचन काय से अनुमोदना के कारण, अन्य दृष्टिप्रशंसा और अन्यदृष्टिसंस्तवनातिचार का एक साथ दृष्टांत है!
विशेष-
१-व्रतों में चार प्रकार के दोष लगते है !
१-अतिक्रमदोष-व्रतों के प्रति रूचि गिरना,मन की पवित्रता का गिरना,व्रतों के प्रति आदर भाव नहीं रहना, व्रतों में अतिक्रम दोष है !
२-व्यतिक्रमदोष-व्रतों में निर्धारित सीमाओं का उल्लंघन कर लेना,यद्यपि त्यागी वस्तु का अभी सेवन नहीं किया,व्रतों में व्यतिक्रम दोष है!
३-अतिचार दोष-यदा कदा त्यागी वस्तु का सेवन करने के बाद,पश्चाताप होना व्रतों में अतिचारदोष है
४-अनाचार दोष-व्रती को धारण किये हुए व्रतों की कोई चिंता ही नहीं,उनको छोड़ देना व्रतों में अनाचारदोष है !
उद्धारहण के लिए-एक बैल अपनी दोनों ओर गेहूं के लहलहाते हुए खेतों के बीच पगडंडी पर चल रहा है!बैल को हांकते हुए किसान से,गेहूं की फसल पर मुह नहीं मारने का वायदा,बैल कर लेता है!अब पग डंडी पर चलते चलते बैल विचार करता है कि एक मुह यदि फसल पर मार दूँ तो अच्छा है किन्तु किसान ने उसे कसकर पकड़ रखा है,यहाँ बैल के मन की पवित्रता में दोष आने से यह अतिक्रम दोष है!बैल ने पगडंडी पर चलते चलते इधर उधर मुह बढ़ाया किन्तु किसान ने रस्सी खीच ली,बैलों का सीमा का उल्लंघन करना व्यतिक्रम दोष है!फिर चलते चलते उसने झपट्टा मारकर गेहूं की बालिया खाली,जिसके फलस्वरूप किसान ने उसके दो डंडे मारे,जिससे बैल के विचार आया कि मैं ऐसा नहीं करूँगा,यह अतिचार दोष है!इसमें उसे अपनी मर्यादा,जिसका उल्लंघन उसे नहीं करना है का,पुन: ज्ञान हो गया!फिर उसे गुस्सा आता है,वह दौड़कर खेत में अपने वायदे को भूलकर घुस जाता है और बहुत सारे गेहूं खाता है,किसान ने उसे डंडे भी मारे किन्तु वह नहीं माना यह अनाचार दोष है!
इस दृष्टांत को गणितज्ञ भाषा में इस प्रकार समझा जा सकता है -अतिक्रम पर २५%,व्यतिक्रम पर २५%, अतिचार पर २५%,और अनाचार पर १००% अंक कट जाते है तथा १००% की पेनल्टी भी लग जाती है !
शंका अन्य मतियों के शास्त्रों का स्वाध्याय करना चाहिए या नहीं ?
समाधान-सर्व प्रथम अपने जैन धर्म के शास्त्रों का स्वाध्याय कर ,उनमे दृढ श्रद्धान होने के पश्चात अन्य मतियों के शास्त्रों के गुण/दोष देखने के उद्देश्य से,उनके स्वाध्याय में कोई आपत्ति नहीं है,क्योकि यदि अपने धर्म के प्रति अपरिपक्व श्रद्धान,अल्प ज्ञेय अवस्था में है तब अन्य मतियों के शास्त्रों का स्वाध्याय करने से आपका श्रद्धान डगमगा सकता है!
शंका -क्या किसी भी शास्त्र जी का स्वाध्याय किया जा सकता है ?
समाधान ,नहीं,अपने जैन धर्म के भी,सत्यमहाव्रतधारी पूर्वाचार्यों द्वारा लिपिबद्ध सच्चे शास्त्रों का ही स्वाध्याय करना चाहिए क्योकि वर्तमान में अनेक शास्त्रों में मिलावट देखने में आती है अन्यथा तत्वार्थ का सच्चा ज्ञान नहीं हो पायेगा! वर्तमान के कुछ टीकाकारों ने,अपने मत की पुष्टि हेतु पूर्वाचार्य द्वारा लिपिबद्ध करी गई गाथाओं का अर्थ सही किया है किन्तु भावार्थ सर्वथा बदल कर अनर्थ कर दिया है!जैसे;एक तत्वार्थ सूत्र की टीका में दसवे अध्याय के सूत्र ८,”-धर्मास्तिकायभावात्” का भावार्थ है की धर्म द्रव्य के अभाव में आत्मा लोक के अंत से आगे नहीं जा सकती,किन्तु टीका कार ने इसका भावार्थ बदल कर कहा कि,आत्मा में सीमित शक्ति के कारण वह लोकांत से ऊपर, आगे नहीं जा सकती,जबकि आत्मा में तो अनंत शक्ति है!वे टीकाकार क्योकि निमित्त को नहीं मानते इसलिए,मात्र अपने मत की पुष्टि के लिए,उन्होंने उक्त सूत्र का भावार्थ स्वेच्छा से बदल दिया है,जो की मिथ्यात्व का पोशक है क्योकि आगम विरोध वचन है !
शंका-महिलाओं को ,अन्यमतियों में सुसराल होने पर उनके मंदिरों में जाना चाहिए या नहीं ?
समाधान-वास्तव में तो विवाह स्व धर्मावलम्बी परिवार में ही होना चाहिए जिससे अपने धर्म का पालन पुत्री विधिवत कर सके!वर्तमान में विवाह युवक एवं युवतियों की परिपक्व आयु में होता है उन्हें अपने ससुरालियों को धर्म के संबंध में अपने मत को पाणिग्रहण संस्कार से पूर्व स्पष्ट बता देना चाहिए कि उन्हें अपने धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता मिलेगी तथा देवी/देवताओं की पूजा नहीं करूंगी !यदि उन्हें विवाह शर्तो यह मंजूर है तब ही वे विवाह करें अन्यथा नहीं !आचर्य सामंत भद्र स्पष्ट कहते है कि सम्यग्दृष्टि जीव किसी स्नेह,भय, आशा अथवा लोभ वश कु देव कु शास्त्र कु गुरु की पूजा नहीं करता ,उसके पास अन्य मतावलम्बियों के मंदिरों आदि को देखने के लिए समय ही नहीं होता , सिर्फ अपने सच्चे देव शास्त्र गुरु को ही पूजता है !
जिनकी शादी हो चुकी है,वे अपने ससुरालियों को सच्चे मुनि/साधु के पास लेजाकर उनके धर्म सम्बन्धी मत को ठीक करवाने का प्रयास करे !यदि नहीं ठीक करवा सके तो उन्हें अपने मत के चलने दे और स्वयं अपने मतानुसार चले !
व्रत और शीलों के अतिचार-
व्रतशीलेषु पञ्चपञ्च यथाक्रमम् !!२४!!
संधि-विच्छेद-व्रत-शीलेषु+पांच पांच +यथा+ क्रमम्
अर्थ-पांच अणुव्रतों और सात शील व्रतों के पांच पांच अतिचार है जिनको कर्म से कहता हूँ
अहिंसाणु व्रत के पांच अतिचार-
बन्ध वधच्छेदातिभाररोपणान्ना-पाननिरोधा:-!!२५!!
संधि विच्छेद-बन्ध+ वध+छेद+अतिभाररोपण+अनपाननिरोधा:!
शब्दार्थ:-बन्ध-बांधना,वध-मारना,छेद-छेदना,अतिभाररोपण-अधिक वजन लादना,अनपाननिरोधा:-समय पर भोजन जल नहीं देना !-
अर्थ -अहिंसा अणु व्रत के पांच अतिचार निम्न है –
१-बंध-प्राणी को सांकल अथवा पिंजरे में/ रस्सी से कसकर बाँधना !
२-वध-प्राणियों को कोड़े अथवा डंडे से मारना
३-छेदन- प्राणियों के नाक कान आदि अंगो का छेदन करना !
४-अतिभार्रोपण-प्राणियों से सामर्थ्य से अधिक कार्य करवाना/पशुओं पर अधिक भार लादना !
५ -अन्नपान निरोध-प्राणियों को समय पर जल /पानी नहीं देना या उन्हें लेने देना
अपने अहिंसाणुव्रत के अतिचार रहित पालन के लिए उपयुक्त नही करने चाहिए अपने अहिंसाणुव्रत के अतिचार रहित पालन के लिए उपयुक्त नही करने चाहिए
विशेष-सम्यग्दृष्टि जीव के प्रशम-मंद कषाय,संवेग-संसार के स्वरुप से भय,अनुकम्पा-अन्य प्राणियों के कष्टों को स्वयं अनुभव करते हुए उनका निवारण करने का उपाय करना और आस्तिकाय।चार प्रमुख गुण स्वभावत: होते है.उसकी लेश्या पीत ,शुक्ल और पदम होती है, अत;उसके परिणाम सरल होते है!फिर भी कदाचित इनके अभाव में उनके अणुव्रत में उक्त अतिचार लगते है !
श्रावकाचारों में स्पष्ट निर्देश है कि, पशुओं के पालन हेतु, उन्हें रस्सी न बाधके बड़े baadey में खुला रखना चाहिए !यदि बांधना ही आवश्यक हो तो उन्हें ढीली रस्सी से बंधे जिससे वे स्वतंत्रता पूर्वक घूम सके !
सत्याणुव्रत के अतिचार-
मिथ्योपदेशरहोभ्याख्यानकूटलेखनक्रियान्यासापहारसाकारमंत्रभेदा:!!२६!!
संधि विच्छेद -मिथ्योपदेश+रहोभ्याख्यान+कूटलेखनक्रिया+न्यासापहार+साकारमंत्र+भेदा:
शब्दार्थ-मिथ्योपदेश,रहोभ्याख्यान,कूटलेखनक्रिया,न्यासापहार ,साकारमंत्र,भेदा:-ये सत्यणुव्रत के अतिचार है !!
अर्थ-सत्याणुव्रत के मिथ्योपदेश,रहोभ्याख्यान-कूटलेखनक्रिया-न्यासापहार,साकारमंत्र पांच अतिचार है !
भावार्थ-
१-मिथ्योपदेश-आगम के विरुद्ध झूठे ,अकल्याणकारी उपदेश देना !
२-रहोभ्याख्यान-स्त्री पुरुषों की गुप्त बातों को जानकर सार्वजानिक प्रकाशित करना !
३-कूटलेखन क्रिया – झूठे दस्तवेज़ तैयार कर दूसरों को फ़साना अथवा उनसे मुकदा जीतना !
४-न्यासापहार- किसी की धरोहर को हड़पना जैसे कोई आपके पास सोने की ६ चूड़ी रखवा कर गया और लौटने पर उसे याद नहीं रहा ,उसने आपसे चार चूड़ी ही मांगी ,आपने उसे चार वापिस कर दी और २ हड़प ली !
५-साकारमंत्रभेद -किसी बात उसके इशारों आदि से जानकर सार्वजानिक कर देना
सत्याणुव्रती को उक्त अतिचारों से अपने व्रतों की रक्षा करनी चाहिए !
विशेष-
शंका-वकीलों को तो अपने प्रोफेशन में झूठ बोलना आवश्यक है वे तो सत्यणुव्रती नहीं हो सकते !
समाधान -ऐसा नहीं है की सभी केस में झूठ ही बोलना आवश्यक हो ,बैंक के केस अधिकांशत: सीधे सच्चे होते है ,फिर केस में हीन अधिक झूठ सच्च का परीक्षण कर चयनित किया जा सकता है !गांधी जी सच्चे केस लेते थे !श्री रमेश चाँद जैन जी ,सहारनपुर ,आज भी सच्चे सीधे केस लेते ,बड़े प्रतिष्ठित वकीलों में से है!न्यायधीशों के द्वारा भी सम्मानित प्रतिष्ठा रखते है !प्रैक्टिस भी उनकी टक्क्र में अन्य वकील शहर में नही है !
अचौर्याणुव्रत के पांच अतिचार –
स्तेनप्रयोग तदाहृतादानविरुद्धराज्यतिक्रमहीनाधिकमानोन्मान प्रतिरूपकव्यवहारा:!!२७!!
संधि विच्छेद-
स्तेनप्रयोग+ तदाहृतादान+विरुद्धराज्यतिक्रम+हीन+अधिक+मान+उन्मान+प्रतिरूपक+ व्यवहारा:
शब्दार्थ-स्तेन+प्रयोग-चोरी के लिए किसी को स्वयं अथवा किसी के द्वारा प्रेरित करना अथवा चोरी करते हुए की अनुमोदना कर प्रोत्साहित करना,तदाहृतादान-किसी चोर को ,चोरी के लिए प्रेरित किया या करवाया या अनुमोदना करी। ऐसे चोर से माल खरीदना अनाचार है,किन्तु किसी अन्य चोर से चोरी का माल खरीदना अतिचार है! विरुद्धराज्यतिक्रम-राजा के द्वारा स्थापित नियमों के विरुद्ध टैक्सो की चोरी करना या एक राज्य से दुसरे राज्य को चोरी से,अधिक लाभार्जन के उद्देश्य से हस्तांतरित करना , हीन-कम ,अधिक-अधिक, मान-बाँट, उन्मान-तराजू अधिक लाभार्जन के उद्देश्य से भिजन भिन्न बाँट और तराजू रखना, प्रतिरूपक-शुद्ध माल में मिलावट, व्यवहारा:-करना!!
अर्थ:- स्तेनप्रयोग,तदाहृतादान ,विरुद्धराज्यतिक्रम, हीनाधिकमानोन्मान,प्रतिरूपकव्यवहारा,पांच अचौर्याणुव्रत के अतिचार है !
१-स्तेनप्रयोग-किसी को चोरी करने के लिए स्वयं या /किसी अन्य के द्वारा प्रेरित करना / चोरी करते हुए को अनुमोदना कर प्रोत्साहित करना,अचौर्याणुव्रत का स्तेनप्रयोग अतिचार है
२-तदाहृतादान-ऐसे चोर से चोरी का माल खरीदना जिसकी चोरी के लिए चोर को स्वयं अथवा किसी अन्य से प्रेरित नहीं करवाया हो/प्रोत्साहित न किया हो,अचौर्याणुव्रतों में तदाहृतादान अतिचार है!किन्तु यदि उसी चोर से माल खरीदे जिसे चोरी के लिए स्वयं/अन्यसेप्रेरित क्या हो /अनुमोदना करी हो तो व्रत में अनाचार होता है !
३-विरुद्धराज्यतिक्रम-शासक के द्वारा स्थापित किये राज्य के नियमों के विरुद्ध; बिक्री कर,आयकर,उत्पाद कर ,गृह कर इत्यादि की चोरी करना,अथवा किसी दुसरे राज्य में अधिक लाभ के उद्देश्य से बिक्री आदि करों की चोरी कर हस्तांतरित करना,बिजली आदि की चोरी करना,अचौर्याणुव्रतों में विरुद्धराजयतिक्रम अतिचार है !
४-हीनाधिकमानोन्मान-क्रय और विक्रय के वस्तु को तौलने के लिए भिन्न भिन्न बाँट और तराजू/मीटर , हीना धिक तौल/नापने के लिए रख,अधिक लाभ अर्जित करना,अचौर्याणुव्रत में हीनाधिकमानोन्मान अतिचार है !
५-प्रतिरूपकव्यवहारा:-प्रतिरूपक गलत/स्थापित मानों के विपरीत /बेईमानी का ,व्यवहारा:-व्यापर /उत्पाद में व्यवहार करना !,अधिक लाभार्जन के उदेश्य से महगी वस्तु में सस्ती वस्तु मिला कर बेचनाजैसे शुद्ध घी में डालडा घी मिलाना,सोने में अधिक खोट मिलाकर,जेवर बना कर,बेईमानी से अधिक लाभ अर्जित करना , अचौर्याणुव्रतों में प्रतिरूपकव्यव हारा अतिचार है !
विशेष-
१- अतिचार और अनाचार में अंतर है कि व्रतों में अतिचार दोष लगने पर प्रायश्चित संभव है,किन्तु वही अतिचार दुबारा दौहराने से प्रायश्चित कार्यकारी नहीं होता है,वही अतिचार,अनाचार में बदल जाता है अर्थात अणुव्रत सर्वथा भांग हो जाता है !
२-व्यापारियों की अधिकतर दलील रहती है कि व्यापारिक प्रतिस्पर्धा के कारण बिक्री कर/आयकर/उत्पाद कर /बिजली आदि सरकारी राजस्वों की चोरी करना उनकी मजबूरी है,उसके बिना जीविका अर्जित ही करना असंभव है !यह दलील बिलकुल अव्यवहारिक है क्योकि कोई शासन/सरकार आपको निर्देशित नहीं करती कि आप अपना माल बिना कर वसूले बेचे,अब यदि व्यापरी प्रतिस्पर्धा में ‘विक्रयकर’,क्रय व्यापारी से नहीं वसूलते तो सरकार की कहाँ गलत है !
दूसरी बात बहुत से व्यापारी अधिक लाभ के लोभवश,बिक्री कर वसूलते भी है तो राजस्व विभाग में जमा नहीं करते !सारांशत करों की चोरी का मूल कारण लोभ कषाय है !बहुत से व्यापार ऐसे है जिन के ऊपर कोई बिक्री करनहीं है जैसे कपड़े का व्यापार ,किन्तु उनके व्यापारी भी अपनी बिक्री सही नहीं दिखाते क्योकि आयकर का भी भुगतान करना होता है!आयकर वर्तमान में पूर्वकी अपेक्षा काफी % कम रह गया है ,इसलिए आयकर अवश्य देना चाहिये,यह हमारेऔर हमारे देश के विकास में काम आता है,सिर्फ सोच का अंतर है!इसका भुग तान करने से, हमे आध्यात्मिक लाभ भी मिलेगा और शारीरिक शांति क रूप में मिलता है,हम अचौर्याणुव्रत का भली प्रकार पालन कर पाते है!हमे व्यापार में लाभ,लाभांतराय कर्म के क्षयोपशम से होता है,न की चोरी या हेरा फेरी करने से ,किन्तु जब हम चोरी/बेईमानी(मिलावट)करते है तो पाप कर्म का अनुभाग बढ़ता है,पुण्य का घटता है ,इसलिए लाभांतराय का क्षयोपशम हो नहीं होता, जो की हमारे पुन: लाभ को कम करने में सहकारी होता है !सभी जीवों को अपने कर्मों का हिसाब किताब तो अंतत देना ही पड़ता है इसलिए ईमानदारी से ही व्यापार/नौकरी करनी चाहिए!जिससे नींद भी बढ़िया आएगी,बीमारी नहीं लगेगी,इस तरह बीमारी पर हनी वाला खर्च बचा कर,लाभ ही होगा !जब आप अपने शुद्ध लाभ की गणना की तुलना ईमानदारी से अर्जित लाभ और बेईमानी से अर्जित लाभ से करेंगे तो आपका शुद्ध लाभ ईमानदारी से करे गए व्यापार में अधिक आएगा !
ब्रह्मचर्याणुव्रत के ५ अतिचार-
परविवाहकरणेत्वरिकापरिगृहीतापरिगृहीतागमनानंगक्रीड़ाकामतीव्राभिनिवेशा:!!२८!!
संधि विच्छेद-परविवाह करण+इत्वरिका परिगृहीतागमन +इत्वरिकाअपरिगृहीतागमन+अनंगक्रीड़ा+काम तीव्राभिनिवेशा:!!
शब्दार्थ-परविवाहकरण-अपने /अपने आश्रितों के अतिरिक्त लोगो का विवाह करवाना,इत्वरिका-बदनाम परिगृहीता-विवाहिता के,गमन-आना जाना,इत्वरिका अपरिगृहीतागमन-बदनाम अविवाहित के आना जाना, अनंगक्रीड़ा काम-काम सेवन के अतिरिक्त अन्य अंगों से वासना पूर्ती करना,कामतीव्राभिनिवेशा:-काम वासना की तीव्र अभिलाषा होना !!
अर्थ- परविवाहकरण ,इत्वरिका परिगृहीता गमन,इत्वरिका अपरिगृहीतागमन अनंगक्रीड़ा, कामतीव्राभिनिवेश ब्रह्मचर्याणुव्रत के ५ अतिचार है!
भावार्थ
१-परविवाहकरण-अपने एएवं अपने आश्रितों के अतिरिक्त अन्यों का विवाह करवाना जैसे बहुत से लोगो का शौक रिश्ते करवाने का होता है,परविवाहकरण ब्रह्म्चर्याणुव्रत का अतिचार है क्योकि अनावश्यक रूप से अब्रह्म पाप में निमित्त हो रहे है !पंडित लोगों को रात्रि में विवाह नहीं करवाने चाहिए अन्यथा उनके दिन में विवाह करवाने में आपत्ति नही है,क्योकि विवाह संस्कार भी आगम में उल्लेखित है !
२-इत्वरिका परिगृहीता गमन-किसी बदचलन स्त्री/पुरष के घर आना जाना,इत्वरिकापरिगृहीता गमन, ब्रह्म्च र्याणुव्रत में अतिचार है !
३-इत्वरिका अपरिगृहीतागमन-बदनाम अविवाहिता स्त्री /पुरुषों के घर आना जाना,(इसमें अविवाहित युवा युवक/युवतियां भी सम्मलित है),इत्वरिका अपरिगृहीता गमन,ब्रह्म्चर्याणुव्रत में अतिचार है !
४-अनंगक्रीड़ा-काम सेवन के अंगों के अतिरिक्त अन्य अंगो से काम क्रीड़ा में लिप्त रहना,ब्रह्मचर्याणुव्रत में अनंगक्रीड़ा, अतिचार है
५-कामतीव्राभिनिवेश-काम वासना की तीव्र अभिलाषा होना ,ब्रह्मचर्याणुव्रतों में कामतीव्राभिनिवेश अतिचार है ! ५०-५५ वर्ष की बाद ब्रह्मचर्याणुव्रतों ले लेना चाहिए ,अष्टमी चतुर्दशी,अष्टाह्निका पर्व,दस लक्षण पर्व में,तीर्थ यात्रा के दौरान संयमित होकर व्रत का पालन करना चाहिए !
परिग्रह परिमाणुव्रत के अतिचार
क्षेत्रवास्तुहिरण्यसुवर्णधनधान्यदासीदासकुप्यप्रमाणातिक्रमा:!!२९!!
संधि विच्छेद-क्षेत्र+वास्तु +हिरण्य+सुवर्ण +धन+धान्य +दासी+दास +कुप्य+ प्रमाण+अतिक्रमा:!!
शब्दार्थ-क्षेत्र-खेत,वास्तु-मकान,हिरण्य-चांदी,सुवर्ण-सोने के सिक्के/मुद्रा आदि,धन-पशु धन ,धान्य-अनाज, दासी-सेविका,दास-सेवक,कुप्य-कपड़े और बर्तन, प्रमाण -संख्या ,क्षेत्रफल अथवा तौल का अतिक्रमा:-उल्लंघन करना ,!!
अर्थ-खेत-मकान,चांदी और स्वर्ण के सिक्कों,पशुधन-अनाज ,सेवेकिा -सेवक,वस्त्र एवं बर्तनों के,अणुव्रत धारण करते समय निर्धारित करे प्रमाण की सीमा का उल्लंघन करना ,परिग्रह परिमाणुव्रत के पांच अतिचार है !
भावार्थ-
१-क्षेत्र -वास्तु प्रमाणातिक्रम अतिचार-जैसे मान लीजिये अणुव्रत लेते समय १ खेत और १ मकान रखने की व्रती सीमा निर्धारित करता है !कुछ समय पश्चात वह अपने और पड़ौसी के बीच दीवार को तोड़ कर १ ही खेत और मकान कर लेता है तो,यदयपि उसने गिनती का उल्लंघन नहीं किया,किन्तु यह उसके अणुव्रत में अतिचार हो गा क्योकि उसने क्षेत्रफल की निर्धारित सीमा का उल्लंघन करा है तथा उसे संख्या १ का आभास है !यदि संख्या का भी आभास नहीं रहे तो अनाचार होजाता है एयर व्रत ही भंग हो जाएगा !
२-हिरण्य सुवर्ण प्रमाणातिक्रम अतिचार- व्रत धारण करते समय व्रती १० लाख रूपये की मुद्रा का निर्धारित करता है तो उसे जीवन पर्यन्त इतने ही रूपये रखने होंगे ,मुद्रास्फीर्ति के कारण इस सीमा का उल्लंघन करने की सोचने मात्र से व्रत का अतिचार होगा यदि उसने इस सीमा को ५० लाख कर दिया तो अनाचार होगा !सहारनपुर के पंडित रत्न चाँद जी मुख्त्यार ने जो प्रमाण निर्धारित किया था उसको महंगाई के अनुपात में कम करते गए,यहाँ तक की आखिर में उन्हें किसी ने बुलाना होता था, तो वही रिक्शा में उन्हें अपने साथ ले जाता था ! इस व्रती को मुद्रा स्फीर्ति के साथ साथ अपनी इच्छाओं का दमन करना है !
३-धन-धान्य प्रमाणाति क्रम अतिचार-व्रती ने २ गाय और २ भैंस रखने का नियम लिया तो उसको ४ भैस अतः ४ गाय में परिवर्तित नहीं कर सकते अन्यथा व्रत का अतिचार होगा!अनाज का भी जितना नियम में निर्धारित किया उतना ही रखना आवश्यक है !
४-दासी-दास प्रमाणाति क्रम अतिचार-व्रती द्वारा व्रत के समय निर्धारित दासी-दास की संख्या का उल्लंघन करने के सोचने मात्र से व्रत में अतिचार हो जाएगा और यदि उल्लंघन कर दिया तो अनाचार होगा !
५-कुप्य-प्रमाणाति क्रम अतिचार-अनु व्रत धारण करते समय जितने कपड़े एवं बर्तनों के रखने का नियम लिया उसे जीवन पर्यन्त निभाना होता है!परिस्थितियों के अनुसार नियम नही बदलते,व्रती को परिस्थितियों के अनुसार अपने को बदलना होता है !!
विशेष-श्रावकाचारों में उल्लेखित है की यदि एक गाय गर्भवती हो जाती है तो जिस व्रती ने २ गाय रखने का नियम लिया है उसे १ को बेच देना चाहिए !इसी प्रकार दो कार रखने वाले व्रती को ,यदि कार बदलने की इच्छा है तो नयी कार का एडवांस देने से पूर्व एक कार को बेच देना चाहिए !ये परिग्रह परिमाण व्रत में ५० साड़ी रखने का नियम लिया है तो ५-१० साड़ी कम ही रखनी चाहिए।क्योकि यदाकदा भेंट मे भी मिलती रहती है,उनका समायोजन अपनी निर्धारित संख्या में कैसे हो पायेगा !यह ध्यान में रखने से इस व्रत का निर्दोष पालन हो सकेगा !
दिग्व्रत के अतिचार-
ऊर्ध्वाधस्तिर्यग्व्यतिक्रम -क्षेत्र वृद्धि-स्मृत्यन्तरा धनानि !!३०!!
सन्धिविच्छेद -ऊर्ध्व+अधो:+तिर्यग्+व्यतिक्रम+क्षेत्र +वृद्धि+स्मृत्यन्तराधनानि
शब्दार्थ- (ऊर्ध्व+अधो+तिर्यग्) व्यतिक्रम-ऊपर,नीचे और तिर्यग् दिशा का उल्लंघन करना,क्षेत्र वृद्धि-मर्यादित क्षेत्रो को बढ़ा लेना ,स्मृत्यन्तराधनानि-मर्यादा को भूल जाना !
अर्थ-ऊर्ध्व,अधो ,तिर्यग् दिशाओं में नियम लेते समय की सीमा का,व्यतिक्रम+उल्लंघन करना ,क्षेत्र की सीमा को बढ़ा लेना और मर्यादित सीमा को ही भूल जाना ,दिग्व्रत के अतिचार है !
भावार्थ-
उर्ध्व व्यतिक्रम -जीवन पर्यन्त लिए गए दिग्व्रत में ऊपर की दिशा अर्थात पर्वत ,हवाई जहाज से आकाश में उड़ी गई ऊंचाई आदि की सीमा का उल्लंघन करना उर्ध्व व्यतिक्रम है !मानलीजिए ऊपर २५००० फ़ीट का नियम लया है किन्तु हवाई जहाज से ३०००० फुट अकस्मात् जाना पड़ जाए तो यह उर्ध्व व्यतिक्रम अतिचार होगा !
अधो व्यतिक्रम-व्रती ने नियम लेते समय नीचे की दिशा में गमन का ५००फुट का नियम लियाहै किन्तु कही उसे अज्ञानता वश ,इस सीमा से नीचे जाना पड़ जाए तो अधो व्यतिक्रम होता है ,ऐसा होने पर प्रायश्चित लेना पड़ता है !
तिर्यग् दिशा में क्षेत्र वृद्धि व्यतिक्रम -मन लीजिये व्रती २०० किलोमीटर गमन का नियम लेता है ,वह इस सीमा का उल्लंघन करता है तो दिगव्रत में तिर्यग् दिशा में क्षेत्र वृद्धि का अतिचार लगता है !यदि निर्धारित सीमा भूल ही जाता है व्रती तब संरिति अंतरधान अतिचार व्रतों में लगता है !
विशेष-व्रती दिग्व्रत में सीमित दासों दिशाओं का नियम पांच पापो से निवृत होने के लिए लेता है किन्तु यदि इन सीमाओं का उल्लंघन,धार्मिक कार्यों,जैसे तीर्थ यात्रा,पंचकल्याणक,अथवा मुनि के प्रवचन सुनने के लिए किया जाए तो व्रत में अतिचार नहीं होता बशर्ते सीमाओं का उल्लंघन सिर्फ धार्मिक प्रवृत्ति के लिए क्या हो उसके साथ आप व्यापर या मोरंजन के कार्य क्रम नहीं कर सकते!
देशव्रत के अतिचार-
आनयनप्रेष्यप्रयोगशब्दरूपानुपातपुद्गल क्षेपा: !!३१!!
संधि विच्छेद-आनयन+प्रेष्यप्रयोग+शब्दानुपात+रूपानुपात+पुद्गल+क्षेपा:
शब्दार्थ-आनयन,प्रेष्यप्रयोग ,शब्दानुपात,रूपानुपात,पुद्गल-पुद्गल/पत्थर आदि,क्षेपा:-फेंकना
अर्थ-आनयन, प्रेष्यप्रयोग ,शब्दानुपात, रूपानुपात,पुद्गल फेंकना,पांच देश व्रत के अतिचार है !
भावार्थ-
आनयन अतिचार-स्वयं अपने मर्यादित क्षेत्र में रहते हुए,किसी अन्य द्वारा मर्यादित क्षेत्र से वस्तु मंगवाना !व्रत में आनयन अतिचार है!
प्रेष्यप्रयोग अतिचार – स्वयं मर्यादित क्षेत्र में रहते हुए किसी सेवक को उसी कार्यवश,अपने मर्यादित क्षेत्र से बहार भेजकर वस्तु मंगवाना !व्रत में प्रेष्यप्रयोग अतिचार है !
शब्दानुपात अतिचार-स्वयं अपने निर्धारित क्षेत्र में रहते हुए,निर्धरित सीमा के बाहर से फोन से / खांस कर अपना अभिप्राय समझाना ,व्रत में शब्दानुपात अतिचार है !
रुपानुपात अतिचार –
स्वयं अपने निर्धारित क्षेत्र में रहते हुए,मर्यादा से बाहर रह रहे व्यक्ति को अपना रूप दिखाकर इशारा करना ,व्रत में रूपानुपात अतिचार है
पुद्गलक्षेप-स्वयं अपने निर्धारित क्षेत्र में रहते हुए,मर्यादा से बाहर पत्थर /कंकड़ आदि फेंक कर संकेत देना ,व्रत में पुद्गलक्षेप अतिचार है!
अनर्थदंड व्रत के अतिचार-
कन्दर्पकौत्कुच्यमौखर्यासमीक्ष्याधिकरणोपभोगपरिभोगानर्थक्यानी!!३२!!
संधि विच्छेद:-(कन्दर्प+कौत्कुच्य+मौखर्या+असमीक्ष्याधिकरण उपभोगपरिभोग)+अनर्थक्यानी!
शब्दार्थ:-कन्दर्पअनर्थक्यं-राग,हास्य सहित अशिष्ट वचन बोलना,कौत्कुच्य अनर्थक्यं-अशिष्ट वचन सहित, शरीर से भी कुचेष्टा करना,मौखर्या अनर्थक्यं-धृष्टता पूर्वक आवश्यकता से अधिक बाते करना,असमीक्ष्याधि करण अनर्थक्यं-निष्प्रयोजन मन,वचन,काय की प्रवृति करना,उपभोगपरिभोग अनर्थक्यं-भोगोपभोग सामग्री आवश्यकता से अधिक एकत्रित करना,अनर्थक्या-,नी-आवश्यकता से अधिक,अनर्थदंड व्रतों के ५ अतिचार है !
अर्थ:-कन्दर्प अनर्थक्यं,कौत्कुच्यअनर्थक्यं,मौखर्या अनर्थक्यं,असमीक्ष्याधिकरण अनर्थक्यं, उपभोग परिभोग अनर्थक्यं,अनर्थ दंड व्रत के ५ अतिचार है!
विशेष-
कन्दर्प अनर्थक्यं-हास्य सहित शिष्ट वचन बोलना ;जैसे किसी को गाली देना/भांड कहना,/ मज़ाक बनाना आदि ,
कौत्कुच्यअनर्थक्यं-कुचेष्टा करते हुए अशिष्ट वचन बोलना ,
मौखर्या अनर्थक्यं-धृष्टता पूर्वक आवष्यकता से अधिक वचन बोलना
असमीक्ष्याधिकरण अनर्थक्यं-जैसे निष्प्रयोजन मन वचन काय की प्रवृत्ति करना जैसे निष्प्रयोजन घूमना,जल के नल को खुला छोड़ना,अपनी धींग मारते रहना,किसी के अनहित के लिए मन से चिंतन करना आदि
उपभोगपरिभोग अनर्थक्यं-आवश्यकता से अधिक भोगोपभोग सामग्री एकत्रित करना जैसे ३-४-६ माह के लिए अनाज एकत्र कर रख लिया की कल महंगा न हो जाए,एक कार की आवश्यकता है किन्तु मान की पुष्टि हेतु ३-४ गाड़ी खरीद ली ,ये पाँचों प्रवृत्तियाँ अनर्थ दंड के अतिचार हैं !
समायिक शिक्षा व्रत के अतिचार-
योगदुष्प्रणिधानादरस्मृत्यनुपस्थानानि !!३३!!
संधि विच्छेद:- योग-दुष्प्रणिधान+अनादर+स्मृति+अनुपस्थाननि
शब्दार्थ:-योग-,मन वचन,काय,दुष्प्रणिधान-अच्छे भाव नहीं होना,अनादर-सामायिक आदर पूर्वक/उत्साहपूर्वक नहीं करना , स्मृति -भूल जाना,अनुपस्थाननि
अर्थ:-तीन मन वचन काय योग दुष्प्रणिधान अनुपस्थान ,अनादर अनुपस्थान और स्मृति अनुपस्थान , समायिक व्रतों में पांच अतिचार है
भावार्थ-मनोयोग दुष्प्रणिधान् अतिचार-सामयिक में बैठे है किन्तु चिंतवन अपने किसी मुक़दमे का कर रहे है!यह समायिक व्रत में मनोयोग दुष्प्रणिधान् अतिचार है !
वचन योग दुष्प्रणिधान् अतिचार-समायिक करते करते कुछ का कुछ बोलना या बिना अर्थ जाने बोलना, समायिक व्रत में वचनयोग दुष्प्रणिधान् अतिचार है !
काययोग दुष्प्रणिधान् अतिचार-समायिक करते समय आसान में निश्चलता से नहीं बैठना ,हिलना डुलना आदि समायिक व्रत में काययोग दुष्प्रणिधान् अतिचार है!
अनादर अनुपस्थान अतिचार-आदरभाव/उत्साह रहित होकर समायिक करना,अनादर अनुपस्थान अतिचार है !
स्मृति अनुपस्थान अतिचार-समायिक करते समय पाठ एकाग्रता के अभाव में भूलना/अपने आत्मस्वरुप के विषय में भूलकर,आगम विरुद्ध मनन करना,समायिक व्रत में स्मृति अनुपस्थान अतिचार है !
विशेष-अपने सामायिक व्रतों के निर्दोष पालन हेतु उक्त अतिचारों से सर्वथा बचना चाहिए !सामायिक सैदव एकांत में एक,घड़ी का संकल्प लेकर करी जाती है!इसमें णमोकारमंत्र आदि नहीं पढ़ते बल्कि अपने आत्मस्वरुप का चिंतवन किया जाता है!जैसे;-मेरी आत्मा क्या है?मैं कौन हूँ,?कहा से आया हूँ ?मेरा क्या उद्देश्य है ,?कहाँ जाऊँगा ?क्यों आया हूँ ?आदि का चिंतवन करते है!
प्रोषधोपवास व्रत में अतिचार –
अप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जितोत्सर्गादानसंस्तरोपक्रमणानादरस्मृत्यनुपस्थानि!!३४!!
संधि विच्छेद:-अप्रत्यवेक्षित+अप्रमार्जित+ उत्सर्ग+आदान+संस्तरोपक्रमण+अनादर+ स्मृति+अनुपस्थानि
शब्दार्थ-अप्रत्यवेक्षित-बिना देखे,अप्रमार्जित-बिना शोधे, उत्सर्ग-मल मूत्र त्यागना, आदान-रखना, संस्तरोप क्रमण-धार्मिक कार्य की आवश्यक वस्तुए जैसे चटाई नही बिछाना,अनादर-उत्साह रहित भाव होना, स्मृति-भूलवश, अनुपस्थानि-नहीं करना
अर्थ-अप्रत्यवेक्षित,अप्रमार्जित,उत्सर्ग,अनुपस्थान;अप्रत्यवेक्षित अप्रमार्जित आदान अनुपस्थान;अप्रत्यवेक्षित, अप्र मार्जित संस्तरोपक्रमण अनुपस्थानं;अनादर अनुपस्थान,स्मृतिअनुपस्थान,प्रोषधोपवास व्रत के ५ अतिचार है
भावार्थ-अप्रत्यवेक्षित अप्रमार्जित उत्सर्ग अनुपस्थान-बिना देखे शोधी भूमि पर मल मूत्र त्यागना!
अप्रत्यवेक्षित अप्रमार्जित आदान अनुपस्थान-बिना देखे शोधे पूजा की सामग्री,वस्त्र ,उपकरण उठाना!
अप्रत्यवेक्षित अप्रमार्जित संस्तरोपक्रमण अनुपस्थान-बिना देखे और शोधे चटाई आदि बिछाना!
अनादर अनुपस्थान -उपवास के कारण उत्साहपूर्वक आवश्यक कार्य नहीं करना !
स्मृतिअनुपस्थान -आवश्यक धार्मिक कार्यों को भूलना !
विशेष – प्रोषधोपवास व्रत के निर्दोष पालन के लिए उक्त ,पांच अतिचारों से सर्वथा बचना चाहिए !
भोगोपभोग परिमाण व्रत के अतिचार –
सचित्त सम्बन्ध सम्मिश्राभिषव दु:पक्वाहारा:!!३५!!
संधि विच्छेद-(सचित्त+सम्बन्ध+सम्मिश्रा+अभिषव दु:पक्व)+आहारा:
शब्दार्थ-सचित्त-जीव सहित ,सम्बन्ध-संबंध,सम्मिश्रा-मिश्रित,अभिषव-गरिष्,दु:पक्व-हीनाधिक पके,आहारा:-आहार ग्रहण करना
अर्थ सचित्त आहार,सचित्त सम्बन्ध आहार,सचित्तसम्मिश्राहार,अभिषव आहार, दु:पक्व आहारा,भोगोपभोग परिमाण व्रत के अतिचार है !
भावार्थ-
सचित्त आहार,-चेतन/जीव अंकुर सहित आहार ग्रहण करना!
सचित्त सम्बन्ध आहार-सचित वस्तु से सम्बन्ध प्राप्त आहार ग्रहण करना ,
सचित्तसम्मिश्राहार-सचित वस्तु से मिश्र वस्तु का आहार ग्रहण करना
अभिषव आहार-गरिष्ट आहार ग्रहण करना ,
दु:पक्व आहारा-हीनाधिक पक्के आहार को ग्रहण करना !
उक्त पांच अतिचार ,भोगोपभोग परिमाण व्रत के है जिनसे निर्दोष व्रतों के पालन के लिए सर्वथा बचना चाहिए !
अतिथि संविभाग शिक्षा व्रत के अतिचार-
सचित्तनिक्षेपापिधान परव्यपदेश मात्सर्य कालातिक्रमा:!!३६!!
संधि विच्छेद-सचित्तनिक्षेप+सचित्त अपिधान +परव्यपदेश +मात्सर्य + काल+अतिक्रमा:!! शब्दार्थ:-सचित्तनिक्षेप-सचित्त पत्ते पर आहार रख कर देना,
शब्दार्थ-सचित्तनिक्षेप- सचित पत्रादि पर आहार रख कर देना
सचित्त अपिधान-सचित्त पत्ते से ढका हुआ आहार देना ,
पर व्यपदेश०-दुसरे दाता की वस्तु दान देना / अपनी वस्तु अन्य से दान दिलवाना ,
मात्सर्य-ईर्ष्या अथवा अनादर पूर्वक आहार देना ,
काल-काल बेला प्रात: १०-१०,४५ बजे का,
अतिक्रमा- योग्य काल ( प्रात: १०-१०,४५ बजे) का उल्लंघन कर अकाल में दान देना ,अतिथि संविभाग व्रत के ५ अतिचार है !
अर्थ-सचित्तनिक्षेप,सचित्त अपिधान,परव्यपदेश ,मात्सर्य और कालतिक्रम,अतिथि संविभाग व्रत के अतिचार है
भावार्थ-अतिथि संविभाग के निर्दोष पालन के लिए सचित्तपत्ते पर रखकर अथवा उससे ढके हुए आहार को अनादर भाव से आहार बेला में अपने दान को दुसरे के हाथ से अथवा दुसरे का दान अपने हाथ से देना,अथवा अकाल में दान देना ,अतिथि संविभाग व्रत के पांच अतिचारों है जिनसे सर्वथा बचना चाहिए !
सल्लेखना के अतिचार –
जीवित मरणाप्रशंसा मित्रानुराग सुखानुबन्ध निदानारि !!३७!!
संधि विच्छेद -जीवितशंसा + मरणाशंसा +मित्र+अनुराग +सुख+अनुबन्ध +निदानारि
शब्दार्थ-जीवितशंसा-जीने की वांछा रखना,मरणाशंसा-कष्टो के कारण जल्दी मरण की इच्छा रखना, मित्रानुराग-मित्रो से अनुराग रखना, सुखानुबन्ध-पहले भोगे सुखों का स्मरण करना, निदानारि -आगामी कालों में भोगो की वांच्छा होना
अर्थ-जीवित, मरणाप्रशंसा मित्रानुराग सुखानुबन्ध निदान ,सल्लेखना व्रत के ५ अतिचार है !
भावार्थ-
जीवितशंसा निदानम्-सल्लेखना धारण करने बाद जीवित रहने की वांच्छा होना,जैसे एक दो दिन पुत्र के विदेश से लौटने तक जीवित रहने की वांच्छा होना,सल्लेखना व्रत में जीवितशंसा अतिचार है !
मरणांशा निदानम्-सल्लेखना की वेदना अथवा रोग-बेड सोर आदि की वेदना के कारण शीघ्र मरने की वांच्छा होना, सल्लेखना व्रत में मरणांशा अतिचार है
मित्रानुरागनिदानम्-मित्रों से अनुरागवश समाचार भेज कर,मृत्यु से पूर्व एक बार आकर मिलने का आग्रह करना सल्लेखनाव्रत में मित्रानुराग अतिचार है !
सुखानुबन्धनिदानम् -पूर्व में भोगे गए सुखो को याद करना जैसे फिले शरीर कितना तंदरुस्त था और अब कितना सुब्दर रह गया ,सल्लेखना व्रत में सुखानुबन्ध अतिचार है !
निदनानि -भविष्य में मरणोपरांत सुखों की वांच्छा रखना जैसे स्वर्ग की प्राप्ति हो ,सल्लेखना व्रत में निदान अतिचार है
सल्लेखना व्रत के निर्दोष पालन के लिए उक्त अतिचारों से सर्वथा बचना चाहिए !
विशेष:-
जीने की न हो वांच्छा, -जीवितशंसा
मरने की न हो इच्छा -मरणशंसा
परिवार मित्रजन के राग मै हटाऊँ,मित्रानुराग
भोगे जो भोग पहिले उनका न होवे स्मरण!सुखानुबन्ध
मै राज्य सम्पदा या पद के न चाहूँ ! निदान
इन भावों से सल्लेखना धारण करने से ७-८ भव में मोक्ष सुनिश्चित है !
शंका:-क्या सल्लेखना आत्म हत्या नहीं है?
समाधान-आत्म हत्या तनाव (टेंशन) में तीव्र काषायवश करी जाती है,सल्लेखना स्वेच्छा (इंटेंशन) से कषायों की धीरे धीरे कृशता कर ली जाती है,इसमें कषायमंद से मन्दतर होती जाती है!अंतत: शून्य होती है!आचार्यों ने लिखा है कि “मेरे धर्म में दोष न लगे इसलिए मै सल्लेखना धारण करता हूँ!”अत: यह आत्महत्या नहीं है !
शंका-हम नित्य प्रति वांच्छा करते है तो क्या हमारा निदान अतिचार वाली सल्लेखना होगी ?
समाधान-निदान का अर्थ वर्तमान अथवा भविष्य भवों में सांसारिक भोगों की वांच्छा है !हम पूजा के अंत में कहते है:-
दुःख खओ-जन्म,जरा,मरण दुखों का अंत हो,कमोखओ-(द्रव्य,भाव,और नो) कर्मों का क्षय हो,
बहुलाभ होओ-रत्नत्रय का लाभ हो,शुभ गमनम -शुभ गति में गमन हो,महामरणम्-समाधी मरण हो,भगवान के गुणों की सम्पत्ति मुझे प्राप्त हो! इसमें आत्मकल्याण का भाव;जन्म,जरा,मरण का क्षय कर्मों का क्षय होने की भावना है!यह प्रशस्त भावना सभी आचर्य,मुनि,आदि करते है इनमे सांसारिक सुखो अथवा भोगों की वांच्छा नहीं है इसलिए निदान नहीं है !
दान में विशेषता –
अनुग्रहार्थं स्वस्यतिसर्गो दानम् !!३८!!
संधि विच्छेद:-अनुग्रहार्थं+स्वस्य+अतिसर्गो +दानम्
शब्दार्थ:-अनुग्रहार्थं-अपने और पर के उपकार के लिए,स्वस्य-अपनी वस्तु (धनादि) का,अतिसर्गो-देना ,दानम्-दान है
अर्थ:-स्वयं और पर के उपकार हेतु अपनी वस्तु को देना दान है !
भावार्थ:-अपने और पर के कल्याण के लिए अपनी वस्तु त्यागना/देना दान है ,दुसरे की वस्तु को देना दान नहीं है! दान सदैव अपने उपकार; पुण्यबंध के रूप में तथा पर का उपकार; उनकी धर्म साधना के रूप में सहायक होता है !
विशेष:-श्रावक के षटआवश्यकों में और दस धर्मों में आठवा धर्म दान है!आध्यात्मिक दृष्टि से राग-द्वेष,कषा- यों का आत्मा से पृथक होना तथा आत्मशुद्धि के उद्देश्य से विकारी भावो का पृथक होना; त्याग है!स्व-पर की उपकार दृष्टि से अपनी वस्तुओं धनादि का ममत्व भाव छोड़कर अन्य जीवों की सहायता के लिए दान देना है !सम्पूर्ण वस्तु छोड़ना त्याग धर्म है और उसका अंश छोड़ना दान है !
सर्वश्रेष्ठ दान-आहारदान का प्रभाव मात्र २४ घंटे रहता है,उसके बाद पात्र को पुन:आहार की आवश्यकता होती है, औषधिदान,रोग के निवारण तक उपयोगी है,अभयदान में धर्मशाला ,निवास आदि तब ही तक कार्यकारी है जब तक पात्र उसमे निवास करते है किन्तु ज्ञान दान जन्मों जन्मो तक जीव के साथ रहता है इसलिए सर्वश्रेष्ठ दान ज्ञान दान है !
शंका-क्या अन्याय से अर्जित किया द्रव्य दान देना दान है?
समाधान -इस प्रकार अर्जित किया द्रव्य दान देने पर दान की परिभाषा के अंतर्गत तो आता है,दाता ने अपनी वस्तु से ममत्व भाव छोड़ा है,पुण्य भी मिलेगा लेकिन उसी डिग्री का मिलेगा जिस डिग्री से वह कमाया हुआ है क्योकि अन्याय से अर्जित किया हुआ द्रव्य निश्चित रूप से अनेक जीवों की भाव/द्रव्य हिंसा कर अर्जित किया होगा !यदि कोई यह दान दाता सोचता है की पूरे वर्ष खूब पापकर्म कर धन अर्जित करो और वर्ष के अंत में उसमे से कुछ द्रव्य दान देने से वह पापों से मुक्त हो जाएगा तो ऐसा नहीं है!जैनदर्शन में पाप और पुण्य अलग अलग चलते है पापकर्म को पुण्यकर्म काटता नहीं है!आचार्यों ने दान के सन्दर्भ में कहा है की जब कभी आवश्यकता से अधिक धन सही तरीकों से आये तब दान करे ,वह कार्यकारी होगा अन्यथा गलत ढंग से अर्जित किया धन कार्यकारी नहीं होगा !
दान में विशेषता-
विधिद्रव्यदातृपात्रविशेषात्तद्विशेष:!!३९!!
संधि विच्छेद-विधि+द्रव्य+दातृ+पात्र+विशेषात्त+द्विशेष
शब्दार्थ:-विधिविशेष-नवधा भक्ति आदि विधि,द्रव्यविशेष-द्रव्य की सात्विकता इत्यादि,दातृविशेष-दाता की श्रद्धा/भक्ति आदि,पात्रविशेष-पात्र विशेष अर्थात ब्रह्मचारी,आचार्य ,गणधर आदि की विशेषात्त – विशेषता द्विशेष-दान में विशेषता आती है
अर्थ:-विधिविशेष,द्रव्यविशेष, दाता विशेष और पात्र विशेष से दान में विशेषता आती है !
भावार्थ:-
विधि विशेष-अतयंत उत्साहपूर्वक आहार बनाकर,नवधा भक्ति पूर्वक (पड़गाहन,उच्च आसान, पाद प्रक्षालन, पूजा,नमोस्तु,मन,वचन,काय,आहार जल शुद्धि की प्रतिज्ञा) और आदर पूर्वक विशुद्ध आहारदान देने के उपरान्त आरती करने से ,दान का फल अधिक मिलेगा,
द्रव्य विशेष-द्रव्य; पात्र के स्वास्थ्य,शरीर,मौसम के अनुकूल होने पर द्रव्य विशेष माना जाता है!जैसे मुनिराज को ज्वर होने पर लौकी,तौरी,रोटी आहार में देने से अधिक पुण्यार्जन होगा बजाये घी से परिपूर्ण हलवा/दाल बाटी देने से !आहार आगमानुकूल निर्दोष,४६ दोषों रहित बना होना चाहिए,रात्रि में नहीं बना हो,आटा रात्रि में पिसा न हो,जल रात्रि में गर्म नहीं किया होना चाहिए!इस प्रकार का आहार में द्रव्य विशेष गुण होंगे !
दाता विशेष- क्षमाशील,विवेकशील,श्रद्धावान,भक्त अलोलुप्त ,संतोषी ,शक्तिवान दाता के सात गुण है !दाता को ज्ञान भी होना चाहिए कि कौन से द्रव्य के बाद कौन सा द्रव्य आहार में देना है!वृद्ध महाराज के यथायोग्य आहार देना चाहिए जिससे वे अपने दांतों से सरलता से चबा सके !दाता में उपयुक्त गुणों में से जितने अधिक होंगे दान का फल उतना अधिक मिलेगा !
पात्र विशेषता-ब्रह्मचारी जी ,क्षुल्लक जी/क्षुल्लिकजी,ऐलाकमहाराज,आर्यिकामाताजी,मुनिमहाराज उपाध्याय महाराज,आचर्यश्री,तीर्थंकर/केवली को आहार दान देते समय, दाता के क्रमश: भावों में उत्तरोत्तर वृद्धिगत वि- शुद्धि होने से उत्तरोत्तर अधिक दान का लाभ मिलता है !
विशेष:
१-पात्रो में -उत्तम-तीर्थंकर,मध्यम गणधर ऋद्धिधारी ऋषिराज,जघन्य-सामान्य भावलिंगी मुनि,जो मुनि राज २८ मूल गुणोँ का पालन करते हुए चर्या करते हों वे उत्तम पात्र की जघन्य कोटि में आते है ! !
मध्यम पात्र के तीन भेद -१-ऐल्लक,क्षुल्लक,प्रतिमधारी
जघन्य पात्र के तीन भेद-उत्तम-क्षायिक सम्यग्दृष्टि,मध्यम-औपशमिक सम्यग्दृष्टि,जघन्य-क्षयोपशमिक सम्यग्दृष्टि!
कुपात्र-जिन्होंने व्रतों को धारण तो किया है किन्तु आगमानुकूल २८ मूल नहीं पालते, उनकी चर्या नहीं है !
कुपात्रों के तीन भेद-उत्तम-द्रव्यलिंगी मुनि,माध्यम-द्रव्यलिंगी अणुव्रती,जघन्य-अगृहीत मिथ्यदृष्टि
अपात्र-जिनके चारित्र ही नहीं है
अपात्र तीन भेद-उत्तम-परिग्रही मुनि,मध्यम-भाव और चरित्र से हींन गृहस्थ,जघन्य-गृहीत और अगृहीत मिथ्यात्व सहित !
उत्तम पात्र को दिए गए दान का फल उत्तम कोटि का है,जो की जघन्य पात्र तक क्रमश घटता जाता है
कुपात्र को दिया दान कुगति में ले जाने वाला है !अपात्र को दिया दान उपयोगी नहीं है !
मुनि महाराज की नवधा भक्ति सहित किन्तु ऐल्लक,क्षुल्लक,आर्यिका माता जी के पाद प्रक्षालन एवं आरती की आवश्यकता नहीं है!उनकी परिक्रमा भी नहीं ली जाती !उन्हें पड़गाहन कर अंदर घर में लाया जाता है !प्रतिमधारियों को मन वचन काय शुद्ध है कहकर ही आहार दिया जाता है !
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मुनि श्री 108 प्रणम्यसागरजी तत्वार्थ सूत्र with Animation
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण
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आस्रव-जो शरीर,वचन अथवा मन की क्रिया से आत्म प्रदेशों में परिस्पंदन होता है उसे योग कहते है!योगो की प्रवृत्ति से आत्मप्रदेशों में कर्मों का आस्रव होता है,कर्मों के आत्मप्रदेशों में आगमन को आस्रव कहते है!शुभ और अशुभ योग से क्रमश; दोनों प्रकार शुभ और अशुभ कर्मों का आस्रव होता है,जिस योग की प्रधानता होती है उसके अधिक और दुसरे के कम कर्म बंधते है!हमारे आत्मप्रदेशों में ही कर्मवर्गणाये,पुद्गल वर्गणाओं रूप में रहती है,जैसे ही हम मन,वचन,अथवा काय से कोई क्रिया करते है वे कर्माणपुद्गल वर्गणाए,आत्मप्रदेशों में परिस्पन्द करने से कर्म रूप बंध जाती है!यह समस्त क्रिया बंध और आस्रव है,कर्मों का आस्रव-बंध एक ही समय युगपत् होता है!
इस अध्याय में उमास्वामी आचार्यश्री २७ सूत्रों के माध्यम से तीसरे ‘आस्रव’ तत्व के कारणों, उस के भेद,जीवाधिकरण,अजीवाधिकरण और अष्ट कर्मों के आस्रवों के कारणों पर उपदेश देते हुए प्रथम सूत्र में योग को परिभाषित करते है-
आस्रव क्यों होता है-
कायवाड.मन:कर्मयोग: !!१!!
संधिविच्छेद:-काय+वाड.+मन:+कर्म+योग:
शब्दार्थ:-काय-शरीर,वाड.-वचन,मन:-मन की,कर्म-क्रिया,योग:-योग है!
अर्थ-काय-शरीर ,वचन और मन की क्रिया योग है
भावार्थ-शरीर,वचन अथवा मन की क्रिया से आत्मप्रदेशों में परिस्पंदन(हलन-चलन,/संकोच-विस्तार) को योग कहते है!योग के निमित्त,सामान्य से ३ और विशेष से १५ है!
आत्मप्रदेशों में परिस्पंदन काया,वचन और मन की,क्रिया से क्रमश: काययोग, वचनयोग और मनोयोग कहलाता है!
काययोग-वीर्यान्तरायकर्म के क्षयोपशम से होने पर औदारिकादि;सात प्रकार की कायवर्गणाओं में से किसी एक वर्गणा की सहायता से जो आत्मप्रदेशों में परिस्पंदन होता है,उसे काययोग कहते है !
काययोग के भेद:-सात-१-औदारिक,२-औदारिकमिश्र,३-वैक्रियिक,४-वैक्रियिकमिश्र,५-आहारक,६-आहरकमिश्र तथा ७-कार्मण काययोग!
स्पर्शन,रसना,घ्राण,चक्षु और श्रोत पंचेन्द्रियां भी काय में ही गर्भित है !
वचनयोग-वीर्यान्तरायकर्म के क्षयोपशम होने से जीव में वाग्लाबधि प्रकट होती है और वह बोलने के लिए ततपर होता है,तब वचनमर्गणा के निमित्त से जो आत्मप्रदेशों में परिस्पंदन होता है उसे वचन योग कहते है !
वचनयोग के भेद:-चार;
१-सत्यवचनयोग- वचनों में सत्यत्व हो,२-असत्यवचनयोग-वचनों में असत्यत्व हो,३-उभयवचनयोग-वचनों में सत्यत्व और असत्यत्व दोनों हो ,तथा४- अनुभयवचनयोग-वचनों में सत्यत्व और असत्यत्व दोनों ही नही हो और
मनोयोग वीर्यान्तरायकर्म और नो इन्द्रयावरणकर्म के क्षयोपशम से मनोलब्धि के होने पर तथा मनो वर्गणा के आलंबन के निमित्त से,जीव के चिंतन के लिए ततपर,आत्म प्रदेशों में परिस्पंदन होता है,वह मनोयोग कहलाता है
मनोयोग के भेद:-चार;
१-सत्यमनोयोग-मन में सत्यत्व ,२-असत्यमनोयोग -होमन में असत्यत्व हो,३-उभयमनोयोग-मन में सत्यत्व और असत्यत्व दोनों हो ,४-अनुभयमनोयोग-मन में सत्यत्व और असत्यत्व दोनों ही नही हो इस प्रकार तीनो;,काय,वचन और मन,योगो के कुल १५ उत्तर भेद है!
विशेष
१-वर्तमान में हमारे चारों मनोयोग,चारों वचनयोग और औदारिक काययोग,कुल ९ में से,एक समय में एक ही योग हो सकता है!हमें भ्रान्ति हो सकती है कि जब हम चलते है,उसी समय बोलते भी है, उसी समय चिंतवन भी करते है,किन्तु वास्तव में ऐसा होना असंभव है!जब मनोयोग,वचनयोग अथवा काययोग का कोई भी एक भेद हो रहा हो तब योग का अन्य कोई भेद नहीं हो सकता!आत्मा का उपयोग जिस ऒर होता है,वही योग होता है अन्य नहीं! जब हम सोचते है,उस समय मनोयोग ही होता है चाहे हम संस्कार वश उसी समय शरीर से भाग भी रहे हो,किन्तु आत्मा का उपयोग उस ऒर नहीं हो रहा होता है, अत: उस समय काययोग नहीं होता है!जब हम टी.वी पर कोई कार्यक्रम देखते है,उस समय हमें चक्षुइंद्री से देखने और कर्ण इंद्री से सुनने की अनुभूति एक साथ होती है किन्तु वास्तव में ऐसा होता नहीं है क्योकि एक समय में हम आत्मा का उपयोग एक ही ऒर लगा सकते है!इस का प्रमाण है कि हम टी.वी.पर प्रवचन सुनते समय उसको निर्विघ्न काय (हाथ)से साथ-साथ लिख नहीं पाते है!
२-केवली भगवन के दो वचन योग:-१-सत्यवचनयोग-वचन सत्य होने के कारण,२-अनुभय वचन योग:-भाषा अनुभय होने के कारण तथा दो मनो योग:-१ सत्यमनोयोग-सत्य वचन बोलने से पहले जो मन का उपयोग सत्य बोलने के लिए हुआ,उस कारण और,२-अनुभय मनोयोग-अनुभय वचन होने के कारण!उनके तीन काययोग होते है!सामान्य से जब वे समवशरण में विराजमान रहते है अथवा विहार करते है तब उनका औदारिक काययोग होता है!उनका दंड-समुदघात में औदारिककाययोग,कपाट समुद घात में औदारिकमिश्र काययोग और प्रतर व लोकपूर्ण समुद्घात में कार्माण काय योग होता है।
विशेष-वीर्यान्तराय और ज्ञानावरण के क्षय होने पर सयोगकेवली के तीन;वर्गणाओं; काय, वचन और मन की अपेक्षा जो आत्म प्रदेश में परिस्पंदन होता है वह कर्म क्षय निमित्तक योग है !जो की १३ वे गुणस्थान तक ही रहता है आयोग केवली के तीनों वर्गणाओं का आगमन रुक जाता है!जिससे वहां योग का अभाव हो जाता है !
३- योग के आठ अंग –
१-यम :-अहिंसा,सत्य ,अस्तेय ,ब्रह्मचर्य व अपरिग्रह रूप मन वचन काय का संयम यम है !
२-नियम:-शौच ,संतोष,तपस्या। स्वाध्याय,व् ईश्वर प्रणिधान ये नियम है !
३-आसान:-पद्मासन ,वीरासन ,आसान है
४-प्राणायाम -श्वासोच्छ्वास का गति निरोधप्राणायाम है !
५-प्रत्याहार-इन्द्रियों को अंतर्मुखी करना प्रत्याहार है !
६-धारणा -विकल्पपूर्वक किसी एक काल्पनिक ध्येय में चित्त को नष्ट करना धारणा है
७-ध्यान-ध्यान,ध्याता व् ध्येय को एकाग्र प्रवाह ध्यान है !
८-समाधि-ध्यान,ध्याता व ध्येय रहित निवृत्त चित्त समाधि है !
चित्त (मन )की पांच अवस्थाये-
१-क्षिप्तचित्त-चित्त का संसारी विषयो में भटकना !
२-मूढ़चित्त-चित्त का निंद्रा आदि में रहना !
३-विक्षिप्तचित्त-सफलता-असफलता के झूले में झूलना !
४-एकाग्रचित्त-एक ही विषय में केंद्रित रहना !
५-निरुद्धचित्त-समस्त प्रवृत्तियों का रुक जाना !,
४-५ वी अवस्थाये योग के लिए उपयोगी है !
चित्त (मन) के रूप –
१-प्रख्या-अणिमा आदि ऋद्धियों की अनुरक्ति/प्रेमी प्रख्या है
२-प्रवृत्ति-विवेक बुद्धि के जागृत होने पर चित्त धर्ममेय समाधि में स्थित हो जाता है तब पुरुष का बिम्ब चित्त पर पड़ता है और चेतनवत् कार्य करने लगता है!यही चित्त की प्रवृत्ति है !
स आस्रव: -२
संधि विच्छेद-स+आस्रव:
शब्दार्थ- स=वह (योग जो पिछले सूत्र में कहा है), आस्रव:-आस्रव है!
अर्थ वह तीन प्रकार का योग ही आस्रव है
भावार्थ-त्रियोगों;मन,वचन और काय के द्वारा आत्माप्रदेशों में परिस्पंदन अर्थात योग ही पुद्गलकर्म वर्गणाओ का आत्मा की ऒर आने का कारण,आस्रव है!
विशेष-
१-कर्मों के आत्मा में आने के द्वार को आस्रव १५ भेद वाला योग है!कार्मणवर्गणाओ का कर्म रूप परिणमन आस्रव है!
२-जीव निरंतर मन,वचन,काय त्रियोगों में सोते-जागते प्रतिसमय प्रवृत्त रहता है,इसीलिए उसके प्रतिसमय कर्मों का आस्रव होता है यहाँ तक की जब आत्मा वर्तमान एक शरीर को त्याग कर विग्रह्गति में दुसरे भव के शरीर को धारण करने के लिए गमन करते समय भी उसमे क्रिया होती है,कर्मो का आस्रव होता है!
३-१३वे गुणस्थानवर्ती मुनिराज के भी कर्मो का आस्रव होता है!
४–जिस प्रकार कुए के भीतर पानी आने में झिरे कारण है उसी प्रकार आत्मा के कर्म आने में योग कारण है!यद्यपि योग आस्रव में कारण है तथापि सूत्र में कारण में कार्य का उपचार कर उसे ही आस्रव कह दिया है!जैसे प्राणों की स्थिति में कारण अन्न को ही प्राण कह देते है!
आस्रव का स्वरुप –
शुभ:पुण्यस्याशुभ:पापस्य: ३
संधि-विच्छेद-शुभ:+पुण्यस्य+अशुभ:+पापस्य:शब्दार्थ-शुभ:-शुभ(योग),पुण्यस्य-पुण्यकर्म और अशुभ:-अशुभ(योग),पापस्य-पापकर्म आस्रव है
अर्थ-शुभयोग पुण्यकर्म और अशुभयोग पापकर्म के आस्रव का कारण है
भावार्थ-शुभयोग-शुभ;मन वचन काय की प्रवृत्तियां(क्रियाये) जैसे;पूजा,पाठ,स्वाध्याय,धर्म ध्यानादि शुभ/पुण्यकर्मो का और अशुभयोग-अशुभ;मन;वचन,काय की प्रवृत्ति(क्रियाये) जैसे;सांसारिक राग-द्वेष, पंच पापों में लिप्ता आदि अशुभकर्मों-पापकर्मों का आस्रव होता है!
विशेष-१-जब हम धार्मिक कार्यो में प्रवृत्त रहते है उस समय हमें शुभ-पुण्यकर्मो का आस्रव तभी होगा जब हमारा अभिप्राय,पूजा की क्रिया विधि,और परिणाम दोनों ठीक होंगे अन्यथा अशुभ पाप कर्मों का ही आस्रव होता है!
अभिप्राय-मान लीजिये पूजा-पाठ आदि करने के पीछे हमारा अभिप्राय,सांसारिक सुखों की पूर्ती की इच्छाए है तब हमें कर्मों का पुण्यास्रव नहीं होगा,पापास्रव ही होगा क्योकि हम संसार से मुक्त होने की इच्छा नहीं रख रहे है!
शंका-१ अपने समय का श्रावक सदुपयोग कैसे करे?
समाधान-मन,वचन और काय की प्रवृत्ति अशुभ विकल्प रहित होंगी तब पुण्यास्रव होगा अन्यथापापास्रव होगा!आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी के अनुसार हमें अपने समय;२४ घंटो को ८-८ घंटे के ३ भागों में , विभक्त करना चाहिए!प्रत्येक ८-८ घंटे; धार्मिककार्यो,व्यावसायिक कार्यों और काम अर्थात शरीर के लिए रखने चाहिये!
शंका:-२ शुभकर्म के आस्रव का कारण शुभयोग और अशुभकर्म के आस्रव का कारण अशुभयोग है,यदि ऐसा लक्षण कह दिया जाये तो क्या हानि है?
समाधान-यदि ऐसा लक्षण कह दिया जाए तो शुभ का अभाव हो जाएगा क्योकि आगमानुसार जीव के आयुकर्म के अतिरिक्त,सातों कर्मों का आस्रव प्रतिसमय होता है,अत: शुभयोग में भी ज्ञानावरण आदि पापकर्मों का आस्रव/बंध होता है,इसलिए उक्त कथन आगम विरुद्ध है !
शंका-३ जब शुभयोग से भी घातिया कर्मों का बंध होता है तो सूत्र में क्यों कहा है की शुभयोग से पुण्यकर्म का आस्रव/बंध होता है?
समाधान-घातियाकर्मों की अपेक्षा से नहीं,अघातिया(वेदनीय,आयु,नाम और गोत्र) कर्मों की अपेक्षा से कहा गया है!अघातिया कर्मों के पुण्य और पाप दो भेद होते है!शुभयोग से पुण्यकर्म का और अशुभयोग से पापकर्म का आस्रव होता है!शुभयोग रहते हुए भी घातिया कर्मों का अस्तित्व रहता है,उनका उदय भी रहता है और उसी से घातिया कर्म का बंध भी होता है !
साम्परायिक आस्रव के स्वामी की अपेक्षा दो भेद:-
सकषायाकषाययो:साम्परायिकेर्यापथयो:!४!
संधिविच्छेद-सकषाय+अकषाययो:+साम्परायिक:+ईर्यापथयो:
शब्दार्थ-सकषाय-कषायसहित और अकषाययो-कषायरहित जीवों के क्रमश: साम्परायिक-साम्परायिक आस्रव(कर्मो का आत्मा के पास आकर रुकना) और ईर्यापथयो-ईर्यापथ आस्रव (कर्मों का आत्मा के पास आकर नहीं रुकना अर्थात बिना रुके चले जाना) कहलाता है!
अर्थ-चार कषायों(क्रोध,मान,माया और लोभ) सहित जीवों के साम्परायिक और कषाय रहित जीवों के ईर्यापथ आस्रव होता है
भावार्थ-कषाय सहित जीवों के १० वे गुणस्थान तक साम्परायिक आस्रव होता है क्योकि कषाय १०वे गुणस्थान के बाद नहीं रहती!
ईर्यापथ आस्रव-स्थिति और अनुभाग रहित कर्मों के आस्रव को ईर्यापथ आस्रव कहते है इस में, कर्म की स्थित १ समय की भी नहीं होती,वे आकर चले जाते है,क्योकि कषाय के अभाव में उन्हे बंधने का अवसर नहीं मिलता!कषाय रहित जीवों के केवल,योग के (सद्भाव में)कारण ११,१२,१३ वे गुणस्थान में ईर्यापथ आस्रव होता है,१४ वे गुणस्थान में योग के अभाव में वह भी नही रहता !
साम्परायिक आस्रव के भेद-
इन्द्रियकषायाव्रतक्रिया:पञ्चचतु:पञ्चपञ्चविंशतिसंख्या:पूर्वस्यभेदा:!५!
संधिविच्छेद:-इन्द्रिय+कषाय+अव्रत+क्रिया:+पञ्च+चतु:+पञ्च+पञ्चविंशति+संख्या:+पूर्वस्य+भेदा:
शब्दार्थ-इन्द्रिय-इन्द्रिय,कषाय-कषाय,अव्रत-पाप,क्रिया:-क्रिया के क्रमश: ,पञ्च-पांच,चतु:-चार,पञ्च-पाच, और पञ्चविंशति-पच्चीस,संख्या:-भेद,पूर्वस्य-उप्र के सूत्र में पहले वाले/साम्परायिक आस्रव,भेदा:-भेद है!
अर्थ-पूर्वसूत्र में पहिले,साम्परायिक आस्रवके इन्द्रिय,कषाय,पापो,क्रिया की अपेक्षा क्रमश:५,४,५,२५ भेद है
भावार्थ-साम्परायिक आस्रव के ३९;पञ्चइन्द्रिय विषयों(स्पर्श,रसना,घ्रण,चक्षु और कर्ण)-,४ कषायों (क्रोध,मान,माया और लोभ),५-पापो(हिंसा,चोरी,झूठ,कुशील और परिग्रह)और २५ क्रियाये,भेद है!
विशेष-
१-जीव के ३ योगो;मन,वचन,काय से ५-इन्द्रिय विषयों में,४-कषाय;क्रोध,मान,माया लोभ ,५-पापों; हिंसा, झूठ, चोरी,कुशील,परिग्रह तथा २५-क्रियाओं रूप प्रवृत्ति होने(विशेषत:सम्यक्त्व और मिथ्यात्व क्रिया) से,साम्परायिक आस्रव होता है!
सम्यक्त्व क्रिया-सम्यक्त्व की वृद्धि करने वाली क्रिया अर्थात सच्चे देव,शास्त्र, गुरुकी भक्ति आदि करना,सम्यक्त्व क्रिया है !
सच्चेदेव-वीतराग,हितोपदेशी,सर्वज्ञ,सच्चे देव है!
सच्चे शास्त्र-“भव्य जिन(जिनेन्द्र देव) की वाणी” है,जिनवाणी सच्चे शास्त्र है!
सच्चे गुरु-२८ मूलगुण धारी निर्ग्रन्थ गुरु सच्चे गुरु है! एक भी मूल गुण कम होने पर वे सच्चे गुरु की कोटि में नहीं आते है!
साम्प्रायिक आस्रव के होने में कारण २५-क्रियाये –
१-सम्यक्त्व-सम्यक्त्व की अभिवृद्धि करने वाली देव,शास्त्र,गुरु की पूजन आदि क्रियाये है!
इन की वृद्धि हेतु सच्चे,देव,शास्त्र,गुरु के स्वरुप को समझकर उनकी पूजा,भक्ति, अराधना, मनोयोग से करनी चाहिए!इसी से सम्यगदर्शन,सम्यग्ज्ञान,सम्यक्चरित्र प्राप्त हो सकता है!
हमारे अराध्य मात्र ९;देव,पंच परमेष्ठी,जिनवाणी,जिनधर्म,जिनचैत्यालय और जिनबिम्ब है!इनके अतिरिक्त अन्य देवी-देवता हमारे अराध्य/पूजनीय नहीं है!इनसे बचते हुए सम्यक्त्व में वृद्धि करनी चाहिए!अन्यथा दर्शनमोहनीय कर्म का बंध पुष्ट होगा!इस मनुष्य पर्याय का भरतक्षेत्र में जन्म लेने के लाभ से वंचित रह जायेगे!हमारी मनुष्यपर्याय,जिसमे अपना कल्याण कर सकते है,व्यर्थ जायेगी !सम्यक्त्व क्रियाये पुण्य के बंध और संसार से मुक्ती का कारण है,मिथ्यात्व क्रियाये घोर पापबंध और संसार का कारण है!
२-मिथ्यात्वक्रियाये-सम्यक्त्व क्रिया के विपरीत,मिथ्यातव वृद्धि हेतु सच्चे,देव,शास्त्र, निर्ग्रन्थ गुरु, जिनवाणीआदि के अतिरिक्तअन्य;देव शास्त्र गुरु,धर्म,भक्ति,सेवामें अनुरक्त रहना मिथ्यात्व क्रियाये है!
आज हम जैन लोग,नवरात्रि पूजा करने लगे है जिसका जैन शास्त्रों में कोई विधान नहीं है,नवग्रह विधान में लग रहे है,ये नवगृह हमारा कुछ भी अच्छा-बुरा नहीं कर सकते!ये क्रियाये आगमविरुद्ध है!जैनी शनि अमावस्या मनाने लगे है,सभी देवी-देवताओं के मंदिर बनने लगे है,नवग्रह अष्ट निवारक मंदिर बनने लगे है,शनि वार को मुनिसुव्रत भगवान् की पूजा,शनि गृह के प्रकोप के निवारण हेतु करने लगे है,यह धारणा बिलकुल आगम विरुद्ध है!समस्त सिद्ध भगवानो की क्षमता में मात्र भी अंतर नहीं है!मिथ्यात्व और कुदेव,कुशास्त्रों,कुगुरू के चक्कर में पड़कर हम आज अपना वर्तमान जीवन और परलोक भी नष्ट कर रहे है! हमें सन्मार्ग दिखाने वाले गुरु भी आज हमें मिथ्यात्व की ऒर ले जाने लगे है!वे कहने लगे नवग्रह,देवी,देवताओं की पूजा करो!ये सब मिथ्यात्व क्रिया है!आज बहुत सी जैन महिलाए करवा चौथ का व्रत,अन्य धर्मों के अनुसरण में रखने लगी है,जिसका विधान जैनागम में नहीं है!अन्य धर्मो के त्योहारों को हम मानने लगे है,ये सब क्रियाये मिथ्यात्व की वृद्धि है,जिनसे बच कर हमें अपने धर्म के प्रति श्रद्धा प्रगाढ़ करनी चाहिए!इनसे बचे क्योकि पञ्च इन्द्रियों के विषयों में,चार कषायों,पञ्च अव्रत व २५ क्रियाओं में यदि हम अपना उपयोग लगा रहे है,तब साम्परायिक आस्रव होगा
३-प्रयोग क्रिया-शरीर आदि से गमनागमन रूप प्रवृत्ति,प्रयोग क्रिया है!
४-समादान क्रिया-संयमी का असंयम की ओर अभिमुख होना,समादान क्रिया है!
५-ईर्यापथ क्रिया-ईर्यापथ गमन हेतु क्रिया ईर्यापथ गमन क्रिया है!
६-प्रदोषिक क्रिया-क्रोध के आवेश में होने वाली द्वेषादिक रूप क्रिया,प्रदोषिक क्रिया है!
७-कायिकी क्रिया-मारना,गाली देना,आदि दुष्टता पूर्ण क्रियाये कायिकी क्रिया है !
८-आधिकारणि क्रिया-हिंसादि के उपकरण तलवार,पिस्टल,बंदूकआदि ग्रहण करना,आधिकारणि क्रिया है
९-परितापि की क्रिया-प्राणियों को दुखी करने वाली क्रियाएँ,परितापिकी क्रिया है !
१०-प्राणातिपाती की क्रिया-दुसरे जीव के शरीर,इन्द्रिय आदि प्राणों का ही घात करना,प्राणातिपाती की क्रिया है !
११-दर्शन क्रिया-राग के वशीभूत होकर मनोहर देखना,दर्शन क्रिया है!
१२-स्पर्शन क्रिया-रागवश किसी वस्तु को स्पर्श करना,स्पर्शन क्रिया है!
१३-प्रात्ययिकी क्रिया-विषयों की नयी नयी वस्तुओं को एकत्र करना,प्रात्ययिकी क्रिया है!
१४-समन्तानुपात क्रिया-स्त्रीपुरुष, के सोने/बैठने के स्थान पर मलमूत्र आदि क्षेपण करना,समन्तानुपात क्रिया है !
१५-अनाभोग क्रिया-बिना देखी,बिना शोधी जमीन पर उठने बैठने को अनाभोग क्रिया कहते है !
१६-स्वहस्त क्रिया -दुसरे के योग्य कार्य स्वयं करना स्वहस्त क्रिया है!
१७-निसर्ग क्रिया-पाप की कारण प्रवृत्ति को भला समझने को निसर्ग क्रिया कहते है!
१८-विदारण क्रिया-पर द्वारा किये गए पापों को प्रकाशित करने को विदारण क्रिया कहते है !
१९-आज्ञाव्यापादिकी क्रिया-चारित्रमोहनीय के उदय से शास्त्रोक्त आवश्यकादि क्रियाओं के करने में असमर्थ होने पर उनका अन्यथा निरूपण करना, आज्ञाव्यापादिकी क्रिया कहते है !
२०-अनाकांक्षा क्रिया-प्रमाद/अज्ञान वश,आगमोक्त क्रियाओं में अनादर करना अनाकांक्षा क्रिया है !
२१-आरंभिकी क्रिया -छेदन भेदनादि क्रियाओं में स्वयं प्रवृत्त होना,अन्यों को प्रवृत्त होता देख प्रसन्न होना आरंभिकी क्रिया है !
२२-परिग्रहिकीक्रिया-परिग्रहों की रक्षा में लगे रहना परिग्रहिकी क्रिया है !
२३-माया क्रिया-ज्ञान दर्शन में कपट रूप प्रवृत्ति करना माया क्रिया है !
२४-मिथ्यादर्शन क्रिया-मिथ्यात्व रूप परिणीति मे,किसी को मिथ्यात्व की प्रशंसा कर,दृढ करना मिथ्यादर्शन क्रिया है !
२५-अप्रत्याख्यान क्रिया-चारित्र मोहनीय के उदय से त्याज्य वस्तुओं में त्याग रूप प्रवृत्ति नहीं होना,अप्रत्याख्यान क्रिया है!
शंका-सभी आत्माओं के तीनो;मन,वचन और काय योग कार्य है,अत:सब सैनी पंचेन्द्रिय संसारी जीव के समान रूप से प्राप्त होने के कारण;सभी को कर्म बंध के फल का अनुभव एक समान होना चाहिए !
समाधान-सब को एक समान कर्मबंध का फल नहीं मिलता क्योकि यद्यपि योग सभी सैनी पंचेन्द्रिय आत्मा के होते है किन्तु जीवों के परिणामों में तीव्रता /मन्दता अनन्त भेदों सहित होती है !इसलिए कर्म के फलों में भिन्नता आ जाती है! आचार्य श्री ने इसे निम्न सूत्र द्वारा स्पष्ट किया है
हीनाधिक साम्प्रायिक आस्रव के कारण-तीव्रमंदज्ञाताज्ञातभावाधिकरणवीर्यविशेषेभ्यस्तद्विशेष:!!६!!
संधिविच्छेद-तीव्र+मंद+ज्ञात+अज्ञात भाव+अधिकरण+वीर्य+विशेषेभ्य+तद्विशेष:
शब्दार्थ:-तीव्रभाव,मंदभाव,ज्ञातभाव,अज्ञातभाव,आधारविशेष और वीर्यविशेष से तद्विशेष:-उस( साम्प्रायिक आस्रव) में विशेषता ( हिनाधिक्ता) होती है
अर्थ-साम्परायिक आस्रव में विशेषता (हीनाधिक्ता),जीव के तीव्रभाव,मंदभाव,ज्ञातभाव,अज्ञातभाव अधिकरण विशेष और वीर्यविशेष से आती है!
भावार्थ-जीव के किसी कार्य में तीव्र राग-द्वेष ,कषाय से अधिक और मंद राग-द्वेष,कषाय से कम आस्रव होता है!
१-तीव्र/मंदभाव:-कोई जीव,नन्दीश्वर द्वीप/पंञ्चमेरु की पूजन, इनके अर्थ/विषय जाने बिना कर रहा है तो उनका,उस जीव की अपेक्षा कम मन लगेगा जिसको इनके अर्थ/विषय का ज्ञान है,ऐसे जीव के पुण्यकर्म का आस्रव,मन लगाकर पूजन करने वाले की अपेक्षा कम होगा!मन लगाकर पूजा करने वाले के नेत्रों के समक्ष नन्दीश्वर द्वीप/पञ्चमेरु के जिनालय बनने से वह भक्ति में डूब जायेगा जिससे उस के पुण्यकर्मों का आस्रव उत्कृष्टकोटि का होगा!इस प्रकार तीव्र और मंद भाव के आधार से परिणामों में विशेषता आने से ,तदानुसार आस्रव होता है!
२-ज्ञात/अज्ञातभाव:-कोई क्रिया ज्ञानता या अज्ञानता पूर्वक करी है,दोनों में भिन्न प्रकार का आस्रव होगा!जैसे किसी ने बाज़ार से अंडे से निर्मित आईस क्रीम के सेवन किया ,जब तक उसे ज्ञान नहीं है की उसमे अंडा है तब तक उसके,जानने के बाद सेवन करने की अपेक्षा,पापकर्म का कम आस्रव होगा!अज्ञातभाव से हिन्सा कम होती है,आस्रव कम होता है,ज्ञात भाव से जान बूझकर कार्य करने पर हिंसा बहुत होती है,आस्रव बहुत होता है!
३-अधिकरणविशेष-आस्रव के आधार को अधिकरण/प्रयोजन कहते है!किसी तीर्थ पर जाकर साफ़ सुथरी नई धोती,शुद्ध सामग्री,साफ़-सुथरे,चमकते चांदी के बर्तनों में अत्यंत भक्तिभाव से पूजन करने पर पुण्य आस्रव,अपेक्षाकृत,अशुद्ध सामग्री,गंदे टूटे-फूटे स्टील के बर्तनों में,गन्दी धोती पहन कर साधारण भक्तिभाव होने के कारण,अधिक होगा, क्योकि अधिकरण अर्थात आधार की विशेषता से पुण्य के आस्रव में अंतर होता है!
४-वीर्य विशेष- द्रव्य की शक्ति विशेष को वीर्य कहते है!पंच पापो ,पंचइन्द्रियों विषयों ,चार कषायों,२५ क्रियाओं की वीर्य/शक्ति अधिक से पुण्य/पाप का अधिक और कम शक्ति से कम पुण्य पापका आस्रव होगा !वर्तमान में हम सब का असंप्रप्तासृपाटिका संहनन है! हम अधिकतम तीसरे नरक तक जाने योग्य पापकर्म का आस्रव कर सकते है और यदि वज्रऋषभनारांच संहनन होता तब सातवे नरक तक जा ने योग्य पाप कर्म का आस्रव कर सकते। हम असंप्रप्तासृपाटिका संहनन के साथ अधिकतम ८ वे स्वर्ग तक जाने योग्य पुण्य कर्म का आस्रव कर सकते किन्तु वज्रऋषभनारांच सहनं के साथ सर्वार्थसिद्धी और मोक्ष तक जाने योग्य पुण्य का आस्रव कर सकते! अत: वीर्य विशेष से भी आस्रव में विशेषता-अंतर होता है!
विशेष- हमें शुभ कार्य में तीव्र भाव और अशुभ कार्यों में मंद भाव रखना चाहिए जिससे क्रमश पुण्य का अधिक और पाप का कम आस्रव हो !
सम्प्रायिक आस्रव किसके आधार से होता है? यह बताने के लिए निम्न सूत्र खा है !
अधिकरण/आस्रव का आधार
अधिकरणजीवाजीवाः ७
संधि विच्छेद -अधिकरण+जीव+अजीवाः
शब्दार्थ-अधिकरण-अधिकरण/आधार,जीव-जीव और अजीवाः-अजीव दो भेद है
अर्थ -जीव और अजीव के अधिकरण/आश्रय से साम्प्रयिक आस्रव होता है!
भावार्थ-जीव के हिंसा/दयारूप भाव के आश्रय से आस्रव होता है तो वह जीवाधिकरण/भावाधिकरण कहलाता है!
अजीव द्रव्य रूप हिंसा आदि के साधन रूप होना अजीवाधिकरण/द्रव्याधिकरण कहलाता है!यह द्रव्य रूप आस्रव होता है!जैसे तलवार,कैची,फावड़ा,पिच्ची,कमंडलादि के आश्रय से आस्रव होता है!
विशेष-यद्यपि जीव और अजीव द्रव्य दो ही है किन्तु उनकी पर्याय अनेक है इसलिए सूत्र में बहुवचन ‘जीवाजीवा:’ कहा है मतलब है कि किसी एक पर्याय से युक्त द्रव्य अधिकरण होता है,केवल द्रव्य नहीं!
जीव के आधार से आस्राव के द्वार-
आद्यंसंरम्भ-समारम्भारम्भयोगकृत-कारितानुमत-कषायविशेषैस्त्रि स्त्रिस्त्रिश्चतुश्चैकशः!!८!!
संधिविच्छेद-आद्यं+संरम्भ+समारम्भ+आरम्भ+योग+कृत+कारित+अनुमत+कषाय+विशेषै:+ त्रि:+त्रि:+त्रि:+चतु:+च+ऐकश:
शब्दार्थ-आद्यं(सूत्र ७ में) पहिले अर्थात जीवाधिकरण;संरम्भ-किसी कार्य की योजना बनाना,समारम्भ-योजना को कार्यन्वित करने के लिए आवश्यक सामाग्री एकत्र करना,आरम्भ-कार्य को आरम्भ करना, योग-योग,कृत-स्वयं कार्य करना,कारित-अन्य द्वारा कार्य को करवाना,अनुमत-किसी अन्य द्वारा कार्य किये जाने पर अनुमोदना करना,कषाय-कषाय,विशेषै:-से आस्रव में विशेषता आती है ,इनके क्रमश: त्रि:-तीन.त्रि:-तीन,त्रि:-तीन,चतु:-चार,च-और ऐकश:-(इन्हे परस्पर मिलाने/गुणित करने) से ,जीवाधिकरण द्वारा आस्रव के द्वार है!अर्थात जीवधिकरण आस्रव इन परिणामों से होता है!
भावार्थ-जीव के आधार से होने वाले आस्रव से १०८ परिणामों होते है!इनसे बचने के लिय ही जाप की माला में १०८ दाने होते है!
संरम्भ-जैसे शिविर लगाने की योजना बनाना संरम्भ है,
समारम्भ-उसके लिए सामग्री एकत्रित करना समारंभ और ,
आरम्भ-शिविर प्रारम्भ हो जाना आरम्भ है!
ये तीनो,तीन योगों;मन,वचन,काय से होती है जैसे मन,वचन,शरीर से योजना बनाना!तीन प्रकार से कार्य करना-अर्थात
कृत=स्वयं कार्य करना,
कारित=किसी अन्य से कार्य करवाना,
अनुमत=कार्यस्वयं नही करना किन्तु किसी अन्य द्वारा कार्य करने वाले की अनुमोद्ना करना !
चार-कषाय क्रोध,मान,माया,लोभ !इस प्रकार ( ३x ३x ३x ४ =१०८) परिणामों से जीव के जीवाधिकरण आस्रव होता है!
शंका:-कृत,कारित,अनुमोदन में से किस में पाप/पुण्य का अधिक बंध होगा ?
परिणामों की विशेषता अनुसार तीनों में से किसी में भी पाप/पुण्य का अधिक बंध हो सकता है!
उद्धाहरण के लिए
1-किसी ने चौका लगाने पर बड़े-बड़े मुनिमहाराजों ने आहार लेने पर उसे यदि घमंड हो गया “की बड़े से बड़े महाराज मेरे चौके में आते है,इनके मान कषाय की तीव्रता होने से,उस व्यक्ति के पुण्य का आस्रव अधिक होगा जो चौका तो नहीं लगा पा रहा है किन्तु वह भाव से इन चौका लगाने वाले सज्जन की अनुमोद्ना कर रहा है,कि ‘आप कितने भाग्यशाली है,आपने कितना पुण्य किया है ,आपके घर कितने बड़े-बड़े मुनि महाराज आहार लेने आये है,मुझे ऐसे सौभाग्य कब प्राप्त होगा,मुझे भी ऐसा पुण्य मिले’!इस दृष्टांत नमें अनुमोद्ना करने वाले के अधिक पुण्य का आस्रव होगा !
2-पञ्च कल्याणक में किसी व्यक्ति ने सौधर्मेन्द्र की बोली २१,३१,५१ लाख में,अन्य किसी को बोली नहीं लेने देने और शहर में अपनई प्रतिष्ठा का डंका बजाने के भाव से लेता है तो मान कषाय की वृद्धि के कारण इस से अधिक उस व्यक्ति के पुण्य का बंध होगा जो केवल अनुमोदन कर रहा है कि ”इस बोली लेने वाले व्यक्ति ने अपने धन का कितना सदुपयोग किया है,वह कितना पुण्यशाली है,मेरे पुण्य का कब उदय होगा जब मैं भी अपने धन का ऐसा सदुपयोग कर पाऊंगा!” जिसके परिणामों में विशुद्धि अधिक है,कषाय कम है,उसके पुण्य का अधिक बंध होगा! जिसके पापरूप क्रियाएँ करते हुए परिणामों में तीव्रता है उसके पाप का बंध अधिक होगा!
सामान्यता कृत के सबसे अधिक,कारित के उससे कम और अनुमोद्ना करने वाले के सबसे कम पाप/पुण्य का बंध होता है !
किसी व्यक्ति ने मुनिराज के लिए आहार बड़ी भक्ति भाव से बनाया किन्तु महाराज इनके चौके में नहीं पधारे,तब भी इनके अनुमोद्ना के कारण पुण्य का बंध होगा !
जैसे कार्य मन,वचन काय से कृत,कारित अथवा अनुमोद्ना करेगे तदानुसार पुण्य/पाप का बंध कषायों की तीव्रता,मंदता,ज्ञात,अज्ञात भावों के अनुसार होता है!
टीवी पर भैसे आदि की लड़ाई जैसे हिंसात्मक दृश्य देख कर आनंदित होने पर,अनुमोद्ना के कारण,भी पाप बंध होता है!इसी प्रकार धार्मिक कथा,पञ्चकल्याणक आदि जैसे प्रोग्राम देखने, सुनने पर पुण्यबंध होता है!
टीवी पर अन्य मतियों के प्रवचन,धार्मिक कार्यक्रम देखने सुनने से मिथ्यात्व की पुष्टि होती है,अत: इन से हमें बचना चाहिए!हमें विवेकता पूर्वक,[b]सच्चे शास्त्रों (प्रथमानुयोग करुणानुयोग,चरणानुयोग, द्रव्यानुयोग),[/b]सच्चे गुरु के प्रवचनों से जानकर ही देखना सुनने का निर्णय करना चाहिए!
अजीव के आधार/आश्रय से आस्रव-
निर्वर्तनानिक्षेपसंयोगनिसर्गाद्वि-चतुर्द्वि-त्रिभेदा:परम् ९
संधि विच्छेद-निर्वर्तना+निक्षेप+संयोग+निसग:द्वि+चतुः+द्वि+त्रि+भेदा:+परम्शब्दार्थ-
निर्वर्तना=रचना करना,,निक्षेप=वस्तु को उठाना/रखना,संयोग=वस्तु को आपस में मिलाना,,निसग:=मन.वचन,काय से प्रवृत्ति,द्वि=दो,चतु:=चार,त्रि-तीन,भेदा:=भेद है ,परम्=(सूत्र ७ में बाद वाले अर्थात अजीव अधिकरण के है)!
भावार्थ- निर्वर्तना/रचना- दो, निक्षेप /वस्तु को उठाना /रखना-चार, संयोग/वस्तुओं को मिलाना-दो और निसग:/मन/वचन/कांय की प्रवृत्ति-तीन,कुल ११ अजीव अधिकरण है अर्थात अजीव के आधार से कर्मों का आस्रव होता है!
निर्वर्तना=रचना के दो भेद है
१-मूलगुण निर्वर्तना=शरीर,मन,श्वासोच्छ्वास आदि की रचना करना
२-उत्तरगुण निर्वर्तना=पाषाण,लकड़ी,विध्वंसक कार्यों के लिए रोबोट आदि बनाना!इनके आश्रय से जो जीव के परिणाम में जो भाव आते है वह निर्वर्तना नामक अजीव अधिकरण है!जैसे आजकल शादियों में सलाद,मछली आदि के आकार में सजाई जाते है,उसको छूरी से काट कर खाते है! यह अजीव अधिकरण आस्रव है! यह अजीव के आश्रय से होने वाला पाप है! किसी चादर, कपडे, या साड़ी पर पशु-पक्षी,आदि जीव प्रिंट होने पर यदि हम उसे काटते है तो पापकर्म बंध होता है! यह भी अजीवा- धिकरण आस्रव है!चीनी के खिलौने पशु आकर बनवाकर खाना भी निर्वर्तना अजीव अधिकरण आस्रव है!
निक्षेप=पुद्गल वस्तुओं के रखने से पाप/पुण्य कैसे होता है-
१-अप्रत्यवेक्षित निक्षेप-बिना देखे शोधे वस्तु रखना
२-दु:प्रमृष निक्षेप-ढंग से देखे बिना वस्तु रख देना
३-सहसा निक्षेप-सहसा वस्तु रख देना-बिना स्थान को शोधे सहसा रख देना !
४-अनाभोग निक्षेप-यथायोग्य स्थान पर वस्तु न रखना!जैसे शास्त्र जी को स्वाध्याय के समय चौकी पर नहीं रखना,उसके बाद यथास्थान बिना,देखे शोधे नहीं स्थापित करना !
इन चारो क्रियाओं से पापकर्म बंध होता है चाहे कोई जीव मरे या न मरे क्योकि भाव से हमने जीव रक्षा का प्रयास नहीं करा है!यह पाप बंध अजीव के आश्रय से होने वाला कहलायेगा!
संयोग- के दो भेद
भक्तपान संयोग-दाल में राई और नमक का छौक लगाने से/दही और गुड को मिलाने से,जीव उत्पत्ति हो जाती है!सचित्त को अचित्त आहार पानी में मिलाना भक्तपान संयोग है!
उपकरण संयोग-ठन्डे उपकरण को गर्म उपकरण में एवं एक साधु के पिच्छी कमंडल दूसरे साधु के पिच्छी कमंडल से मिला देना,आदि उपकरण संयोग है
निसग:-प्रवृत्ति अथवा क्रिया के तीन भेद है !
१- मन[b]निसग:-[/b]मन की प्रवृत्ति दुष्टता पूर्वक करना !
२-वचन[b]निसग: वचन की प्रवृत्ति [/b]दुष्टता पूर्व करना
३- काय[b]निसग: -काय की प्रवृति दुष्टता पूर्व करना ![/b]
मन, वचन, काय पौदगलिक है इनकी प्रवृत्ति के कारण आत्मा के जो परिणाम होते है उनमे अजीव अधिकरण आस्रव होता है!११ प्रकार के अजीव अधिकरण के आश्रय से होने वाले पापों के आस्रव से हमें बचना चाहिए!१०८ जीव के परिणामों के आधार से और ११ प्रकार के अजीव के आधार से होने वाले आस्रव से बचने के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहना चाहिए!अष्टकर्मों के अस्राव के कारण -इनसे हमें सावधान रहना चाहिए !
तत्प्रदोषनिह्नवमात्सर्यान्तरायासादनोपघाताज्ञानदर्शनावरणयो:!!१०!!
संधि विच्छेद- तत्+प्रदोष+निह्नव+मात्सर्य+अन्तराय+आसादन:+उपघात:+ज्ञानावरणयो:+दर्शनावरणयो:
शब्दार्थ- तत्=वह(आस्रव);प्रदोष,निह्नव,मात्सर्य,अन्तराय,आसादन और उपघात से ज्ञानावरण और दर्शनावरणयो-दर्शनावरण (कर्मों) का होता है!
भावार्थ-वह आस्रव;प्रदोष,निह्नव,मात्सर्य,अन्तराय,आसादन और उपघात,ज्ञानावरण के सम्बन्ध में होने से ज्ञानावरण और दर्शनावरण के सम्बन्ध में होने से दर्शनावरण कर्मों का होता है!
प्रदोष=मन को किसी के द्वारा बताई गयी,सच्चे ज्ञान की बात नही सुहाना,प्रदोष है!किसी के सत्य अच्छे प्रवचन सुनकर प्रसन्न नहीं होना!
निह्नव=ज्ञान होने पर भी अन्यों को ज्ञान नही देना,कोई के द्वारा आपसे आपके ज्ञान का स्रोत्र पूछने पर उसको,गुरु-शास्त्र के नाम,जिनसे ज्ञान अर्जित किया है,को नही बताना और कहना मैंने तो ज्ञान स्वयं अर्जित किया है,किसी ने नहीं बताया आदि,निह्नव है!
मात्सर्य=किसी योग्य पात्र को,ईर्षा भाव से अपना ज्ञान भय वशीभूत, नहीं देना कि वह मेरे से अधिक ज्ञानी न हो जाए,मात्सर्य है
अन्तराय=किसी के ज्ञान के साधनों में विघ्न डालना,जैसे उसकी पुस्तक छुपाना/जलाना/पाठशालाओं को,स्वाध्याय की परम्परा को,धार्मिक शिवरों को बंद करवाने का प्रयास करना/धार्मिक कार्यों में विघ्न डालना,अन्तराय है!
आसादन=सम्यग्ज्ञान को प्रकाशित करने से बाधित करना अथवा उसका अनादर करना,आसादन है!
उपघात= प्रशस्त ज्ञान में दोष लगाना/सम्यग्ज्ञान को अज्ञान बताकर,ज्ञान में दोष लगाना उपघात है!
ये छ: ज्ञानावरण कर्म के बंध के कारण है
ज्ञानावरणीय कर्म के आस्रव के अन्य कारण-
१-अपने आचार्य,उपाध्याय की आज्ञानुसार नहीं चलना,२-प्रकाशन में अर्थ का अनर्थ कर देना,भावार्थ अपनी इच्छानुसार अपने मत की पुष्टि हेतु बदल कर अभिप्राय को दूषित कर देना,!३-शुद्ध उच्चारण नहीं करना!४-ज्ञान के अध्ययन/अर्जन में आलस्य करना!५-आचार्य श्री के प्रवचन में बैठ कर आपस में बाते करना! ६-धन कमाने के उद्देश्य से ज्ञान देना! ७-शास्त्रों के विक्रय से आजीविका अर्जित करना! ८-जिनवाणी की ऒर पैर रखकर सोना तथा उन्हें यथायोग्य स्थान पर आदर सम्मान के साथ विराज मान नहीं करना!जैसे;अलमारी में सबसे नीचे के तख्ते पर विराजमान करना!९-अकाल में स्वाध्याय करना,जैसे महाराज श्री के प्रवचन के समय स्वाध्याय करना!सामायिक के काल में स्वाध्याय करना!
सूत्र के अंत में, ‘ज्ञान दर्शनावरणयो’ से तात्पर्य है की ये सब ज्ञान के सम्बन्ध में किये जाये तो ज्ञानावरणीय कर्म का और यदि दर्शन के सम्बन्ध में किये जाए तो दर्शानावरणीय कर्म का आस्रव होता है!
दर्शन के सन्दर्भ में-
प्रदोष-कोई व्यक्ति आचार्यश्री के दर्शन करने के बाद आकर वर्णन कर रहा है कि मैं ऐसे दर्शन करके आया,तो प्रसन्न न होना,प्रदोष है!
निह्नव- किसी के आपसे पूछने पर कि आचार्य श्री कहाँ है,उसे नहीं बताना,आचार्यश्री के दर्शन में विघ्न डालना,निह्नव है! !
मात्सर्य- इस भाव से नहीं बताना की वे कहाँ है,कि यदि ये वह भी वहाँ जाने लगे तो हमें कौन पूछेगा,इस शहर में तो आचार्यश्री हमें ही जानते है,यह मात्सर्य है!
अन्तराय-कोई आचार्य श्री के दर्शन के लिए दसलक्षण पर्व में जाना चाहते है,उन्हें यह कह कर रोकना की इस समय वहाँ बहुत भीड़ होगी क्या करोगे वहाँ जाकर,अन्तराय है!
आसादन-दर्शन के प्रति अनादर भाव रखना,क्या करोगे दर्शन करके व्यर्थ है,दर्शन करना,यह आसादन है
उपघात-आचार्यश्री के दर्शन से उन्हें बिलकुल रोक देना उपघात है !
दर्शनावरणीय कर्म के आस्रव के अन्य कारण –
१-अपनी दृष्टि क्षमता पर गर्व करना! जैसे मेरे से अधिक दूर तक कोई नहीं देख सकता,
२-दिन में सोने से तीव्र दर्शनावरणीय का बंध होने पर संभवत अगले भव में चक्षु इन्द्रिय मिले ही नहीं!शास्त्रों में दिन में सोने की आज्ञा नहीं है,
३-मुनियों के देख कर उनसे घृणा आदि करना,
४-गलत श्रुत को आँखों से देख,पढ़ कर परिणामों को दूषित करना,ये सब दर्शनावरणीय कर्म के आस्रव /बंध के कारण है!
इस सूत्र से, हमें ज्ञानावरणीय और दर्शनावरणीय कर्मों के अस्राव के कारणों को समझ/जान कर उनसे बचने का प्रयास करना चाहिए!आज तक हमने ज्ञान और दर्शन के सम्बन्ध में जो दोष या विघ्न डाले है,उनके लिए प्रायश्चित लेना चाहिए और संकल्प लेना चाहिए की भविष्य में सच्चे ज्ञान और दर्शन के प्रचार-प्रसार में कोई विघ्न नहीं डालेंगे! ऐसा करने से ज्ञानावरणीय और दर्शनावरणीय कर्मों का क्षयोपशम होगा! इन कारणों से बचने से हमारे इन दोनों कर्मो का आस्रव नहीं होगा जिससे ज्ञान दर्शन में वृद्धि होगी!
विशेष- यद्यपि आयुकर्म के अतिरिक्त सातों कर्मों का आस्रव प्रतिसमय होता है तथापि प्रदोष,निह्नव आदि भावों के द्वारा जो ज्ञानावरणीय और दर्शावरणीय कर्मों का विशेष आस्रव/बंध होता है वह स्थिति और अनुभागबंध की अपेक्षा होता है,अर्थात प्रदेश/प्रकृति बंध तो सभी कर्मों का होता है किन्तु स्थिति/अनुभागबंध ज्ञाना[b]वरणीय और दर्शनावरणीय का अधिक होता है![/b]
असातावेदनीय कर्मों के आस्रव के कारण
दु:खशोकतापाक्रंदनवधपरिदेवनान्यात्मपरोभयास्थानान्यसद्वेद्यस्य११
संधिविच्छेद:-दु:ख+शोक+ताप+आक्रंदन+वध+परिदेवनानि+आत्म+पर+उभय+स्थानानि+असद्वेद्यस्य
शब्दार्थ-दु:ख-चित्त में कष्ट का अनुभव करना,पीड़ा रूप परिणाम दु:ख है,
शोक-किसी इष्ट वस्तु के वियोग होने पर दु:खी होना शोक है! मकान के गिर जाने पर दुखी होना, पुत्र/पिता की मृत्यु पर दुखी होना!
ताप-समाज में अपनी निंदादि होने पर पश्चाताप,संताप के भाव होना! जैसे बेटी का विवाह करने के पश्चात उसके दुखी रहने पर पश्चाताप करना,
आक्रंदन-जोर जोर से रोना,
वध-किसी के इंद्रीय, बल आयु,श्वासोछावास आदि प्राणों का वियोग कर देना! जैसे किसी को जान से मार देना,
परिदेवन-इस प्रकार रोना कि सामने वाला भी रोने लगे,
आत्म-अपने को,पर-दूसरों को उभय=अपने और दुसरे दोनों को,स्थानानि-करना, असद्वेद्यस्य=असाता वेदनीय कर्म के आस्रव है
भावार्थ-स्वयं,दूसरे,अथवा दोनों को इन ६;दु:ख,शोक,ताप,आक्रंदन,वध और परिदेवन करने से असाता वेदनीय कर्म के आस्रव के कारण है!स्वयं दुखी,शोकित आदि होना,दूसरे को दुखी-शोकित आदि करने अथवा दोनों स्वयं और दूसरों को दुखी-शोकित आदि करने से असाता वेदनीय कर्म का आस्रव होता है!
असाता वेदनीय कर्मों के आस्रव के अन्य कारण-
१-दूसरों की निंदा करना,
२-पाप से अजीविका अर्जित करना,
३-सप्त व्यसन का सेवन करना!,
४-तीव्र कषाय रूप परिणाम होना,
५-परिग्रहों में अत्यंत आसक्त होना,
६-अपने सेवकों को समय पर वेतन न देकर,
७-पशुओं को चाबुक-कोड़े मारना,
८-किसी जीव को समय से भोजन आदि नहीं देना!
९-झूठ बोलना,कुशील,अभद्र वचन बोलना,मायाचारी रूप प्रवृत्ति आदि!
सारांशत: समस्त पाप रूप कार्यों से असाता वेदनीय कर्म का आस्रव होता है! इनसे हमें बचना चाहिए!
शंका -किसी के शोक करने पर असाता का आस्रव होता है,किन्तु किसी के वियोग होने पर रोना तो आता ही है तो क्या रोये नहीं ?
समाधान-हमें रोना नहीं चाहिए क्योकि रोने से जाने वाला वापिस आएगा नहीं! बल्कि रोने से आगे कर्मों का बंध और होगा जो कि भविष्य में दुःख का कारण होगा!हमें विचार करना चाहिए की जाने वाले की हमने सेवा खूब करी,इनका आयुकर्म इतना ही था,इतना ही हमारा साथ था,इसे हम बढ़ा नहीं सकते।इस प्रकार विचार करने से रोने पर नियंत्रण किया जा सकता है!
शंका-मुनिराज को केशलोंच करते हुए दुःख होता होगा,क्या उन्हें असातावेदनीय का आस्रव होता होगा?
समाधान-केश लोंच के समय मुनि महाराज को कष्ट महसूस नहीं होता,किसी दिन आहार नही मिलने पर भी वो विचार करते है,आज तो परिषयजय का मौका मिला है,कर्मों की इससे निर्जरा होगी!
साता वेदनीय(सुख देने वाले) कर्मो के आस्रव के कारण-
भूतव्रत्यनुकम्पादानसरागसंयमादियोगक्षांतिःशौचमितिसद्वेद्यस्य-१२
संधि विच्छेद -भूत+अनुकम्पा+व्रत्य+दान+सरागसंयम+आदि+योगः+क्षांतिः+शौचम्+इति+सद्वेद्यस्य
शब्दार्थ-भूत-(जीवमात्र) पर,अनुकम्पा-दया करना,व्रत्यदान-व्रतियो को दान देना,सरागसंयमादि-सराग संयम,-संयमासंयम,आदि(अकामनिर्जरा और बालतप) का भली प्रकार पालन करना,योगः-मन,वचन,काय की वृत्ति को त्यागना,क्षांतिः-कषायो की मंदता रखना,शौचम्-लोभ वृत्ति को त्यागना,इति-तथा अन्य शुभ कार्य,सद्वेद्यस्य-सातावेदनीय के आस्रव है।
भावार्थ-भूत अनुकम्पा-जीव मात्र पर दया करते हुए उनके दुःखो को दूर करने के परिणाम होना, तथा उनके निवारण हेतु प्रयासरत रहना,व्रत्यदान-व्रतियो को दान देना,कोई व्रती नगर मे आये तो स्वयं के लिए शुद्ध आहार बनाकर,पहले उन्हे शुद्ध आहारदान कर,स्वयं ग्रहण करना!भाव होना चाहिए कि मैंने यह आहार अपने लिए बनाया है,मेरे पुण्योदय से महाराज के स्वयं पधारने पर उन्हें आहार दूंगा!
मुनि महाराज के निमित्त का आहार कभी नही बनाया जाता है अन्यथा आहार सदोष होता है! उनके ठहरने के लिए स्थान,स्वाध्याय के लिए शास्त्रजी,पिच्छि-कमंडल की व्यवस्था करना।
दान-अपना द्रव्य दान मे,अपने व पर के कल्याण के लिए दिया जाता है।
नोट कुछ टीकाकारों ने,इस सूत्र के व्याख्या करते हुए कहा है भूत-प्राणी मात्र व्रती-‘व्रतियों पर अनुकम्पा- दया और दान करना अर्थात उनके आहारादी,वैय्यावृत्ति की व्यवस्था आदि करना’-आचार्य श्री विद्या सागर जी एवं पंडित रतनलाल बैनाडा जी के अनुसार उचित नहीं प्रतीत होता क्योकि क्या हम व्रतीयों पर दया कर उनके लिए आहार बनायेगे या वैयावृत्ति करेंगे?इस अपेक्षा से इसकी व्याख्या,”प्राणी मात्र पर अनुकम्पा -दया और व्रतियों को दान देना”,होनी चाहिए.जो की ठीक प्रतीत होती है,!सरागसंयम-मुनि अवस्था धारण करना,संयमासंयम-व्रती,पहली प्रतिमा धारी से ११वी प्रतिमाधारी तक क्षुल्लक,ऐल्लक,आर्यिका बनना,अकाम निर्जरा-अचानक कष्ट आने से उसे शांत परिणामों के साथ सहना।जैसे खड़े-खड़े यात्रा करने पर कष्ट को सहजता से सहना। महिलाओं को अकाम निर्जर के प्रसंग बहुत आते है जैसे; परिवार के सभी सदस्यों को अपने से पहले भोजन कराने के बाद, अंत में, अपनी मन पसंद की वस्तु समाप्त हो गयी तो, यह उन्हें सहना पड़ता है,यदि वे इसे सहजता से,शांत परिणाम के साथ सहेगी तो अकाम निर्जर होगी!सत्याग्रह आदि के आन्दोलन में मान लीजिये कारागार जाना पड़े तो,कारावास सहजता से सहना,अकाम निर्जर है! बालतप-अन्य मति द्वारा अज्ञानता पूर्वक (जैन मत की अपेक्षा) किया गया तप,बालतप कहलाता है।वह भी कषायो की मंदता के कारण सातावेदनीय कर्म के आस्रव का कारण है।क्षांतिः-क्रोध,मान,माया,लोभ से दूर रहना। कषायो की मंदता रखना।क्रोध आदि के प्रसंगों में भी क्रोध नहीं करना, बहुत धन,संपत्ति,वैभव की प्राप्ति पर घमंड नहीं करना, कैसा ही प्रसंग आ जाये स्पष्ट बोलना,मायाचारी नहीं करना!शौचम्-अपनी आमदनी का आगमानुसार,निश्चित भाग बिना मांगे दान मे देना,लोभ वृत्ति को त्यागना,इति-तथा अन्य शुभ कार्य,जैसे जिनेन्द्र भगवान की पूजा,भक्ति,स्तवन,आरती करना,स्वयं स्वाध्याय करना, अन्यों को कराना,तपश्चरण,एकासन उपवास करना,किसी रस का त्याग कर भोजन लेना,गरीबो पर दया करना,उन मे कम्बलादि का वितरण करना,उनकी पढ़ाई के लिए छात्रवृति देना,उनकी बिमारी के लिये औषधि,औषधालय,डाक्टर आदि का प्रबंध करने से भी सातावेदनीय कर्म का आस्रव होता है।
दर्शन मोहनीय (संसार भ्रमण मे प्रबलत्तम) कर्मो के आस्रव के कारण-
केवलीश्रुतसंघधर्मदेवावर्णवादो दर्शनमोहस्य १३
संधि-विच्छेद-केवली+श्रुत+संघ+धर्म+देव+अवर्णवादो+दर्शनमोहस्य
शब्दार्थ -केवलीअवर्णवादो -केवली भगवान् मे अविद्यमान दोषारोपण करना।जैसे केवली वस्त्र धारण करते है या वे कवलाहार लेते है।ऐसा कहना केवली अवर्णवाद है।ऐसा कहने वालो के महान दर्शनमोह नीय कर्मो का आस्रव होगा,श्रुत अवर्णवादो-भगवान द्वारा दिया गया उपदेश के अनुसार रचे गये शास्त्र और उनकी परम्परा से लिखी गई वर्तमान जिनवाणी मे दोषारोपण करना,जैसे कहना कि आलू मॆ सूक्ष्म जीव पाये जाते है अतः उसके सेवन मे दोष नही है,मांस सेवन मे दोष नही है ऐसा जिन वाणी मे लिखा है आदि कहना श्रुत अवर्णवाद है।श्रुत मे तो त्रस/स्थावर जीवो की हिंसा का पूर्णतया निषेध है।संघअवर्णवादो-चार प्रकार का ऋषि,यति,मुनि,अंगार या मुनि,आर्यिका श्रावक,श्राविका आदि मे गल्त दोष लगाना।मुनियो पर दोष लगाना कि ये मलिन है,मंजन,स्नान नही करते,य़े निर्लज है,नग्न रहते है।नग्नता उनकी काम वासना पर तथा शीत और उष्णता की बाधा पर विजय का प्रमाण पत्र है,ये उनके ख्याति के प्रसंग है,किंतु उन पर इस प्रकार दोषारोपण करना संघावर्णवाद है;जो दर्शन मोहनीय के आस्रव का कारण है,धर्मावर्णवादो-भगवान् द्वारा प्रणीत जिनधर्म मे गल्त दोष लगाना, जैसे कहना जिनधर्म हमे अहिंसावादि होने के कारण कायर बनाते है चिंटी को न मारो। ये धर्मावर्णवाद है;दर्शनमोहनीय के आस्रव का कारण है।ऐसे निन्दा करने वाले जीव अधोगति पाते है। देवअवर्णवादो-जो दोष देवो मे नही है वह उनमे गल्त दोष लगा देना। जैसे कहना कि देव मांस भक्ष्ण,मदिरा सेवन,सारे निंदनीय कार्य भी करते है ऐसा कहना देवो का अवर्णवादो है।यह दर्शन मोहनीय कर्म के आस्रव का कारण है.अवर्णवादो-जो दोष उनमे नही है वह उनमे लगा देना। दर्शनमोहस्य -दर्शनमोहनीय कर्म के आस्रव के कारण है।
भावार्थ-दर्शन मोहनीय का अर्थ मिथ्यात्व है।केवली,श्रुत,संघ,धर्म और देवों मे जो दोष नही है उनका दोषारोपण करने से अन्नतकाल तक संसार मे भ्रमण कराने वाले घोर दर्शनमोहनीय का आस्रव होता है।अतः इनसे हमे बचना चाहिए।
शंका-यदि हम केवली,श्रुत,संघ,धर्म और देवों में दोष न लगाये,क्या तब दर्शन मोहनीय कर्म का आस्रव होगा?
समाधान- उक्त मुख्य कारण दर्शनमोहनीय कर्म के आस्रव के है, इनके अलावा अन्य बहुत से कारण भी है जैसे,1-जो रोज़ दर्शन करने मंदिर नही जाते,2-जो अन्य मतियो के देव-शास्त्र गुरू पर श्रद्धा रखते है,अपने पर नही रखते है,3-सप्त तत्वो के श्रद्धान मे दृढ़ता के अभाव मे, शिथिलता मे, सम्यक्तव के दोषो को न हटाने पर,६ अनायतनो मे लगे रहने से,८ मदो के सद्भाव मे,दर्शन मोहनीय कर्म का आस्रव होता है,4-शास्त्रो के अर्थ का अनर्थ जान बूझकर,अपने मत की पुष्टि हेतु,शास्त्रो मे हेर फेर करने वालो के,दर्शन मोहनीय कर्म का आस्रव होगा।5- सम्यक्त्व के विरोधी समस्त क्रियाओं से दर्शन मोहनीय कर्म का आस्रव होता है!आदि भी दर्शनमोहनीय कर्म के आस्रव का कारण है !
चारित्र मोहनीय कर्म के आस्रव के कारण-
कषायोदयात्तीव्रपरिणामश्चारित्रमोहस्य १४
संधिविच्छेद-कषाय+उदयात्+तीव्र+परिणामः+चारित्रमोहस्य
शब्दार्थ–कषाय-कषाय,क्रोध,मान,माया,लोभ के,उदयात्-उदय से.तीव्र-तीव्र,परिणामः-परिणामो के होने से,चारित्रमोहस्य-चारित्रमेहनीय कर्म का आस्रव होता है
भावार्थ-तीव्र क्रोध,मान,माया,लोभ या तीव्र नो कषाय रूप परिणामो के होने से चारित्र मोहनीय कर्म का आस्रव होता है।जैसे बात-बात मे क्रोधित होना!धन,सम्पत्ति,ज्ञानादि अधिक होने पर घमण्डित होने से, मायाचारी से और निरंतर तीव्र लोभवश परिग्रहो के संघ्रह मे लगे रहने से, चारित्र मोहनीय कर्म के आस्रव होता है।
चारित्र मोहनीय कर्म के आस्रव के अन्य कारण-
१-अपने को श्रेष्ठ मानकर,जो अन्यों की मजाक बनाते है,खिल्ली उड़ाते है,उनके हास्य नोकषाय कर्म का उदय/आस्रव होता है,२-जो अपने मकान, आदि को अच्छा बनाने में लगे रहते है उनके रति नो कषाय कर्म का आस्रव होता है!३-जिन्हें अन्यों के गंदे मकान,गंदे वस्त्र आदि को देखकर अच्छा नहीं लगता,घृणा करते है,उनके अरति नोकषाय का आस्रव होता है!४-रोगी,कोडी,मुनि आदि को देखकर जो घृणा करते है उनके जुगुप्सा नोकषायकर्म का आस्रव होता है!५-जिन्हें अन्य को दु:खी करने में आनंद आता है उन्हें शोक नोकषाय का आस्रव होता है!६-जो स्वयं डरते है अथवा अन्यों को डराते है उन्हें भय नोकषायकर्म का आस्रव होता है!७-जो पुरुषों में वासना रूप परिणाम रखते है उनके स्त्री वेद नो कषाय कर्म का आस्रव होता है!८-जो स्त्री में वासना रूप परिणाम रखते है उनके पुरुषवेद नो कषाय कर्म का आस्रव होता है!९-जो स्त्री और पुरुषों दोनों में वासना रूप परिणाम रखते है उनके नपुंसक नोकषायकर्म का आस्रव होता है!
ये समस्त कषाय और नो कषाय के आस्रव आत्मा को पतित करने वाले है,अत: हमें इनकी तीव्रता से बचना चाहिए जिससे चरित्र मोहनीय के आस्रव से हम बच सके!
क्या मंद कषाय होने से चारित्र मोहनीय का आस्रव नहीं होगा ?
यहाँ आस्रव के प्रमुख्य कारणों की चर्चा है, चारित्र मोहनीय कर्म का उत्कृष्ट आस्रव कषायों के तीव्र उदय के कारण होता है!चारित्र मोहनीयकर्म का उत्कृष्ट आस्रव कषायों के तीव्र उदय के कारण होता है!आस्रव के अनेक कारण होते है!मंदकषाय के उदय में भी,४ थे से १०वे गुणस्थानों तक चारित्र मोहनीय कर्म का आस्रव/उदय तो होता ही है!किन्तु यहाँ तीव्र आस्रव की चर्चा करी है!
किस कर्म के उदय से स्त्री पर्याय मिलती है ?
1-जो दुसरे के दोषों को देखने में निरंतर लगे रहते है2-जो स्त्री पर्याय मिलने पर निरंतर श्रृंगार में लगी रहते है,अपनी स्त्री पर्याय में संतुष्ट रहती है,3-मायाचारी जिनमे विशेष रूप से पायी जाती है, उनके स्त्रीवेद का आस्रव होता है!
इससे बचने के लिए विचार करना चाहिए की स्त्री पर्याय बड़ी निंदनीय है क्योकि अनेकों अशुद्धि के प्रकरण स्त्री पर्याय में आते है,यह कितनी पराधीन पर्याय है,मैंने पूर्व जन्म में कैसे पाप कर्म किये होंगे जो मुझे स्त्री पर्याय प्राप्त हुई!इस प्रकार निरंतर स्त्री पर्याय की निंदा सहित उसमे प्रवृत रहना पुरुषवेद के आस्रव का कारण है!
अल्पारम्भपरिग्रह्त्वं मानुषस्य १७
संधिविच्छेद-अल्पारम्भ+अल्पपरिग्रह्त्वं+मानुषस्य
शब्दार्थ-अल्प आरम्भ=अल्प आरम्भ, अल्पपरिग्रह्त्वं= अल्प परिग्रह्त्व,मानुषस्य=मनुष्यायु के आस्रव के कारण है!
अर्थ-अल्पारम्भ और अल्पपरिग्रहत्व से मनुष्यायु का आस्रव होता है !
भावार्थ-अल्प आरम्भ; हिंसात्मक कार्य नहीं/कम करना,यदि हो भी रहे हो तो,निरंतर उन्हें कम करने के चिंतवन में लगे रहना,अल्पपरिग्रह्त्व-अर्थात परिग्रहों की अत्यंत वांछा नहीं रखना, कम से कम परिग्रह में संतुष्ट रहना!अल्पआरंभी और अल्पपरिग्रही होने से मनुष्यायु का आस्र व होता है! मनुष्यायु के इन आस्रव के प्रमुख कारणों के अतिरिक्त निम्न कारण भी है !
सरल व्यवहार/प्रवृत्ति,भद्र प्रकृत्ति होना ,कषायों की मंदता,पंचेंद्रिय विषयों में अरूचि,असंक्ले षित भाव से मरण होना, मनुष्यायु के आस्रव के कारण है!
शंका-मनुष्य और तिर्यंच गति में चारों आयु का आस्रव होता है,क्या देवगति और नरक गति में भी चारों आयु का आस्रव होता है ?
समाधान-मनुष्य और तिर्यंच में जीव चारों गतियों का अस्राव करते है किन्तु देव और नारकी मात्र मनुष्यायु या तिर्यंचायु का ही आस्रव करते है!
मनुष्यायु के आस्रव के अन्य कारण –
स्वभावमार्दवं च १८
संधि विच्छेद:-स्वभाव+मार्दवं+च
शब्दार्थ-स्वभाव-परिणामों की,मार्दव-कोमलता/सरलता से भी मनुष्यायु का आस्रव होता है!
अर्थ- मृदु/सरल स्वभावी/परिणामी होने से भी मनुष्यायु का आस्रव होता है !
भावार्थ-इस सूत्र को अलग से लिखने का कारण है कि, स्वभाव की सरलता भी मनुष्यायु के आस्रव का कारण तो है ही वह देवायु के आस्रव का भी कारण है!
चारों आयु के आस्रव के कारण-!
निःशीलव्रतत्वंचसर्वेषाम् !!१९!!
संधिविच्छेद:-निः(शील+व्रतत्वं)+च+सर्वेषाम्
शब्दार्थ:-निःशील-शीलरहित,नि:व्रतत्वं-व्रतोंरहित,च-और,सर्वेषाम्=सभी आयु के आस्रव का कारण है !
शील-तीन गुणव्रत;दिग्व्रत,देशव्रत,अनर्थदण्ड व्रत और ४ शिक्षाव्रत;सामयिक,प्रोषधोपवास, भोगोपभोग परिमाण और अतिथि संविभाग व्रत, व्रत-अणुव्रतों और महाव्रतों को व्रत कहते है!
अर्थ:- शील और व्रतों से रहित जीव चारों आयु का आस्रव करता है
भावार्थ कोई जीव शील और व्रतों से रहित है तो उसको चारों आयु में से किसी का आस्रव,उसके परिणामों के आधार पर हो सकता है!
विशेष-१ -सूत्र पृथक से इसलिए बनाया क्योकि शीलव्रतियों और अणु/महा व्रतियों के तो मात्र देवायु का ही आस्रव होता है!
२-बाल तपस्वी जीवों को भी देवायु का आस्रव होता है,यद्यपि उनके शीलव्रत और अणु/महाव्रत नहीं होते क्योकि उनके परिणामों में उनके धर्म के अनुसार सरलता होती है!
३-महात्मा गाँधी थे,उनके शील और अणु व्रत नहीं थे किन्तु परिणामों में सरलता के कारण,परिग्रह कम होने के कारण,तथा देश के लिए लड़ने के कारण,उनके स्वर्ग में देव बनना शक्य नहीं है!४-भोगभूमि के जीवों के भी शीलव्रत और अणु/महाव्रत नहीं होते,किन्तु सभी नियम से देवायु का बंध करते है!भोगभूमि में मिथ्यादृष्टि जीवों के भी देवायु का आस्रव होता है,किन्तु वे भवन्त्रिक में उत्पन्न होते है तथा सम्यगदृष्टि वैमानिक देव होकर पहले व दुसरे स्वर्गों तक उत्पन्न होते है!
देवायु के आस्रव के कारण –
सरागसंयमसंयमासंयमाकामनिर्जराबालतपांसि देवस्य २०
संधि विच्छेद-सरागसंयम+संयमासंयम+अकामनिर्जरा+बालतपांसि+देवस्य
शब्दार्थ- सरागसंयम- राग सहित संयम,छठा-सातवाँ गुणस्थानवर्ती दिगंबर मुनिराज केसारंग संयम होता है संयमासंयम-संयम असंयम,पंचम गुणस्थानवर्ती.प्रतिमाधारी श्रावक,क्षुल्लिका,क्षुल्लक,ऐलक महाराज,आर्यिका माता जी के होता है,अकामनिर्जरा-आकस्मिक कष्ट आने पर उसे सहजता से,शान्तीपूर्वक सहना अकाम निर्जरा है जिस से कषायों में मंदता होती है,लेश्या शुभ होती है,बाल तपांसि=जो तपश्चरण तो करते है,किन्तु उन्हें अभी तक सम्यक्त्व की प्राप्ति नहीं हुई या अन्य मति तपश्चर्ण करते हुए परिणामों में सरलता रखते है,उनका तप, बालतप कहलाता है!,देवस्य-देवायु का आस्रव होता है!
भावार्थ:-सरागसंयम के धारी,छठा-सातवाँ गुणस्थानवर्ती दिगंबर मुनिराज के सराग संयम होता है देवायु के आस्रव का कारण है,वीतराग संयमी मुनि देवायु का आस्रव नहीं करते है! संयम-असंयम,पंचम गुणस्थानवर्ती.प्रतिमाधारी श्रावक,क्षुल्लिका,क्षुल्लक,ऐलक महाराज,आर्यिका माता जी के होने से देवायु का आस्रव होता है! अकाम निर्जरा अर्थात आकस्मिक आये कष्टों(जैसे जेल जाना पड़े अथवा यात्रा करते हुए खड़े खड़े हुए कष्टों) को शान्तिपूर्वक सहने से कषायों की मंदता और शुभ लेश्या होती है ,इसलिए अकाम निर्जरा भी देवायु के आस्रव का कारण है!बाल तप ,जो की सम्यक्त्व के अभाव में अन्य मटियों के द्वारा किये जाते है वे भी देवायु के आस्रव के कारण है क्योकि वे अपने धर्म की निष्ठांपूर्वक पालन कर रहे होते है जिससे उनके परिणामों में सरलता होती है !
शंका-सूत्र में बताये गए सभी सराग संयम,संयमसंयम देवायु के आस्रव के कारण है ?
समाधान-नहीं किन्तु ,सम्यक्त्व के अभाव में सारंग संयम और संयमासंयम नहीं होते,और सम्यक्त्व वैमानिक देवों के आस्रव का कारण है ,इसलिए सरागसँयम और संयमासंयम वैमानिक देवायु के आस्रव के कारण हुए !
सम्यक्त्वं च !!२१!!
शब्दार्थ- सम्यग्दर्शन भी देवायु के आस्रव का कारण है!
भावार्थ-यद्यपि सम्यगदर्शन को आस्रव के कारणों में नहीं लिया,किन्तु इस सूत्र के लिखने का अभि प्राय है,सम्यगदृष्टि मनुष्य,सम्यक्त्व अवस्था में आयु बंध करे तो विशेषतःवैमानिक देवायु का आस्रव ही करेगा क्योकि उसके परिणाम सरल और आचरण बहुत अच्छा रहता है,वह भवनन्त्रिक में नहीं उत्पन्न होता!यदि कोई सम्यगदृष्टि देव है,वह मात्र मनुष्यायु का आस्रव करेगा !
शंका-एक जीव, अपने जीवनकाल में, आयु कर्म का आस्रव कितनी बार और कब करता है ?
समाधान- सभी जीवों के आयुकर्म के आस्रव और बंध का काल एक ही ‘समय’ है!जीव अपनी अगले भव की आयु,आठ अपकर्ष कालों में,आयुकर्म के बंधने के लिए यथायोग्य परिणाम होने पर बांधता है! प्रथम अपकर्षकाल उसके,उस भव की बंध आयु के २/३ भाग समाप्त होने के बाद प्रथम अंतर्मूहर्त में आता है!दूसरा उसकी शेष आयु के २/३ भाग व्यतीत होने के बाद प्रथम अंतर्मूहर्त में,शेष का २/३ व्यतीत होने पर तीसरा प्रथम अंतर्मूहर्त में आएगा,इसी प्रकार ८ अपकर्ष काल आयु बंध के जीव के जीवन में आते है!उद्दाहरण के लिए;किसी जीव की उस भव की बंध आयु ८१ वर्ष की है! उसका प्रथम अपकर्ष काल,८१ का २/३ भाग अर्थात ५४ वर्ष व्यतीत होने के बाद ,५५ वर्ष की आयु के प्रथम अंत र्मूहर्त में आता है ,दूसरा अपकर्ष काल शेष आयु अर्थात (८१-५४)= २७ वर्ष का २/३ अर्थात १८ वर्ष व्यतीत होने पर अर्थात उसकी ५४+१८=७२ वर्ष की आयु व्यतीत होने के बाद ७३ वर्ष आयु के ,प्रथम अंतर्मूहर्त में आएगा! तीसरा अपकर्ष काल उसकी शेष आयु ८१-७२=९ के २/३ भाग अर्थात ६ वर्ष व्यतीत होने पर,अर्थात उसकी आयु के ७२+६ =७८ वर्ष के आयु के बाद ७९ वर्ष आयु के प्रथम अंतर्मूहर्त में आएगा!चौथा अपकर्ष काल उसकी शेष आयु ८१-७८=३ वर्ष का २/३ भाग अर्थात २ वर्ष के व्यतीत होने के बाद अर्थात उसकी ७८+२ =८० वर्ष की आयु के बाद,८१ वर्ष के प्रथम अंतर्मूहर्त में आएगा!पांचवा अपकर्ष काल शेष आयु ८१-८०=१ वर्ष के २/३=८ माह व्यतीत होने के बाद उसकी ८०+८ माह की आयु के बाद,८० वर्ष ९वे माह के प्रथम अंतर्मूहर्त में आएगा!छठा अपकर्ष काल शेष ४ माह की आयु के २/३ समय अर्थ १२० दिन के २/३ दिन ८० दिन व्यतीत होने के बाद ८० वर्ष १० माह २० दिन की आयु व्यतीत होने के बाद ८० वर्ष १० माह २१वे दिन के प्रथम अंतर्मूहर्त में आएगा! सातवाँ अपकर्ष काल शेष आयु ४० दिन के २/३ अर्थात २६ दिन १६ घंटे व्यतीत होने के बाद अर्थात ८० वर्ष ११ माह १६दिन १६ घंटे की आयु के बाद ८० वर्ष ११ माह १७वे दिन के १७वे घंटे के प्रथम अंतर्मूहर्त में आएगा!आठवा अपकर्ष काल शेष आयु अर्थात १३ दिन ८ घंटे का २/३ भाग ८ दिन २१ घंटे २० मिनट व्यतीत होने पर अर्थात ८० वर्ष ११ माह २५ दिन १३ घंटे २० मिनट आयु के प्रथम अंतर्मूहर्त में आएगा!यदि इस समय भी जीव के आयु बंध के कर्मों का आस्रव के यथा योग्य परिणाम के कारण नहीं होता,तो मरने से पूर्व आवली का संख्यातवा भाग आयु शेष रहने पर, निश्चित रूप से आयु बंध हो ही जायेगा क्योकि नियम से जीव आयुबंध के बिना वर्तमान शरीर छोड़ता नहीं है,उसे असंक्षेपाधा काल कहते है! अर्थात आवली का संख्यात्वा भाग आयु शेष रहना!
एक जीव अपने जीवन में कम से कम एक बार और अधिकतम ८ बार आयु बाँध सकता है!कोई जीव आठों अपकर्ष कालों में आयु बाँध सकता है बशर्ते की जो उसने सबसे पहले आयु बांधी है ,उसी के योग्य परिणाम होगे तो अगले अपकर्ष कालों में आयु बंध होगा अन्यथा नहीं!किसी ने पहले अपकर्ष काल में यदि देवायु बंधी है,और अगले अपकर्ष काल में उसके मनुष्य आयु के योग्य परिणाम है तो आयु बंध नहीं होगा,तीसरे अपकर्ष काल में तिर्यंचायु के योग्य परिणाम है तो बंध नहीं होगा,चौथे अपकर्ष काल में यदि देवायु के योग्य परिणाम होंगे तो बंध हो जायेगा! जिन जीवों की १/२४ सेकंड आयु होती है,उनके भी आयुबंध के आठ अपकर्ष काल आते है! देवों नारकियों की आयु उनके आयु के अंतिम ६ माह में,८ अपकर्ष काल में आकर आयु बंधती है!हमें आर्त,रौद्र ध्यान,अत्यंत आरम्भ, अत्यंत परिग्रहों,मयाचारी से से बचना चाहिए तभी तिर्यंच और नरक गति से बच सकते है!
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मुनि श्री 108 प्रणम्यसागरजी तत्वार्थ सूत्र with Animation
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण
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अजीव तत्व
इस अध्याय में आचार्यश्री ने १-१६ सूत्रों में लोक में विध्यमान ६ ही (हीनाअधिक नही ) द्रव्यों और उन के विभिन्न गुणों,१७-२२ तक उनके उपकारों और २३-४२ में पुद्गल द्रव्य के लक्षणादि का निरूपण किया है!आइये इन ४२ सूत्रों के द्वारा मुख्यत: अजीव द्रव्य को समझने का प्रयास करते है!प्रथम सूत्र में आचार्य बहु प्रदेशी (कायवान) अजीव द्रव्य के भेदो का निरूपण करते है-
इस अध्याय में हम लगभग २६०० वर्ष पूर्व भगवान महावीर द्वारा प्रतिपादित रसायन विज्ञान के रहस्यों को सूत्र २३-४२ तक समझ सकेंगे जिनको अनुसंधान द्वारा आधुनिक वैज्ञानिको ने हमारे समक्ष भगवान महावीर के निर्वाण के लगभग २५०० वर्ष बाद १८वॆ-१९वी सदी में अनुसंधान द्वारा खोज कर रखा है!
अजीवकायाधर्माधर्माकाशपुद्गला: !!१!!
संधि विच्छेद -अजीव+काया+धर्म+अधर्म+आकाश+पुद्गला:
शब्दार्थ-अजीव-चेतन रहित,काया-, कायवान(बहुप्रदेशी),धर्म,अधर्म,आकाश,पुद्गला:
अर्थ-धर्म,अधर्म,आकाश और पुद्गल चार द्रव्य;अजीव(चेतनरहित) और शरीर की भांति कायवान अर्थात बहु प्रदेशी है !
भावार्थ-
धर्म द्रव्य-जो गतिशील जीव और पुद्गलों के गमन में निष्क्रिय उत्प्रेरक की भांति सहायक/निमित्त होता है,रुके हुए पुद्गल और जीवों को गमन के लिए बाध्य नहीं करता,धर्म द्रव्य है !
अधर्म द्रव्य-जो द्रव्य स्थिर जीव और पुद्गलों के स्थिर रहने में निष्क्रिय उत्प्रेरक की भांति सहायक/निमित्त होता है,गतिशील पुद्गल और जीवों को स्थिर होने के लिए बाध्य नहीं करता,अधर्म द्रव्य है!
आकाश द्रव्य-समस्त द्रव्यों को अवकाश देने वाले द्रव्य को आकाश द्रव्य कहते है!इसके लोकाकाश-त्रिलोक मे जितने आकाश में धर्म/अधर्म द्रव्य है वह लोकाकाश कहलाता है और अलोकाकाश;-लोकाकाश से बाहर का अनन्त आकाश अलोकाकाश है ,दो भेद है !
पुद्गल द्रव्य -स्पर्श,रस,गंध और रूप (वर्ण) गुणों सहित द्रव्य को पुद्गल कहते है !
विशेष-
१-छ:द्रव्यों में से दो द्रव्यों;जीव और काल को इस सूत्र में सम्मिलित नहीं लिया क्योकि जीव द्रव्य चेतन गुण युक्त है और काल द्रव्य यद्यपि अजीव है,किन्तु एक प्रदेशी है,बहु प्रदेशी नहीं है अर्थात कायवान नहीं हैं!इस सूत्र में केवल कायवान अजीव द्रव्यों को ग्रहण किया है !
२-एक से अधिक प्रदेशी को कायवान कहते है!यद्यपि पुद्गल परमाणु एक प्रदेशी है,किन्तु वह अन्य पुद्गल परमाणु से संघात (मिल) कर स्कंध निर्मित करता है इस अपेक्षा से वह बहुप्रदेशी कहा जाता है जबकि कालाणु भी एक प्रदेशी है किन्तु वह अन्य कालाणुओं से संघात कर स्कंध नहीं बना सकता इसलिए उसे एक प्रदेशी कहा है और वह कायवान नहीं है !
३- उक्त सूत्र में इन चारों को द्रव्य नही खा है किन्तु अगले सूत्र में आचार्य स्पष्ट करते है की ये चारो द्रव्य है
द्रव्यों की गणना –
द्रव्याणि -!!२!!
संधि-विच्छेद-द्रव्य+आणि
शब्दार्थ-द्रव्य-द्रव्य ,आणि -है
अर्थ- ये चार पदार्थ धर्म,अधर्म,आकाश और पुद्गल(उक्त सूत्र से ग्रहण किये गए है)- द्रव्य है !
विशेष –
१-द्रव्य-द्रव्य का लक्षण सत (अस्तित्व) है!जो अपनी त्रिकालवर्ती पर्यायों को प्राप्त करता है या उनसे प्राप्त होता है वह द्रव्य है!जिस मे गुण पर्याय होते है वह द्रव्य है अथवा उत्पाद-ध्रौव्य व्यय युक्त पदार्थ द्रव्य है!
किसी द्रव्य में सदैव(प्रत्येक पर्याय में) विध्यमान रहने वाले धर्म को गुण कहते है!गुण द्रव्य की समस्त पर्यायों में व्याप्त रहता है!जगत में पदार्थ परिणमनशील होते हुए भी ध्रुव है इसलिए उसे द्रव्य कहते है,वह अपने पर्याय और गुण का उल्लघन कभी नहीं करता !
जीव में द्रव्यत्व –
जीवश्च !!३!!
संधि-विच्छेद -जीवा:+च
शब्दार्थ-जीवा: -जीवों के अनेक भेद ( जीवाSmile,च- भी(द्रव्य है )
अर्थ-जीव (अनेक भेदों सहित )भी द्रव्य है !
विशेष-
१-सूत्र में जीव द्रव्य के साथ बहुवचन लगाने का कारण है की इसके अनेक भेद है जैसे मुक्त-संसारी,स्थावर-त्रस, एकेन्द्रिय,पंचेन्द्रिय,संज्ञी-असंज्ञी,जीव आदि!१४ मार्गणा से भी जीव द्रव्य के अनेक भेद है !
२-सूत्र १ से ३ तक पांच द्रव्यों तथा सूत्र ३९ में काल द्रव्य सहित कुल छ द्रव्य की संख्या निश्चित करके अन्यवादियों द्वारा माने गए पृथिवी,जल,अग्नि,वायु,मन का अंतर्भाव पुद्गल द्रव्यों में ही हो जाता है क्योकि ये स्पर्श,रस ,गंध,वर्ण युक्त है !
शंका-मन वायु में रुपादिक नहीं होते,ये पुद्गल कैसे है ?
समाधान-वायु में स्पर्श होता है,जिसे हमसभी अनुभव कर सकते है!इस प्रकार वायु में रूपादि प्रमाणित हुआ !उक्त चार पुद्गल के गुणों में से कोई भी एक अनुभव करने से उस मे बाकी गुण भी अवश्य ही होते है ,हमारी इन्द्रिय उन्हें अनुभव करने में असक्षम होती है!जैसे परमाणु को हमारी चक्षु इन्द्रिय देखने में सामर्थ्यवान नहीं है किन्तु उसका अस्तित्व,उससे निर्मित उसके बड़े स्कंध को देखकर प्रमाणित हो जाता है! जल भी इसी प्रकार गंध वाला है किन्तु हमारी नासिका (घ्राणेंद्रिय)उसकी गंध को सूंघने में सक्षम नहीं है,किन्तु एक स्पर्श होने के कारण पृथ्वी के सामान है!अग्नि भी रस गंध युक्त है !
मन;भाव मन और द्रव्य मन दो प्रकार का है!उन में,भाव मन ज्ञान रूप है और ज्ञान जीवो का गुण है ,इसलिए भाव मन का अंतर्भाव जीव में हो जाता है !द्रव्य मन में रूपदिक पाये जाते है इसलिए वह पुद्गल द्रव्य की पर्याय हुई!जैसे मन रूपादिक सहित है,ज्ञानोपयोग का कारण होने से चक्षु इन्द्रिय के समान है!शब्द पौद्गलिक है, उसमे ज्ञानोपयोग कारणता है !
शंका -परमाणु के समान मन और वायु में रूपादि गुण नहीं दीखते –
समाधान-वायु और मन भी रूपादि गुण युक्त सिद्ध होते है क्योकि सब परमाणुओं में,सब रूपादि गुणवाले कार्य होने की क्षमता मानी गई है!दिशा का भी अंतर्भाव आकाश में हो जाता है क्योकि सूर्य के उदय की अपेक्षा, आकाश प्रदेश पंक्तियाँ में,यहाँ अमुक दिशा है,इस प्रकार व्यवहार की उत्पत्ति होती है !
इस प्रकार जैन दर्शनानुसार बताये गए द्रव्य छ: ही है ,हीनाधिक नहीं !
द्रव्यों की विशेषता –
नित्यावस्थितान्यरूपाणि !!४!!
संधि विच्छेद-नित्य+अवस्थिताणि+अन्यरूपाणि
शब्दार्थ-नित्य-अविनाशीहै,अवस्थिताणि-अवस्थित है;अर्थात उनकी संख्या छः ही है ,हीनाधिक नहीं, अन्यरूपाणि-अरूपी अर्थात स्पर्श,रस,गंध और रूप रहित है,अमूर्तिक है
अर्थ-सभी द्रव्य नित्य है;क्योकि अविनाशी है,अवस्थित है क्योकि इनकी संख्या छःही है हीनाधिक नहीं!समस्त जीवात्माओं की निश्चित संख्या है कभी भी हीनाधिक नहीं होती!द्रव्य अरूपी,अमूर्तिक है क्योकि इनमे रस गंध ,रूप और स्पर्श गुण नहीं है !
विशेष –
१-इस सूत्र में सामान्य से ५ द्रव्यों को अरूपी कहा है,अगले छठे सूत्र में पुद्गलद्रव्य को रुपी बताया है ,यदि यह सूत्र नही लिखते तो पुद्गल द्रव्य के भी अरूपी की अवधारणा होती !
२-प्रत्येक द्रव्य के सामान्य और विशेष दो गुण होते है!जैसे धर्म द्रव्य का विशेष गुण गतिशील पुद्गल और जीव द्रव्यों की गति में उत्प्रेरक की भांति सहायता देना है और अस्तित्व उसका सामान्य गुण है !किसी भी द्रव्य के गुण का विनाश कभी नहीं होता,उसका स्वभाव सदा ,प्रत्येक पर्याय में उसके साथ रहता है अत:सभी द्रव्य नित्य है !
पुद्गल द्रव्य रूपी है –
रूपिण:पुद्गला: !!५!!
संधि विच्छेद -रूपिण:+पुद्गला:
शब्दार्थ -रूपिण:-रूपी है,पुद्गला:-पुद्गल द्रव्य
अर्थ-पुद्गल द्रव्य रूपी है अर्थात मूर्तिक है !
विशेषार्थ-
१-इस सूत्र से यह भी स्पष्ट हो गया कि पुद्गल के अतिरिक्त अन्य पाँचों द्रव्य अरूपी अर्थात अमूर्तिक है!पुद्गल भी नित्य अवस्थित द्रव्य है अत:इनकी मात्र भी हीनाधिक नही होती है !
२-पुद्गला: बहु वचन में है जो सूचित करता है की पुद्गल द्रव्य भी है !
३-पुद्गल में रस,गंध,वर्ण (रूप),और स्पर्श चारों गुण,अभिनावी है,चारों एक साथ रहते है किन्तु दिखने में सिर्फ रूप ही आता है ,शेष गुण दीखते नहीं इसलिए पुद्गल को रुपी कहा है!जिस प्रकार जीव का दर्शन और ज्ञान गुण है किन्तु जब जीव की चर्चा करी जाती है तब ज्ञान गुण की ही चर्चा करी जाती है क्योकि दर्शन समझ नहीं आता, ज्ञान समझ में आ जाता है !
४-पुद्गल के परमाणु और स्कंध रूप अनेक भेद है !पुद्गल परमाणु से जुड़कर बड़े स्कंध भी बनाते है और उनमे से परमाणु टूटकर छोटे स्कंध भी बनते है!यह गुण अन्य द्रव्यों में विध्यमान नहीं है!जैसे दो जीवों जुड़ते नहीं, आकाश ,धर्म और अधर्म द्रव्य बड़े है किन्तु छोटों में खंडित नहीं होते!काल द्रव्य के अणु भी परस्पर जुड़ कर स्कंध नहीं बनाते !
धर्म अधर्म आकाश द्रव्यों की संख्या –
आ आकाशादेकद्रव्याणि !!६!!
संधि-विच्छेद -आ+आकाशात+एक+द्रव्याणि
शब्दार्थ-आ-पर्यन्त,आकाशात-आकाश तक ,एक-एक,द्रव्याणि -द्रव्य है !
अर्थ-सूत्र १ में आकाश तक एक -एक द्रव्य है !
भावार्थ-धर्म,अधर्म और आकाश एक एक द्रव्य है!
विशेष –
१-आकाश द्रव्य एक ही है!उसके लोकाकाश और अलोककाश दो भेद है!आकाश में जहाँ ,तक पांच द्रव्य पाये जाते है वह लोकाकाश है और शेष अलोकाकाश है!अर्थात आकाश द्रव्य एक ही है !
२-इस सूत्र में धर्म अधर्म और आकाश द्रव्य को एक एक बताने से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि अन्य द्रव्य अनेक है!जैन दर्शन के अनुसार जीव द्रव्य अनंत है,पुद्गल द्रव्य अनन्तानन्त और काल द्रव्य(अणु रूप) असंख्यात है ,क्योकि लोकाकाश के असंख्यात प्रदेशों पर एक एक कालणु स्थित रहता है !
धर्मादिक द्रव्यों की निष्क्रियता –
निष्क्रियाणि च !!७!!
संधि-विच्छेद-निष्क्रिय+आणि+ च
शब्दार्थ-निष्क्रिय-क्रिया रहित/गमन नही करते ,आणि-है, च-और
अर्थ-धर्म,अधर्म और आकाश तीनो द्रव्य क्रिया रहित है!अर्थात वे एक स्थान से दुसरे स्थान को गमन नहीं करते है !
विशेष –
१- क्रिया-एक स्थान से दूसरा स्थान प्राप्त करने को क्रिया कहते है !
२- धर्म और अधर्म द्रव्य समस्त लोकाकाश में व्याप्त है;आकाश द्रव्य समस्त लोक और अलोक में व्याप्त है, अत: अन्य क्षेत्र का अभाव होने के कारण इनमे हलन चलन रूप क्रिया नहीं होती है !
-शंका-जैनसिद्धांत के अनुसार प्रत्येक द्रव्य में प्रति समय उत्पाद और व्यय होता है किन्तु धर्मादि द्रव्यों को निष्क्रिय कहा है तो उनमे उत्पाद कैसे सम्भव है क्योकि कुम्हार मिटटी को चाक पर रखकर जब घुमाता है तभी घड़े की उत्पत्ति होती है अत:बिना क्रिया के उत्पाद असम्भव है और उत्पाद नहीं होगा तो व्यय भी नहीं होगा ?
समाधान-धर्मादिक द्रव्यों में क्रियापूर्वक उत्पाद नहीं होता!उत्पाद स्वनिमित्तिक और परनिमित्तिक दो प्रकार का होता है!जैनागम के अनुसार प्रत्येक द्रव्य में अगुरुलघु नामक अनंतगुण विध्यमान है !उन गुणों में षटगुण हानि-वृद्धि सैदव होती रहती है जिसके निमित्त से द्रव्यों में स्वभावत: उत्पाद,व्यय होता है!यह स्व नैमित्तिक उत्पाद व्यय है!धर्मादि द्रव्य प्रति समय अश्व आदि अनेक जीवों और अन्य पुद्गल के गमन में , स्थिति में और अवकाश दान में निमित्त होते है,प्रति समय गति,स्थिति आदि में परिवर्तन होता है जिसके निमित्त से धर्मादि द्रव्यों में परिवर्तन होना स्वाभाविक है यह पर नैमित्तिक उत्पाद व्यय है !
शंका -धर्मादि द्रव्य स्वयं तो चलते नहीं फिर अन्य जीवों और पुद्गलों को चलने में कैसे सहायक हो सकते है !क्योकि जल गतिमान होता है तभी मछली के गमन में सहायक होता है ?
समाधान-जैसे चक्षु ,रूप देखने में, केवल जब हम देखना चाहते है तभी दिखाते है,किसी अन्य दिशा में हमारा उपयोग हो तब चक्षु, रूप को देखने लिए आग्रह नहीं करते !इसी प्रकार धर्म और अधर्म द्रव्य क्रमश: गमन और स्थिरता में उदासीन निमित्त है
धर्म ,अधर्म और एक जीव द्रव्य के प्रदेश –
असंख्येया:प्रदेशाधर्माधर्मैकजीवानाम् !!८!!
संधि-विच्छेद-असंख्येया:+प्रदेशा+ धर्म+अधर्म ,एक+जीवानाम्
शब्दार्थ -असंख्येया:-असंख्यात,प्रदेशा-प्रदेश , धर्म-धर्म, अधर्म -अधर्म ,एक जीवा+नाम् -द्रव्य के है
अर्थ- धर्म,अधर्म और ‘एक जीव’ द्रव्य के असंख्यात प्रदेश होते है !
विशेष-
१-प्रदेश-अविभागी पुद्गल के सूक्ष्मत अंश;एक परमाणु,द्वारा घेरे गए आकाश के क्षेत्र को प्रदेश कहते है !स्थान (unit of space) की इकाई प्रदेश है !
२- सब जीवों के अनन्तान्त प्रदेश होते है इसलिए सूत्र में ‘एक जीव’ ग्रहण किया गया है !
३- प्रत्येक जीवात्मा असंख्यात प्रदेशी होती है अर्थात प्रत्येक जीव आत्मा लोकप्रमाण विशाल होती है!जीवात्मा के प्रदेश असंख्यात ही होते है किन्तु उनमे संकुचित/विस्तारित होने की शक्ति होती है!इसीलिए केवली भगवान के आत्म प्रदेश समुद्घात के समय सम्पूर्ण लोकप्रमाण प्रदेशों में फ़ैल जाते है!
समुद्घात के समय केवली जीव के मध्य के आठ प्रदेश मेरु के नीचे चित्रा पृथ्वी के वज्रमय पटल के मध्य में स्थित हो जाते है और शेष समस्त प्रदेश ऊपर,नीचे,तिर्यक,समस्त लोक में व्याप्त हो जाते है!इसी संकोच विस्तार गुण के कारण एक जीव(अशुद्धावस्था में)को,नाम कर्म केअनुसार,जैसा छोटा बड़ा शरीर मिलता है उसके अनुसार प्रदेश फ़ैल जाते है!जैसे निगोदिया/चींटी आदि जैसे सूक्ष्म शरीर को और स्वयंभूरमण समुद्र में उत्पन्न होने वाले,मत्स्य(मगर) जैसे विशाल शरीर धारण कर पाती है !
४- एक धर्म और एक अधर्म द्रव्य सम्पूर्ण लोकाकाश के प्रदेशों में व्याप्त है इसलिए दोनों असंख्यात प्रदेशी है !
आकाश के प्रदेश –
आकाशस्यान्नता: !!९!!
संधिविच्छेद -आकाशस्य+अन्नता:
शब्दार्थ- आकाशस्य-आकाश द्रव्य के,अ न्नता:-अनन्त प्रदेश है !
अर्थ-आकाश द्रव्य के अनन्त प्रदेश है !
विशेष-लोकाकाश के असंख्यात ही प्रदेश है !
पद्गल द्रव्य के प्रदेश-
संख्येयाऽसंख्येयाश्चपुद्गलानाम !!१०!!
संधि विच्छेद -संख्येय+असंख्येया:+च +पुद्गलानाम
शब्दार्थ-संख्येय-संख्यात,असंख्येया:-असंख्यात ,च -और अर्थात अनन्त ,पुद्गलानाम -पुद्गल द्रव्य के प्रदेश है
अर्थ- पुद्गल द्रव्य के संख्यात,असंख्यात और अन्नत प्रदेश होते है !
विशेष-
१- शुद्ध पुद्गल द्रव्य;- एक अविभागी परमाणु तो एक प्रदेशी ही है(सूत्र १० )!किन्तु दो परमाणुओं में भेद और संघात (मिलने और बिच्छुड़ने)की शक्ति द्वारा स्कंध निर्मित करते है !सूक्ष्मत:स्कंध दो (संख्यात प्रदेशी) परमाणुओं के संघात से बनता है जबकि अन्य स्कंध २,३,४,अथवा संख्यात,असंख्यात और अनांत परमाणुओं के संघात से बनते है अत: पुद्गल द्रव्य क्रमश संख्यात ,असंख्यात और अनन्त प्रदेशी होता है !
२-संख्यात-मति व श्रुत ज्ञान द्वारा जीव जहाँ तक जान सकते है वह संख्या संख्यात है!अवधिज्ञानी और मन: पर्ययज्ञानी जहाँ तक जानते है वह संख्या असंख्यात है!केवली भगवान जहाँ तक जानते है उसे अनन्त कहते है !संख्या की इकाई अचल अर्थात ८४ की घात ३१ x १० की घात ८० तक की संख्या,संख्यात है ,इससे १ अधिक होने पर असंख्यात हो जाती है!(सदर्भ -आदिनाथपुराण-पृष्ठ ६५ )
३- यद्यपि शुद्ध परमाणु एक प्रदेशी है,किन्तु उसमें अवगाहनना गुण होने के कारण,अनन्त परमाणु को उसमे समाने की क्षमता होती है,इसीलिए उस परमाणु के एक प्रदेश में अन्नंत परमाणु को स्थान देने की क्षमता है!यह प्रत्येक द्रव्य में विध्यमान अवगाहनना गुण के कारण होती है!इसी अवगाहनना गुण के कारण असंख्यात प्रदेशी लोकाकाश में अनन्त जीव और पुद्गल समाये हुए है !
इस को एक दृष्टांत से समझा जा सकता है-
एक कमरे में एक मोमबती का प्रकाश फ़ैल जाता है!उसी कमरे में २,५०,१०० आदि अनेक मोमबत्तियों का प्रकाश भी फ़ैल जाता है!यह पुद्गल प्रकाश में दुसरे पौद्गलिक प्रकाश को स्थान देने (अवगाहना) की क्षमता के कारण होता है!पुद्गल परमाणु सूक्ष्मत: होने के कारण अपने प्रदेश में अन्नत परमाणुओं को समाने के लिए स्थान दे देता है !
जैन दर्शन में सूक्ष्मत्व-जैनदर्शन में सूक्ष्मता का अर्थ कल्पना से भी दूर है!एक आलू के सुई के नोक से भी छोटे कण में अनन्तानन्त आत्माए वास करती है !वे आत्माए कितनी है? आज तक सिद्ध हो चुकी आत्माओं से अनंत गुणी जीवात्माये, आलू के कण में हैं !सूक्ष्म परिणमन होने के कारण एक के अंदर एक विराजमान है!उनमे जो अनन्तानन्त आत्माए विराजमान है,प्रत्येक के साथ अनन्तानन्त कार्माण वर्गणाये चिपकी हुई है!प्रत्येक कर्माण वर्गणा में अनन्तानन्त परमाणु है!उस आत्मा के साथ उससे अनंत गुणे नो कर्म परमाणु है!इनसे भी अन्नत गुणे वे परमाणु है जो अगले समयों में कर्म रूप परिणमन करने वाले विस्रोपत्च कहलाते है!यह सूक्ष्मत्व और अवगाहना गुण के कारण सम्भव है!
परमाणु के प्रदेश –
नाणो: !!११!!
संधिविच्छेद-न +अणु
शब्दार्थ-परमाणु/अणु के दो आदि प्रदेश (खंड) नहीं होते अर्थात वह एक प्रदेशी है !
अर्थ- शुद्ध परमाणु /अणु संख्यात,असंख्यात अथवा अनन्त प्रदेशी नहीं होता,केवल एक प्रदेशी होता है !
विशेष-
१-पुद्गल अणु से सूक्ष्मत: है इससे सूक्ष्म कुछ नहीं होता ,उसके बराबर केवल काल द्रव्य का कालणु होता है,वह भी पुद्गल परमाणु के बराबर स्थान घेरता है !
२-पुद्गल और काल अणु में अंतर-पुद्गल के सूक्ष्मत अविभाज्य परमाणु /अणु क्रियावान है जबकि कालणु में नहीं है!परमाणु /पुद्गल अणु परिणमनशील है कभी शुद्ध होता है और कभी अशुद्ध जबकि कालणु अनंत काल से शुद्ध ही है ,शुद्ध ही रहता है!
३-जैन दर्शन का अणु परमाणु पर्यायवाची है जबकि विज्ञान के अनुसार जो अणु है वह जैन दर्शन में वर्णित स्कंध है!
४-जैन दर्शन और आधुनिक विज्ञान में परिभाषित परमाणु-अणु में अंतर –
जैन दर्शना में परिभाषित परमाणु और अणु पर्यायवाची है,पुद्गल का सूक्ष्मत:अविभाज्य भाग है किन्तु आधुनिक विज्ञान के अनुसार अणु (मॉलिक्यूल )दो सा दो से अधिक परमाणुओं (जैन दर्शनानुसार उल्लेखित)का स्कंध है !विज्ञान में परिभाषित परमाणु के ; इलेक्ट्रान,प्रोटोन ,न्यूट्रॉन उसके घटक है,वह द्रव्य का सूक्ष्मत अविभाज्य अंग नही है अत: वह जैनदर्शनानुसार स्कंध ही है!
समस्त द्रव्यों के रहने का स्थान-
लोकाकाशेऽवगाह: !!१२!!
संधि विच्छेद-लोकाकाशे+अवगाह:
शब्दार्थ-लोकाकाश सब द्रव्यों को अवगाह (स्थान) देता है !
अर्थ-छ; द्रव्यों का अवगाहन लोकाकाश में है !
विशेष-
१-अनंत आकाश के जितने क्षेत्र में छहों द्रव्य पाये जाते है,वह लोकाकाश है और शेष अनंत आकाश अलोकाकाश है!धर्मादिक द्रव्य ही आकाश को, लोकाकाश और अलोकाकाश में विभाजित करते है !
२-शंका- छहों द्रव्यों का आधार लोकाकाश है तो आकाश का आधार क्या है ?
समाधान -आकाश का कोई अन्य आधार नहीं है वह स्व प्रतिष्ठित है !
शंका-यदि आकाश स्व प्रतिष्ठित है तब धर्मादि द्रव्य भी स्व प्रतिष्ठित होने चाहिए?यदि इनका आधार है तो आकाश का भी आधार होना चाहिए !
समाधान-यह दोष नहीं है क्योकि सभी दिशाओं में फैला हुआ अनंत आकाश सबसे बड़ा द्रव्य है ,उसके परिमाण का अन्य द्रव्य कोई नहीं है!धर्मादिक द्रव्यों का आकाश को व्यवहारनय की अपेक्षा से अधिकरण/आधार कहा जाता है क्योकि धर्मादिक द्रव्य लोकाकाश के बाहर अलोकाकाश में नहीं है! किन्तु एवं भूत नय की अपेक्षा सब द्रव स्व प्रतिष्ठित है!निश्चयनय से सभी द्रव्य का अपना अपना आधार है कोई अन्य किसी द्रव्य का आधार नहीं है !
शंका-लोक में पूर्वोत्तर काल भावी होते है उन्ही में आधार और आधेयपन देखा जाता है जैसे मकान पहले बनता है बाद में उसमे रहने वाले मनुष्य आते है किन्तु धर्मादिक द्रव्यों में यह देखने में नहीं आता कि पहले आकाश बना हो और फिर बाद में ये धर्मादिक द्रव्य उसमे आये हो ,ऐसी स्थिति में व्यवहार नए से भी आधार और आधेयपन नहीं बनता ?
समाधान-शंका निर्मूल है क्योकि जो साथ में रहते है उनमे भी आधार और आधेयपन बनता है जैसे शरीर का हाथ साथ साथ बनता है किन्तु कहा जाता है की शरीर में हाथ है !इसी प्रकार यद्यपि छहों द्रव्य अनादिकाल से है फिर भी व्यवहार से कथन सदोष नहीं है कि आकाश में बाकी सभी द्रव्य रहते है !
धर्म और अधर्म द्रव्य के रहने के स्थान –
धर्माधर्मयो:कृत्स्ने !!१३!!
संधि विच्छेद-धर्म+अधर्मयो:+कृत्स्ने
शब्दार्थ-धर्म-धर्म ,और अधर्मयो:-अधर्म द्रव्य, कृत्स्ने-सम्पूर्ण लोकाकाश में समान व्याप्त है !
अर्थ-धर्म और अधर्म द्रव्य सम्पूर्ण लोकाकाश में तिल में तेल के समान व्याप्त है!ऐसे नहीं जैसे कि मकान के एक कोने में घड़ा रखा हो !
विशेष-
१-छहो द्रव्य लोकाकाश के प्रत्येक प्रदेश में व्याप्त है किन्तु अवगाहनना शक्ति के निमित्त से इनके प्रदेश परस्पर में प्रविष्ट होकर एक दुसरे को बाधित नहीं करते!प्रत्येक प्रदेश पर अनन्त जीवात्माये है और उनके साथ अनन्त पुद्गल वर्गणाये भी चिपकी है!धर्म,अधर्म आकाश और काल अमूर्तिक है इसलिए परस्पर में टकराने का प्रश्न ही नहीं उठता,वे पुद्गल की सूक्ष्म वर्गणाओं से नहीं टकराते ,जीव तो शुद्ध अवस्था में सूक्ष्म अमूर्तिक ही है !
पुद्गल के रहने के स्थान-
एकप्रदेशादिषुभाज्य:पुद्गलानाम् !!१४!!
संधि विच्छेद -एक+प्रदेशा/+आदिषु +भाज्य:+ पुद्गलानाम्
शब्दार्थ-एक प्रदेशादिषु-एक आदि में प्रदेश,भाज्य:-विभाजन कर,पुद्गलानाम्-पुद्गल द्रव्य की अवगाहन है
अर्थ-एक प्रदेश,दो प्रदेश,संख्यात प्रदेशों और असंख्यात प्रदेशों में पुद्गल रहते है !
विशेष –
१-अन्नत प्रदेश अलोकाकाश में इनके रहने का प्रश्न ही नहीं है !संख्यात परदेशी लोकाकाश में ही रहते है
२-पुद्गल का सबसे बड़ा स्कंध महास्कंध लोकप्रमाण है,सबसे छोटा परमाणु एक प्रदेशी है !
३-पुद्गल के दो परमाणु जुदा हो तो दो प्रदेशों में और यदि बंधे हो तो एक प्रदेश में रहते है!इसी प्रकार संख्यात,असंख्यात और अन्नंत प्रदेशी स्कंध लोकाकाश के एक/संख्यात/असंख्यात प्रदेशों में रहते है जैसे स्कंध हो तदानुसार स्थान में रहते है !अत: लोकाकाश के एक प्रदेश में एक पुद्गल को आदि लेकर उसमे संख्यात असंख्यात और अनंत पुद्गल परमाणुओ के प्रदेश स्म सकते है !
यह बात वर्तमान विज्ञान की कसौटी पर भी प्रमाणित हो चुका है !मनुष्य के सिर के बाल की मोटाई के १००वे भाग (१.३ माइक्रोन स्पेक ) पर (जो कि सम्भवत जैनदर्शन में उल्लेखित एक प्रदेश ही हो ) सम्पूर्ण अमेरिका के विद्युत ग्रिड की क्षमता से ३०० गुणा अधिक अर्थात ३००x १० की घात १२ (टेट्रा)वाट विद्युत समां गई !
शंका-धर्म अधर्म अमूर्तिक द्रव्य है इसलिए वे तो एक स्थान पर बाधारहित रह सकते है! किन्तु पुद्गल द्रव्य मूर्तिक है अत: एक प्रदेश में अनेक मूर्तिक पुद्गल कैसे रह सकते है ?
समाधान-जिस प्रकार प्रकाश मूर्तिक है किन्तु एक कमरे में अनेकों दीपक का पुद्गल प्रकाश समा जाता है वैसे ही स्वभाव और सूक्ष्म परिणमन होने से लोकाकाश के एक प्रदेश में बहुत से पुद्गल परमाणु रह सकते है!
एक जीव के रहने के स्थान –
असंख्येयभागादिषुजीवानाम् !!१५!!
संधिविच्छेद-असंख्येय+भागादिषु+जीवानाम्
शब्दार्थ -असंख्येय-असंख्यात,भागादिषु-विभाजित करे प्रदेश,जीवानाम्-जीव रहता है
अर्थ-जीवों का अवगाह,लोक के (असंख्यात) प्रदेशों को असंख्यात से विभाजित करने पर अर्थात एक प्रदेश में कम से कम एक जीव लोक पर्यंत रहता है
भावार्थ-लोक के असंख्यत्वे भाग,अर्थात एक प्रदेश में न्यूनतम,सूक्ष्मत:एक निगोदिया जीव रहता है क्योकि उसका जघन्य अवगाहन है,वह लोक के एक प्रदेश (स्थान) को घेरता है!यदि जीव का अवगाहन अधिक होता है,तो वह लोक के एक,दो,चार आदि प्रदेशों में अर्थात लोक के असंख्यातवे भाग में रहता है,यहाँ तक की सर्व लोक तक भी व्याप्त हो जाता है (केवली समुद्घात के समय)
विशेष-
शंका-लोक के एक प्रदेश (असंख्यत्वे भाग में) पर एक जीव रहता है तो लोक के समस्त (असंख्यात) प्रदेशों में संख्या की अपेक्षा अनन्तानन्त सशरीरी जीव कैसे रह सकते है?
समाधान-सूक्ष्म-सूक्ष्म और बादर-स्थूल शरीर वाले दो प्रकार के जीव लोक में पाये जाते है!सूक्ष्म शरीर के जीव एक दुसरे को बाधित नहीं करते ,केवल स्थूल शरीर वाले जीव एक दुसरे को बाधित करते है!सूक्ष्म जीव,जितने प्रदेश में एक निगोदिया जीव (अर्थात १ प्रदेश) में रहता है उतने में अनन्तानन्त जीव साधारण काय के साथ रह सकते है क्योकि वे अन्य जीवों को बाधित नहीं करते अत: असंख्यात प्रदेशों में अनन्तान्त स शरीरी जीव रह सकते है,कही कोई विरोध नहीं है !
शंका-एक जीव को लोकाकाश के बराबर प्रदेश वाला कहा है फिर वह लोकाकाश के असँख्यातवे भाग अर्थात एक प्रदेश में कैसे रह सकता है?इस शंका का समाधान सूत्र १६ के माध्यम से आचर्य उमास्वामी जी !
समाधान -आत्मा/जीव के प्रदेशों में शरीर नामकर्म के उदय से संकुंचित/विस्तृत होने का गुण होता है इसलिए प्रदेश छोटे से छोटे जीव के शरीर के अनुसार संकुचित हो जाते है !
जीव द्रव्य का लोक के असंख्यातवे भाग में रहने का स्पष्टीकरण –
प्रदेश-संहारविसर्पाभ्यां प्रदीपवत् !!१६!!
संधि विच्छेद -प्रदेश+संहार+विसर्पाभ्यां+प्रदीपवत्
शब्दार्थ-प्रदेश-(जीव के) प्रदेश ,संहार-संकोच और विसर्पाभ्यां-विस्तार के कारण,प्रदीपवत्-दीपक के प्रकाश् के समान
अर्थ -जीव के प्रदेश दीपक के प्रकाश के समान संकुचित और विस्तृत हो सकते है !
भावार्थ-जिस प्रकार एक कमरे में एक दीपक से प्रकाशित होने के पर भी उसमे अन्य दीपकों का प्रकाश भी समा जाता है,उसी प्रकार यद्यपि आत्मा के प्रदेश असंख्यात प्रदेशी है,वे प्रदेश; संकोच और विस्तार गुणों के कारण एक प्रदेश में समा जाते है!समुद्घात के समय केवली के आठ मध्य के आत्म प्रदेशो के अतिरिक्त,जो की मेरु के नीचे चित्रा पृथ्वी पर आठ दिशाओं में रहते है,शेष पूरे लोक में विस्तृत हो जाते है!यह बंध आत्म प्रदेशों के गुण है !
विशेष-
१-शुद्ध जीवात्मा स्वभावत:अमूर्तिकहै,किन्तु अनादिकाल से कर्मों से बंधे होने से कथंचित मूर्तिक हो रहा है,अत: कर्मबंध वश छोटा बड़ा शरीर नामकर्म के अनुसार आत्मप्रदेश,प्राप्त शरीर में व्याप्त हो जाते है !
२-सिद्धावस्था में अंतिम शरीर से कुछ छोटे ,आकार में मुक्त आत्म के प्रदेश सिद्धालय में रहते है !
३-शंका-यदि आत्म प्रदेशों में संकोच विस्तार का गुण है तो वे इतने संकुचित क्यों नहीं हो जाते की लोकाकाश के एक प्रदेश पर एक ही जीवात्मा रह सके ?
समाधान-आत्माप्रदेशों में संकोच विस्तार,शरीरनामकर्म के अनुसार होता है!सूक्ष्मत: शरीर,सूक्ष्म निगोदिया लब्ध्य पर्याप्तक जीव का होता है जिसकी अवगाहना अंगुल का असंख्यात्व भाग है,अत:जीव की अवगाहना इसे कम नहीं हो सकती इसलिए वह लोक के असंख्यातवे भाग प्रमाण है!
धर्म अधर्म द्रव्य का कार्य/लक्षण /उपकार –
गतिस्थित्युपग्रहौधर्माधर्मोयोरुपकार:!!१७!!
संधि-विच्छेद-गति+स्थिति+उपग्रहौ+धर्म+अधर्म:+उपकार:!!
शब्दार्थ-गति-गति,स्थिति:-स्थिति,उपग्रहौ-सहकारी क्रमश:धर्म-धर्म,अधर्म-अधर्मद्रव्य का उपकार:-उपकार है !
अर्थ-धर्म और अधर्म द्रव्य का उपकार,पुद्गल और जीव के क्रमश गति और स्थिति में सहकारी होना है!
विशेष –
१-मछली के जल में तैरने में,जल केवल बाह्य सहायक है,यदि मछली तैरना नहीं चाहे तो उसे तैरने के लिए बाध्य नहीं कर सकता है!धर्म द्रव्य भी इसी प्रकार से पुद्गल और जीव के गमन करनी की इच्छा होने पर सहायता करना है किन्तु उनकी इच्छा के विरुद्ध उन्हें गमन करने के लिए बाध्य नहीं कर सकता !जैसे सिद्ध भगवान की आत्मा को लोक के शिखर पर पहुचने में धर्म द्रव्य सहकारी है,उसके ऊपर यद्यपि आत्मा में अनंत शक्ति है किन्तु धर्म द्रव्य के अभाव मे उस से ऊपर आत्मा अन्ननत अलोकाकाश में नहीं गमन कर सकती !
२-किसी पथिक को गर्मी में वृक्ष की छाया जिस प्रकार ठहरने में सहायक है (उसे ठहरने के लिए प्रेरित करती है),किन्तु उसकी इच्छा के विरुद्ध उसे ठहरने लिए बाध्य नहीं करती इसी प्रकार अधर्म द्रव्य पुद्गल व जीव को जो कही स्थिर रहना चाहे तो उनके ठहरने में सहायता करता है !जैसे सिद्धालय में सिद्ध भगवान की आत्मा स्थिर हो जाती है !
३-वस्तुओं की गति और स्थिति में भूमि,जल आदि को सहायक देखा जाता है फिर धर्म और अधर्म द्रव्यों का अस्तित्व क्यों माना जाए ?
समाधान-भूमि और जल किसी किसी वस्तु के गति और स्थिति में सहायक है सब वस्तुओं के नहीं किन्तु धर्म और अधर्म द्रव्य सभी वस्तुओं के गमन और स्थिरता में सहायक है,वह सभी पुद्गल और जीवों के गति और ठहरने में साधारण सहायक है,तथा एक कार्य अनेक कारणों से होता है इसलिए उनके अस्तित्व को मानने में कोई बाधा नहीं है !
४-शंका -धर्म /अधर्म के उपकार को यदि सर्वगत आकाश का मान लिया जाए तो क्या आपत्ति है ?
समाधान -धर्मादिक द्रव्यों को आकाश का उपकार अवगाहन देना है!यदि एक द्रव्य के अनेक उपकार मान लिए जाए तो लोकालोक का विभाजन का अभाव हो जाएगा इसलिए धर्म अधर्म द्रव्यों के उपकार को आकाश का उपकार मानना अनुचित है !
५-शंका-अधर्म और धर्म द्रव्य तुल्य बलवान है अत स्थिति का गति से और गति से स्थिति का प्रतिबंध होना चाहिए ?
समाधान-ये दोनों द्रव्य उदासीन प्रेरक है ,जबरदस्ती किसी से नहीं करते इसलिए शंका निर्मूल है !
६-शंका-धर्म अधर्म द्रव्य नहीं है क्योकि इनकी उपलब्धि नहीं है जैसे गधे के सिर पर सींग?
समाधान-सभी वादी प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से इन दोनों पदार्थों को स्वीकार करते है इसलिए इनका अभाव नहीं कहा जा सकता!दूसरा हम जैनो के प्रति “अनुपलब्धि हेतु असिद्ध है ‘क्योकि जिनके सातिशय प्रत्यक्ष ज्ञान रूपी नेत्र विध्यमान है,ऐसे सर्वज्ञ देव सब धर्मादिक द्रव्यों को प्रत्यक्ष जानते है और उपदेश से श्रुतज्ञानी भी जानते है !
७-शंका-सूत्र में’उपग्रह ‘निरर्थक है क्योकि केवल उपकार से काम चल सकता था ?
समाधान-यह दोष नहीं है क्योकि यथा क्रम निराकरण के लिए उपग्रह पद रखा है !जिस प्रकार धर्म और अधर्म के साथ गति व् स्थिति का क्रम से संबंध होता है जैसे धर्म द्रव्य का उपकार जीवों की गति है और अधर्म द्रव्य उपकार पुद्गलों की स्थिति है ,इसका निराकरण करने के लिए सूत्र में उपग्रह पद रखा है !
आकाश द्रव्य का उपकार/कार्य –
आकाशस्यावगाह: !!१८!!
संधि विच्छेद -आकाशस्य +अवगाह:
शब्दार्थ-आकाशस्य-आकाश द्रव्य ,अवगाह:-स्थान(अवकाश )देता है
अर्थ-सभी द्रव्यों को अवकाश (स्थान) देना आकाश द्रव्य का उपकार है !
विशेष-
१-अनंन्त आकाश सबसे बड़ा द्रव्य है,इसको अन्य कोई द्रव्य अवकाश नहीं देता,स्वयं सहित यह पाँचों द्रव्यों को अवकाश देता है!लोकाकाश के बहार भी अलोकाकाश मे असीमित अवगाहन शक्ति होने के बावजूद भी,धर्म और अधर्म द्रव्य के अभाव में वह किसी भी द्रव्य को अवगाहन नहीं दे सकता है !
शंका-क्रियावान द्रव्य पुद्गल और जीव को आकाश द्रव्य द्वारा अवकाश देना तो उचित लगता है किन्तु निष्क्रिय धर्म और अधर्म द्रव्य अनादिकाल से जहा के तहाँ स्थित (नित्य) है,आकाश का उन्हें अवकाश देना उचित नहीं लगता ?
समाधान-आकाश कभी चलता नहीं किन्तु उसे सर्वगत कहते है क्योकि सब जगह विध्यमान है इसी प्रकार धर्म और अधर्म द्रव्यों में अवगाहरूप क्रिया नहीं पायी जाती फिर भी लोकाकाश में सर्वत्र व्याप्त है।अत: उन्हेँ अवग्राही उपचार से कहते है!यद्यपि पुद्गल और जीव को मुख्यत आकाश ही अवकाश देता है !
शंका-यदि आकाश द्रव्य का स्वभाव अवकाश देना है तब एक मूर्तिक द्रव्य का अन्य मूर्तिक द्रव्य से प्रतिघात नहीं होना चाहिए,किन्तु देखने में आता है की मूर्तिक मनुष्य मूर्तिक दीवार से टकरा कर रुक जाता है ?
समाधान-जब कोई मनुष्य दीवार से टकराता है तब पुद्गल,पुद्गल से टकराता है ,इसमें आकाश द्रव्य का कोई दोष नहीं है!जैसे सवारियों से भरी रेलगाड़ी में बैठे यात्री यदि अन्य यात्रियों को चढ़ने नहीं दे तो इसमें रेलगाड़ी का तो कोई दोष नहीं है वह तो बराबर अवकाश/स्थान दे रही है !
शंका-अलोकाकाश में कोई द्रव्य नहीं रहता है तो क्या आकाश में अवकाश दान की शक्ति नहीं है?
समाधान-अलोकाकाश में यदि कोई द्रव्य नहीं रहता तो इससे प्रमाणित नहीं होता की उसमे अवकाश देने की शक्ति नहीं है ठीक वैसे जैसे किसी खाली घर में कोई नहीं रह रहा हो तो इसका अर्थ यह नहीं है की उस मकान में किसी को ठहरने की शक्ति नहीं है!कोई भी द्रव्य अपने स्वभाव को छोड़कर नहीं रह सकता !
पुद्गल द्रव्य का उपकार –
शरीरवाङ्मन:प्राणापाना:पुद्गलानाम् !!१९!!
संधि विच्छेद-शरीर+वाङ्मन:+प्राणापाना:+पुद्गलानाम्
शब्दार्थ-शरीर-शरीर,वाङ्मन:-वचन,मन,प्राणापाना:-श्वासोच्छ्वास(श्वास लेना और निकालना)पुद्गलानाम्-पुद्गल द्रव्य के उपकार है !
अर्थ-पुद्गल द्रव्य के; शरीर ,वचन ,मन और श्वासोच्छ्वास,जीव द्रव्य पर उपकार है !
भावार्थ-शरीर;पांच प्रकार के औदारिक,वैक्रयिक,आहारक,तेजस और कार्माण क्रमश,इन ५ शरीर नाम कर्मों के उदय से पुद्गल आहार वर्गणाओं से निर्मित होने के कारण यह पुद्गल द्रव्य के उपकार है !
वचन;भाव वचन और द्रव्य वचन दो प्रकार के है!वीर्यान्तरायकर्म और मति,श्रुत ज्ञानावरण के क्षयोपशम से तथा अंगोपांग कर्म के उदय से जो आत्मा में बोलने की शक्ति मिलती है उसे भाव वचन कहते है!पुद्गल के निमित्त से होने के कारण वचन पुद्गल का उपकार है!इस बोलने की शक्ति से युक्त जीव के कंठ,तालु आदि के संयोग से जो पुद्गल शब्द रूप बनते है उन्हें द्रव्यवचन कहते है,ये भी पौद्गलिक है क्योकि कान से सुनायी देते है!भाषा वर्गणाओं को शब्द रूप परिणमन कर हमें बोलने की शक्ति मिलती है!यह भी पुद्गल का उपकार है
हृदय के पास,द्रव्यमन,मनोवर्गणाओं से निर्मित है,इसी के द्वारा हम चिंतवन करते है!भावमन,गुणों और दोषों की चिंतवन करने की आत्मा की शक्तिहै!वह पुद्गलकर्मों के क्षयोपशम से प्राप्त होती है हमारी आत्मा, द्रव्यमन के माध्यम से जो चिंतन करती है वह भी मतिज्ञानावरण और श्रुतज्ञानावरण के क्षयोपशम से ,अंगोपांग कर्म के उदय और वीर्यन्तराय कर्म के क्षयोपशम से करती है!यह भी पुद्गलकर्म के उदय से मिलने वाला भाव मन बन गया,अत:यह भी पुद्गल का उपकार है !
प्राणापाना:-आपना-श्वास लेना और प्राणा-छोड़ना अर्थात श्वास लेना और छोड़ना भी श्वासोच्छ्वास नाम कर्म के उदय से होता है!हम श्वासोच्छ्वास लेते है वह भी आहार वर्गणाए है, ये सभी पुद्गल द्रव्य के जीव द्रव्य पर उपकार है !
श्वासोच्छ्वास से ही आत्मा के अस्तित्व का आभास होता है क्योकि इसकी गति को मुह पर हथेली रखने से रोका जा सकता है!जब तक श्वासोच्छ्वास चलती रहती है तब तक जीव भी जीवित है,मशीन की तरह चलता महसूस देता है !
विशेष-
१-पांच प्रकार के शरीर (औदारिक,वैक्रयिक,आहारक,तेजस और कार्माण) ,वचन ,मन और श्वासोच्छ्वास पुद्गल द्रव्य के जीव द्रव्य पर उपकार है अर्थात इनकी रचना पुद्गल द्रव्य से होती है !
२-अन्यमति शब्द को अमूर्तिक मानते है किन्तु यह मत ठीक नहीं है क्योकि शब्द मूर्तिमान कानो से सुने जाते है और मोर्तिक के द्वारा रुक भी जाते है !वह मूर्तिमान वायु द्वारा एक स्थान से दुसरे स्थान जाते भी है !शब्द की टककर से प्रतिध्वनि भी होती है इसलिए शब्द मूर्तिक है !
३-मन;द्रव्य और भावमन दो प्रकार का है!लब्धि और उपयोग लक्षण सहित भावमन पुद्गल के आलंबन से होता है इसलिए पौद्गलिक है!ज्ञानावरण और वीर्यान्तराय कर्म के क्षयोपशम और अंगोपांग नामक नामकर्म के उदय(निमित्त) से,जो पुद्गल गुण दोष का विचार और स्मरण आदि उपयोग के सम्मुख हुए आत्मा के उपकारक है,वे ही मन रूप से परिणत होते है अत; द्रव्य मन भी पौद्गलिक है !
शंका-मन एक स्वतत्र द्रव्य है,यह रूपादि परिणमन से रहित अणुमात्र है अत:इसे पौद्गलिक मानना आयुक्त नहीं है ?
समाधान-विचार करे मन,आत्मा और इन्द्रियों से संबध है या असंबद्ध!यदि असंबद्ध है तो आत्मा का उपकारक नहीं हो सकता,इन्द्रियों की सहायता भी नहीं कर सकता है!यदि आत्मा से संबद्ध है,तो उसके जिस प्रदेश से वह अनुमात्र मन संबद्ध है उसके अतिरिक्त अन्य प्रदेशों का उपकार नहीं कर सकता!
मन,श्वासोच्छ्वास (प्राण और अपान )मूर्तिक है क्योकि अन्य मूर्तिक पदार्थों द्वारा इनका प्रतिघात देखा जाता है!जैसे भय उत्पन्न करने वाले बिजलीपात से मन का प्रतिघात होता है!,हाथ से मुह को ढकने से श्वासोच्छ्वास; प्राण और आपन का प्रतिघात होता है किन्तु मूर्त पदार्थ का अमूर्त पदार्थ से प्रतिघात नहीं होना चाहिए ,इससे सिद्ध होता है की ये मन ,श्वासोच्छ्वास मूर्तिक,पुद्गलमय ही है !श्वासोच्छ्वास ही आत्मा के अस्तित्व को भी प्रमाणित करता है !
पुद्गल द्रव्य क अन्य उपकार –
सुखदुःखजीवितमरणोपग्रहाश्च !!२० !!
संधि विच्छेद -सुख+दुःख+जीवित+मरण+उपग्रह:+च
शब्दार्थ-सुख-सुख,दुःख -दुःख,जीवित-जीवन और मरण-मरण भी ,उपग्रह:-पुद्गल द्रव्य का उपकार है,च -(अन्य उपकार भी है ) !
अर्थ- इन्द्रिय जनित सुख ,दुःख जीवन,मरण भी जीव के ऊपर पुद्गल द्रव्य के उपकार है ,इनके अतिरिक्त अन्य उपकार भी है !
सुख:-साता वेदनीय कर्म के उदय और बाह्य क्षेत्र,द्रव्य ,काल और भाव के निमित्त से आत्मा के जो प्रसन्नता पूर्ण भाव होते है उसे सुख कहते है !
दुःख-असाता वेदनीय कर्म के उदय और बाह्य क्षेत्र,द्रव्य,काल और भाव के निमित्त से जो आत्मा को संक्लेश रूप परिणाम प्राप्त होते है उसे दुःख कहते है !
जीवन-आयु कर्म के उदय से जीव के एक भव में श्वासोच्छ्वास का जारी रहना जीवन है !
मरण-जीव के श्वासोच्छ्वास का रुकना उसका इस भव से मरण है!
उपर्युक्त सभी पुद्गल कर्मों के निमित्त से होते है,इसलिए पौद्गलिक है,जीव के ऊपर पुद्गल के उपकार है !यहाँ उपकार का अर्थ केवल भलाई करने से नहीं अपितु कार्य में सहायक होने से है,जैसे फिटकरी से गंदा पानी साफ़ हो जाता है !
च-शब्द सूत्र में सूचित करता है की पुद्गल के अन्य उपकार भी है जैसे चक्षु इन्द्रिय पुद्गल का उपकार है !
यहाँ ‘उपग्रह’ शब्द से सूचित होता है की पुद्गल परस्पर एक दुसरे पर भी उपकार करते है जैसे साबुन कपड़े पर,राख बर्तन पर करता है यहाँ उपकार शब्द का अर्थ निमित्तमात्र है अन्यथा दुःख,मरण उपकार नहीं कहलायेंगे !
जीवों का उपकार-
परस्परोपग्रहोजीवानाम् !!२१ !!
संधि विच्छेद -परस्पर+उपग्रहो+जीवानाम्
शब्दार्थ-परस्पर-परस्पर,एक दुसरे पर,उपग्रहो=उपकार करते है,जीवानाम्-जीव द्रव्य
अर्थ-जीवों का एक दुसरे की सहायता करना जीव द्रव्य का उपकार है !
विशेष-
१-स्वामी अपने सेवक को वेतन देकर उस पर उपकार करता है तो सेवक अपनी सेवाएं उस स्वामी को देकर, स्वामी पर उपकार करता है !
२-गुरु शिष्यपर उपदेश देकर उपकार करता है तो शिष्य गुरु के उपदेश एवं आज्ञा ग्रहण कर उनपर उपकार करता है !
३-उपग्रह का प्रकरण होते हुए भी इस सूत्र में उपग्रह पद देने का कारण है की उपर्युक्त सूत्र में कहे गए सुख , दुःख,जीवन,मरण भी जीवकृत उपकार भी है!अर्थात जीव परस्पर में एक दुसरे को सुख दुःख भी देता है,जीवन , मरण में भी वे निमित्त मात्र (सहायक) है !
४-उपकार के प्रकरण में-विचारणीय तथ्य –
कौन द्रव्य अन्य द्रव्य का क्या उपकार करता है?क्या कोई द्रव्य अपने से भिन्न अन्य द्रव्य का भला बुरा कर सकता है?यदि कर सकता है तो जैन दर्शन में ईश्वरवाद का निषेध क्यों?कोई भी द्रव्य अपने में विध्यमान गुण पर्याय को कभी छोड़ कर दुसरे द्रव्य में प्रविष्ट नहीं होता !तब विचारणीय है कि एक द्रव्य, अपने से भिन्न दुसरे द्रव्य पर उपकार कैसे कर सकता है !
समाधान-ईश्वरवाद को मानने वाले दर्शन, प्रत्येक कार्य के प्रेरक रूप से,ईश्वर को निमित्त कारण मानते है!
उनका मानना है कि यह प्राणी अज्ञानी है अत:अपने सुख दुःख का स्वामी नही है,ईश्वर की प्रेरणा वश स्वर्ग/नरक जाता है,यह तो स्वीकार किया गया है कि जीव को स्वर्ग / नरक गतियों की प्राप्ति ईश्वर के द्वारा ही होती है !यदि ईश्वर चाहे तो गतियों में जाने से बचा सकते है !इस अभिप्राय से एक द्रव्य पर अन्य द्रव्य का उपकार माना है!तब तो ईश्वरवाद का निषेध करना,न करने के बराबर है !और यदि इस उपकार प्रकरण का भिन्न अभिप्राय है तब उसका दार्शनिक विश्लेषण होना अत्यंत आवश्यक है !
लोक में सभी द्रव्य अपने अपने गुणों और पर्यायों को लिये (धारण किये है )हुए है !द्रव्यदृष्टि से वे अनंतकाल से जैसे है आज भी है,भविष्य में भी वैसे ही बने रहेंगे!किन्तु पर्याय दृष्टि से द्रव्य की मर्यादा के अंतर्गत सदैव वे परिवर्तनशील है!यह प्रत्येक द्रव्य का स्वभाव है!इसलिए प्रत्येक द्रव्य में जो भी परिणाम होता है अपनी योग्यतानुसार ही होता है! संसारी जीव कर्मो से बंधा है तो अपनी योग्यतानुसार बंधा है और यदि कालान्तर में मुक्त होगा तब भी अपनी योग्यतानुसार ही होगा,तथा प्रत्येक द्रव्य की इस योग्यतानुसार कार्य होने में बाह्य पदार्थ निमित्त माना जाता है!जैसे किसी विद्यार्थी में पढ़ने की योग्यता यदि है तभी वह पुस्तके, शिक्षक, विद्यालय आदि बाह्य निमित्त मिलने पर पढ़ कर वह विद्वान बन जाता है!परन्तु तत्वत:विचार करने पर ज्ञात होता है की पुस्तकों,शिक्षक अथवा विद्यालय ने उस की आत्मा में बुद्धि नही उत्पन्न कर दी !यदि इन बाह्य निमित्तों में बुद्धि उत्पन्न करने की शक्ति होती तो कक्षा में पढ़ने वाले प्रत्येक विद्यार्थी की बुद्धि एक समान उतपन्न होकर सभी एक समान विद्वान बन जाते ,किन्तु अनुभव इसके विपरीत ही है !एक ही कक्षा में अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों में कोई विद्यार्थी अल्प ज्ञानी ही रह जाता है ,कोई महान ज्ञानी हो जाता है!यदि विद्यार्थी में योग्यता नहीं होगी तो शिक्षक की लाख चेष्टा पर भी वह विद्यार्थी मूर्ख ही रह जाता है !दूसरी ओर हम ऐसे दृष्टान्तों से भी अवगत है जहाँ गुरु/पुस्तकों,विद्यालयों के अभाव मे भी विद्यार्थी पढ़े है!जैसे एक- लव्य को गुरु द्रोणाचार्य ने धनुर्विद्या की शिक्षा देने से इंकार कर दिया था किन्तु फिर भी वह, इस विद्या का प्रकांड,मात्र गुरु द्रोण के प्रति अपनी श्रद्धा और अपने में विध्यमान योग्यता के कारण हो गया था !इससे सिद्ध होता है कि शिक्षक कार्य की उत्पत्ति में निमित्त मात्र तो है किन्तु प्रेरक नहीं !ईश्वरवाद में ईश्वर की प्रेरकता पर बल दिया है और उपकार प्रकरण में बाह्य निमित्त स्वीकार किया है किन्तु उसे परमार्थ से प्रेरक नहीं हुआ !काल द्रव्य का उपकार –
वर्तनापरिणामक्रिया:परत्वापरत्वेचकालस्य !!२२!!
संधि विच्छेद-वर्तना+परिणाम+क्रिया:+परत्व+अपरत्वे+च+कालस्य
शब्दार्थ-वर्तना-परिणाम-क्रिया:-परत्व-अपरत्वे च कालस्य
अर्थ-वर्तना,परिणाम,क्रिया,परत्व और अपरत्व काल द्रव्य के उपकार है !
वर्तना-जो स्वयं परिणमन करते हुए,द्रव्यों के परिणमन में सहकारी है वह वर्तना लक्षण वाला निश्चयकाल द्रव्य है,वह लोकाकाश के प्रत्येक प्रदेश पर एक एक कालणु के रूप में स्थित है!जो प्रति समय प्रत्येक द्रव्य में उत्पाद ध्रौव्य व्यय स्वभावत होता रहता है,उसे वर्तना कहते है!सभी द्रव्य प्रति समय अपनी अपनी पर्याय में परिणमन करते है किन्तु इस परिणमन के लिए वाह्य निमित्त भी आवश्यक होता है जिसके अभाव में परिणमन सम्भव नहीं है,इस बाह्य निमित्त द्रव्य कहते है !उस परिणमन को कहने वाले सैकंड,मिनट,घंटा,दिन,रात,आदि व्यवहा र काल द्रव्य है जो की निश्चय काल के अस्तित्व की पुष्टि करता है !
परिणाम-अपने स्वभाव को छोड़े बिना द्रव्यों की पर्याय को बदलने को परिणाम कहते है !जैसे जीव परिणाम क्रोधादि और पुद्गल के रूप आदि है!धर्म अधर्म आकाश द्रव्यों में भी अगुरुलघु गुणों के अविभागी प्रतिच्छेद होने के कारण षटगुण हानिवृद्धि रूप परिणमन होता है!यह भी काल द्रव्य का उपकार है!
क्रिया-एक स्थान से दुसरे स्थान गमन करने को क्रिया कहते है,और पुद्गल में पायी जाती है!यद्यपि गमन करती वस्तुओं जैसे अंगुली ऊपर नीचे करना, धर्मद्रव्य का उपकार है किन्तु यह काल द्रव्य का भी उपकार है !
परत्व-बडेपन का अहसास परत्व है जैसे २० वर्ष का बालक १६ वर्ष से बड़ा है!व्यवहार काल का उपकार है
अपरत्व-छोटेपन का अहसास,जैसे १६ वर्ष का बालक २० वर्ष के बालक से छोटा है व्यवहार काल का उपकार है
वर्तना निश्चित काल द्रव्य का और परिणाम,क्रिया ,परत्व ,अपरत्व व्यवहार काल द्रव्य के उपकार है !
विशेष-
१-अपनी आत्मा में,राग-द्वेष रुप परिणाम होना,एक परिणमन से दुसरे परिणमन में जाना,ये परिणाम होना अथवा स्थिर वस्तु जैसे दीवार का प्रति समय परिणमन होने के कारण पुराना होते रहना,चलती वस्तु में क्रिया दि होना व्यवहारकाल द्रव्य का उपकार है !
२-हमारे शरीर के प्रदेशों में स्थित सभी कालाणु हमारे परिणमन में सहकारी है!एक पूरे अखंडित द्रव्य में एक कालाणु भी परिणमन कर सकता है!अखंडित लोकाकाश द्रव्य में कही परिणमन हो रहा है तो वह समस्त लोका-काश में परिणमन कहा जाएगा जैसे लोहे की छड़ के एक कोने पर हथौड़ा मारने पर पूरी छड़ में परिणमन माना जाता है!या जैसे किसी देश के किसी गाव में कोई घटना घटित होती है तो उस से समस्त देश प्रभावित होता है !
पुद्गल द्रव्य के लक्षण/गुण –
स्पर्शरसगंधवर्णवन्त:-पुद्गला: !!२३!!
सधी विच्छेद -स्पर्श+रस+गंध+वर्ण+वन्त:+पुद्गला:
शब्दार्थ-स्पर्श-स्पर्श,रस-रस,गंध-गंध,वर्ण-वर्ण,वन्त:-सहित को,पुद्गला:-पुद्गल कहते है !=
अर्थ-जिस द्रव्य में स्पर्श,रस,गंध और वर्ण होते है उसे पुद्गल कहते है !
विशेष-१-ये स्पर्श,रस,गंध और वर्ण गुण प्रत्येक पुद्गल में युगपत् अवश्य होंते है,यह सम्भव है कि सूक्ष्मता के कारण वे हमें आभासित नहीं हो!
२-इन पुद्गल के गुणों के उत्तर भेद २० है!
१-स्पर्श-स्निग्ध-रूक्ष,शीत-उष्ण,हल्का-भारी और कठोर-नरम-८
२-रस-खट्टा,मीठा,कसैला,कड़वा और चरपरा -५
३-गंध-सुगंध और दुर्गन्ध-२
४-वर्ण-काल,पीला,नीला,लाल,सफ़ेद-५
पुद्गल का गुण रूपवान होना है!जैसे कच्चे आम का रंग हरा होता है,पक्के का पीला,ये रंग पुद्गल की पर्याय है! जैसे ज्ञान आत्मा का गुण है,मति,श्रुत आदि ज्ञान,ज्ञान की पर्याय है!प्रत्येक पुद्गल में रूप,गंध,रस;स्पर्श अवश्य होता है!जैसे आम पकने पर खट्टे से मीठा होता है,उसमें रस अवश्य रहता है,खट्टा मीठा,पर्याय है जो की बदलती है!वायु को स्पर्श से महसूस करते है किन्तु रस,गंध,वर्ण को हम अपनी लर्मश: रसना ,घ्राण और चक्षु इन्द्रियों की सीमित क्षमता के कारण महसूस नहीं कर पाते है!
३-हमारे शास्त्रों के तथ्यों की वैज्ञानिक पुष्टि-भगवान महावीर ने लगभग २६०० वर्ष पूर्व उक्त सूत्र के माध्य म से प्रतिपादित कर दिया था कि अधिकतम परमाणु के गुण पर्याय की अपेक्षा २०० हो सकते है ,जिनका आधुनिक विज्ञान अभी तक अन्वेषण ही कर रहा है ! १९४२ तक वैज्ञानिको ने ९२,१९५५ तक ९३,२००४ तक ununpentium element की खोज कर इनकी संख्या ११५ ,!ununseptium २०१० में ११८ elements खोज लिये है !जैन दर्शनानुसार इनकी संख्या २०० से अधिक कभी नही होगी!शास्त्रों के इन तथ्यों से उनकी प्रमाणकता को बल मिलता है !अत: किसी को भी इन में प्रतिपादित तथ्यों पर संदेह नही करना चाहिए !
पुद्गल के सूक्ष्मत: अविभाज्य भाग परमाणु के भेद- परमाणु व्यंजन पर्याय की अपेक्षा एक ही है किन्तु गुण पर्याय की अपेक्षा २०० प्रकार के होते है!
रूप की ५ पर्यायों में से कोई एक ,रस की ५ पर्यायों में से कोई एक ,गंध के २ पर्यायों में से कोई १ तथा स्पर्श की स्निग्ध-रुक्ष में से १ और शीत -उष्ण में से कोई एक ,इस प्रकार कुल ५ x ५ x २ x ४ =२०० प्रकार की परमाणु (गुणपर्याय) होते है !
पुद्गल की पर्याय-
शब्द्बन्धसौक्ष्म्यस्थौल्यसंस्थानभेदतमछायातपोद्योतवन्तश्च !!२४!!
संधि विच्छेद-शब्द+बंध+सौक्ष्म्य+स्थौल्य+संस्थान+भेद+तम+छाया+आतप+उद्योतवन्त:+च
शब्दार्थ-शब्द-शब्द,बंध-बंध,सौक्ष्म्य-सूक्ष्मता,स्थौल्य-स्थूलता,संस्थान-आकार,भेद-टुकड़े,तम-अन्धकार, छाया-छाया,आतप-आतप,उद्योत-उद्योत,वन्त:-जो है पुद्गल की पर्याय है +च-और जैसे अन्य पुद्गल की पर्याय कही है !
अर्थ-शब्द,बंध,सूक्ष्मता,स्थूलता,आकार,भेद,अन्धकार,छाया,आतप और उद्योत पुद्गल की पर्याय है !इसके अतिरिक्त आगम में कही गई पर्याय का संघ्रह कर ले !
भावार्थ-
शब्द -शब्द भाषा और अभाषा रूप से दो प्रकार के है !
भाषा रूप के भी दो भेद है;
१-अक्षररूप भाषात्मकशब्द मनुष्यों की व्यवहारिक बोलिया, अक्षर रूप भाषात्मक शब्द है और
२-अनक्षररूप भाषात्मकशब्द-चिड़िया,पक्षियों,पशु आदि की बोलिया अनक्षररूप भाषात्मक शब्द है !
अभाषा रूप शब्दों के दो भेद है
१-प्रायोगिकशब्द-जो मनुष्यों की सहयता से उत्पन्न किये जाते है इसके ४ भेद है
१-तत-चमड़े को मढ़ कर ढोल नगाड़ों द्वार किये गए शब्द तत शब्द है !
२-वितत-सीतारादि के शब्द वितत शब्द है !
३-घन-घंटादि के बजाने से उतपन्न शब्द घन शब्द है
४-सुषिर-बाँसुरी आदि द्वारा किये गए शब्द सुषिर शब्द है !
२-वैस्रसिक अभाषा रूप शब्द-जो बिना मनुष्यों की सहायता से ,स्वाभाविक रूप से होते है जैसे मेघ की गर्जन !
२-बंध-
१-प्रायोगिक बंध-जो मनुष्यों की सहायता से अजीव लकड़ी,लाख आदि का बंध, किया जाता है और
२-वैस्रसिक बंध-जो स्वभावत:,बिना किसी सहयता बंध होता है जैसे जीवात्मा के साथ पुद्गल कर्मबंध, इसमें पुद्गलों के स्निग्ध-रुक्ष गुणों के निमित्त से स्वयं बंध होता है जैसे मेघ,बिजली,इंद्र धनुषादि!बंध के दो भेद है !
३-सूक्ष्मता के २ भेद है
१-अन्त्य सूक्ष्म-जैसे परमाणु पुद्गल असूक्ष्मत: अविभाज्य खंड है !
२-आपेक्षिक सूक्ष्मता -जैसे बेर आवले से सूक्ष्म है !
४-स्थूलता-के भी दो भेद है !
१-अन्त्यस्थूल-जैसे जग व्यापी महास्कंध स्थूलतम,अन्त्य स्थूल है !
२-आपेक्षिक स्थूल-आँवला ,बेर से स्थूल है !
५-संस्थान-आकृति के दो भेद-
१-इथंलक्षण-जिन आकारो जैसे गोल,लम्बा,चौकोर,त्रिकोणादि ,व्यक्त किया जा सके इथं लक्षण संस्थान है
२-अनित्यथंलक्षण-जिन का आकार बदलता रहता हो,निश्चित नहीं हो जैसे मेघ,वे अनित्यथं संस्थान है !
६-भेद-अर्थात टुकड़े -इनके निम्न ६ भेद है-
क-उत्कर-लकडी को आरे से चीरने पर निकला बुरादा उत्कर है
ख-चूर्ण-गेहूं का पीसा आटा चूर्ण है !
ग-चूर्णिका-दाल के छिलके चूर्णिका है !
घ-प्रतर-मेघ के पटलों को प्रतर कहते है
ङ -अणु चटन-जो लोहे को पीटने पर फुल्लिंग निकलते है ,उन्हें अणु चटन कहते है !
च-खंड-घड़े के टुकड़ों को खंड कहते है !
७-तम-अंधकार को कहते है!
८-छाया-प्रकाश को रोकने वाले पदार्थ के निमित्त से जो होता है उसे छाया कहते है!इसके दो भेद है
१-दर्पण के समक्ष रखी वस्तु का बिम्ब जस का तस आ जाता है!
२-धुप में खड़े होने पर मात्र छाया द्वारा प्रतिबिम्ब पड़ना !
९-आतप-सूर्य के प्रकाश को आतप कहते है !
१०-चन्द्रमा,जुगने आदि के शीतल प्रकाश को उद्योत कहते है !
ये पुद्गल की पर्याय है च शब्द से सूचित होता है कि आगम से प्रसिद्द पुद्गल की पर्यायों (अभिघात आदि )का संघ्रह करना चाहिए !
पुद्गल के भेद
अणवःस्कंधाश्च -२५
संधि विच्छेद-अणवः+स्कंध:श्च =
शब्दार्थ-अणवः-अणु,स्कंध:-स्कंध,च-और पुद्गल के भेद है
अर्थ-पुदगल द्रव्य के;अणु और स्कंध दो भेद है।
भावार्थ-अणु-पुद्गलद्रव्य का सूक्षमतःअविभाज्य एक परदेशी खंड परमाणु/अणु है!जैनदर्शन में अणु/पर माणु परायवाची है!दो,तीन,संख्यात या असंख्यात अणुओं के संघात (मिलने) से स्कन्ध बनता है,इस के अनेक भेद है!संसार की समस्त वस्तुए अणुओं से मिलकर ही बनी है
विशेष-१-सूत्र २७ से स्पष्टहै-अणु कभी भी स्वतंत्र अवस्था में नहीं पाया जाता क्योकि इसकी उत्पत्ति भेद से ही होती है!
२-हमारे प्रयोग में केवल अनन्त संख्या वाली पुद्गल वर्गणाये ही आती है,संख्यात या असंख्यात संख्या वाली नहीं!जैसे मैदे के सूक्ष्मत: कण में भी अनंत परमाणु होते है!
३-एक अणु/परमाणु में एक रूप,एक रस.,एक गंध और दो स्पर्श;रुक्ष-स्निग्ध में से एक और शीत -उष्ण में से एक अवश्य होते है!किसी स्कंध में पहिले ३ के साथ चार स्पर्श भी होते है!क्योकि हल्का-भारी और कठोर-नरम स्कंध में ही होते है,परमाणु में नहीं !
४-पुद्गल की कुल २३ वर्गणाओं मे से केवल ५ निम्न अदृश्य वर्गणाये हमारे लिए उपयोगी है!
१-आहार वर्गणाये/नोकर्मवर्गणाये -इनसे आहार,शरीर,इन्द्रियां,श्वासोच्छ्वास,की पर्याप्तियां प्राप्त होती है !जिससे आत्मा में आहार वर्गणाओं को खल,रस विभाग में परिणमित करने की शक्ति आ जाती है और शरीर,इन्द्रियों और श्वासोच्छ्वास का निर्माण अंतर्मूर्हत में होता है !ये शरीर के रूप में हमें दिखती है !
२-तेजसवर्गणाये-इनसे शरीर को कांति प्रदान करने वाले और उसके तापमान को नियत्रित करने वाले तेजस शरीर का निर्माण होता है!ये हमे दिखती नहीं है
३-भाषा वर्गणाये -भाषा/शब्दों का निर्माण होता है,ये हमे दिखती नहीं
४-मनोवर्गणाये-इनसे द्रव्य मन की रचना होती है!ये भी नहीं दिखती ,
५-कर्माण वर्गणाये -इनसे कार्मण शरीर का निर्माण होता है ,ये भी हमें दिखती !
जैन दर्शन अनुसार परमाणु और आधुनिक विज्ञान के परमाणु में भेद-
१-विज्ञान में परिभाषित द्रव्य का सूक्ष्मत भाग परमाणु,जैन दर्शनानुसार परिभाषित अविभाज्य परमाणुओं/अणुओं का स्कन्ध है क्योकि उसके इलेक्ट्रान,प्रोटोन,न्यूट्रॉन आदि उसके विभाज्य अवयव है!
२-अनंत परमाणुओं से निर्मित वर्गणाये हमारे ग्रहण में नहीं आती,ये आधुनिक उपलब्द्ध यंत्रों की पकड़ में नहीं आती!
जैन दर्शन अनुसार वैज्ञानिक परमाणु तक नहीं पहुँच पायेगे क्योकि यह ‘केवली’ absolute knowledgeable का विषय है!
पद्गल स्कंधों की उत्पत्ति –
भेदसंघातेभ्यउत्पद्यन्ते !!२६!!
संधि विच्छेद-भेद+संघातेभ्य+उत्पद्यन्ते
शब्दार्थ-उत्पद्यन्ते-(पुद्गल स्कंधों की) उत्पत्ति, भेद-टुकड़े करने से,संघातेभ्य-जुड़ने/मिलने से और भेद-संघात दोनों से अर्थात तोड़ने व जोड़ने से होती है!
भावार्थ-एक दृष्टान्त से इस सूत्र को समझते है-
घरों में गेहूं पीसकर,अर्थात गेहू को भेद कर आटा बनाया गया!
फिर आटे में पानी मिला कर उसका मोटा स्कन्ध बनाया जाता है,यह संघात हुआ,
फिर इसमें से छोटी-छोटी आटे की लोई लेकर उस पर सुखा आटा मिलकर रोटी बेलकर रोटी बनाई जाती है,यह भेद और संघात दोनों का उद्धारहण है!
विशेष-१-स्कन्धों के टूटने/विघटन को भेद और भिन्न भिन्न परमाणुओं/स्कन्धौ के मिलने को संघात कहते है स्कन्धौ की उत्पत्ति,भेद संघात और दोनों अर्थात स्कन्धौ के भेद और संघात से होती है !यह तीसरा; भेद और संघात दोनों,सूत्र में बहुवचन होने से निकलता है !
इसी सूत्र को वैज्ञानिक एवं जैन दर्शन के तुलनात्मक दृष्टिकोण से,कुछ रासायनिक क्रियाऔ के दृष्टान्तों द्वारा समझते है-
आचार्य उमास्वामी जी ने स्पष्ट कहा है कि “-भेद संघातेभ्य उत्पद्यन्ते!!”
तीन प्रक्रियाओं से स्कन्धोत्पत्ति होती है-
१-कुछ स्कन्धों की केवल स्कंध के भेद-विघटन से ,
२-कुछ स्कन्धो की दो या अधिक स्कन्धों के परस्पर संघात-संयोजन से और
३-कुछ स्कन्धौ की दो या अधिक स्कन्धों के परस्पर एक साथ भेद-विघटन और संघात-संयोजन से, उत्पत्ति होती है!
रसायन विज्ञान में भेद से स्कन्धौ की उत्पत्ति के कुछ दृष्टांत-
1-K SO Al (SO4)]. 24H 0 —-९२ डिग्रीसेंटीग्रेड –K 0 +Al 0 +SO +24H 0
2 4 2 3 2 2 2 3 2
फिटकरी पोटेशियम अल्युमिनियम सल्फर ट्राई पानी
आक्साइड आक्साइड आक्साइड
रेडियो सक्रिय (Radio Active) तत्वों में विघटन में भेद प्रक्रिया द्वारा स्कंध उत्पत्ति –
एक रेडियो सक्रिय तत्व द्वारा अल्फा,बीटा,गामा कणों का उत्सर्जन उसका विघटन (भेद) कहलाता है! रेडियो सक्रिय(Radio Active) तत्वों को जैनाचार्यों की भाषा में पुद्गलस्कंध है,विघटित हो कर नया तत्व (नयास्कंध) उतपन्न होता है, जो स्वत: विघटित होकर एक और नया तत्व /स्कंध उतपन्न करता है!इस प्रकार विघटन एवं दुहिता तत्व (daughter element )की उत्पत्ति का अनवरत क्रम तब चलता है जब तक अन्य उत्पाद के रूप से रेडिओ सक्रियाता हीन तत्व उतपन्न होता है !
स्कन्धोत्पत्ति की प्रक्रिया जैन दर्शनानुसार
संघात द्वारा स्कंधोत्पत्ति –
रसायनविज्ञान में स्कन्धोत्पत्ति की क्रिया संघात द्वारा भी देखी जाती है!इस प्रक्रिया को सह-संयोज नबंध के रूप में समझ सकते है !
सहसंयोजी बंध में,अणु निर्माण में भाग ले रहे परमाणुओं के मध्य इलेक्ट्रान की साझेदारी से जो बंध बंधता है उसे सहसंयोजी बंध एवं निर्मित यौगिक को सहसंयोजी यौगिक (स्कंध) कहा जाता है !
1- H*-H =H2
२ हाइड्रोजन हाइड्रोजन गैस
परमाणु
2- Cl2 + H2 — सूर्य का प्रकाश — = 2 HCl
क्लोरीन हाइड्रोजन हाइड्रोजन क्लोराइड
भेद-संघात द्वारा स्कन्धोत्पत्ति –
भेद (विघटन)संघात (संयोजन) से होने वाली स्कन्धोत्पत्ति को रसायन विज्ञान में मान्य विद्युत संयोजी बंध (electro valent bond) से तुलना कर सकते है !
स्कंध निर्माण की इस प्रक्रिया में,विज्ञान द्वारा मान्य परमाणुओ में से सर्वप्रथम एक परमाणु, एक या एक से अधिक इलेक्ट्रान त्यागता है!इलेक्ट्रान त्याग की इस क्रिया को ‘भेद’ (विघटन ) कहते है !तदोपरांत इस त्यागे हुए इलेक्ट्रान को दूसरा परमाणु ग्रहण करता है! प्रथम परमाणु जिसने इलेक्ट्रान त्यागा है वह धनावेशित और इलेक्ट्रान ग्रहण करने वाला परमाणु ऋणावेशित हो जाता है !अंत में विपरीत आवेश से आवेशित ये दोनो परमाणु विद्युत बल रेखाओं से जुड़ जाते है!संयोग की इस क्रिया को ‘संघात’-संयोजन कहते है!इस प्रकार भेद संघात की प्रक्रिया,विद्युत संयोजी बंध (electro valent bond) द्वारा स्कंध (वैज्ञानिक अणु -molecule) का निर्माण होता है !इस प्रक्रिया को रसायन विज्ञान की निम्न रासायनिक समीकरणों से समझते है !
१- सोडियम परमाणु क्लोरीन परमाणु
Na Cl (भेद)
– 1 इलेक्ट्रान + 1 इलेक्ट्रान
Na+ Cl- = संघात NaCl
सोडियम आयन क्लोरीन आयन सोडियम क्लोराइड (नमक )
उक्त दृष्टान्त में सोडियम परमाणु ने १ इलेक्ट्रान का त्याग कर क्लोरीन के एक परमाणु ने उस एक इलेक्ट्रान को ग्रहण किया जिसके फलस्वरूप सोडियम का परमाणु धनात्मक आवेश से और क्लोरीन का परमाणु ऋणात्मक आवेश से आवेशित हो गया!सोडियम और क्लोरीन के एक -एक परमाणुओ का विपरीत विद्युत आवेश से आवेशित होने के कारण वे आयनिक अवस्था में आ गए और उनके बीच विद्युत बल रेखाओं के उत्पन्न होने के कारण वे परस्पर जुड़कर सोडियम क्लोराइड (नमक) के अणु (वैज्ञानिक)/स्कंध (दर्शनानुसार) का निर्माण करते है !यह जैन दर्शना नुसार भेद संघात द्वारा स्कंध के निर्माण का दृष्टांत है !
परमाणु की उत्पत्ति का कारण
भेदादणु:-२७
संधि विच्छेद-भेदा +अणु:
शब्दार्थ-भेदा-भेद अर्थात विघटन से ही,अणु:-अणु की उत्पत्ति होती है
अर्थ- अणु की उत्पत्ति स्कन्धों के भेदने (टूटने-विघटन) से ही होती है!
भावार्थ-अणु, पुद्गल द्रव्य की स्वाभाविक अवस्था है,जिसके आगे उसको विभाजित नहीं करा जा सकता ,मात्र पुद्गल स्कन्ध के भेद से अणु की उत्पत्ति होती है,संघात से नहीं होती!
विशेष-उक्त सूत्र के माध्यम से आचर्यश्री उमास्वामी जी कहते है कि अणु/परमाणु की उत्पत्ति मात्र भेद क्रिया अर्थात विघटन से ही होती है,न की संघात अथवा भेद संघात क्रिया से !\जैन दर्शन के अनुसार अणु /परमाणु पुद्गल का अविभाज्य सूक्ष्मत्व अंश है जो आगे भेदा नहीं जा सकता !इससे यह भी स्पष्ट होता है कि प्रकृति में परमाणु का स्वतत्र अस्तित्व नहीं है किन्तु उसका अनुभव उसके स्कन्धौ के अस्तित्व द्वारा किया जा सकता है!इसीलिए अणु/परमाणु केवली ,(absolute knowledgeable) का विषय है !
चाक्षुष स्कंध की उत्पत्ति का कारण –
भेदसंघाताभ्यं चाक्षुषः-२८
संधिविच्छेद-भेदसंघाताभ्यं+चाक्षुषः
शब्दार्थ-भेद=तोड़ने/विघटन और संघात=जोड़ने से,चक्षु इन्द्रिय से,अदृश्य गोचर स्कन्ध, दृष्टिगोचर स्कन्ध की उत्पत्ति होती है केवल भेदन से नही !
भावार्थ-चक्षुइंद्री से दृष्टिगोचर स्कंध केवल भेद-संघात की युगपत क्रिया से उत्पन्न होते है,केवल भेद से नही !
उद्धाहरण से इस सूत्र को समझ सकते है-
१-गर्मियों में हमारे हाथों में मैल हो जाता है जो पहले नेत्रों से नहीं दिखता किन्तु जब दुसरे हाथ से उसे रगड़ते है,अभी तक जो मैल के स्कन्ध खाल के अन्दर जमे होने के कारण दिखाई नहीं दे रहे थे,तो उन स्कन्धो का खाल के अन्दर से तो भेद हुआ और खाल के ऊपर आ कर वे जुड़ने (संघात) के कारण मैल की बत्ती दिखने लगती है! यह मैल का स्कन्ध हमें खाल के अन्दर भेद कर ऊपर संघात के कारण दृष्टिगोचर होने लगा!
२-मेज के ऊपर धुल फ़ैली होने के कारण नेत्रों को दिखाई नहीं देती किन्तु मेज पर हाथ से समेटने पर वह एकत्र (संघात) हो कर दिखने लगती है!
विशेष-श्लोकवार्तिककार ने, विशेष बात भी लिखी,उन्होंने लिखा की चाक्षुषः से तात्पर्य मात्र दिखने वाला स्कन्ध नहीं अपितु जो स्कन्ध अभी तक छूने में नहीं आ रहा था,वह भेद और संघात से छूने वाला हो गया!जो स्कन्ध अभी तक सूंघने में नहीं आ रहा था वह भी भेद और संघात से सूंघने में आने लगा! जो चखने में नहीं आ रहा था वह भेद संघात से चखने योग्य हो जाता है!अर्थात पाचों इन्द्रियों के विषय,भेद और संघात से,जो पंचेंद्रियो के विषय अभी तक भोग्य नहीं थे वे भोगने योग्य हो जाते है!
इसी सूत्र को निम्न वैज्ञानिक रासायनिक क्रिया को जैन दर्शन से तुलनात्मक अध्ययन द्वारा समझ सकते है –
भेद संघताभ्यां चाक्षुष:
उक्त सूत्र में आचार्य उमास्वामी जी कह रहे है कि भेद संघताभ्यां -भेद और संघात (संयोजनी) प्रक्रिया द्वारा ही,चाक्षुष:-नेत्रों को दृष्टि गोचर स्कन्धौ (वैज्ञानिक Molecule) की उत्पत्ति होती है !केवल भेद से नहीं!आशय है कि अनन्त परमाणुओ का स्कंध होने पर ही कोई स्कंध चक्षु इन्द्रियों द्वारा देखने योग्य नहीं होता है!उसमे भी कोई दिखाई देने तथा कोई नहीं दिखाई देने योग्य होता है !अब प्रश्न उठता है की जो दिखता नहीं वह कैसे दिख सकता है?
इसी के समाधान के लिए उक्त सूत्र कहता है कि केवल भेद से ही कोई स्कंध चक्षु इंद्री द्वारा देखने योग्य नहीं होता बल्कि भेद और संघात दोनों की युगपत प्रक्रिया से होता है!
उद्धाहरण के लिए एक चक्षुइन्द्रिय अगोचर सूक्ष्मस्कंध के भेदन से चक्षु इन्द्रिय अगोचर सूक्ष्म स्कंध ही निर्मित होते है!किन्तु जब वह सूक्ष्म स्कंध किसी अन्य स्कंध से संघात द्वारा संयोग होने पर सूक्ष्मत्व त्याग कर स्थूलत्व ग्रहण करता है तभी चक्षु इन्द्रिय से दृष्टिगोचर होता है !
वैज्ञानिक विश्लेषण :-
भेद-संघात अर्थात विद्युत संयोजनी बंध द्वारा निर्मित अणु (स्कंध) ठोस होते है अत: चाक्षुष,(नेत्र) इन्द्रिय द्वारा दृष्टिगोचर होते है क्योकि इस प्रक्रिया द्वारा निर्मित
अणु ध्रुवीय होते है जिस कारण अनंत अणु एक दुसरे से आवेशित आयनो की ओर विद्युत बल रेखाओ द्वारा जुडते चले जाते है फलत: चाक्षुष स्कंध का निर्माण करते है !
जैसे नमक(NaCl),शोरा,नौसादर,फिटकरी,नीलाथोथा,हराकसीस आदि के भेद संघात प्रक्रिया द्वारा अचाक्षुष स्कंध बन जाते है !
+NaCl- +NaCl- विद्युत बल रेखाएं ——–& gt; NaCl-+NaCl-
इसी आधार पर वैद्युत संयोजी यौगिकों (स्कन्धों ) के विलयन होने वाली आयनिक क्रियाओं समझा जा सकता है !
स्कन्धों का अचाक्षुष जलीय विलयन; भेद संघात क्रिया द्वारा बने चाक्षुष स्कंध-
१- +NaCl- + AgNO भेद –& gt;+Na + Cl- + +Ag +NO- –& gt; संघात AgCl +NaNO
3 3 3
सोडियम क्लोराइड सिल्वर नाइट्रेट सोडियम क्लोरीन सिल्वर नाइट्रेट सिल्वरक्लोराइड सोडियमनाइट्रेट
(अचक्षुष) (अचक्षुष) (अचक्षुष) (अचक्षुष) (अचक्षुष)(अचक्षुष) (चक्षुष,सफ़ेद रंग ) (अचक्षुष)
salution salution आयन आयन अयन आयन precipitate solution
२- PbCl + KCrO भेद —->Pb+ +2Cl – +2K+ +CrO- संघात >PbCrO +2 KCl
2 4 4 4
लेडक्लोराइड पोटॅशियमक्रोमेट लेड क्लोराइड पोटेशियम क्रोमेट लेडक्रोमेट पोटेशियमक्लोराइड
(अचक्षुष) (अचक्षुष) (अचक्षुष ) (अचक्षुष) (अचक्षुष) (अचक्षुष) ( चक्षुष)पीला
salution salution आयन आयन आयन आयन precipitate solution
सद्द्रव्यलक्षणम् -२९
संधि-विच्छेद:- सत्+द्रव्य+लक्षणम्
शब्दार्थ-सत्-सत्य(नित्यता) अस्तित्व,द्रव्य-द्रव्य का,लक्षणम्-लक्षण है!
भावार्थ-द्रव्य सदैव(सत्ता) अस्तित्व में रहता है,अविनाशी है !
उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत् ३०
संधिविच्छेद:-उत्पाद+व्यय+ध्रौव्य+युक्तं+सत्
शब्दार्थ-उत्पाद-नवीन पर्याय की उत्पत्ति,व्यय-पुरानी पर्याय का नाश/व्यय और ध्रौव्य=वस्तु का सदैव अस्तित्व से युक्त,सत्-अस्तित्व है!
अर्थ-अर्थात जिसमे उत्पाद,व्यय और ध्रौव्य तीनो पाए जाए,सत् है !
उपर्युक्त सूत्र संख्या २९ में द्रव्य का लक्षण सत्-अर्थात अस्तित्व/नित्यत्व द्रव्य का लक्षण बताया है और इस सूत्र में सत्-अस्तित्व/नित्यत्व को परिभाषित किया है; उत्पाद,व्यय और ध्रौव्य युक्त सत् है अर्थात उत्पाद व्यय ध्रौव्य,द्रव्य का लक्षण है !
भावार्थ- द्रव्य का लक्षण -जिसमें निरंतर प्रति समय नवीन पर्याय की उत्पत्ति और पुरानी पर्याय का व्यय होने पर भी वह अपना अस्तित्व सदा रखे उसे,सत् कहते है,जो की द्रव्य का लक्षण है! सभी द्रव्य अविनाशी है तथा उसमे नवीन पर्याय की उत्पत्ति और पुरानी का व्यय एक ही समय में युगपत् होता ही है!
उत्पाद-अपनी जाति को छोड़े बिना,चेतन/अचेतन द्रव्य में अंतरंग और बहिरंग के निमित्त से प्रति समय नवीन पर्याय की उत्पत्ति उत्पाद है!जैसे मिटटी की पिंड पर्याय से घट पर्याय की उत्पत्ति!
व्यय-पूर्वपर्याय का विनाश व्यय है जैसे घट पर्याय के उत्पन्न होने पर पिंड पर्याय का विनाश होना !
ध्रौव्य-पूर्वपर्याय के विनाश और नवीनपर्याय का उत्पाद होने पर भी मूलस्वभाव सदैव रहना,ध्रौव्य है!जैसे पिंड पर्याय का व्यय होकर घट पर्याय का उत्पाद होने पर भी मिटटी द्रव्य का कायम रहना!
द्रव्य,उत्पाद व्यय और ध्रौव्य स्वरुप ही है-उक्त दृष्टांत में मिटटी की पिंड पर्याय का व्यय /विनाश होने पर नवीन घट पर्याय का उत्पाद होने पर भी,मिटटी, मूल द्रव्य सदैव रहती है! इसी प्रकार प्रत्येक द्रव्य में तीनों गुण एक साथ रहते है क्योकि पुरानी पर्याय के नष्ट होने पर, नवीन पर्याय का उत्पाद होने पर भी द्रव्य का स्वभाव सदा रहता है अर्थात द्रव्य वही रहता है!यदि केवल उत्पाद माना जाये तथा व्यय और ध्रौव्य को नहीं माना जाए तब नवीन वस्तु का बनना ही शेष रहा,ऐसी स्थिति में बिना मिटटी के घट बन जाएगा!यदि वस्तु का केवल विनाश माना जाये,उत्पाद और ध्रौव्य को नहीं माना जाये,तो घट के टूटने पर मिटटी या टीकर कुछ शेष नहीं रहेगा!यदि केवल ध्रौव्य को ही मन जाए उत्पाद व् व्यय को नहीं माने तो प्रत्येक वस्तु जिस अवस्था में है वह उसी अवस्था में सदा रहेगी,उसमे कभी कोई परिवर्तन नहीं होगा! किन्तु यह प्रत्येक्ष के ये विरुद्ध है!प्रत्यक्षत: प्रत्येक वस्तु परिवर्तन शील है,उसमे प्रति समय परिवर्तन होते हुए भी जो सत् है उसका विनाश कभी नहीं होता है तथा असत् का उत्पाद कभी नहीं होता है, प्रत्येक द्रव्य में परिणमन होते हुए भी उसका मूल स्वभाव यथावत रहता है !जड़ चेतन नहीं हो सकता और चेतन जड़ नहीं हो सकता!अत: जो सत उत्पाद व्यय और ध्रौव्य स्वरुप है उसे ही द्रव्य कहते है!
जीव का चेतनत्व,ज्ञान,दर्शनादि गुण उसकी समस्त गतियों रूप पर्यायों और पुद्गल द्रव्य के स्पर्श,रस,गंध,वर्ण गुण उसकी सब पर्यायों में विध्यमान रहते है!
उद्धाहरण २-पुराने स्वर्ण के जेवर अंगूठी को तुड़वाकर नवीन बाली बनवाना!इसमें सोंने की अंगूठी पुरानी पर्याय है जिसका नाश होने पर उसकी नवीन पर्याय बाली का उत्पाद हुआ तथा दोनो ही स्थिति में सोने का गुण उसमे ध्रौव्य रहा !
शंका-प्रत्येक द्रव्य तीनो उत्पाद व्यय और ध्रौव्य रूप एक साथ कैसे रह सकता है कदाचित कालभेद से उसे उत्पाद और व्यय स्वरुप मान भी लिया जाए,क्योकि जिसका उत्पाद होता है उसका कालांतर में विनाश भी अवश्य होता है,वह ऐसी अवस्था में ध्रौव्य रूप नहीं हो सकता क्योकि जिसके उत्पाद व्यय होता है उसका ध्रौव्य स्वभाव मानने में विरोध आता है?
समाधान- इसका समाधान है की जिस समय द्रव्य की पुरानी पर्याय का विनाश होता है उसी समय नवीन पर्याय का उत्पाद होता है फिर भी उसका त्रिकालिक अवयव स्वभाव बना रहता है !
आचर्य समन्तभद्र स्वामी व्यक्त करते है है कि “घटका इच्छुक उसके नाश होने पर दुखी होता है,मुकुट का इच्छुक उसके उत्पाद होने पर हर्षित होता है,और सोने का इच्छुक मध्यस्थ रहता है !एक ही समय में शोक,हर्ष और नध्यस्थ भाव अकारण नहीं हो सकता जिससे सिद्ध होता है कि प्रत्येक द्रव्य उत्पाद,व्यय और ध्रौव्य युक्त होता है !”
आज विज्ञान कहता है की वस्तु का नाश कभी नहीं होता,केवल उसकी वर्तमान पर्याय(mode-state) बदलती है!जैनागम के इस दृष्टिकोण का विज्ञान भी समर्थन करता है! जैनागम कहता है वस्तु की नवीन पर्याय की उत्पत्ति होती है,पुरानी का नाश-व्यय होता है,तथा वस्तु का गुण सभी पर्याय में रहता है!
विशेष-१-अनादिकाल से रहने वाले शुद्ध धर्म,अधर्म,आकाश,काल और सिद्ध जीव द्रव्यों में उत्पाद,व्यय और ध्रौव्य होता है!प्रत्येक शुद्धद्रव्य में अगुरुलघुगुण के कारण,षट्गुणहानि वृद्धि रूप परिणमन प्रतिसमय होता है!किसी भी द्रव्य का अस्तित्व परिणमन के बिना असंभवहै!अत:सिद्ध भगवान् की केवल सांसारिक अवस्थों का अंत होता है,मुक्त अवस्था शुरू होती है!
३-षट्गुणहानिवृद्धि –
१-अनन्तभागहानि/वृद्धि,२-असंख्यातभागहानि/वृद्धि,३-संख्यातभागहानि/वृद्धि४-संख्यातगुण हानि/वृद्धि,५-असंख्यातगुणहानि/वृद्धि,६-अन्नतगुणहानि/वृद्धि
नित्यम्/ध्रौव्य–
तद्भावाव्ययंनित्यम् ३१
संधि-विच्छेद:-तद्+भाव+अव्ययं+नित्यम्
शब्दार्थ:-तद-उस (द्रव्य) के,भाव-भाव का,अव्ययं=नाश नहीं होना,नित्यम्-नित्य/ध्रौव्य है!
अर्थ-उस द्रव्य का स्वभावनष्ट नहीं होता,वह नित्य है,यद्यपि वस्तु प्रतिसमय परिणमनशील है तथापि उसमे एक रूपता बनी रहती है,जिसे कालांतर मेंदेख कर पहिचान सकते है कि यह वही वस्तु है,वस्तु/द्रव्य की इस एक रूपता को ही नित्यता कहते है जो कि उस वस्तु का स्वभाव है !
भावार्थ-जीव के जीवत्व/चेतनत्व का क्षय नहीं होना,उसका ध्रौव्यत्वहै!जैसे सिद्ध भगवान् की सांसारिक पर्याय काक्षय (व्यय) होकर,मुक्त पर्याय का आरम्भ (उत्पाद) होना तथा सिद्धावस्था में भी जीवत्व सदा रहेता है!इसी प्रकार पुद्गल का पुद्गल्त्व कभी नष्ट नहीं होता!
वस्तु द्रव्य की अपेक्षा,ध्रौव्य की अपेक्षा,नित्य है उत्पाद व्यय की अपेक्षा वस्तु अनित्य है!हम जीवत्व की अपेक्षा,नित्य और ध्रौव्य की अपेक्षा,नित्य अविनाशी है किन्तु पर्याय की अपेक्षा हमारी मृत्यु (व्यय) होती है फिर जन्म (उत्पाद) लेते है अत:,हम इस की अपेक्षा से अनित्य है!इस प्रकार दो विरोधी धर्म वस्तु में हमेशा विद्यमान रहते है!
शंका-जैन दर्शनानुसार प्रत्येक वस्तु प्रतिसमय परिणमनशील है फिर वह नित्य कैसे हो सकती है ?
समाधान-नित्यता से अभिप्राय यह नही है की वस्तु जिस रूप मे है वह सदैव उसी रूप में ही बनी रहेगी,उसमे कोई परिवर्तन नही होगा,बल्कि उसमे परिणमन के साथ साथ एक रूपता बनी रहना उसकी नित्यता है,जो की उसका स्वभाव है,जिसे देखकर हम पहिचान सकते है की वही वस्तु है!उक्त कथन का अभिप्राय है कि वस्तु नित्य भी है और अनित्य भी!जैसे जीव,पर्याय दृष्टि से अनित्य और द्रव्य दृष्टि से चेतनत्व होने के कारण नित्य है!पदार्थों में नित्यता सामन्य रूप की अपेक्षा से होती है और पर्याय की दृष्टि से सभी द्रव्य अनित्य है,इसीलिए संसार के सभी पदार्थ में दो विरोधी धर्म नित्य और अनित्य युगपत् विध्यमान होते है !
शंका-एक ही द्रव्य को नित्य और अनित्य कहना विरोधाभासी कथन है ,यदि नित्य है तो उत्पाद और व्यय के अभाव में अनित्यता नहीं बनती,यदि अनित्य है तो स्थिति का अभाव होने से नित्यता का व्याघात हो जाता है वस्तु में नित्यता और अनित्यता,दो विरोधी
धर्मो की सिद्धि निम्न सूत्र से होती है
अर्पितानर्पितसिद्धे:-३२
संधि-विच्छेद -अर्पित+अनर्पित+सिद्धे:
शब्दार्थ:-अर्पित-मुख्यता,अर्थात जिसको वक्ता वर्तमान में कहना चाह रहा है और अनर्पित=गौणता से अर्थात जिसको वक्ता अभी नहीं कहना चाह रहा है,सिद्धे=सिद्धी होती है!
अर्थ- मुख्यता /विवक्षा और गौणता (अविवक्षा ) से अनेक धर्मात्मक वस्तुओं का कथन सिद्ध होता है !किन्तु इस का अभिप्राय यह नहीं है की जिस गुण का मुख्यता से वर्णन किया जा रहा है उसके अतिरिक्त वस्तु के सभी धर्म/गुण सर्वथा ही गौण हो गए !मुख्यता और गौणता से किसी वस्तु के गुणों का कथन करने की व्यवस्था का कारण है कि एक समय में वस्तु के एक ही गुण का कथन किया जा सकता है !अत:किसी वस्तु के किसी धर्म की प्रमुखता और उस के अन्य गुणों की गौणता से ही वस्तु की सिद्धि होती है !
भावार्थ-वस्तु में विद्यमान दो विरोधी धर्मो की,सिद्धि अर्पित और अनर्पित से है!उद्धाहरण के लिये,जब हम किसी वस्तु कर वर्णन द्रव्य की अपेक्षा से करते है,द्रव्य की मुख्यता की अपेक्षा वर्णन करना अर्पित हुआ,इस समय हमने वस्तु की नित्यता सिद्ध करी,जब पर्याय की मुख्यता की अपेक्षा से वर्णन करेगे तब पर्यायदृष्टि मुख्य अर्थात अर्पित होगी और हम वस्तु की अनित्यता सिद्ध करते है !
अर्पित-मुख्य द्रव्य दृष्टि से में जीव नित्य हूँ इस समय पर्याय दृष्टि गौण अनर्पित हो गयी है!जब पर्यायदृष्टि की मुख्यता अर्थात अर्पित बनाया तो मैं अनादिकाल से जन्म -मरण कर रहा हूँ इसलिय अनित्य हूँ!पहले जिस धर्म को अर्पित बनाते है उसकी सिद्धी हो जाती है,दूसरा धर्म गौण हो जाता है फिर पहले को अनर्पित बनाकर दुसरे धर्म को अर्पित बनाकर उसकी सिद्धि हो जाती है!अत: मुख्यता और गौणता से वस्तु में विद्यमान दो विरोधी धर्मों की सिद्धी हो जाती है
पुण्य हेय है या उपादेय है?
शुद्धोपयोगी की अपेक्षा पुण्य हेय है,अशुभोपयोगी की अपेक्षा शुभुपयोग और पुण्य उपादेय है!शुद्धोपयोगी मुनिमहाराज की अपेक्षा शुभुपयोग,पुण्य हेय है ! अशुभोपयोगी की अपेक्षा शुभुपयोग-पुण्य उपादेय है
वस्तु में किते धर्म पाए जाते है?
वस्तु में अनेक धर्म विद्यमान होते है! एक ही जीव किसे की अपेक्षा पुत्र,किसी की अपेक्षा पिता,किसी की अपेक्षा भाई आदि है!वस्तु के इन अनेक धर्मों को अनेकांत कहते है!,अंत=धर्म,अनेक=बहुत!जब वस्तु के एक धर्म का वर्णन होता है,वह एकांत है!जब वस्तु में पाए जाने वाले अनेक धर्मों का वर्णन होता है उसे अनेकांत कहते है !
शंका:-सूत्र २६ में बताया है की स्कंध की उत्पत्ति भेद,संघात और भेद संघात दोनों से,अर्थात तीन प्रकार से होती है तो क्या दो परमाणु के संघात होने पर भी स्कंध की उत्पत्ति होती है !
समाधान:-दो परमाणुओं का संघात द्वारा बंध तब तक नहीं होता जब तक उनमे परस्पर रासायनिक क्रिया नहीं हो जाती है !जैसे-
रसायन विज्ञान में स्कन्धोत्पत्ति की क्रिया संघात द्वारा भी होती है!इस प्रक्रिया को सह संयोजन बंध के रूप में समझ सकते है!सहसंयोजी बंध में,अणु निर्माण में भाग ले रहे परमाणुओं के मध्य इलेक्ट्रान की साझेदारी से जो बंध बंधता है उसे सहसंयोजी बंध एवं निर्मित यौगिक को सहसंयोजे यौगिक (स्कंध) कहा जाता है !
1- H*-H =H2
हाइड्रोजन का १ परमाणु, दुसरे हाइड्रोजन परमाणु से संघात कर ,हाइड्रोजन गैस का एक अणु बनता है!परमाणु और अणु वैज्ञानिक मान्यता परिभाषा लिया गया है !जब की जैन दर्शन के अनुसार परमाणु पुद्गल का सूक्ष्मत अविभाज्य खंड है जो विभाजित नहीं किया जा सकता और स्कंध २ या २ से अधिक परमाणुओं के संयोग से निर्मित का स्कंध है !बिना रासायनिक क्रिया के कोई स्कंध नहीं बनता!
पुद्गल का स्वाभाविक रूप अणु/परमाणु है!कुछ में परस्पर बंध होता है और कुछ में नहीं होता है!निम्न सूत्र से बंध का कारण बताया है !
द्गल का स्वाभाविक रूप अणु/परमाणु है!कुछ में परस्पर बंध होता है और कुछ में नहीं होता है!निम्न सूत्र से बंध का कारण बताया है !
स्निग्धरूक्षत्वाद्बंध:-३३
संधिविच्छेद:-स्निगधत्वाद+रूक्षत्वाद+बंध
शब्दार्थ:-स्निग्धत्वाद् =चिकने और रूक्षत्वा[b]द्=रूखापना होना,बंध= बंध का कारण है![/b]
भावार्थ-अणु/परमाणु से अणु/परमाणु का परस्पर बंध उनमे विध्यमान स्निग्ध और रुक्ष गुणों के कारण होता है !
विशेष-
१-किसी परमाणुओं में स्निग्ध(+) और किसी में रुक्ष (-) गुण होते है!स्निग्ध और रुक्ष गुणों के अनंत अविभागीप्रतिच्छेद होते है!शक्ति के न्यूनतम अंश को अविभागी प्रतिच्छेद कहते है!एक एक परमाणु में अनंत अविभागी प्रतिच्छेद होते है जो घटते बढ़ते रहते है! ये घटते घटते किसी समय असंख्यात,संख्यात या इससे भी कम और कभी बढ़ते बढ़ते अनंत अविभागी प्रतिच्छेद हो जाते है!इस प्रकार परमाणुओं की स्निग्धता और रुक्षता में हीनाधिकता पायी जाती है,जिसका अनुमान स्कंध को देखकर हो सकता है!जैसे जल से अधिक स्निग्धता बकरी के दूध के घी में,उससे अधिक गाय के दूध के घी में,और उससे भी अधिक भैस के दूध के घी में होती है!इसी प्रकार धुल,रेत,बजरी में रुक्षणता क्रमश वृद्धिगतहै!इसी प्रकार परमाणुओं में भी हीनाधिक स्निग्धता/रुक्षता होती है जो कि उनके परस्पर बंध का कारण है!
कालद्रव्य के अणु शुद्ध रूप में है वे एक दुसरे से बंध को प्राप्त नहीं होते क्योकि उनमे स्निगध-रुक्ष गुण नहीं है! ये गुण मात्र पुद्गल द्रव्यों में है!
आत्मा का कर्मो से बंध,आत्मा में स्निग्ध-राग गुण,और रुक्ष=द्वेष गुण होने के कारण ही होता है!सिद्धावस्था में इन दोनों गुणों का आत्मा में अभाव होने से कर्म का बंध नहीं होता है !
सूत्र का जैन दर्शन और आधुनिक विज्ञान के परिपेक्ष में विश्लेषण –
जैनदर्शनानुसार-इस कथन को समझने के लिए वैज्ञानिक विश्लेषण से पूर्व,स्निग्ध एवं रुक्ष गुणों को वैज्ञानिक परिपेक्ष्य में समझना अत्यंत आवश्यक है !
तत्व मूलतः दो प्रकार के होते है !
१-धातु-वे तत्व जो प्रकृति में वैद्युत धनीय(+),क्षारीय गुण तथा कम विद्युत ऋणात्मकता(-) वाले जैसे सोना,चांदी,पारा,ताम्बा,जस्ता आदि होते है इनमे स्वाभाविक स्निग्धता (चिकनाई) होती है !
२-अधातु-वे तत्व जो प्रकृति में विद्युत ऋणीय(-),अम्लीय गुण एवं तत्वों की अपेक्षा अधिक वैद्युतऋणात्मकता(-)वाले,जैसे;सिलिकॉन,बोरोन,हीरा,कार्बन,ब्रोमिन,क्लोरीन आदि होते है इनमे स्वाभाविकता रूक्षता (रूखापन) है!इससे स्पष्ट हो जाता है की आचार्य उमा स्वामी जी ने स्निग्ध गुणों से युक्त धातुविक परमाणुओं का और रुक्ष गुणों से युक्त अधातुविक परमाणु में बंध सम्भव कहा है !
वैज्ञानिको के अनुसार विश्लेषण –
धातु-धातु,अधातु-अधातु और धातु-अधातु के परमाणु,परस्पर बंध कर स्कंध के निर्माण करने में सक्षम है !
१-स्निग्ध गुण युक्त धातुविक परमाणु का स्निग्ध धातुविक परमाणु से बंध –
1-(ताम्बा)Cu +(जस्ता)(Zn)+(निकिल )(Ni=जर्मन सिल्वर
2-(लोहा)Fe+(निकिल)Ni+(क्रोमियम)Cr=स्टेनलेस स्टील
२-रुक्षगुण युक्त अधात्विकपरमाणु का रुक्ष गुण युक्त अधात्विक परमाणुओं से बंध –
1- N +3 H ———> ५०० डिग्री से. =2NH
2 2 3
नाइट्रॉन हाइड्रोजन अमोनिया
2- N + 3 Cl =2NCl
2 2 3
नाइट्रोजन क्लोरीन नाईट्रोजन क्लोराइड
3- 2H + O =2H O
2 2 2
हाईड्रोजन आक्सीजन जल
३-स्निग्ध गुण युक्त धात्विक परमाणु का रुक्ष गुण युक्त अधात्विक परमाणु से बंध –
1-2Na + Cl =2 NaCl
2
सोडियम क्लोरीन सोडियमक्लोराइड (नमक)
2- Cu + S ———-> ऊष्मा = CuS
ताम्बा सल्फर(गंधक) क्यूपरीक सल्फाइड
अणुओ के बंध की शर्ते
नजघन्यगुणनाम् -३४
संधि-विच्छेद:-न+जघन्य+गुणनाम्
शब्दार्थ:-जघन्य (कम से कम),गुणनाम्=गुणों वाले अणु का बंध,न=नहीं होता
अर्थ-जिन परमाणुओं में स्निग्धता और रुक्षता का एक अविभागी परिच्छेद रह जाता है उनमे परस्पर बंध नहीं होता है
भावार्थ-जिन परमाणुओं में स्निग्ध और रुक्ष गुण न्यूनतम,(अर्थात एक अविभागी प्रतिच्छेद/अंश है) उनका बंध नहीं होता!
एक स्निगध +ve का एक रुक्ष -ve से बंध नहीं होता!, एक रुक्ष(-) का एक रुक्ष (-) से बंध नहीं होता,
एक स्निग्ध +ve का एक स्निग्ध +ve से बंध नहीं होता!
परमाणुओं में ये अनंत अविभागी प्रतिच्छेदों की सख्या घट कर असंख्यात,संख्यात और उससे भी कम हो जाती है और इसी प्रकार बढ़ते बढ़ते अन्नंत भी होती है
क्या जघन्य गुण वाले परमाणु का कभी भी बंध नहीं होगा! उनमे परिणमन उनकी योग्यता अनुसार तो हमेशा होता रहता है,जब वे जघन्य अंश से ऊपर उठेंगे तब वे बंध करने योग्य होगे!
आचार्य उमा स्वामी का अभिप्राय जघन्य गुणानाम से दो स्निग्ध-स्निग्ध,रुक्ष-रुक्ष अथवा स्निग्ध रुक्ष परमाणुओं ,जिनमे रुक्ष और स्निग्ध गुणों के जघन्य अर्थात १ अविभागी प्रतिच्छेद है उनमे बंध नहीं होता से अभिप्राय, परमाणुओं की विद्युत ऋणात्मकता में अंतर १ या १ से कम होता है तो उनमे बंध नहीं होता जो की निम्न दृष्टान्त से स्पष्ट है
सूत्र का जैन दर्शन और आधुनिक विज्ञान के परिपेक्ष में विश्लेष-
सूत्र में आचार्य उमा स्वामी स्पष्ट करते है कि;न -नहीं,जघन्य-न्यूनतम, गुणानाम्-गुणों वाले परमाणुओं;में परस्पर भेदसंघात प्रक्रिया द्वारा बंध होकर स्कन्धोत्पत्ति नहीं होती है;अर्थात जिन परमाणुओं की विद्युत ऋणात्मकता का अंतर १ या कम होता है वे परस्पर भेद संघात(विद्युत संयोजनी ;(Eletro Valent Bonding) प्रक्रिया द्वारा बंध कर स्कन्धोत्पत्ति (स्कंध का निर्माण-Molecule form) नहीं करते है !
उद्धाहरण के लिए :-
परमाणु विद्यत ऋणात्मकता विद्युत ऋणात्मकता में अंतर विद्युत संयोजनी बंध से स्कन्धोत्पत्ति
१-कार्बन २.५ १ स्कन्धोत्पत्ति नहीं होती
आक्सीजन(O) ३. ५
२-क्लोरीन ३.० १ स्कन्धोत्पत्ति नहीं होती
फ्लोरीन ४,०
गुणसाम्येसदृशानाम् -३५
संधि-विच्छेद:-गुण+साम्ये+सदृशानाम्
शब्दार्थ-गुणसाम्ये-दो परमाणुओं के सामान गुण (अविभागीपरिच्छेद) होने पर , सदृशानाम्-सजातीय होने पर अर्थात स्निग्ध-स्निग्ध अथवा रुक्ष -रुक्ष परमाणुओं का बंध नहीं होगा!
भावार्थ-यदि बंधने वाले दो सजातियों परमाणु/अणुओं के गुणों में समानता अर्थात शक्ति के अविभागी प्रतिच्छेद समान होने पर उनमे परस्पर बंध नहीं होता जैसे २ स्निग्ध गुण वाले परमाणु का दुसरे दो स्निगध गुण वाले परमाणु,दो रुक्ष गुण वाले दो रुक्ष गुण वाले परमाणु,और दो स्निग्ध गुण वाले परमाणु का २ रुक्ष गुण वाले परमाणु के साथ बंध नहीं होता है!
यदि गुणों की संख्या में विषमता हो तो सजातीय परमाणुओं का भी बंध होता है!अर्थात १ स्निग्ध( +) परमाणु का दो रुक्ष(-) परमाणु के साथ,एक रुक्ष (-) का २ स्निग्ध(+) परमाणु ,१ स्निग्ध (+) परमाणु का २ स्निग्ध (+) परमाणु ,१ रुक्ष (-) परमाणु का २ रुक्ष (-) परमाणु के साथ बंध हो सत्ता है
यही यह सूत्र बताने के लिए है !सूत्र में सदृश पद सूचित करता है कि दोनों बंधने वाले परमाणुओं के गुणों(अविभागी प्रतिच्छेदों) में असमानता होने पर ही,परमाणुओं में बंध होता है !
इस सूत्र का जैन दर्शन और आधुनिक विज्ञान के परिपेक्ष में विश्लेष-
१-गुण साम्ये सदृशानाम् !!
(गुण साम्ये), दो परमाणुओं में समान गुण अर्थात स्निग्ध और रुक्ष गुण समान होने पर,(सदृशानाम्)एक समान स्निग्ध और रुक्ष गुणवाले परमाणुओं में भेद-संघात प्रक्रिया द्वारा परस्पर बंध होकर स्कन्धोत्पत्ति नहीं होती है!
आधुनिक विज्ञान के अनुसार भी एक सामान विद्युत ऋणात्मकता वाले परमाणुओं में भेद संघात प्रक्रिया द्वारा परस्पर बंध से स्कन्धोत्पत्ति (molecule Formation ) नहीं होती है !
नोट-विद्युत ऋणात्मकता किसी एक परमाणु की वह शक्ति है जिसे दुसरे परमाणु के इलेक्ट्रान पर डालकर उस से वह इलेक्ट्रान शेयर करता है !
उद्धाहरण के लिए :-
नाईट्रोजन(N) और क्लोरीन(Cl) की विद्युत ऋणात्मकता ३
फॉस्फोरस(P) और हाइड्रोजन (H) की २.१(स्कंध का निर्माण
आर्सेनिक (As)और आयोडीन( I) की २.२
आक्सीजन(O)-आक्सीजन(O) की ३.५
बोरोन(B) २,-हाइड्रोजन (H)की २.१ है,
इनके परमाणुओं में भेद-संघात(Electro Valent bonding) प्रक्रिया द्वारा बंध नहीं होता है किन अणुओं/परमाणुओं का किन परिस्थितियों में बंध होता है –
द्वयधिकादिगुणानां तु ३६
संधि विच्छेद -द्वी+अधिक+आदि+गुणानां+तु
शब्दार्थ-तु=लेकिन,द्वयधिकादिगुणानां- केवल ,परस्पर में दो से अधिक,गुण वाले परमाणुओं का बंध होता है!उससे कम या अधिक गुणों का अंतर होने पर बंध नहीं होता
भावार्थ- यदि एक स्निग्ध अथवा रुक्ष परमाणु में दो, तीन चार आदि शक्तिंश (अविभागी प्रतिच्छेद) है और दुसरे में क्रमश: ४,५,६ आदि रुक्ष अथवा स्निग्ध शक्तिंश है तभी दोनों परमाणुओं में बंध हो सकता है, क्योकि उनके गुण परस्पर दो अधिक है! दो से कम अथवा अधिक अंतर होने पर सजातीय और विजातीय परमाणुओं में बंध नहीं हो सकता! जैसे किसी स्निग्ध अथवा रुक्ष, २ गुण वाले परमाणु का बंध २, ३, ५, संख्यात,असंख्यात गुणों वाले स्निग्ध अथवा रुक्ष परमाणुओं से बंध नहीं हो सकता! केवल चार गुण वाले परमाणु में ही बंध संभव है! यह बंध स्निग्ध का स्निग्ध के साथ,रुक्ष का रुक्ष के साथ व स्निग्ध का रुक्ष के साथ है !२ अंशों का अंतर होने पर ही बंध होगा !
प्रोटोन में २ क्वार्क (+) के होते है वही तीसरा क्वार्क (-) वाला होता है ये २ अधिक गुणों वाले का बंध हुआ !पेंटा क़वर्क में ५ क्वार्कों का बंध होता है (उप्र के ३ क्वार्कों का बंध अन्य २ क्वार्कों के साथ होता है जिससे कुल क़वार्क ५ होते है !इस प्रकार न्यूट्रॉन में २ क्वार्क (-) होते है वही तीसरा (+) होता है यह दो अधिक गुण वालों का बंध है !
,अधिकादि -दो से अधिक, गुणानां-स्निग्ध और रुक्ष गुणों में अंतर होने पर,तु–परस्पर परमाणुओं में भेद-संघात प्रक्रिया द्वारा बंध होता है!अर्थात दो परमाणुओं के स्निग्ध और रुक्ष गुणों,अर्थात विद्युत ऋणात्मकता में दो अधिक होने पर परस्पर में भेद संघात प्रक्रिया द्वारा बंध कर के स्कन्धोत्पत्ति होती है!आधुनिक विज्ञान के रसायन विज्ञान के अनुसार भी भेद संघात ;विद्युत संयोजनी बंध (EletroValent Bonding) के द्वारा स्कन्धोत्पत्ति के निर्माण (molecule Formation) के लिए,बंध निर्माण में भाग ले रहे परमाणुओं की विद्युत ऋणात्मकता २ से अधिक होना आवश्यक है !
उद्धाहरण के लिए :-
परमाणु विद्यत ऋणात्मकता विद्युत ऋणात्मकता में अंतर विद्युत संयोजनी बंध से स्कन्धोत्पत्ति
१-सोडियम (Na १ २ सोडियमक्लोराइड (NaCl )
क्लोरीन (Cl) ३
२-पोटेशियम(K) ०.८ २.२ पोटेशियमक्लोराइड KCl
क्लोरीन (Cl) ३.०
स्कन्धोत्पत्ति के बाद उत्पन्न स्कंध की प्रकृति –
बन्धेऽधिकौ पारिणामिकौ च – ३७
संधिविच्छेद:-बन्धे+अधिकौ+पारिणामिकौ+च
शब्दार्थ:-बन्धे-बंध होने पर,अधिकौ-अधिक गुणों वाला परमाणु ,पारिणामिकौ-परिणमन कराने वाला,च=भी होता है!
अर्थ- और बंध होने पर अधिक गुणों वाला परमाणु,कम गुण वाले परमाणु को अपने अनुरूप परिणमन कर लेता है !
भावार्थ:-जब दो परमाणु अपनी पूर्वास्था को छोड़कर तीसरी अवस्था धारण करते है तभी नवीन स्कंध की उत्पत्ति होती है!यदि ऐसा नहीं हो तो जैसे कपड़े में काले और सफ़ेद धागे परस्पर में संयुक्त होते हुए भी अलग अलग पड़े रहते है वैसे ही परमाणु भी पड़े रहे.और स्कंध की उत्पत्ति ही नहीं हो!अत: अधिक (१०अंश )गुण वाले रुक्ष परमाणु से यदि कम (८ अंश) वाले स्निग्ध परमाणु का बंध होता है तो स्कन्ध रुक्ष गुणों से परिपूर्ण (अम्लीय) होगा!अर्थात दो परमाणुओं के बंध में कम अंशगुण वाला परमाणु अधिक अंशगुण वाले परमाणु के अनुरूप परिणमन कर दोनों परमाणु परिणमन कर नवीन स्कंध में परिवर्तित हो जाते है!
दो अधिक गुणों वाले रमाणुओं का ही बंध होकर स्कंध क्यों बनता है ?
समाधान-बंध करने वाले परमाणुओं के लयवर्त गुणों में दो का अंतर इसलिए रखा है क्योकि यदि अधिक अंतर होगा तो कम गुणों वाला परमाणु लयवर्त तो हो जाएगा किन्तु तीसरी स्कंध अवस्था प्राप्त नहीं कर सकेगा क्योकि वह अपने प्रभाव से अधिक गुण वाले परमाणु को प्रभावित नहीं कर पायेगा!समान गुण होने पर भी बंध इसलिए नहीं हो पायेगा क्योकि दोनों परमाणु समान बलशाली हो जाएंगे ,जिससे एक दुसरे के अनुरूप परिणमन कर नहीं पाएंगे और अलग अलग ही रह जाते है !
गीले गुड़ के समान,एक अवस्था से दुसरी अवस्था को प्राप्त करना ,पारिणामिक कहलाता है !जैसे अधिक् मीठे रस वाला गुड़ ,उस पर पडी धुल को अपने गुण रूप से परिणमाने के कारण पारिणामिक होता है इसी प्रकार अधिक गुण वाला पारिणामिक होता है !
इस सूत्र का जैन दर्शन और आधुनिक विज्ञान के परिपेक्ष में विश्लेष-
बंधेऽधिकौ पारिणामिकौ च
बंधेऽधिकौ पारिणामिकौ च -और बंध करने वाले परमाणु में अधिक गुण रखने वाला परमाणु कम गुण वाले परमाणु को अपने रूप परिणमन करवा लेते है! रसायन विज्ञान मान्य स्कन्धौ अणु (molecules) में भी प्राय: यही देखा जाता है!जब स्निग्ध गुण युक्त धातु का परमाणु रुक्ष गुण युक्त अधातु के परमाणु परस्पर बंध कर स्कन्धो त्पत्ति (molecule formation) करते है तब निर्मित स्कंध (molecule) उसी गुण का होता है जिसका द्रव्यमान (mass) अधिक हो! यदि स्कंध (molecule) निर्माण में भाग ले रहे परमाणु में से यदि स्निग्ध गुण युक्त धातु (क्षारीय) के परमाणु का द्रव्य मान अधिक है तो निर्मित स्कंध क्षारीय प्रकृति का होगा,इसके विपरीत यदि रुक्ष (अम्लीय) अधातु के परमाणु का द्रव्यमान अधिक हो तब निर्मित स्कंध (molecule) अम्लीय प्रकृति का होगा क्योकि क्षारीय गुण धातु और अम्लीय गुण अधातु का विशिष्ट गुण है!
इन तथ्यों को हम निम्न उद्धहरणों से समझ सकते है –
परमाणु प्रकृति द्रव्यमान निर्मित्त स्कंध निर्मित स्कंध की प्रकृति
१-मैंगनीज़ (Mn)स्निग्ध ५४x१ =५४ मैंगनीज़मोनो आक्साइड (MnO) क्षारीय
आक्सीजन (O) रुक्ष १६ x १ =१६
2-मैंगनीज़ (Mn)स्निग्ध ५४x२=१०८ मैंगनीज़ आक्साइड (Mn O ) अम्लीय 2 7
आक्सीजन (O) रुक्ष १६ x ७ =११२
उपर्युक्त तीन सूत्र के माध्यम से आचारश्री ऊमा स्वमी जी ने हमे अवगत करवाया कि दो परमाणुओं को भेद संघात (विद्युत संयोजनी बंध -electro valent bonding) से दो परमाणुओं को बंध कर स्कंध का निर्माण किन परिस्थियों में होगा और किन में नहीं होगा !उन्होंने बताया कि दो परमाणुओं में एक समान स्निग्ध रुक्ष गुण अर्थात एक समान विद्युत ऋणात्मकता वाले परमाणुओं में तथा उनकी विद्युतऋणात्मकता में एक या एक अंतर होगा तब वे स्कन्धोत्पत्त्ति में असक्षम होंगे,किन्तु यदि उनका अंतर दो या इससे अधिक होगा तभी स्कन्धोत्पत्ति में सक्षम होंगे!
द्रव्य को परिभाषित करते है आचार्य-
गुणपर्ययवदद्रव्यम् ३८
सन्धिविच्छेद-गुण+पर्ययवद+द्रव्यम्
शब्दार्थ-गुण=गुण युक्त,पर्ययवद-पर्याय युक्त,द्रव्यम्-द्रव्य कहते है!
अर्थ-गुण और पर्याय युक्त द्रव्य होता है !
गुण-द्रव्य में अनेक पर्यायों के व्यतीत होने पर भी जो द्रव्य से कभी पृथक नहीं होता वह उस द्रव्य का गुण है!जैसे जीव के चेंतनत्व,ज्ञान,वीर्य,दर्शनादि तथा पुद्गल के स्पैश रस ,गंध,और वर्ण (रूप) गुण है! इसलिए गुण को अन्वयी कहते है!
पर्याय- द्रव्य में क्रम से होने वाली विक्रिया होती रहती है,जो द्रव्य में आती जाती रहती है,वह पर्याय है जैसे;जीव की नरक,तिर्यंच,देव और मनुष्य गतियां,जीव द्रव्य की पर्याय है!इसलिए पर्याय को व्यतिरेकी कहते है!
भावार्थ-द्रव्य गुण पर्याय युक्त होता है!कोई भी द्रव्य गुण और पर्याय रहित हो ही नहीं सकता!जैसे जीव द्रव्य,ज्ञान-दर्शनादि गुण के बिना तथा किसी संसारी अथवा सिद्ध पर्याय के बिना हो ही नहीं सकता!प्रत्येक द्रव्य की पर्याय और गुण अवश्य होंगे’
विशेष-
१- द्रव्य में गुण और पर्याय न तो सर्वथा भिन्न है और नहीं अभिन्न! वास्तव में द्रव्य में गुण और पर्याय दोनों है और अभिन्न है!लेकिन वर्णन करते हुए सबका अलग अलग वर्णन करते है जैसे यह जीव की नरक,मनुष्य,देव अथवा तिर्यंच पर्याय है!यद्यपि गुण और पर्याय के अपेक्षा द्रव्य अलग नहीं हो सकता किन्तु कथन की अपेक्षा उनका वर्णन अलग से किया जाता है! उद्धाहरण के लिए स्वर्ण चिकना,पीला होता है!उनके ये गुण स्वर्ण से अभिन्न नहीं है क्योकि यदि हम कहे की हमें पीले रंग रहित स्वर्ण दे दीजिये तो असंभव है!किन्तु जब कथन करते है तो कहेंगे पीला,चिकना स्वर्ण दे दीजिये!
काल भी द्रव्य है
कालश्च -३९
संधि विच्छेद-काल :+च
शब्दार्थ-काल:-काल,च -भी (‘च’ का अन्वय सूत्र २ “द्रव्याणि” के साथ है)
अर्थ-काल भी द्रव्य है!
भावार्थ- काल भी द्रव्य है क्योकि वह भी गुण,पर्याय तथा उत्पाद,व्यय,ध्रौव्य युक्त है!
विशेष-
१-इस प्रकार सूत्र १ में धर्म,अधर्म,आकाश और पुद्गल ४, सूत्र ३ में जीव-१ और ३९ में काल -१ ,उल्लेखित कुल द्रव्य छः ही हैं हीनाधिक नही !
२-सूत्र १, में चार द्रव्यों के साथ, काल द्रव्य का कथन नहीं किया गया क्योकि उस सूत्र में अजीव एवं कायावान (बहुप्रदेशी) द्रव्यों का उल्लेख कियाहै जबकि कालद्रव्य कायावन नहीं है,एक प्रदेशी है!
३ -काल द्रव्य होने की सिद्धि-
काल द्रव्य में ध्रौव्य पाया जाता है क्योकि सदा से उसका स्वभाव स्थायी है,यह ध्रुवता स्व निमित्तिक है!उत्पाद और व्यय ,दोनों ‘स्व’ और ‘पर’ निमित से है!काल द्रव्य अनंत पदार्थों के प्रति समय परिणमन में कारण है,अत: कार्य के भेद से -कारण में प्रति समय भेद होना जरूरी है,यह पर निमित्तक उत्पाद व्यय है तथा काल द्रव्य में भी अगुरुलघु गुण है जिस से षटगुणहानिवृद्धि की अपेक्षा प्रति समय उत्पाद व्यय ‘स्व’ निमित्तक भी होता है!
दूसरा लक्षण काल द्रव्य;गुण-पर्याय युक्त है!काल द्रव्य में सामन्य और विशेष दोनों गुण है! काल द्रव्य समस्त द्रव्यों की वर्तना का हेतु है,यह उसका विशेष गुण है क्योकि यह अन्य किसी द्रव्य में नहीं है!अचेतनत्व, अमूर्तिकत्व, सूक्ष्मत्व,अगुरुलघुत्व,इसमें सामान्य गुण है जो की अन्य द्रव्यों में भी पाये जाते है !उत्पाद,व्यय और ध्रौव्य से युक्त होने के कारण काल भी द्रव्य है!
यह अमूर्तिक है क्योकि इसमें रस,गंध,स्पर्श और वर्ण नहीं पाये जाते और
ज्ञान,दर्शनादि चेतन के गुणों के अभाव होने से अचेतन है !
काल द्रव्य आस्तिकाय नहीं है अर्थात एक प्रदेशी है क्योकि लोकाकाश के प्रत्येक प्रदेश पर एक एक कालाणु,रत्नों की राशि की भांति स्थित है जो की स्निग्ध-रुक्ष गुण के अभाव में स्कंध नहीं बनाते, परस्पर मिलते नहीं हैं !इसलिए प्रत्येक कालणु,एक एक काल द्रव्य है! काल द्रव्य एक नहीं अपितु, जितने लोकाकाश के असंख्यात प्रदेश है उतने ही असंख्यात काल द्रव्य है!कालणु निष्क्रिय है क्योकि यह एक स्थान से दुसरे स्थान गमन नहीं करते ,जहाँ के तहाँ स्थित रहते है !ये अनादिकाल से है और रहेंगे
कालद्रव्य कितने समय वाला है
सोऽनन्तसमयः ४०
संधिविच्छेद :-सो+अनन्त+समयः
शब्दार्थ सो-वह काल द्रव्य,अनन्त=अनंत,समयः=समय वाला है!
अर्थ-वह काल द्रव्य,अनंत समय वाला है
भावार्थ-वह काल द्रव्य अनादिकाल से है और अनंत काल तक रहेगा! यह अनश्वर है!
विशेष-
समय-एक पुद्गल परमाणु मंद गति से,आकाश के एक प्रदेश से निकटतम दुसरे प्रदेश पर, जाने में जितना काल लेता है वह एक समय है,यह व्यवहार काल की सूक्षमत: इकाई है!१-समय-काल का सूक्षमत: अविभागी भाग है! केवली भगवान् का विषय होने के कारण इस को समझाया नहीं जा सकता है फिर भी इसकी तुलना एक पलक झपकने में लगे काल से करी जा सकती है!एक बार पलक झपकने में असंख्यात समय लगते है!
वर्तमानकाल एक समय प्रमाण है क्योकि एक समय काल व्यतीत हो जाने पर वह भूत होकर, दूसरा समय उसका स्थान लेकर वर्तमान कहलाता है,किन्तु भूत और भविष्यत काल अनन्त समय वाले है!
व्यवहारकाल;भूत,वर्तमान और भविष्यत्काल सहित अनन्त समय का है इसकी समय,आवली,सैकंड,मिनट,घंटा,दिन, पक्ष,माह,वर्ष,युग,लक्ष,पूर्वांग,पूर्व,अचल तक अन्य ईकाईयां है!व्यवहारकाल,निश्चयकाल की पर्याय है!
यह सूत्र,निश्चय काल का ही प्रमाण बताता है क्योकि एक कालाणु,अनन्त पर्यायों की वर्तना में कारण है,इसलिए उपचार से कालाणु को अनन्त कह सकते है !
निश्चयकाल द्रव्य-लोककाश के,प्रत्येक प्रदेश पर,रत्नों की राशि के समान,एक एक कालाणु स्थित है उसे निश्चय काल द्रव्य कहते है! वर्तना उसका कार्य है !
द्व्याश्रयानिर्गुणा गुणाः ४१
संधि विच्छेद:-द्रव्य+आश्रय+अनिर्गुणा +गुणाःशब्दार्थ- द्रव्य-जो द्रव्य के,आश्रय-आश्रय से रहते हो और,अनिर्गुणा-अन्य गुण उन गुणों में नहीं पाए जाए,गुणाः=उन्हें गुण कहते है!
अर्थ-जो द्रव्य के आश्रय से रहता है,सदैव द्रव्य में रहता है,और जिसमे स्वयं दूसरा गुण नहीं रहता,उसे गुण कहते है!
भावार्थ-ज्ञान और दर्शन जीव के गुण,जीव द्रव्य के आश्रय पाए जायेगे,जीव होगा तो यह गुण निश्चित रूप से होंगे !ज्ञान में दर्शन,सुख,चरित्र अन्य कोई गुण नहीं है,दर्शन गुण में;ज्ञान,/सुख गुण नहीं है! किन्तु वह जीव में है! अर्थात जो द्रव्य के आश्रय तो रहते हो, द्रव्य के बहार न पाए जाते हो,जैसे ज्ञान दर्शन हमें जीव के अतिरिक्त किसी अन्य द्रव्य में नहीं मिल सकते! ये जीव में ही मिलेंगे! कोई भी गुण किसी अन्य गुण में हस्तक्षेप नही कर सकता (कोई भी गुण किसी अन्य गुण में encroachment नही करता
गुण के भेद-
१-सामान्यगुण- अन्य द्रव्यों में भी पाए जाते है जैसे अस्तित्व,वस्तुत्व,प्रमेत्व ,अगुरुलघुत्व आदि!
और
२-विशेष गुण-उसी द्रव्य में पाए जाते है जैसे जीव में ज्ञान दर्शन;पुद्गल के स्पर्श ,रस ,गंध,वर्ण आदि
आचार्यश्री पर्याय की परिभाषा बताते हुए कहते है –
तदभाव:परिणाम: !!४२!!
संधि-विच्छेद:-तदभाव:+परिणाम:
शब्दार्थ-तदभाव:-जो द्रव्य,जिस रूप में है।परिणाम:-पर्याय है!
अर्थ:-जीव,धर्म,अधर्म,पुद्गल,आकाश और कालद्रव्य है,उनके उसी रूप रहने को परिणाम/पर्याय कहते है!जैसे जीव की नर,देव आदि पर्याय है! नर में बालक का बालयपन उसकी बालक पर्याय है !
भावार्थ-अंगुली को मोड़ते है,तो जिस कोण में वह मुड़ कर स्थिर होती है वही उसकी पर्याय है! हम खड़े है तो हमारी पर्याय खडी है,बैठने पर बैठी पर्याय है!जिस द्रव्य का जो स्वभाव होता है वही उसका भावहै,जैसे धर्मद्रव्य का स्वभाव पुद्गल और जीव की गति में उत्प्रेरक सहायक होना है!धर्मद्रव्य का परिणमन सदा इसी रूप होगा!जीवद्रव्य का स्वभाव चेतनत्व/ज्ञान-दर्शनादि है वह परिणमन सदा उसी रूप करेगा !
विशेष-
१-इन ४२ सूत्रों का हमें तीनोयोग से दत्तचित्त होकर स्वाध्याय कर,अपने जीवन में अंगीकार करना चाहिए!जिससे हमारे वर्तमान और अन्य भवों की गुणवत्ता में उत्थान होकर हमारा कल्याण हो सके![/b]
२-हमारे युवा वर्ग ही नही अपितु प्रौढ़वर्ग भी बहुदा संशयवश,कि ‘हमारे आध्यात्मिक ग्रंथों में उल्लेखित द्रव्य,तत्व,पदार्थ आदि वास्तव में सही भी है या किसी ने प्रमाद वश गलत तो नही इनमे प्रतिपादित कर दिया है” धर्म से विमुख होने लगते है!इस अध्याय के सूत्रों को स्वध्याय से समझने और वैज्ञानिक कसौटी पर तुलना करने के पश्चात मुझे दृढ विशवास है कि युवा और प्रौढ़ सभी वर्गों में अपने शास्त्रों के प्रति श्रद्धान में प्रगाढ़ता आएगी,उनका सम्यक्त्व दृढ परिपक्व होगा क्योकि हमारे सच्चे(सत्या महाव्रती पूर्वाचार्यों द्वारा प्रतिपादित) शास्त्रों में लगभग आज से २६०० वर्ष पूर्व भगवान महावीर की प्रतिपादित वाणी उन्नीस और बीसवी सदी के वैज्ञानिको के अनुसंधान से भी प्रमाणित हो रही है!
आज का बच्चा भी प्रमाण के बिना किसी बात का हृदयांगम करने के लिए तैयार नही होता !यह अध्याय उनकी अधिकाँश जिज्ञासाओं को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से शांत करने में सहकारी होगा!
मुनि श्री 108 प्रणम्यसागरजी तत्वार्थ सूत्र with Animation
अधिक जानकारी के लिए ….
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44
उर्ध्व लोक का वर्णन
देवों के भेद
देवाश्चतुर्णिकाया: !!१!!
संधि विच्छेद -देवा:+चतुर्णिकाया:
शब्दार्थ :-देवा:-देव ,चतुर्णिकाया-चार निकाय के होते है
अर्थ-देवों के चार निकाय /भेद ;भवनवासी,व्यंतर,ज्योतिष्क और वैमानिक है !
भावार्थ -देवगति नामकर्म के उदय से देवगति में उत्पन्न होकर नाना द्वीप,समुद्रों और पर्वत आदि रमणीय स्थानो पर क्रीड़ा करते है उन्हें देव कहते है उन देवों के चार भेद ;भवनवासी,व्यंतर,ज्योतिष्क और वैमानिक है!
विशेष –
उर्ध्व लोक-अनादिनिधन त्रिलोक में मृदंग और तबले के आकार के,जम्बूद्वीप के विदेहक्षेत्र के उत्तर और देवकुरु क्षेत्र में स्थित १०००४० महायोजन ऊँचे सुदर्शन समेंरू पर्वत की चूलिका से १ बाल के अंतराल से ७ राजू ऊँचे उर्ध्व लोक में वैमानिक देवो में इंद्र,देव सोलवे स्वर्ग,तक और उसके ऊपर नव ग्रैयविक,नव अनुदिशों और पांच अनुत्तरों में अहमिन्द्र निरंतर सांसारिक सुखों को भोगते है!सिद्ध शिला के ऊपर तनुवातवलय से शीर्ष स्पर्श करते हुए ५२५ धनुष मोटे और ४५ लाख योजन विस्तार वाले सिद्धालय में अनन्तानन्त सिद्ध परमेष्ठी अनंत चतुष्कक सहित आनंदपूर्वक अनंत कल तक विराजमान है!
भवनत्रिक देवों के लेश्या का विभाग –
आदितस्त्रिषुपीतान्तलेश्या:!!२!!
संधि विच्छेद -आदितस्+त्रिषु+ पीत+अंत + लेश्या:!!
शब्दार्थ-आदित पहले के, त्रषु-तीनों निकाय के,पीत+अंत-पीत तक,लेश्या:-लेश्याए होती है !
अर्थ-पहले के तीन निकायों के देवो की पीत लेश्या तक अर्थात कृष्ण,नील ,कापोत और पीत चारों लेश्याए होती है !
भावार्थ-आदि के तीन अर्थात भवनवासी,व्यंतर और ज्योतिष्क देवों के कृष्ण,नील,कापोत और पीत चार लेश्याए होती है!
विशेष-तीनों भवनत्रिक;भवनवासी,व्यंतर और ज्योतिष्क देवों की पर्याप्त अवस्था में सदा एक ही पीत लेश्या पायी जाती है!किन्तु नियम है कि कृष्ण,नील और कापोत लेश्या के मध्यमअंश के साथ मरे हुए कर्मभूमियाँ मिथ्यादृष्टि मनुष्य और तिर्यंच तथा पीत लेश्या के मध्यमअंश से मरे भोगभूमियाँ मिथ्यादृष्टि भवनत्रिक में उत्पन्न होते है,इसीलिए इनकी अपर्याप्त(विग्रहगति में निर्वतपर्याप्तक अवस्था की अपेक्षा) अवस्था में कृष्ण,नील और कापोत लेश्या होती है इसके अतिरिक्त इनकी पीत लेश्या ही होती है !इसीलिये यहाँ भवनत्रिको की चार लेश्याए बताई है !
निष्कर्ष-यहाँ भाव लेश्या की अपेक्षा वर्णन है द्रव्य लेश्या तो पीत ही होती है!कोई जीव मरण कर देवगति में गमन करता है तो अपर्याप्त अवस्था में देवों की वही लेश्या होती है जिसमे मरण हुआ है!परन्तु पर्याप्त अवस्था में सिर्फ पीत लेश्या होती है!
चार निकायों के देवों के प्रभेद-
दशाष्टपञ्चद्वादशविकल्पा:कल्पोपपन्न पर्यन्ता: !!३!!
संधि विच्छेद:-दश+अष्ट+पञ्च+द्वादश+विकल्पा:+कल्पोपपन्न+पर्यन्ता:
शब्दार्थ-
दश-दस,अष्ट-आठ,पञ्च-पांच,द्वादश-बारह,विकल्पा:-भेद से,कल्पोपपन्न-सोलहवे स्वर्ग ,पर्यन्ता:-तक
अर्थ-कल्पोपपन्न अर्थात १६ वे स्वर्ग तक देवों के क्रमश: दस, आठ,पांच और १२ भेद है!
भावार्थ- भवनवासी-दस,व्यतर-आठ,ज्योतिष्क-५ और वैमानिक देवों के (सोलहवे स्वर्ग तक) बारह भेद है!
शंका -१६वे स्वर्ग तक इन्द्रों की अपेक्षा बारह भेद कैसे होते है ?
समाधान- वैमानिक देवों के दो भेद है!
कल्पोपन्न-सोलहवे स्वर्ग तक उत्पन्न होने वाले देव और
कल्पातीत-सोलहवे स्वर्ग से ऊपर नव ग्रैवियक,अनुदिशो और पांच अनुत्तरों में उत्पन्न होने वाले देव !
पहले के चार स्वर्गों और अंतिम के चार स्वर्गों में एक एक इंद्र होते है ,मध्य के आठ स्वर्गों में दो-दो स्वर्गों में एक-एक इंद्र होते है!इस प्रकार १६ स्वर्गों में बारह इन्द्रो की व्यवस्था है !१६ स्वर्गों में बारह ही प्रतीन्द्र है!
देवों के निकायोँ में सामान्य भेद –
इन्द्रसामानिकत्रायस्त्रिंशपारिषदात्मरक्षलोकपालानीकप्रकीर्णकाभियोग्यकिल्विष्काश्चैकश:-!!४!!
संधि-विच्छेद-इन्द्र+सामानिक+त्रायस्त्रिंश+पारिषत्+आत्मरक्ष+लोकपाल+अनीक+प्रकीर्णक+आभियोग्य+किल्विष्का:+च+ एकश:-
शब्दार्थ
इन्द्र-इन्द्र,सामानिक-सामानिक,त्रायस्त्रिंश-त्रायस्त्रिंश,पारिषत्-पारिषद्,आत्मरक्ष-आत्मरक्ष,लोकपाल-लोक पाल,अनीक-अनिक,प्रकीर्णक-प्रकीर्णक,आभियोग्य-आभियोग्य,किल्विष्का:-किल्विषक,च+और,एकश:-प्रत्येक के !
अर्थ-उक्त चारों निकाय के देवों में,प्रत्येक के इंद्र,सामानिक,त्रायस्त्रिंश,पारिषद्,आत्मरक्ष,लोकपाल,अनिक, प्रकीर्णक,आभियोग्य,किल्विषिक दस दस भेद होते है!
भावार्थ-
१-इंद्र-अन्य देवों से भिन्न,अणिमादि ऋद्धियों के धारक एवं परमैश्वर्य को प्राप्त देवों के स्वामी को इंद्र कहते है !
२-सामानिक-आयु,शक्ति,परिवार,भोगोपभोग की अपेक्षा इंद्र के सामान किन्तु आज्ञा देने रूप ऐश्वर्य से रहित देवों सामानिक देव कहते है !
३-त्रायस्त्रिंश-आदर और सत्कार की अपेक्षा से जो ३३ देव पिता,मंत्री,पुरोहित या गुरु के तुल्य होते है उन्हें त्राय स्त्रिंश देव कहते है!
४-पारिषद्-इन्द्रों की सभा के सदस्य देवों को पारिषद् देव कहते है !
५-आत्मरक्ष-अंगरक्षक के समान रक्षा करने वाले देवों को आत्मरक्ष देव कहते है !
६-लोकपाल-कोतवाल के समान देवों को लोकपाल कहते है!
७-अनिक-पैदल आदि सात प्रकार की सेना में विभक्त देवों को अनिक देव कहते है!
८-प्रकीर्णक-नगर वासियों के तुल्य , निवासी जनता को प्रकीर्णक देव कहते है !
९-आभियोग्य-जो देव हत्थे,घोडा आदि विक्रिया कर देवों के रथ आदि को खींचते है वे आभियोग्य देव है ,जैसे जो देव ऐरावत हाथी बनते है वे आभियोग्य जाति के देव होते है !
१०-किल्विषिक-चांडालादि की भांति अस्पर्शीनीय,पापी देवों को किल्विषिक देव कहते है !
इनमे इंद्र ऐश्वर्य के द्योतक है!
व्यंतर और ज्योतिष्क देवों में दस से कम अर्थात आठ भेद होते है –
त्रायस्त्रिंशलोकपालवर्ज्याव्यन्तरज्योतिषिका: !!५!!
संधि विच्छेद-त्रायस्त्रिंश+लोकपाल+वर्ज्या+व्यन्तर+ज्योतिषिका:
शब्दार्थ-त्रायस्त्रिंश-त्रायस्त्रिंश,लोकपाल-लोकपाल,वर्ज्या-वर्जित है(नही होते),व्यन्तर-व्यन्तर,ज्योतिषिका: -ज्योतिष्क में !
भावार्थ-उक्त सूत्र ४ में, देवों के सामन्य १० भेद कहे किन्तु व्यंतर और ज्योतिष्क देवों में त्रायस्त्रिंश और लोकपाल नहीं होते इन दो के अतिरिक्त आठ ही भेद होते है !
विशेष –
त्रायस्त्रिंश और लोकपाल पद हेतु देवों में, विशेष पुण्य के अभाव में,यथायोग्य विशेष गुणों के उत्पन्न नही होने से व्यंतर/ज्योतिष्कदेवों में उनका सर्वथा अभाव होता है!(सदर्भ-श्लोकवार्तकि विरचित आ,विद्यानन्द जी)
देवों में इन्द्रों की व्यवस्था –
पूर्वयोर्द्वीन्द्रा:-!!६!!
संधि विच्छेद-पूर्वयो :+द्वी +इंद्रा:-
शब्दार्थ -पूर्वयो:-पूर्व के दो निकायों अर्थात भवनवासी और व्यन्तर देवों में, द्वी-दो-दो इंद्रा:-इंद्र होते है
अर्थ-पूर्व के दो;भवनवासी और व्यन्तर देवों में दो-दो इंद्र होते है !
विशेषार्थ-
१-भवनवासी में १० भेदो में २० इंद्र और व्यन्तर के आठ भेदो में सोलह इंद्र होते है इतने ही प्रतीन्द्र होते है!
भवनवासी में असुरकुमार जाति के चामर और वैरोचन ,नाग कुमार के धरणानन्द -भूतानन्द,विद्युतकुमार के सुघोष-महाघोष ,सुपर्णकुमार के वेणु-वेणुधारी ,अग्निकुमार के अग्निशिख-अग्निवाहन,वाट कुमार के वैलम्ब-प्रभंजन,स्तनितकुमार के हरिषेण-हरिकांता,उद्विकुमार के जलप्रभ-जलकांत,द्वीपकुमार के पूर्ण-पूर्ण विशिष्ठ ,दिक्कुमार के अमितगति-अमित वाहन, ये कुल २० इंद्र भवनवासी के है !इसी प्रकार व्यंतर देवों के १६ इंद्र है
२-किसी एक निकाय में एक इंद्र का होना विशेष पुण्य का सूचक है किन्तु इन दो निकायों के देव इस विशेष पुण्य से रहित होते है इसलिए इनमे,दोनों इन्द्रो के मध्यस्थ सब कुछ ऐश्वर्य,सुखादि विभाजित होकर बट जाता है !
३- पूर्वयो द्विवचन में है इसलिए पूर्व के दो निकाय भवनवासी और वयंतर देवों को ग्रहण किया गया है
देवों में कामसेवन की विधि-
कायप्रवीचाराआऐशानात् !!७!!
संधि विच्छेद -काय+प्रवीचारा+आ+ऐशानात्
शब्दार्थ-काय-शरीर द्वारा ,प्रवीचारा-काम सेवन,आ-पर्यन्त ,ऐशानात् -ऐशान स्वर्ग
अर्थ-ऐशान स्वर्ग के देव काय से काम सेवन करते है !
भावार्थ-भवनवासी,व्यंतर,ज्योतिष्क और ऐशान स्वर्ग तक के देव अपनी अपनी देवियों के साथ मनुष्य एवं तिर्यन्चों के समान शरीर से काम सेवन (मैथुन) करते है !
शंका-वैक्रयिकशरीर में सप्त धातुओं का अभाव होता है फिर मनुष्यों/तिर्यन्चों की भांति कामसेवन कैसे संभव है?
समाधान-उनके शरीर में धातु के अभाव में भी मनुष्यवत् क्रियाएँ होती है जिनसे उन्हें मनुष्यवत् काम सुख की अनुभूति होती है !देवों का वैक्रयिक शरीर धातु रहित होता है!
नोट – किसी भी शास्त्र जी में नहीं लिखा है की वैक्रयिक शरीर में धातु होती ही नहीं बल्कि आचार्यों ने तो लिखा ही कि नारकियों के शरीर सड़े रुधिर मांस आदि से निर्मित होता है!(सदर्भ रतनलाल जैन बैनाड़ा जी पाठशाला )!
माघ शुक्ल नवमी ,१६ -२-१६
शेष स्वर्गों में कामसेवन की रीति –
शेषा:स्पर्शरूपशब्दमन:प्रवीचारा: !!८!!
संधि विच्छेद -शेषा:+स्पर्श+ रूप+ शब्द+ मन:+ प्रवीचारा:
शब्दार्थ -शेषा:-शेष,स्पर्श-स्पर्श, रूप -रूप,शब्द-शब्द , मन:-मन,प्रवीचारा-काम सेवन कर लेते है !
अर्थ-दुसरे ऐशान्त स्वर्ग से ऊपर के स्वर्गों में क्रमश:देव;
१-देवियों के स्पर्श मात्र से,
२-उनके मात्र रूप अवलोकन कर
३-उनके शब्दों मात्र को सुनने से और
४- उनका मन में मात्र चिंतन करने से कामसेवन करते है !
भावार्थ १-तीसरे-सनत्कुमार और चौथे-माहेंद्र स्वर्ग के देव,अपनी अपनी देवियों के आलिंगन मात्र से,
२-पांचवे-ब्रह्म,छठे-,ब्रह्मोत्तर,सातवे-लान्तिव और आठवें-कापिष्ट स्वर्गों के देव अपनी अपनी देवियों का मात्र रूप देख कर ,
३-नौवे-शुक्र,१०-महाशुक्र,११वे-शातार और १२-सहस्रार स्वर्गों के देव अपनी अपनी देवियों के मात्र शब्द सुन कर और
४-१३वे-आनत,१४वे-प्राणत,१५वे आरणव,और १६वे अच्युत स्वर्ग के देव अपनी अपनी देवियों का मात्र मन में
चिंतन कर प्रवीचार से ही तृप्त हो जाते है !
विशेष-
१-देवियाँ प्रथम दो स्वर्गों में ही उत्पन्न होती है!पहले स्वर्ग में पहिले,विषम संख्या के तथा दुसरे स्वर्ग मेंसम संख्या के स्वर्ग के देवों की देवियों उत्पन्न होती है!अपने अपने स्वर्गों में अपनी अपनी देवियों की उत्पत्ति का अवधि ज्ञान द्वारा पता लगने पर उन्हें देव आकर अपने अपने स्वर्गो में ले जाते है !
२-भवनवासी,व्यंतर,और ज्योतिष्क देवों की देवियों उनके भवनों/विमानों में ही उत्पन्न होती है !
कल्पातीत देवों में प्रवीचार का निषेध
परेऽप्रवीचाराः॥९॥
संधि विच्छेद-परे+अप्रवीचाराः
शब्दार्थ-परे- वहां से आगे(सोलहवे स्वर्ग से ऊपर) ,अप्रवीचाराः-कामसेवन नहीं है
अर्थ:-सोलहवे स्वर्ग से ऊपर अर्थात ९ ग्रैवियक,९अनुदिशों और ५ अनुत्तरों के कल्पातीत देवों में काम सेवन नहीं होता है !
भावार्थ-१६ वे स्वर्ग से ऊपर ९ ग्रैवियक,९ अनुदिशों और ५ अनुत्तरों के देवों में काम सेवन नहीं होता है क्योकि कारण के अभाव में कार्य नहीं हो सकता,वहां देवियाँ ही नहीं होती है इसलिए इच्छा ही नहीं होती !
विशेष-
१-ब्रह्मलोक के ब्रह्मऋषि;लौकांतिक देवों के भी काम प्रवीचार नहीं होता है उनके निकट भी देवियों का प्रवेश निषेध है !पुरुषवेद का उदय नौवे गुणस्थान के मध्य तक रहता है किन्तु इन जीवों में उसका मंद उदय होने से उसके निराकरण की इन्हे आवश्यकता ही नहीं होती है!
भवनवासिनोऽसुरनाग-विद्यत् सुपर्णाग्नि वात स्तनितोदधि द्वीप दिक्कुमारा: !!१०!!
सन्धि विच्छेद –
भवनवासिन:+असुर+नाग+विद्यत्+सुपर्ण+अग्नि+वात+स्तनित+उदधि+ द्वीप+ दिक्कुमारा:
शब्दार्थ-
भवनवासिन:-भवनवासी देवों के,असुर,नाग,विद्यत्,सुपर्ण,अग्नि,वात,स्तनित,उदधि, द्वीप और दिक्कुमारा:
अर्थ:-भवनवासी देवों के,असुरकुमार ,नागकुमार,विद्यत्कुमार,सुपर्णकुमार,अग्निकुमार,वातकुमार,स्तनितकुमार,उदधि, उदधिकुमार ,द्वीप कुमार और दिक्कुमारा ,दस भेद है!
विशेष :-
१-इनकी वेश भूषा,शस्त्र,यान,वाहन,क्रीड़ादि कुमारों की भांति होती है तथा आयु पर्यन्त स्वभाव से अवस्थित है इसलिए सभी भवनवासी को कुमार कहते है !
२-ये देव,अधोलोक में रत्नमणियों से मंडित ७ करोड़ ७२ लाख भवनो में उत्पन्न होकर रहते है,इसलिए इन्हे भवनवासी देव कहते है!प्रत्येक भवन में एक-एक अकृत्रिम जिनचैत्यालय है,अधोलोक में कुल ७ करोड़ ७२ लाख जिनचैत्यालय है,प्रत्येक में १०८ रत्नों से जड़ित भव्य,अति सुंदर,मनोहर अकृत्रिम जिन बिम्ब विराज मान है !
३-रत्न प्रभा पृथ्वी के प्रथम खर भाग में ऊपर और नीचे के १००० योजन मोटे भाग छोड़कर;शेष १४००० योजन में असुर कुमार के अतिरिक्त;नौ प्रकार के भवनवासियों के भवन में जन्म होता है ! और व्यंतर देव ऊपर और नीचे के १०००-१००० योजन के भाग में ऊपर नीचे के १००-१०० योजन छोड़कर अर्थात ८०० योजन भाग में राक्षस के अतिरिक्त शेष ७ व्यंतरदेव जन्म लेकर वहां के भवनो में रहते है!
असुर कुमार -भवनवासी और राक्षस जाति – के व्यंतर देव ८४००० योजन मोटे पंकभाग में स्थित भवनों में जन्म लेकर वही रहते है!असुर कुमार प्रथम से तीसरे नरकों तक जाकर वहां के नारकियों को लड़वाकर आनंदित होते है!
इसके अतिरिक्त व्यंतर देवों के निवास मध्यलोक में ,पहाड़ों,नदियों,तालाबों आदि विविध स्थानों पर भी है! इनके भवनो को जमीन के अंदर भवन ,उसके ऊपर भवनपुर,और पहाड़ो के ऊपर आवास कहते है !
४–भवनवासी देवों;असुरकुमार,नागकुमार,विद्यत्कुमार,सुपर्णकुमार,अग्निकुमार,वातकुमार,स्तनितकुमार,
उदधिकुमार,द्वीपकुमार और दिक्कुमार के मुकट पर क्रमश:चूड़ामणि,सर्प,गरुड़,हाथी,मगर,घड़ा,वज्र,सिह, कलश,अश्व के चिन्ह होते है !
५-असुरकुमार देव की २५ धनुष और शेष भवनवासी और व्यंतर देवों की उचाई१० धनुष होती है !
व्यंतर देवों के भेद –
व्यन्तरा:किन्नरकिम्पुरुषमहोरगगन्धर्वयक्षराक्षसभूतपिशाचा: !!११!!
संधि विच्छेद-
व्यन्तरा:+किन्नर+किम्पुरुष +महोरग +गन्धर्व+ यक्ष+राक्षस+भूत+पिशाचा:
शब्दार्थ –
व्यन्तरा:-व्यन्तर देवों के,किन्नर,किम्पुरुष,महोरग,गन्धर्व,यक्ष,राक्षस,भूत और पिशाच,आठ भेद है
अर्थ:-व्यन्तर देवों के,किन्नर,किम्पुरुष,महोरग,गन्धर्व,यक्ष,राक्षस,भूत और पिशाच,आठ भेद है !
विशेष –
१-जो देव निरंतर भ्रमण करते हुए यत्र तत्र विचरण में लीन रहते है उन्हें व्यंतर देव कहते है !ये पवित्र वैक्रयिक शरीर के धारक होते है कभी भी औदारिक शरीर वाले मनुष्यो न का ग्रहण नही करते !कभी मांसाहार नही करते !मानस आहार करते है !
2 -व्यंतर देवों के असंख्यात भवन है,प्रत्येक भवन में अकृत्रिम जिन चैत्यालय है,अत: व्यंतर देवों के असंख्यात अकृत्रिम जिनचैत्यालय है,प्रत्येक जिन चैत्यालय में १०८ जिन विराजमान है !
४-भूत-पिशाच आदि देव पूर्वभव के बैर के वशीभूत किसी मनुष्यों को परेशान करने में सामर्थ्यवान होते है !तदानुसार वे उन्हें अपने अच्छे बुरे प्रभाव से प्रभावित कर सकते है,वातावरण को प्रभावित कर सकते है!किन्तु वर्तमान में जो धारणा है की किसी को ऊपरा हो गया,यह वास्तव में मानसिक तनाव के कारण कुछ लोग पागल से हो जाते है!व्यंतरदेव अपनी इच्छानुसार चमत्कार दिखा सकते है,किन्तु ये सभी पूर्व कर्म जनित है अन्यथा किसी को वे क्यों परेशान करेंगे?
ज्योतिष्क देव के भेद –
ज्योतिष्का:सूर्या चद्रमसौ ग्रह नक्षत्र प्रकीर्णक तारकाश्च: !!१२!!
संधिविच्छेद :-ज्योतिष्का:+सूर्या +चद्रमसौ ग्रह +नक्षत्र +प्रकीर्णक +तारका:+च
शब्दार्थ -ज्योतिष्का:-ज्योतिष्क देव सूर्या,चद्रमा,ग्रह,नक्षत्र,प्रकीर्णक -फैले हुए,तारका:-तारे +च -और
अर्थ -पांच ज्योतिष्क देव सूर्य,चन्द्रमा,गृह,नक्षत्र और फैले हुए तारे है !
विशेषार्थ-
१-पांचों ज्योतिष्क देव ज्योति स्वभाव अर्थात प्रकाशमान है इसीलिए इन्हे ज्योतिष्क कहा है !
२-सूत्र में,सूर्य-प्रतीन्द्र और चद्रमा-इन्द्र का ,गृह नक्षत्र और तारों से अधिक प्रभावशाली दर्शाने के उद्देश्य से एक साथ रखाहै!इन पांचो ज्योतिष्क देवों के प्रकाशवान चमकते सूर्यों,चंद्रमाओं,ग्रहों ,नक्षत्रों और तारो के ज्योतिमान असंख्यातविमान है !
३-सभी ज्योतिष्क देव के विमान मध्य लोक मेंचित्रा पृथिवी की सतह से ७९० महायोजन से ९०० महायोजन की ऊंचाई के मध्यस्थ है; ७९० महायोजन ऊंचाई -तारे,८००महायोजन ऊंचाई-सूर्य,८८० महायोजन ऊंचाई-चन्द्रमा,८८४ महायोजन-नक्षत्र,८८८ महायोजनऊंचाई-बुध,८९१महायोजन ऊंचाई-शुक्र,८९४महायोजन ऊंचाई-गुरु,८९७महायोजन ऊंचाई- मंगल और ९०० महायोजन ऊंचाई-शनि केविमान है !अर्थात ११० महा योजन मोटे आकाश क्षेत्र में है इन ज्योतिष्क देवों के विमान सुदर्शन समेरू पर्वत की ११२१ योजन दूर रहते हुए निरंतर अपनी अपनी गति से परिक्रमा करते है!ये ज्योतिष्क देव लोकांत तक असंख्यात द्वीप समुद्र तक है!ढाई द्वीप से आगे स्वयंभूरमण समुद्र तक के देव अवस्थित है अर्थात गमन नहीं करते है
४-प्रत्येक विमान में संख्यात ज्योतिष्क देव रहते है ,प्रत्येक विमान में एक एक अकृत्रिम जिनालय है इस अपेक्षा से मध्यलोक में असंख्यात अकृत्रिम जिंनालय है !
५-गृह /नक्षत्र चमकते हुए ज्योतिष्क देवों के विमान के नाम है,इसलिए यह हमे सुखी/ दुखी कर प्रभावित करने में सक्षम नही है!सुख दुःख जीव को अपने कर्मानुसार सातावेदनीय / असाता वेदनीय कर्म के उदय से मिलते है!ज्योतिष्क विद्या में प्रवीण ज्योतिष इन ज्योतिष्क विमान के गमन के आधार पर जीवों के भविष्य की सही भविष्यवाणी कर सकते है किन्तु उनका यह कहना की गृह/नक्षत्र हमारे सुख /दुःख के कारण है सर्वथा गलत है !
६-आजकल मंदिरों में अनेक स्थानो पर शनिवार को मुनिसुव्रत भगवान की पूजा -शनिग्रह के प्रकोप के निवारण लिए,पार्श्वनाथ भगवान की पूजा संकटों के निवारण के लिए,शांतिनाथ भगवान की पूजा शांति प्रदान करने के लिए करी जाने लगी है;जो कि सर्वथा मिथ्यात्व के बंध का कारण है क्योकि आगमानुसार सिद्धालय में विराजमान सभी सिद्ध आत्माए,शक्ति की अपेक्षा समान है,जो कार्य मुनिसुव्रत भगवान/शांतिनाथभगवान/पार्श्वनाथ भगवान कर सकते है,वह अन्यसिद्ध भगवान भी कर सकते है !दूसरी बात सिद्ध भगवान/आत्माए वीतरागी,सिद्धालय में अनंतकाल के लिए अनंतचतुष्क सहित स्व आत्मा में \लीन है,वे किसी भी प्राणी के सुख /दुःख में कुछ नही कर सकते है और नहीं करते है!इतना अवश्य होता है कि किसी भी भगवान की पूजादि करने से जीव के अशुभकर्मों का आस्रव बंध कम और शुभ आस्रव/बंध अधिक होता है और असातावेदनीय कर्म का संक्रमण भी सातावेदनीय कर्म में होता है ,इस कारण सांसारिक सुखो की अनुभूति पूजादि धार्मिक अनुष्ठानो से स्वत:जीव के पुण्य का अनुभाग बढ़ने से होती है!
६-भवनत्रिक देवों में सबसे कम भवनवासी देव है,उनसे अधिक व्यन्तर और सर्वाधिक ज्योतिष्क देव है !
७-जम्बूद्वीपमें २ सूर्य २ चन्द्रमा,लवण समुद्र में ४ सूर्य ४ चन्द्रमा,धातकीखंड में १२ सूर्य १२ चन्द्रमा,कालोदधि समुद्र में ४२ सूर्य ४२ चन्द्र,पुष्करार्ध द्वीप में ७२ सूर्य और ७२ चन्द्रमा है! इस प्रकार ढाई द्वीप में १३२ सूर्य और १३२चन्द्रमा है!बाह्य पुष्करार्ध द्वीप में इतने ही ज्योतिष्क देव है!पुष्करवर समुद्र मेंइससे चौगनी संख्या है!उसे आगे प्रत्येक द्वीप समुद्र में लोकांत तक क्रमश: दुगने दुगने सूर्य और चन्द्रमा इनके परिवार सहित है !
८-चन्द्रमा के परिवार में १ प्रतीन्द्र सूर्य ८८ गृह २८ नक्षत्र ,६६९७५ कोडकोडी तारे है!
चन्द्र विमान,चित्र पृथ्वी के तल से ८८० योजन ऊपरआकाश में , ऊर्ध्वमुख रूप से अवस्थित अर्द्ध गोलक सदृश है !उनकी अलग अलग १२००० किरणे अतिशय शीतल एवं मंद है !सभी ज्योतिष्क देवों के विमान का स्वरुप यही है !चन्द्र विमानों में विध्यमान पृथ्वीकायिक जीव उद्योत नाम कर्म के उदय से संयुक्त है अत: वे प्रकाशमान अतिशय शीतल और मंद किरणों से संयुक्त है ! चद्र विमान के उपरिम तल का विस्तार ५६/६१ और बाहुल्य (मोटाई ) २८/६१ योजन (१ योजन =४००० मील) ,परिधि २ योजन ३ कोस कुछ कम १२२५ धनुष है !प्रत्येक विमान की तट वेदी चार गोपुरों से संयुक्त होती है,उसके बीच में उत्तम वेदी सहित राजाङ्गण होता है ! राजाङ्गण के ठीक बीचो बीच उत्तम रत्नमय दिव्य कूट और उन कूटों के ऊपर वेदी और चार तोरणों से संयुक्त जिन मंदिर अवस्थित है !सभी मंदिर मोती और स्वर्ण की मालाओं से रमणीक और उत्तम वज्रमय किवाड़ों से संयुक्त होते हुए दिव्य चन्दोवों से सुशोभित रहते है !वे जिन भवन देदीप्यमान रत्नदीपकों और अष्ट महामंगल द्रव्यों से परिपूर्ण , वन्दन माला,चंवर तथा कष्द्र घंटिकाओं के समूह से शोभायमान होते हैं !इन जिन भवनों में स्थान स्थान पर विचित्र रत्नों से निर्मित नाट्यसभा ,अभिषेक सभा और विचित्र क्रीड़ाशालाये सुशोभित होती है !वे जिन भवन समुद्र सदृश गंभीर शब्द नित्य मृदंग, मर्दल आदि विविध वादित्रों से नित्य शब्दायमान होता रहता है !उन जिन भवनों में ३ छत्र,सिंहासन ,भामंडल और चमरों से संयुक्त रत्नमयी जिन प्रतिमाये विराजमान है !जिन बिम्ब के पार्श्व में श्री देवी ,श्रुत देवी सर्वाण्हयक्ष और सनत्कुमार यक्ष की मनोहर मूर्तियां शोभायमान होती है !सभी चन्द्र देव गाढ़ भक्ति से उन जिनेन्द्र प्रतिमाओं की जल ,चंदन,तंदुल,फूल ,उत्तम नैवैद्य ,डीप,धुप औरर फलों से पूजा करते है !चन्द्र ज्योतिष्क देव के विमान /प्रसाद –
जिन मंदिरों के कूटों के चारों ओर से समचतुष्कोण लम्बे और अनेक प्रकार के विन्यासों से रमणीय,मरक्तवर्ण,स्वर्ण वर्ण,मूंगे सदृश वर्ण वाले,कन्दपुष्प चन्द्र ,हार,एवं बर्फ जैसे वर्ण सदृश चंद्रों के प्रसाद होते है !इन भवनों ,में उप्पाद मंदिर,अभिषेकपुर,भूषण गृह ,मैथुनशाला,क्रीड़ाशाला,मंत्रशाला,और सभा शालाएं होती है ! सभी प्रसाद उत्तम कोटों ,तथा विचित्र गोपुरों से संयुक्त मणिमय तोरणों से रमणीय,दीवारों पर नाना प्रकार के चित्रों से सुशोभित,विचित्र रूपवाली उपवन वापिकाओं से सुशोभित और स्वर्णमय खम्बों से युक्त है तथा श्यानासनों आदि से परिपूर्ण है !धुप की सुगंध से व्याप्त ये दिव्य प्रसाद शब्द,रस ,गंध रूप उर स्पर्श से विविध अनुपम सुखदायक है !उन भवनों में कूटों से विभूषित और प्रकाशमान रत्न -किरण पंक्तियों से संयुक्त ७-८ आदि भूमियाँ शोभायमान है!इन मंदिरों के बीच में चन्द्र देव सिंहासन पर विराजमान रहते है !प्रत्येक चन्द्र !चन्द्राभा ,सुसीमा प्रभङ्करा,और अर्चिमालिनी ४ -४ पट(अग्र महिषियां) देवियाँ होती है,प्रत्येक अग्र देवी की ४००० परिवार देवियाँ होती हैं वे अपने अपने परिवार के साथ अर्थात ४०००-४००० रूपों की विक्रियां धारण करती है !चन्द्र देवों के आठ;प्रतीन्द्र (सूर्य), सामानिक(संख्यात),तनुरक्ष,(संख्यात),तीनों पारिषद,प्रकीर्णक ,सात अनीक,अभियोग्य और किल्विषिक ,परिवार देव होते है !उत्तम रत्नों से विभूषित और प्रकाशमान तेज को धारक समस्त परिवार देवों प्रासाद राजांङ्गण बाहर होते है ! प्रत्येक चन्द्र के चारो दिशाओं में ४०००-४००० ,कुल १६००० अभियोग्य जाति के स्वर्णमयी वर्ण सदृश देव;,नित्य सिंह,हाथी,बैल,जटा युक्त घोड़ों के रूप विक्रिया करके क्रमश पूर्व,दक्षिण , उत्तर दिशा में विराजमान हो कर चन्द्र विमानों वहन करते है -उनके र गमन में निमित्त होते है!प्रत्येक चन्द्र इंद्र के; एक-एक प्रतीन्द्र सूर्य होते है ! सदर्भ त्रियोपण्णत्ती गाथा ३६ -६४
सूर्य(मंडलकी प्रारूपण) ज्योतिष्क देव के विमान- [Image: 00328.jpg]
त्रियोपण्णत्ती गाथा ६५- ८१
चित्र पृथ्वी के उपरिमतल से ८०० योजन ऊपर आकाश में नित्य (शाश्वत) नगर तल स्थित है! सूर्य के मणि मय विमान,उर्ध्व अवस्थित,अर्द्ध -गोलक सदृश है,उनकी अलग अलग १२०० किरणे प्रकाशमान उष्णतर होती है क्योकि सूर्य विमानों मे स्थित पृथ्वीकायिक जीव ,आतप नामकर्म के उदय से संयुक्त होते है! उन सूर्य विमानों से प्रत्येक,अनदिनिधन अकृत्रिम सूर्य बिम्ब के उपरिम तल का विस्तार ४८/ ६१योजन ,बाहुल्य २४/६१ योजन और इनकी अलग अलग परिधियां २ योजन १ कोस कुछ कम १९०७ धनुष है !प्रत्येक सूर्य विमान की तट वेदी ,चार गोपुर द्वारों से सुंदर होती है !उसके मध्य, उत्तम वेदी से संयुक्त राजांङ्गण होता है,जिसके मध्य में उत्तम कूट होते है ,उनमे सूर्यकांत मणिमय जिन-भवन स्थित हैं ! ये जिन मंदिर एवं उनमे विराजमान जिन प्रतिमाये तथा उनकरे देवोब द्वारा अष्ट द्रव्यों द्वारा पूजा की विधि, चन्द्र पुरों के कूटों पर स्थित जिनभवनो एवं प्रतिमाओं सदृश्य ही है!इन कूटों के चारो ओर जो सूर्य प्रसाद है वे भी चन्द्र प्रासादों सदृश है! उन भवनों के मध्य में उत्तम छत्र -चँवरों से युक्त और अतिशय दिव्य तेज को धारण धारण करने वाले सूर्य देव दिव्य सिंहासन पर स्थित होते है !प्रत्येक सूर्य की ध्युतिश्रुति, प्रभङ्करा,सूर्यपप्रभा और अर्चिमालिनी ,४ अगर देवियाँ होती है !प्रत्येक अग्र देवी की ४००० परिवार देवियाँ होती हैं वे अपने अपने परिवार के साथ अर्थात ४०००-४००० रूपों की विक्रियां धारण करती है ! सूर्य देवों के सात; सामानिक,तनुरक्षक,तीनों पारिषाद,प्रकीर्णक अनीक,अभियोग्य और किल्विषिक ,परिवार देव होते है !उत्तम रत्नों से विभूषित और प्रकाशमान तेज को धारक समस्त परिवार देवों प्रासाद राजांङ्गण बाहर होते है ! प्रत्येक सूर्य के चारो दिशाओं में ४०००-४००० ,कुल १६००० अभियोग्य जाति के स्वर्णमयी वर्ण सदृश देव;,नित्य सिंह,हाथी,बैल,जटा युक्त घोड़ों के रूप विक्रिया करके क्रमश पूर्व,दक्षिण , उत्तर दिशा में विराजमान हो कर सूर्य -नगर तालों का गमन में निमित्त होते है!
९-तारे के टूटने का वर्णन –
पद्मपुराण के रचियता महान आचार्य रविसैन जी के अनुसार पदमपुराण में कहते है कि जब हनुमान जी यात्रा कर लौटते वे पर्वत पर विश्राम के लिए लेटे हुए ,आकाश से एक टूटता हुआ तारा देखते है!उन्होंने इस घटना का स्पष्टीकरण देते हुए कहा है कि”सम्भवत: उस समय कोई देव प्रकाशवान चमकते हुए वैक्रयिक शरीर से सम्पन्न विचरण कर रहे होगे जिनका शरीर,आयु पूर्ण होने के कारण,बिखर गया हो”जो की चमकीला होने के कारण तारे के टूटना जैसा लगता हो क्योकि तारे अकृत्रिम अनादिकालीन है वे टूट नहीं सकते,उनकी संख्या हीनाधिक नहीं हो सकती !
ज्योतिष्क देवों का गमन-
मेरुप्रदिक्षणानित्यगतयोनृलोके -!!१३!!
सन्धिविच्छेद -मेरु +प्रदिक्षणा+ नित्य +गतयो +नृ+ लोके
शब्दार्थ-मेरु-मेरु , प्रदिक्षणा -परिक्रमा ,नित्य -सदैव ,गतयो- गतिमान रहकर भ्रमण करते है ,नृ-मनुष्य ,लोके-लोक में !
अर्थ-वे ज्योतिष्क देव मनुष्य लोक में,सुदर्शन मेरु पर्वत की परिक्रमा लेते हुए सदा भ्रमण करते है !
भावार्थ-मनुष्य लोक अर्थात ढाई द्वीप में, मानुषोत्तर पर्वत तक, ४५लख योजन क्षेत्रमें पांचों ज्योतिष्क देव सदैव सुदर्शन समेरू पर्वत की परिक्रमा,उससे ११२१ महायोजन की दूरी पर रहते हुए लेते है!ये मेरु के चारों ओर सदा भ्रमण करते रहते है!
ज्योतिष्क देवों के गमन का काल पर प्रभाव-
तत्कृत:कालविभाग: !!१४ !!
संधि-विच्छेद -तत्कृत:+काल+विभाग
शब्दार्थ_-तत्कृत:-उन(ज्योतिष्क देवों )के द्वारा काल-काल ,विभाग-विभाग होता है !
अर्थ – उन गतिशील ज्योतिष्क देवों के द्वारा काल का , व्यवहार काल दिनरात आदि में विभाजन होता है !
भावार्थ-मनुष्यलोक -ढाई द्वीप में समय, आंवली, ,सैकंड, मिनट, घड़ी,, मूर्हत, ,घंटे, दिन , रात, पक्ष, माह, ऋतू,अयन,वर्ष,युग,सहस्र,वर्ष,लक्ष वर्ष,पूर्वांग ,पूर्व से लेकर अचल तक, यह व्यवहार काल , ज्योतिष्क देवों के निरंतर मेरु की प्रदिक्षणा लेने के कारण होते है !
विशेष-
१-ढाई द्वीप के बाहर लोकांत तक स्वयंभूरमण समुद्र पर्यन्त ज्योतिष्क देव अवस्थित है अर्थात वे गमन नहीं करते,इसलिय वहमनुष्य लोक की भांति व्यवहार काल समय मिनट दिन रात आदि नहीं है !वहां कल्पवृक्षों के प्रकाश से सदा प्रकाश ही रहता है अन्धकार नहीं होता है ! !
२-सभी देवों से संयम और व्रत रखने की अपेक्षा मनुष्य ही उंच्च है क्योकि देव व्रत संयम आदि रखने में सक्षम नही है !
३-पूजनीय नव देवता-पांच परमेष्ठी (अरिहंत,सिद्ध,आचर्य,उपाध्याय एवं साधु ),जिनागम/ जिनवाणी , जिन बिम्ब,जिनधर्म जिन चैत्यालय! भवनवासी ,व्यंतर ,ज्योतिष्क सूर्य /चादर आदि और वैमानिक देव पूजनीय नहीं है क्योकि नव देवताओं के अंतर्गत नहीं है !ये जन्म से ही मिथ्या दृष्टि होते है क्योकि सम्यग्दृष्टि इनमे जन्म नहीं लेते!इनको पूजना अथवा जल आदि अर्पित करना मिथ्यात्व है !एक भवतारी वैमानिक देव भी पूजनीय नहीं है !ये कभी सामने आ जाए तो जैजिनेन्द्र करने योग्य है !
४-एक सूर्य को जम्बूद्वीप की पूरी प्रदिक्षणा लेने में २ दिन रात लगते है ,चन्द्रमा को इससे कुछ अधिक समय लगता है !चंद्रोदय में न्यूनाधिकता इसी लिए आती है !यहाँ २ सूर्य और २ चद्र है !वैसे तो सूर्य और चद्रमा का गमन स्वाभाविक है किन्तु अभियोग्य जाति के ज्योतिष्क देव इनके विमानों को निरंतर ढोते है !इन देवों में विक्रिया द्वारा प्राप्त सिहाकार देव का मुख -पूर्व दिशा में,गजाकर का मुख -दक्षिण दिशा में,,वृषभाकार का मुख -पश्चिम दिशा में ,और अश्वकार देव का मुख उत्तर दिशा में होता है !
४-व्यवहार काल की विभिन्न इकाइयों में संबंध-
असंख्यातसमय=१आवलि ,संख्यातआवलि=१प्राण/(उच्छवास),७उच्छवास=१स्तोक,७स्तोक =१लव,३८.५लव= १घड़ी,२घड़ी=१मूर्हत,३०मूर्हत=१दिन,१५दिन=१पक्ष,२पक्ष=१माह,२माह=१ऋतू,३ऋतू =१आयन,२आयन=१वर्ष , ५ वर्ष=१युग,२युग=१०वर्ष,१०x१०वर्ष=शतवर्ष,10xशतवर्ष=१ सहस्र वर्ष,१० सहस्र वर्ष=दस सहस्र वर्ष,१० x १० सहस्रवर्ष=१लक्षवर्ष,१पूर्वांग =८४लक्षवर्ष ,१पूर्व=८४लक्ष पूर्वांग =५०७६x १० की घात दस वर्ष,१ पूर्व कोटि =५०७६ x१० की घात१५!इसी क्रम मेंअंतिम संख्यात संख्या १ अचल =८४ की घात ३१x१० की घात ८०, अचल से १ अधिक होने पर असंख्यात आरम्भ हो जाता है (आदिपुराण पृष्ठ ६५ )
मनुष्य लोक से बाहर ज्योतिष्क देवों की गति स्थित-
बहिरवस्थिता:!१५ !!
संधि विच्छेद-बहि:+अवस्थिता:
शब्दार्थ :-बहि:-बाहर ,मनुष्य लोक से ,अवस्थित: -स्थिर है !
अर्थ -मनुष्य लोक के बाहर ज्योतिष्क देव स्थिर है ,गमन नहीं करते
भावार्थ-ढाई द्वीप ,मनुष्य लोक से बाहर के ज्योतिष्क देव स्थिर है गमन नहीं करते !
शंका–इस सूत्र की क्या आवश्यकता थी क्योकि सूत्र १४ में तो कहा गया है कि मनुष्य लोक में ही ज्योतिष्क देव मेरु पर्वत की परिक्रमा लेते हुए गमन करते है ,जिससे स्पष्ट हो जाता है कि इससे बाहर के ज्योतिष्क देव गमन नहीं करते स्थिर है !
समाधान -सूत्र १४ में मनुष्य लोक से बाहर ज्योतिष्क देवों का अस्तित्व अभी तक प्रमाणित नहीं होता , इसी लिए इस सूत्र की आवश्यकता है !उनके अस्तित्व और स्थिरता को बताने के लिए यह सूत्र रखा है !
वैमानिक देवों का वर्णन-
वैमानिका: !!१६!!
अर्थ-अब वैमानिक देवों का वर्णन करते है !
विशेष-
१-विशेष पुण्य के उदय से उत्पन्न होने वाले पुण्यशाली जीवो के निवास स्थान को विमान कहते है!उन विमानों में जन्म लेने वाले देवों को वैमानिक देव कहते है !
२- विमान के इन्द्रक,श्रेणीबद्ध और पुष्प प्रकीर्णक तीन भेद है !जो इंद्र की तरह अन्य विमानों के बीच में रहते है उन्हें इन्द्रक,जो उसकी चारो दिशा इ कतारबद्ध होते है उन्हें श्रेणी बढ़ और जो विदिशाऔ में फूलों के समान यत्र तत्र बिखरे होते है उन्हें पुष्प प्रकीर्णक विमान कहते है !
वैमानिक देवों के भेद-
कल्पोपन्ना:कल्पातीताश्च !!१७!
संधि विच्छेद-कल्पोपन्ना:+कल्पातीत:+च
शब्दार्थ- कल्पोपन्ना:-जहा १६ स्वर्गों में कल्पो (इन्द्रादि के १० भेदो ) की कल्पना है +कल्पातीत-कल्पातीत ,जहाँ कल्पो(इन्द्रादि १० भेदों की की कल्पना नहीं है, च -और
अर्थ वैमानिक देवों के कल्पोपन्न-जहाँ १६ स्वर्गों-कल्प में इन्द्रादि के १० भेदो की कल्पना होती है,उनमे उत्पन्न होने वाले देवों को कल्पोपन्न वैमानिक देव कहते है, और
जहाँ इन्द्रों आदि १० भेदों की कल्पना नहीं है ,उन्हें कल्पातीत (९ ग्रैवियिक,९ अनुदिदशो और ५ अनुत्तरों) में उतपन्न होने होने वाले देवों को वैमानिक देवों को कल्पातीत देव कहते है !
विशेष-जिन कल्पो में १२ प्रकार के इंद्र रहते है वे कल्प १६ है उसमे से सौधर्मेन्द्र कल्प मेरु पर्वत के उप्र अवस्थित है जो की दक्षिण दिशा में फैला हुआ है !इस कल्प के ऋजु विमान और समरू पर्वत की चूलिका में १ बाल मात्र का अंतराल है!इसके समान आकाश प्रदेश में उत्तर दिशा में ऐशान कल्प है!
कल्पों की स्थित का क्रम –
उपर्युपरि !!१८!!
अर्थ -ये कल्पादि क्रमश: ऊपर ऊपर है !सोलह स्वर्गों के आठ युगल ,नव ग्रैवेयिक,नव अनुदिश और पांच अनुत्तर ये सब क्रम से ऊपर ऊपर है !
विशेष-ये कल्पोपण और कल्पातीत वैमानिक देव ज्योतिष्क देवों के समान तिरच्छे या वियंत्र देवों के समान विषम रूप से नहीं रहते बल्कि क्रम से ऊपर ऊपर रहते है !सभी स्वर्गो में परस्पर समीपता नहीं है,उनमे असंख्यात योजनों का अंतर है !कल्पातीत देवों को अहमिन्द्र कहते है !
वैमानिक देवों के निवास स्थान –
सौधर्मैशानसानत्कुमारमाहेन्द्रब्रह्मब्रह्मोत्तरलान्तवकापिष्ठशुक्रमहाशुक्रशतारसहस्रारेष्वानतप्राणतयोरारणा- च्युतयोर्नवसुग्रैवेयकेषुविजयवैजयन्तजयन्तापराजितेषुसर्वार्थसिद्धौच !!१९!!
संधिविच्छेद- सौधर्म-ऐशान+सानत्कुमार-माहेन्द्र+ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर+लान्तव-कापिष्ठ+शुक्र-महाशुक्र+शतार-सहस्रार+आनत- प्राणत+आरण-अच्युत+योर्नवसु +ग्रैवेयकेषु +विजय +वैजयन्त +जयन्ता +पराजितेषु +सर्वार्थसिद्धौ +च
अर्थ-सौधर्म-ऐशान,सानत्कुमार-माहेन्द्र,ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर,लान्तव-कापिष्ठ,शुक्र-महाशुक्र,शतार-सहस्रार, आनत- प्राणत,आरण-अच्युत आठ स्वर्गो के युगलों में देवो निवास स्थान विमान है तथा नौ ग्रैवेयक,(र्नवसु)नौ अनुदिश ,विजय, वैजयंत, जयन्त और अपराजित और सर्वाथसिद्धि अनुत्तर विमानो मे अहमिन्द्र कल्पातीत देव रहते है।
विशेष-१-उर्ध्व लोक मे, मध्यलोक चित्रा पृथ्वी के भूमि तल से ९९०४० महायोजन ऊंचाई पर सुदर्शन मेरु की चूलिका से १ बाल अंतराल पर ,सौधर्मेन्द्र -ऐशान कल्प (स्वर्ग पहिला स्वर्ग का युगल)आरम्भ होता है !इसपर प्रथम इन्द्रक विमान ऋजु , ढाई द्वीप के विस्तार के बराबर ४५ लाख महायोजन विस्तार का है !इसकी चारों दिशाओं में ६२-६२ श्रेणीबद्ध विमान और विदिशाओं में बहुत सारे प्रकीर्णक विमान है ,इनके ऊपर असंख्यात पटल छोड़कर दूसरा पटल है.उसके मध्य में इन्द्रक विमान और चारों दिशाओं में ६१-६१ विमान है तथा विदिशाओं में असंख्यात प्रकीर्णक विमान है !इसी प्रकार योजनो के अंतराल पर १,५ राजू उंचाई तक क्रमश ३१ पटल है !३१ वे पटल से असंख्यात योजन अंतराल पर सनत्कुमार और महेंद्र कल्प आरम्भ होता है उनके ७ पटल १.५ राजू की ऊंचाई तक है ! इसी प्रकार १/२ -१/२ राजू के अंतराल पर क्रमश तीसरा कल्प ब्रह्म ब्रह्मोत्तर (४पटल), चौथा कल्प लांतव-कापिष्ट (२ पटल ),पांचवा कल्प शुक्र और महा शुक्र (१ पटल )और छठा कल्प शतार – सहस्रार (१ पटल),सातवा कल्प आनत -प्रणत(३ पटल) ,आठवां कल्प आरण-अच्युत(३ पटल) लोक की कुल ६ राजू ऊंचाई तक १६ स्वर्ग! इनके कुल ५२ पटल है !आठवे स्वर्ग के युगल से ऊपर लोक के अंत तक लगभग १ राजू ऊंचाई तक क्रमशः ,नव ग्रैवेयक के ९ पटल है,उसके ऊपर नव अनुदिशों का एक पटल और इसके ऊपर ५ अनुत्तरों विमान के एक पटल में है !इस प्रकार ऊर्ध्व लोक में कुल ६३ पटल है!इन स्वर्गों के ८ कल्प युगलों के १२ इन्द्रों में सौधर्मेन्द्र,सनत्कुमार,ब्रह्म,शुक्र,आनत और आरण ६ इंद्र दक्षिणेन्द्र और ६;ऐशान ,माहेन्द्र ,लांतव ,शतार, प्राणत और अच्युत उत्तरेन्द्र है !
२ -पांच अनुत्तारों में सर्वार्थ सिद्धि के विमान से १२ योजन ऊपर ८ योजन मोटी ,इष्टतागार ,अष्टम पृथ्वी में चंद्रकार सिद्धशिला है!उसके ऊपर क्रमशः घनोदधि,घनवात और तनुवात वलय है,सिद्ध भगवान् के प्रदेश मनुष्यकार कायोत्सर्ग अथवा पद्मासन आकार में, इस तनुवातवलय के अंत को शीर्ष स्पर्श करते हुए ५२५ धनुष मोटे और ४५लाख योजन विस्तार के सिद्धालय में विराजमान रहते है! स्वर्गों में ८४९७०२३ देवों के विमान है,प्रत्येक में, एक एक जिनचैत्यालय ,प्रत्येक में १०८ रत्नमयी जिन बिम्ब विराजमान है !
सूत्र में सर्वार्थ सिद्धि को अलग से इसलिए रखा है क्योकि यहाँ पर उत्पन्न देव एक भव ,में मनुष्य पर्याय पाकर मोक्ष प्राप्त करते है!
३-नवग्रैवेयिक;१-सुदर्शन,२-अमोध,३-सुप्रबद्ध,४-यशोधर,५-सुभद्र,६-सुविशाल,७-सुमनस,८-सोमप्रभ,९-प्रीतिकर है !
४-नवअनुदिश;१-आदित्य,२-अर्चि ,३-अर्चिमाली,४-बैरोचन ,५-प्रभास,६-अर्चिप्रभ,७-अर्चिमध्य ,८-अर्चिरावर्त ,९ -अर्चि विशिष्ट है
वैमानिक देवों में उत्तरोत्तर अधिकता –
स्थितिप्रभावसुखद्युति लेश्या विशुद्धीन्द्रियावधिविषयोतोऽधिका: !!२० !!
संधि विच्छेद -स्थिति+प्रभाव+सुख+द्युति+लेश्या +विशुद्धि +इन्द्रियाविषयात:+अवधिविषयत:+अधिका:
शब्दार्थ-स्थिति-आयु,प्रभाव-प्रभाव,सुख-सुख,द्युति-कांति लेश्याविशुद्धि-लेश्या की विशुद्धि ,इन्द्रियाविषयात:इन्द्रिय का विषय और अवधिविषयत:-अवधि ज्ञान का विषय ,अधिका:-अधिक अधिक है
अर्थ – ऊपर ऊपर के देवों की आयु,प्रभाव,सुख,कांति ,लेश्या विशुद्धि,इन्द्रिय विषय और अवधि ज्ञान के विषय क्रमश उत्तरोत्तर वृद्धिगत होते है !
विशेष-
१-आयु-नीचे से ऊपर के देवों की आयु बढ़ती जाती है ;प्रथम स्वर्ग में उत्कृष्ट आयु २अगर से कुछ अधिक है जबकि सर्वार्थ सिद्धि में जघन्य और उत्कृष्ट दोनों ३३ सागर है ,बीच के स्वर्गों और /ग्रैविकों अनुदिश और अनुत्तर में इनके बीच पहले स्वर्ग युगल से बढ़ती हुई है !
२-प्रभाव – देवों के श्राप देने या उपकार करने की क्षमता को उनका प्रभाव कहते है !यह भीनीचे से ऊपर स्वर्गों के डिवॉन में वृद्धिगत है !किन्तु ऊपर ऊपर के डिवॉन में अहंकार कम कम होता जाता है इसलिए इस प्रभाव को वे कभी प्रयोग में नहीं ला ते है!
३-सुख -इन्द्रियों के द्वारा उनके विषयों का अनुभव करना सुख है !यद्यपि ऊपर ऊपर के डिवॉन का नदी,पर्वत ,अटवी आदि में विहार करना क्रमश कम होता जाता है ,देवियों की संख्या व् परिग्रह क्रमश कम होता जाता भी सुख की उन्हें क्रमश अधिक अनुभूति होती है !
४-द्युति-शरीर ,वस्त्र ,आभरण की छटा द्युति है !उप्र २ के देवों का शरीर छोटा है ,वस्त्र और आभरण भी कम होता जाता है,किन्तु इन सबकी द्युति क्रमश वृद्धिगत होती हैं !
५-लेश्या विशुद्धि-ऊपर के स्वर्गों में देवों की लेश्या विशुद्धि वृद्धिगत होती है ,उनकी लेश्या निर्मल होती जाती है !
६-इन्द्रियविषय -प्रत्येक इन्द्रिय का जघन्य और उत्कृष्ट विषय बतलाया है ! उस से अपेक्षा नीचे के देवों से ऊपर के देवों के इन्द्रिय विषय वृद्धिगत है !अर्थात ऊपर पर के देवों की द्वारा विषय को ग्रहण करने सामर्थ्य उत्तरोत्तर वृद्धिगत है !
७-अवधि विषय-ऊपर के देवों की अवधि ज्ञान की सामर्थ्य भी क्रमश वृद्धिगत है!प्रथम व् दुसरे कल्प के देव अवधिज्ञान द्वारा प्रथम , ३ सरे -४थे कल्प के देव दुसरे ,५ वे से ८ वे कल्प तक के देव तीसरी,९वे से १२ वे कल्प तक के देव चौथी ,१३ वे से१६वे तक के देव पांचवी , नव ग्रैवेयक के देव छठी नरक भूमि तक और नव अनुदिशों और अनुत्तरों के देव पूरी लोक नाड़ी को जानते है !
गति-शरीर-परिग्रहाभिमानतो हीना: !!२१!!
संधि विच्छेद -गति+शरीर+परिग्रहा+अभिमानतो +हीना:
शब्दार्थ -गति-शरीर-परिग्रह- अभिमानतो हीना: क्रमश कम कम
अर्थ – नीचे के स्वर्गों से ऊपर ऊपर के स्वर्गों के देवों में गति,शरीर,परिग्रह,अभिमान क्रमश हीन हीन होता है !विशेष-
१-गति-जिससे प्राणी एक स्थान से दुसरे स्थान को जाता है वह गति है !यह गति ऊपर ऊपर के विमानों के देवों में क्रमश कम कम होती जाती है यद्यपि शक्ति की अपेक्षा अधिक सामर्थ्य होती है किन्तु वे प्रमाद वश ही कही आते जाते नहीं !सोलहवे स्वर्ग से ऊपर के देव अपना विमान छोड़कर कही नहीं जाते है !इनके शरीर में दुर्गन्ध,मल मूत्र,रुधिर,चर्बी आदि नहीं होता है !
२-शरीर -शरीर की अवगाह्न्ना अर्थात ऊंचाई क्रमश ऊपर के स्वर्गों में कम कम होती जाती है !डिवॉन का शरीर वैक्रयिक होता है जिसको वे अपनी इच्छानुसार छोटा बड़ा कर सकते है !तीर्थंकरों के जन्मोत्सव के समय जो १ लाख योजन ऐरावत हाथी का कथन आता है वह वैक्रयिक शरीर आभियोग्य जाती के देव का होता है !यह विक्रिया करने की शक्ति उत्तरोत्तर नीचे से ऊपर के स्वर्गों में क्रमश घटती जाती है !
३-परिग्रह-लोभ कषाय के उदय वश जो इन्द्रिय विषयों में ममत्व भाव होता है,उसे परिग्रह कहते है !यह उत्तरोत्तर नीचे से ऊपर के स्वर्गों के डिवॉन में क्रमश कम कम होता है !
४-अभिमान-मान कषाय के उदय से उत्पन्न होने वाले अहंकार ,अभिमान है !स्थिति,प्रभाव ,शक्ति आदि के निमित्त से अभिमान उत्त्पन्न होता है किन्तु ऊपर ऊपर के डिवॉन में मान कषाय क्रमश घटती है इसलिए
अभिमान भी घटता हुआ होता है संवेग परिणामों की उत्तरोत्तर अधिकता होने से अभिमान में हानि होती है !
५-शवासोच्छवास व आहार – देवों की जितने सागर की आयु होती है ,उतने पक्षों के अंतराल पर श्वासोच्छ्वास लेते है और उतने सहस्र वर्ष के अंतराल पर आहार विषयक विकल्प होते ही कंठ से अमृत झड़ता है,इसी को लेकर तृप्त हो जाते है !
पूर्व भव की कषायों का देव गति में जन्म लेने पर प्रभाव –
असैनी पंचेन्द्रिय पर्याप्त तिर्यंच अपने शुभ परिणामों से पुण्य कर्म का बंध कर भवनवासी और व्यंतर देवों में और सैनी पर्याप्त कर्म भूमियाँ मिथ्यादृष्टि या सासादन सम्यग्दृष्टि तिर्यंच भवनत्रिक में उत्पन्न हो सकते है और सम्यग्दृष्टि प्रथम स्वर्ग युगल तक जन्म ले सकते है !
कर्मभूमिया मिथ्यदृष्टि /सासादनसम्यग्दृष्टि मनुष्य भवनवासी से उपरिम ग्रैवियक तक उत्पन्न हो सकते है,किन्तु जो द्रव्य से जिन लिंगी ही ग्रैवियक तक उत्पन्न हो सकते है !
अभव्य मिथ्यादृष्टि जिन लिंग धारण कर,तप के प्रभाव से,मरकर उप्रीम ग्रैवियक तक में उत्पन्न हो सकते है !
परिव्राजक तपस्वी मरकर ५ वे स्वर्ग तक उत्पन्न हो सकते है !आजीविक सम्प्रदाय के साधु १२ वे स्वर्ग तक उत्पन्न हो सकते है !१२वे स्वर्ग से ऊपर अन्य लिंगी साधु उत्पन्न नहीं हो सकते !
निर्ग्रन्थ लिंग के धारक यदि द्रव्य लिंगी है तो उपरिम ग्रैवियक तक और भावलिंगी _सर्वार्थ सिद्धि तक उत्पन्न हो सकते है !श्रावक पहिले से सोलवे स्वर्ग तक ही जन्म ले सकते है!
इस प्रकार कषायों की मंदता के साथ ही मरने पर ऊपर ऊपर के स्वर्गों में जन्म होता है !,उसी प्रकार ऊपर के देवों में कषायों की मंदता होती है !\
वैमानिक देवों की लेश्याए –
पीतपद्मशुक्ललेश्याद्वित्रिशेषेषु २२
सन्धिविच्छेद -पीत+ पद्म+शुक्ल+ लेश्या+ द्वि+ त्रि +शेषेषु
शब्दार्थ- पीत , पद्म शुक्ल लेश्या, द्वि -दोयुगलों में ,त्रि-तीनयुगलों में , शेषेषु-शेष ससत विमानों में
अर्थ-प्रथम दो युगलों में ,तीन युगलों में और शेष समस्त विमानों में देवों की क्रमश पीत ,पढम और शुक्ल लेश्याए होती है !भावार्थ- प्रथम युगल सौधर्मेन्द्र-ईशांत स्वर्गोंके विमानों में देवों की पीत लेश्या है ,द्वित्य स्वर्ग युगल सानात्कुमार-माहेन्द्र में देवों की नीचे पीत और ऊपर के देवों की पद्म लेश्या है, ५वे से ८वे स्वर्गों के युग्ल.९वे से १२वे युग्ल में नीचे तक पद्म लेश्या है और ऊपर शुक्ल लेश्या है!१३वे से १६ वे स्वर्ग के युगलों में देवों की शुक्ल लेश्या है! शेषेषु- अर्थात ग्रैवेयक तक के देवों की शुक्ललेश्या है !
विशेष
१-अनुदिशों और अनुत्तरों में परम शुक्ल लेश्या है ,किन्तु राजवार्तिक के अनुसार परम शुक्ल लेश्या मात्र अनुत्तरों में है !
२-वैमानिक देवो के भाव लेश्या के समान द्रव्य लेश्या होती है किंतु उनके द्वारा बनाये गये वैक्रियिक शरीर की छ:लेश्यारूप वर्णमय है।अर्थात मूल शरीर एक ही द्रव्य लेश्यारूप है किंतु उत्तर शरीर सभी द्रव्य लेश्यारूप है!
शंका-देवों में आयु का बंध मात्र कापोत और पीत लेश्या मे होता है,किन्तु पांचवे स्वर्ग से ऊपर देवो के पद्म लेश्या और ११वे स्वर्ग से सर्वार्थसिद्धि तक ऊपर शुक्ल व परम शुक्ल लेश्या है फिर देवो की आयु का बंध कैसे होता है।
समाधान – उनकी त्रिभंगी आयु के बंध के समय, उनके परिणाम कापोत या पीत लेश्या रूप हो जाते है जिससे उनके भाव उस समय आयु बंध के अनुकूल हो जाते है।अतः निमित नैमित्तक संबंध मिलने से आयु का बंध हो जाता है।अन्य समयो मे,स्वर्गानुसार निर्दिष्ट लेश्याएँ जीवन पर्यंत रहती है।गोम्मेटसार के अनुसार ऐसा ही नरक मे भी रहता है।
कल्प कहाँ तक है –
प्राग्ग्रैवेयकेभ्यःकल्पाः २३
संधि विच्छेद -प्राक्+ग्रैवेयकेभ्य:+कल्प:
शब्दार्थ -प्राक -पाहिले तक, ग्रैवेयकेभ्यः -ग्रैवेयक से ,कल्पाः-कल्प है !
अर्थ- ग्रैवेयको से पहिले अर्थात १६ वे स्वर्ग तक कल्प कहते है क्योकि वही तक के देवों में इन्द्रादिक दस भेदो की कल्पना है !
विशेष -१६ वे स्वर्ग से ऊपर समस्त ग्रैवेयक ,अनुदिश और अनुत्तोर कल्पातीत है क्योकि यहाँ देवो मे कोई भेद नहीं है , अह्मिन्द्र है !
लौकांतिक देवों का लक्षण –
ब्रह्म-लोकालया लौकान्तिका: !!२४!!
संधि विच्छेद-ब्रह्म+लोक+आलया+ लौकान्तिका:
शब्दार्थ ब्रह्म-लोक -ब्रह्म लोक ,आलया -निवासहै, स्थान लौकान्तिका:-लौकांतिक देवो का
अर्थ –ब्रह्म लोक ,पांचवे स्वर्ग के निवासी देव लौकांतिक देव कहलाते है !
विशेष –
१- लौकांतिक देव देवऋषि कहलाते है!लौकांतिक देवों में मनुष्य आयु पूर्ण कर वे ही दिगंबर निर्ग्रन्थ, शरीर से नि:स्पृह, मुनि उत्पन्न होते है जो मनुष्य भव में सर्वपरिग्रहों के त्यागी और घोर तपश्चरण द्वारा सुख दुःख,मित्रता शत्रुता आदि में संमभावी होते है !
२-ये लौकांतिक देव ब्रह्म स्वर्ग के अंत के दिशा और विदिशाओं के विमानों में रहते है!
३-ये द्वादशांग के पाठी ,ब्रह्मचारी और एक भवावतारी अर्थात अगले भाव में मनुष्य पर्याय में जन्म लेकर मुक्त होते है !
४-इनके विमानों में देवियों का प्रवेश वर्जित है !इनकी देवांगनाएँ नहीं होती है !
५-ये केवल तीर्थंकर के दीक्षा कल्याणकों में दीक्षा की अनुमोदना के लिए दीक्षा स्थल पर जाते है
लौकांतिक देवों के भेद /नाम –
सारस्वातादित्य बहन्यरुण गर्दतोय तुषितावया बाधारिष्टाश्च !!२५!!
संधि विच्छेद-
सारस्वात+आदित्य + वहिन +अरुण + गर्दतोय +तुषित +अवयाबाध+ अरिष्ट:+ च
शब्दार्थ-
सारस्वत आदित्य वहि्न अरुण गर्दतोय तुषित अवयाबाध अरिष्ट: च (यहाँ च से सूचित होता है कि प्रत्येक के बीच २-२ लौकांतिक देव और है !
अर्थ-लौकांतिक देवों के सारस्वत,आदित्य,वहि्न,अरुण,गर्दतोय,तुषित,अवयाबाध और अरिष्ट आठ भेद नाम है !यहाँ च से सूचित होता है कि प्रत्येक के बीच २-२ लौकांतिक देव और है !
विशेष –
१ –उपर्युक्त आठों लौकांतिक देव ब्रह्म लोक की प्रत्येक दिशा में क्रमश एक एक होते है!
सारस्वत देव(७००) के विमान पूर्वोत्तर दिशा (ईशान ) में ,पूर्व दिशा में आदित्य देव (७००),वहि्न देवों(७००७) के पूर्व दक्षिण दिशा में,अरुण देवों(७००७) के दक्षिण दिशा में ,गर्दतोय देवों (९००९) के दक्षिण-पश्चिम दिशा में, तुषित देवों (९००९)पश्चिम दिशा में,अवयाबाध देवों (११०११)के पश्चिम उत्तर दिशा में और अरिष्ट:देवों (११०११) के विमान उत्तर दिशा में है सदर्भ सर्वार्थ सिद्धि पृष्ठ-१९३
ये लौकांतिक देव, इन्ही नाम कर्मों के उदय के कारण,इन्ही नामों से लौकांतिक देवो में जन्म लेते है!ये सभी एक समान होते है कोई छोटा बड़ा नहीं होता है ,किसी इंद्र के आधीन नहीं होते है !,ये समस्त विषयों से विरक्त होते है इसलिए इन्हे देवऋषि कहते है!अन्य देवों के बीच इनकी बहुत प्रतिष्ठा होती है !ये सभी अगले भव से मुक्त होने वाले होते है !
२ सूत्र में ” च” से सूचित होता है कि प्रत्येक के बीच २-२ लौकांतिक देव प्रकार है !
सारस्वत-आदित्य के बीच अगन्य और सूर्यप्रभ,
आदित्य-वहि्न के बीच चन्द्रभ और सत्यप्रभ ,
वहि्न-अरुण के बीच श्रेयस्कर और क्षेमप्रभ ,
अरुण-गर्दतोय के बीच वृषभेष्ठ और कामचोर ,
गर्दतोय-तुषितदेवों के बीच निर्माण और रजस,
तुषित-अवयाबाध देवों के बीच आत्मरक्षित और सर्वरक्षित,
अवयाबाध-अरिष्ट देवों के बीच मरुत और वायु, तथा
अरिष्ट-सारस्वत के बीच अश्व और विश्व देव है !
इस प्रकार २४ लौकांतिक देव ये है
अनुदिशों और अनुत्तरों देव वासियों में मोक्ष प्राप्ति का नियम
विजयादिषुद्विचरमा: !!२६ !!
संधि विच्छेद -विजय+आदिषु+द्विचरमा:
शब्दार्थ-विजय+आदिषु-विजय आदि में,द्विचरमा:-द्वी भवतारी
अर्थ-नव अनुदिश के नौ और ४ अनुत्तरों; विजय ,वैजयंत,जयंत,अपराजित के देव उत्कृष्टता से दो भवतारी होते है !
भावार्थ-नवअनुदिश और चार अनुत्तरों के;१३ देव अधिकतम २ भवों में मोक्ष प्राप्त कर लेते है!अर्थात देव इस भव की आयु से च्युत होकर ,मनुष्य भव में उत्पन्न होकर संयमादि धारण कर पुन:विजयादि में उत्पन्न होकर अगला भव पुन: मनुष्य भव पाकर मोक्ष प्राप्त करते है !
विशेष-
१-नवअनुदिशों और ५ अनुत्तरों में ,मिथ्यादृष्टि नहीं केवल सम्यग्दृष्टि जीव ही उत्पन्न होते है!
२-सूत्र में,सर्वार्थसिद्धि के देवों को नहीं लिया क्योकि वे उत्कृष्टतम विशुद्धि के धारक एक भवतारी ही होते है अर्थात यहाँ से च्युत होकर,मनुष्य पर्याय में उपन्न होकर नियम से मोक्ष प्राप्त करते है ! इनके अतिरिक्त दक्षिणेन्द्र,सौधर्मेन्द्र की इन्द्राणी,सौधर्मेन्द्र स्वर्ग के लोकपाल,और लौकांतिक देव भी एक भवतारी होते है !
३- नवअनुदिशों और ४ अनुत्तरों के ये १३ देव एक भव में भी मोक्ष प्राप्त कर सकते है किन्तु नियम से दूसरी बार मनुष्य भव में उत्पन्न होकर तो निश्चित रूप से मुक्त हो जाते है !
तिर्यंच का लक्षण
औपपादिकमनुष्येभ्य:शेषास्तिर्यग्योनय:!!२७!!
सन्धिविच्छेद :-औपपादिक +मनुष्येभ्य:+शेषा:+तिर्यञ्च+योनय :
शब्दार्थ -औपपादिक-उपपाद जन्म वाले ,मनुष्येभ्य:-मनुष्यों,शेषा:-के अतिरिक्त सभी, तिर्यंच :-तिर्यंच, योनय:-योनी वाले है
अर्थ-उपपाद जन्म वाले देवों ,नारकियों और मनुष्यों के अतिरिक्त सभी तिर्यंच योनी के जीव है !
भावार्थ -देव नारकी और मनुष्यों के अतिरिक्त समस्त जीव तिर्यंच है !
विशेष-
१-एकेन्द्रिय जीव भी तिर्यंच ही है जो की समस्त लोक में व्याप्त है!इसलिए इनका कोई अलग से लोक नहीं है !
२-त्रस जीव मात्र लोकनाड़ी में रहते है !
भवनवासी देवों की उत्कृष्ट स्थिति
स्थितिरसुरनागसुपर्णद्वीपशेषाणाम्सागरोपमत्रिपल्योपमार्द्धहीनमिता:!!२८!
सन्धिविच्छेद :-स्थिति+असुर+नाग+सुपर्ण+द्वीप+शेषाणाम्+सागरोपम+त्रि+पल्योपम+अर्द्ध+हीनमिता:
शब्दार्थ-स्थिति-आयु,असुर,नाग,सुपर्ण,द्वीप+शेषाणाम्-बाकियों की,सागरोपम-सागर त्रि-तीन,पल्योप-पल्य+अर्द्ध-आधा-आधा,हीनम् -कम कम +इताSadअर्थात आधा आधा पल्य कम ,क्रमश २.५ ,२.०,१.५ पल्य है
अर्थ- भवनवासी देवों में असुरकुमार की आयु १ सागर ,नाग कुमार की ३ पल्य , सुपर्ण कुमार की २.५ पल्य ,द्वीप कुमार की २ पल्य तथा शेष छ देवोँ विद्युतकुमार,अग्निकुमार,वातकुमार ,स्तनिक कुमार ,उदधि कुमार और दिक्कुमार की १.५ पल्य है!
सौधर्मेन्द्र और ऐशान स्वर्ग में उत्कृष्टायु –
सौधर्मैशानयो:सागरोपमेअधिक !!२९!!
संधि-विच्छेद -सौधर्म+ऐशानयो:+सागरोपमे+अधिक
शब्दार्थ-सौधर्म-सौधर्म,ऐशानयो-:और ऐशान स्वर्गों में, सागरोपमे- दो सागरसे, अधिक-अधिक (कुछ)
अर्थ-सौधर्मेन्द्र और ऐशान स्वर्गों के देवों की उत्कृष्ट आयु दो सागर से कुछ अधिक है !
भावार्थ-सौधर्मेन्द्र और ऐशान स्वर्गों में देवो की उत्कृष्ट आयु साधारणतया २ सागर है !किन्तु घातायुष्क सम्यग्दृष्टि की अपेक्षा उत्कृष्ट आयु २ सागर से आधा सागर अधिक अर्थात ढाई सागर है !
विशेष-
१-घातायुष्क-उस जीव को कहते है जो पहले आयु बंध के अपकर्ष काल में विशुद्ध परिणामों के कारण अधिक आयु की स्थिति बंध कर किसी उपरिम स्वर्ग की आयु का बंध करता है किन्तु किसी बाद के अपकर्ष काल में परिणामों की विशुद्धता में कमी आने के कारण कम स्थिति करलेता है यह उस जीव की घातायुष्क कहलाती है !
२-किसी जीव ने यदि २ सागर की आयु का वैमानिक देव की गति का बंध किया तो वह प्रथम युगल में २ सागर की आयु के साथ जन्म लेगा और यदि २ सागर से १ समय अधिक का बंध किया तो वह दुसरे युगल अर्थात सनत्कुमार-महेंद्र में २ सागर १ समय की आयु के साथ उत्पन्न होगा !
किन्तु यदि कोई मुनिराज पाहिले नव ग्रैवेयिक की आयु ३१ सागर का बंध करते है किन्तु बाद में विशुद्धि के गिरने के कारण प्रथम स्वर्गों की २ सागर का बंध कर लेते है तब वे घातायुष्क सम्यग्दृष्टि है, उनका उत्कृष्तायु का बंध इस स्वर्गों के युगल में वह ढाई सागर से १ अंतर्मूर्हत कम का होगा,न की २ सागर का
सानत्कुमार-माहेन्द्र स्वर्गों में देवों की उत्कृष्टायु –
सानत्कुमार-माहेन्द्रयो: सप्त !!३०!!
संधि विच्छेद-सानत्कुमार+माहेन्द्रयो:+सप्त
शब्दार्थ-सानत्कुमार-माहेन्द्रयो: -सानत्कुमार और माहेन्द्र स्वर्गों में,सप्त -सात सागर से कुछ अधिक उत्कृष्ट आयु है
अर्थ -सानत्कुमार और माहेन्द्र स्वर्गों में देवों की उत्कृष्ट आयु सात सागर है !घातायुष्क सम्यग्दृष्टि की अपेक्षा सात सागर से आधा सागर अधिक अंतर्मूर्हत कम है !
त्रिसप्तनवैकादशत्रयोदशपञ्चदशभिरधिकानितु !!३१!!
संधि विच्छेद -त्रि+सप्त+नव+ऐकादश त्रयोदश +पञ्चदशभि:+अधिकानि+ तु
शब्दार्थ-त्रि-तीन,सप्त-सात,नव-नौ,ऐकादश-ग्यारह, त्रयोदश-तरह,पञ्चदशभि:-पंद्रह ,अधिकानि-(सात से) अधिक , तु-बार्वे स्वर्ग से आगे इन से आधा सागर अधिक आयु नहीं है !
अर्थ- तीसरे युगल, ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर में देवों की उत्कृष्ट आयु ७+३ अर्थात १० सागर से कुछ अधिक (अंतर्मूर्हत कम आधा सागर अधिक ,
चौथे युगल लांतव-लापिष्ट स्वर्गों में देवों की उत्कृष्ट आयु ७+७ =१४ सागर से कुछ अधिक (अंतर्मूर्हत कम आधा सागर ),
पांचवे युगल शुक्र और महाशुक्र में देवों की उत्कृष्टायु ७+९=१६ सागर में कुछ अधिक (अंतर्मूर्हत कम आधा सागर ),
छठे युगल शतार -सहस्रार स्वर्गों में देवों की उत्कृष्टायु ७+११ =१८ सागर से कुछ अधिक (अंतर्मूर्हत कम आधा सागर ),
सातवे युगल -आणत -प्राणात स्वर्गों में देवों की उत्कृष्ट आयु ७+१३=२२ सागर और
आठवे युगल आरं-अच्युत स्वर्गों में देवों की उत्कृष्टायु ७+१५=२२ सागर है !
विशेष- घातायुष्क जीव १२ स्वर्गों तक ही उत्पन्न होते है !
ग्रैवेयिक ,अनुदिशों और अनुत्तरों में उत्कृष्टायु –
आरणाच्युतादूर्ध्वमेकैकेनवसुग्रैवेयिकेषुविजयादिषुसर्वार्थसिद्धौच !!३२!!
संधि विच्छेद –
आरण +अच्युतात्+ऊर्ध्वम् ज़+एकैके+नवसु+ग्रैवेयिकेषु+विजयादिषु+सर्वार्थसिद्धौ+च –
शब्दार्थ-आरण-आरण,अच्युतात्-अच्युत से ,ऊर्ध्वम्-ऊपर के,एकैके-(एक-एक सागर),नवसु-नवअनुदिशों, ग्रैवेयिकेषु-नव ग्रैवेयिक,विजयादिषु-विजयादि ,सर्वार्थसिद्धौ-सर्वार्थ सिद्धि , च -और सर्वार्थ सिद्धि में ३३सागर ही जघ्य व् उत्कृष्ट आयु है !
अर्थ-आरण और अच्युत स्वर्गों के आठवे युगल से ऊपर नव अनुदिश ,और विजयादि चार अनुत्तरों और सर्वार्थसिद्धि में देवों की उत्कृष्ट आयु क्रमश १ -१ सागर वृद्धिगत है !
भावार्थ -पहले ग्रैवेयिक में उत्कृष्ट आयु देवों की २३ सागर है जो की प्रत्येक ग्रैवेयिक में एक एक सागर अधित होते होते अंतिम ग्रैवियेयिक में ३१ सागर है ,नव अनुदिशों में ३२ सागर और पांचों अनुत्तरों में ३३सागर है
उक्त सूत्र में सर्वार्थ सिद्धि को च से अन्य अनुत्तरों से अलग दर्शाने का कारण है की यहाँ उत्कृष्ट ही आयु ३३ सागर ही है !
सौधर्मेन्द्र और ऐशान स्वर्ग में देवों की जघन्यायु –
अपरा पल्योपममधिकम्॥३३॥
संधि विच्छेद-अपरा+ पल्योपमम् +अधिकम्
शब्दार्थ -अपरा-जघन्य आयु , पल्योपमम्- पल्योपम , अधिकम्-से कुछ अधिक है
अर्थ-सौधर्मेन्द्र और ऐशान स्वर्ग में देवों की जघन्यायु एक पल्य है !
परत:परत:पूर्वापूर्वा ऽनन्तरा॥३४॥
संधि विच्छेद-परत:+परत:+पूर्वा+पूर्वा +अनन्तरा
शब्दार्थ-परत:परत:-अगले अगले स्वर्गों में देवों की है, पूर्वापूर्वा -पहिले -पहिले स्वर्गों के देवों की उत्कृष्टायु , अनन्तरा-जघन्यायु है !
अर्थ-स्वर्गों में अगले स्वर्ग युगल के देवों की जघन्यायु पाहिले-पाहिले स्वर्ग युगल के देवों के उत्कृष्टायु से एक समय अधिक है !
भावार्थ-सौधर्मेन्द्र-ऐशान स्वर्ग युगल में उत्कृष्टायु २ सागर से कुछ अधिक,सनत्कुमार-माहेन्द्र स्वर्ग युगल के देवों की जघन्यायु २ सागर से कुछ अधिक से १ समय अधिक है ,इसी प्रकार सनत्कुमार-माहेन्द्र स्वर्गों मे देवों की उत्कृष्तायु ७ सागर से कुछ अधिक में १ समय अधिक जघन्यायु, ब्रह्म और ब्रह्मोत्तर स्वर्गों के देवों की है !इसी प्रकार आगे के स्वर्गों के देवों की भी है,सर्वार्थ सिद्धि मे जघन्यायु नहीं होती !
द्वित्यादि नरको में नारकियों की जघन्यायु –
नारकाणां च द्वित्यादिषु !!३५!!
संधि विच्छेद -नारकाणां +च+ द्वित्यादिषु
शब्दार्थ-नारकाणांनरकों में भी, च-देवों के समान है , द्वित्यादिषु-द्वित्यादि नरकों में नारकीयों की जघन्यायु
अर्थ- पाहिले नरक में नारकियों की उत्कृष्टायु १ सागर है,दुसरे नरक मे जघन्यायु १ सागर समय नारकियों की है उत्कृष्टायु ३ सागर है ,तीसरे नरक की जघन्यायु ३सागर से १ समय है,उत्कृष्तायु ७ सागर है !चौथे नरक में जघन्यायु ७ सागर १ समय और उत्कृष्टायु १० सागर है ,पांचवे नरक में जघन्यायु १० सागर १ समय और उत्कृष्ट १७ सागर है,छठे नरक में जघन्य आयु १७ सागर १ समय है,उत्कृष्टायु २२ सागर , सातवे में जघन्यायु २२ सागर से एक समय अधिक है और उत्कृष्ट आयु ३३ सागर है
विशेष-नारके भी देवों की भांति जितने सागर की आयु का बंध होता है उतने ही पक्ष में नारकी श्वासोच्छ्वास लेते है !
प्रथम नरक में जघन्यायु –
दशवर्षसहस्राणिप्रथमायाम् !!३६!!
संधि -विच्छेद -दश+वर्ष+सहस्राणि +प्रथमायाम्
शब्दार्थ-दश-दस ,वर्ष-वर्ष,सहस्राणि-हज़ार, प्रथमायाम्-प्रथम नरक में है
अर्थ-प्रथम नरक में नारकी की जघन्यायु दस हज़ार वर्ष है !
भवनवासी देवों की जघन्य आयु –
भवनेषु च !!३७!!
शब्दार्थ -भवनेषु -भवनों में,च-भी (दस हज़ार वर्ष आयु है )
अर्थ-भवनवासी देवों की जघन्यायु भी १० हज़ार वर्ष है !
व्यंतर देवों की जघन्यायु-
व्यन्तराणां च !!३८!!
संधि विच्छेद -व्यन्तर+अणां +च
शब्दार्थ -व्यन्तर-व्यन्तर, अणां -वासियों में ,च-भी (१० हज़ार वर्ष है )
अर्थ -व्यन्तर देवों की भी दस हज़ार वर्ष जघन्यायु है!
व्यन्तर देवों की उत्कृष्टायु –
परा पल्योपममधिकम् !!३९!!
शब्दार्थ-परा -उत्कृष्तायु,पल्योपममधिकम्- पल्य से कुछ अधिक है !
अर्थ – व्यन्तर देवों की उत्कृष्टायु पल्य से कुछ अधिक है,पल्य असंख्यात वर्षों का होता है !१० कोडाकोड़ी पल्य का १ सागर होता है
ज्योतिष्क देवों की उत्कृष्टायु –
ज्योतिष्काणां च !!४०!!
अर्थ- ज्योतिष्क देवों की भी उत्कृष्टायु १ पल्य से कुछ अधिक होती है !
विशेष-चन्द्रमा की १ लाख वर्ष अधिक एक पल्य है!सूर्य की १००० वर्ष अधिक १ पल्य है !शुक्र की १०० वर्ष अधिक १ पल्य है !वृहस्पति की उत्कृष्ट स्थिति मात्र १ पल्य है !
ज्योतिष्क देवों की जघन्यायु –
तदष्ट-भागो ऽपरा !!४१!!
शब्दार्थ-तदष्ट -वह आठवा ,भागो-भाग, ऽपरा -ऊपर कहे पल्य का है
अर्थ- ज्योतिष्क देवों में जघन्यायु एक पल्य का आठवा भाग है !
विशेष-चन्द्र,सूर्य,शुक्र,वृहस्पति,की जघन्यायु १/४ पल्य ,तारों,नक्षत्र,बुद्ध की १/८ पल्य है !
लौकांतिक देवों की आयु-
लौकान्तिकानामष्टौसागरोपमाणिसर्वेषाम् !!४२ !!
संधि विच्छेद -लौकान्तिकानाम+अष्टौ+ सागरोपम+,अणि+ सर्वेषाम्
शब्दार्थ-लौकान्तिकानाम-लौकांतिक देवों में , अष्टौ-आठ , सागरोपम-सागर ,आणि-अस्ति है,, सर्वेषाम्-समान
अर्थ- लौकांतिक देवों की एक समान;जघन्यायु और उत्कृष्टायु ८ सागर है प्रमाण ही है !
विशेष -सभी लौकांतिक देवों की ऊंचाई ५ हाथ प्रमाण होती है और शुक्ललेश्याधारी होते है !ये ब्रह्मऋषि कहलाते है!इनकी देवांगनाएँ नहीं होती !
देवों का स्वरूप –
१-सभी देवों का शरीर का आकार सुंदर,अंग-उपांग अति सुन्दर,मनोहर ,समचतुर संस्थान सहित सप्त धातुओं(रस,लहू,हड्डि,मांस,मेद,मज्जा,वीर्य,/शुक्र)पसीने आदि से रहित महा सुगंधित,भव प्रत्यय से वैक्रयिक होता है।
२-इनके शरीर के वैक्रयिक पुद्गल परमाणुमय है!बाल ,नाखून आदि बढ़ते नही !दाढ़ी -मूछें ,नेत्रों में पलके आदि होती नहीं है !
३- देवों के बाल्यावस्था और वृद्धावस्था नहीं होती ,अपने जन्म से च्युत होने तक युवा ही रहते है!
४-इनके बल,वीर्य,प्रभाव,वैभव,परिवार रूप सम्पदा में हीन अधिक्ता नहीं होती सदा एक समान रहते है !
५-देवों को आहार की जब वांछा होती हैं ,तब इनके कंठ से अमृत झर कर इनकी तुरंत तृप्ति हो जाती है! इनका मानसिक आहार होता है मनुष्यों की भांति कवलाहार नहीं होता है ! है की देवगति संयम नहीं हो पाता है !
६- देव गति में जीव के पहले चार गुणस्थान होते है !
Animations and Visualizations.
मुनि श्री 108 प्रणम्यसागरजी तत्वार्थ सूत्र with Animation
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण
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अधो लोक –
सात पृथिवियाँ (सात नरक)
रत्नशर्कराबालुकापङ्कधूमतमोमहातमःप्रभाभूमयोघनाम्बुवाताकाशप्रतिष्ठाःसप्तोऽधोऽधः ॥१॥
संधि-विच्छेद :
रत्न+शर्करा+बालुका+पङ्क+धूम+तमो+महातमः+प्रभा+भूमय:+घन+अम्बु+वात+आकाश+प्रतिष्ठाः+सप्त+ऽधोऽधः
शब्दार्थ-रत्न-रत्नो,शर्करा-शर्करा,बालुका-बालुका,धूम-धूम,पङ्क-कीचड़,तमअन्धकार,महातम-घोरअन्धकार की प्रभा-कांति के समान सात पृथिवीयाँ है,घनाम्बुवाता-घनोदधिवातवलय, घनवातवलय, तनुवातवलय, आकाश-आकाश के, प्रतिष्ठा:-आधार से है !
भावार्थ-अधोलोक में रत्नप्रभा,शर्कराप्रभा,बालुकाप्रभा,पङ्कप्रभा,धूमप्रभा,तमप्रभा और महात्मप्रभा क्रम से एक के नीचे दूसरी ,दूसरी के नीचे तीसरी ;इस प्रकार सात पृथिवियाँ मे क्रमश: धम्मा ,वंशा ,मेधा, अंजना, अरिष्टा,मधवा और माधवी सात नरक,नारकियों के निवास स्थान ८४लाख बिल है !सभी पृथिवियाँ घनोदधि वातवलय के आधार है,घनोदधि ,घनवातवलय के आधार और घनवातवलय तनुवातवलय के आधार है,तनुवातवलय का आधार आकाश है!आकश सबसे बड़ा और अनन्त है इसलिए स्वयं का आधार है इसका अन्य कोई आधार नहीं है !
सात पृथिवियोँ में नरको(बिलों) की संख्या –
तासुत्रिंशत्पंचविंशतिपंचदशदशत्रिपंचोनैकनरकशतसहस्राणिपञ्चचैवयथाक्रममम् ॥२॥
संधि विच्छेद –
तासु+त्रिंशत्+पंचविंशति+पंचदश+दश+त्रि+पंचोनैक+नरक+शत+सहस्राणि+पञ्च+च+एव्+यथाक्रममम्
शब्दार्थ-
तासु-उन-पृथिवियों के नरको में, त्रिंशत्-३x१०=तीस ,पंचविंशति-पच्चीस ,पंचदश-पद्रह,दश-दस,त्रि-तीन,पंचोनैक-पांच कम एक लाख,नरक-बिल,शत(सौ),सहस्राणि-(हज़ार)अर्थातलाख पञ्च-पांच,एव +यथाक्रममम् -क्रमश :!
भावार्थ-अधोलोक में उन पृथिवियों;रत्नप्रभा,शर्कराप्रभा,बालुकाप्रभा,पङ्कप्रभा,धूमप्रभा,तमप्रभा और महातम प्रभा में क्रमश ;३०लाख,२५लाख,१५लाख,१०लाख,३ लाख और एक लाख में ५ कम अर्थात ९५००० तथा ५ बिल है !
विशेष –
१-इस अध्याय में अधोलोक/मध्य लोक का वर्णन आचार्य उमा स्वामी जी ने किया है!आकाश और लोकाकाश दो आकाश है!जहाँ तक आकाश द्रव्य में छ द्रव्य व्याप्त है वह लोकाकाश है,वही ३४३ घन रज्जु का हमारा अकृत्रिम,अनादि निधन,स्वभाव से निर्मित लोक है!लोकाकाश,आकाश के बीचोबीच अवस्थित है!इस लोक के तीन अधो,मध्य और उर्ध्व भाग है!अधोलोक में नारकी ,भवनवासी और व्यंतर देवों ,मध्य लोक में व्यंतर,ज्योतिष्क देवों,तिर्यंच और मनुष्य तथा उर्ध्व लोक में वैमानिक देवों का वास है!!मन्दरांचल के नीचे क्षेत्र ,अधो लोक है इसमें सात पृथिवियाँ में सात नरक है!
२- रत्नप्रभा पृथिवि १,८०,००० योजन मोटी है,ये तीन खर,पंक और अब्बहुल भागों में विभक्त है जिनकी मोटाई क्रमश:१६०००,८४००० और १००००० योजन है !खरभाग के प्रथम और अंतिम १००० योजन छोड़कर १४००० योजन में राक्षसों के अतिरिक्त शेष ९ प्रकार के भवनवासी देव और ७ प्रकार के व्यंतर देव रहते है पंक भाग में असुरकुमार और राक्षस रहते है!अब्बहुल भाग में प्रथम धम्मा नरक है,जिसमे ३०००० बिलों,१३ पटल में १०००० वर्ष की जघन्य आयु और १ सागर उत्कृष्ट आयु के बंध के साथ ७ धनुष ३ हाथ ६ अंगुल लम्बे नारकी रहते है !इस पृथ्वी में जीव लगातार ८ बार उत्पन्न हो सकते है,आयु पूर्ण कर तीर्थंकर बन सकते है ,असंज्ञी जीव १ कोस उपपाद व्यास तक उत्पन्न हो सकते है !
३-शर्करा प्रभा पृथिवि मे ,वंशा नरक है, मोटाई ३२००० योजन है,इसके २५ लाख बिलों,११ पटल में ३ सागर उत्कृष्ट और १ सागर+१ समय जघन्य आयु के बंध के साथ ५ धनुष २ हाथ और १२ अंगुल लम्बे नारकी रहते है!जीव लगातार ७ बार उत्पन्न हो सकते है,आयु पूर्ण कर तीर्थंकर बन सकते है ,सरी सृप जीव २ कोस उपपाद व्यास तक उत्पन्न हो सकते है !
४ -बालुकाप्रभा पृथिवि में मेधा नरक है,जिस की मोटाई २८००० योजन है,इसके १५ लाख बिलों,९ पटल में ७ सागर उत्कृष्ट और ३ सागर+१ समय जघन्य आयु के बंध के साथ ३१ धनुष १ हाथ लम्बे नारकी रहते है जीव लगातार ६ बार उत्पन्न हो सकते है,आयु पूर्ण कर तीर्थंकर बन सकते है,पक्षी ३ कोस उपपाद व्यास तक उत्पन्न हो सकते है !
५-पङ्कप्रभा पृथिवि में अंजना नरक है, जिस की मोटाई २४००० योजन है,इसके १० लाख बिलों ७ पटल में १० सागर उत्कृष्ट और ७ सागर+१ समय जघन्य आयु के बंध के साथ ६२ धनुष २ हाथ लम्बे नारकी रहते है!जीव लगातार ५ बार उत्पन्न हो सकते है,आयु पूर्ण कर मोक्षगामी हो सकते है ,भुजङ्गादि जीव १ योजन उपपाद व्यास तक उत्पन्न हो सकते है !
६-धूमप्रभा पृथिवि में अरिष्टा नरक है जिसकी मोटाई २०००० योजन है,इसके ३ लाख बिलों ५ पटल में १७ सागर उत्कृष्ट और १०सागर+१ समय जघन्य आयु के बंध के साथ १२५ धनुष लम्बे नारकी रहते है! जीव लगातार ४ बार उत्पन्न हो सकते है,आयु पूर्ण कर मुनि/सकलसंयमी हो सकते है,सिंह जीव २ योजन उपपाद व्यास तक उत्पन्न हो सकते है !
७-तमप्रभा पृथिवि में मधवा नरक है जिसकी मोटाई १६००० योजन है,इसके ५ कम १ लाख बिलों ३ पटल में २२ सागर उत्कृष्ट और १७ सागर+१ समय जघन्य आयु के बंध के साथ २५० धनुष लम्बे नारकी रहते है!जीव लगातार ३ बार उत्पन्न हो सकते है,आयु पूर्ण कर देशविरति हो सकते है,स्त्री जीव ३ योजन उपपाद व्यास तक उत्पन्न हो सकते है !
८-महातमप्रभा पृथिवी में माधवी नरक है जिसकी मोटाई ८००० योजन है,इसके ५ बिलों, १ पटल में ३३ सागर उत्कृष्ट और २२ सागर+१ समय जघन्य आयु बंध के साथ ५०० धनुष लम्बे नारकी रहते है!जीव लगातार २ बार उत्पन्न हो सकते है,आयु पूर्ण कर मिथ्यादृष्टिं तिर्यंच हो सकते है, मत्सय एवं पुरुष जीव १०० योजन उपपाद व्यास तक उत्पन्न हो सकते है !
९-तीनो वातवलय- घनोदधि ,घनवातवलय और घनवातवलय तनुवातवलय लोक के आधार दक्षिण में २००००-२०००० योजन मोटाई है तीनों की मोटाई कुल ६०००० योजन है !सातवे नरक को दोनों तरफ पार्श्व भाग ऊपर मध्य लोक तक ७,५. और ४ योजन क्रम से है अर्थात घनोदधि ७ योजन मोटा,घन ५ और तनु ४ योजन मोटा है !आगे मध्य लोक में दोनों पार्श्व क्रम से ५,४ योजन मोटाई के तीन वातवलय है ,आगे ५ वे ब्रह्म स्वर्ग के दोनों पार्श्व में तीनो क्रमश:७,५,योजन मोटे है!ब्रह्म स्वर्ग से ऊपर जाते हुए लोक अंतिम भाग में दोनों पार्श्व भाग में तीनो वातवलय की क्रमश :५,४ और ३ योजन कुल १२ योजन मोटाई है !लोक के ऊपर शिखर पर चक्र के आकार घनोदधि वातवलय की मोटाई २ कोस =४००० महा धनुष,घन वातवलय १ कोस =२००० महा धनुष वातवलय १५७५ महा धनुष मोटा है !घनोदधि वातवलय गौ मूत्र के रंग समान वर्ण का है!घनवातवलय मूंग के समान रंग और तनुवातवलय अनेक प्रकार के रंगों वाला है !
१० -मध्य लोक से दुसरे नरक की पृथिवीं का अंतराल,दूसरी से तीसरी ,तीसरी से चौथी , पांचवी से छठी ,छठी से सातवी ,प्रत्येक का अंतराल १ राजू से कुछ कम है !सातवी पृथिवि मध्यलोक से ६ राजू के अंतराल पर है!सातवी पृथिवि के नीचे १ राजू प्रमाण कलकल पृथिवि है जिसमे निगोदिया जीव रहते है !लोक में सारे में निगोदिया जीव ठसा ठस भरे है !
११ – नारकी के निवास स्थान को बिल कहते है !ये तीन प्रकार के होते है !
१-इन्द्रकबिल-सभी बिलो के मध्यस्थ के बिल को इन्द्रक बिल कहते है!ये कुल ४९ है!प्रथम नरक का प्रथम इन्द्रक बिल का विस्तार ४५ लाख योजन ढाई द्वीप के समान है और ठीक उसके नीचे है ! क्रम से घटते घटते सातवे नरक का इन्द्रक बिल जम्बूद्वीप के ठीक नीचे १००००० योजन विस्तार का है !
२-श्रेणीबद्धबिल आकाश प्रदेशों की श्रेणी के अनुसार,दिशा और विदिशाओं में स्थित बिल को श्रेणीबद्ध बिल कहते है ये २६०४ है !
३-प्रकीर्णकबिल -पुष्पों के समान बिखरे बिलो को प्रकीर्णक कहते है !८४ लाख में शेष ८३९७३४७ है !
१२ -नरक में नारकी जीवों की विक्रिया –
६ठे नरक तक के नारकियों के त्रिशूल ,तलवार,परशु,आदि अनेक आयुध रूप एकत्व विक्रिया होती है !सातवे नरक में गाय बराबर कीड़े ,चींटी आदि रूप से एकत्व क्रिया होती है !
१३ -नारकियों की लेश्य -रत्नप्रभा में जघन्यकापोत,शर्करा में मध्यमकापोत बालुका में उत्कृष्टकापोत और जघन्यनील,पङ्कप्रभा में माध्यमनील,धूमप्रभा में उत्कृष्यनील और जघन्यकृष्ण,तमप्रभा में मध्यमकृष्ण ,महातमप्रभा में उत्कृष्ट कृष्ण लेश्या है
नारकीयों की लेश्यादि दुःख:-
नारकानित्याशुभतरलेश्यापरिणामदेहवेदनाविक्रिया:-!!३!!
सन्धिविच्छेद-
नारका+नित्य+अशुभतर+लेश्या+परिणाम+देह+वेदना+विक्रिया:
शब्दार्थ-
नारका-नरक में नारकीयों की,नित्य-सदैव अशुभतरलेश्या-अशुभतरलेश्या,परिणाम-अशुभतरपरिणाम, देह-अशुभतरदेह,वेदना-अशुभतरवेदन,विक्रिया:-अशुभतरविक्रिया होती है !
भावार्थ-
नारकी जीवों की नरक में हमेशा अशुभतरलेश्या,अशुभतरपरिणाम,अशुभतरदेह,अशुभतरवेदना,अशुभतर विक्रिया के धारक होते है !
अशुभतर से अभिप्राय पहले नरक से सातवे नरक तक जीवों की लेश्याए,परिणाम-पुद्गल का स्पर्श, रस, गंध,रूपऔर शब्द रूप परिणाम से है!देह ,वेदना और विक्रिया उत्तरोत्तर अशुभ होती जाती है !
अशुभतर लेश्या-यहाँ कषाय अनुरंजीत योग प्रवृति को लेश्या कहा है!अत: कषाय और योग के बदलने से वह मर्यादा के अंतर्गत बदल जाती है!प्रथम नरक से सातवे तक लेश्याये अशुतर होती जाती है !
रत्नप्रभा में जघन्यकापोत,शर्कराप्रभा में मध्यमकापोत, बालुकाप्रभा में उत्कृष्टकापोत और जघन्य नील,पङ्कप्रभा में माध्यमनील,धूमप्रभा में उत्कृष्यनील और जघन्यकृष्ण,तमप्रभा में मध्यमकृष्ण , महातमप्रभा में उत्कृष्ट कृष्णलेश्या है!रत्नप्रभा में कपोतलेश्या का जघन्य अंश नहीं बदलता क्योकि मध्यम और उत्कृष्ट अंश वहा नहीं रहता!इसी प्रकार महातमप्रभा पृथिवीं में कृष्णलेश्या का उत्कृष्ट अंश नहीं बदलता !भावलेश्या में परिवर्तन नहीं होता मात्र कषाय और योग के अनुसार तारतम्य भाव होता रहता है क्योकि प्रत्येक नारकी के समान कषाय और योग रहे ऐसा नियम नहीं है!साधारणतया नारकी में तिर्यंच और मनुष्य ही मरकर जन्म लेते है !देव और नारकी उनमे जन्म नहीं लेते !
अशुभतरपरिणाम- सातो नरकों में नारकियों के ये पुद्गल रूप परिणाम उत्तरोत्तर अशुभ होते जाते है !जो की उत्तरोत्तर बढ़ते दुखों के कारण है!
प्रथम नरक से सातवे नरक तक मिटी की दुर्गन्ध क्रमश: १,१.५ ,२,२,५,३,३.५ और ४ कोस तक के जीवों को मारने में सक्षम है !परस्पर में वे लड़ते है !एक दुसरे को मारते काटते है !
अशुभतरदेह-नरको में नारकियों के शरीर अशुभनामकर्मोदय से उत्तरोत्तर अशुभ,देखने में भयकर होते है !
अशुभतरवेदना-असातावेदनीय कर्मोदय से,जन्म लेते समय जीवों के ऊपर उछाल कर गिरने की क्षमता क्रमश:७योजन 3. २५ कोस,१५योजन २,५कोस,३१योजन १कोस,६२योजन २कोस,१२५योजन ,२५०योजन, और ५०० योजन है!रत्नप्रभा पृथ्वी से धूमप्रभा पाचवी पृथ्वी तक ८२२५००० बिल उष्ण भयकर गर्मी के कारण और १२५००० बिल शीत भयकर ठण्ड के कारण वेदना उतपन्न करते है!प्रथम से चौथी पृथ्वी तक समस्त बिल उष्णहै ,पांचवी पृथ्वी के २२५००० बिल उष्ण तथा ७५००० बिल ठन्डे है ,छट्टे और सातवी पृथिवि के समस्त बिल ठन्डे है !इनमे गर्मी और ठण्ड इतनी अधिक होती है की मेरु के प्रमाण का लोहे का गोल पिंड भी उससे क्षण में पिघल जाता है,वह अंतिम नरक तक नहीं पहुँच पाता !नारकी जीव कड़वी मिटटी का आहार लेते है,उससे नीचे के नारकी जीव सड़ा हुआ अशुभ दुर्गन्ध युक्त आहर लेते है !नरको में नारकियों को इतनी भूख की वेदना सताती है की समस्त लोक में उतपन्न अन्न भी खा ले तब भी उनकी भूख शांत नहीं होती!,किन्तु उन्हें एक भी अन्न का दाना उपलब्ध नहीं होता है!प्यास इतनी लगती है की लोक के समस्त सागर का जल भी पी ले तो उनकी प्यास नहीं बुझती,किन्तु जल उपलब्द्ध नहीं होता है !नारकी जीव उप्पाद स्थान से छत्तीस प्रकार के शस्त्रों पर गिरते है,और गिरते ही उछल कर पुन :उसी के ऊपर गिरते है जससे उनकी देह छिन्न भिन्न हो जाती है पारे के समान और पुन: जुड़ जाती है
अशुभतर विक्रिया-नारकियों की विक्रिया बहुत शुभ चाहने पर भी उत्तरोत्तर अशुभ होती है !वे अच्छा कार्य करने की सोचते भी है किन्तु कर नहीं पाते है !
विशेष- १ धनुष ४ हाथ प्रमाण और १ हाथ २४ उंगल प्रमाण होता है,६ अंगुल=१ पाद,२ पाद =१वितस्ति,२ वितस्ति=१हाथ ,२हाथ =१रिंकू,,२ रिंकू=१ धनुष/दंड
नरको में परस्पर उदित दुःख –
परस्परोदीरित दुखा:-४
संधि विच्छेद -परस्पर+ उदीरित +दुखा:
शब्दार्थ-परस्पर-आपस में, उदीरित-उत्पन्न कर देते है , दुखा:-दुःख
अर्थ-नारकी आपस में एक दुसरे को दुःख देते है !
विशेष-नरको में नारकी एक दुसरे को मारते काटते है फिर भी वे आयु पूर्ण करने से पूर्व मरते नही क्यो कि उनकी अकाल मृत्यु नहीं होती है !अम्बाब्रीष देव तीसरे नरक तक के जीवों को दुखी करते है !
नरको में असुर कुमार देवों कृत दुःख-
संक्लिष्टा सुरोदीरित दुखाश्च प्राक् चतुर्थ्या:-५
संधि विच्छेद-संक्लिष्टा+सुर+उदीरित+दुखा:+च+प्राक्+चतुर्थ्या:-
शब्दार्थ संक्लिष्टा-संक्लिष्ट परिणाम वाले, सुर-असुर कुमार देव द्वारा ,उदीरित-उत्पन्न किये हुए , दुख:-दुःख ,च-और , प्राक् -पाहिले,चतुर्थ्या:-चौथी पृथ्वी से
अर्थ-और अम्ब्रीश जाति के असुरकुमार देव चौथी पृथिवी से पूर्व अर्थात तीसरी पृथिवी तक नारकियों को उनके पूर्व भव के बैर का जातिस्मरण द्वारा याद कराकर,उन्हें लड़वाकर, उनमे परस्पर दुःख उत्प्न्न करवाते है तथा स्वयं आनंदित होते है !इनके इसी प्रकार की कषाय उत्पन्न होती है !
नारकीयों की उत्कृष्ट आयु –
तेष्वेकत्रिसप्तदशसप्तदशद्वाविंशतित्रयस्त्रिंशत्सागरोपमासत्तवानांपरा स्थितिः-॥६॥
संधि विच्छेद-
तेषु+एक+त्रि+सप्त+दश+सप्तदश+द्वाविंशति+त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमा+सत्तवानां+परा+स्थितिः
शब्दार्थ –
तेषु-उन,एक-एक,त्रि-तीन,सप्त-सात,दश-देश,सप्तदश-सत्रह,द्वाविंशति, बाईस, त्रयस्त्रिंशत–तैतीस, सागरोपमा-सागर,सत्तवानां-नारकीजीवों की ,परा-उत्कृष्ट ,स्थितिः-स्थिति अर्थात आयु !
अर्थ –
उन नरकि जीवों की रत्नप्रभा पृथिवी में १ सागर,शर्करा प्रभा में ३ सागर,बालुकाप्रभा में ७ सागर,पंकप्रभा में १० सागर,धूमप्रभा में १७ सागर,तमप्रभा में २२ सागर और महातमप्रभा में ३३ सागर उत्कृष्ट स्थिति/ आयु है!
विशेष-नारकी जीवों को ही दुःख है ,उन्हें सुख की अनुभूति क्षण भर के लिए मात्र मध्यलोक में तीर्थंकर के जन्म के अवसर पर होती है अथवा कोई तीर्थंकर प्रकृति का बंध कर जो नरक में जन्म लेते है तो वहाँ की आयु पूर्ण करने से छः माह पूर्व परस्पर लड़ना बंद कर देते है !
अधोलोक /नरक में नारकियों का जीवन –
उपसंहार-त्रिलोक के अधोलोक में,सात पृथिवियां रत्नप्रभा, शर्कराप्रभा,बालुकाप्रभा, पङ्कप्रभा,धूमप्रभा, तम प्रभा और महातमप्रभा क्रमश:१८००००योजन,३२००० योजन,२८००० योजन,२४००० योजन,२०००० योजन ,१६०००० योजन ८००० योजन मोटी एक दुसरे से असंख्यात योजन अंतराल पर है!पृथ्वियों में नारकियों के वास क्रमश:३०,२५,१५,१०,३,लाख ,९५००० तथा ५ बिल ४९ पटलों में है।कुल ८४०००० बिल है!ये तीन वातवलय से वेष्ठित है!सातवी पृथिवी से नीचे एक राजू मोटाई में कलकल पृथ्वी में निगोदिया जीवों का वास है!इसके अतिरिक्त निगोदिया जीव सारे लोक में ठसाठस भरे हुए है !
नरक में जीवों के वैक्रयिक शरीर,भव प्रत्यय अवधिज्ञान होने के बावजूद भी उनका जीवन अत्यंत दुखमय एवं कष्टों से परिपूर्ण है इसलिए कोई भी जीव चारों गतियों में मात्र नरकगति को छोड़ना चाहता है इसलिए नरकगति को अशुभ नाम कर्म की प्रकृति में लिया है !
नारकियों को नरक में चार प्रकार के दुःख होते है-
१-क्षेत्रजनित,शारीरिक दुःख,३-मानसिकदुःख,४-असुरकृतदुःख!
जीव अपने पूर्व जन्म के अत्यंत संकलेषित परिणामों,बहु आरंभी व बहु परिग्रही,तीव्र कषायी परिणामों के कारण कृष्णादि अशुभ लेश्यों के माध्यम से नरकगति/नरकायु का बंध करता है !जो की एक बार बंधने पर उसे भोगना ही होता है ,किन्तु विशुद्ध परिणामों से उसकी स्थिति का अपकर्षण एवं संक्लेषित परिणामों की वृद्धि से उउत्कर्षण किया जा सकता है ! ये जीव अपने आयु कर्मबंध के आठ अपकर्षकाल में अपने परिणामों के अनुसार जितनी आयुबंध करते है तदानुसार उनका ,प्रथम रत्नप्रभा पृथ्वी के धम्मा नरक, जहाँ जघन्य १०००० वर्ष,उत्कृष्ट आयु १ सागर से सातवे महातमप्रभा पृथ्वी के माधवी नरक में ३३ सागर की आयु तक बंध कर उपपाद शय्या से उपपाद जन्म होता है! इसके बीच की पृथिवीयों शर्कराप्रभा पृथ्वी का वंशा नरक, बालुकाप्रभा पृथ्वी के मेधानरक ,पंकप्रभा पृथिवी के अंजनानरक ,धूमप्रभा पृथिवी के अरिष्टनरक,तमप्रभा पृथिवी के माधवनरक और महातमप्रभा पृथिवी के माधवीनरक में नारकी जीवों की उत्कृष्ट आयु क्रमश:३,७,१०,१७,२२ सागर है तथा जघन्य आयु पिछले नरक की आयु से १ समय अधिक है!इनकी पहले से ७वे नरक में लम्बाई क्रमश:७ धनुष ३ हाथ ६ अंगुल से दुगनी दुगनी प्रयेक नरक में होती हुई सातवे नरक में ५०० धनुष होती है ,
उक्त नरको में,पहले से सातवे तक क्रमश १३,११,९,७,५,३,१ कुल ४९ पटल है जिनमे नारकियों के निवास स्थानबिल क्रमश३०,२५,१५,१०,३लाख,९५०००,५ कुल ८४लाखबिल है! ये तीन प्रकार के इन्द्रक ,श्रेणीबद्ध और प्रकीर्णक बिल होते है जो की क्रमश ४९,२६०४ और ८२९७३४७ है !
नारकीजीव उपपाद जन्म स्थान से ३६ प्रकार के शास्त्रों पर गिरते है,फिर गेंद की भांति सात नरकों में क्रमश:७ योजन 3.२५ कोस, १५ योजन २.५ कोस,३१ योजन १ कोस,६२ योजन २ कोस,१२५ योजन ,२५० योजन ५०० योजन ऊँचे उछल कर पुन: उसी स्थान पर गिरने से उनका वैक्रयिक शरीर छिन्न भिन्न हो जाता है किन्तु मृत्यु को प्राप्त नहीं होता क्योकि नारकियों की अकालमृत्यु नहीं होती,वह पारे के समान दुबारा जुड़ जाता है !
नरकों में नारकियों का जन्म अंतर-पहिले से सात नरको में क्रमश: २४ मूर्हत,७ दिन,एक पक्ष,१ माह ,२माह,४ माह और ६ माह है !अंतर से अभिप्राय है की अधिकतम कितने समय तक उस नरक में कोई दूसरा नारकी जन्म नहीं लेगा !
नारकियों को ज्ञान- नारकियों को मति,श्रुत,अवधि ज्ञान तथा कुमति,कुश्रुत,कुअवधि ;विभंग ज्ञान होते है !अवधि ज्ञान के माध्यम से नारकी प्रथम से सातवे नरक तक क्रमश:४,३,५,३,२.५ .२ ,१.५ और १ कोस तक का ज्ञान प्राप्त कर सकते है !
नारकियोंकेगुणस्थान-नारकीजीव चार गुणस्थानवर्ती;मिथ्यादृष्टि, सासदनसम्यकदृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि अविरतिसम्यग्दृष्टि होते है!अविरतसम्यग्दृष्टि के क्षायिक सम्यक्त्व,वेदकसम्यक्त्व और उपशम सम्यक्तव हो सकते है!ससादन गुणस्थानवर्ती मरकर नरक में नहीं उत्पन्न होते क्योकि उनके नरक आयु का बंध ही नहीं होता !अविरत्सम्यग्दृष्टि प्रथम नरक तक जन्म ले सकते है बशर्ते उन्होंने सम्यक्त्व से पूर्व नरकायु का बंध कर लिया हो जैसे राजाश्रेणिक के जीव ने ३३ सागर की सातवे नरकायु का बंध किया था यशोधर मुनिराज के गले में मरा सर्प डालकर किन्तु बाद में सम्यक्त्व होने के कारण वह बंध प्रथम नरक का ८४००० वर्ष का रह गया ! अन्यथा सम्यग्दृष्टि जीव नरक में जन्म नहीं लेते !
नारकी जीवों के देशविरत -पंचम गुण स्थान इसलिए नहीं होता क्योकि उनके अप्रत्याख्यानावरण कषाय के उदय से हिंसा आनंदित होते है,और नाना प्रकार दुखों के देने में लिप्त ,इसलिए उनके परिणाम पंचम गुणस्थान के योग्य विशुद्धि को कदाचित प्राप्त नहीं करते है !
नरक में संहनन की अपेक्षा जीव का जन्म -वज्रऋषभ नाराच संहनन वाले जीव सातवे नरक तक,वज्रनाराच संहनन,नाराच संहनन और अर्द्धनाराच संहनन वाले छठे नरक तक ,कीलित संहनन वाले पांचवे नरक तक, सृपटिकासंहनन वाले चौथे नरक तक उत्पन्न हो सकते है !
वर्तमानकाल में जीव नरको में जन्म- पंचम काल में जीव पांचवे नरको तक जन्म ले सकते है किन्तु बाहुलयता से तीसरे नरक तक ले सकते है ,स्त्रीया मरकर अधिकतम छटे नरक तक,पुरुष /मत्स्य सातवे नरक तक जन्म ले सकते है !
सिंह पांचवे नरक तक,सर्प चौथे नरक तक,पक्षी तीसरे नरक तक,सरीसृप दुसरे नरक तक और असंज्ञी प्रथम नरक तक जासकते है !
मरण के बाद दूसरे पर्याय में जन्म लेने के बाद लगातार नरक गति में जन्म लेने की जीव की सम्भावनाये –
कोई भी जीव पहले से सातवे नरक में दूसरी पर्याय में जन्म लेने के बाद क्रमश: ८,७,६,५,४,३,२,और १बार जन्म ले सकता है !
नारकी,देवों लभद्र,चक्रवर्ती,तीर्थंकर,प्रतिनारायण,कामदेव के दाढी मूछें नहीं होती !
देव ,नारकी और भगभूमिज मनुष्य उसी पर्याय में जन्म नहीं लेते!
अधोलोक में ७ करोड़ ७२ लाख अकृत्रिम चैत्यालय,व्यंतर देवों के असंख्यात चैत्यालयों के अतिरिक्त है !२
यहां तक अधोलोक के स्वरुप का संक्षिप्त विवरण पूर्ण हुआ !
तीर्थंकरों द्वारा प्रतिपादित जैनागम के अनुसार लोक के स्वरुप का वैज्ञानिक द्वारा पुष्टि का प्रमाण-
अन्य धर्मावलम्बियों और कुछ अपने ही जैन धर्मावलम्बियों को संशय रहता है कि तीर्थंकरों द्वारा प्रतिपादित लोक का स्वरुप तदानुसार है या नही!इसमें लेश मात्र संशय नही होना चाहिए! महान वैज्ञानिक, सापेक्षिकसिद्धांत(जैन दर्शनानुसार स्याद्वादसिद्धांत ) के सूत्रधार,प्रोफेसर अल्बर्ट आइंस्टीन द्वारा वैज्ञानिक शोध द्वारा उपलब्ध लोक के आयतन (वॉल्यूम) की तुलना जैन दर्शन में उल्लेखित लोक के आयतन ३४३ राजू से तुलना कर ,लोक की त्रिज्या (रेडियस) की १ राजू से तुलना कर निम्न वैज्ञानिक गणनाओं द्वारा उसका अस्तित्व प्रमाणित किया है !
रज्जु की परिभाषा-द्रुतगति (२,०५७,१५२ महा योजन प्रतिक्षण ) से ६ माह में एक देव द्वारा तय करी गई दूरी एक रज्जु है!
समय, ६ माह =६x३० (दिन)x २४(घंटे)x ६०(मिनट)x ५४०००० प्रतिविपलंश
गति =२,०५७,१५२ महा योजन =२०५७१५२ x ४००० मील प्रतिविपलंश
( ६० प्रतिविपलंश =१ प्रतिविपल ,६० प्रतिविपाल=१ विपल ,६० विपल =१ पल,६०पल =१घडी,१ घडी =२४ मिनट ,
अत:१ मिनट=६० x ६० x ६० x ६० /२४= ५,४०,००० प्रतिविपलांश देव द्वारा तय करी दूरी =समय x गति=६x३०x २४x ६०x ५४०००० x २०५७१५२ x ४०००
१ रज्जु =१. १५ x १० की घात २१ मील
जैन दर्शन अनुसार लोक का आयतन ३४३ घन रज्जु है !
वैज्ञानिक आइंस्टीन द्वारा लोक का आयतन =४/३ x पाई (२२/७) x त्रिज्या की घात ३
लोक की त्रिज्या = १०६८ मिलियन प्रकाश वर्ष ;(१ प्रकाश वर्ष =प्रकाश द्वारा एक वर्ष में तय करी गई दूरी
=५.८८ x १० की घात १२ मील
लोक का आयतन=४/३ x २२/७ x{ १०६८x १० की घात ६ x ५.८८x १० की घात १२}की घात ३ घन मील
=१०३७ x १० की घात ६३
३४३ रज्जु की घात ३ =१०३७ x १० की घात ६३
रज्जु की घात ३ =१०३७ x १० की घात ६३ /३४३ =३.०२३३२३६x१० की घात ६३ =१,४४६x १.४४६x१.४४६ x १० की घात ६३
रज्जु =१,४४६ x १० की घात २१ मील
उक्त गणना में जैन दर्शनानुसार रज्जु का मान १.१५ x १० की घात २१ मील और वैज्ञानिकों द्वारा लोक की त्रिज्या=रज्जु १. ४ ४ ६ x १० की घात २१ आती है जो की परस्पर काफी निकट है !
उक्त गणना से ही प्रमाणित होता है कि किसी लोक का अस्तित्व है ,किसी वस्तु की त्रिज्या निकट केवल तभी निकल सकती है अस्तित्वमें हो !
रज्जु के जैनागम और वैज्ञानिको द्वारा प्राप्त मान में मेरे विचार से जो अंतर आ रहा है उसका कारण प्रोफेसर आइंस्टीन ने लोक का स्वरुप गेंद रूप लिया है जबकि तीर्थंकरों ज्ञान में त्रिलोक के जाने चित्रानुसार है !दूसरा कारण योजन के मान को सम्भवत हम सम्पूर्ण आगाम के अभाव में ,समझने में कोई त्रुटि कर रहे है !
English version
Raju (chain-a linear astrophysical measurement) is the distance deva’s fled in 6 months @2057152 mahayojan per instance of time/kshan
Period 6 months=6x30x24x540000 prtiviplansh
(1 minute=540000 prtiviplansh
Speed=2057152×4000=8228608000mile per prtiviplansh
1rajju=distance traversed by Dev in 6 months at above speed=periods speed
=6x30x24x60X540000x8228608000 mile=1.15×10 to the power 21 miles
This is value of Raju as per jaindarshan muni
Now we calculate Raju in accordance is scientist prod Einstein spherical model of universe equating it with universe volume 343 cubic Raju as per jainagam
Volume of universe spherical model As per
Einstein =4/3×22/7xr to power 3
=4/3×22/7X(1068 million light year) *To power 3
*1 light year is the distance travelled by light in 1 year=5.88×10 to the power 12
Volume of universe=
4/3×22/7x(1068×10 to power6x5.88×10 to power12) to power 3 cubic miles
=1037×10 to power63 cubic miles
Equating this volume to jain Datsun volume of universe
343 Raju to power 3=1037×10 to power63
Raju power 3=1037×10 to power63/343
Rajjuto power3=3.0233236×10 to power 63
Raju=1.446×10 to power 21
Thus we find that the value of Raju as calculated by jaindarshan is 1.15×10 to power 21 quite near to spherical model of universe radius i.e.1.446x 10 to power of 21
Hence we conclude the existence of universe proved by scientifically researches as in accordance of jain scriptures.
I feel the difference in value of Rajju is because of
1-Einstein has taken the universe as spherical where as jain scriptures define it in accordance of fig as shown in the beginning of this chapter
2-their might be some misunderstanding in evaluation of Yojana value 4000 miles
Note 1 minute=540000 prtiviplansh /kshan
मध्यलोक का विस्तार,रत्नप्रभा पृथ्वी के १००० योजन मोटी चित्रा भाग के मूल से,एक लाख ४० योजन ऊँचे सुदर्शन मेरु पर्वत जम्बूद्वीप के केंद्र पर स्थित लेकर स्वयंभूरमण समुद्र तक १ राजू तिर्यक विस्तार का क्षेत्र है अर्थात मध्य लोक १रज्जु x१०००४० योजन तक तिर्यकदिशा में फैला है!ढाई द्वीप;जम्बू द्वीप.लवण समुद्र,धातकीखण्ड,कालोदधि समुद्र और अर्द्धपुष्कवर द्वीप तक का क्षेत्र मनुष्य लोक है !इसके भार मध्य लोक में मनुष्य नही उत्पन्न होते !मनुष्यलोक में ज्योतिष्क देवो का परिवार सुदर्शन मेरु की निरंतर परिक्रमा करते है जिससे व्यवहारकाल समय मिनट दिन आदि का वर्तन होता है !मनुष्यलोक के बहार मध्य लोक में समस्त ज्योतिष्क देव अवस्थित है वे भ्रमण नही करते! समस्त लोक में काल का वर्तन मनुष्य लोक से ही व्यवहारित होता है !
मध्यलोक में सूत्र ७ में आचार्यश्री उमास्वामी जी कहते है –
जम्बूद्वीप का चित्र –
जम्बूद्वीपलवणोदादय:शुभनामानोद्वीपसमुद्रा :-!!७ !!
सन्धिविच्छेद-जम्बूद्वीप+लवण:+आदय:+शुभ+नामानो+द्वीपसमुद्रा:-!!
शब्दार्थ-जम्बूद्वीप आदि+लवण समुद्र+आदि+शुभ,शुभ,नामानो-नामों के ,द्वीप-द्वीप , समुद्र:-और समुद्र है !!
अर्थ-मध्य लोक में जम्बूद्वीप आदि द्वीप और लवण आदि समुद्र है !
भावार्थ-मध्यलोक में शुभनाम वाले जम्बूद्वीपादि और लवण समुद्रादि असंख्यात द्वीप और समुद्र है !
विशेष –
१-बहुवचन ‘द्वीपसमुद्रा:’पद से मध्य लोक में असंख्यात द्वीप समुद्रों का अस्तित्व कहा गया है !
द्वीपों और समुद्रों का विस्तार –
द्विर्द्विर्विष्कम्भाःपूर्वपूर्वपरिक्षेपिणोवलयाकृतयः॥८॥
संधि विच्छेद-द्वि+द्वि+विष्कम्भा:+पूर्व+पूर्व+परिक्षेपिण:+वलयाकृतयः
शब्दार्थ-द्वि-दुगने,द्वि-दुगने,विष्कम्भा:-विस्तारवाले,पूर्व-पहिले,पूर्व-पहिले,परिक्षेपिण:-चारो ओर से घेरे हुए दूसरा (वेष्ठित) वलयाकृतयः -वलयाकार (चूड़ी के सामान आकारवान )
अर्थ-सभी द्वीप समुद्र क्रमश: दुगने दुगने अर्थात एक दुसरे से क्रमश: द्वीप समुद्र दुगने दुगने विस्तार का है;पहिले द्वीप को वलयाकार (चूड़ी के समान आकारवान) समुद्र, पहिले द्वीप से दुगने विस्तार का है और उसे वेष्टित करता है पहिले समुद्र को वेष्टित (घेरते ) हुए वलयाकार (चूड़ी के आकार के समान) दूसरा द्वीप पहिले समुद्र से दुगने विस्तार का है!
जम्बू द्वीप का विस्तार १ लाख योजन है, लवण समुद्र का विस्तार २ लाख योजन है इसी प्रकार क्रमश सभी समुद्र मध्यलोक के अंत,स्वयंभूरमणसमुद्र तक,असंख्यात द्वीप व् समुद्र दुगने दुगने विस्तार के क्रमश पहिले वाले द्वीप/समुद्र को घेरे है!लवण समुद्र को घेरे हुए घातकीखंड द्वीप ४ लाखयोजन,इसे घेरे हुए कालोदधि समुद्र ८ लाख योजन ,इसे घेरे हुए पुष्कवर द्वीप १६ लाख योजन विस्तार का है.!जम्बूद्वीप से अर्द्धपुष्कवर द्वीप तक ,ढाई द्वीप मनुष्य लोक है क्योकि मनुष्य यही तक रहते है !
शब्द संख्यात है किन्तु असंख्यात है इसलिए इनके नामो की पुनरावृत्ति होती है
जम्बूद्वीप का स्वरुप –
तन्मध्येमेरु,नाभिर्वृत्तोयोजनशतसहस्रविष्कम्भोजम्बूद्वीपः ॥९॥
संधि विच्छेद -तन्मध्ये+मेरु+नाभि:+वृत्त:+योजन+शत+सहस्र+विष्कम्भ:+जम्बूद्वीपः
शब्दार्थ-तन्मध्ये-उन(सबद्वीप/समुद्रों)के मध्य में,नाभि:-नाभि:पर,वृत्त:-वृत्ताकार(थाली के आकार समान),योजन-योजन ,शत-सौ,सहस्र-हज़ार,विष्कम्भ:-व्यास ,जम्बूद्वीपः-जम्बूद्वीप है !
अर्थ-उन सब द्वीपों और समुद्रों के मध्यस्थ वृत्ताकार,(थाली के आकार वाला), एक लाख योजन विस्तार का जम्बूद्वीप है जिसके केंद्र पर सुमेरु पर्वत स्थित है !
१ योजन =२००० कोस=४००० मील = ६४०० किलो मीटर
विशेष-
१-इस द्वीप के विदेहक्षेत्र के उत्तरकुरु ,उत्कृष्ट भोगभूमि में अकृत्रिम पृथ्वीकायिक जम्बूवृक्ष इसका नाम जम्बूद्वीप सार्थक है !
२-जम्बूद्वीप के चारों ओर ८ योजन ऊंची रत्नमयी कोट रूप एक बेदी है जिसकी नीव आधा योजन/२ कोस जमीन में है!वह पृथिवी सतह पर १२ योजन,बीच में ८ योजन और ऊपर ४ योजन चौड़ी है!यह बेदी मूलनीव में वज्रमयी , मध्य में सर्वरत्नमयी और अंत में वैडूर्यमणिमयी है!इसके ऊपर २ कोस ऊंची ५०० धनुष चौड़ी सुंदर स्वर्णमयी छोटी बेदी है!इसके दोनों ओर बावड़ी और व्यंतर देवों के निवासस्थान है!यह बेदी गवाक्षजाल, घंटाजाल, कनक रत्नजाल,मुक्ताफलजाल, सुवर्णजाल,मणिजाल, क्षुद्रघंटिकाजाल,पदमपनजाल;नौ प्रकार के जालों से युक्त है
३- इसके पूर्वादि चारो दिशाओं में अनुक्रम से विजय,वैजयंत,जयंत और अपराजित ४ द्वार है,प्रत्येक ८ ऊँचा ,४ योजन चौड़ा है!इन द्वारों के नाम के धारक व्यंतर देवों के निवास इन द्वारों के ऊपर है!पूर्व के विजय द्वार से दक्षिण के वैजयंत द्वार का अंतराल उन्यासी हज़ार ५३ योजन है ,अन्य द्वारो का भी यही अंतराल है !
४-जम्बूद्वीप वेदी सम्बन्धी चार मुख्य द्वारों के अतिरिक्त १४ नदियों संबंधी ,१४ प्रवेश द्वार है ,कुल १८ द्वार है हीनाधिक नहीं !इन १८ द्वारों सहित जम्बूद्वीप की परिधि ३ लाख १६ हज़ार २२८ योजनहै!
५-आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान अनुसार जम्बूद्वीप -मिल्की वे गैलेक्सी वृताकार मोटाई लिए है जिसका व्यास १लाख प्रकाशवर्ष है जिसमे हमारी पृथ्वी,(जैन दर्शनानुसार भरत क्षेत्र का मात्र आर्यखण्ड) भी है!जबकि जैनदर्शन अनुसार जम्बूद्वीप का व्यास एक लाख योजन उपदेशित है!योजन =१ प्रकाश वर्ष तो यह विसंगती दूर हो सकती है!हमारे आगाम का बहुभाग समय के साथ नष्ट हो गया अथवा विद्वेषपूर्वक अन्य धर्मावलम्बियों ने नष्ट कर दिया है,अत: वर्तमान में केवली भगवान के अभाव में वस्तु स्थिति का सही आंकलन असम्भव है! भविष्य में वह दिन दूर नही जब वैज्ञानिक भी अपनी शोध द्वारा जैनागम के निष्कर्षों पर पहुंचेगे !
जम्बूद्वीप में ६ कुलांचलो द्वारा ७ क्षेत्रों का विभाजन
भरतहैमवतहरिविदेहरम्यकहैरण्यवतैरावतवर्षाःक्षेत्राणि॥१०॥
सन्धिविच्छेद-(भरत+हैमवत+हरि+विदेह+रम्यक+हैरण्यवत+ऐरावत)+वर्षाः+क्षेत्राणि
शब्दार्थ-जम्बू द्वीप में भरत,हेमवत,हरि,विदेह,रम्यक,हैरण्यवत और ऐरावत सात क्षेत्र है
अर्थ-जम्बू द्वीप में भरतवर्ष ,हेमवतवर्ष,हरिवर्ष,विदेहवर्ष,रम्यकवर्ष,हैरण्यवतवर्ष और ऐरावतवर्ष, सात क्षेत्र है!
पर्वत के नाम
तद्विभाजनःपूर्वापरायताहिमवन् महाहिमवन् निषधनीलरुक्मिशिखरिणो वर्षधरपर्वताः॥११॥
संधिविच्छेद-तद्विभाजनः+पूर्व+अपर+आयता+(हिमवन्+महाहिमवन्निषध+नील+रुक्मि+शिखरिणSmile+ वर्ष धर+पर्वताः
शब्दार्थ –
तद्विभाजनः-उन क्षेत्रों के बिभाग करने वाले,पूर्व-पूर्व से ,अपर- से आयता- अर्थात पश्चिम तक,हिमवन्-हिमवत् , महाहिमवन्निषध-महाहिमवान,निषध ,नील-नील,रुक्मि-रुक्मी,शिखरिण:शिखरिन ,वर्षधर-कुलाचल,पर्वताः-पर्वत है !
अर्थ-उन सात क्षेत्रो का विभाग करने वाले पश्चिम से पूर्व तक फैले हुए हिमवन् वर्षधर,महाहिमवन वर्षधर,निषधवर्षधर, नीलवर्षधर, रुक्मीवर्षधर, शिखरिनवर्षधर, छ कुलांचल ( पर्वत) है !
जम्बूद्वीप के क्षेत्रों में भोगभूमि,कर्मभूमि और पर्वतों की व्यवस्था –
एक लाख योजन विस्तार (व्यास )के जम्बूद्वीप को हिमवन्,महाहिमवन,निषध,रुक्मि और शिखरिन छः वर्षधर-कुलाँचल;क्रमश:भरतवर्ष,हेमवतवर्ष,हरिवर्ष,विदेहवर्ष,रम्यकवर्ष, हैरण्यवत वर्ष और ऐरावतवर्ष,सात क्षेत्रों में विभक्तकरते है!
विदेह क्षेत्र के मध्य में,जम्बूद्वीप की नाभि पर, सुदर्शन सुमेरु पर्वत है जिसके उत्तर में, उत्तरकुरु और ,दक्षिण में देवकुरु क्षेत्र,विदेह के ही भाग है!इन ७ क्षेत्रों में से ;उत्तरकुरु-देवकुरु,हरी-रम्यक तथा हेमवत-हैरण्यवत में क्रमश उत्तम,माध्यम और जघन्य शाश्वत भोगभूमियों की तथा भरत-ऐरावत के आर्य खंड और विदेह क्षेत्र में कर्मभूमि,भरत-ऐरावत के म्लेच्छ खंड में जघन्य शाश्वत भोग भूमि की व्यवस्था अनादिकाल से है और रहेगी !भरत और ऐरावत के आर्यखंड में अशाश्वत भोगभूमि भी होती है!
भोगभूमि-भोगभूमिज जीवों की नित्य आवश्यकताओं जैसे;गृह,भोजन,वस्त्र,बर्तन,भोजन,संगीत के यंत्र, ज्योति के यंत्र ,आदि सभी वस्तुओं की आपूर्ति १० प्रकार के कल्पवृक्षो,१-मद्यंग, २-वादित्र ,३-भूषणांग, ४-मालंग, ५-दीपांग, ६-ज्योतिरांग, ७-गृहरांग,८-भोजनांग,९-भाजनांग ,१०-वस्त्रांग के नीचे खड़े होकर याचना करने से हो जाती है,उन्हें अपनी जीविका के लिए कर्मभूमि के जीवों की भांति किसी पुरुषार्थ की आवश्यकता नहीं होती !
भरत /ऐरावत के आर्यखण्ड में भोगभूमि की रचना-अवसर्पिणी के प्रथम,द्वितीय और तृतय तथा उत्सर्पिणी के चतुर्थ,पंचम,और षष्टम काल में भोगभूमि की रचना होती है ,इसलिए ये अशाश्वत भोगभूमि है!
भोगभूमि का काल-इन क्षेत्रों में भोगभूमि का कालकल्प के २० कोड़ा कोडी सागर में से १८ कोड़ा कोडी सागर है !
भोगभूमि में जन्म लेने वाले जीवो -पांच पापो के त्यागी,मंद कषायी,ब्रह्मचारी,व्रती,निर्मल परिणामी,दानी (चार प्रकार का दान सुपात्र को देने वाले जीव आयु पूर्ण कर भोगभूमि में जन्म लेते है!
भोगभूमि में शरीर त्यागने(मृत्यु) और अगले भव में जन्म लेने की व्यवस्था -भोगभूमि में माता-पिता के युगली संतान ही जन्म लेते है ,उनके जन्म लेते ही माता पिता क्रमश:जवाई और छींक लेकर अपने शरीर को त्याग देते है !शरीर शरद ऋतू के मेघ के समान छीन-भिन्न हो जाता है!इनमे मिथ्यादृष्टि जीव मरणोपरान्त भवनत्रिक (भवनवासी,व्यंतर,अथवा ज्योतिष्क) में उत्पन्न होते है सम्यग्दृष्टि वैमानिक डिवॉन में दुसरे स्वर्ग तक उत्पन्न होते है !
भोगभूमियों में जीव का विकास –
१-जघन्य भोग भूमि -जन्म लेने पर बच्चे सोते सोते ७ दिन तक अंगूठा चूसते है ,दुसरे सप्ताह में घुटने के बल चलते है,तीसरे सप्ताह में मधुर तुतलाती भाषा बोलते है,चौथे सप्ताह में पैरो पर चलने लगते है,पांचवे सप्ताह में कला और रूप आदि गुणों से युक्त हो जाते है,छठे सप्ताह में युवावस्था को प्राप्त करते है,सातवे सप्ताह में सम्यग्दर्शन के धारण की योग्यता प्राप् कर लेते है !ये आवले के समान दूसरे दिन आहार लेते है !इनकी आयु १ पल्य लम्बाई १ कोस होती है!
२-मध्यम भोगभूमि
जन्म लेने पर बच्चे सोते सोते ५ दिन तक अंगूठा चूसते है ,५ दिन में घुटने के बल चलते है,फिर ५ दिन में मधुर तुतलाती भाषा बोलते है,फिर ५ दिनों में पैरो पर चलने लगते है,फिर ५ दिनों में कला और रूप आदि गुणों से युक्त हो जाते है,फिर ५ दिनोमें में युवावस्था को प्राप्त करते है,फिर ५ दिनों में सम्यग्दर्शन धारण करने की योग्यता प्राप् कर लेते है !ये बेहड़ा फल के समान तीसरे दिन आहार लेते है !इनकी आयु २ पल्य लम्बाई २ कोस होती है!
३-उत्तम-भोगभूमि –
जन्म लेने पर बच्चे सोते सोते ३ दिन तक अंगूठा चूसते है ,३ दिन में घुटने के बल चलते है,फिर ३ दिन में मधुर तुतलाती भाषा बोलते है,फिर ३ दिनों में पैरो पर चलने लगते है,फिर ३ दिनों में कला और रूप आदि गुणों से युक्त हो जाते है,फिर ३ दिनोमें में युवावस्था को प्राप्त करते है,फिर ३ दिनों में सम्यग्दर्शन धारण करने की योग्यता प्राप् कर लेते है !ये बेर के फल के समान चौथे दिन आहार लेते है!इनकी आयु ३ पल्य लम्बाई ३ कोस होती है!
भोगभूमि में जीवों के सम्यक्त्व के कारण-यहाँ भव्य जीवों को जातिस्मरण,देवों के उपदेशों ,सुखों/दुखो के अवलोकन से,जिनबिम्ब दर्शन से और स्वभावत: सम्यक्त्व होता है !
भोगभूमि की अन्य विशेषताए –
भोगभूमि का जीवों को सुख भरत क्षेत्र के चक्रवर्ती से भी अधिक होता है !जीवों का बल ९००० हाथियों के बराबर होता है !भोगभूमि में विकलत्रय जीव उत्पन्न नहीं होते ,विषैले सर्प ,बिच्छू आदि जंतु नहीं उत्पन्न होते !वहां ऋतुओं का परिवर्तन नहीं होता,मनुष्यों की यहाँ वृद्धावस्था,रोग,चिंता,निंद्रा रहित होते है !
भोगभूमि में युगल बच्चे ही युवा होने पर पति पत्नी की तरह रहकर सन्तानोत्पत्ति करते है,कोई विवाह व्यवस्था नहीं है !
कुभोगभूमि -लवण समुद्र और कालोदधि समुद्रों में ९६ अंतरद्वीपों में जघन्य कुभोग भूमिया है !यहाँ पर पूर्व जन्म में कुपात्रों को चार प्रकार के दान ,आहार आदि देने से ,कुशास्त्रों का स्वाध्याय एवं कुदेवों की आराधना भक्ति करने से जन्म कुमानुषों( मनुष्य का मुख होता है पूछ या धड़ किसी पशु की) के रूप में लेते है !
जम्बू द्वीप में पर्वतों का विवरण –
जम्बूद्वीप में सुदर्शन नामक पर्वत १००० योजन चित्त्रा पृथ्वी मर है,९९००० योजन ऊपर है उसकी ४० योजन चूलिका है,कुल लम्बाई १ लाख ४० योजन है इसके तीन काण्ड है ,पहला जमीन से ५०० योजन का दूसरा ६२५०० योजन,तीसरा ३६००० योजन प्रत्येक काण्ड पर एक एक कटनी है जिसका विस्तार ५०० योजन है केवल अंतिम कटनी का विस्तार ६ योजन कम है !इन चार वन क्रमश:भद्रसाल ,नंदन,सोमनस और पाण्डुक है !पहली और दूसरी कटनी के बाद मेरु ११००० योजन तक मेरु सीधा है(कल प्रकाशित मेरु के चित्र में देखे ) फिर क्रमश: घटने लगता है मेरु पर्वत के चारो वनो में चारों दिशों के कुल १६ अकृत्रिम चैत्यालय है और पाण्डुक वन की विदिशाओं में चार पाण्डुक शिलाये है जिनपर उन दिशाओं में उत्पन्न हुए तीर्थंकरों के जन्माभिषेक इन्द्रो द्वारा किये जाते है !यह स्वर्ण वर्ण का है !
यहाँ छ कुलांचल पर्वत है,चार यमक गिरी,दो सौ कांचन गिरी,आठ दिग्गज पर्वत,सोलह वक्षार गिरी,
चार गजदंत,चौतीस विजयार्ध ,चौतीस वृषभांचल,चार नाभागिरी ,इस प्रकार कुल ३११ पर्वत है !
पर्वतों का वर्ण (रंग)/धातु से बने है
हेमार्जुनतपणीयवैडूर्यरजतहेममया: १२
संधि विच्छेद –
(हेम+अर्जुन+तपणीय+वैडूर्य+रजत+हेम)+मया :
शब्दार्थ-
हेम-स्वर्ण,अर्जुन-चांदी,तपणीय-तप्तस्वर्ण समान,वैडूर्य-नीला,रजत-चांदी,हेममया:–स्वर्ण समान वर्ण/या इनसे बने है !
अर्थ -इन छ पर्वतों के क्रमश: वर्ण;स्वर्ण,चांदी,तप्तस्वर्ण नीला,चांदी और स्वर्ण के समान है /अथवा इनसे बने हुए है !स्वामी अकलंक देव ने इनका वर्ण कहा है !
विशेष-इन पर्वतों की ऊंचाई ऊपर से नीचे तक एक समान क्रमश १००,२००,४००,४००,२००,१०० योजन है १ योजन=४००० मील अर्थात महायोजन है (त्रिलोकसार गाथा ५९६)!
पर्वतों का आकार –
मणिविचित्रपार्श्वाउपरिमूलेचतुल्यविस्तार :१३
संधि विच्छेद: मणि+विचित्र+पार्श्वा+उपरि+मूले+ च+ तुल्य+ विस्तार:
शब्दार्थ -मणि-मणियों से ,विचित्र-विचित्र ,पार्श्वा-पार्श्व भाग में ,उपरि-ऊपर,मूले-नीचे ,च-मध्यमें ,तुल्य+ एक समान ,विस्तार:-विस्तार (मोटे ) के है !
अर्थ -ये पर्वत दोनों पार्श्वों (भुजाओं )में विचित्र मणियो से खचित है ,ऊपर ,मध्य और नीचे तक समान विस्तार के है !
भावार्थ -ये पर्वत ऊपर से नीचे तक एक समान मोटे,दोनों ओर मणियों द्वारा खचित दीवार के समान है!
पर्वतों पर स्थित सरोवर (तालाब ) का स्वरुप –
पद्म महापद्मतिगिंछकेशरिमहापुण्डरीकपुंडरीकहृदास्तेषामुपरि-१४
सन्धिविच्छेद -पद्म+महापद्म+तिगिंछ+केशरि+महापुण्डरीक+पुंडरीक+हृदा+तेषां+उपरि
शब्दार्थ -पद्म,महापद्म,तिगिंछ,केशरि,महापुण्डरीक,पुंडरीक,हृदा-सरोवर ,तेषां-उनके ,उपरि=ऊपर क्रम से है
अर्थ-उन पर्वतों के ऊपर क्रमश: पद्म,महापद्म,तिगिंछ,केशरि,महापुण्डरीक और पुंडरीक सरोवर है
भावार्थ-हिमवन्,महाहिमवन,निषध,नील,रुक्मी,शिखरिन;छ:कुलांचलपर्वतों के ऊपर क्रमश: पद्म,महापद्म, तिगिंछ, केशरि,महापुण्डरीक और पुंडरीक सरोवर है !
प्रथम ‘पद्म सरोवर’ का विस्तार; लम्बाई- चौड़ाई –
प्रथमोयोजनसहस्रायामस्तदर्धविष्कम्भोहृद:-१५
संधि विच्छेद – प्रथमो+योजन+सहस्रा+आयाम:+तत्+अर्ध +विष्कम्भ: +हृद:-
शब्दार्थ -प्रथमो-पहिले,योजन-योजन,सहस्रा-एक हज़ार,आयाम:-पूर्व से पश्चिम की ऒर लम्बाई,तत्-उससे,अर्ध आधी , विष्कम्भो-उत्तर से दक्षिण की ओर्र (चौड़ाई), हृद:-सरोवर की है !
अर्थ -हिमवन पर्वत पर स्थित प्रथम (पद्म ) सरोवर की पूर्व से पश्चिम दिशा में १००० महायोजन लम्बा और उत्तर से दक्षिण की ओर ५०० महायोजन चौड़ा है
प्रथम पद्म सरोवर की गहराई –
दशयोजनावगाह:-१६
संधि विच्छेद -दश+ योजन+आवगाह:-
शब्दार्थ -दश+दस, योजन-महा योजन ,आवगाह:- गहरा है
अर्थ -पद्म सरोवर १० महायोजन गहरा है
तन्मध्येयोजनंपुष्करं -१७
संधि विच्छेद तन्मध्ये+योजनं+पुष्करं-
शब्दार्थ-तन्मध्ये-उस के बीच में, योजनं-१ योजन ,पुष्करं -विस्तार का कमल है !
अर्थ -पद्म सरोवर के मध्य १ योजन विस्तार का कमल है!
नोट यह कमल वनस्पतिकाय नहीं बल्कि पृथिवीकाय है अर्थात पृथिवी कमलाकार है !
इसके अतिरिरिक्त इसके आधे विस्तार के १४०१२५ कमल भी है जिनमे देवो का निवास है !
तद्द्विगुणद्विगुणहृदाःपुष्कराणिच ॥१८!!
संधि विच्छेद -तद् +द्वि+गुण+ द्वि+गुण+हृदाः+पुष्कराणि+च
शब्दार्थ-तद्-उस (पद्म सरोवर और कमल से ) से, द्विगुण-दुगने द्विगुण-दुगने, हृदाः-सरोवर,पुष्कराणि-कमल, च-और है
अर्थ- पद्म सरोवर से आगे के सरोवर और कमल दुगने दुगने विस्तार के है अर्थात महापदम सरोवर २००० महा योजन लम्बा १००० महायोजन चौड़ा २० योजन गहरा, कमल २ योजन विस्तार का तथा तिगिंछ सरोवर ४००० महायोजन लम्बा २००० महायोजन चौड़ा और ४० महा योजन गहरा है ,कमल ४ योजन उत्सोध है !
नोट यह दूने दूने का क्रम केवल तिगिन्छ सरोवर तक ही है !उसके बाद के तीन सरोवर और ३ कमल का विस्तार दक्षिण के सरोवर और कमल के समान ही है !
पद्म सरोवर एवं उसके मध्य स्थित कमल-
पद्म सरोवर के मध्यस्थ १ योजन चौडा पद्म कमल है !उसमें चारो ओर एक कोस लम्बे ,२ कोस मोटे रजतमय ११११ पत्ते है !उसके मध्यस्थ २ कोस चौड़ी स्वर्णमयी कर्णिका है!४२ कोस ऊंची इसकी नाल ४० कोस जलमग्न और २ कोस ऊपर है !इस कमल की आधी ऊंचाई के १ कोस ऊँचे १,४०,११५ छोटे कमल जल से ऊपर है जिनमे श्री देवी के परिवार रहते है !ये पृथ्वीकाय कमल है वनस्पतिकाय नही है !=
कमलो पर निवास करने वाली देवियाँ-
तन्निवासिन्योदेव्यःश्रींहृींधुतिकीर्तीबुद्धिलक्ष्म्यःपल्योपमस्थितयःससमा- निकपरिषत्काः ॥१९॥
संधि विच्छेद –
तत्+निवासिन्य:+देव्यः+श्रीं+हृीं+धुति+कीर्ती+बुद्धि+लक्ष्म्य:+पल्योपम+स्थितयःस+समानिक+परिषत्काः ॥१९॥
शब्दार्थ-
तत्-उन पर,निवासिन्य:-निवास करती है,देव्यः-देवियान-श्रीं,हृीं,धुति,कीर्ती,बुद्धि,लक्ष्म्यः-लक्ष्मी, पल्योपम- १ पल्योपम ,स्थितयः-आयु वाली ,स-साथ ,समानिक-समानिक और परिषत्काः-परिष्तक जाति के देवो के
अर्थ-,उन (पद्म ,महापद्म तिगिच्छ,केशरि, महापुण्डरीक,पुण्डरीक) सरोवरों के कमलो (की कर्णिकाओं) पर स्थित महलों में १ पल्योपम आयु वाली देवियाँ क्रमश:श्रीं,हृीं,धुति,कीर्ती,बुद्धि और लक्ष्मी समानिक और पारिषद जाति के देवों के साथ रहती है !
नोट-१-यह देवियाँ सामयिक जाति ,पिता तुल्य व्यंतर और पारिषद जाति के ,मित्र तुल्य देवों की देवियाँ होती है!ये ब्रह्मचारिणी होती है!उनकी पत्नीरूप नहीं होती ;तीन देवियाँ सौ धर्मेन्द्र की और तीन देवियाँ ऐशान इंद्र की आज्ञा का पालन करती है !
जम्बू द्वीप में प्रवाहित होने वाली नदियां –
नदियों का वर्णन –
गंगासिंधुरोहिद्रोहितास्याहरिद्धरिकान्तासीतासीतोदानारीनरकान्तासुवर्णरूप्यकूलारक्तारक्त्तोदाः सरितस्तन्मध्यगा:-२०
संधिविच्छेद:-गंगा+सिंधु+रोहित्+रोहितास्या+हरित्+हरिकान्ता+सीता+सीतोदा नारी+नरकान्ता सुवर्णकूला + रूप्यकूला+रक्ता+रक्त्तोदाः सरित:+ तन+ मध्यगा:
शब्दार्थ-
गंगा+सिंधु,रोहित+रोहितास्या,हरित+हरिकान्ता,सीता+सीतोदा,नारी+नरकान्ता,सुवर्णकूला +रूप्यकूला, रक्ता+रक्त्तोदाः सरित:-नदिया,,तन-उन (क्षेत्रों ),के,मध्यगा-मध्य में बहती है
भावार्थ :-जम्बू द्वीप के भरत,हेमवत,हरि,विदेह,रम्यक,हैरण्यवत और ऐरावत क्षेत्रों में क्रमश: गंगा सिंधु,रोहित-रोहितास्य ,हरी-हरिकान्ता,सीता-सीतोदा,नारी-नरकान्ता,सुवर्णकूला-रूप्यकूला, और रक्ता-रक्त्तोदाः सात नदियों के युगल बहते है ! इनमे से पहली नदी पूर्व क्षेत्रों में बहती हुई पूर्व तथा दूसरी नदी पश्चिम क्षेत्रों से बहती हुई पश्चिम लवण समुद्रो में गिरती है !
विशेष –
१-भरतवर्ष में गंगा और सिंधु,हेमवत् वर्ष में रोहित और रोहितास्य ,हरि वर्ष में हरित और हरिकान्ता , विदेहवर्ष में सत्ता और सितोदा ,रम्यकवर्ष में नारी और नरकान्ता ,हैरण्यवत वर्ष में सुवर्णकूला और रूप्यकूला तथा ऐरावतवर्ष में रक्त और रक्तोदा नदिया बहती है !सात युगल की प्रथम नदी पूर्व दिशामें बहती हुई पूर्व लवण समुद्र में और दूसरी नदी इन क्षेत्रों की पश्चिम दिशा में बहती हुई पश्चिम लवण समुद्र में गिरती है !
२-हिमवन पर्वत पर स्थित पदम सरोवर से गंगा,सिंधु और रोहितस्या ,महाहिमवन पर्वत पर स्थित महापदम सरोवर से रोहित और हरिकांत, निषध पर्वत पर स्थित तिगिच्छ सरोवर से हरित और सीतोदा, नील पर्वत पर स्थित केशरी सरोवर से सीता और नरकांता ,रुक्मी पर्वत पर स्थित महापुण्डरी से नारी और रूप्यकूला तथा शिखरिन पर्वत पर स्थित पुण्डरीक सरोवर से
सुवर्णकूला ,रक्त और रक्तोदा नदिया निकलती है!
३-पद्म ,महापद्म,तिगिच्छ ,केशरी ,महापुण्डरीक ,पुण्डरीक सरोवर की लम्बाई चौड़ाई गहराई क्रमश १००० x ५०० x १०,२०००x १००० x २०,४००० x २००० x ४० ,४००० x २००० x ४०,२०००x १००० x २०,१००० x ५०० x १० महा योजन है
७ क्षेत्रों की पूर्व दिशा में बहने वाली महा नदिया
द्व्यो र्द्व्योःपूर्वाःपूर्वगाः ॥२१॥
शब्दार्थ-द्व्यो र्द्व्योः दो दो नदियों के युगल में से,पूर्वाः-पहली -पहली ,पूर्वगाः-पूर्व समुद्र की ओर जाती है
भावार्थ -भरत,हेमवत्,हरी,विदेह,रम्यक औरहैरण्यवत्, ऐरावत सात क्षेत्रों में क्रमश: बहने वाली महा नदियों के युगलों ;गंगा-सिंधु,रोहित-रोहितास्य ,हरी-हरिकांता,सीता-सीतोदा ,नारी-नारिकांता,स्वर्णकूला-रूप्यकूला, रकता-रक्तोदा में से पहली पहली महानदिया;गंगा,रोहित्.हरि,सीता,नारी,स्वर्णकूला और रक्ता पूर्व दिशा के समुद्र में मिलती है !
७-क्षेत्रों की पश्चिम दिशा में भने वाली महा नदिया
शेषास्त्वपरगाः ॥ २२॥
-संधि विच्छेद -शेषा:+त्व +अपरगाः
शब्द्दार्थ -शेषा:-बची हुई ,त्व -उनमे अपरगाः-विपरीत दिशा अर्थात पश्चिम दिशा में समुद्र में मिलती है !
भावार्थ -भरत,हेमवत्,हरी,विदेह,रम्यक और हैरण्यवत्, ऐरावत सात क्षेत्रों में क्रमश: बहने वाली महा नदियों के युगलों;गंगा-सिंधु,रोहित-रोहितास्य ,हरी-हरिकांता,सीता-सीतोदा ,नारी-नारिकांता,स्वर्णकूला-रूप्यकूला,रकता-रक्तोदा में से पहली पहली महानदिया;गंगा,रोहित्,हरि,सीता,नारी,स्वर्णकूला और रक्ता के अतिरिक्त शेष अर्थात महानदियों के युगलों की दूसरी दूसरी महानदियां सिंधु,रोहितास्या,हरिकांता, सितोदा,नारीकांता,रूप्यकूला और रक्तोदा पश्चिम दिशा के समुद्र में मिलती है !
भरत आदि क्षेत्रों में बहने वाली महानदियों की सहायक नदियां
चतुर्दशनदीसहस्रपरिवृतागङ्गासिन्ध्वादयोनद्यः ॥२३॥
संधि विच्छेद-चतुर्दश+नदी+सहस्र+परिवृता+गङ्गा+सिंधु:+आद्य:+नद्यः
शब्दार्थ-चतुर्दश-चौदह,नदी-नदिया,सहस्र-हज़ार परिवृता-घिरे हुए है गङ्गा+सिंधु:,आद्य:-आदि, नद्यः सहायक नदियों से !
अर्थ-गंगा सिंधु आदि महानदिया चौदह-चौदह हज़ार सहायक नदियों से घिरी हुई है !भावार्थ-गंगा-सिंधुनदी से १४०००,१४०००,,रोहित-रोहितास्या से २८०००-२८०००,हरी हरिकांता से ५६०००-५६०००,सीता-सीतोदा से ११२०००-११२०००,नारी-नारीकांता से-५६०००-५६०००,सुवर्णकूला -रूप्यकूला से २८०००-२८००० तथा रक्त और रक्तोदा से १४०००-१४००० नदिया घेरी हुई है !
नोट- नदियों की संख्या विदेह क्षेत्र पर्यन्त दुगना दुगना तथा उसके बाद दक्षिण क्षेत्र के सामान ही है जैसे की सूत्र २५ में भी क्षेत्रों और २६ में खा गया है !
क्षेत्रों का विस्तार –
भरतःषड्विंशतिपञ्चयोजनशतविस्तारःषट्चैकोनविंशतिभागायोजनस्य ॥२४॥
संधिविच्छेद -भरतः+षड्विंशति पञ्च+योजन+शत+विस्तारः+षट् +च+एकोन+विंशति+भागा+योजनस्य
शब्दार्थ-भरतः-भरत,षड्विंशति=छःऔरबीस/छब्बीस,पञ्च-पांच,योजन-योजन,शत-सौ,विस्तारः-विस्तार, षट्-छः च-और एकोन-एक कम,विंशति-बीस,भागा-भाग योजनस्य-योजन का
अर्थ-भरत क्षेत्र का विस्तार पांच सौ छब्बीस योजन और योजन के बीस भाग में से १ भाग कम अर्थात उन्नीस भाग के छः भाग है !
भावार्थ= भरत क्षेत्र का दक्षिण से उत्तर तक का विस्तार पांच सौ छब्बीस अधिक ६ /१९ योजन है !
अन्य पर्वतो और क्षेत्रों का विस्तार-
तदद्विगुणाद्विगुणा विस्तारा वर्षधर वर्षा विदेहान्ता:-!!२५ !!
संधि विच्छेद -तद+द्विगुणा+द्विगुणा+विस्तारा+वर्षधर+वर्ष +विदेह+अन्ता:-!!
शब्दार्थ-तद-उनका,द्विगुणा-दुगना,द्विगुणा-दुगना,विस्तारा+विस्तार,वर्षधर-पर्वतोंका,वर्षा-क्षेत्रोंका,विदेह- विदेह ,अन्ता:-तक -!!
अर्थ -विदेह क्षेत्र तक उन पर्वतों और क्षेत्रों का क्रमश:दुगना दुगना विस्तार है !
भावार्थ
हिमवन् पर्वत का विस्तार दक्षिण से उत्तर में भरत क्षेत्र से दुगना अर्थात १०५२ और १२/१९ योजन है
हेमवत् क्षेत्र का विस्तार हिमवान पर्वत के विस्तार से दुगना अर्थात २१०५,५/१९ योजन है,
महाहिमवान पर्वत का विस्तार हेमवत् क्षेत्र से दुगना अर्थात ४२१०,१०/१९ योजन है,
हरि क्षेत्र का विस्तार महहिमवान पर्वत से दुगना अर्थात ८४२१,१/१९ योजन है,
निषध पर्वत का विस्तार हरि क्षेत्र से दुगना अर्थात १६८४२ ,२/१९ योजन तथा
विदेह क्षेत्र का विस्तार निषध पर्वत के विस्तार से दुगना अर्थात ३३६८४,४/१९ योजन है !
विदेह क्षेत्र से आगे पर्वतों और क्षेत्रों का विस्तार-
उत्तरदक्षिणतुल्य: !!२६ !!
संधिविच्छेद -उत्तर+दक्षिण+तुल्य:
शब्दार्थ -उत्तर दिशा में दक्षिण दिशा के समान ही (पर्वतों और क्षेत्रो का) विस्तार है!
भावार्थ-
ऐरावत क्षेत्र का विस्तार दक्षिण के भरत क्षेत्र के समान ५२६,६ /१९ योजन है,
पुण्डरीक पर्वत का हेमवन पर्वत के सामान १०५२,१२/१९ योजन है !
हैरण्यवत् क्षेत्र का विस्तार हेमवत क्षेत्र के समान २१०५ ,५ /१९ योजन है ,
रुक्मिन पर्वत का विस्तार महहिमवान पर्वत के समान ४२१०,१०/१९ योजन है,
रम्यक क्षेत्र का विस्तार हरी क्षेत्र के समान ८४२१,१ /१९ योजन है
नील पर्वत का विस्तार निषेध पर्वत के समान १६८४२,२/१९ योजन है!
भरत ऐरावत क्षेत्रों में काल परिवर्तन –
भरत क्षेत्र में षट काल परिवर्तन व्यवस्था
१-अवसर्पिणी के छ काल क्रमश; प्रथम सुषमा सुषमा काल ४ कोड़ा कोडी सागर का उत्कृष्ट भोगभूमि का है –
जन्म लेने पर बच्चे सोते सोते ३ दिन तक अंगूठा चूसते है ,३ दिन में घुटने के बल चलते है,फिर ३ दिन में मधुर तुतलाती भाषा बोलते है,फिर ३ दिनों में पैरो पर चलने लगते है,फिर ३ दिनों में कला और रूप आदि गुणों से युक्त हो जाते है,फिर ३ दिनोमें में युवावस्था को प्राप्त करते है,फिर ३ दिनों में सम्यग्दर्शन धारण करने की योग्यता प्राप् कर लेते है !ये बेर के फल के समान चौथे दिन आहार लेते है!इनकी आयु ३ पल्य लम्बाई ३ कोस अर्थात ६००० धनुष होती है!इस काल में जीवों का वर्ण उगते हुए सूर्य समान होता है
२- अवसर्पिणी का द्वित्य काल ३ कोड़ा कोडी सागर का माध्यम भोग भूमि का होता है !जन्म लेने पर बच्चे सोते सोते ५ दिन तक अंगूठा चूसते है ,५ दिन में घुटने के बल चलते है,फिर ५ दिन में मधुर तुतलाती भाषा बोलते है,फिर ५ दिनों में पैरो पर चलने लगते है,फिर ५ दिनों में कला और रूप आदि गुणों से युक्त हो जाते है,फिर ५ दिनोमें में युवावस्था को प्राप्त करते है,फिर ५ दिनों में सम्यग्दर्शन धारण करने की योग्यता प्राप् कर लेते है !ये बेहड़ा फल के समान तीसरे दिन आहार लेते है !इनकी आयु २ पल्य लम्बाई २ कोस अर्थात ४००० धनुष होती है!इस काल में जीवों का वर्ण चद्रमा की कांति के समान उज्ज्वल होता है
३-अवसर्पिणी का तीसरा काल दुषमा सुषमा २ कोड़ा कोडी सागर का जघन्य भोग भूमि होती है !जन्म लेने पर बच्चे सोते सोते ७ दिन तक अंगूठा चूसते है ,दुसरे सप्ताह में घुटने के बल चलते है,तीसरे सप्ताह में मधुर तुतलाती भाषा बोलते है,चौथे सप्ताह में पैरो पर चलने लगते है,पांचवे सप्ताह में कला और रूप आदि गुणों से युक्त हो जाते है,छठे सप्ताह में युवावस्था को प्राप्त करते है,सातवे सप्ताह में सम्यग्दर्शन के धारण की योग्यता प्राप् कर लेते है !ये आवले के समान दूसरे दिन आहार लेते है !इनकी आयु १ पल्य लम्बाई १ कोस अर्थात २००० धनुष होती है!इस हरित और श्याम वर्ण के जीव उत्पन्न होते है
भोगभूमि में जीवों के सइस काल में जीवों के सम्यक्त्व के कारण-यहाँ जीवों को जातिस्मरण ,देवों के उपदेशों ,सुखों/दुखो के अवलोकन से, जिनबिम्ब दर्श से और स्वभावत: भव्य जीवों को सम्यक्त्व होता है !
भोगभूमि की अन्य विशेषताए –
भोगभूमि का जीवों को सुख भरत क्षेत्र के चक्रवर्ती से भी अधिक होता है ! जीवों का बल ९००० हाथियों के बराबर होता है !भोगभूमि में विकलत्रय जीव उत्पन्न नहीं होते ,विषैले सर्प ,बिच्छू आदि जंतु नहीं उत्पन्न होते !वहां ऋतुओं का परिवर्तन नहीं होता ,मनुष्यों की यहाँ वृद्धावस्था नहीं होती ,उन्हें कोई रोग नहीं होता ,कोई चिंता नहीं होती ,उन्हें निंद्रा नहीं आती!
भोगभूमि में युगल बच्चे ही युवा होने पर पति पत्नी की तरह रहते है,कोई विवाह व्यवस्था नहीं है !यहाँ जीवों को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ती के लिए पुरुषार्थ नहीं करना पड़ता ,सभी की पूर्ती दस प्रकार के कल्प वृक्षों के नीचे खड़े होकर याचना करने से हो जाती है !
४- अवसर्पिणी का चौथा दुषमा सुषमा काल कर्मभूमि का १ कोड़ा कोडी सागर में से ४२००० वर्ष कम का होता है !इसमें सभी जीवों को अपनी जीविका के लिए पुरुषार्थ करना पड़ता है क्योकि कल्प वृक्षों की फलदान शक्ति समाप्त हो जाती हा !इसमें जीवों की उत्कृष्ट आयु १ कोटि पूर्व ऊंचाई ५०० धनुष होती है!इसी काल मे धर्म प्रवर्तन होता है ,६३ श्लाखा पुरुष; १६९ महान पुरुष २४ तीर्थंकरों के माता,पिता, कामदेव ,१४ ,कुलकर,११रुद्र,१२ चक्रवर्ती,९-९ बलभद्र,नारायण और प्रतिनारायण ,नारद होते है !
५- अवसर्पिणी का पंचम दुःखमा काल २१००० वर्ष का है जिसमे जीव का हीन सहनन ,भ्रष्ट आचरण ,पांचों वर्ण के काँति रहित, उत्कृष्ट आयु १२० वर्ष और ऊचाई ७ हाथ होती है !इस काल में अधिकांश जीव दुःखी ही रहते है जीव ,यह भी कर्म भूमि का काल है !सभी जीव मिथ्यात्व में जन्म लेते है !पंचम काल के अंत से ३ वर्ष ८ माह १५ दिन पूर्व जैन धर्म और राजा लोप हो जायेंगे,अग्नि समाप्त हो जायेगी !तब तक इस कल में महावीर के निर्वाण से प्रयेक १००० वर्ष के अंतराल पर अवधि ज्ञानी मुनि और चतुर्विध संघ होगा तथा एक कल्कि राजा उत्पन्न होता रहेगा जोकि मुनि के आहार में से कर के रूप मे पहिला ग्रास वसूलने के कारण नरक में जाएगा और मुनि की अंतराय होने के कारण वे समाधी लेकर स्वर्ग जाएंगे इसी शृंखला में अंतिम के समय वीरांगज अवधि ज्ञानी मुनि,सर्वश्री नामक आर्यिका ,तथा अग्निल और पंगु श्री नामक युगल श्रावक -श्राविका होंगे !अंत में ये आहार और परिग्रहों का त्याग कर समाधी मरण ग्रहण करते है !प्रत्येक ५०० ५०० वर्षों के अंतराल पर उपक्लकी भी होते रहेंगे !इस काल में मिथ्या ब्राह्मणों का सत्कार होगा !
६- अवसर्पिणी का छठा दुःखमा दुःखमा काल २१००० वर्ष का है यहाँ !जीवों को धर्म ,दया ,क्षमा आदि गुणों रहित होने के कारण दुःख ही दुःख है,वे नग्न ही जीवन व्यतीत करते है ! सभी जीव इस काल में मिथ्यात्व मे धुए के समान काले वर्ण युक्त।गूंगे,बहरे,अंधे,कुरूप,पशु के समान स्वभाव के उत्पन्न होकर मिथ्यात्व में ही मरते है !अधिकांशत जीव नरक गति को ही प्राप्त करते है !इस काल मे हिंसा इतनी बढ़ जाती है की मनुष्य मनुष्य का भक्षण करने लगता है !इस काल के अंत से ४९ दिन पूर्व महा प्रलय भरत और ऐरावत क्षेत्र के आर्य खंड मे होती है जिसमे १ योजन तक की चित्रा पृथिवी जल कर भस्म हो जाती है !इन ४९ दिनों में ७-७ दिन के लिए क्रमश:शीट,क्षार,विष,वज्र,धुल और धूम की वर्षाये होती है जिसने इन क्षेत्रों के आर्य खंड में सभ्यता का सर्वनाश हो जाता है !यह प्रलय उत्सर्पिणी काल के प्रथम काल के ४९ दिनों तक रहती है , जिसके बाद देवों द्वारा विज्यार्ध पर्वत और गंगा सिंधु नदी के बीच की गुफाओं में छुपाये गए ७२ युगल और असंख्यात युगल भरत के आर्यखण्ड में लौटकर जीवन प्रारम्भ भादो पंचमी शुक्ल पक्ष में करते है ,पंचमी से हम उसी याद में १० दिन का दस लक्षण शाश्वत पर्व मनाते है !यहाँ जीवों की उत्कृष्ट आयु २०-१५ वर्ष और ऊंचाई १ हाथ तक होती है !उत्सर्पिणी काल का आरम्भ श्रवण कृष्णा प्रतिपदा को होता है !जिसके प्रारम्भ में प्रत्येक ७-७ दिन तक क्रमश जल,दूध,घृत ,अमृत ,सुगंधित पवन आदि की शुभ वर्षाये होती है जिससे सभी जगह शांति मय वातावरण हो जाता है !यह दिन भाद्र शुक्ल पंचमी का होता है !!
उत्सर्पिणी के छ: काल अवसर्पिणी के ठीक विपरीत है !अर्थात पहिला काल दुःखमा दुःखमा-२१००० वर्ष ,कर्म भूमि ,दूसरा दुःखमा -२१००० ,वर्ष कर्म भूमि है !उत्सर्पिणी का छठा दुःखमा दुःखमा काल और दुःखमा काल के २०००० वर्ष व्यतीत होने के बाद अर्थात उखमा काल के १००० वर्ष शेष रहने पर प्रथम कुलकर जन्म लेते है !जो मुष्यों को खाना बनाने की,कुलाचार आदि की शिक्षा देते है !तीसरा काल कर्म भूमि का १कोड़ा कोडी सागर में ४२००० वर्ष कम , चौथा काल जघन्य भोग भूमि २ कोड़ा ,कर्मभूमि कोडी सागर का है, पंचमकाल सुखमाँ ३कोड़ा कोडी सागर का माध्यम भोग भूमि है छठा काल सुखमा सुखमा ४ कोड़ा कोडी सागर का उत्तम भोगभूमि है ! इन कालों में जीवों की आयु ,सुख सम्पदा ,ऊंचाई क्रमश बढ़ती है इसलिए इस काल का नाम उत्सर्पिणी काल सार्थक है !
असंख्यात अवसर्पिणी काल के व्यतीत होने पर एक हुँडावसर्पिणी काल आता है जिसमे अनहोनी घटनाएं जैसे तीर्थंकर ऋषभदेव जी के पुत्रियों का जन्म होना,५-तीर्थंकरों वासुपूज्य,मल्लिनाथ,नेमिनाथ जी,पार्श्वनाथ जी और महावीर जी का बालयति होना,६३ श्लाखा पुरुषों की जगह ५८ ही होना ,तीर्थंकरो ऋषभदेव जी का अवसर्पिणी काल के तीसरे काल में उत्पन्न होकर मोक्ष प्राप्त करना,भरत चक्रवर्ती के मान का गलन होना ,तीर्थंकरों पर उपसर्ग होना ,तीर्थंकरों का अयोध्या के अतिरिक्त अन्य स्थानों पर जन्म लेना,तीर्थंकरों सम्मेद शिखर जी के अतिरिक्त अन्य स्थानों से मोक्ष प्राप्त करना इत्यादि !वर्तमान में यहाँ हुन्डावसर्पिनी काल ही चल रहा है !
भरत और ऐरावत के म्लेच्छ खंडो तथा विज्यार्ध पर्वत की श्रेणियों में अवसर्पिणी के चतुर्थ काल के आदि से अंत तक परिवर्तन होता है,जब आर्य खंड में अवसर्पिणी का प्रथम ,द्वित्य और तृतीय काल वर्तता है उस समय म्लेच्छ खंड और विज्यार्ध की श्रेणियों में मनुष्यों की उत्कृष्ट आयु १ कोटी पूर्व और ऊंचाई ५०० धनुष होती है!
(५) भरत और (५) ऐरावत क्षेत्रो कें मात्र आर्य खण्डों मे जीवो की अवगाहना,आयु, वीर्य, सुख-दू:ख ,भोगोपभोगो आदि में उत्सर्पिणी के छह कालों में क्रमशः वृद्धि होते है तथा अवसर्पिणी में कमी होती है! म्लेच खंडो व विज्यार्द्ध की श्रेणियों में ६ कालों का परिवर्तन नहीं होता है वहा सदा ४ थे काल के सामान परिवर्तन होता है! जब आर्य खंड में १.२.३ काल वर्तता तब इनमें जीवों की अवगाहना ५०० धनुष और आयु १ पूर्व कोटि होती है,जब ४ था काल वर्तता है तब वहां जीवों की अवगाहना ५०० धनुष से घटते घटते ७ हाथ तक आर्य खंड की भांती होती है ,जब ५-६-काल वर्तता है तब आर्य खंड की भांती ७ हाथ से घटकर १ हाथ तक नहीं रह जाती है! उत्सर्पिणी काल में इससे विपरीत अवगाहना,आयु बढती हुई होती है ! अवसर्पिणी के ५,६, और उत्सर्पिणी के १,२ काल,कुल ८४००० वर्षों में, म्लेचखंड,विज्यर्द्ध की श्रेणियों में,सात हाथ की ही काया रहती है!जब आर्य खंड में उत्सर्पिणी के ३सरे काल में अवगाहना बदनी शुरू होती है तब वहां भी काया सात हाथ से – ५०० धनुष तक बढती है! अर्थात म्लेचखंड,विज्यर्द्ध की श्रेणियों में १८ कोड़ा कोडी सागर तक( अव्सिर्पिनी के १,२,३,- उत्सर्पिणी के,४,५,६,कालों में) मनुष्यों की आयु १ कोटि पूर्व और अवगाहना ५०० धनुष रहती है! अतः अवसर्पिणी के ४थे काल में आयु व शरीर की अवगाहना घटती है व् उत्सर्पिणी के तीसरे काल में बढती है उसी प्रकार म्लेचखंड,विज्यर्द्ध की श्रेणियों में घटती व बढती है!जब आर्य खंड में पांचवा छठा काल तथा उत्सर्पिणी का प्रथम और दूसरा काल कुल ८४००० वर्ष का चल रहा होता है तब ७ हाथ की काया रहती है !
इसलिए चक्रवर्ती की ९६००० रानियों में से ३२००० विज्यार्ध पर्वत की श्रेणियों से ,३२००० म्लेच्छ खंड से और ३२००० आर्य खंड से हो जाती है !उत्सर्पिणी के तीसरे -चौथे ,पांचवे और छट्टे काल में अवगाहना ५०० धनुष हो जाती है ! चक्रवर्ती छह खंडो का विजेता होता है तथा नारयण और प्रतिनारायण तीन खंडो के इसलिए अर्द्ध चक्रवर्ती कहलाते है
उत्सर्पिणी काल के समय तृतीयकाल के अंत से लेकर आदि तक परिवर्तन होता है !इनमे आर्यखण्ड की तरह ष ट काल परिवर्तन नहीं होता है !भरत ऐरावत के म्लेच्छ खण्डों और विजयार्ध पर्वत की श्रेणियों में प्रलय नही होती होती !
विजयार्ध पर्वत,
२५ योजन ऊँचा और मूल में दूना,भरत क्षेत्रों को बीचों बीच उत्तर और दक्षिण दो भागों में विभाजित करता है !इसका प्रत्येक भाग, गंगा और सिंधु नदियों के द्वारा ३-खंड उत्तर और -३ खंड दक्षिण में विभाजित हो जाते है ,इस प्रकार भरत क्षेत्र के छह खंड हो जाते है ! विज्यार्ध के उत्तर में तीनो खनंद म्लेच्छ खंड है और दक्षिण में बीच का कदंड आर्य खंड और उसके दोनों ओर के २ खंड म्लेच्छ खंड है !हमारी सम्पूर्ण पृथ्वी आर्य खंड है !चक्रवर्ती छह खंडो को जीतने के बाद म्लेच्छ खंड के वृषभांचल पर अपना नाम अंकित करने जाते है !
अन्य भूमियों में काल व्यवस्था-
ताभ्या-मपराभोम्योऽवस्थित:-!!२८!!
संधि विच्छेद -ताभ्याम् +अपरा:+भूमय :+अवस्थित:
शब्दार्थ-ताभ्याम् -उन (भरत और ऐरावत क्षेत्रों),अपरा:-आगे की ,भूमय:-भूमियाँ ,अवस्थित:-अवस्थित है !
अर्थ-उन भरत और ऐरावत क्षेत्रों के अतिरिक्त सभी भूमियों अवस्थित है ,उनमे षट काल रूप काल का परिवर्तन नहीं होता है!
भावार्थ -हेमवत् वर्ष औए ऐरावत वर्ष में तीसरा काल ,जघन्य भोगभूमि रूप दूसरा काल रहता है,हरीवर्ष और रम्यक वर्ष में मध्यम भोगभूमि रूप रहता है ,उत्तर और देव कुरु में प्रथम काल ,उत्तम भोग भूमि रूप रहता है !चारों पूर्व दक्षिण,पश्चिम और उत्तर विदेह क्षेत्र में चतुर्थ काल ,कर्म भूमी रूप वर्तता है !
हेमवत आदि क्षेत्रों में आयु-
एकद्वित्रिपल्योपमस्थितियोहैमवतक-हरिवर्षकदैवकुरवका:!!२९!!
संधि-विच्छेद -एक+द्वि+त्रि+ पल्योपम +स्थितिय:+हैमवतक +हरिवर्षक+ दैवकुरवका:
शब्दार्थ -एक-एक,द्वि-दो,त्रि-तीन,पल्योपम-पल्य ,स्थितिय:-आयु ,हैमवतक -हेमवतवर्ष ,हरिवर्षक-हरीवर्ष और दैवकुरवका:-देवकुरु में है !!
अर्थ -हेमवत ,हरी और देवकुरु(विदेह क्षेत्र में विशेष क्षेत्र )में तिर्यन्चों और मनुष्यों की उत्कृष्ट आयु क्रमश: १,२,३ पल्य की होती है !
विशेषार्थ-
१-हेमवत क्षेत्र में सदैव अवसर्पिणी का अथवा उत्सर्पिणी का चौथा काल ,जघन्य भोगभूमि का प्रवर्तता है तथा प्राणियों की स्थिति (आयु) १ पल्य और मनुष्यों की अवगाह्न्ना २००० धनुष ,वर्ण नीला होती है,एक दिन के अंतराल पर भोजन लेते है !
२-हरिवर्ष में सैदव अवसर्पिणी का दूसरा अथवा उत्सर्पिणी का पंचम काल प्रवर्त्ता है ,प्राणियों की उत्कृष्य स्थिति २ पल्य होती है मनुष्यों की अवगाह्न्ना ४००० धनुष ,वर्ण शुक्ल होता है !दो दिन के अंतराल पर आहार लेते है !
३- देवकुरु के प्राणियों की स्थिति ३ पल्य प्रमाण होती है। मनुष्यों की अवगाहना ६००० धनुष ,वर्ण पीत होता है ,भोजन ३ /४ दिन के अंतराल पर करते है !
हैरण्यवत् आदि क्षेत्रों में आयु-
तथोत्तरा:-३०
अर्थ-उत्तर के क्षेत्रों में मनुष्यों और तिर्यन्चों की आयु हेमवत आदि क्षेत्रों के सामान है !
भावार्थ -उत्तरकुरु में देवकुरु के सामान उत्तम भोगभूमि ,प्रथम काल प्रवृत्त है ,प्राणियों पल्य आयु व मनुष्यों की अवगाहना ६००० धनुष,रम्यक और हरिवर्ष में मध्यम भोग भूमि का दूसरा काल प्रवृत्ता है ,प्राणियों के आयु २ पल्य और अवगाहना ४००० धनुष है ,हैरण्यवत् में हेमवत् के समान जघन्य भोगभूमि का तीसरा काल प्रवर्त्ता है ,जीवों की उत्कृष्ट आयु १ पल्य और मनुष्यों की अवगाहना २००० धनुष होती है !
विशेष –
१-इस प्रकार जम्बूद्वीप में ६ भोगभूमि,घातकी खंड में १२ पुष्कार्ध द्वीप में १२ भोग भूमियाँ है,ढाई द्वीप -मनुष्य लोक में ३० भोग भूमियाँ है जिसमे सब तरह की भोगोपभोग की सामग्री कल्प वृक्षोस से प्राप्त होती है !
विदेह क्षेत्रमे आयु-
विदेहेषुसंख्येयकाल:-३१
संधि विच्छेद-विदेहेषु +संख्येय+काल:-
शब्दार्थ-विदेहेषु-विदेह क्षेत्र में,प्राणियों की संख्येय-संख्यात , काल:-वर्षों की आयु है
अर्थ -विदेह क्षेत्र में प्राणियों;मनुष्यों और तिर्यन्चों की आयु संख्यात वर्ष है !
विशेष-
विदेह क्षेत्र में अवसर्पिणी का चौथा और उत्सर्पिणी का तीसरा काल सदैव व्यवस्थित रहता है !इसमें मनुष्यों की उत्कृष्ट आयु १ कोटि पूर्व प्रमाण तथा अवगाहना ५०० धनुष होती है !यहाँ कर्म भूमि होती है और सदा जीव मोक्ष को प्राप्त करते रहते है !यहाँ नित्य तीर्थंकर ,केवली,चक्रवर्ती,नारायण ,मुनि आदि उत्पन्न होकर मोक्ष प्राप्त करते रहते है
जम्बू द्वीप में,विदेह क्षेत्र निषेध पर्वत के उत्तर और नील पर्वत के दक्षिण मे पूर्व से उत्तर तक फैला,सबसे बड़ा क्षेत्र है जिसके मध्य में उत्तर और देवकुरु दो उत्तम भोग भूमिया है !
भरत क्षेत्र का विस्तार –
भरतस्य विष्कम्भो जम्बूद्वीपस्य नवति शत भाग: !!३२ !!
संधि विच्छेद -भरत+अस्य+ विष्कम्भ:+ जम्बूद्वीप+अस्य +नवति +शत +भाग:
शब्दार्थ-भरत-भरत क्षेत्र,अस्य-का ,विष्कम्भ:-विस्तार,जम्बूद्वीप-जम्बूद्वीप,अस्य-के ,नवतिश-एक सौ नब्बे वा, भाग:-भाग है
अर्थ -भरत क्षेत्र का विस्तार जम्बूद्वीप के विस्तार एक लाख योजन का एक सौ नब्बे व भाग अर्थात १००००० /१९० =५२६-६/१९ योजन है !
विशेषार्थ -जम्बूद्वीप के विस्तार का भरत क्षेत्र १ भाग,हिमवन पर्वत २ भाग ,हेमवत वर्ष ४ भाग,महा हिमवन पर्वत -८ भाग,हरिवर्ष १६ भाग,निषध पर्वत ३२ भाग विदेहवर्ष ६४ भाग,नील पर्वत ३२ भाग,रम्यकवर्ष १६ भाग,रुक्मि पर्वत के ८ भाग ,हैरण्यवत वर्ष ४ भाग ,शिखरिन पर्वत २ भाग और ऐरावत वर्ष १ भाग है !इन सब का योग १९० है ,अत: भरत वर्ष का विस्तार जम्बूद्वीप के विस्तार का एक सौ नब्बेवा भाग है !
घातकी खंड द्वीप की रचना –
द्विर्घातकीखण्डे !!३३!!
संधि विच्छेद-द्वि:+घातकी +खण्डे
शब्दार्थ -द्वि:-दुगने ,घातकी -घातकी ,खण्डे-खंड द्वीप में
अर्थ -घातकी खंड द्वीप में दुगनी रचना है !
भावार्थ -घातकी खंड में जम्बूद्वीप से दुगने दुगने क्षेत्र,पर्वत,सरोवर ,नदियां आदि है !विशेषार्थ -घातकीखंड द्वीप वलयाकार होने के कारण, इसमें उत्तर और दक्षिण में स्थित दो इक्ष्वाकार पर्वतो से , जो उत्तर से दक्षिण तक द्वीप के विष्कम्भ -४ लाख योजन प्रमाण लम्बे है, एक छोर उनका कालोदधि समुद्र को और दूसरा छोर लवण समुद्र को स्पर्श करता है ,के द्वारा पूर्वार्द्ध घातकीखंड और पश्चिमार्द्ध घातकी खंड दो भागों में विभाजित है !प्रत्येक में एक एक; भरत,ऐरावत,हेमवत,हैरण्यवत,हरि,रम्यक,विदेहवर्ष कुल ७ क्षेत्र ,हिमवन, महहिमवन,निषध , नील,रूक्मी,और शिखरिन -कुल ६ पर्वत , पदम, महापदम, तिगिन्छ ,केशरी,महापुण्डरीक,पुण्डरीक -कुल ६ सरोवर,गंगा-सिंधु,रोहित-रोहितास्य,हरि-हरिकांता,सीता-सीतोदा ,सुवर्णकुला-रूप्यकूला, रक्त-रक्तोदा -कुल १४ नदियां ,१-मेरु अर्थात दोनों विभागों में कुल १४ क्षेत्र ,१२ पर्वत ,१२ सरोवर ,२८ महा नदियां ,२ मेरु है !इस द्वीप में ये सर्वत्र समान विस्तार के पर्वत पहिये के आरे के समान है और क्षेत्र आरो के बीच में स्थित है !यहाँ क्षेत्रों ,पर्वतों,सरोवरों,नदियों के नाम जम्बूद्वीप के समान ही है ! विजय और अचल क्रमश पूर्व और पश्चिम घातकी खंड में स्थित मेरु के नाम है !
घातकी खंड द्वीप को कालोदधि समुद्र घेरे हुए है और घातकी खंड द्वीप ने लवण समुद्र को घेर रखा है !घातकी खंड में क्षेत्र कालोदधि के पास अधिक चौड़े और लवण समुद्र के पास कम चौड़े है !जम्बूद्वीप में जिस स्थान पर जामुन का पार्थिव वृक्ष है ,घातकी खंड में उसी स्थान परघातकी अर्थात धतूरे का विशाल पार्थिव वृक्ष है खंड द्वीप है !
पुष्कर द्वीप का
पुष्करार्द्धेच -३४
संधि विच्छेद -पुष्कर+अर्द्धे+च
शब्दार्थ -पुष्कर-पुष्कव र द्वीप के,अर्द्धे-आधे भाग में ,च-भी क्षेत्रो और पर्वतों की रचना भी घातकी खंड के समान जम्बूद्वीप से दुगनी दुगनी तरह ही है !
अर्थ -पुष्कवर द्वीप के आधे भाग में भी घातकी खंड के समान और जम्बूद्वीप से दुगने दुगने क्षेत्र ,पर्वत,सरोवर,नदिया उसी नाम से ,और मेरु पर्वत है !
भावार्थ -कालोदधि समुद्र को घेरे हुए १६ लाख योजन विस्तार का पुष्कर द्वीप चूड़ी आकार मनुषोत्तर पर्वत से दो भागो में विभाजित है !इसके अंदरूनी भाग तक मनुष्य गति के जीव पाये जाते है !मानुषोत्तर पर्वत के बाहर अर्द्ध पुष्कर द्वीप से लोक के अंत तक मनुष्य नहीं होते !जम्बू द्वीप ,घातकी खंड द्वीप और अर्द्ध पुष्कर द्वीप ,ढाई द्वीप कहते है !पुष्करार्द्ध द्वीप को भी उत्तर और दक्षिण दोनों भागों को इक्ष्वाकर पर्वत पूर्वी और पश्चमी पुष्करार्ध दो भागो में विभाजित करता है जिसके प्रत्येक भाग में जम्बूद्वीप के सामान ही ७ क्षेत्र ,६ पर्वत,६ सरोवर १४ नदिया तथा क्रमश मंदार और विद्युन्माली मेरू पर्वत है !इस प्रकार यहाँ भी सभी जम्बूद्वीप से दुगने दुगने है
मनुष्य क्षेत्र –
प्राङ्मानुषोत्तरान्मनुष्याः ॥३५॥
संधि विच्छेद -प्राक् +मानुषोत्तरात्+मनुष्याः
शब्दार्थ-प्राक् -पहिले तक, मानुषोत्तरात्-मानुषोत्तर पर्वत तक,मनुष्याः-मनुष्य है
अर्थ -मानुषोत्तर पर्वत तक ही मनुष्य होते है !
भावार्थ -मानोषोत्तर पर्वत तक,जम्बूद्वीप,धातकी खंड और अर्द्धपुष्कर द्वीपों ,अर्थात ढाई द्वीप क्षेत्र में ही के ४५लाख योजन क्षेत्र में मनुष्य होते है, उससे आगे ऋद्धिधारी मुनिराज भी नहीं जा सकते !
विशेष- ढाई द्वीप के बाहर मनुष्य केवल निम्न तीन परिस्थितियों में पाये जाते है –
१-केवली भगवान के आत्म प्रदेश ८ समय के लिए केवली समुद्घात ,मे वे अपनी आयु कर्म की स्थिति अन्य तीन अघातिया कर्मों वेदनीय,नाम और गोत्र कर्म की स्थिति के बराबर करते है,के समय सर्व लोक में व्याप्त होते है !२-जो जीव ढाई द्वीप में अपनी आयु पूर्ण करने के बाद ढाई द्वीप के बहार के क्षेत्र की आयु बंध कर वहां उत्पन्न होने वाले है,वे मरण से पूर्व,मरणान्तिक समुद्घात करते है तो ढाई द्वीप के बाहर पाये जाते है!
३-ढाई द्वीप से बाहर का कोई जीव यदि वह मनुष्यायु का बंध करता है तो उसके पूर्व की पर्याय छोड़ने के अनन्तर ही मनुष्यादि कर्मों का उदय हो जाता है तब भी वह उत्पाद क्षेत्र तक पहुचने तक मनुष्यलोक से बाहर होता है !
मनुष्य के भेद –
आर्याम्लेच्छाश्च !!३६!!
संधि विच्छेद -आर्या+ म्लेच्छ:+च
शब्द्दार्थ – आर्या-आर्य , म्लेच्छ:-म्लेच्छ ,च-और
अर्थ- मनुष्यो के आर्य और म्लेच्छ दो भेद है !
भावार्थ -१- आर्य और २-म्लेच्छा ,मनुष्यो के दो भेद है !
विशेष-
१-आर्य-अनेक गुणों से सम्पन्न ,गुणी पुरषों से सेवित ,आर्य मनुष्य है!इन आर्यों के दो उप भेद है
१-ऋद्धिधारी आर्य -ऋद्धि सहित,ऋद्धि धारण की अपेक्षा ८ भेद है,आठ मे से कोई भी एक ऋद्धि अथवा समस्त ऋद्धियों के धारी आर्य ,ऋद्धिधारी आर्य होते है १
२ अऋद्धिधारी आर्य -ऋद्धि से रहित आर्य है !इन के निमित्त की अपेक्षा ५ भेद है –
१-क्षेत्रार्य-काशी,कौशल आदि क्षेत्रोंमें जन्म लेने वाले क्षेत्रार्य है !
२ -जात्यार्य-इक्ष्वाकु भोज आदि वंश में जन्मे आर्य ,जात्यार्य है !
३-चारित्रार्य-स्वयं और अन्यों को चारित्र पालन करवाने वाले आर्य चारित्रार्य है!
४-दर्शनार्य-सन्यग्दृष्टि आर्य दर्शनार्य है
५-कर्मार्य – क-सावद्य कर्मार्य ,ख-अल्प सावद्य कर्मार्य ,ग-असावद्य कर्मार्य !
क-सावद्य कर्मार्य –
१-असि कर्मार्य:-जो आर्य तलवार,शस्त्रों आदि से अथवा युद्ध करके रक्षा करअपनी आजीविका अर्जित करते है असि कर्मार्य है !
२-मसि कर्मार्य -जो आय -व्यय लेखन कर आजीविका अर्जित करते है ,मसि कर्मार्य है !
३-कृषि कर्मार्य -जो खेती द्वारा आजीविका अर्जित करते है कृषि कर्मार्य है !
४ -विद्या कर्मार्य -जो विविध कलाओं में प्रवीणता प्राप्त कर आजीविका अर्जित करते है विद्या कर्मार्य है !
५-शिल्प कर्मार्य-धोबी ,कुम्हार,नाई,लोहार,सुनार,इत्यादि शिल्प से जीविका अर्जित करते है शिल्प कर्मार्य है !
६-वाणिज्य कर्मार्य -जो वाणिज्य ,व्यापार आदि से जीविका अर्जित करते है वे वाणिज्य कर्मार्य है !
ख-अल्प सावद्य कर्मार्य -अणुव्रती श्रावक अल्पसंवाद्य कर्मार्य होते है !
ग-असावद्य कर्मार्य-पूर्ण संयम साधु असावद्य कर्मार्य होते है !
२-म्लेच्छ मनुष्य –
म्लेच्छ- आचार,विचार से भ्रष्ट ,धर्म कर्म व्यवस्था के विवेक से रहित मनुष्यों को म्लेच्छ कहते है! !ये दो प्रकार के होते है !
१-अन्तर्द्वीपज म्लेच्छ -लवण समुद्र और कालोदधि समुद्र के मध्य में स्थित अंतरद्वीपोँ में रहने वाले कुभोगभूमिज मनुष्यों को अन्तर्द्वीपज म्लेच्छ कहते है
२-कर्मभूमिज म्लेच्छ -कर्म भूमि में ,आर्य संस्कृति से विहीन ,उत्पन्न होने वाले कर्म भूमिज म्लेच्छ कहते है !
कर्म भूमियों के भेद –
भरतैरावतविदेहः कर्मभूमियोऽन्यत्र देवकुरूत्तरकुरुभ्यः ॥३७॥
सन्धि विच्छेद-भरत+ऐरावत+विदेहः कर्मभूमिय:+अन्यत्र+ देवकुरू+उत्तरकुरुभ्यः
शब्दार्थ -भरत,ऐरावत,विदेह, कर्मभूमिय:-कर्म भूमियाँ है, अन्यत्र -के अतिरिक्त देवकुरू+उत्तरकुरुभ्यः-देव और उत्तर कुरू के
अर्थ-भरत ऐरावत और ,विदेह में उत्तरकुरु के अतिरिक्त ,विदेह कर्म भूमियाँ है !
भावार्थ -जम्बू,धातकीखण्ड और पुष्करार्द्ध द्वीप पांचो मेरु; संबंधी ५ भरत ,५ ऐरावत और ५ विदेह क्षेत्र,विदेह में देव और उत्तर कुरु के अतिरिक्त, ४५ लाख योजन के ढाई द्वीप में कुल १५ कर्म भूमियाँ हैं !
विशेष –
१-कर्मभूमि-जिन क्षेत्रों में मनुष्यों को जीविका अर्जित करने के लिए असि,मसि,कृषि, वाणिज्य, विद्या अथवा शिल्पी, छः कर्मों से कोई एक करना हो और वह बड़े से बड़ा पुण्य कर संसार चक्र से मुक्त हो कर मोक्ष प्राप्त कर सकता हो अथवा बड़े से बड़ा पाप कर्म कर संसार चक्र में ही भटक सकता हो ,वह कर्म भूमि कहलाती है!ढाई द्वीप में १५ कर्म भूमिया है !शेष क्षेत्रो में भोगभूमि है वहां आजीविका के लिए कोई कर्म नहीं करना पड़ता !दो समुद्रों के अंतरद्वीपों में ९६ भोग भूमिया है !
मनुष्य की उत्कृष्ट और जघन्यायु –
नृस्थितीपरावरेत्रिपल्योपमान्तर्मुर्हूर्ते !!३८!!
संधि विच्छेद -नृ + स्थिती+ पर+अवरे +त्रिपल्योपमा +अन्तर्मुर्हूर्ते
शब्दार्थ-नर-मनुष्य की,स्थिती-आयु,पर-उत्कृष्ट,आवरे-जघन्य,त्रिपल्योपम-तीन पल्य,अन्तर्मुर्हूर्ते-अन्तर्मुहूर्त है
अर्थ-मनुष्यों की उत्कृष्ट आयु ३ पल्य (उत्तम भोगभूमि की अपेक्षा) और जघन्य आयु अन्तर्मुहूर्त (कर्म भूमि की अपेक्षा) है !तिर्यन्चों की आयु-
तिर्यग्योनिजानां च ॥३९॥
तिर्यंच जीवों की भी यही है !
अर्थ- तिर्यन्चों की भी उत्कृष्ट आयु मनुष्यों की भांति ३ पल्य और जघन्य अन्तर्मुहूर्त है !
विशेष-स्थिति के दो भेद है !
१-भव स्थिति-आत्मा एक पर्याय में जितने काल रहे वह उस जीव की भव स्थिति है,यहाँ भव स्थिति बतायी है!तिर्यन्चों में; पृथ्वीकायिक के उत्कृष्ट भव स्थिति २२००० वर्ष,जलकायिको की ७००० वर्ष,अग्निकायिक की ३ दिनरात,वायुकायिक की ३००० वर्ष और वनस्पतिकायिक की १०००० वर्ष है,द्वीन्द्रिय की १२ वर्ष,त्रीन्द्रिय की ४९ दिन,चतुरिंद्रिय की ६ माह,पंचेन्द्रिय में मच्छली आदि जलचरों की पूर्व कोटि प्रमाण,गोह व् नकुल आदि परीसर्पों की नौ पूर्वाङ्ग,सर्पो की ४२ हज़ार वर्ष और चतुष्पदों की ३ पल्योपम है !
२ -काय स्थिति- पुन :पुन :उसी पर्याय में निरंतर उत्पन्न होना, दूसरी जाती में नहीं जाना, काय स्थिति है !
पृथ्वीकायिक,जलकायिक,अग्निकायिक और वायुकायिक जीवों की उत्कृष्ट कायस्थिति असंख्येय लोक प्रमाण है और वनस्पतिकायिक की अनंत काल प्रमाण है जो की असंख्यात पुद्गल परिवर्तन प्रमाण स्वरुप व आव्लिका के असंख्यात भाग स्वरुप कही जाती है !विकलेन्द्रिय की असंख्यात हज़ार वर्ष है,पंचेन्द्रिय तिर्यंच/ पूर्व कोटि पृथकत्व अधिक ३ पल्य है, देव और नारकी की भव स्थिति ही काय स्थिति है !
३-१ पूर्वाङ्ग =८४ लाख वर्ष,१ पूर्व =८४ लाख पूर्वाङ्गतत्वार्थ सूत्र (मोक्षशास्त्र )अध्याय ३ मध्य लोक का वर्णन सहधर्मी भाइयों बहिनजैजिनेन्द्र देव की !पंचपरमेष्ठी की जय !विश्व धर्म जैन धर्म की जय !संत श्रोमणि आचार्यश्री विद्यासागर जय !
मध्य लोक से संबंधित महत्व पूर्ण सूचनाये –
१-पैमाइश की उपयोगी इकाइया –
अंगुल-तीन प्रकार के है –
१-उत्सेधांगुल -अंगुल,उत्सेधांगुल या सूच्यांगुल है !उत्सेधांगुल से देव,मनुष्य,तिर्यंच ,नार्कियों के शरीर के लम्बाई का प्रमाण और चारो प्रकार के देवों के निवास स्थान एवं नगरआदि का प्रमाण मापा जाता है !
२-प्रमाणांगुल -५०० उत्सेधांगुल प्रमाण अवसर्पिणी काल के प्रथम चक्रवर्ती के एक अंगुल का नाम प्रमाणांगुल है ! द्वीप,समुद्र,कुलांचल,वेदी,नदी,कुण्ड,सरोवर ,जगती,भरत आदि क्षेत्रों का प्रमाण -प्रमाणांगुल से ही मापे जातेहै!
३-आत्मांगुल – जिस जिस काल में भरत और ऐरावत क्षेत्र में जो जो मनुष्य होते है,उस काल में उन्ही मनुष्य के
अंगुल का नाम आत्मांगुल है !झारी,कलश,दर्पण ,हल,मूसल,सिंहासन,बाण,नली,अक्ष चामर,दुन्दभि,पीठ,छत्र, मनुष्य के निवास स्थान,नगर और उद्यान की संख्या आत्मांगुल से ही मापे जाते है!
२- ६अँगुल =१ पाद,२ पाद=१ विलस्ति ,२ विलस्ति =१ हाथ ,२ हाथ=१ रिंकू,२ रिंकू =१ दण्ड =४ हाथ=१ धनुष,मूसल/नाली ,२००० धनुष/दण्ड =१ कोस ,४ कोस=१योजन ,५००योजन =१ महायोजन =२०००कोस
४-सागर का नाप – एक योजन गहरे और इतने ही विस्तार के गड्ढे को ,उत्तम भोग भूमि के ७ दिन तक के मेढे के बच्चे के रोमो को कैची से आगे अविभाज्य टुकड़ों से ठसाठस भरण के बाद ,प्रत्येक सौ वर्ष में १ -१ रोम का सूक्ष्मत टुकड़ा निकलने पर ,गड्ढे को खाली करने में जितना समय लगता है उतना समय व्यवहार पल्य है !
ऐसे गोल गड्ढे के क्षेत्र का क्षेत्र घन फल =१ x १ x १० =१९/६ परिधि,१९/(६ x ४ )=१९/२४ घनफल !इस गड्ढे में १-७ दिन के मेढ़े के ४.१३४५२६३०३०८२०३१७७७४९५१२९९२ x १० की घात ४४ रोम आते है !प्रत्येक १०० वर्ष में १ रोम निकालने में ४.१३४५२६३०३०८२०३१७७७ ४९५१२९९२ x १० की घात ४६ वर्ष लगेंगे =१ व्यवहार पल्य !
ऐसे असंख्यात व्यवहार पल्य का १ उद्धार पल्य है !असंख्यात उद्धार पल्य का १ अद्धा पल्य है !ऐसे दस करोड़ अद्धा पल्य का को १० करोड़ अद्धा पल्य से गुना करने पर १ सागर की माप होती है !
१ अवसर्पिणी=१ उत्सर्पिणी =४,१३ x १० की घात ७६ सोलर वर्ष (REf cosmology by Mr.G ,R ,Jain )
५- १ अचल =८४ की घात ३१ x १० की घात ८० से १ अधिक संख्या असंख्यात हो जाती है!सन्दर्भ आदिपुराण पृष्ठ ६५ ,आचार्य जिनसेन विरचित
लोक में मध्य लोक एक झालर के सामान दीखता है जो की चित्र पृथ्वी के तल से सुदर्शन मेरु की चूलिका १लाख ४० योजन ऊँचा और तिर्यक दिशा में लोक के अंत तक १ राजू लम्बे क्षेत्र में असंख्यात द्वीप और समुद्रों से घिरा हुआ है !ये सभी द्वीप समुद्र चित्र पृथ्वी के ऊपर है !
समरू पर्वत के पाण्डुक वन ,पाण्डु ,पांडुकंबला ,रक्त और रक्तकम्ब्ला नमक चार शिलाये है जिनमे क्रमश: भरत ,पश्चिम विदेह,ऐरावत,और पूर्व विदेह क्षेत्रों में उत्पन्न होने वाले तीर्थंकरों के जन्माभिषेक होते है !चारो पाण्डु शिलाओं पर चारो दिशाओं में ३-३ सिंहासन होते है !मध्य के सिंहासन पर जिनेन्द्र भगवन विराजमान होते है और उनके दाए हाथ अर्थात दक्षिण की तरफ सौधर्मेन्द्र और उत्तर में ईशान इंद्र विराजमान होते है !
समुद्रों में लवण समुद्र का जल खारा,क्षीर सागर का जल दूध के समान ,घृतवर सागर का जल घृत के समान ,कालोदधि और पुष्कर सागर ,स्वयभूरमण सागर के जल का स्वाद साम्य जल के समान होता है !बाकी समुद्रो के जल का स्वाद गन्ने के रस के समान होता है !
लवण समुद्र,कालोदधि और स्वयंभूरहै मण सागर में जलचर जीव होते है शेष में नहीं होते !स्वयंभू रमन सागर में महामत्स्य १००० योजन लम्बा २५० योजन चौड़ा और ५०० योजन ऊँचा है !जो की मरकर सातवे नरक में जन्म लेता है !
मध्य लोक में तेरहर्वे रुचिकर द्वीप तक ४५८ अकृत्रिम चैत्यालय है,!पांचो मेरु पर्वत पर ८०,३० कुलांचल पर ३०,बीस गजदंत पर्वत पर २०,वक्षार गिरी पर ८०,इक्ष्वाकर पर्वत पर ४,मनुशोत्तर पर्वत पर ४,विज्यार्ध पर्वत पर १७०,जम्बू वृक्ष पर ५ शाल्मली वृक्ष पर ५ ,नन्दीश्वर द्वीप पर ५२,कुण्डलगिरी पर्वत पर ४,रूचक द्वीप के रूचक पर्वत पर ४ है !प्रत्येक चैत्यलत में १०८ भव्य जिम प्रतिमाये है ! इनमे ढाई द्वीप में ३९८ अकृत्रिमचैत्यालय है !जम्बू द्वीप में ७८ है !,धातकी खंड और पुश्राद्ध द्वीप में में १५८ -१५८ है !
नन्दीश्वर द्वीप का विस्तार एक सौ तरेसठ करोड़ चौरासी लाख योजन है
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मुनि श्री 108 प्रणम्यसागरजी तत्वार्थ सूत्र with Animation
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण
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