राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन
पर्व 76 – श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 271 | श्लोक 272 से 283 | श्लोक 284 से 291 | श्लोक 292 से 302
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 76- shlok 303 to 311
श्लोक ( Shlok ) 303
नागदरोऽङ्गितं ज्ञात्वा कन्यका मौनमब्रवीत् । प्रीतिङ्कराद्विनात्रान्यैर्न वदाम्यहमित्यसौ ॥ ३०३ ॥
कन्याने नागदत्तका अभिप्राय जानकर मौन धारण कर लिया और ऐसी प्रतिज्ञा कर ली कि मैं इस जहाजपर प्रीतिङ्करके सिवाय अन्य किसीसे बातचीत नहीं करूँगी ॥ ३०३॥
Upon discerning Nagadatta’s wicked intention, the maiden maintained a strict silence and took a solemn vow, declaring to herself, “On this ship, I shall not converse with anyone else other than Pritinkar.” [303]
श्लोक ( Shlok ) 304
नागदत्तोऽपि कन्यैषा मूकीति प्रतिपादयन् । तां द्रव्यरक्षणेऽयौक्षीत्प्रीत्या स्वाङ्गुलिसम्ज्ञया ॥३०४ ॥
नागदत्तने भी लोगों पर ऐसा प्रकट कर दिया कि यह कन्या गूँग। है और उसे अपनी अंगुलीके इशारेसे बड़े प्रेमके साथ द्रव्यकी रक्षा करनेमें नियुक्त किया ॥ ३०४॥
“Nagadatta, too, made it appear to the people that the maiden was mute, and with a gesture of his finger, he affectionately appointed her to guard the wealth.” [304]
श्लोक ( Shlok ) 305 – 307
क्रमात्स्वनगरं प्राप श्रेष्ठी प्रीतिङ्करस्तदा । गतो भूतिलकं नायात्कुत इत्यवदत्स तम् ॥ ३०५ ॥नागदचमसौ नाहं जानामीत्युत्तरं ददौ । भूषणानि समादाय समुद्रतटमागतः ॥ ३०६ ॥ नागदशेन पापेन स कुमारोऽतिसन्धितः । अदृष्ट्वा पोतमुद्विग्नः पुरं प्रति निवृत्तवान् ॥ ३०७॥
अनुक्रमसे नागदत्त अपने नगर में पहुँच गया। पहुँचनेपर सेठने उससे पूछा कि उस समय प्रीतिङ्कर भी तो तुम्हारे साथ भूतिलक नगरको गया था वह क्यों नहीं आया ? इसके उत्तरमें नागदत्तने कहा कि मैं कुछ नहीं जानता हूँ। आभूषण लेकर प्रीतिङ्कर कुमार समुद्रके तटपर आया परन्तु पापी नागदत्त उसे धोखा देकर पहले ही चला गया था। जहाजको न देखकर वह उद्विग्न होता हुआ नगरकी ओर लौट गया ।॥ ३०५-३०७॥
“In due course, Nagadatta arrived at his own city. Upon his arrival, the merchant-chief questioned him, ‘At that time, Pritinkar too had accompanied you to the city of Bhutilaka; why has he not returned?’ In response, Nagadatta replied, ‘I know nothing at all.’
Meanwhile, bearing the ornaments, Prince Pritinkar had arrived at the seashore, but the sinful Nagadatta had already deceived him and departed beforehand. Not seeing the ship, the prince grew deeply anxious and turned back toward the city.” [305-307]
श्लोक ( Shlok ) 308
सचिन्तस्तत्र जैनेन्द्रगेहमेकं विलोक्य तम् । पुष्पादिभिः समभ्यर्च्य विधाय विधिवन्दनाम् ॥ ३०८॥
चिन्तासे भरा प्रीतिङ्कर वहीं एक जिनालय देखकर उसमें चला गया। पुष्पादिकसे उसने वहाँ विधिपूर्वक भगवान्की पूजा-वन्दना की। तदनन्तर निम्न प्रकार स्तुति करने लगा ।। ३०८ ॥
“Filled with anxiety, Pritinkar noticed a Jain temple (Jinalaya) nearby and entered it. There, he ritually worshiped and paid homage to the Lord with flowers and other offerings. Thereafter, he began to chant praises in the following manner.” [308]
श्लोक ( Shlok ) 309
जिन उत्वद्दष्टमात्रेण मत्पापं काप्यलीयत । निशि दीपेन वा ध्वान्तं समुन्मीलितचक्षुषः ॥ ३०९ ॥
“हे जिनेन्द्र ! जिस प्रकार रात्रिमें खुले नेत्रवाले मनुष्यका सब अन्धकार दीपकके द्वारा नष्ट हो जाता है उसी प्रकार आपके दर्शन मात्रसे मेरे सब पाप नष्ट हो गये हैं ।॥ ३०९ ॥
“O Jinendra! Just as all darkness is dispelled by a lamp for a person whose eyes are wide open in the night, in the very same manner, all my sins have been destroyed by the mere sight of You.” [309]
श्लोक ( Shlok ) 310
चेतनः कर्मभिर्ग्रस्तः सर्वोऽप्यन्यदचेतनम् । सर्ववित्कर्मनिर्मुक्तो जिन केनोपमीयसे ॥ ३१० ॥
हे जिनेन्द्र ! आप, शुद्ध जीव, कर्मोंसे ग्रसित संसारी जीव और जीवोंसे भिन्न अचेतन द्रव्य, इन सबको जानते हैं तथा कर्मोंसे रहित हैं अतः आपकी उपमा किसके साथ दी जा सकती है ? ॥ ३१० ।।
“O Jinendra! You possess full knowledge of all things—of the pure soul, of the mundane transmigrating souls afflicted by karmas, and of the insentient matter distinct from living beings—and You are entirely free from all karmas. Therefore, with whom can You possibly be compared?” [310]
श्लोक ( Shlok ) 311
साङ्ख्यादीन् लोकविख्यातान् सर्वथा सावधारणान् । एको भवान् जिनाजैषीच्चित्रं निरवधारणः ॥३११॥
हे भगवन् ! यद्यपि आप इन्द्रिय-ज्ञानसे रहित हैं तो भी इन्द्रिय-ज्ञानसे सहित सांख्य आदि लोक प्रसिद्ध दर्शनकारोंको आपने अकेले ही जीत लिया है यह आश्वर्यकी बात है ।। ३११ ।।
“O Lord! Although You are devoid of sensory knowledge, You have single-handedly triumphed over the widely renowned philosophers of the world, such as the followers of the Samkhya school, who possess sensory knowledge. This is indeed a matter of profound wonder.” [311]
श्लोक 312 से 321
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राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन
करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाकापुरुषोंका
वर्णन , महावीर भगवान् की शिष्य परम्परा पर्व 76 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 64 | श्लोक 65 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111| श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 200 | श्लोक 201 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 271 | श्लोक 272 से 283 | श्लोक 284 से 291 | श्लोक 292 से 302
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