राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन
करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाकापुरुषोंका
वर्णन , महावीर भगवान् की शिष्य परम्परा पर्व 76 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 64 | श्लोक 65 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 93
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 76- shlok 94 to 101
श्लोक ( Shlok ) 94 – 97
इत्यस्य सोऽपि वाग्जालमसोढोदाहरिष्यति । किल धूर्तविटं वीक्ष्य ललिताङ्गाभिधामकम् ॥ ९४ ॥कस्यचित्सा महादेवी जाता मदनविह्वला । तद्विटानयनोपायनिरन्तरनियुक्तया ॥ ९५ ॥तद्धाच्या गुप्तमानीतः पथिकोऽन्तः प्रवेशितः । सह तेन महादेवी रममाणा यथेप्सितम् ॥ ९६ ॥अहोभिर्बहुभिर्शाता शुद्धेः शुद्धान्तरक्षिभिः । तन्मुखात्तद्दुराचारे राज्ञापि विदिते सति ॥ ॥ ९७ ॥
इस प्रकार उस चोरका वाग्जाल जम्बू-कुमार सहन नहीं कर सकेगा अतः उत्तर में दूसरी कथा कहेगा। वह कहेगा कि ललिताङ्ग नामके किसी धूर्त व्यभिचारी मनुष्यको देखकर किसी राजाकी रानी कामसे विह्वल हो गई। उसने किसी भी उपायसे उस पथिकका लानेके लिए एक धाय नियुक्त की और धाय भी उसे गुप्त रूपसे महलके भीतर ले गई। महारानी उसके साथ इच्छानुसार रमण करने लगी। बहुत समय बाद अन्तःपुरकी रक्षा करनेवाले शुद्ध खोजा लोगोंने रानीकी यह बात जान ली और उनके कहनेसे राजाको भी रानीके इस दुराचारका पता लग गया ।। ९४-९७ ॥
“In this manner, Jambukumar will not be able to tolerate that web of words woven by the thief; therefore, he will tell another story in reply. He will say, ‘Upon seeing a certain deceitful and adulterous man named Lalitanga, the queen of a king became overwhelmed with desire. She appointed a nurse to bring that traveler inside by any means necessary, and the nurse secretly escorted him into the palace. The queen began to enjoy pleasures with him as she pleased. After a long time, the pure eunuchs who guarded the inner apartments came to know about this affair of the queen, and through their reporting, the king also found out about the queen’s misconduct.'” || 94-97 ||
श्लोक ( Shlok ) 98 – 99
जारापनयनोपायमाज्ञप्ताः परिचारिकाः । अवस्करगृहं नीत्वा सा तं तन्त्राक्षिपन्खलम् ॥ ९८ ॥स दुर्गन्धेन तज्जन्तुभिश्च दुःखमवाप्नुवन् । अत्रैव नरकावासमाप्तवान् पापपाकतः ॥ ९९ ॥
राजाने इस दुराचारकी बात जानकर किसी भी उपायसे उस जारको पकड़नेके लिए सेवकोंको आज्ञा दी। यह जानकर रानीने उसे टट्टीमें ले जाकर छिपा दिया । वहाँकी दुर्गन्ध और कीड़ोंसे वह वहाँ बहुत दुःखी हुआ तथा पाप कर्मके उदयसे इसी जन्ममें नरक वासके दुःख भोगने लगा ॥ ९८-९९ ॥
“Upon learning of this misconduct, the king ordered his servants to capture that paramour by any means necessary. Knowing this, the queen took him and hid him inside the latrine. Due to the foul smell and worms there, he suffered immensely, and owing to the rise of his past sinful deeds, he began experiencing the miseries of hell in this very birth.” || 98-99 ||
श्लोक ( Shlok ) 100
तद्वदल्पसुखस्याभिलाषिणो नरकादिषु । भवन्ति दुस्तरापारघोरदुःखा गतिष्विति ॥ १०० ॥
इसी प्रकार थोड़े सुखकी इच्छा करनेवाले पुरुष नरकमें पड़ते हैं और वहाँ के दुस्तर, अपार तथा भयंकर दुःख उठाते हैं ।॥ १०० ॥
“Similarly, men who desire fleeting pleasures fall into hell, and there they endure insufferable, boundless, and terrifying miseries.” || 100 ||
श्लोक ( Shlok ) 101
पुनः कुमार एवैकं प्रपञ्चाङ्गदिता स तम् । येन संसारानवेंगो जायते सहसा सताम् ॥ १०१ ॥
इसके बाद भी वह एक ऐसी कथा और कहेगा जिसके कि द्वारा सत्पुरुषोंको संसारसे शीघ्र ही निर्वेग हो जाता है ॥ १०१ ॥
“Even after this, he will tell another such story, by means of which righteous men instantly attain detachment from the worldly existence.” || 101 ||
श्लोक 102 से 111
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