राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 51 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 104 | श्लोक 105 से 123 | श्लोक 124 से 132
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 133 to 141
श्लोक ( Shlok ) 133
इत्युक्तिभिरिमां मूकीभूतामालोक्य कामिनीम् । पुनश्चैवमभाषिष्ट मृष्टेष्टवचनो नृपः ॥ १३३ ॥
इस प्रकार रामने यद्यपि कितने ही शब्द कहे तो भी सीता क्रोधवश चुप ही बैठी रही। यह देख मिष्ट तथा इष्ट वचन बोलनेवाले राम फिर भी इस प्रकार कहने लगे ।। १३३ ।।
“In this way, although Rama spoke many words, Sita remained sitting in silence due to her anger. Seeing this, Rama—who always speaks sweet and desirable words—began to speak to her once again in the following manner.” (133)
श्लोक ( Shlok ) 134
त्वद्वक्त्रं दर्पणे वीक्ष्य चक्षुषी ते कृतार्थ के । त्वदास्यसौरभेणेव तृप्ता ते नासिका भृशम् ॥ १३४ ॥
हे प्रिये ! तेरे नेत्र दर्पणमें तेरा मुख देखकर कृतकृत्य हो चुके हैं और तेरी नाक तेरे मुखकी सुगन्धिसे ही मानो अत्यन्त तृप्त हो गई है ।। १३४ ॥
“O beloved! Having seen your face reflected in the mirror of your eyes, they have attained ultimate fulfillment; and your nose, it seems, has become completely satiated merely by the sweet fragrance of your face.” (134)
श्लोक ( Shlok ) 135
त्त्वच्छ्रव्यगेय सल्लापैः कर्णो पूर्णरसौ तव । तव विम्बाधरस्वादात्त्वज्जिह्वान्यरसास्पृहा ॥ १३५ ॥
तेरे सुनने तथा गाने योग्य उत्तम शब्द सुनकर कान रससे लबालब भर गये हैं। तेरे अधर-विम्बका स्वाद लेकर ही तेरी जिह्वा अन्य पदार्थोंके रस से निःस्पृह हो गई है ॥ १३५ ॥
“Hearing your excellent words, which are so worthy of being listened to and sung, my ears have been filled to the very brim with nectar. And by tasting the nectar of your Bimba-like lips, your own tongue has become completely indifferent to the flavors of all other worldly things.” (135)
श्लोक ( Shlok ) 136 – 138
परिरभ्य करौ तृप्तौ तव त्वत्कठिनस्तनौ । मनोऽपीन्द्रियसंतृप्ता संतृप्तं नितरां प्रिये ॥ १३६ ॥स्वस्यामेवं स्वयं तृप्ता सिद्धाकृतिरिवाधुना । कोपस्ते युक्त एवेति सीतां स चतुरोक्तिभिः ॥ १३७॥ततः प्रसन्नया सार्द्धं सुखं सर्वेन्द्रियोद्भवम् । सम्प्राप्य नूतनं भूपः कोपोऽपि सुखदः क्वचित् ॥ १३८ ॥
तेरे हाथ तेरे कठिन स्तनोंका स्पर्श कर सन्तुष्ट हो गये हैं इसी प्रकार हे प्रिये ! तेरी समस्त इन्द्रियोंके सन्तुष्ट हो जानेसे तेरा मन भी खूब सन्तुष्ट हो गया है। इस तरह तू इस समय अपने आपमें तृप्त हो रही है इसलिए तेरी आकृति ठीक सिद्ध भगवान्के समान जान पड़ती है फिर भी हे प्रिये ! तुझे क्रोध करना क्या उचित है। इस प्रकार चतुर शब्दोंके द्वारा रामने सीताको समझाया । तदनन्तर प्रसन्न हुई सीताके साथ राजा रामचन्द्रने समस्त इन्द्रियोंसे उत्पन्न हुए अभूतपूर्व सुखका अनुभव किया। सो ठीक ही है क्योंकि कहीं-कहीं क्रोध भी सुखदायी हो जाता है ॥ १३६-१३८ ।।
“O beloved! Your hands have found satisfaction in the touch of your own firm breasts; likewise, since all your senses are fully satisfied, your mind too has become deeply content. In this state, you are so perfectly self-satiated that your appearance resembles that of a liberated Soul (Siddha Bhagwan). Even so, my dear, is it proper for you to remain angry? In this way, Rama comforted Sita with his clever and charming words. Thereafter, the now-pleased Sita and King Ramachandra experienced an unprecedented bliss born of all the senses. And it is rightly said—sometimes, even a lover’s anger can lead to greater happiness.” (136-138)
श्लोक ( Shlok ) 139
तन्त्रैव लक्ष्मणोऽप्येवं स्वप्रियाभिः सहारमत् । दृष्टौ तदा मुदा कामस्तेभ्योऽभ्यर्थमदः सुखम् ॥ १३९ ॥
वहीं पर लक्ष्मण भी इसी तरह अपनी स्त्रियोंके साथ रमण करते थे । उस समय कामदेव बड़े हर्षसे उन सबके लिए इच्छानुसार सुख प्रदान करता था ॥१३९॥
“Right there, Lakshmana too would sport with his wives in a similar manner. At that time, Kamadeva (the God of Love) joyfully granted them all the pleasures and happiness their hearts desired.” (139)
श्लोक ( Shlok ) 140
एवं रामश्विरं ‘रन्त्वा कान्ते पश्य रविः करैः । सर्वान् दहति मूर्द्धस्थस्तीव्रः कस्यात्र शान्तये ॥ १४० ॥
इस प्रकार रामचन्द्र चिरकाल तक क्रीड़ा कर सीतासे कहने लगे कि हे प्रिये ! यह सूर्य अपनी किरणोंसे सबको जला रहा है सो ठीक ही है क्योंकि मस्तक पर स्थित हुआ उग्र प्रकृतिका धारक किसकी शान्तिके लिए होता है ? ॥ १४० ॥
“In this manner, having sported for a long time, Ramachandra said to Sita, ‘O beloved! This sun is scorching everyone with its rays, and rightly so—for when one of a fierce nature is positioned at the very top (overhead), who can expect peace from them?'” (140)
श्लोक ( Shlok ) 141
लक्ष्मणाक्रम विक्रान्तिविजितारातिसन्निभाः । छायामात्मनि सल्लीनां प्रकुर्वन्ति महीरुहः ॥ १४१ ॥
लक्ष्मण के आक्रमण और पराक्रमसे पराजित हुए शत्रुके समान ये वृत्त अपनी छायाको अपने आपमें लीन कर रहे हैं ।॥ १४१ ॥
“Just like an enemy defeated by the assault and prowess of Lakshmana, these trees are withdrawing their shadows into themselves.” (141)
श्लोक 142 से 151
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राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 16 | श्लोक 17 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 50 | श्लोक 51 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 104 | श्लोक 105 से 123 | श्लोक 124 से 132
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