राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाकापुरुषोंका वर्णन , महावीर भगवान् की शिष्य परम्परा पर्व 76 – श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 192
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 76- shlok 193 to 200
श्लोक ( Shlok ) 193
कषायविषयारम्भलौकिकज्ञानवेदकैः । जिह्वाषड्भेदसम्बन्धाः कुशीलाख्या दुराशयाः ॥ १९३ ॥
जो कषाय, विषय, आरम्भ तथा लौकिक ज्ञानके वशीभूत होकर जिह्वा, इन्द्रिय सम्बन्धी छह रसोंमें आसक्त रहते हैं वे दुष्ट अभिप्राय वाले कुशील कहलाते हैं ।॥ १९३॥
“Those who, falling under the sway of passions (Kashaya), sensual desires (Vishaya), worldly occupations (Arambha), and mundane knowledge, remain deeply attached to the six tastes related to the tongue and senses, are known as Kushila (misconducted ascetics) of wicked intent. || 193 ||”
श्लोक ( Shlok ) 194 – 199
संसक्ताख्या निषिद्धेषु द्रव्यभावेषु लोलुपाः । अवसनाङ्ख्या हीयमानज्ञानादिकत्वतः ॥ १९४ ॥समाचारबहिर्भूता मृगचार्यभिधानकाः । महामोहानिवृत्याजवअवागाधकूपके ॥ १९५ ॥पतन्ति स्म पुनश्चेति भवदेवोऽपि तच्छ्रतेः । सम्प्राप्तशान्तभावोऽभूज्ञात्वा तत्सायिकाग्रणीः ॥ १९६ ॥नागश्रियं च दौर्गत्यभावोत्पादितदुःस्थितिम् । आनाय्यादर्शयत्सोऽपि तां दृष्ट्वा संसृतिस्थितिम् ॥१९७ ॥स्मृत्वा धिगिति निन्दित्वा गृहीत्वा संयमं पुनः । भात्रा सहायुषः प्रान्ते क्रमात्स्वाराधनां श्रितः ॥१९८॥मृत्वा माहेन्द्रकल्पेऽभुद्धलभद्रविमानके । सामानिकः सुरः सप्तसागरोपमजीवितः ॥ १९९ ॥
जो निषिद्ध द्रव्य और भावोंमें लोभी रहते हैं वे संसक्त कहलाते हैं। जिनके ज्ञान, चारित्र आदि घटते रहते हैं वे अवसन्न कहलाते हैं और जो सदाचारसे दूर रहते हैं वे मृगचारी कहलाते हैं। ये सब लोग महामोहका त्याग नहीं होनेसे संसाररूपी अगाध कुएँमें बार-बार पड़ते हैं। गणिनीकी ये सब बातें सुनकर भवदेव मुनिको भी शान्त भावकी प्राप्ति हुई। यह जानकर गणिनीने, दुर्गतिके कारण जिसकी खराब स्थिति हो रही थी ऐसी नागश्रीको बुलवाकर उसे दिखाया। भवदेवने उसे देखकर संसारकी स्थितिका स्मरण किया, अपने आपको धिक्कार दिया, अपनी निन्दाकर फिरसे संयम धारण किया और बड़े भाई भगदत्त मुनिराजके साथ आयुके अन्त में अनुक्रमसे चारों आराधनाओंका आश्रय लिया । मरकर अपने भाईके ही साथ माहेन्द्रस्वर्गके बयभद्र नामक विमानमें सात सागरकी आयु वाला सामानिक देव हुआ ।। १९४-१९९ ॥
“Those who remain greedy for forbidden material things (Dravya) and impure mental dispositions (Bhava) are called Sansakta. Those whose knowledge, conduct, and other virtues continuously decline are called Avasanna, and those who live far removed from righteous conduct are called Mrigachari. Because all these individuals fail to renounce intense delusion (Maha-moha), they fall time and again into the bottomless well of worldly existence.
Upon hearing all these words from the senior nun, the sage Bhavadeva also attained a state of deep tranquility. Sensing this shift, the senior nun summoned Nagashri—whose condition had become wretched due to her misfortunes—and showed her to him. Witnessing her state, Bhavadeva reflected deeply on the transience of the worldly cycle, rebuked and censured himself, and once again firmly embraced self-restraint (Sanyam).
At the end of his lifespan, along with his elder brother, the sage Bhagadatta, he took refuge in the four forms of adoration (Aradhana) in due order. Upon passing away, he was reborn alongside his brother in the Vayabhadra celestial vehicle of the Mahendra heaven, becoming a Samanika deity with a lifespan of seven Sagaras. || 194-199 ||”
श्लोक ( Shlok ) 200
ज्यायानहमजाये त्वं कनिष्ठोऽभूस्ततश्च्युतः । इति सोऽपि मुनिप्रोक्तश्रवणेन विरक्तवान् ॥ २०० ॥
वहाँ से चयकर बड़े भाई भगदत्तका जीव मैं हुआ हूँ और छोटे भाई भवदेवका जीव तू हुआ है। इस प्रकार मुनिराजका कहा सुनकर शिवकुमार विरक्त हुआ ।। २०० ।।
“Descending from that celestial realm, I have become the soul of the elder brother, Bhagadatta, and you have become the soul of the younger brother, Bhavadeva.’ Hearing these words of the great sage, Prince Shivakumar was filled with deep detachment from the world. || 200 ||”
श्लोक 201 से 213
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राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन
करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाकापुरुषोंका
वर्णन , महावीर भगवान् की शिष्य परम्परा पर्व 76 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 64 | श्लोक 65 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 192
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