नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 273 से 282 | श्लोक 283 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 315 | श्लोक 316 से 324 | श्लोक 325 से 341
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 71- shlok 342 to 351
श्लोक ( Shlok ) 342 – 344
रुग्मिण्यथ पुरः कौसलाख्यया भूपतेः सुतः । भेषजस्याभवन्मद्रयां शिशुपालस्त्रिलोचनः ॥ ३४२ ॥ अभूतपूर्वमेतत्तु मनुष्येष्वस्य किं फलम् । इति भूपतिना पृष्टः स्पष्टं नैमित्तिकोऽवदत् ॥ ३४३ ॥ तृतीयं नयनं यस्य दर्शनादस्य नश्यति । अयं हनिष्यते तेन संशयो नेत्यदृष्टवित् ॥ ३४४ ॥
तदनन्तर कोशल नामकी नगरी में राजा भेषज राज्य करते थे। उनकी रानीका नाम मद्री था; उन दोनोंके एक तीन नेत्रवाला शिशुपाल नामका पुत्र हुआ। मनुष्योंमें तीन नेत्रका होना अभूतपूर्व था इसलिए राजाने निमित्तज्ञानीसे पूछा कि इसका क्या फल है ? तब परोक्षकी बात जाननेवाले निमित्तज्ञानीने साफ-साफ कहा कि जिसके देखनेसे इसका तीसरा नेत्र नष्ट हो जावेगा यह उसीके द्वारा मारा जावेगा इसमें संशय नहीं है।।३४२-३४४।।
Subsequently, King Bheshaj ruled in the city named Koshal. His queen’s name was Madri, and the two had a son named Shishupal who was born with three eyes. Since having three eyes was unprecedented among human beings, the King asked an astrologer (nimittajnani), “What does this signify?”
Thereupon, the astrologer, who possessed knowledge of hidden and future events, spoke clearly: “The person upon whose sight his third eye disappears will undoubtedly be the one by whose hands he shall be slain. There is no doubt about this.”[ 342-344]
श्लोक ( Shlok ) 345 – 346
कदाचिद्भषजो मद्री शिशुपालः परेऽपि च । गत्वा द्वारावतीं द्रष्टुं वासुदेवं समुत्सुकाः ॥ ३४५ ॥ अदृश्यतामगानेत्रं जरासन्धारिवीक्षणात् । तृतीयं शिशुपालस्य विचित्रा द्रव्यशक्तयः ॥ ३४६ ॥
किसी एक दिन राजा भेषज, रानी मद्री, शिशुपाल तथा अन्य लोग बड़ी उत्सुकताके साथ श्रीकृष्णके दर्शन करने के लिए द्वारावती नगरी गये थे वहाँ श्रीकृष्णके देखते ही शिशुपालका तीसरा नेत्र अदृश्य हो गया सो ठीक ही है क्योंकि द्रव्योंकी शक्तियाँ विचित्र हुआ करती हैं ।।३४५-३४६।।
One day, King Bheshaj, Queen Madri, Shishupal, and others went to the city of Dwaravati with great eagerness to see Shri Krishna. The moment Shri Krishna looked at him, Shishupal’s third eye vanished. This is only natural, for the inherent powers and properties of different entities (dravyasa) are truly extraordinary.[ 345-346]
श्लोक ( Shlok ) 347
विज्ञातादेशया मद्या तद्विलोक्य हरिभिर्भया । ददस्व पूज्य मे पुत्रभिक्षामित्यभ्ययाचत ॥ ३४७ ॥
यह देख मद्री को निमित्तज्ञानीकी बात याद आ गई इसलिए उसने डरकर श्रीकृष्णसे याचना की कि ‘हे पूज्य ! मेरे लिए पुत्रभिक्षा दीजिये ‘ ॥ ३४७॥
Seeing this happen, Queen Madri instantly recalled the words of the astrologer. Terrified, she pleaded with Shri Krishna, saying, “O venerable one! Please grant me the life of my son as alms (putra-bhiksha).”[ 347]
श्लोक ( Shlok ) 348
शतापराध पर्यन्तमन्तरेणाम्ब मद्भयम् । नास्यास्तीति हरेर्लब्धवरासौ स्वां पुरीमगात् ॥ ३४८ ॥
श्रीकृष्णने उत्तर दिया कि ‘हे अम्ब ! सौ अपराध पूर्ण हुए बिना इसे मुझसे भय नहीं हैं अर्थात् जब तक सौ अपराध नहीं हो जायेंगे तब तक में इसे नहीं मारूँगा’ इसप्रकार श्रीकृष्णसे वरदान पाकर मद्री अपने नगरको चली गई ।। ३४८ ।।
Shri Krishna replied, “O Mother! Until he has committed one hundred offenses, he has nothing to fear from me. That is to say, I shall not slay him until he completes one hundred transgressions.” Having received this boon from Shri Krishna, Madri returned to her city.[348]
श्लोक ( Shlok ) 349 – 351
विशुद्धमण्डलो नित्यमुद्यन् ध्वस्तद्विपत्तमाः । पद्माह्लादकरस्तीक्ष्णकरः क्रूरः प्रतापवान् ॥ ३४९ ॥प्रच्छाद्य परतेजांसि भूभृन्मूर्धस्थपादकः । शैशवे शिशुपालोऽसौ भासते स्मेव भास्करः ॥ ३’५० ॥ हरिं हरिरिवाक्रम्य विक्रमेणाक्रमेषिणा । राजकण्ठीरवत्वेन सोऽवान्छद्वर्तितुं स्वयम् ॥ ३५१ ॥
इधर वह शिशुपाल बाल-अवस्थामें ही सूर्यके समान देदीप्यमान होने लगा क्योंकि जिस प्रकार सूर्येका मण्डल विशुद्ध होता है उसी प्रकार उसका मण्डल-मन्त्री आदिका समूह भी विशुद्ध था- विद्वेष रहित था, जिस प्रकार सूर्य उदित होते ही अन्धकारको नष्ट कर देता है उसी प्रकार शिशुपाल भी उदित होते ही निरन्तर शत्रुरूपी अन्धकारको नष्ट कर देता था, जिस प्रकार सूर्य पद्म अर्थात् कमलोंको आनन्दित करता है उसी प्रकार शिशुपाल भी पद्मा अर्थात् लक्ष्मीको आनन्दित करता था, जिस प्रकार सूर्यकी किरण तीक्ष्ण अर्थात् उष्ण होती है उसी प्रकार उसका महसूल भी तीक्ष्ण अर्थात् भारी था, जिस प्रकार सूय क्रूर अर्थात् उष्ण होता है उसी प्रकार शिशुपाल भी क्रूर अर्थात् दुष्ट था, जिस प्रकार सूर्य प्रतापवान् अर्थात् तेजसे सहित होता है उसी प्रकार शिशुपाल भी प्रतापवान् अर्थात् सेना और कोशसे उत्पन्न हुए तेजसे युक्त था और जिस प्रकार सूर्य अन्य पदार्थोंके तेजको छिपाकर भूभृत अर्थात् पर्वतके मस्तकपर- शिखर पर अपने पाद अर्थात् किरण स्थापित करता है उसी प्रकार शिशुपाल भी अन्य लोगोंके तेजको आच्छादितकर राजाओंके मस्तकपर अपने पाद अर्थात् चरण रखता था। वह आक्रमणकी इच्छा रखनेवाले पराक्रमसे अपने आपको सब राजाओंमें श्रष्ठ समझने लगा और सिंहके समान, श्रीकृष्णके ऊपर भी आक्रमण कर उन्हें अपनी इच्छानुसार चलानेकी इच्छा करने लगा ।। ३४९ -३५१ ॥
Meanwhile, even in his childhood, Shishupal began to shine as resplendently as the sun. For just as the disc (mandal) of the sun is completely pure, so too was his circle of ministers and advisors (mandal) pure and free from malice. Just as the sun destroys darkness the moment it rises, so too did Shishupal continuously destroy the darkness of his enemies upon his rise. Just as the sun brings joy to the lotus (padma), so too did Shishupal bring joy to the goddess of wealth (Padma or Lakshmi).
Just as the sun’s rays are sharp and intense (teekshna), so too was his taxation sharp and heavy (teekshna). Just as the sun is harsh and burning (kroor), so too was Shishupal harsh and cruel (kroor). Just as the sun is full of majesty and heat (pratapvaan), so too was Shishupal majestic (pratapvaan), possessed of the great power generated by his army and treasury. And just as the sun eclipses the brightness of all other entities and places its feet/rays (paad) upon the heads/peaks of the mountains (bhubhrit), so too did Shishupal obscure the glory of all other men and place his feet (paad) upon the heads of the kings (bhubhrit).
Driven by an aggressive valor, he began to consider himself the supreme leader among all kings. Like a lion, he even desired to assault Shri Krishna and bend him to his own will.[ 349-351]
श्लोक 352 से 362
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नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 130 | श्लोक 131 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 257 | श्लोक 258 से 272 | श्लोक 273 से 282 | श्लोक 283 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 315 | श्लोक 316 से 324 | श्लोक 325 से 341 |
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