पुष्पदन्त (सुविधिनाथ) पुराण का वर्णन
आचार्य गुणभद्राचार्य रचित ‘उत्तरपुराण’ के 55वें पर्व में नौवें तीर्थंकर भगवान पुष्पदन्त (सुविधिनाथ) के जीवन चरित्र और उनके पूर्व भवों का वर्णन है।
Hindi Translation of Uttar puran Parv 55
श्लोक 1 से 11 राजा महापद्म का वैभव और न्यायप्रिय शासन
जिन्होंने विशाल तथा निर्मल मोक्षमार्गमें अनेक शिष्योंको लगाया और स्वयं लगे एवं जो सुविधि रूप हैं- उत्तम मोक्षमार्गकी विधि रूप हैं अथवा उत्तम पुण्यसे सहित हैं वे सुविधि-नाथ भगवान् हम सबके लिए सुविधि – मोक्षमार्गकी विधि अथवा उत्तम पुण्य प्रदान करें ।॥ १ ॥ पुष्करार्धद्वीपके पूर्व दिग्भागमें जो मेरु पर्वत है उसके पूर्वविदेहक्षेत्रमें सीतानदीके उत्तर तट पर पुष्कलावती नामका एक देश है। उसकी पुण्डरीकिणी नगरीमें महापद्म नामका राजा राज्य करता था। उस राजाने अपने भुजदण्डोंसे शत्रुओंके समूह खण्डित कर दिये थे, वह अत्यन्त पराक्रमी था, वह किसी पुराने मार्गको अपनी वृत्तिके द्वारा नया कर देता था और फिर आगे होनेवाले लोगोंके लिए वही नया मार्ग पुराना हो जाता था ।। २-४ ॥ जिस प्रकार कोई गोपाल अपनी गायका अच्छी तरह भरण-पोषण कर उसकी रक्षा करता है और गाय द्रवीभूत होकर बड़ी प्रसन्नताके साथ उसे दूध देती हुई सदा संतुष्ट रखती है उसी प्रकार वह राजा अपनी पृथिवीका भरण-पोषण कर उसकी रक्षा करता था और वह पृथिवी भी द्रवीभूत हो बड़ी प्रसन्नताके साथ अपनेमें उत्पन्न होनेवाले रत्न आदि श्रेष्ठ पदार्थोंके द्वारा उस राजाको संतुष्ट रखती थी ।। ५ ।। वह बुद्धिमान् सब लोगोंको अपने गुणोंके द्वारा अपनेमें अनुरक्त बनाता था और सब लोग भी सब प्रकारसे उस बुद्धिमान्को प्रसन्न रखते थे ॥ ६ ॥ उसने मंत्री पुरोहित आदि जिन कार्य-कर्ताओंको नियुक्त किया था तथा उन्हें बढ़ाया था वे सब अपने-अपने उपकारोंसे उस राजाको सदा बढ़ाते रहते थे ॥ ७ ॥ जिस प्रकार मुनियोंमें अनेक गुण वृद्धिको प्राप्त होते हैं उसी प्रकार उस सदाचारी और शास्त्रज्ञानसे सुशोभित राजामें अनेक गुण वृद्धिको प्राप्त हो रहे थे तथा जिस प्रकार संस्कार किये हुए मणि सुशोभित होते हैं उसी प्रकार उस राजामें अनेक गुण सुशोभित हो रहे थे ॥ ८ ॥ वह राजा यथायोग्य रीतिसे विभाग कर अपने आश्रित परिवारके साथ अखण्ड रूपसे चिरकाल तक अपनी राज्य-लक्ष्मीका उपभोग करता रहा सो ठीक ही है क्योंकि सज्जन पुरुष लक्ष्मीको सर्वसाधारणके उपभोगके योग्य समझते हैं ॥ ६ ॥ नीतिके जाननेवाले राजाको इन्द्र और यमके समान कहते हैं परन्तु वह पुण्यात्मा इन्द्रके ही समान था क्योंकि उसकी सब प्रजा गुणवती थी अतः उसके राज्यमें कोई दण्ड देनेके योग्य नहीं था ॥ १० ॥ उसके सुखकी परम्परा निरन्तर बनी रहती थी और उसके भोगोपभोगके योग्य पदार्थ भी सदा उपस्थित रहते थे अतः विशाल पुण्यका धारी वह राजा अपने सुखके विरहको कभी जानता ही नहीं था ।। ११ ।।
श्लोक 12 से 22 वैराग्य, तप और स्वर्ग गमन
इस प्रकार अपने पुण्यके माहात्म्यसे जिसके महोत्सव निरन्तर बढ़ते रहते हैं ऐसे राजा महापद्मने किसी दिन अपने वनपालसे सुना कि मनोहर नामक उद्यानमें महान् ऐश्वर्यके धारक भूतहित नामके जिनराज स्थित हैं। वह उनकी वन्दनाके लिए बड़े वैभवसे गया और समस्त जीवोंके स्वामी जिनराजकी तीन प्रदक्षिणाएँ देकर उसने पूजा की, वन्दना की तथा हाथ जोड़कर अपने योग्य स्थानपर बैठकर उनसे धर्मोपदेश सुना । उपदेश सुननेसे उसे आत्मज्ञान उत्पन्न हो गया और वह इस प्रकार विचार करने लगा ।। १२-१४ ॥ अनादि कालीन मिथ्यात्वके उद्यसे दूषित हुआ यह आत्मा, अपने ही आत्मामें अपने ही आत्माके द्वारा दुःख उत्पन्न कर पागलकी तरह अथवा मतवालेकी तरह अन्धा हो रहा है तथा किसी भूताविष्टके समान अविचारी हो रहा है। जो जो कार्य आत्माके लिए अहितकारी हैं मोहोदयसे यह प्राणी चिरकालसे उन्हींका आचरण करता चला आ रहा है। संसाररूपी अटवीमें भटक-भटक कर यह मोक्षके मार्गसे भ्रष्ट हो गया है। इस प्रकार चिन्तवन कर वह संसारसे भयभीत हो गया तथा मोक्ष-मार्गको प्राप्त करनेकी इच्छासे धनद नामक पुत्रके लिए अपना ऐश्वर्य प्रदान कर संसारसे डरनेवाले अनेक राजाओंके साथ दीक्षित हो गया ।। १५-१८ ।। क्रम-क्रमसे वह ग्यारह अंगरूपी समुद्रका पारगामी हो गया, सोलह कारण भावनाओंके चिन्तवनमें तत्पर रहने लगा और तीर्थंकर नामकर्मका बन्ध कर अन्तमें उसने समाधिमरण धारण किया ।। १६ ।। समाधिमरणके प्रभावसे वह प्राणत स्वर्गका इन्द्र हुआ। वहाँ बीस सागरकी उसकी आयु थी, साढ़ेतीन हाथ ऊँचा शरीर था, शुक्ललेश्या थी, दश-दश माहमें श्वास लेता था, बीस हजार वर्ष बाद आहार लेता था, मानसिक प्रवीचार करता था, धूम्रप्रभा पृथिवी तक उसका अवधिज्ञान था, विक्रिया बल और तेजकी सीमा भी उसके अवधिज्ञानकी सीमाके बराबर थी तथा अणिमा महिमा आदि आठ उत्कृष्ट गुणोंसे उसका ऐश्वर्य बढ़ा हुआ था ॥ २०-२२ ।।
श्लोक 23 से 31 भगवान पुष्पदन्त का अवतरण और वैभव
वहाँ-का दीर्घ सुख भोगकर जब वह यहाँ आनेके लिए उद्यत हुआ तब इस जम्बूद्वीपके भरत क्षेत्रकी काकन्दी नगरीमें इक्ष्वाकुवंशी काश्यपगोत्री सुग्रीव नामका क्षत्रिय राजा राज्य करता था। सुन्द कान्तिको धारण करनेवाली जयरामा उसकी पट्टरानी थी ।। २३-२४ ।। उस रानीने देवोंके द्वारा अतिशय श्रेष्ठ रत्नवृष्टि आदि सम्मानको पाकर फाल्गुनकृष्ण नवमीके दिन प्रभात कालके समय मूल-नक्षत्रमें जब कि उसके नेत्र कुछ-कुछ बाकी बची हुई निद्रासे मलिन हो रहे थे, सोलह स्वप्न देखे ।स्वप्न देखकर उसने अपने पतिसे उनका फल जाना और जानकर बहुत ही हर्षित हुई ।। २५-२६ ।। मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदाके दिन जैत्रयोगमें उस महादेवीने वह उत्तम पुत्र उत्पन्न किया। उसी समय इन्द्रोंने देवोंके साथ आकर उनका क्षीरसागरके जलसे अभिषेक किया, आभूषण पहिनाये और कुन्दके फूलके समान कान्तिसे सुशोभित शरीरकी दीप्तिसे विराजित उन भगवान्का पुष्पदन्त नाम रक्खा ।। २७-२८ ॥ श्री चन्द्रप्रभ भगवान्के बाद जब नब्बै करोड़ सागरका अन्तर बीत चुका था तव श्री पुष्पदन्त भगवान् हुए थे। उनकी आयु भी इसी अन्तरमें शामिल थी ।॥ २६ ॥ दो लाख पूर्वकी उनकी आयु थी, सौ धनुष ऊँचा शरीर था और पचास लाख पूर्व तक उन्होंने कुमार-अवस्था-के सुख प्राप्त किये थे ॥ ३० ॥
अथानन्तर अच्युतेन्द्रादि देव जिसे पूज्य समझते हैं ऐसा साम्राज्य पाकर उन पुष्पदन्त भग-वान्ने इष्ट पदार्थोंके संयोगसे युक्त सुखका अनुभव किया। उस समय बड़े-बड़े पूज्य पुरुष उनकी स्तुति किया करते थे ।। ३१ ।।
श्लोक 32 से 42 राज्य भोग और उल्कापात से वैराग्य
सब स्त्रियोंसे, इन्द्रियोंसे और इस राज्यसे जो भगवान् सुविधिनाथको सुख मिलता था और भगवान् सुविधिनाथसे उन स्त्रियोंको जो सुख मिलता था उन दोनोंमें विद्वान् लोग किसको बड़ा अथवा बहुत कहें ? ।। ३२ ।। भगवान् पुण्यवान् रहें किन्तु मैं उन स्त्रियोंको भी बहुत पुण्यात्मा समझता हूँ क्योंकि मोक्षका सुख जिनके समीप है ऐसे भगवान्को भी वे प्रसन्न करती थीं-क्रीड़ा कराती थीं ।। ३३ ।। वे भगवान् स्वर्गके श्रेष्ठ सुख-रूपी समुद्रमें मग्न रहकर पृथिवी पर आये थे अर्थात् स्वर्गके सुखोंसे उन्हें संतोष नहीं हुआ था इसलिए पृथिवी पर आये थे। इससे कहना पड़ता है कि यथार्थ भोग्य वस्तुएँ वही थीं जो कि भगवान्को अभिलाषा उत्पन्न कराती थीं-अच्छी लगती थीं ।। ३४ ।। जो भगवान् अनन्त वार अहमिन्द्र पद पाकर भी उससे संतुष्ट नहीं हुए ने यदि मनुष्य-लोकके इस सुखसे संतुष्ट हुए तो कहना चाहिए कि सब सुखोंमें यही सुख प्रधान था ॥ ३५ ॥ इस प्रकार प्रेम-पूर्वक राज्य करते हुए जब उनके राज्य-कालके पचास हजार पूर्व और अट्ठाईस पूर्वांग बीत गये तब वे एक दिन दिशाओंका अवलोकन कर रहे थे। उसी समय उल्का-पात देखकर उनके मनमें इस प्रकार विचार उत्पन्न हुआ कि यह उल्का नहीं है किन्तु मेरे अनादि-कालीन महामोह रूपी अन्धकारको नष्ट करनेवाली दीपिका है ॥ ३६-३७ ।। इस प्रकार उस उल्काके निमित्तसे उन्हें निर्मल आत्मज्ञान उत्पन्न हो गया। वे स्वयंबुद्ध भगवान् इस निमित्तसे प्रतिबुद्ध होकर तत्त्वका इस प्रकार विचार करने लगे कि आज मैंने स्पष्ट देख लिया कि यह संसार विड-म्बना रूप है। कर्मरूपी इन्द्रजालिया ही इसे उल्टा कर दिखलाया है ॥ ३८-३६ ॥ काम, शोक, भय, उन्माद, स्वप्न और चोरी आदिसे उपद्रुत हुए प्राणी सामने रक्खे हुए असत् पदार्थको सत् समझने लगते है ।। ४० ।। इस संसारमें न तो कोई वस्तु स्थिर है, न शुभ है, न कुछ सुख देनेवाली है और न कोई पदार्थ मेरा है, मेरा तो मेरा आत्मा ही है, यह सारा संसार मुझसे जुदा है और मैं इससे जुदा हूँ, इन दो शब्दोंके द्वारा ही जो कुछ कहा जाता है वही सत्य है, फिर भी आश्चर्य है कि मोहोदयसे शरीरादि पदार्थोंमें इस जीवकी आत्मीय बुद्धि हो रही है ।। ४१-४२ ।। शरीरादिक ही में हूँ, मेरा सब सुख शुभ है, नित्य है इस प्रकार अन्य पदार्थोंमें जो मेरी पिपर्यय-बुद्धि हो रही है उसीसे मैं अनेक दुःख देनेवाले जरा, मरण और मृत्यु रूपी बड़े-बड़े मकरोंसे भयंकर इस संसाररूपी समुद्रमें भ्रमण कर रहा हूँ। ऐसा विचार कर वे राज्य-लक्ष्मीको छोड़नेकी इच्छा करने लगे ।।
श्लोक 43 से 51 दीक्षा कल्याणक और केवलज्ञान प्राप्ति
४३-४४ ।। लौकान्तिक देवोंने उनकी पूजा की। उन्होंने सुमति नामक पुत्रके लिए राज्यका भार सौंप दिया, इन्द्रोंने दीक्षा-कल्याणक कर उन्हें घेर लिया ।। ४५ ।। वे उसी समय सूर्यप्रभा नामकी पालकी पर सवार होकर पुष्पकवनमें गये और मार्गशीर्षके शुक्लपक्षकी प्रतिपदा के दिन सायंकालके समय बेलाका नियम लेकर एक हजार राजाओंके साथ दीक्षित हो गये। दीक्षा लेते ही उन्हें मनःपर्यय-ज्ञान उत्पन्न हो गया। वे दूसरे दिन आहारके लिए शैलपुर नामक नगर में प्रविष्ट हुए। वहाँ सुवर्णके समान कान्तिवाले पुष्पमित्र राजाने उन्हें भोजन कराकर पञ्चाश्चर्य प्राप्त किये ॥ ४६-४८ ॥ इस प्रकार छद्मस्थ अवस्थामें तपस्या करते हुए उनके चार वर्ष बीत गये। तदनन्तर कार्तिक शुक्ल द्वितीया-के दिन सायंकालके समय मूल-नक्षत्रमें दो दिनका उपवास लेकर नागवृक्षके नीचे स्थित हुए और उसी दीक्षावनमें घातिया कर्मरूपी पापकर्मोंको नष्ट कर अनन्तचतुष्टयको प्राप्त हो गये ॥४६-५००८ चतुर्णिकाय देवोंके इन्द्रोंने उनके अचिन्त्य वैभवकी रचना की- समवसरण बनाया और वे समस्त पदार्थोंका निरूपण करनेवाली दिव्यध्वनिसे सुशोभित हुए ।॥ ५१ ॥
श्लोक 52 से 62 संघ विस्तार, निर्वाण और उपसंहार
वे सात ऋद्धियोंको धारण करनेवाले विदर्भ आदि अट्ठासी गणधरोंसे सहित थे, पन्द्रह सौ श्रुतकेवलियोंके स्वामी थे; एक लाख पचपन हजार पाँच सौ शिक्षकोंके रक्षक थे, आठ हजार चार सौ अवधि-ज्ञानियोंसे सेवित थे, सात हजार केवलज्ञानियों और तेरह हजार विक्रिया ऋद्धिके धारकोंसे वेष्टित थे, सात हजार पाँच सौ मनःपर्ययज्ञानियों और छह हजार छह सौ वादियोंके द्वारा उनके मङ्गलमय चरणोंकी पूजा होती थी, इस प्रकार वे सब मिलाकर दो लाख मुनियोंके स्वामी थे, घोषार्याको आदि लेकर तीन लाखअस्सी हजार आर्यिकाओंसे सहित थे, दो लाख श्रावकोंसे युक्त थे, पाँच लाख श्राविकाओंसे पूजित थे, असंख्यात देवों और संख्यात तिर्यश्चोंसे सम्पन्न थे। इस तरह बारह सभाओंसे पूजित भगवान् पुष्पदन्त आर्य देशोंमें बिहार कर सम्मेदशिखर पर पहुँचे और योग निरोध कर भाद्रशुक्त अष्टमीके दिन मूल नक्षत्रमें सायंकालके समय एक हजार मुनियोंके साथ मोक्षको प्राप्त हो गये । देव आये और उनका निर्वाण-कल्याणक कर स्वर्ग चले गये ।। ५२-५६ ॥
जिन्होंने स्वयं चलकर मोक्षका कठिन मार्ग दूसरोंके लिए सरल तथा शुद्ध कर दिया है, जिन्होंने चित्तमें उपशम भावको धारण करनेवाले भक्तोंके लिए स्वर्ग और मोक्षका मार्ग प्राप्त करने-की उत्तम विधि बतलाई है, जो मोक्ष-लक्ष्मीके स्वामी हैं, जिनके दाँत खिले हुए पुष्पके समान हैं, जो स्वयं देदीप्यमान हैं और जिनका मुख दाँतोंकी कान्तिसे सुशोभित है ऐसे भगवान् पुष्पदन्तको हम नमस्कार करते हैं ।॥६०॥ हे देव ! आपका शरीर शान्त है, वचन कानोंको हरनेवाले हैं, चरित्र सबका उपकार करनेवाला है और आप स्वयं संसाररूपी विशाल रेगिस्तानके बीचमें ‘सघन’-छायादार वृक्षके समान हैं अतः हम सब आपका ही आश्रय लेते हैं ॥ ६१ ॥
जो पहले महापद्म नामक राजा हुए, फिर स्वर्गमें चौदहवें कल्पके इन्द्र हुए और तदनन्तर भरतक्षेत्रमें महाराज सुविधि नामक नौवें तीर्थकर हुए ऐसे सुविधिनाथ अथवा पुष्पदन्त हम सबको लक्ष्मी प्रदान करें ।। ६२ ।।
इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, भगवद् गुणभद्राचार्य प्रणीत, त्रिषष्टिलक्षण महापुराण संग्रहमें पुष्पदन्त पुराणको पूर्ण करनेवाला पचपनवाँ पर्व समाप्त हुआ ।
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आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena