राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 292 से 302 | श्लोक 303 से 317 | श्लोक 318 से 332 | श्लोक 333 से 353 | श्लोक 354 से 364 | श्लोक 365 से 382 | श्लोक 383 से 401
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 402 to 412
श्लोक ( Shlok ) 402 – 407
वर्द्धमानश्रियं दृष्ट्वा रामं तत्पुण्यचोदितम् । इतो द्वितयलोकैकहितं यायामधीश्वरम् ॥ ४०२ ॥ इति रक्तं स्वयं भूयो रणधीगोचरं बलम् । पञ्चाशत्कोटिसंयुक्तं लक्षाचतुरशीतिकम् ॥ ४०३ ॥ ‘सार्द्धत्रिकोटिसङ्ख्यातं खेचरानीकमप्यदः । बलेन तेन सम्प्राप्य स नृसिंहः सलक्ष्मणः ॥ ४०४ ॥ हर्तुमचैव सीतां वा सीतां च खचरेशिनः । समर्थः किन्तु दाक्षिण्यं विभोनैसर्गिकं त्वयि ॥ ४०५ ॥ ततोऽह प्रेषितस्तेन त्वं च किं वेत्सि नेदृशम् । इति तद्वचनं श्रुत्वा कार्यविद्रावणानुजः ॥ ४०६ ॥ तदानीमेव तं नीत्वा दशाननमजिज्ञपत् । वचोहरोऽयं रामेण प्रहितो देवसन्निधिम् ॥ ४०७ ॥
इस समय जिनकी लक्ष्मी बढ़ रही है ऐसे रामचन्द्रको देख उनके पुण्यसे प्रेरित हुई तथा ‘हम लोगोंको दोनों लोकोंका एक कल्याण करनेवाले रामचन्द्रजीकी शरण जाना चाहिए, इस प्रकार अनुरागसे भरी रणकी भावनासे ओतप्रोत पचास करोड़ चौरासी लाख भूमिगोचरियोंकी सेना और साढ़े तीन करोड़ विद्याधरोंकी सेना स्वयं ही उनसे आ मिली है। वे रामचन्द्र इतनी सब सेना तथा लक्ष्मणको साथ लेकर स्वयं ही यहाँ आ पहुँचेंगे। यद्यपि वे सीताके समान विद्याधरोंके राजा रावणकी लक्ष्मीको भी आज ही हरनेमें समर्थ हैं किन्तु उनका आपमें स्वाभाविक प्रेम है इसीलिए उन्होंने मुझे भेजा है। क्या आप इस तरहके सत्र समाचार नहीं जानते ? इस प्रकार अणुमान्के वचन सुनकर कार्यको जाननेवाला विभीषण उसी समय उसे रावणके समीप ले जाकर निवेदन करने लगा कि हे देव ! रामचन्द्रने यह दूत आपके पास भेजा है ॥ ४०२-४०७ ॥
“At this time, seeing Ramachandra whose fortune and glory are increasing, and inspired by his virtues—filled with affection and a battlefield spirit that ‘we must take refuge in Ramachandraji, who brings welfare to both the worlds’—a force of 508,400,000 (fifty crore eighty-four lakh) earth-dwelling warriors and 35,000,000 (three and a half crore) Vidyadhara warriors have voluntarily joined him.
That Ramachandra, taking this entire army along with Lakshmana, will arrive here himself. Although he is capable of destroying the fortune and glory of Ravana, the king of Vidyadharas, this very day—just as he did for Sita’s sake—he holds a natural affection for you, which is why he has sent me. Are you not aware of all this news?”
Hearing these words from Anuman (Hanuman), Vibhishana, who understood the gravity of the situation, immediately took him to Ravana and submitted, “O Lord! Ramachandra has sent this messenger to you.” [402-407]
श्लोक ( Shlok ) 408 – 409
इत्यसावपि योग्येन क्रमेणालोक्य रावणम् । तदादिष्टासने स्थित्वा प्राभृतार्पणपूर्वकम् ॥ ४०८ ॥ श्रव्यैहितमितालापैः शृणु देवेति बोधयन् । प्राज्ञो विज्ञाययामास प्रस्पष्टमधुरध्वनिः ॥ ४०९ ॥
बुद्धिमान् तथा स्पष्ट और मधुर शब्द बोलनेवाले अणुमान् ने भी विनयपूर्वक रावणके दर्शन किये, योग्य भेंट समर्पित की। तदनन्तर रावणके द्वारा बतलाये हुए आसन पर बैठकर श्रवण करनेके योग्य हित मित शब्दों द्वारा उसने इस प्रकार कहना शुरू किया कि हे देव, सुनिये ॥ ४०८-४०९॥
“The wise Anuman (Hanuman), who spoke clear and sweet words, also respectfully beheld Ravana and presented him with suitable gifts. Thereafter, sitting on the seat designated by Ravana, he began to speak beneficial and measured words worthy of being listened to, saying, ‘O Lord, please listen.'” [408-409]
श्लोक ( Shlok ) 410 – 412
अयोध्यामधुनाध्यास्य वर्द्धमानो निजौजसा । आत्माभिगामिकप्रज्ञासाहसो गुणभूषणः ॥ ४१० ॥ राघवः कुशली देवं त्रिखण्डाखण्डनायकम् । कुशलोदन्तसम्प्रश्नपूर्वमित्थमभाषत ॥ ४११ ॥ सीतान्यस्येति नीता सावस्मदीयेत्यजानता । किं जातं नास्ति दोषो द्राकू प्रेषणीया मनीषिणा ॥४१२॥
जो अपने तेजसे बढ़ रहे हैं, जिनकी बुद्धि तथा साहस सबको अपने अनुकूल बनानेवाला है, गुण ही जिनके आभूषण हैं तथा जो कुशल युक्त हैं ऐसे राजा रामचन्द्रने इस समय अयोध्यानगर में ही विराजमान होकर तीन खण्डके एक स्वामी आपका पहले तो कुशल-प्रश्न पूछा है और फिर यह कहला भेजा है कि आप सीताको किसी दूसरेकी समझ कर ले आये हैं। परन्तु वह मेरी है, आप बिना जाने लाये हैं इसलिए कुछ बिगड़ा नहीं है। आप बुद्धिमान् हैं अतः उसे शीघ्र भेज दीजिए ॥ ४१०-४१२ ।।
“King Ramachandra—who is growing in his own splendor, whose intellect and courage win everyone over, whose virtues are his only ornaments, and who is highly skillful—is currently residing in the city of Ayodhya. Being the master of three realms, he has first inquired about your well-being and has then sent this message:
‘You have brought Sita here thinking she belongs to someone else. However, she is mine. Since you brought her unknowingly, no harm is yet done. You are wise, so please return her quickly.'” [410-412]
श्लोक 413 से 422
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