शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्तीका पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 1 से 11
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 63- shlok 12 to 22
श्लोक ( Shlok ) 12 – 17
पुष्करद्वीपपूर्वार्द्धभरते नन्दने पुरे । नयविक्रमसम्पन्नो महीशोऽमितविक्रमः ॥ १२ ॥ऐतस्यानन्दमत्याश्च धनानन्तश्रियौ सुते । भूत्वा वां सिद्धकूटस्थनन्दनाख्ययतीश्वरात् ॥ १३ ॥श्रुत्वा धर्म व्रतैः सार्द्धमुपवासांश्च संविदा । समग्रहीष्टां नौ दृष्ट्वा कदाचित् त्रिपुराधिपः ॥ १४ ॥मनोहरवनेऽगच्छत् सहवज्राङ्गदः खगः । काम्तया वज्रमालिन्या समासक्तमतिस्तदा ॥ १५ ॥पुरीं प्रापय्य कान्तां स्वां सहसा पुनरागतः । गृहीत्वाऽऽवां व्रजन्नाशु निजाभिप्रायवेदिनीम् ॥ १६ ॥आगतामन्तरे दृष्ट्वा दूरात्तां वज्रमालिनीम् । त्यक्त्वा वेणुवने भीत्या तस्याः स्वपुरमीयिवान् ॥१७॥
पुष्कर द्वीप सम्बन्धी भरतक्षेत्रके नन्दनपुर नामक नगर में वय और पराक्रमसे सुशोभित एक अमितविक्रम नामका राजा राज्य करता था। उसकी आनन्दमती नामकी रानीसे हम दोनों धनश्री तथा अनन्तश्री नामकी दो पुत्रियां उत्पन्न हुई थीं। किसी एक दिन हम दोनोंने सिद्धकूटमें विराज-मान नन्दन नामके मुनिराजसे धर्मका स्वरूप सुना, व्रत ग्रहण किये तथा सम्यग्ज्ञानके साथ-साथ अनेक उपवास किये। किसी दिन त्रिपुरनगरका स्वामी वज्राङ्गद विद्याधर अपनी वज्रमालिनी स्त्रीके साथ मनोहर नामक बनमें जा रहा था कि वह हम दोनोंको देखकर आसक्त हो गया। वह उसी समय लौटा और अपनी स्त्रीको अपनी नगरीमें भेजकर शीघ्र ही वापिस आ गया। इधर वह हम दोनोंको पकड़कर शीघ्र ही जाना चाहता था कि उधरसे उसका अभिप्राय जाननेवाली वज्रमालिनी आ धमकी। उसे दूरसे ही आती देख वज्राङ्गद डर गया अतः वह हम दोनोंको वंश-वनमें छोड़कर अपने नगरकी ओर चला गया ।। १२-१७ ॥
In the town of Nandanpur, located in the Bharata-kshetra (region) of the Pushkara-dvipa (island), there ruled a king named Amitavikrama, who was adorned with youth and immense prowess. From his queen, named Anandamati, the two of us—named Dhanashri and Anantashri—were born as daughters.
One day, in Siddhakhuta, the two of us listened to the true nature of Dharma from a sage named Nandana, took vows, and performed several fasts along with acquiring right knowledge (Samyagjnana).
On another day, Vajrangada, the Vidyadhara (celestial being) lord of Tripurnagar, was passing through a beautiful forest named Manohara with his wife, Vajramalini. Upon seeing the two of us, he became infatuated. He immediately went back, sent his wife to his city, and returned shortly after.
Just as he was about to seize the two of us and flee, Vajramalini, who had figured out his intentions, suddenly arrived on the scene. Seeing her approaching from a distance, Vajrangada grew frightened. Consequently, he abandoned the two of us in a bamboo forest (Vamsha-vana) and fled toward his own city. || 12-17 ||
श्लोक ( Shlok ) 18 – 22
आवां संन्यस्य तत्रैव सौधर्मेन्द्रस्य शुद्धधीः । व्रतोपवासपुण्येन देवी नवमिकाभवम् ॥ १८ ॥त्वं च देवी कुबेरस्य रत्याख्या समजायथाः । अन्योन्यमवगत्यैत्य नन्दीश्वरमहामहम् ॥ १९ ॥अथ मन्दरपर्यन्तवने निर्जन्तुके स्थितम् । चारणं धृतिषेणाख्यं समाश्रित्य प्रणम्य ‘तम् ॥ २० ॥आवामप्रश्नयावेदं कदा स्यान्मुक्तिरावयोः । इत्यथो मुनिरप्याह जन्मनीतश्चतुर्थके ॥ २१ ॥ अवश्यं युवयोर्मुक्तिरिति तस्मान्महामते । सुमते नाकिनां लोकात्त्वां बोधयितुमागता ॥ २२ ॥
हम दोनोंने उसी वनमें संन्यास मरण किया। जिससे शुद्ध बुद्धिको धारण करने वाली मैं तो व्रत और उपवासक पुण्यसे सौधर्मेन्द्रकी नवमिका नामकी देवी हुई और तू कुबेरकी रति नामकी देवी हुई। एक बार हम दोनों परस्पर मिलकर नन्दीश्वर द्वीपमें महामह यज्ञ देखने के लिए गई थीं वहाँ से लौटकर मेरुपर्वतके निकटवर्ती जन्तुरहित वनमें विराजमान धृतिषेण नामक चारणमुनिराज के पास पहुँची थीं और उनसे हम दोनोंने यह प्रश्न किया था कि हे भगवन् ! हम दोनोंकी मुक्ति कब होगी ? हम लोगोंका प्रश्न सुननेके बाद मुनिराजने उत्तर दिया था कि इस जन्मसे चौथे जन्ममें तुम दोनोंकी अवश्य ही मुक्ति होगी। हे बुद्धिमती सुमते ! मैं इस कारण ही तुम्हें समझानेके लिए स्वर्गलोकसे यहाँ आई हूं ॥ १८-२२ ।।
The two of us embraced Sanyasamaran (ritual peaceful death while meditating) in that very forest. As a result, due to the spiritual merit (Punya) of my vows and fasts, I, possessing pure intellect, was reborn as a goddess named Navamika in the Saudharma Heaven (Saudharmendra). You, on the other hand, were reborn as Kuber’s goddess named Rati.
Once, we met and went together to the Nandishwar Island (Nandishwar-dvipa) to witness the grand Mahamaha festival. While returning from there, we arrived in a secluded forest devoid of living beings near Mount Meru, where a Charana ascetic (a monk with miraculous walking powers) named Dhritishena was seated. We both asked him, “O Holy One! When will the two of us achieve ultimate liberation (Mukti)?”
After listening to our question, the sage replied, “In the fourth birth from your current life, both of you will definitely achieve liberation.”
O wise Sumati! It is for this very reason that I have descended here from the heavenly realm to enlighten you. || 18-22 ||
श्लोक 23 से 31
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धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 |श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 130
अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 82 | श्लोक 83 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 |श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 283 | श्लोक 284 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 |श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 363 | श्लोक 364 से 371 | श्लोक 372 से 382 | श्लोक 383 से 390 | श्लोक 391 से 401 | श्लोक 402 से 411 | श्लोक 412 से 421 | श्लोक 422 से 433 | श्लोक 434 से 442 | श्लोक 443 से 451 | श्लोक 452 से 462 | श्लोक 463 से 472 | श्लोक 473 से 481 | श्लोक 482 से 491 | श्लोक 492 से 501 | श्लोक 502 से 513
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