राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 185 से 193 | श्लोक 194 से 203 | श्लोक 204 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 235 | श्लोक 236 से 252
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 253 to 262
श्लोक ( Shlok ) 253 – 255
इतो विनीतानगरात् श्रीमतः श्रीमतां पतिः । प्रेमप्रसारितात्मीयभुजाभ्यां स्वप्रियात्मजौ ॥ २५३ ॥परिष्वज्यानुयुज्याङ्गक्षेमवार्ता ततः परम् । इदमाज्ञापयत्यन्त्र दक्षिणाब्ध्यन्तरस्थिताः ॥ २५४ ॥षट्पञ्चाशन्महाद्वीपाश्चक्रवर्त्यनुवर्तिनः । केशवाश्च स्वमाहात्म्यात्तदर्द्धपरिरक्षिणः ॥ २५५ ॥
उसमें लिखा था कि इधर लक्ष्मीसम्पन्न अयोध्या नगरसे लक्ष्मीवानोंके स्वामी महाराज दशरथ प्रेमसे फैलाई हुई अपनी दोनों भुजाओंके द्वारा अपने प्रिय पुत्रोंका आलि-ङ्गनकर तथा उनके शरीरकी कुशल-वार्ता पूछकर यह आज्ञा देते हैं कि यहाँ से दक्षिण दिशाकी ओर समुद्रके बीचमें स्थित छप्पन महाद्वीप विद्यमान हैं जो चक्रवर्तीके अनुगामी हैं अर्थात् उन सबमें चक्रवर्तीका शासन चलता है। नारायण भी अपने माहात्म्यसे उन द्वीपोंमेंसे आधे द्वीपोंकी रक्षा करते हैं ।॥ २५३-२५५ ॥
“It was written therein that from the prosperous city of Ayodhya, Maharaja Dasharatha—the lord of the wealthy—lovingly extending both his arms, embracing his beloved sons, and inquiring about their well-being, commands that toward the south from here, situated in the midst of the ocean, lie fifty-six great islands which are followers of the Emperor (Chakravarti), meaning that the rule of the Emperor prevails over all of them. Narayana also, by virtue of His own majesty, protects half of those islands. || 253-255 ||”
श्लोक ( Shlok ) 256 – 257
द्वीपोऽस्ति तेषु लङ्काख्यास्त्रिकूटाद्रिविभूषितः । तस्मिन् विनमिसन्तानविद्याधरधरेशिनाम् ॥ २५६ ॥चतुष्टये व्यतिक्रान्ते प्रजापालनलोलुपे’ । रावणाख्यः खलो लोककण्टकः स्त्रीषु लम्पटः ॥ २५७ ॥
उन द्वीपोंमें एक लङ्का नामका द्वीप है, जो कि त्रिकूटाचलसे सुशोभित है। उसमें क्रम-क्रमसे राजा विनमिकी सन्तानके चार विद्याधर राजा, जो कि प्रजाकी रक्षा करनेमें सदा तत्पर रहते थे, जब व्यतीत हो चुके तब रावण नामका वह दुष्ट राजा हुआ है जो कि लोकका कण्टक माना जाता है और स्त्रियोंमें सदा लम्पट रहता है ।। २५६-२५७ ॥
“Among those islands is one named Lanka, which is graced by the Trikutachal mountain. In that land, after four Vidhyadhara kings from the lineage of King Vinami—who were ever-dedicated to the protection of their subjects—had passed away in succession, there arose that wicked king named Ravana. He is considered a thorn in the side of the world and is ever-indulgent in his lust for women. || 256-257 ||”
श्लोक ( Shlok ) 258 – 262
ततोऽभूदन्यदा तस्य नारदेन रणेच्छुना । रूपलावण्यकान्त्यादिकथितं क्षितिजाश्रितम् ॥ २५८ ॥ तदैव मदनामोधवाणनिभिन्नमानसः । पौलस्त्यो ध्वस्तधीधैर्यो मायावी न्यायदूरगः ॥ २५९ ॥ *अनन्यवेद्यमागत्य सोपायं स्वां पुरीं सतीम् । अनैषीद्यावदस्माकमुद्योगसमयो भवेत् ॥ २६० ॥ तावत्स्वकायसंरक्षा कर्तव्येति प्रियां प्रति । प्राहिणोतु कुमारोऽग्यं दूतं स्वं धीरयन्निति ॥ २६१ ॥ पितृलेखार्थमाध्याय रुद्धशोकः कुधोद्धतः । अन्तकस्याङ्कमारोढुं स लङ्केशः किमिच्छति ॥ २६२॥
तदनन्तर युद्धकी इच्छा रखने वाले नारदने किसी एक दिन रावणके सामने सीताके रूप लावण्य और कान्ति आदिका वर्णन किया । उसी समय रावणका मन कामदेवके अमोघ वाणोंसे खण्डित हो गया। उसकी बुद्धिकी धीरता जाती रही। न्यायमार्गसे दूर रहनेवाला वह मायावी जिस तरह किसी दूसरेको पता न चलै सके इस तरह-गुप्तरूपसे आकर सती सीताको किसी उपायसे अपनी नगरीमें ले गया है सो जबतक हम लोगोंके उद्योग करनेका समय आता है तबतक अपने शरीरकी रक्षा करनी चाहिये इस प्रकार प्रिया-सीताके प्रति उसे समझानेके लिए कुमारको अपना कोई श्रेष्ठ दूत भेजना चाहिये’ । ऐसा महाराज दशरथने अपने पत्रमें लिखा था। पिताके पत्रका मतलब समझकर रामचन्द्रका शोक तो रुक गया परन्तु वे क्रोधसे उद्धत हो उठे। वे कहने लगे कि क्या रावण यमराजकी गोदमें चढ़ना चाहता है ॥ २५८-२६२ ॥
“Thereafter, on a certain day, Narada, desirous of instigating a war, described the beauty, elegance, and radiance of Sita before Ravana. At that very moment, Ravana’s mind was pierced by the unfailing arrows of Kamadeva (the god of love). The steadfastness of his intellect vanished. Deviating far from the path of righteousness, that master of illusions secretly arrived in a manner that no one could detect, and by some trickery, carried the chaste Sita away to his city. Therefore, until the time comes for us to make our efforts, she must protect her life; to explain this to his beloved Sita, the prince (Rama) should dispatch one of his finest messengers.’ Such was written by Maharaja Dasharatha in his letter.
Understanding the intent of his father’s letter, Ramachandra’s grief was contained, but he became fiercely aroused with anger. He began to say, ‘Does Ravana wish to climb into the very lap of Yamaraja (the god of death)?’ || 258-262 ||”
श्लोक 263 से 276
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