Hindi Translation of Uttar puran Parv 49
श्लोक 1 से 12 : पूर्वभव में विमलवाहन राजा का वैराग्य और तीर्थंकर नामकर्म बन्ध
जिनका ज्ञान सामने रखे हुए समस्त पदार्थोंको प्रकाशित करनेके लिए दर्पणके समान है तथा जो सब प्रकारके पाखण्डोंके विस्तारको नष्ट करनेवाले हैं ऐसे सम्भवनाथ तीर्थकर मेरा कल्याण करें ।॥ १ ॥ इसी पहले जम्बूद्वीपके पूर्व विदेहक्षेत्रमें सीता नदीके उत्तर तटपर एक कच्छ नामका देश है। उसके क्षेमपुर नगरमें राजा विमलवाहन राज्य करता था ॥ २ ॥ जिसे निकट भविष्यमें मोक्ष प्राप्त होनेवाला है ऐसा वह राजा किसी कारणसे शीघ्र ही विरक्त हो गया। वह विचार करने लगा कि इस संसारमें वैराग्यके तीन कारण उपस्थित हैं ।॥ ३ ॥ प्रथम तो यह कि यह जीव यम-राजके दाँतोंके बीचमें रहकर भी जीवित रहनेकी इच्छा करता है और मोहकर्मके उदयसे उससे निकलनेका उपाय नहीं सोचता इसलिए इस अज्ञानान्धकारको धिक्कार हो ।॥ ४ ॥ वैराग्यका दूसरा कारण यह है कि इस जीवकी आयु असंख्यात समयकी ही है उन्हें ही यह शरण माने हुए है परन्तु आश्चर्य है कि ये आयुके क्षण ही इन जीवोंको नष्ट होनेके लिए यमराजके समीप पहुँचा देते हैं ॥ ५ ॥ तीसरा कारण यह है कि ये जीव अभिलाषारूपी धूपसे संतप्त होकर विषयभोगरूपी किसी नदीके जीर्णशीर्ण तटकी छायाका आश्रय ले रहे हैं सो उनका यह आश्रय कुशलतापूर्वक उनकी रक्षा नहीं कर सका ।। ६ ।। इत्यादि विचार करते हुए विमलवाहन राजाने अपना राज्य विमलकीर्ति नामके पुत्रके लिए देकर स्वयंप्रभ जिनेन्द्रकी शिष्यता स्वीकार कर ली अर्थात् उनके पास दीक्षा धारण कर ली ॥ ७ ॥ ग्यारह अङ्गोंका जानकार होकर उसने सोलह कारण भावनाओंके द्वारा तीनों लोकोंमें क्षोभ उत्पन्न करनेवाला तीर्थंकर नामक नामकर्मका बन्ध किया ।॥ ८ ॥ अन्त में संन्यासकी विधिसे शरीर छोड़कर प्रथम ग्रैवेयकके सुदर्शन विमानमें बड़ी-बड़ी ऋद्धियोंको धारण करनेवाला अहमिन्द्र हुआ ॥ ६ ॥ तेईस सागरकी उसकी आयु थी, साठ अङ्गुल ऊँचा उसका शरीर था, शुक्त लेश्या थी, साढ़े ग्यारह माहमें एकबार श्वास लेता था, तेईस हजार वर्ष बाद मनसे आहारका स्मरण करता था, उसके भोग प्रवीचारसे रहित थे, सातवें नरकके अन्त तक उसका अवधिज्ञान था, अवधिज्ञानके क्षेत्रमें गमन करनेकी शक्ति थी, उतनी ही उसके शरीरकी प्रभा थी और उतनी ही दूर तक उसका वैक्रियिक शरीर आ जा सकता था ।। १०-१२ ॥
श्लोक 13 से 21 : अहमिन्द्र देव से संभवनाथ के गर्भ और जन्म कल्याणक तक
इस प्रकार वह श्रीमान् उत्तम अहमिन्द्र अणिमा महिमा आदि गुणोंसे सहित तथा पाँच प्रकारके पुण्योदयसे प्राप्त होनेवाले अहमिन्द्रके सुखोंका अनुभव करता था ।॥ १३ ॥
अथानन्तर इसी जम्बूद्वीपके भरत क्षेत्रमें श्रावस्ती नगरीका राजा दृढ़राज्य था। वह इक्ष्वाकु वंशी तथा काश्यपगोत्री था। उसके शरीरकी कान्ति बहुत ही उत्तम थी। सुषेणा उसकी स्त्रीका नाम था। जब पूर्वोक्त देवके अवतार लेनेमें छहमास बाकी रह गये तब सुषेणा रत्नवृष्टि आदि माहात्म्यको प्राप्त हुई। फाल्गुन शुक्ल अष्टमीके दिन प्रातःकालके समय मृगशिरा नक्षत्रमें पुण्योदयसे रानी सुषेणा ने सोलह स्वप्न देखे ॥ १४-१६ ।। तदनन्तर स्वप्नमें ही उसने देखा कि सुमेरु पर्वतके शिखरके समान आकारवाला तथा सुन्दर लक्षणोंसे युक्त एक श्रेष्ठ हाथी उसके मुखमें प्रवेश कर रहा है ।।१७। अपने पतिसे उन स्वप्नोंका फल सुनकर वह आनन्दको प्राप्त हुई। उसी दिन वह अहमिन्द्र उसके गर्भमें आया। तदनन्तर नवमें महीनेमें कार्तिक शुक्ला पौर्णमासीके दिन मृगशिरा नक्षत्र और सौम्य योगमें उसने तीन ज्ञानोंसे युक्त उस पूज्य अहमिन्द्र पुत्रको प्राप्त किया। जन्मकल्याणकसम्बन्धी उत्सव हो जानेके बाद उसका ‘संभव’ यह नाम प्रसिद्ध हुआ ।। १८-१६ ॥ इन्द्रोंने उस समय भगवान् संभवनाथकी इस प्रकार स्तुति की- हे संभवनाथ ! तीर्थंकर नामकर्मके उदयके बिना ही केवल आपके जन्मसे ही आज जीवोंको सुख मिल रहा है। इसलिए आपका संभवनाथ नाम सार्थक है ॥ २० ॥ हे भगवन् ! जिसमें अनेक लक्षण और व्यज्जनारूपी फूल लग रहे हैं तथा जो लम्बी-लम्बी भुजाओंरूपी शाखाओंसे सुशोभित है ऐसे आपके शरीररूपी आम्रवृक्षपर देवोंके नेत्ररूपी भ्रमर चिरकाल तक तृप्त रहते हैं ।॥ २१ ॥
श्लोक 22 से 31 : जन्ममहिमा, राज्यवैभव और वैराग्य की पुनः जागृति
हे देव ! जिस प्रकार स्याद्वादका निर्मल तेज कपिल आदिके मतोंका तिरस्कार करता हुआ सुशोभित होता है उसी प्रकार आपका निर्मल तेज भी अन्य लोगोंके तेजकों तिरस्कृत करता हुआ सुशोभित हो रहा है ॥ २२ ॥ जिस प्रकार सब जीवोंको आह्लादित करनेवाली सुगन्धिसे चन्दन जगत्का हित करता है उसी प्रकार आप भी साथ उत्पन्न हुए तीन प्रकारके ज्ञानसे जगत्का हित कर रहे हैं ।॥ २३ ॥ हे नाथ! आपके स्नेहसे बढ़ा हुआ यह लोक, दीपकके समान कारणके बिना ही हित करनेवाले तथा खजानेके समान देदीप्यमान आपको नमस्कार कर रहा है ।। २४ ।। इस प्रकार स्तुतिकर जिसने आनन्द नामका नाटक किया है ऐसा प्रथम स्वर्गका अधिपति सौधर्मेन्द्र माता-पिताके लिए भगवान्को सौंपकर देवोंके साथ स्वर्ग चला गया ॥ २५ ॥ द्वितीय तीर्थंकरकी तीर्थ-परम्परामें जब तीस लाख करोड़ सागर बीत चुके थे तब संभवनाथ स्वामी उत्पन्न हुए थे। उनकी आयु भी इसी अन्तरालमें सम्मिलित थी । उनकी साठ लाख पूर्वकी आयु थी, चार सौ धनुष ऊँचा शरीर था, जब उनकी आयुका एकचौथाई भाग बीत चुका तब उन्हें राज्यका महान् वैभव प्राप्त हुआ था। वे सदा देवोपनीत सुखोंका अनुभव किया करते थे ।। २६-२८ ।। इस प्रकार सुखोपभोग करते हुए जब चवालीस लाख पूर्व और चार पूर्वाङ्ग व्यतीत हो चुके तब किसी दिन मेघोंका विभ्रम देखनेसे उन्हें आत्मज्ञान उत्पन्न हो गया, वे उसी समय विरक्त हो गये और संसारका अन्त करनेवाले श्रीसंभवनाथ स्वामी अपने मनमें आयु आदिका इस प्रकार विचार करने लगे ॥ २६-३० ॥ कि प्राणीके भीतर रहनेवाला आयुकर्म ही यमराज है, अन्य वालोंने भूलते किसी दूसरेको यमराज बतलाया है, संसारके प्राणी इस रहस्यको नहीं जानते अतः अनन्तवार यमराजके द्वारा मारे जाते हैं ।॥ ३१ ॥
श्लोक 32 से 41 : दीक्षा, तप और केवलज्ञान
यमराज इसी शरीरमें रहकर इस शरीरको नष्ट करता है फिर भी इस जीवकी मूर्खता देखो कि यह इसी शरीरमें वास करता है ॥ ३२ ॥ रागरूपी रसमें लीन हुआ यह जीव विषके समान नीरस विषयोंको भी सरस मानकर सेवन करता है इसलिए अनादि कालसे चले आये इसकी बुद्धिके विभ्रमको धिक्कार है ॥३३॥ आत्मा, इन्द्रिय, आयु और इष्ट पदार्थके संनिधानसे संसारमें सुख होता है सो आत्माका सन्निधान तो इस जीवके सदा विद्यमान रहता है फिर भी यह जीव क्यों नहीं जानता और क्यों नहीं इसका विचार करता। यह लक्ष्मी बिजलीकी चमकके समान कभी भी स्थिरताको प्राप्त नहीं होती। जो जीव इसकी इच्छाको छोड़ देता है वही निर्मल सम्यग्ज्ञान की किरणोंसे प्रकाशमान मोक्षलक्ष्मीको प्राप्त हो सकता है ॥ ३४-३५ ॥ इस प्रकार पदार्थके सारको ग्रहण करनेवाले संभवनाथ स्वामीकी स्तुति कर लौकान्तिक देव चले गये । तथा भगवान् भी अपने पुत्रके लिए राज्य देकर दीक्षा कल्याणकका उत्सव प्राप्त करते हुए देवों द्वारा उठाई हुई सिद्धार्थ नामकी पालकीमें सवार हो नगरसे बाहर निकले और सहेतुक वनमें एक हजार राजाओंके साथ संयम धारण कर लिया ।। ३६-३७ ॥ दीक्षा लेते ही उन्हें मनःपर्ययज्ञान प्राप्त हो गया। सुवर्णके समान प्रभाको धारण करनेवाले भगवान्ने दूसरे दिन भिक्षाके हेतु श्रावस्ती नगरी में प्रवेश किया ।। ३८ ।। वहाँ काञ्चन जैसी कान्तिके धारक सुरेन्द्रदत्त नामक राजाने उन्हें पगाहकर आहार दान दिया और जिनमें अनेक रत्न चमक रहे हैं ऐसे पञ्चाश्चर्य प्राप्त किये ॥ ३६ ॥ इस प्रकार शुद्ध बुद्धिके धारक भगवान् संभवनाथ चौदह वर्ष तक छद्मस्थ अवस्थामें मौनसे रहे । तदनन्तर दीक्षावनमें पहुँचकर शाल्मली वृक्षके नीचे कार्तिक कृष्ण चतुर्थीके दिन जन्मकालीन मृगशिर नक्षत्रमें शामके समय वेलाका नियम लेकर ध्यानारूढ़ हुए और चार घातिया कर्मरूपी पाप-प्रकृतियोंको नष्ट कर अनन्तचतुष्टयको प्राप्त हुए ॥ ४०-४१ ॥ उसी समय इन्होंने कल्पवासियों तथा ज्यौतिष्क आदि तीन प्रकारके देवोंके साथ कैवल्य महोत्सव किया – ज्ञानकल्याणक उत्सव किया ।। ४२ ।।
श्लोक 42 से 54 : धर्मतीर्थ स्थापना, विशाल संघ और दिव्य प्रभाव
जिस प्रकार छोटे-छोटे अन्य अनेक पर्वतोंसे घिरा हुआ सुमेरु पर्वत शोभित होता है उसी प्रकार चारुषेण आदि एक सौ पाँच गणधरोंसे घिरे हुए भगवान् संभवनाथ सुशोभित हो रहे थे ॥ ४३ ॥ वे दो हजार एक सौ पचास पूर्वधारियोंसे परिवृत थे, एक लाख उन्तीस हजार तीन सौ शिक्षकोंसे युक्त थे ।॥ ४४ ॥ नौ हजार छह सौ अवधि-ज्ञानियोंसे सहित थे, पन्द्रह हजार केवलज्ञानियोंसे युक्त थे ।। ४५ ॥ उन्नीस हजार आठ सौ विक्रिया ऋद्धिके धारक उनके साथ थे, बारह हजार एक सौ पचास मनःपर्ययज्ञानी उनकी सभा में थे ।। ४६।। तथा बारह हजार वादियोंसे सुशोभित थे, इस प्रकार वे सब मिलाकर दो लाख मुनियोंसे अत्यन्त शोभा पा रहे थे ॥ ४७ ॥ धर्मार्याको आदि लेकर तीन लाख बीस हजार आर्यिकाएँ थी, तीन लाख श्रावक थे, पाँच लाख श्राविकाएँ थीं, असंख्यात देव-देवियाँ और संख्यात तिर्यञ्च उनकी स्तुति करते थे। इस प्रकार वे भगवान्, धर्मको धारण करनेवाली बारह सभाओंके स्वामी थे ।।४८-४६।। वे चौंतीस अतिशय और आठ प्रातिहार्योंके प्रभु थे, दिव्यध्वनिरूपी चाँदनीके द्वारा सबको आह्लादित करते थे तथा नमस्कार करनेवालोंको सूर्यके समान प्रकाशित करते थे ।। ५० ।। भगवान् संभवनाथने चन्द्रमाको तिरस्कृत कर दिया था क्योंकि चन्द्रमा सुदी और वदी दोनों पक्षोंमें संचार करता है परन्तु भगवान् शुद्ध अर्थात् निर्दोष पक्षमें ही संचार करते थे, चन्द्रमा दिनमें लक्ष्मीहीन हो जाता है परन्तु भगवान् मोक्षलक्ष्मीसे सहित थे, चन्द्रमा कलङ्क सहित है परन्तु भगवान् निष्कलङ्क – निष्पाप थे, चन्द्रमा सातङ्क – राहु आदिके आक्रमणके भयसे युक्त अथवा क्षय रोगसे सहित है परन्तु भगवान् निरातङ्क – निर्भय और नीरोग थे, चन्द्रमाके राहु तथा मेघ आदिके आवरणरूप अनेक शत्रु हैं परन्तु भगवान् शत्रुरहित थे, चन्द्रमा कुपक्ष – कृष्ण पक्षको करनेवाला है परन्तु भगवान् कुपक्ष – मलिन सिद्धान्तको नष्ट करनेवाले थे, चन्द्रमा दिनमें ताराओंसे रहित दिखता है परन्तु भगवान् सदा मुनि रूपी तारागणोंसे युक्त रहते थे, चन्द्रमा कामको बढ़ानेवाला है परन्तु भगवान् कामके शत्रु थे, चन्द्रमा तेजरहित है परन्तु भगवान् महान् तेजके धारक थे, चन्द्रमा पूर्णिमाके सिवाय अन्य तिथियोंमें वृत्ताकार न रहकर भिन्न-भिन्न आकारका धारक होता है परन्तु भगवान् सदा सवृत्त-सदाचारके धारक रहते थे, चन्द्रमा केवल पूर्णिमाको ही पूर्ण रहता है अन्य तिथियोंमें अपूर्ण रहता है परन्तु भगवान् सदा ज्ञानादि गुणोंसे पूर्ण रहते थे, चन्द्रमाके निकट ध्रुव ताराका उद्य नहीं रहता परन्तु भगवान् सदा अभ्यर्ण ध्रुवोदय थे- उनका अभ्युदय ध्रुव अर्थात् स्थायी था, चन्द्रमा केवल मध्यम लोकके द्वारा सेवनीय है परन्तु भगवान् तीनों लोकोंके द्वारा सेवनीय थे, चन्द्रमा कमलोंको मुकुलित कर देता है परन्तु भगवान् सदा भव्य जीवरूपी कमलोंको प्रफुल्लित करते थे अथवा भव्यजीवोंकी पद्मा अर्थात् लक्ष्मीको बढ़ाते थे, चन्द्रमा केवल बाह्य अन्धकारको ही नष्ट करता है परन्तु भगवान्ने बाह्य और आभ्यन्तर दोनों प्रकारके अन्धकारको नष्ट कर दिया था, तथा चन्द्रमा केवल लोकको प्रकाशित करता है परन्तु भगवान्ने लोक-अलोक दोनोंको प्रकाशित कर दिया था। इस प्रकार चन्द्रमाको तिरस्कृत कर धर्मकी वर्षा करनेके लिए भगवान्ने आर्य देशोंमें विहार किया था सो ठीक ही है क्योंकि सत्पुरुषोंकी चेष्टा मेघके समान सब लोगोंको सुख देनेवाली होती है ।। ५१-५४ ॥
श्लोक 55 से 59 : सम्मेदशिखर पर निर्वाण और परम कल्याण
अन्तमें जब आयुका एक माह अवशिष्ट रह गया तब उन्होंने सम्मेदाचल प्राप्त कर विहार बन्द कर दिया और एक हजार राजाओंके साथ प्रतिमायोग धारण कर लिया ।। ५५ ।। तथा चैत्र मासके शुक्ल पक्षकी षष्ठीके दिन जब कि सूर्य अस्त होना चाहता था तव अपने जन्म-नअत्रमें मोक्षलक्ष्मीको प्राप्त किया ॥ ५६ ॥ जो पञ्चम ज्ञान- केवलज्ञानके स्वामी हैं और पञ्चम-गति–मोक्षावस्थाको प्राप्त हुए हैं ऐसे भगवान् संभवनाथकी पञ्चमकल्याणक – निर्वाणकल्याणकमें पूजा कर पुण्यका संचय करने वाले देव यथास्थान चले गये ।॥ ५७ ॥ उपायोंके जाननेमें निपुण भगवान् संभवनाथने छठवेंसे लेकर चौदहवें तक संयमके उत्तम गुणस्थानोंका उल्लंघन किया, अत्यन्त दुष्ट आठ कर्मरूपी शत्रुओंका विनाश किया, अत्यन्त इष्ट सम्यक्त्व आदि आठ गुणोंको अपना अविनश्वर शरीर बनाया और अष्टम भूमिमें अनन्त सुखसे युक्त हो सुशोभित होने लगे ॥ ५८ ॥ जिन्होंने अनन्तचतुष्टयरूप विशाल तथा निर्मल लक्ष्मी प्राप्त की है, जिन्होंने शरीररहित मोक्षलक्ष्मीका साक्षात्कार किया है, जिन्होंने अपने शरीरकी प्रभासे सूर्यको पराजित कर दिया है, जो पहले इस पृथिवी पर विमलवाहन राजा हुए थे, फिर अहमिन्द्र हुए और तदनन्तर जिन्होंने पञ्च-कल्याणक लक्ष्मीका आलिंगन प्राप्त किया ऐसे श्री संभवनाथ स्वामी तुम सबका कल्याण करें ॥५६॥
इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, भगवद्गुणभद्राचार्य के द्वारा प्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराणके संग्रहमें संभवनाथ तीर्थकरका पुराण वर्णन करनेवाला उनचासवां पर्व पूर्ण हुआ ।
पर्व 50
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आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena