श्री वासुपूज्य जिनेन्द्र, द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण का वर्णन पर्व 58 – श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 53 | श्लोक 54 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111
English translation of Uttar Puran parv 58- shlok 112 to 121
श्लोक ( Shlok ) 112
बालवबेलया वेलां तत्सेनां निजसेनया । न्यरौत्सीज्जलनिःसारामचलो ऽप्यचलस्थितिः ॥ ११२ ॥
जिस प्रकार कोई पर्वत जलकी लहर-को अनायास ही रोक देता है उसी प्रकार पर्वतके समान स्थिर रहनेवाले अचलने अपनी सेनाके द्वारा उसकी निःसार सेनाको अनायास ही रोक दिया था ॥ ११२ ॥
Just as a mountain effortlessly checks the advance of surging waters, so too did Acala, steadfast as a mountain, easily halt Tāraka’s insubstantial army by means of his own forces. ॥ 112 ॥
श्लोक ( Shlok ) 113
द्विपृष्ठो मत्तमातङ्ग सिंहपोत इवोद्धतः । ‘पराक्रमैकसाहाय्यादाक्रमद् बलिनं द्विषम् ॥ ११३ ॥
जिस प्रकार सिंहका बच्चा मत्त हाथीके ऊपर आक्रमण करता है उसी प्रकार उद्धत प्रकृतिवाले द्विपृष्ठने भी एक पराक्रमकी सहायता-से ही बलवान् शत्रु पर आक्रमण कर दिया ॥ ११३ ॥
Just as a lion-cub springs fearlessly upon a rut-maddened elephant, so too did Dviṣpṛṣṭha, possessed of a fiercely valiant nature, assail the mighty foe relying solely upon his own prowess. ॥ 113 ॥
श्लोक ( Shlok ) 114
तारकोऽपि चिरं युद्ध्वा तं निराकर्तुमक्षमः । श्रामयित्वाऽक्षिपञ्चक्रं यमचक्रमिवात्मनः ॥ ११४ ॥
तारकने यद्यपि चिरकाल तक युद्ध किया पर तो भी वह द्विष्पृष्ठको पराजित करनेमें समर्थ नहीं हो सका। अन्तमें उसने यमराज के चक्रके समान अपना चक्र घुमाकर फेंका ॥ ११४ ॥
Although Tāraka fought for a long time, he was nevertheless unable to overpower Dviṣpṛṣṭha Nārāyaṇa. At last, he whirled and hurled forth his discus, dreadful as the wheel of Yama, the lord of death. ॥ 114 ॥
श्लोक ( Shlok ) 115
तत्परीत्य स्थितं बाहौ दक्षिणे दयितश्रियः । तस्यासौ तेन चक्रेण नरकं तमजीगमत् ॥ ११५ ॥
वह चक्र द्विपृष्ठकी प्रदक्षिणा देकर उस लक्ष्मीपतिकी दाहिनी भुजा पर स्थिर हो गया और उसने उसी चक्रसे तारकको नरक भेज दिया ।। ११५ ॥
That discus, having circumambulated Dviṣpṛṣṭha Nārāyaṇa in reverence, came to rest upon the right arm of that lord of fortune; and with that very discus he dispatched Tāraka to hell. ॥ 115 ॥
श्लोक ( Shlok ) 116
द्विपृष्ठः सप्तसद्रत्नस्त्रिखण्डेशस्तदाभवत् । अचलो बलदेवोऽभूत्प्राप्तरत्नचतुष्टयः ॥ ११६ ॥
उसी समय द्विपृष्ठ, सात उत्तम रत्नोंका तथा तीन खण्ड पृथिवीका स्वामी हो गया और अचल बलभद्र बन गया तथा चार रत्न उसे प्राप्त हो गये ॥ ११६ ॥
At that very moment, Dviṣpṛṣṭha Nārāyaṇa became the sovereign lord of the seven supreme jewels and of the earth divided into three regions; while Acala attained the status of Balabhadra and obtained the four exalted jewels pertaining thereto. ॥ 116 ॥
श्लोक ( Shlok ) 117
कृत्वा दिग्विजयं जित्वा प्रतीपाख्यातभूभृतः । नत्वा श्रीवासुपूज्येशं प्रविश्य पुरमात्मनः ॥ ११७ ॥
दोनों भाइयोंने शत्रु राजाओंको जीतकर दिग्विजय किया और श्री वासुपूज्य स्वामीको नमस्कार कर अपने नगरमें प्रवेश किया ।॥ ११७ ॥
The two brothers, having conquered the hostile kings and completed their digvijaya, bowed in reverence to Vāsupūjya Svāmī and thereafter entered their city in triumph. ॥ 117 ॥
श्लोक ( Shlok ) 118
चिरं त्रिखण्डसाम्राज्यं विधाय विविधैः सुखैः । द्विपृष्ठः कालनिष्ठायामवधिष्ठानमाश्रितः ॥ ११८ ॥
चिरकाल तक तीन खण्डका राज्य कर अनेक सुख भोगे । आयुके अन्त में मरकर द्विपृष्ठ सातवें नरक गया ॥ ११८ ॥
After ruling the three divisions of the earth for a long time and enjoying innumerable pleasures, Dviṣpṛṣṭha, at the end of his lifespan, died and was reborn in the seventh hell. ॥ 118 ॥
श्लोक ( Shlok ) 119
अचलोऽपि तदुद्वेगाद्वासुपूज्यजिनाश्रयात् । सम्प्राप्य संयमं मोक्षलक्ष्म्या सङ्गममीयिवान् ॥ ११९ ॥
भाईके वियोगसे अचलको बहुत शोक हुआ जिससे उसने श्रीवासुपूज्य स्वामीका आश्रय लेकर संयम धारण कर लिया तथा मोक्ष-लक्ष्मीके साथ समागम प्राप्त किया ।॥ ११९ ॥
Overwhelmed with profound sorrow at the separation from his brother, Acala sought refuge in Vāsupūjya Svāmī, embraced the life of ascetic restraint, and ultimately attained union with the goddess of liberation itself. ॥ 119 ॥
श्लोक ( Shlok ) 120
पुण्यैकबीजमवलम्ब्य महीमिवाप्य लब्धोदयौ सममुपार्जितसत्स्वरूपौ । एकोऽगमत् फलितुमङ्कुरवत् किलोद्ध्वं पापी परो विफलमूलसमस्त्वधस्तात् ॥ १२० ॥
उन दोनों भाइयोंने किसी पुण्यका बीज पाकर तीन खण्डकी पृथिवी पाई, अनेक विभूतियाँ पाईं और साथ ही साथ उत्तम पद प्राप्त किया परन्तु उनमेंसे एक तो अंकुरके समान फल प्राप्त करनेके लिए ऊपरकी ओर (मोक्ष) गया और दूसरा पापसे युक्त होनेके कारण फलरहित जड़के समान नीचेकी ओर (नरक) गया ॥ १२० ॥
Those two brothers, having obtained the seed of merit, attained dominion over the three divisions of the earth, acquired manifold splendours, and together reached exalted stations. Yet of the two, one—like a sprouting seed destined to bear fruit—rose upward toward liberation; while the other, tainted by sin, descended downward like a barren root devoid of fruit, into hell. ॥ 120 ॥
श्लोक ( Shlok ) 121
इदमिति विधिपाकाद् वृत्तमस्मिन् द्विपृष्ठे परिणतमचले च प्रत्यहं चिन्तयित्वा । विपुलमतिभिरायेंः कार्यमुत्सृज्य पापं सकलसुखनिधानं पुण्यमेव प्रतीपम् ॥ १२१ ॥
इस प्रकार द्विपृष्ठ तथा अचलका जो भी जीवन-वृत्त घटित हुआ है वह सब क्रर्मो-दयसे ही घटित हुआ है ऐसा विचार कर विशाल बुद्धिके धारक आर्य पुरुषोंको पाप छोड़कर उसके विपरीत समस्त सुखोंका भंडार जो पुण्य है वही करना चाहिए ॥ १२१ ॥
Thus, reflecting that the entire course of the lives of Dviṣpṛṣṭha and Acala unfolded solely through the fruition of कर्म, noble men endowed with expansive wisdom ought to renounce sin and instead cultivate merit, which is the very treasury of all felicity. ॥ 121 ॥
श्लोक 122 से 124
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