शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्तीका पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 245 से 254 | श्लोक 255 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 293 | श्लोक 294 से 301
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 63- shlok 302 to 311
श्लोक ( Shlok ) 302
गर्भान्वयक्रियाः पूर्व ततो दीक्षान्वयक्रियाः । कर्मान्वयक्रियाश्चान्या स्तत्सङ्ख्याश्चानु तत्त्वतः ॥३०२॥
उन्होंने कहाकि ‘श्रावकोंकी क्रियाएँ गर्भान्वय, दीक्षान्वय और क्रियान्वयकी अपेक्षा तीन प्रकारकी हैं इनकी संख्या इस प्रकार है ।। ३०२ ॥
“He (Tirthankara Ghanaratha) said, ‘The ritual practices and duties of lay disciples (shravakas) are of three types based on their lineage and initiation: Garbhanvaya (conception/birth lineage), Dikshanvaya (initiation/ascetic lineage), and Kriyanvaya (ritual/conduct lineage). Their specific numbers are as follows…'”302
श्लोक ( Shlok ) 303
गर्माधानादिनिर्वाणपर्यन्ताः प्रथमक्रियाः । प्रोक्ताः ‘प्राक्तास्निपञ्चाशत्सम्यग्दर्शनशुद्धिषु ॥ ३०३ ॥
पहली गर्भान्वय क्रियाएँ गर्भाधानको आदि लेकर निर्वाण पर्यन्त होती हैं इनकी संख्या त्रेपन है, ये सम्यग्दर्शनकी शुद्धताको धारण करनेवाले जीवोंके होती हैं तथा इनका वर्णन पहले किया जा चुका है ।। ३०३ ॥
“The first category, the Garbhanvaya rituals, begins with conception and continues all the way until liberation (Nirvana). They number fifty-three in total, are performed by souls who possess pure right-belief (Samyagdarshana), and have already been described previously.” 303
श्लोक ( Shlok ) 304
दीक्षान्वयक्रियाश्चाष्टचत्वारिंशत् प्रकीर्तिता । अवतारादिक २ निर्वृत्यन्ता निर्वाणसाधिकाः ॥ ३०४॥
अवतारसे लेकर निर्वाण पर्यन्त होनेवाली दीक्षान्वय क्रियाएँ अड़तालीस कही गई हैं। ये मोक्ष प्राप्त कराने वाली हैं ॥ ३०४ ॥
“The Dikshanvaya rituals, which span from spiritual descent (Avatara) all the way until liberation (Nirvana), are said to number forty-eight. These are the practices that lead to the attainment of final liberation (Moksha).”304
श्लोक ( Shlok ) 305 – 306
सद्गृहि त्वादिसिद्धयन्ताः सप्त कर्त्रन्वयक्रियाः । सम्यक् स्वरूपमेतासां विधानं फलमप्यदः ॥३०५॥ तमुपासकसद्धर्म श्रुत्वा घनरथोदितम् । नत्वा मेघरथो भक्त्या मुक्त्यै शान्तान्तरङ्गकः ॥ ३०६ ॥
और सद्गृहित्वको आदि लेकर सिद्धि पर्यन्त सात कर्त्रन्वय क्रियाएँ हैं। इन सबका ठीक-ठीक स्वरूप यह है, करनेकी विधि यह है तथा फल यह है। इस प्रकार घनरथ तीर्थंकरने विस्तारसे इन सब क्रियाओंका वर्णन किया । इस तरह राजा मेघरथने घनरथ तीर्थंकरके द्वारा कहा हुआ श्रावक धर्मका वर्णन सुन कर उन्हें भक्ति-पूर्वक नमस्कार किया और मोक्ष प्राप्त करनेके लिए अपने हृदयको अत्यन्त शान्त बना लिया ॥ ३०५-३०६ ॥
“And starting from the adoption of righteous household life (Sadgrihitatva) all the way until final perfection (Siddhi), there are seven Kartranvaya (or Kriyanvaya) rituals. Tirthankara Ghanaratha described all these practices in great detail—explaining their true nature, the exact method of performing them, and their spiritual fruits.
Having thus listened to the description of the lay practitioner’s dharma (Shravaka Dharma) expounded by Tirthankara Ghanaratha, King Megharatha bowed to him with deep devotion and made his heart profoundly tranquil in order to attain ultimate liberation (Moksha).”305 – 306
श्लोक ( Shlok ) 307 -311
शरीरभोगसंसारवौः स्थित्यं चिन्तयन्मुहुः । संयमाभिमुखो राज्ये तिष्ठत्यनुजमादिशत् ॥ ३०७ ॥त्वया राज्यस्य यो दोषो दृष्टोऽदशि मयाऽप्यसौ । त्याज्यं तच्चेद् गृहीत्वाऽपि प्रागेवाग्रहणं वरम्॥ ३०८ ॥ प्रक्षालनाद्धि पक्ङ्कस्य दूरादस्पर्शनं “वरम् । इति तस्मिस्तदादानविमुखत्वमुपागते ॥ ३०९ ॥ सुताय मेघसेनाय दत्त्वा राज्यं यथाविधि । सहखैः सप्तभिः सार्द्ध सानुजो जगतीपतिः ॥ ३१० ॥ नृपैः दीक्षां समादाय क्रमादेकादशाङ्गवित् । प्रत्ययास्तीर्थकृत्नाम्नः षोडशैतान भावयत् ॥ ३११ ॥
शरीर, भोग और संसारकी दुर्दशाका बार-बार विचार करते हुए वे संयम धारण करनेके सम्मुख हुए। उन्होंने छोटे भाई दृढ़रथसे कहा कि तुम राज्य पर बैठो। परन्तु दृढ़रथने उत्तर दिया कि आपने राज्यमें जो दोष देखा है वही दोष मैं भी तो देख रहा हूँ। जब कि यह राज्य ग्रहण कर बादमें छोड़नेके ही योग्य है तब उसका पहलेसे ही ग्रहण नहीं करना अच्छा है। लोकमें कहावत है कि कीचड़को धोनेकी अपेक्षा उसका दूरसे ही स्पर्श नहीं करना अच्छा है। ऐसा कह कर जब दृढ़रथ राज्य ग्रहण करनेसे विमुख हो गया तब उन्होंने मेघसेन नामक अपने पुत्रके लिए विधिपूर्वक राज्य दे दिया और छोटे भाई तथा सात हजार अन्य राजाओंके साथ दीक्षा धारण कर ली। वे क्रम-क्रमसे ग्यारह अङ्गके जानकार हो गये। उसी सयम उन्होंने तीर्थकर नामकर्मके बन्धमें कारणभूत निम्नांकित सोलह कारण भावनाओंका चिन्तवन किया ॥ ३०७-३११॥
“Constantly contemplating the miserable nature of the physical body, sensory pleasures, and the cycle of worldly existence (Samsara), he (King Megharatha) turned his mind toward embracing self-restraint (Samyama). He said to his younger brother, Dridharatha, ‘You must ascend the throne.’
However, Dridharatha replied, ‘The very flaws you have seen in the kingdom, I see them too. Since this kingdom is bound to be abandoned later anyway, it is better not to accept it in the first place. As the worldly proverb goes: Instead of washing off mud, it is far better not to touch it from a distance at all.‘
Saying this, when Dridharatha refused to accept the kingdom, the king formally and systematically handed over the kingdom to his son named Meghasena. He then took the vows of ascetic initiation (Diksha) along with his younger brother and seven thousand other kings. Gradually, he became well-versed in the eleven limbs of the sacred scriptures (Angas). At that very time, he meditated upon the following sixteen reflections (Solah Karana Bhavanas), which are the binding causes for the Tirthankara Nama-Karma (the karma that leads to becoming a Tirthankara).”307 -311
श्लोक 312 से 321
उत्तरपुराण Uttarapurana home page –
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130
अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 82 | श्लोक 83 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 |श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 283 | श्लोक 284 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 |श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 363 | श्लोक 364 से 371 | श्लोक 372 से 382 | श्लोक 383 से 390 | श्लोक 391 से 401 | श्लोक 402 से 411 | श्लोक 412 से 421 | श्लोक 422 से 433 | श्लोक 434 से 442 | श्लोक 443 से 451 | श्लोक 452 से 462 | श्लोक 463 से 472 | श्लोक 473 से 481 | श्लोक 482 से 491 | श्लोक 492 से 501 | श्लोक 502 से 513
शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्तीका पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 |श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 102 | श्लोक 103 से 114 | श्लोक 115 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 244 | श्लोक 245 से 254 | श्लोक 255 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 293 | श्लोक 294 से 301
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