अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
English translation of Uttar Puran parv 62- shlok 222 to 231
श्लोक ( Shlok ) 222
सप्तमेऽहनि यक्षस्य प्रतिमायां महाध्वनिः । न्यपतनिष्ठुरं मूत्रिं सहसा भीषणोऽशनिः ॥ २२२ ॥
सातवें दिन उस यक्षकी मूर्ति पर बड़ा भारी शब्द करता हुआ भयंकर वज्र अकस्मात् बड़ी कठोरतासे आ पड़ा ।। २२२ ।।
“On the seventh day, making a tremendously loud crash, a terrifying thunderbolt suddenly and violently struck down directly upon that statue of the Yaksha. || 222 ||”
श्लोक ( Shlok ) 223
तस्मिन्नुपङ्गवे शान्ते प्रमोदात्पुरवासिनः । वर्द्धमानानकध्वानैरकुर्वन्नुत्सर्व परम् ॥ २२३ ॥
उस उपद्रव-के शान्त होने पर नगरवासियोंने बड़े हर्षसे बढ़ते हुए नगाड़ोंके शब्दोंसे बहुत भारी उत्सव किया ।। २२३ ।।
“Once that calamity had subsided, the townspeople celebrated a massive festival with immense joy, accompanied by the ever-increasing crescendo of beating drums. || 223 ||”
श्लोक ( Shlok ) 224
नैमितिकं समाहृय राजा सम्पूज्य दत्तवान् । तस्मै ग्रामशतं पद्मिनीखेटेन ससम्मदः ॥ २२४ ॥
राजाने बड़े हर्षके साथ उस निमित्तज्ञानीको बुलाकर उसका सत्कार किया और पद्मिनी-खेटके साथ-साथ उसे सौ गाँव दिये ॥ २२४ ॥
“With great joy, the king summoned that astrologer (seer of omens), honored him with deep respect, and granted him a hundred villages along with the town of Padmini-Kheta. || 224 ||”
श्लोक ( Shlok ) 225 – 226
विधाय विधिवद्भक्त्या शान्तिपूजापुरस्सरम् । महाभिषेकं लोकेशामर्हतां सचिवोरामाः ॥ २२५ ॥ अष्टापदमयैः कुम्भैरभिषिच्य महीपतिम् । सिंहासनं समारोप्य सुराज्ये प्रत्यतिष्ठपत् ॥ २२६ ॥
श्रेष्ठ मंत्रियोंने तीन लोकके स्वामी अरहन्त भगवान्-की विधि-पूर्वक मक्तिके साथ शान्तिपूजा की, महाभिषेक किया और राजाको सिंहासन पर बैठा कर सुर्वणमय कलशोंसे उनका राज्याभिषेक किया तथा उत्तम राज्यमें प्रतिष्ठित किया ।। २२५-२२६ ।।
“With profound and methodically performed devotion, the noble ministers offered prayers for peace (Shanti-Puja) and conducted the grand anointment (Mahabhisheka) of Lord Arihant, the Master of the Three Worlds. Then, seating the king upon the royal throne, they performed his coronation (Rajyabhisheka) by pouring water from golden pitchers, re-establishing him gloriously over his excellent kingdom. || 225-226 ||”
श्लोक ( Shlok ) 227 – 230
एवं सुखसुखेनैव काले गच्छति सोऽन्यदा । विद्यां स्वमातुरादाय संसाध्याकाशगामिनीम् ॥ २२७ ॥ सुतारया सह ज्योतिर्वनं गत्वा रिरंसया । यथेष्टं विहरंस्तत्र सलीलं कान्तया स्थितः ॥ २२८ ॥ इतश्चमरचञ्चाख्यपुरेशोऽशनिघोषकः । आसुर्याश्च सुतो लक्ष्म्या महानिन्द्राशनेः खगः ॥ २२९ ॥ विद्यां स भ्रामरीं नाना प्रसाध्यायान्पुरं स्वकम् । सुतारां वीक्ष्य जातेच्छस्वामादातुं कृतोद्यमः ॥२३०॥
इसके बाद उसका काल बहुत भारी सुखसे बीतने लगा। किसी एक दिन उसने अपनी मातासे आकाशगामिनी विद्या लेकर सिद्ध की और सुताराके साथ रमण करनेकी इच्छाले ज्योतिर्वनकी ओर गमन किया। वह वहाँ अपनी इच्छानुसार लीला-पूर्वक विहार करता हुआ रानीके साथ बैठा था, यहाँ चमरचंचपुरका राजा इन्द्राशनि, रानी आसुरीका लक्ष्मीसम्पन्न अशनिघोष नामका विद्या-धरपत्र भ्रामरी विद्याको सिद्ध कर अपने नगरको लौट रहा था। बीचमें सुताराको देख कर उसपर उसकी इच्छा हुई और उसे हरण करनेका उद्यम करने लगा ।। २२७-२३० ।।
“Thereafter, his time began to pass in immense happiness. One day, he acquired the Akashgamini Vidya (the mystical lore of flying through the air) from his mother, mastered it, and set out toward the Jyotirvan forest with the desire to enjoy the company of Sutara. While he sat there with the queen, strolling and sporting delightfully according to his wishes, Ashanighosh—the glorious Vidyadhara prince born to King Indrashani and Queen Asuri of Chamar-Chanchapur—was returning to his city after mastering the Bhramari Vidya. Catching sight of Sutara along the way, he was struck with desire for her and made an attempt to abduct her. || 227-230 ||”
श्लोक ( Shlok ) 231
कृत्रिमैणच्छलात्तस्मादपनीय महीपतिम् । तद्रूपेण निवृत्यैत्य सुतारां दुरिताशयः ॥ २३१ ॥
उसने एक कृत्रिम हरिण-के छलसे राजाको सुताराके पाससे अलग कर दिया और वह दुष्ट श्रीविजयका रूप बनाकर सुतारा-के पास लौट कर वापिस आया ।। २३१ ।।
“By means of a deceptive trick involving an artificial/illusory deer, he lured the king away from Sutara’s side; then, that wicked person assumed the form of Shrivijaya and returned to Sutara. || 231 ||”
श्लोक 232 से 240
उत्तरपुराण Uttarapurana home page –
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85
धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 |श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 130
अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 82 | श्लोक 83 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 |श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
Download PDF
आदिपुराण उत्तरपुराण हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 | उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 |पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 |
आदिपुराण उत्तरपुराण सारांश
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 |पर्व 54 | पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 |