राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 104 | श्लोक 105 से 123 | श्लोक 124 से 132 | श्लोक 133 से 141
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 142 to 151
श्लोक ( Shlok ) 142
वैराज्यपरिवारो वा मृगरूपः सशावकः । क्वाप्य ‘लब्धाश्रयस्तप्तो भ्राम्यतीतस्ततोऽपि च ॥ १४२ ॥
शत्रु राजाओंके परिवारोंके समान इन बच्चों सहित हरिणोंको कहीं भी आश्रय नहीं मिल रहा है इसलिए ये सन्तप्त होकर इधर-उधर घूम रहे हैं ॥ १४२ ॥
“Just like the families of defeated enemy kings, these deer along with their fawns are finding no shelter anywhere; therefore, being deeply distressed by the scorching heat, they are wandering aimlessly here and there.” (142)
श्लोक ( Shlok ) 143
इति चेतोहरैः सीतां मोदयन् स त्तया सह । शचीदेव्येव देवेशः कृत्वा वनविनोदनम् ॥ १४३ ॥
इस प्रकार चित्त हरण करनेवाले शब्दोंसे सीताको प्रसन्न करते हुए रामचन्द्र, इन्द्राणीके साथ इन्द्रके समान, सीताके साथ वन-क्रीडा करने लगे ॥ १४३ ॥
“In this way, delighting Sita with words that captivate the heart, Ramachandra continued to sport with her in the forest, appearing just like Lord Indra with his consort Indrani.” (143)
श्लोक ( Shlok ) 144
किञ्चित् खिन्नामिवालक्ष्य तां जलाशयमासदत् । तत्र सिञ्चन् प्रियां शीतैर्यन्त्रमुक्क्रपयःकणैः ॥ १४४ ॥
रामचन्द्र सीताको कुछ खेद-खिन्न देख सरोवरके पास पहुँचे और सीताको यन्त्रसे छोड़ी हुई जलकी ठण्डी बूँदोंसे सींचने लगे ॥ १४४ ॥
“Noticing that Sita was appearing somewhat exhausted and weary from the heat, Ramachandra approached a lake and began to sprinkle her with cool droplets of water released from a mechanical fountain device (Yantra).” (144)
श्लोक ( Shlok ) 145
ईषग्निमीलितालोलनयनेन्दीवरोज्ज्वलम् । तद्वक्त्रकमलं पश्यनसावल्पं तदातुषत् ॥ १४५ ॥
उस समय कुछ-कुछ बन्द हुए चञ्चल नेत्ररूपी नीलकमलोंसे ‘उज्ज्वल सीताका मुख-कमल देखते हुए रामचन्द्रजी बहुत कुछ सन्तुष्ट हुए थे ॥ १४५ ॥
“At that moment, gazing upon Sita’s radiant, lotus-like face—with her restless, blue-lotus-like eyes now softly and partially closed—Ramachandraji felt immensely delighted and content.” (145)
श्लोक ( Shlok ) 146
२वक्षोदम्न्नमसौ वारि प्राविशत्सस्मितां प्रियाम् । परिरम्भोत्सुकां विद्वान् रङ्गितज्ञा हि नागराः ॥ १४६ ॥
वे बुद्धिमान् राम-चन्द्रजी आलिङ्गन करनेमें उत्सुक तथा मन्द हास्य करती हुई सीताके समीप छाती तक पानी में घुस् -गये थे सो ठीक ही है क्योंकि चतुर मनुष्य इशारोंको अच्छी तरह समझते हैं ।। १४६ ।।
“The wise Ramachandra—seeing Sita smiling softly and eager for an embrace—entered the water until it reached his chest to be near her. And it is rightly said: those who are clever and discerning understand subtle hints and gestures perfectly.” (146)
श्लोक ( Shlok ) 147
भ्रमराः कञ्जकं मुक्त्वा कान्तास्याब्जेऽपतन्समम् । तैराकुलीकृतां दृष्ट्वा खेदी ह्लादी च सोऽभवत् ॥१४७॥
वहाँ बहुतसे भ्रमर कमल छोड़कर एक साथ सीताके मुखकमल पर आ झपटे उनसे वह व्याकुल हो उठी। यह देख रामचन्द्रजी कुछ खिन्न हुए तो कुछ प्रसन्न भी हुए ॥ १४७ ॥
“There, leaving the lotuses behind, a swarm of black bees rushed all at once toward Sita’s lotus-like face, making her highly distressed and agitated. Seeing this, Ramachandraji felt somewhat dismayed, yet he also felt quite pleased.” (147)
श्लोक ( Shlok ) 148
एवं जले चिरं अरन्त्वा तत्रापूर्य मनोरथम् । सान्तःपुरो वने रम्यप्रदेशे स्थितिमाव्रजत् ॥ १४८ ॥
इस तरह जलमें चिर-काल तक क्रीड़ा कर और मनोरथ पूर्ण कर रामचन्द्रजी अपने अन्तःपुरके साथ वनके किसी रमणीय स्थानमें जा बैठे ।। १४८ ॥
“In this manner, having sported in the water for a long time and fulfilled their hearts’ desires, Ramachandraji, accompanied by the members of his inner court (Antahpura), went and seated himself in a beautiful, enchanting spot in the forest.” (148)
श्लोक ( Shlok ) 149
तदा सूर्पणखागत्य तयोर्नृपतनूजयोः । वीक्ष्यमाणाऽतुलां लक्ष्मींमनुरक्ता सविस्मयम् ॥ १४९ ॥
उसी समय वहाँ शूर्पणखा आई और दोनों राजकुमारोंकी अनुपम शोभाको बड़े आश्चर्यके साथ देखती हुई उन पर अनुरक्त हो गई ॥ १४९ ॥
“At that very moment, Shurpanakha arrived there, and as she gazed upon the incomparable and matchless splendor of the two princes with immense wonder, she became deeply infatuated with them.” (149)
श्लोक ( Shlok ) 150 – 151
प्रभूतप्रसवानभ्रक स्राशोकमहीरुहः । अधस्थां सुस्थितां सीतां हरिन्मणिशिलातले ॥ १५० ॥वनलक्ष्मीमिवालोक्य भूष्यमाणां सखीजनैः । युक्तमेव खगेशस्य प्रेमास्यामिति वादिनी ॥ १५१ ॥
उस समय सीता बहुत-भारी फूलोंके भारसे झुके हुए किसी सुन्दर अशोक वृक्षके नीचे हरे मणिके शिला-तल पर बैठी हुई थी, आस-पास बैठी हुई सखियाँ उसकी शोभा बढ़ा रही थीं जिससे वह वन-लक्ष्मीके समान जान पड़ती थी, उसे देख शूर्पणखा कहने लगी कि इसमें रावणका प्रेम होना ठीक ही है ।।१५०-१५१॥
“At that time, Sita was seated upon a slab of emerald-like green stone beneath a beautiful Ashoka tree, which was bending under the immense weight of its abundant blossoms. Surrounded by her companions who enhanced her splendor, she looked exactly like the Goddess of the Forest (Vana-Lakshmi). Gazing upon her, Shurpanakha began to say to herself, ‘It is completely justified and fitting for Ravana to be deeply in love with her.'” (150-151)
श्लोक 152 से 163
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