शीतल पुराण का वर्णन पर्व 56 – श्लोक 1 से 11
English translation of Uttar Puran parv 56- shlok 12 to 22
श्लोक ( Shlok ) 12
‘स सुखेप्सुर्वसन्तश्रीविवशीकृतमानसः । तया विवृद्धसम्प्रीतिराक्रीडति निरन्तरम् ॥ १२ ॥
जिसका मन वसन्त-लक्ष्मीने अपने अधीन कर लिया है तथा जो अनेक सुख प्राप्त करना चाहता है ऐसा वह राजा प्रीतिको बढ़ाता हुआ उस वसन्तलक्ष्मीके साथ निरन्तर क्रीड़ा करने लगा ।। १२ ।।
“That King, whose mind was completely captivated by the Beauty of Spring and who yearned for manifold pleasures, began to sport incessantly with her, increasing his delight as he surrendered to the season’s charm.”12
श्लोक ( Shlok ) 13
सापि कालानिलोद्भूता घनाली वा व्यलीयत । तदपायसमुद्भूतशोकव्याकुलिताशयः ॥ १३ ॥
परन्तु जिस प्रकार वायुसे उड़ाई हुई मेघमाला कहीं जा छिपती है उसी प्रकार कालरूपी वायुसे उड़ाई वह वसन्त ऋतु कहीं जा छिपी – नष्ट हो गई और उसके नष्ट होनेसे उत्पन्न हुए शोकके द्वारा उसका चित्त बहुत ही व्याकुल हो गया ॥ १३ ॥
“But just as a bank of clouds driven by the wind vanishes into hiding, so too did the Season of Spring, blown away by the ‘Wind of Time,’ disappear and perish. Upon its passing, the King’s mind became deeply overwhelmed by the resulting grief.”13
श्लोक ( Shlok ) 14
कामो नाम खलः कोऽपि तापयत्यखिलं जगत् । पापी सकलचित्तस्थो विग्रही *विग्रहाद्विना ॥ १४ ॥
वह विचार करने लगा कि यह काम बड़ा दुष्ट है, यह पापी समस्त संसारको दुःखी करता है, सबके चित्तमें रहता है और विग्रह-शरीर रहित होनेपर भी विग्रही- शरीरसहित (पक्षमें उपद्रव करनेवाला) है ॥ १४ ॥
“He began to reflect: ‘This Desire is truly wicked; this sinner brings sorrow to the entire world. Though he dwells within the hearts of all and remains bodiless (Ananga), he is yet the cause of great strife and personified affliction (Savigraha).'”14
श्लोक ( Shlok ) 15 – 16
तं ध्यानानलनिर्दग्धमथैव विदधाम्यहम् । इत्याविर्भूतवैराग्यश्चन्दने निजनन्दने ॥ १५ ॥राज्यभारं समारोप्य मुनिमानन्दनामकम् । सम्प्राप्य सर्वसङ्गाङ्गवैमुख्यं स समीयिवान् ॥ १६ ॥
मैं उस कामको आज ही ध्यानरूपी अग्निके द्वारा भस्म करता हूँ। इस प्रकार उसे वैराग्य उत्पन्न हुआ । वह चन्दन नामक पुत्रके लिए राज्यका भार सौंपकर आनन्द नामक मुनिराजके समीप पहुँचा और समस्त परिग्रह तथा शरीरसे विमुख हो गया ।। १५-१६ ॥
” ‘This very day, I shall incinerate that Desire with the fire of meditation!’ Thus, a deep sense of detachment (Vairagya) took root within him. Entrusting the burden of the kingdom to his son, named Chandana, he sought the presence of the great sage Anand; there, he turned his back on all worldly possessions and even his own physical form.”15 – 16
श्लोक ( Shlok ) 17 – 18
विपाकसूत्रपर्यन्तसकलाङ्गधरः शमी । स्वीकृत्य तीर्थकृत्नाम विधाय सुचिरं तपः ॥ १७ ॥सम्प्राप्य जीवितस्यान्तं त्रिधाराधनसाधनः । आरणाख्येऽभवत्कल्पे सुरेन्द्रो “रुन्द्रवैभवः ॥ १८ ॥
शान्त परिणामोंको धारण करनेवाले उसने विपाकसूत्र तक सब अंगोंका अध्ययन किया, चिरकाल तक तपश्चरण किया, तीर्थकर नाम-कर्मका बन्ध किया, सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र इन तीन आराधनाओंका साधन किया तथा आयुके अन्त में वह समाधिमरण कर आरण नामक पन्द्रहवें स्वर्ग में विशाल वैभवको धारण करनेवाला इन्द्र हुआ ।।१७-१८॥
“Maintaining a state of profound inner peace, he mastered all the sacred scriptures (Angas), including the Vipaka Sutra. For a long duration, he performed intense penance and bound the Tirthankara Nama-Karma. By perfecting the three jewels—Right Faith, Right Knowledge, and Right Conduct—and practicing the holy death (Samadhi-marana) at the end of his life, he was reborn as the Indra of the fifteenth heaven, known as Arana, possessing immense splendor and majesty.”17 – 18
श्लोक ( Shlok ) 19 – 22
द्वाविंशत्यब्धिमानायुः हस्तत्रितयविग्रहः । शुक्ललेश्याद्वयो मासैः सदैकादशभिः श्वसन् ॥ १९ ॥द्वाविंशतिसहस्राब्दैर्मानसाहारतर्पितः । श्रीमान् मनःप्रवीचारः ‘प्राकाम्याद्यष्टधागुणः ॥ २० ॥प्राक्षष्ठनरकाद् व्याप्ततृतीयज्ञानभास्वरः । तत्प्रमाणबलस्तावत् प्रकाशतनुविक्रियः ॥ २१ ॥वीतबाह्यविकारो रुवरसौख्याब्धिपारगः । कलामिव किलासङ्ख्यामयमायुरजीगमत् ॥ २२ ॥
वहाँ उसकी आयु बाईस सागरकी थी, तीन हाथ ऊँचा उसका शरीर था, द्रव्य और भाव दोनों ही शुक्ल लेश्याएँ थी, ग्यारह माहमें श्वास लेता था, बाईस हजार वर्षमें मानसिक आहार लेकर संतुष्ट रहता था, लक्ष्मीमान् था, मानसिक प्रवीचारसे युक्त था, प्राकाम्य आदि आठ गुणोंका धारक था, छठवें नरकके पहले-पहले तक व्याप्त रहनेवाले अवधिज्ञानसे देदीप्य-मान था, उतनी ही दूर तक उसका बल तथा विक्रिया शक्ति थी और बाह्य-विकारोंसे रहित विशाल श्रेष्ठ सुखरूपी सागरका पारगामी था, इस प्रकार उसने अपनी असंख्यात वर्षकी आयुको कालकी कलाके समान-एक क्षणके समान बिता दिया ॥ १९-२२ ॥
“In that realm, his lifespan was twenty-two Sagaras and his body stood three cubits (haths) high. He possessed both physical and spiritual purity, characterized by the White Leshya (the highest state of soul-purity). He breathed only once every eleven months and remained satisfied by taking ‘mental food’ once every twenty-two thousand years.
Radiant with majesty, he possessed the power of mental procreation and was endowed with the eight supernatural powers, such as Prakamya (irresistible will). He shone with Avadhijnana (clairvoyance) that could perceive everything down to the sixth hell; his strength and transformative powers (Vikriya) extended just as far. Free from all external impurities, he traversed a vast ocean of supreme bliss. In this state, he passed his countless years of life as if they were but a single moment.” 19 – 22
श्लोक 23 से 31
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शीतल पुराण का वर्णन पर्व 56 – श्लोक 1 से 11
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