अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 284 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321
English translation of Uttar Puran parv 62- shlok 322 to 331
श्लोक ( Shlok ) 322
कालायुक्तचतुर्भेदप्रायोग्यप्रापणाचदा । सम्यक्षद्धानसंशुद्धः श्रावकव्रतभूषितः ॥ ३२२ ॥
ऊपर कही हुई कालादि चार लब्धियोंकी प्राप्तिसे उस समय उसने सम्यग्दर्शनसे शुद्ध होकर अपने आपको श्रावकोंके व्रतसे विभूषित किया ॥ ३२२ ॥
“Having attained the fourfold opportune conditions (Labdhis) starting with time (Kala) mentioned above, he became purified by Right Faith (Samyagdarshana) and adorned himself with the vows of a lay-disciple (Shravaka).” [322]
श्लोक ( Shlok ) 323 – 324
भगवन् किञ्चिदिच्छामि प्रष्टुमन्यच्च चेतसि । स्थितं मेऽशनिधोषोऽयं प्रभावं तन्वतोऽवयन् ॥ ३२३ ॥सुतारां मेऽनुजामेव हृतवान् केन हेतुना । इत्यब्राक्षीज्जिनेन्द्रोऽपि हेतुं तस्यैवमब्रवीत् ॥ ३२४ ॥
उसने भगवान से पूछा कि हे भगवन् ! मैं अपने चित्तमें स्थित एक दूसरी बात आपसे पूछना चाहता हूं। बात यह है कि इस अशनिघोषने मेरा प्रभाव जानते हुए भी मेरी छोटी बहिन सुताराका हरण किया है सो किस कारणसे किया है ? उत्तर में जिनेन्द्र भगवान् भी उसका कारण इस प्रकार कहने लगे ।। ३२३-३२४ ।।
“He asked the Lord, ‘O Worshipful One! There is another matter residing in my heart that I wish to ask You. The thing is, even though this Ashanighosha knew full well of my immense power and influence, he still abducted my younger sister Sutara. What could be the reason behind this?’ In response, the Holy Lord Jinendra began to narrate the cause as follows…'” [323-324]
श्लोक ( Shlok ) 325
जम्बूपलक्षिते द्वीपे विषये मगधाह्वये । अचलग्रामवास्तव्यो ब्राह्मणो धरणीजटः ॥ ३२५ ॥
जम्बूद्वीपके मगध देशमें एक अचल नामका ग्राम है। उसमें धरणीजट नामका ब्राह्मण रहता था ।। ३२५ ।।
“In the Magadha country of Jambudvipa, there is a village named Achala. A Brahmin named Dharanijata used to live there.” [325]
श्लोक ( Shlok ) 326 – 328
अग्निला गृहिणी तोकौ भूत्यन्तेद्राभिसंशकौ । कपिलस्तस्य दासेरस्तद्वेदाध्ययने स्वयम् ॥ ३२६ ॥वेदान्स सूक्ष्मबुद्धित्वादज्ञासीद् ग्रन्थतोऽर्थतः । तं ज्ञात्वा ब्राह्मणः क्रुद्ध्वा त्वयाऽयोग्यमिदं कृतम् ॥ ३२७॥इति दासीसुतं गेहात्तदैव निरजीगमत् । कपिलोऽपि विषण्णत्वात्तस्माद्रत्नं पुरं ययौ ॥ ३२८ ॥
उसकी स्त्रीका नाम अग्निला था और उन दोनोंके इन्द्रभूति तथा अग्निभूति नामके दो पुत्र थे। इनके सिवाय एक कपिल नाम दासीपुत्र भी था। जब वह ब्राह्मण अपने पुत्रोंकरे वेद पढ़ाता था तब कपिलको अलग रखता था परन्तु कपिल इतना सूक्ष्मबुद्धि था कि उसने अपने आप ही शब्द तथा अर्थ-दोनों रूपसे वेदोंको जान लिया था। जब ब्राह्मणको इस बातका पता चला तब उसने कुपित होकर ‘तूने यह अयोग्य किया’ यह कहकर उस दासी-पुत्रको उसी समय घरसे निकाल दिया । कपिल भी दुःखी होता हुआ वहाँ से रत्नपुर नामक नगर में चला गया ।। ३२६-३२८ ॥
“His wife’s name was Agnila, and the two of them had two sons named Indrabhuti and Agnibhuti. Apart from them, there was also a maidservant’s son named Kapila. Whenever that Brahmin taught the Vedas to his sons, he would keep Kapila aside; however, Kapila was so exceptionally sharp-witted that he mastered the Vedas—both their words and their underlying meanings—entirely on his own.
When the Brahmin found out about this, he became furious. Saying, ‘You have done something completely improper,’ he immediately threw the maidservant’s son out of the house. Filled with deep sorrow, Kapila left that place and went to a city named Ratnapura.” [326-328]
श्लोक ( Shlok ) 329
श्रुत्वाऽध्ययनसम्पन्न योग्यं तं वीक्ष्य सत्यकः । विप्रः स्वतनुजां जम्बूसमुत्पन्नां समर्पयत् ॥ ३२९ ॥
रत्नपुर में एक सत्यक नामक ब्राह्मण रहता था। उसने कपिलको अध्ययनसे सम्पन्न तथा योग्य देख जम्बू नामक स्त्रीसे उत्पन्न हुई अपनी कन्या समर्पित कर दी ॥ ३२९ ॥
“In Ratnapura, there lived a Brahmin named Satyaka. Seeing that Kapila was highly educated and well-accomplished in his studies, he gave him his daughter, born of his wife Jambu, in marriage.” [329]
श्लोक ( Shlok ) 330
स राजपूजितस्तत्र सर्वशास्त्रार्थसारवित् । व्याख्यामखण्डितां कुर्वन्ननयत्कतिचित्समाः ॥ ३३० ॥
इस प्रकार राजपूज्य एवं समस्त शास्त्रोंके सारपूर्ण अर्थके ज्ञाता कपिलने जिसको कोई खण्डन न कर सके ऐसी व्याख्या करते हुए रत्नपुर नगरमें कुछ वर्ष व्यतीत किये ॥ ३३० ॥
“In this manner, Kapila—who was revered by the king and possessed deep knowledge of the core essence of all scriptures—spent several years in the city of Ratnapura, providing irrefutable and unchallengeable expositions.” [330]
श्लोक ( Shlok ) 331
तस्य विप्रकुलायोग्यदुश्चरित्रविमर्शनात् । तद्भार्या सत्यभामाऽयं कस्येत्यायत्तसंशया ॥३३१ ॥
कपिल विद्वान् अवश्य था परन्तु उसका आचरण ब्राह्मण कुलके योग्य नहीं था अतः उसकी स्त्री सत्यभामा उसके दुश्चरितका विचार कर सदा संशय करती रहती थी कि यह किसका पुत्र है ? ॥ ३३१ ॥
“Although Kapila was certainly a learned scholar, his conduct was not befitting of the Brahmin lineage. Therefore, reflecting upon his bad character, his wife Satyabhama was always filled with doubt, constantly wondering, ‘Whose son is he really?'” [331]
श्लोक 332 से 341
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