शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्तीका पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 361 | श्लोक 362 से 371 | श्लोक 372 से 381 | श्लोक 382 से 393 | श्लोक 394 से 404
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 63- shlok 405 to 412
श्लोक ( Shlok ) 405
प्रसाधनविशेषाणामपि चैकं प्रसाधनम् । आचारपालनायैव भूषयित्वा विभूषणैः ॥ ४०५ ॥
यद्यपि भगवान् स्वयं उत्तमोत्तम आभूषणोंमेंसे एक आभूषण थे तथापि इन्द्रने केवल आचारका पालन करनेके लिए ही उन्हें आभूषणोंसे विभूषित किया था ।। ४०५ ।।
Although the Lord Himself was inherently the supreme jewel among all ornaments, Lord Indra adorned Him with magnificent jewels and decorations purely out of deference to established cosmic tradition. || 405 ||
श्लोक ( Shlok ) 406
‘सर्वशान्तिप्रदो देवः शान्तिरित्यस्तु नामभाक् । इति तस्याभिषेकान्ते नामासौ निरवर्तयत् ॥ ४०६ ॥
‘ये भगवान् सबको शान्ति देनेवाले हैं इसलिए ‘शान्ति’ इस नामको प्राप्त हों’ ऐसा सोच कर इन्द्रने अभिषेकके बाद उनका शान्तिनाथ नाम रक्खा ॥ ४०६ ॥
“This Lord shall bestow ultimate peace upon all living beings; therefore, He shall be known by the name ‘Shanti’ (Peace).” Reflecting thus, Lord Indra, upon completing the divine bath, bestowed the name Shantinatha upon the Lord. || 406 ||
श्लोक ( Shlok ) 407
प्रीत्या सुरवरैः सार्द्ध मन्दरादेत्य मन्दिरम् । जनन्याः सर्वमावेद्य जगदीशं समर्पयत् ॥ ४०७ ॥
तदनन्तर धर्मेन्द्र सब देवोंके साथ बड़े प्रेमसे सुमेरु पर्वतसे राजमन्दिर आया और मातासे सब समाचार कह कर उसने वे त्रिलोकीनाथ माताको सौंप दिये ।। ४०७॥।
Thereafter, Dharmendra, accompanied by all the celestial gods, returned from Mount Sumeru to the royal palace with deep affection, and after narrating the entire sequence of events to the queen-mother, he reverently placed the Lord of the Three Worlds back into her arms. || 407 ||
श्लोक ( Shlok ) 408
अनृत्यच्चोदितानन्दो बहुभावरसोदयः । सम्मदश्चेदमर्यादः सरागं कं न नर्तयेत् ॥ ४०८ ॥
जिसे आनन्द प्रकट हो रहा है तथा जिसके अनेक भावों और रसोंका उदय हुआ है ऐसे इन्द्रने नृत्य किया सो ठीक ही है क्योंकि जब हर्ष मर्यादाका उल्लंघन कर जाता है तो किस रागी मनुष्यको नहीं। नचा देता ? ॥ ४०८ ॥
Bursting with boundless joy, and experiencing a sudden, magnificent rising of diverse emotional expressions (Bhavas) and aesthetic sentiments (Rasas), Lord Indra danced with complete abandon. And it was only fitting—for when sheer ecstasy overflows and breaches the boundaries of restraint, what passionate soul will it not compel to dance? || 408 ||
श्लोक ( Shlok ) 409
लोकपालांस्त्रिलोकानां पालकस्य महात्मनः । बालकस्यास्य कल्पेशः पालकान्पर्यकल्पयत् ॥ ४०९ ॥
यद्यपि भगवान् तीन लोकके रक्षक थे तो भी इन्द्रने उन -बालक रूपधारी महात्माकी रक्षा करनेके लिए लोकपालोंको नियुक्त किया था ।। ४०९ ॥
Although the Lord Himself was the supreme protector of the three worlds, Lord Indra nevertheless appointed the Lokapalas (guardian deities) to guard that great soul who had manifested in the form of an infant child. || 409 ||
श्लोक ( Shlok ) 410
इति द्वितीयकल्याणसाकल्यसमनन्तरम् । सशक्राः सर्वगीर्वाणाः स्वं स्वमोकः समं ययुः ॥ ४१० ॥
इस प्रकार जन्मकल्याणकका उत्सव पूर्ण कर समस्त देव इन्द्रके साथ अपने-अपने स्थान पर चले गये ॥ ४१० ॥
Having thus completed the grand festivities of the Janma-Kalyanaka (the auspicious birth-festival), all the celestial gods, along with Lord Indra, returned to their respective heavenly abodes. || 410 ||
श्लोक ( Shlok ) 411 – 412
चतुर्विभक्तपल्योपमत्र्यंशोनत्रिसागरे । धर्मतीर्थस्य सन्ताने पल्यतुर्याशशेषिते ॥ ४११ ॥ व्युच्छिन्ने युक्तिसन्मार्गे तदभ्यन्तरजीवितः । शान्तिः समुदपाधानमन्नरामरनायकः ।। ४१२ ॥
धर्मनाथ तीर्थंकरके बाद पौन पल्य कम तीन सागर बीत जाने तथा पाव पल्य तक धर्मका विच्छेद हो लेनेपर जिन्हें मनुष्य और इन्द्र नमस्कार करते हैं ऐसे शान्तिनाथ भगवान् उत्पन्न हुए थे। उनकी आयु भी इसीमें सम्मिलित थी ।। ४११-४१२ ॥
After the era of Lord Dharmanatha Tirthankara, a vast cosmic span of three Sagaropamas minus three-quarters of a Palyopama ($3 \text{ Sagaras} – \frac{3}{4} \text{ Palya}$) elapsed—which included a spiritual dark age lasting one-quarter of a Palyopama ($\frac{1}{4} \text{ Palya}$) during which the true Dharma was completely interrupted—and then Lord Shantinatha, to whom both humans and Indras bow in deep reverence, manifested on this earth. The lifespan of Lord Shantinatha was also included within this total duration. || 411-412 ||
श्लोक 413 से 421
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 1 से 513
शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्तीका पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 |श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 102 | श्लोक 103 से 114 | श्लोक 115 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 244 | श्लोक 245 से 254 | श्लोक 255 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 293 | श्लोक 294 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 361 | श्लोक 362 से 371 | श्लोक 372 से 381 | श्लोक 382 से 393 | श्लोक 394 से 404
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