विमलनाथ तीर्थंकर, धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधरका वर्णन पर्व 59 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81
English translation of Uttar Puran parv 59- shlok 82 to 91
श्लोक ( Shlok ) 82 – 83
सुकेतुरिति सर्वस्वहानिशोकाकुलीकृतः । गत्वा सुदर्शनाचार्य पादमूलं श्रुतागमः ॥ ८२ ॥सद्यो निविंद्य संसारात्प्रव्रज्याप्यशुभाशयः । शोकादन्नं समुत्सृज्य तपोभिरतिदुष्करैः ॥ ८३ ॥
इस प्रकार सुकेतु जब अपना सर्वस्व हार चुका तब शोक से व्याकुल होकर सुदर्शनाचार्यके चरण-मूलमें गया। वहाँ उसने जिनागमका उपदेश सुना और संसारसे विरक्त होकर दीक्षा धारण कर ली। यद्यपि उसने दीक्षा धारण कर ली थी तथापि उसका आशय निर्मल नहीं हुआ था। उसने शोकसे अन्न छोड़ दिया और अत्यन्त कठिन तपञ्चरण किया ।। ८२-८३ ।।
When Suketu had lost everything in this manner, he became overwhelmed with grief and sought refuge at the feet of Sudarshanacharya. There, he listened to the teachings of the Jinagama (Jain scriptures) and, becoming detached from the world, accepted initiation (Diksha). However, even though he had taken the vows of a monk, his inner intent remained clouded and lacked purity. Driven by sorrow, he renounced food and performed extremely rigorous penance. [82-83]
श्लोक ( Shlok ) 84
दीर्घकालमलं तप्त्वा कलागुणविदग्धता । बलं चैतेन मे भूयात्तपसेत्यायुषः क्षये ॥ ८४ ॥
इस प्रकार दीर्घकाल तक तपञ्चरण कर उसने आयुके अन्तिम समयमें निदान किया कि इस तपके द्वारा मेरे कला, गुण, चतुरता और बल प्रकट हो ॥ ८४ ॥
Having performed penance in this manner for a long time, at the final moment of his life, he made a Nidana (a binding wish for future worldly reward): “By the power of this penance, may my arts, virtues, skill, and strength become manifest.” [84]
श्लोक ( Shlok ) 85
कृत्वा निदानं संन्यस्य लान्तवकल्पमास्थितः । तत्र दिव्यसुखं प्रापत्स चतुर्दशसागरम् ॥ ८५ ॥
ऐसा निदान कर वह संन्यास-मरणसे मरा तथा लान्तव स्वर्गमें देव हुआ। वहाँ चौदह सागर तक स्वर्गीय सुखका उपभोग करता रहा ।। ८५ ।।
Having made such a Nidana, he passed away through the rite of Sanyasa-marana and was reborn as a celestial being in the Lantava heaven. There, he continued to enjoy the pleasures of the heavenly realm for a duration of fourteen Sagaras. [85]
श्लोक ( Shlok ) 86
ततः सोऽप्यवतीर्यात्र भद्रस्यैव महीभुजः । बभूव पृथिवीदेव्यां स्वयम्भूः सूनुषु प्रियः ॥ ८६ ॥
वहाँ से चयकर इसी भरत क्षेत्रकी द्वारावती नगरीके भद्र राजाकी पृथिवी रानीके स्वयंभू नामका पुत्र हुआ। यह पुत्र राजाको सब पुत्रोंमें अधिक प्यारा था ।॥ ८६ ॥
After departing from that celestial realm, he was reborn in this Bharatkshetra, in the city of Dvaravati, as the son of King Bhadra and Queen Prithivi, named Svayambhu. This son was the most beloved of all the King’s children. [86]
श्लोक ( Shlok ) 87
धर्मो बलः स्वयम्भूश्च केशवस्तौ परस्परम् । अभूतां प्रीतिसम्पन्नावन्वभूतां श्रियं चिरम् ॥ ८७ ॥
धर्म बलभद्र था और स्वयंभू नारायण था। दोनोंमें ही परस्पर अधिक प्रीति थी और दोनों ही चिरकाल तक राज्यलक्ष्मीका उपभोग करते रहे ॥ ८७ ॥
Dharma was the Balabhadra and Svayambhu was the Narayana. Both shared a deep mutual affection and enjoyed the splendor of the kingdom for a very long time. [87]
श्लोक ( Shlok ) 88
सुकेतुजातौ द्यूतेन निर्जित्य बलिना हठात् । स्वीकृतं येन तद्राज्यं सोऽभूद्रत्नपुरे मधुः ॥ ८८ ॥
सुकेतुकी पर्यायमें जिस बलवान् राजाने जुआमें सुकेतुका राज्य छीन लिया था वह मर कर रत्नपुर नगरमें राजा मधु हुआ था ।॥ ८८ ॥
The powerful king who had seized Suketu’s kingdom in gambling during his previous birth died and was reborn as King Madhu in the city of Ratnapura. [88]
श्लोक ( Shlok ) 89
तजन्मवैरसंस्कारसमेतेनाधुनामुना । तन्नामश्रुतिमात्रेण सकोपेन स्वयम्भुवा ॥ ८९ ॥
पूर्व जन्मके वैरका संस्कार होनेसे राजा स्वयंभू मधुका नाम सुनने मात्रसे कुपित हो जाता था ॥ ८९ ॥
Due to the deep-seated impressions (Sanskara) of enmity from his previous birth, King Svayambhu would become enraged at the mere mention of King Madhu’s name. [89]
श्लोक ( Shlok ) 90
मधोः केनापि भूपे च प्रहितं प्राभृतं स्वयम् । घातयित्वोभयोर्दूतौ साधिक्षेपमगृह्यत ॥ ९० ॥
किसी समय किसी राजाने राजा मधुके लिए भेंट भेजी थी, राजा स्वयंभूने दोनोंके दूतोंको मारकर तिर-स्कारके साथ वह भेंट स्वयं छीन ली ॥ ९० ॥
On one occasion, a certain king sent a gift to King Madhu; King Svayambhu, however, killed the messengers of both parties and seized the gift for himself with utter contempt. [90]
श्लोक ( Shlok ) 91
प्रीत्यप्रीतिसमुत्पन्नः संस्कारो जायते स्थिरः । तस्मादप्रीतिमात्मशो न कुर्यात्कापि कस्यचित् ॥ ९१ ॥
आचार्य कहते हैं कि प्रेम और द्वेषसे उत्पन्न हुआ संस्कार स्थिर हो जाता है इसलिए आत्मज्ञानी मनुष्यको कहीं किसीके साथ द्वेष नहीं करना चाहिए ।। ९१ ।।
The teachers declare that the impressions born of love and hatred become deeply ingrained and enduring; therefore, a self-realized person, possessing the knowledge of the soul, should never harbor malice toward anyone. [91]
श्लोक 92 से 101
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