शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्तीका पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . english translation of Uttar Puran parv 63- shlok 93 to 102
श्लोक ( Shlok ) 93
*जम्बूद्वीपसुकच्छाख्यविषये ‘खचराचले । श्रेण्यामुत्तरदिग्जायां शुकम्प्रभपुराधिपः ॥ ९१ ॥
उसी देश में किन्नरगीत नामका एक नगर है। उसके राजाका नाम चित्रचूल है। चित्रचूलकी पुत्री सुकान्तामेरी स्त्री है ॥ ९३ ॥
“In that very same province, there is a city named Kinnarageeta. Its king’s name is Chitrachula. Chitrachula’s daughter, Sukanta, is my wife.”93
श्लोक ( Shlok ) 94
सुता मम सुकान्तायाश्चैषा शान्तिमतिः सती । विद्याः साधयितुं याता मुनिसागरपर्वतम् ॥९४॥
मेरे तथा सुकान्ताके यह शान्तिमती नामकी सती पुत्री उत्पन्न हुई है। यह विद्या सिद्ध करनेके लिए मुनिसागर नामक पर्वतपर गई थी ॥ ९४ ॥
“To my wife Sukanta and me, this virtuous daughter named Shantimati was born. She had gone to the Munisagara mountain in order to master and accomplish supernatural powers (Vidyas).”94
श्लोक ( Shlok ) 95
विद्यासाधनविघ्न्नार्थ पापोऽयं समुपस्थितः । पुण्योदयात्तदैवास्या विद्या सिद्धिमुपागता ॥९५॥
उसी समय यह पापी इसकी विद्या सिद्ध करनेमें विघ्न करनेके लिए उपस्थित हुआ था परन्तु पुण्यकर्मके उदय से इसकी विद्या सिद्ध हो गई ॥ ९५ ॥
“At that very moment, this sinner arrived there to create obstacles in the accomplishment of her supernatural powers (Vidyas). However, due to the rise of her meritorious karma (Punya), her Vidya was successfully accomplished nonetheless.”95
श्लोक ( Shlok ) 96 – 98
तद्भयात्त्वामयं पापकर्मकृत्समुपाश्रयत् । ‘विद्यापुजां समादाय तदैवाहं समागमम् ॥ ९६ ॥अदृष्ट्वा मत्सुतां तत्र तन्मार्ग क्षिप्रमन्वितः । इत्यवादीत्स तत्सर्वं श्रुत्वाऽवधिविलोचनः ॥ ९७ ॥जानाम्यहं महच्चास्य विद्याया विघ्नकारणम् । इति वज्रायुधो व्यक्तमेवं प्रोवाच तां कथाम् ॥ ९८ ॥
यह पापी विद्याके भय से ही आपके शरण आया है। मैं विद्याकी पूजाकी सामग्री ले कर उसी समय वहाँ आया था परन्तु वहाँ अपनी पुत्रीको न देख शीघ्र ही उसी मार्गसे इनके पीछे आया हूँ। इस प्रकार उस वृद्ध विद्याधरने कहा। यह सब सुनकर अवधिज्ञानरूपी नेत्रको धारण करने वाले राजा वज्रायुध कहने लगे । कि ‘इसकी विद्या में विघ्न्न होनेका जो बड़ा भारी कारण है उसे मैं जानता हूं’ ऐसा कहकर वे स्पष्ट रूपसे उसकी कथा कहने लगे ।। ९६-९८ ॥
“‘This sinner has sought your refuge solely out of fear of her newly acquired power (Vidya). I had arrived there at that very moment carrying the materials for the ritual worship of the Vidya, but not finding my daughter there, I swiftly followed behind them along this very path.’ Thus spoke the elderly Vidyadhara.
Hearing all this, King Vajrayudha, who possessed the divine eye of Avadhijnana (clairvoyance), said, ‘I know the profound and great cause behind the disruption of her Vidya.’ Saying this, he began to clearly narrate his past story.” 96 – 98
श्लोक ( Shlok ) 99 – 102
अस्मिन्नैरावते । ख्याते गान्धारविषये नृपः । विन्ध्यसेनः पतिविन्ध्यपुरस्य विलसन् गुणैः ॥९९॥सुलक्षणायां तस्याभूत्सूनुर्नलिनकेतुकः । तत्रैव धनमित्रस्य श्रीदत्तायां सुतो वणिक् ॥ १०० ॥सुदत्तो नाम तस्यासीद्भार्या प्रीतिङ्कराह्वयात् । दृष्ट्वा नलिनकेतुस्तां कचिद्वनविहारिणीम् ॥१०१॥मदनानलसन्तप्ततद्दाहं सोढुमक्षमः । न्यायवृत्तिं समुल्लक्ष्य बलादहृत दुर्मतिः ॥१०२॥
उन्होंने कहा कि ‘इसी जम्बूद्वीपके ऐरावत क्षेत्रमें एक गान्धार नामका देश है उसके विन्ध्यपुर नगरमें गुणोंसे सुशोभित राजा विन्ध्यसेन राज्य करता था। उसकी सुलक्षणा रानीसे नलिनकेतु नामका पुत्र हुआ था। उसी नगर में एक धनमित्र नामका वणिक् रहता था। उसकी श्रीदत्ता स्त्रीसे सुदत्त नामका पुत्र हुआ था। सुदत्तकी स्त्रीका नाम प्रीतिंकरा था। एक दिन प्रीतिंकरा किसी वनमें विहार कर रही थी। उसी समय राजपुत्र नलिनकेतुने उसे देखा और देखते ही कामाग्निसे ऐसा संतप्त हुआ कि उसकी दाह सहन करनेमें असमर्थ हो गया। उस दुर्बुद्धिने न्यायवृत्तिका उल्लङ्घन कर बलपूर्वक प्रीतिंकरा का हरण कर लिया ॥ ९९-१०२ ॥
“The King said, ‘In the Airavata region of this very Jambudvipa, there is a province named Gandhara. In its city of Vindhyapura, King Vindhyasenna, adorned with excellent virtues, used to rule. From his queen Sulakshana, a son named Naliniketu was born.
In that same city lived a merchant named Dhanamitra. From his wife Shridatta, a son named Sudatta was born, whose wife was named Preetinkara. One day, while Preetinkara was strolling in a forest, the prince Naliniketu saw her. The moment he laid eyes on her, he became so intensely consumed by the fire of lust that he could not bear its burning torment.
Abandoning all righteousness, that wicked-minded prince forcibly abducted Preetinkara.'”99 – 102
श्लोक 103 से 114
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