राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 436 से 452 | श्लोक 453 से 462 | श्लोक 463 से 472 | श्लोक 473 से 484 | श्लोक 485 से 493 | श्लोक 494 से 501 | श्लोक 502 से 515
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 516 to 531
श्लोक ( Shlok ) 516 – 527
नागतो रावणः केन हेतुनेति विभीषणम् । अप्राक्षीदथ सोप्याख्यल्लङ्कायां नास्ति रावणः ॥ ५१६ ॥बालिलोकान्तरापचि सुग्रीवाणुमतोरपि । विद्याबलावलेपित्यमवगम्य स्वयं च सः ॥ ५१७ ॥निवेश्य निजरक्षायां सुतमिन्द्रजिदाह्वयम् । अष्टोपवासमासाद्य सम्यग्नियमितेन्द्रियः ॥ ५१८ ॥आदित्यपादशैलेन्द्रे विद्याः संसाधयन् स्थितः । राक्षसादिमहाविद्यासिद्धावुपचितो भवेत् ॥ ५१९ ॥तद्विम्नपूर्वकं लङ्कामवष्टभ्य निवेशनम् । प्रयोजनमिति श्रद्दधन्तं सीतापतिं प्रति ॥ ५२० ॥नायकाभ्यां ततः सुग्रीवाणुमन्तौ स्वसाधिताः । दत्त्वा गरुडसिंहादिवाहन्यौ बन्धमोचनीम् ॥ ५२१ ॥हननावरणीं विद्याश्चतस्त्रोऽस्य पृथक् पृथक् । प्रज्ञप्तिविद्याविकृतविमानेन महाबलम् ॥ ५२२ ॥लङ्गापुरबर्हिर्भागे तन्निवेशयतः स्म तौ । नभश्वरकुमारेषु तदा रामाज्ञया गिरिम् ॥ ५२३ ॥सम्प्राप्य युद्धयमानेषु रावणस्याग्रसूनुना । सम्भूयेन्द्रजिता यूयं युध्यध्वमिति संक्रुधा ॥ ५२४ ॥प्रेषिताः खचराधीशाः प्राच्याः सर्वाश्च देवताः । इयन्तं कालमस्माभिर्भवत्पुण्यबलोदयात् ॥ ५२५ ॥त्वयाभिलषितं कार्य साधितं पुण्यसंक्षये । समर्था नेत्यसावुक्तो व्यक्तं ताभिर्दशाननः ॥ ५२६ ॥भवतीभिर्वराकीभिर्यात किं सम साध्यते । हन्म्यहं पौरुषेणैव नृमृगान् सह खेचरान् ॥ ५२७ ॥
उस समय उन्होंने विभीषण से पूछा कि रावण किस कारणसे नहीं आया है ? तदनन्तर विभीषणने उत्तर दिया कि इस समय रावण लङ्कामें नहीं है। बालिका परलोक गमन और सुग्रीव तथा अणुमान्के विद्याबलका अभिमान सुनकर उसने अपनी रक्षाके लिए इन्द्रजित् नामक पुत्रको नियुक्त किया है तथा आठ दिनका उपवास लेकर और इन्द्रियोंको अच्छी तरह वश कर आदित्यपाद नामके पर्वत पर विद्याएँ सिद्ध करता हुआ बैठा है। राक्षसादि महाविद्याओंके सिद्ध हो जानेपर वह बहुत ही शक्तिसम्पन्न हो जावेगा। इसलिए इस समय हम लोगोंका यही काम है कि उसकी विद्यासिद्धिमें विघ्न किया जाय और लङ्का को घेरकर ठहरा जाय, इस प्रकार विभीषणने रामचन्द्रसे कहा । तदनन्तर सुग्रीव और अणुमान् ने अपने द्वारा सिद्ध की हुई गरुड़वाहनी, सिंहवाहनी, बन्धमोचनी और हननावरणी नामकी चार विद्याएँ अलग-अलग रामचन्द्र और लक्ष्मणके लिए दीं। इसके बाद दोनों भाइयोंने प्रज्ञप्ति नामकी विद्यासे बनाये हुए अनेक विमानोंके द्वारा अपनी उस बड़ी भारी सेनाको लङ्कानगरीके बाहर मैदानमें ले जाकर खड़ी कर दी। उसी समय कितने ही विद्याधर कुमार रामचन्द्रकी आज्ञासे आदित्यपाद नामक पर्वत पर जाकर उपद्रव करने लगे । तब रावणके बड़े पुत्र इन्द्रजित्ने क्रोधमें आकर विद्याधर राजाओं तथा पहले सिद्ध किये हुए समस्त देवताओंको यह आदेश देकर भेजा कि तुम सब लोग मिलकर इनसे युद्ध करो। इन्द्रजित्की बात सुनकर विद्या-देवताओंने कहा कि हमलोगोंने आपकेपुण्योदयसे इतने समय तक आपका वाब्छित कार्य किया परन्तु अब आपका पुण्य क्षीण हो गया ‘है इसलिए आपके कहे अनुसार कार्य करनेमें हम समर्थ नहीं हैं। जब उक्त विद्या-देवताओंने रावण-से इस प्रकार स्पष्ट कह दिया तब रावण उनसे कहने लगा कि आप लोग जा सकती हैं, आप नीच देवता हैं, आपसे मेरा कौन-सा कार्य सिद्ध होनेवाला है? मैं अपने पुरुषार्थसे ही इन मनुष्य रूपी हरिणोंको विद्याधरोंके साथ-साथ अभी मार डालता हूं ॥ ५१६-५२७ ।।
“At that time, they questioned Vibhishana, asking, ‘For what reason has Ravana not arrived yet?’
Thereafter, Vibhishana replied, ‘At this moment, Ravana is not present in Lanka. Hearing of Bali’s departure to the heavenly realm and the formidable pride of Sugriva and Anuman’s (Hanuman’s) mystical power, he has appointed his son, named Indrajit, for his protection. Moreover, observing an eight-day fast and bringing his senses completely under control, he is seated upon Mount Adityapada, mastering his mystical lores. Once these supreme sciences, such as the Rakshasa-lore, are mastered, he will become immensely powerful. Therefore, our primary duty at this juncture is to create obstacles in his mastery of these lores and to surround Lanka and camp there.’ Thus Vibhishana spoke to Ramachandra.
Thereafter, Sugriva and Anuman bestowed four mystical sciences, which they themselves had mastered—namely Garudavahini, Simhavahini, Bandhamochani, and Hananavarani—individually upon Ramachandra and Lakshmana. Following this, through numerous celestial vehicles (vimanas) created via the Prajnapti lore, the two brothers transported their massive army and stationed them in the plains outside the city of Lanka.
At that very moment, acting upon Ramachandra’s command, several Vidyadhara princes went to Mount Adityapada and began to create disruptions. Then, filled with rage, Ravana’s eldest son, Indrajit, dispatched the Vidyadhara kings as well as all previously mastered deities with the order, ‘All of you unite and wage war against them!’
Hearing Indrajit’s words, the mystical deities replied, ‘By virtue of the rise of your merits (punyodaya), we have fulfilled your desired tasks for all this time. However, your merits have now been exhausted; therefore, we are no longer capable of acting according to your commands.’
When the said mystical deities spoke so plainly to Ravana, Ravana said to them, ‘You may leave! You are lowly deities; what task of mine is going to be accomplished through you anyway? By my own prowess alone, I shall instantly slaughter these deer-like humans along with the Vidyadharas!'” [516-527]
श्लोक ( Shlok ) 528 – 529
सहायैः साधितं कार्य लज्जायै ननु मानिनाम् । इति श्रुद्धः पुरीमागात्तदैवासौ सहेन्द्रजित् ॥ ५२८ ॥दुश्चेष्टस्यास्तपुण्यस्य भूतं भावि ‘विनश्यति । परिवारमुखाद् ज्ञात्वा परैर्लङ्कोपरोधनम् ॥ ५२९ ॥
सहायकोंके द्वारा सिद्ध किया हुआ कार्य अभिमानी मनुष्योंके लिए लज्जा उत्पन्न करता है। इस प्रकार क्रुद्ध होकर रावण उसी समय इन्द्रजित्के साथ नगर में आ गया। देखो, जिसका पुण्य नष्ट हो चुकता है ऐसे दुश्चरित्र मनुष्यका भूत और भावी सब नष्ट हो जाता है। नगरमें आनेपर उसने परिवारके लोगोंसे ज्ञात किया कि शत्रुओंने लङ्काको घेर लिया है ॥ ५२८-५२९ ॥
“‘A task accomplished by assistants brings only shame to arrogant men.’ Becoming furious in this manner, Ravana returned to the city at that very moment along with Indrajit. Behold! For a man of wicked character whose merits (punya) have been completely exhausted, both his past and his future are utterly destroyed. Upon arriving in the city, he learned from his family members that the enemies had completely surrounded Lanka.” [528-529]
श्लोक ( Shlok ) 530
हरिणैर्हरिरारुद्धः पश्य कालविपर्ययम् । अथ वासन्नमृत्यूनां भवेत्प्रकृतिविभ्रमः ॥ ५३० ॥
उस समय रावण कहने लगा कि समयकी विपरीतता तो देखो, हरिणोंने सिंहको घेर लिया है। अथवा जिनकी मृत्यु निकट आ जाती है उनके स्वभावमें विभ्रम हो जाता है ।। ५३० ॥
“At that time, Ravana began to say, ‘Behold the irony of time! The deer have surrounded the lion. Or rather, it is true that those whose death draws near suffer a complete delusion of their nature.'” [530]
श्लोक ( Shlok ) 531
इति गर्जन्समाक्रान्ततुङ्गमातङ्गसिंहवत् । रविकीर्ति स्वसेनान्यं हरिणध्वजमादिशत् ॥ ५३१ ॥
इस प्रकार किसी ऊँचे हाथी पर आक्रमण करनेवाले सिंहके समान गरजते हुए रावणने हरिणकी ध्वजा धारण करनेवाले अपनी रविकीर्ति नामक सेनापतिको आदेश दिया ॥ ५३१॥
“In this manner, roaring like a lion attacking a towering elephant, Ravana issued commands to his commander-in-chief named Ravikirti, who bore a stag upon his banner.” [531]
श्लोक 532 से 542
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