श्रेयांसनाथ तीर्थकर त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण के पुराणका वर्णन पर्व 57 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 62 | श्लोक 63 से 72 | श्लोक 73 से 81
English translation of Uttar Puran parv 57- shlok 82 to 91
श्लोक ( Shlok ) 82
सशल्यः सोऽपि तच्छ्रुत्वा सनिदानोऽसुसङ्क्षये । महाशुक्रेऽभवद्देवो यत्रासीदनुजः पितुः ॥ ८२ ॥
विश्वनन्दीको कुछ शल्य थी अतः उसने विशाखनन्दी की हँसी सुनकर निदान किया । तथा प्राणक्षय होनेपर महाशुक्र स्वर्गमें जहाँ कि पिताका छोटा भाई उत्पन्न हुआ था, देव हुआ ।॥ ८२ ॥
Vishvanandi still harbored some inner sting (residual worldly desire); therefore, upon hearing Vishakhanandi’s mockery, he made a Nidana (a solemn vow to reap the fruits of his penance in a future life). Consequently, upon his death, he was reborn as a celestial being in the Mahashukra Heaven, the same place where his uncle had been reborn. || 82 ||
श्लोक ( Shlok ) 83 – 85
बोडशाब्ध्यायुषा दिव्यभोगान् देव्यप्सरोगणैः । ईप्सिताननुभूयासौ ततः प्रच्युत्य भूतले ॥ ८३ ॥द्वीपेऽस्मिन् भारते क्षेत्रे सुरम्यविषये पुरे । प्रजापतिर्महाराजः पोदनाख्येऽभवत्पतिः ॥ ८४ ॥प्राणप्रिया महादेवी तस्याजनि मृगावती । तस्यां सुस्वप्नवीक्षान्ते त्रिपृष्ठाख्यः सुतोऽभवत् ॥ ८५ ॥
वहाँ सोलह सागर प्रमाण उसकी आयु थी। समस्त आयु भर देवियों और अप्सराओं के समूहके साथ मनचाहे भोग भोगकर वहाँ से च्युत हुआ और इस पृथिवी तल पर जम्बूद्वीप सम्बन्धी भरत क्षेत्रके सुरम्य देश में पोदनपुर नगरके राजा प्रजापतिकी प्राणप्रिया मृगावती नामकी महादेवीके शुभ स्वप्न देखनेके बाद त्रिपृष्ठ नामका पुत्र हुआ ।। ८३-८५ ।।
There, his lifespan spanned sixteen Sagar (an immense cosmic unit of time). Having enjoyed all desired pleasures with groups of goddesses and celestial nymphs throughout that duration, he descended from that realm. He was then reborn on this Earth, in the beautiful Bharat Kshetra of Jambudvipa, in the city of Podanpur. After Queen Mrigavati, the beloved consort of King Prajapati, witnessed auspicious dreams, he was born as their son, named Triprishta. || 83–85 ||
श्लोक ( Shlok ) 86
पितृव्योऽपि च्युतस्तस्मात्तोको 3 ऽभूत्तन्महीपतेः । जयावत्यां ४पुरे चैत्य विक्रमी विजयाह्वयः ॥ ८६ ॥
काकाका जीव भी वहाँ से – महाशुक्र स्वर्ग से च्युत होकर इसी नगरीके राजाकी दूसरी पत्नी जयावतीके विजय नामका पुत्र हुआ ।॥ ८६ ॥
The soul of the uncle (Vishakhabhuti) also descended from that same Mahashukra Heaven and was born as a son named Vijay to Jayavati, the second wife of the king of this very city. || 86 ||
श्लोक ( Shlok ) 87 – 88
भ्रमन् विशाखनन्दी च चिरं संसारचक्रके । विजयार्दोत्तरश्रेण्यामलकाख्यपुरेशिनः ॥ ८७ ॥मयूरग्रीवसंज्ञस्य स्वपुण्यपरिपाकतः । हयग्रीवाह्वयः सूनुरजायत जितारिराद् ॥ ८८ ॥
और विशाखनन्दी चिरकाल तक संसार-चक्रमें भ्रमण करता हुआ विजयार्ध पर्वतकी उत्तर श्रेणीकी अलका नगरीके स्वामी मयूरग्रीव राजाके अपने पुण्योदयसे शत्रु राजाओंको जीतनेवाला अश्वग्रीव नामका पुत्र हुआ ।। ८७-८८ ।।
And Vishakhanandi, after wandering through the cycle of worldly existence (Samsara) for a long time, was born—due to the rise of his past merits—as Ashvagriva, the son of King Mayurgriva, the lord of Alka City on the northern range of Mount Vijayardha. As Ashvagriva, he became a conqueror of enemy kings. || 87–88 ||
श्लोक ( Shlok ) 89
अशीतिचापदेहैः तावादिमौ रामकेशवौ । पञ्चशून्ययुगाष्टाब्दनिर्भङ्गपरमायुषौ ॥ ८९ ॥
इधर विजय और त्रिष्पृष्ठ दोनों ही प्रथम बलभद्र तथा नारायण थे, उनका शरीर अस्सी धनुष ऊँचा था और चौरासी लाख वर्षकी उनकी आयु थी ॥ ८९ ॥
Meanwhile, both Vijay and Triprishta were the first Balabhadra and Narayana (Vasudeva) respectively; their bodies were eighty Dhanush tall, and their lifespan was eighty-four lakh years. || 89 ||
श्लोक ( Shlok ) 90
शङ्खन्द्रनीलसङ्काशौ हत्वाऽश्वग्रीवमुद्धतम् । त्रिखण्डमण्डितायास्ताविहाभूतां पती क्षितेः ॥ ९० ॥
विजयका शरीर शंखके समान सफेद था और त्रिष्पृष्ठका शरीर इन्द्रनीलमणिके समान नील था। वे दोनों उद्दण्ड अश्वग्रीवको मारकर तीन खण्डोंसे शोभित पृथिवीके अधिपति हुए थे ॥ ९० ॥
Vijay’s body was as white as a conch shell, while Triprishta’s body was as dark blue as an emerald (Indraneel gem). Having slain the arrogant Ashvagriva, the two became the sovereign lords of the earth, adorned with its three divisions. || 90 ||
श्लोक ( Shlok ) 91
द्विगुणाष्टसहस्त्राणां मुकुटाङ्कमहीभुजाम् । खगव्यन्तरदेवानामाधिपत्यं समीयतुः ॥ ९१ ॥
वे दोनों ही सोलह हजार मुकुट-बद्ध राजाओं, विद्याधरों एवं व्यन्तर देवोंके आधिपत्यको प्राप्त हुए थे ॥ ९१ ॥
Both of them attained sovereignty over sixteen thousand crown-wearing kings, as well as over the Vidyadharas (supernatural beings) and the Vyantar Devas (pervasive celestial beings). || 91 ||
श्लोक 92 से 100
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