अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 83 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122
English translation of Uttar Puran parv 62- shlok 123 to 131
श्लोक ( Shlok ) 123
परीक्षितव्यः सोऽस्मासु कीदृश इति दक्षिणैः । दूतैरिति खगाधीशमवोचन्मन्त्रिणः पृथक् ॥ १२३ ॥
वह हम लोगोंके विषयमें कैसा है ? – अनुकूल प्रतिकूल कैसे विचार रखता है इस प्रकार सरल चित्त – निष्कपट दूत भेजकर उसकी परीक्षा करनी चाहिये’ मन्त्रियोंने ऐसा पृथक् पृथक् राजासे कहा ।। १२३ ।।
“How does he feel toward us? Does he harbor favorable or hostile thoughts?” Concluding that they ought to test him by sending a simple-hearted and guileless messenger, each of the ministers advised the King accordingly. || 123 ||
श्लोक ( Shlok ) 124
तदाकर्ण्य तदैवासौ चिन्तागतिमनोगती । दूतौ सम्प्रेषयामास त्रिपृष्ठं प्रति विद्वरौ ॥ १२४ ॥
उसी समय उसने उक्त बात सुनकर चिन्तागति और मनोगति नामके दो विद्वान् दूत त्रिष्पृष्ठके पास भेजे ॥ १२४ ॥
Upon hearing that counsel, he immediately dispatched two wise and learned messengers, named Chintagati and Manogati, to Trishprishta. || 124 ||
श्लोक ( Shlok ) 125
तौ स्वागतिं पूर्व निवेद्यानुमतौ नृपम् । दृष्ट्वा यथोचितं दत्वा प्राभृतं विनयान्वितौ ॥ १२५ ॥
उन दूतोंने जाकर पहले अपने आनेकी राजाके लिए सूचना दी, फिर राजाके दर्शन किये, अनन्तर विनयसे नम्रीभूत होकर यथा योग्य भेंट दी ।। १२५ ।।
Upon arrival, those messengers first sent word to the King announcing their coming; thereafter, they were granted an audience with the King, and then, bowing low with deep humility, they presented him with appropriate gifts. || 125 ||
श्लोक ( Shlok ) 126
अश्वग्रीवेण देवेन त्वमग्राज्ञापितोऽस्यहम् । रथावर्त्ताद्रिमेष्यामि तमायातु भवानिति ॥ १२६ ॥
फिर कहने लगे कि राजा अश्वग्रीव ने आज तुम्हें आज्ञा दी है कि मैं रथावर्त नामके पर्वत पर जाता हूँ आप भी आइये ।। १२६ ।।
Then they spoke, “King Ashvagreeva has commanded you today, saying, ‘I am proceeding to Mount Rathavarta; you too must come along.'” || 126 ||
श्लोक ( Shlok ) 127 – 128
आवां त्वामागतौ नेतुमाज्ञामारोप्य मस्तकम् । आगन्तव्यं त्वयेत्युच्चैरूचतुः सोऽपि कोपवान् ॥ १२७ ॥अश्वग्रीवाः खरग्रीवाः क्रौञ्चश्रीवास्तथापरे । दृष्टाः क्रमेलकग्रीवा नापूर्वी नः स पश्यताम् ॥ १२८ ॥
हम दोनों तुम्हें लेनेके लिए आये हैं। आपको उसकी आज्ञा मस्तक पर रखकर आना चाहिये । ऐसा उन दोनोंने जोरसे कहा। यह सुनकर त्रिष्पृष्ठ बहुत क्रुद्ध हुआ और कहने लगा कि अश्वग्रीव (घोड़े जैसी गर्दनवाले) खरग्रीव, (गधे जैसी गर्दन वाले) क्रौञ्चग्रीव ( क्रौन क्रौञ्व पक्षी जैसीगर्दन वाले) और क्रमेलक ग्रीव (ऊँट जैसी गर्दनवाले) ये सब मैंने देखे हैं। हमारे लिए वह अपूर्व आदमी नहीं जिससे कि देखा जावे ॥ १२७-१२८।।
“We both have come to escort you. You ought to place his command upon your head with obedience and come along.” Thus, those two spoke emphatically.
Hearing this, Trishprishta became fiercely enraged and retorted, “I have seen all kinds—Ashvagreeva (horse-necked), Kharagreeva (donkey-necked), Kraunchagreeva (heron-necked), and Kramelakagreeva (camel-necked). He is no extraordinary man to us that he must be sought out and seen!” || 127-128 ||
श्लोक ( Shlok ) 129
इत्याह तौ च किं युक्तमवमन्तुं खगेश्वरम् । विश्वरूपसमभ्यर्च्य तं भवत्पक्षपातिनम् ॥ १२९ ॥
जब वह त्रिपृष्ठ कह चुका तब दूतोंने फिरसे कहा कि वह अश्वग्रीव सब विद्याधरोंका स्वामी है, सबकेद्वारा पूजनीय है और आपका पक्ष करता है इसलिए उसका अपमान करना उचित नहीं है ।॥१२९।।
When Trishprishta finished speaking, the messengers spoke up once more, saying, “That Ashvagreeva is the sovereign lord of all the Vidyadhars, revered by everyone, and he currently favors you. Therefore, it is highly improper for you to insult him.” || 129 ||
श्लोक ( Shlok ) 130
इत्याहतुः खगेशोऽस्तु पक्षपाती न वार्यते । नाहमेष्यामि तं द्रष्टुमिति प्रत्यन्त्रबीदसौ ॥ १३० ॥
यह सुनकर त्रिष्पृष्ठने कहा कि वह खग अर्थात् पक्षियोंका ईश है- स्वामी है इसलिए पक्ष अर्थात् पंखोंसे चले इसके लिए मनाई नहीं है परन्तु मैं उसे देखनेके लिए नहीं जाऊंगा ॥ १३० ।।
Hearing this, Trishprishta replied, “He is a Khaga-eesh—a lord of khagas (birds/sky-goers)—so let him fly about using his paksha (wings/factions); he is not forbidden from doing so! However, I will certainly not go to see him.” || 130 ||
श्लोक ( Shlok ) 131
दर्पादिदं न वक्तव्यमदृष्ट्वा चक्रवर्तिनम् । देहेऽपि न स्थितिर्भूमौ कः पुनः स्थातुमर्हति ॥ १३१ ॥
यह सुनकर दूतोंने फिर कहा कि अहंकारसे ऐसा नहीं कहना चाहिये । चक्रवर्तीके देखे विना शरीरमें भी स्थिति नहीं हो सकती फिर भूमि पर स्थिर रहनेके लिए कौन समर्थ है ? ॥ १३१ ॥
Hearing this, the messengers spoke yet again, “You should not speak this way out of sheer arrogance. Without the grace and favor of the Sovereign (Chakravarti), one cannot even sustain life within one’s own body—who then has the power to remain secure and stable upon this earth?” || 131 ||
श्लोक 132 से 141
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