शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्तीका पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 63- shlok 183 to 192
श्लोक ( Shlok ) 183 – 184
तदाकर्ण्य भवत्प्रीत्या खगौ तावागताविमौ । इति मेघरथात्सर्वमाकर्ध्यात्मीयविग्रहम् ॥ १८३ ॥प्रकटीकृत्य तौ भूपं कुमारं चाभिपूज्य तम् । गत्वा गोवर्द्धनोपान्ते दीक्षासिद्धिमवापताम् ॥ १८४ ॥
उन मुनिराजसे ये सब बातें सुनकर ये दोनों ही विद्याधर आपके प्रेमसे यहाँ आये हैं। इस तरह मेघरथसे सब समाचार सुनकर उन विद्याधरोंने अपना स्वरूप प्रकट किया, राजा घनरथ और कुमार मेघरथकी पूजा की तथा गोवर्धन मुनिराजके समीप जाकर दीक्षा प्राप्त कर ली ।। १८३-१८४ ॥
“Upon hearing all these accounts from the great sage, both of these Vidyadharas have come here drawn by their deep affection for you. Having thus heard the entire chronicle from Megharatha, those Vidyadharas revealed their true forms. They worshiped King Ghanaratha and Prince Megharatha, and then, approaching the great sage Govardhana, they accepted initiation (diksha).” [183-184]
श्लोक ( Shlok ) 185 – 186
स्वपूर्वभवसम्बन्धं विदित्वा कुक्कुटौ च तौ । मुक्त्वा परस्पराबद्धवैरं संन्यस्य साहसात् ॥ १८५ ॥अभूतां भूतदेवादिरमणान्तवनद्वये । ताम्रादिचूलचूलान्तकनकौ भूतजातिजौ ॥ १८६ ॥
उन दोनों मुर्गोंने भी अपना पूर्वभवका सम्बन्ध जानकर परस्पर का बँधा हुआ बैर छोड़ दिया और अन्तमें साहसके साथ संन्यास धारण कर लिया। और भूतरमण तथा देवरमण नामक वनमें ताम्रचूल और कनकचूल नामके भूतजातीय व्यन्तर हुए ।। १८५-१८६ ।।
“Upon realizing the connections of their past lives, both of those roosters also abandoned their deep-seated, mutual animosity and ultimately embraced sannyasa (the vow of renunciation) with great courage. Consequently, they were reborn as Vyantara deities of the Bhuta class, named Tamrachula and Kanakachula, in the forests known as Bhutaramana and Devaramana.” [185-186]
श्लोक ( Shlok ) 187
तदैवागत्य तौ देवौ प्रीत्या मेघरथाह्वयम् । सम्पूज्याख्याय सम्बन्धं स्वजन्मान्तरर्ज स्फुटम् ॥ १८७ ॥
उसी समय वे दोनों देव पुण्डरीकिणी नगरीमें आये और बड़े प्रेमसे मेघरथकी पूजा कर अपने पूर्वे जन्मका सम्बन्ध स्पष्ट रूपसे कहने लगे ॥ १८७ ॥
“At that very moment, those two deities arrived in the city of Pundarikini. With deep affection, they worshiped Megharatha and began to clearly narrate the relationship of their past lives.” [187]
श्लोक ( Shlok ) 188
मानुषोत्तरमूनान्तर्वत्ति विश्वं विलोकय । एष एव तवावाभ्यामुपकारो विधीयताम् ॥ १८८ ॥
अन्तमें उन्होंने कहा कि आप मानुषोत्तर पर्वतके भीतर विद्यमान समस्त संसारको देख लीजिये । हमलोगोंके द्वारा आपका कमसे कम यही उपकार हो जावे ।। १८८ ॥
“In conclusion, they said: ‘Please gaze upon the entire world existing within the Manushottara Mountain. Let this at least be the humble service rendered to you by us.'” [188]
श्लोक ( Shlok ) 189 – 190
इत्युदीर्य कुमारं तं स्यात्तथेति प्रतिश्रतम् । सार्द्ध स्वाप्तैः समारोप्य विमानं विविधर्दिकम् ॥ १८९ ॥सम्प्राप्य गगनाभोगं मेघमालाविभूषितम् । दर्शयामास तुर्यान्तौ कान्तान् देशान्यथाक्रमम् ॥ १९० ॥
देवोंके ऐसा कहनेपर कुमारने जब तथास्तु कहकर उनकी बात स्वीकृत कर ली तब देवोंने कुमारको उसके आप्तजनोंके साथ अनेक ऋद्धियोंसे युक्त विमानपर बैठाया और मेघमालासे विभूषित आकाशमें ले जाकर यथाक्रमसे चलते चलते, सुन्दर देश दिखलाये ॥ १८९-१९० ॥
“When the deities spoke thus, the prince accepted their offer by saying, ‘Tathastu’ (Let it be so). Thereupon, the deities seated the prince, along with his near and dear ones, upon a celestial chariot (vimana) endowed with magnificent, miraculous splendors (riddhis). Taking them high into the sky adorned with garlands of clouds, they flew along a majestic course, displaying beautiful lands one after another.” [189-190]
श्लोक ( Shlok ) 191 – 192
भरतः प्रथमो देशस्ततो हैमवतः परः । हरिवर्षों विदेहश्च रम्यकः पञ्चमो मतः ॥ १९१ ॥हैरण्यवतसंज्ञश्च परश्चैरावताद्धयः । पश्यैते सप्त भूमृद्धि विभक्ताः सप्तभिर्विभो ॥ १९२ ॥
वे बतलाते जाते थे कि यह पहला भरतक्षेत्र है, यह उसके आगे हैमवत क्षेत्र है, यह हरिवर्ष क्षेत्र है, यह विदेह क्षेत्र है, यह पाँचवाँ रम्यक क्षेत्र है, यह हैरण्यवत क्षेत्र है और यह ऐरावत क्षेत्र है। इस प्रकार हे स्वामिन् ! सात कुलाचलोंसे विभाजित ये सात क्षेत्र हैं । ।। १९१-१९२ ॥
“As they traveled, they kept pointing out the lands, saying: ‘This is the first region, Bharata-kshetra; beyond it lies Haimavata-kshetra; this is Harivarsha-kshetra; this is Videha-kshetra; this fifth one is Ramyaka-kshetra; this is Hairanyavata-kshetra; and this is Airavata-kshetra.’ In this manner, O Lord, these are the seven regions divided by the seven Kulachalas (major mountain ranges).” [191-192]
श्लोक 193 से 201
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130
अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 82 | श्लोक 83 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 |श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 283 | श्लोक 284 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 |श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 363 | श्लोक 364 से 371 | श्लोक 372 से 382 | श्लोक 383 से 390 | श्लोक 391 से 401 | श्लोक 402 से 411 | श्लोक 412 से 421 | श्लोक 422 से 433 | श्लोक 434 से 442 | श्लोक 443 से 451 | श्लोक 452 से 462 | श्लोक 463 से 472 | श्लोक 473 से 481 | श्लोक 482 से 491 | श्लोक 492 से 501 | श्लोक 502 से 513
शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्तीका पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 |श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 102 | श्लोक 103 से 114 | श्लोक 115 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182
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