राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 552 से 560 | श्लोक 561 से 575 | श्लोक 576 से 585 | श्लोक 586 से 594 | श्लोक 595 से 604 | श्लोक 605 से 622 | श्लोक 623 से 631
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 632 to 641
श्लोक ( Shlok ) 632
तदावशिष्टपौलस्त्यमहामात्रादयोऽलिवत् । मलिना बलचक्रेशपादपङ्कनमाश्रयन् ॥ ६३२ ॥
उसी समय रावणके बचे हुए महामन्त्री आदिने भ्रमरोंके समान मलिन होकर रामचन्द्र तथा लक्ष्मणके चरण-कमलोंका आश्रय लिया ॥ ६३२ ॥
“At that very moment, the remaining chief ministers and generals of Ravana, looking as dark and crestfallen as swarms of black bees (Bhramar), sought refuge at the lotus-feet of Ramachandra and Lakshmana.” || 632 ||
श्लोक ( Shlok ) 633 – 634
मन्दोदर्यादित द्देवीदुःखनोदनपूर्वकम् । विभीषणाय लङ्गैश्यपट्टबन्धं विधाय तौ ॥ ६३३ ॥दशकण्ठान्वयायातविश्वभुक्ति वितेरतुः । ‘अभूतां च त्रिखण्डेशौ प्रचण्डौ बलकेशवौ ॥ ६३४ ॥
रावणकी मन्दोदरी आदि जो देवियाँ दुःखसे रो रही थीं उनका दुःख दूर कर राम और लक्ष्मणने विभीषणको लंकाका राजा बनाया तथा रावणकी वंश-परम्परासे आई हुई समस्त विभूति उसे प्रदान कर दी। इस प्रकार दोनों भाई बलभद्र और नारायण होकर तीन खण्डके बलशाली स्वामी हुए ।। ६३३-६३४।।
“Soothening the grief of Mandodari and the other queens of Ravana who were weeping in deep sorrow, Rama and Lakshmana crowned Vibhishana as the king of Lanka, bestowing upon him all the ancestral wealth and sovereignty of Ravana’s lineage. In this manner, manifesting as Balabhadra and Narayana respectively, the two brothers became the mighty sovereigns of the three realms.” || 633-634 ||
श्लोक ( Shlok ) 635 – 636
अथ शीलवतीं सीतामशोकवनमध्यगाम् । संग्रामविजयाकर्णनोदीर्णप्रमदान्विताम् ॥ ६३५ ॥रावणानुजसुग्रीवपवमानात्मजादयः । गत्वा यथोचितं दृष्ट्वा ज्ञापयित्वा जयोत्सवम् ६३६ ॥
तदनन्तर जो अशोक वनके मध्यमें बैठी है, और संग्राममें रामचन्द्रजीकी विजयके समाचार सुननेसे प्रकट हुए हर्षसे युक्त है ऐसी शीलवती सीताके पास जाकर विभीषण, सुग्रीव तथा अणु-मान् आदिने उसके यथा योग्य दर्शन किये और विजयोत्सवकी खबर सुनाई ॥ ६३५-६३६ ।।
“Subsequently, Vibhishana, Sugriva, Hanuman (Anuman), and the other lords approached the exceptionally virtuous Sita, who was seated in the midst of the Ashoka grove. Radiating with the profound joy that arose upon hearing the news of Ramachandra’s victory in battle, she received them as they paid their utmost respectful heritages to her and delivered the grand tidings of the festival of victory.” || 635-636 ||
श्लोक ( Shlok ) 637 – 638
समयुञ्जत रामेण समं लक्ष्मीमिवापराम् । महामणिं वा हारेण कुशलाः कवयोऽथवा ॥ ६३७ ॥वाचं मनोहरार्थेन सन्तो धर्मेण वा धियम् । ‘सद्धृत्यमित्रसम्बन्धाद्भवन्तीप्सितसिद्धयः ॥ ६३८ ॥
तत्पश्चात् जिस प्रकार कुशल कारीगर महामणिको हारके साथ, अथवा कुशल कवि शब्दको मनोहर अर्थके साथ अथवा सज्जन पुरुष अपनी बुद्धिको धर्मके साथ मिलाते हैं उसी प्रकार उन विभीषण आदिने दूसरी लक्ष्मीके समान सीताजीको रामचन्द्रजीके साथ मिलाया। सो ठीक ही है क्योंकि उत्तम भृत्य और मित्रोंके सम्बन्धसे इष्ट-सिद्धियाँ हो ही जाती हैं ।॥ ६३७-६३८ ॥
“Thereupon, just as a skilled artisan sets a magnificent gem into a necklace, or a gifted poet unites a word with a beautiful meaning, or a righteous man aligns his intellect with virtue (Dharma)—even so, Vibhishana and the other companions reunited Sitaji, who resembled the goddess Lakshmi herself, with Ramachandra. And this was truly fitting, for through the association of excellent allies and faithful friends, all cherished desires are inevitably fulfilled.” || 637-638 ||
श्लोक ( Shlok ) 639 – 640
वहन्ती जानकी दुःखमा प्राणप्रियदर्शनात् । रामोऽपि तद्वियोगोत्थशोकव्याकुलिताशयः ॥ ६३९ ॥तौ परस्परसन्दर्शात्परां प्रीतिमवापतुः । तृतीयप्रकृतिं प्राप्य नृपो वा सापि वा नृपम् ॥ ६४० ॥
उधर जब तक रामचन्द्रजीका दर्शन नहीं हो गया था तब तक सीता दुःखको धारण कर रही थी और इधर राम-चन्द्रजीका हृदय भी सीताके वियोगसे उत्पन्न होनेवाले शोकसे व्याकुल हो रहा था। परन्तु उस समय परस्पर एक-दूसरेके दर्शन कर दोनों ही परम प्रीतिको प्राप्त हुए। रामचन्द्रजी तृतीय प्रकृति-वाली शान्त स्वभाववाली सीताको और सीता शान्त स्वभाववाले राजा रामचन्द्रजीको पाकर बहुत प्रसन्न हुए ॥ ६३९-६४० ॥
“On one side, until she could gaze upon Ramachandra, Sita had been bearing immense sorrow; on the other side, Ramachandra’s heart too had been deeply distressed by the grief born of separation from Sita. Yet, the moment they looked upon one another, both were filled with supreme love and joy. Ramachandra was filled with delight upon being reunited with Sita—who possessed a serene nature and the gentle disposition of Tritiya-Prakriti—and Sita was equally overjoyed to be reunited with the calm-natured King Ramachandra.” || 639-640 ||
श्लोक ( Shlok ) 641
आरभ्य विरहाद्रुत्तं यद्यत्तत्तदपृच्छताम् । अन्योन्यसुखदुःखानि निवेद्य सुखिनः प्रियाः ॥ ६४१ ॥
विरहसे लेकर अब तकके जो-जो वृत्तान्त थे वे सब दोनोंने एक-दूसरेसे पूछे सो ठीक ही है क्योंकि स्त्री-पुरुष परस्पर एक-दूसरेको अपना सुख-दुःख बतलाकर ही सुखी होते हैं ।॥ ६४१ ॥
“They eagerly inquired of one another about everything that had transpired from the very moment of their separation until their reunion. And this was truly fitting, for a husband and wife find true peace and happiness only by sharing their joys and sorrows with each other.” || 641 ||
श्लोक 642 से 651
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