चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 455 से 472 | श्लोक 473 से 492 | श्लोक 493 से 501 | श्लोक 502 से 512 | श्लोक 513 से 524 | श्लोक 525 से 542 | श्लोक 543 से 552
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 75- shlok 553 to 571
श्लोक ( Shlok ) 553
ज्ञात्वा ताभ्यां स्थितं स्थानं ते सर्वे तद्दिदृक्षया । आपृच्छय स्वजनान् सर्वान् सन्तोषाचैविंवेचिताः ॥ ५५३ ॥
इस प्रकार गन्धर्वदत्ता से उनके रहनेका स्थान जानकर मधुर आदि सब मित्रोंको उनके देखनेकी इच्छा हुई और वे सब अपने आत्मीय जनोंसे पूछकर तथा उनसे बिदा लेकर सन्तोषके साथ चल पड़े ॥ ५५३ ।।
Upon learning their whereabouts from Gandharvadatta in this manner, Madhura and all the other friends desired to see them. Asking for permission and taking leave from their respective families, they all set out on their journey with a sense of contentment. (553)
श्लोक ( Shlok ) 554 – 555
गच्छन्तो दण्डकारण्ये व्यभ्राम्यंस्तापसाश्रये । तापसीषु समागत्य तान् पश्यन्तीषु कौतुकात् ॥ ५५४ ॥ महादेवी च तान् दृष्ट्वा यूर्य कस्मात्समागताः । गमिष्यथ क्व वेत्येतदपृच्छत्स्नेहनिर्भरा ॥ ५५५ ॥
चलते-चलते उन्होंने दण्डक वनमें पहुँचकर तपस्वियोंके आश्रममें विश्राम किया। कौतुकवश वहाँकी तापसी स्त्रियाँ आकर उन्हें देखने लगीं। उन स्त्रियोंमें महादेवी विजया भी थी, वह उन सबको देखकर कहने लगी कि आप लोग कौन हैं? कहाँ से आये हैं? और कहाँ जावेंगे ? विजयाने यह सब बड़े स्नेहके साथ पूछा ।। ५५४-५५५ ।।
Travelling along, they reached the Dandaka forest and rested at the hermitage of the ascetics. Out of curiosity, the ascetic women came there to look at them. Among those women was Mahadevi Vijaya. Looking at them all, she said, “Who are you all? Where have you come from? And where are you going?” Vijaya asked all this with great affection. (554-555)
श्लोक ( Shlok ) 556 – 557
यथावृत्तान्तमेवैषु कथयत्सु प्रतोषिणी । मत्पुत्रपरिवारोऽयं सङ्घो यूनामिति स्फुटम् ॥५५६॥ विज्ञायाद्यात्र विश्रम्य भवद्भिर्गम्यतां पुनः । समागमनकालेऽसाविहैवानीयतामिति ॥ ५५७ ॥
जब मधुर आदिने अपना सब वृत्तान्त कहा तब वह, यह स्पष्टजानकर बहुत ही सन्तुष्ट हुई कि यह युवाओंका सङ्घ मेरे ही पुत्रका परिवार है। उसने फिर कहा कि आज आप लोग यहाँ विश्राम कर जाइये और आते समय उसे यहाँ ही लाइये ।। ५५६-५५७ ।।
When Madhura and the others narrated their entire account, she was deeply gratified to clearly realize that this group of young men belonged to her own son’s entourage. She then said, “You must rest here today before you proceed, and while returning, bring him right here to this place.” (556-557)
श्लोक ( Shlok ) 558 – 569
सम्यक्प्रार्थयतैतांस्तेऽप्येषा जीवन्धरश्रुतेः । रूपेण निविशेषा किं तन्मातेत्यात्तसंशयाः ॥ ५५८ ॥कुर्मस्तथेति सन्तोष्य तां प्रियानुगतोक्तिभिः । गत्वा ततोऽन्तरं किञ्चित्तत्र व्याधैः कदर्थिताः ॥ ५५९ ॥युद्धे पुरुषकारेण क्रव्यादानभिभूय तान् । यान्तो यदृच्छया व्याधैर्मार्गेऽन्यैर्योगमागमन् ॥ ५६० ॥ हेमाभपुरसार्थापहरणारम्भसम्बमे । तत्कर्म नागरैरूर्ध्वन्यस्तहस्तैर्निवेदितः ॥ ५६१ ॥आक्रोशद्भिः सकारुण्यो जीवन्धरसमाह्वयः । गत्वा व्याधबलं युद्धे निरुध्यातकर्यविक्रमः ॥ ५६२ ॥ तद्गृहीतं धनं सर्वं वणिग्भ्यो ह्यार्पयत्पुनः । युद्ध्वा चिरं विमुक्तात्मनामाङ्कशरदर्शनात् ॥ ५६३ ।। जीवन्धरकुमारेण विदिता मधुरादयः । सङ्गतास्ते कुमारस्य वार्ता राजपुरोद्भवाम् ॥ ५६४ ॥ सर्वा निर्वर्ण्य विश्रम्य कञ्चित्कालं स्थिताः सुखम् । ततः कुमारमादाय गच्छन्तः स्वपुरं प्रति ॥५६५॥ अरण्यमप्रयाणार्थं दण्डकाख्यमुपागमन् । तत्र स्नेहान्महादेवी क्षीरापूर्णोन्नतस्तनी ॥ ५६६ ॥ बाष्पाविलविलालाक्षी क्षामझामाङ्गयष्टिका । चिन्तासहस्त्रसन्तप्तजटीभूतशिरोरुहा ॥ ५६७ ॥ निरन्तरोष्णनिःश्वासवैवर्ण्यगमिताधरा । ताम्बूलादिव्यपायोरुमलदिग्धद्विजावली ॥ ५६८ ॥ अशोचत्पुत्रमालोक्य रुक्मिणीव मनोभवम् । इष्टकालान्तरालोकस्तत्क्षणे दुःखकारणम् ॥ ५६९ ॥
इस प्रकार उसने उन लोगोंसे अच्छी तरह प्रार्थना की। वह देवी रूपकी अपेक्षा जीवन्धरके समान ही थी इसलिए सबको संशय हो गया कि शायद यह जीवन्धरकी माता ही हो। तदनन्तर उन लोगोंने प्रिय और अनुकूल वचनोंके द्वारा उस देवीको सन्तुष्ट किया और कहा कि हमलोग ऐसा ही करेंगे। इसके बाद वे आगे चले, कुछ ही दूर जाने पर उन्हें भीलोंने दुःखी किया परन्तु वे अपने पुरुषार्थसे युद्धमें भीलोंको हराकर इच्छानुसार आगे बढ़े। आगे चलकर मार्गमें ये सब लोग दूसरे भीलोंके साथ मिल गये और सबने हेमाभ नगरमें जाकर वहाँके सेठोंको लूटना शुरू किया। इससे क्षुभित हुए नगरवासी लोगोंने हाथ ऊपर कर तथा जोर-जोरसे चिल्लाकर जीवन्धर कुमारको इस कार्यकी सूचना दी। निदान, अचिन्त्य पराक्रमके धारक दयालु जीवन्धर कुमारने जाकर युद्धमें वह भीलोंकी सेना रोकी और उनके द्वारा हरण किया हुआ सब धन छीनकर वैश्योंके लिए वापिस दिया । इधर मधुर आदिने चिरकाल तक युद्ध कर अपने नामसे चिह्नित बाण चलाये थे उन्हें देखकर जीवन्धर कुमारने उन सबको पहिचान लिया। तदनन्तर उन सबका जीवन्धर कुमारसे मिलाप हो गया और सब लोग कुमारके लिए राजपुर नगरकी सब कथा सुनाकर वहाँ कुछ काल तक सुखसे रहे। इसके बाद वे कुमारको लेकर अपने नगरकी ओर चले। विश्राम करनेके लिए वे उसी दण्डक वनमें आये । वहाँ उन्हें महादेवी विजया मिली, स्नेहके कारण उसके स्तन दूधसे भर-कर ऊँचे उठ रहे थे, नेत्र आँसुओंसे व्याप्त होकर मलिन हो रहे थे, शरीर-यष्टि अत्यन्त कृश थी, वह हजारों चिन्ताओंसे सन्तप्त थी, उसके शिरके बाल जटा रूप हो गये थे, निरन्तर गरम श्वास निकलनेसे उसके ओठोंका रङ्ग बदल गया था और पान आदिके न खानेसे उसके दाँतों पर बहुत भारी मैल जमा हो गया था। जिस प्रकार रुक्मिणी प्रद्युम्नको देखकर दुखी हुई थी उसी प्रकार विजया महादेवी भी पुत्रको देखकर शोक करने लगी सो ठीक ही है क्योंकि इष्ट पदार्थका बहुत समय बाद देखना तत्कालमें दुःखका कारण होता ही है ।। ५५८-५६९ ॥
In this manner, she earnestly requested them. Since that queen resembled Jivandhara in appearance, everyone suspected that she might indeed be Jivandhara’s mother. Subsequently, they pleased the queen with sweet and agreeable words and said, “We shall do exactly as you say.” After this, they proceeded forward. Having gone only a short distance, they were harassed by forest bandits (Bhils), but through their own valour, they defeated the Bhils in battle and advanced as they wished.
Further along the path, these men joined forces with another group of Bhils, entered Hemabh Nagar, and began plundering the merchants there. Distressed by this, the townspeople raised their hands, cried out loudly, and reported this incident to Prince Jivandhara. Ultimately, the compassionate Prince Jivandhara, possessing inconceivable prowess, went and halted the army of Bhils in battle, seized all the plundered wealth from them, and returned it to the merchants. Meanwhile, Madhura and the others, having fought for a long time, shot arrows inscribed with their names. Seeing those arrows, Prince Jivandhara recognized them all.
Thereupon, they were all reunited with Prince Jivandhara. After narrating the entire account of Rajpura city to the prince, they stayed there happily for some time. Following this, they set out towards their own city, taking the prince along with them. To rest, they came to that same Dandaka forest. There they met Mahadevi Vijaya. Out of maternal affection, her breasts were swelling with milk, her eyes were clouded and dimmed with tears, her frame was extremely emaciated, and she was tormented by thousands of anxieties. The hair on her head had become matted, the color of her lips had changed due to the continuous exhaling of warm sighs, and due to abstaining from betel leaf and other refinements, a heavy layer of impurities had gathered on her teeth. Just as Rukmini had grieved upon seeing Pradyumna, Mahadevi Vijaya also began to weep out of sorrow upon seeing her son. And this is but natural, for beholding a beloved object after a very long time becomes an immediate cause of grief. (558-569)
श्लोक ( Shlok ) 570
तनूजस्पर्शसम्भूतमस्पृशन्तीं सुखामृतम् । ज्ञापयित्वा पतत्पादपश्नयोः सकृताञ्जलिः ॥ ५७० ॥
पुत्रके स्पर्शसे उत्पन्न हुए सुख रूपी अमृतका जिसने स्पर्श नहीं किया है ऐसी माताको उस सुखका अनुभव कराते हुए जीवन्धर कुमार हाथ जोड़कर उसके चरण-कमलोंमें गिर पड़े ॥ ५७० ॥
Affording the experience of that bliss to his mother—who until then had never tasted the nectar-like joy arising from the touch of her son—Prince Jivandhara fell at her lotus feet with folded hands. (570)
श्लोक ( Shlok ) 571
कुमारोचिष्ठ कल्याणशतभागी भवेत्यसौ । तमाशिषां शतैः स्नेहादभिनन्द्याब्रवीदिति ॥ ५७१ ॥
‘हे कुमार ! उठ, सैकड़ोंकल्याणोंको प्राप्त हो’ इस प्रकार सैकड़ों आशीर्वादोंसे उन्हें प्रसन्न कर विजया महादेवी बड़े स्नेहसे इस प्रकार कहने लगी ।। ५७१ ।।
“O Prince! Arise, may you be blessed with hundreds of auspicious fortunes.” Pleasing him with hundreds of such blessings, Mahadevi Vijaya began to speak with deep affection in this manner: (571)
श्लोक 572 से 583
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170 | अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 549
चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25 | श्लोक 26 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 94 | श्लोक 95 से 101 | श्लोक 102 से 113 | श्लोक 114 से 122 | श्लोक 123 से 135 | श्लोक 136 से 150 | श्लोक 151 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 193 | श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 222 | श्लोक 223 से 241 | श्लोक 242 से 250 | श्लोक 251 से 261 | श्लोक 262 से 273 | श्लोक 274 से 290 | श्लोक 291 से 300 | श्लोक 301 से 313 | श्लोक 314 से 321 | श्लोक 322 से 330 | श्लोक 331से 350 | श्लोक 351से 365 | श्लोक 366 से 383 | श्लोक 384 से 391 | श्लोक 392 से 403 | श्लोक 404 से 412 | श्लोक 413 से 423 | श्लोक 424 से 440 | श्लोक 441 से 454 | श्लोक 455 से 472 | श्लोक 473 से 492 | श्लोक 493 से 501 | श्लोक 502 से 512 | श्लोक 513 से 524 | श्लोक 525 से 542 | श्लोक 543 से 552
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