राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाकापुरुषोंका वर्णन , महावीर भगवान् की शिष्य परम्परा पर्व 76 – श्लोक 431 से 441 | श्लोक 442 से 453 | श्लोक 454 से 470 | श्लोक 471 से 481 | श्लोक 482 से 491 | श्लोक 492 से 508 | श्लोक 509 से 522 | श्लोक 523 से 533
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 76- shlok 534 to 543
श्लोक ( Shlok ) 534
पुरूरवाः सुरः प्राच्यकल्पेऽभूद्भरतात्मजः । मरीचिर्ब्रह्मकल्पोत्थस्ततोऽभूज्जटिलद्विजः ॥ ५३४ ॥
भगवान् महावीर स्वामीका जीव पहले पुरूरवा नामका भील था, फिर पहले स्वर्गमें देव हुआ, फिर भरतका पुत्र मरीचि हुआ, फिर ब्रह्मस्वर्ग में देव हुआ, फिर जटिल नामका ब्राह्मण हुआ ॥ ५३४ ॥
The soul of Lord Mahavira Swami was: First, a Bhil (tribal hunter) named Pururava, then A celestial being (deva) in the first heaven, then Marichi, the son of Emperor Bharata, then A celestial being (deva) in the Brahma heaven, then A Brahmin named Jatila. || 534 ||
श्लोक ( Shlok ) 535
सुरः सौधर्मकल्पेऽनु पुष्यमित्रद्विजस्ततः । सौधर्मजोऽमरस्तस्माद्विजन्माग्निसमाह्वयः ॥ ५३५ ॥
फिर सौधर्म स्वर्गमें देव हुआ, फिर पुष्यमित्र नामका ब्राह्मण हुआ, फिर अग्निसम नामका ब्राह्मण हुआ ।। ५३५ ।।
Then a celestial being (deva) in the Saudharma heaven, then a Brahmin named Pushyamitra, then a Brahmin named Agnisama. || 535 ||
श्लोक ( Shlok ) 536 – 537
सनत्कुमारदेवोऽस्मादग्निमित्राभिधो द्विजः । मरुन्माहेन्द्रकल्पेऽभूद्भारद्वाजो द्विजान्वये ॥ ५३६ ॥जातो माहेन्द्रकल्पेऽनु मनुष्योऽनु ततश्च्युतः । नरकेषु त्रसस्थावरेष्वसंख्यातवत्सरान् ॥ ५३७ ॥
फिर सनत्कुमार स्वर्गमें देव हुआ, फिर अग्निमित्र नामका ब्राह्मण हुआ, फिर माहेन्द्रस्वर्गमें देव हुआ, फिर भारद्वाज नामका ब्राह्मण हुआ, फिर माहेन्द्र स्वर्गमें देव हुआ, फिर वहाँ सेच्युत होकर मनुष्य हुआ, फिर असंख्यात वर्षों तक नरकों और त्रस स्थावर योनियोंमें भ्रमण करता रहा ॥ ५३६-५३७ ।।
Then a celestial being (deva) in the Sanatkumara heaven, then a Brahmin named Agnimitra, then a celestial being (deva) in the Mahendra heaven, then a Brahmin named Bharadvaja, then a celestial being (deva) in the Mahendra heaven again. Descending from there, he became a human, and subsequently wandered through hells and the various forms of mobile (trasa) and immobile (sthavara) life for countless (asamkhyata) years. || 536-537 ||
श्लोक ( Shlok ) 538 – 539
भ्रान्त्वा ततो विनिर्गत्य स्थावराख्यो द्विजोऽभवत् । ततश्चतुर्थकल्पेऽभूद्विश्वनन्दी ततश्च्युतः ॥ ५३८ ॥ महाशुक्रे ततो देवस्खिखण्डेशस्त्रिष्पृष्ठवाक् । सप्तमे नरके तस्माचस्माच्च गजविद्विषः ॥ ५३९ ॥
वहाँ से निकलकर स्थावर नामका ब्राह्मण हुआ, फिर चतुर्थ स्वर्गमें देव हुआ,वहाँ से च्युत होकर विश्वनन्दी हुआ, फिर त्रिष्पृष्ठ नामका तीन खण्डका स्वामी-नारायण हुआ, फिर सप्तम नरकमें उत्पन्न हुआ वहाँ से निकल कर सिंह हुआ ॥ ५३८-५३९ ।।
Emerging from there, he became a Brahmin named Sthavara, then a celestial being (deva) in the fourth heaven. Descending from there, he became Vishvanandi, then the master of the three realms—the Narayana named Triprishta. Thereafter, he was born in the seventh hell, and emerging from there, he became a lion. || 538-539 ||
श्लोक ( Shlok ) 540 – 543
आदिमे नरके तस्मात्सिहः सद्धर्मनिर्मलः । ततः सौधर्मकल्पेऽभूत्सिहकेतुः सुरोत्तमः ॥ ५४० ॥ कन कोज्ज्वलनामा भूत्ततो विद्याधराधिपः । देवः सप्तमकल्पेऽनु हरिषेणस्ततो नृपः ॥५४१ ॥ महाशुक्रे ततो देवः प्रियमित्रोऽनु चक्रभृत् । स सहस्त्रारकल्पेऽभूद्देवः सूर्यप्रमाद्धयः ॥ ५४२ ॥ राजा नन्दाभिधस्तस्मात्पुष्पोत्तरविमानजः । अच्युतेन्द्रस्ततश्च्युत्वा वर्धमानो जिनेश्वरः ॥ ५४३ ॥
फिर पहले नरकमेंगया, वहां से निकल कर फिर सिंह हुआ, उसी सिंहकी पर्यायमें उसने समीचीन धर्म धारण कर निर्मलता प्राप्त की, फिर सौधर्म स्वर्ग में सिंहकेतु नाम का उत्तम देव हुआ, फिर कनकोज्वल नाम का विद्याधरोंका राजा हुआ, फिर सप्तम स्वर्ग में देव हुआ, फिर हरिषेण राजा हुआ, फिर महाशुक्रस्वर्गमें देव हुआ, फिर प्रियमित्र नामका चक्रवर्ती हुआ, फिर सहस्त्रार स्वर्गमें सूर्यप्रभ नामका देव हुआ, वहाँ से आकर नन्द नामका राजा हुआ, फिर अच्युत स्वर्गके पुष्पोत्तर विमानमें उत्पन्न हुआ और फिर वहाँसे च्युत होकर वर्धमान तीर्थकर हुआ है ।। ५४०-५४३ ।।
Then he went to the first hell, and emerging from there, he became a lion once again. It was in this very birth as a lion that he adopted the true religion (samyak dharma) and attained spiritual purity. Then he became an excellent celestial being (deva) named Simhaketu in the Saudharma heaven, then a king of the Vidyadharas named Kanakojvala, then a celestial being (deva) in the seventh heaven, then King Harishena, then a celestial being (deva) in the Mahashukra heaven, then a universal monarch (chakravarti) named Priyamitra, then a celestial being (deva) named Suryaprabha in the Sahasrara heaven. Descending from there, he became King Nanda, then he was born in the Pushpottara celestial vehicle (vimana) of the Achyuta heaven, and finally, descending from there, he has become the Tirthankara Vardhamana. || 540-543 ||
श्लोक 544 से 551
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170 | अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 549 | चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 691
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राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाकापुरुषोंका वर्णन , महावीर भगवान् की शिष्य परम्परा पर्व 76 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 64 | श्लोक 65 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 200 | श्लोक 201 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 271 | श्लोक 272 से 283 | श्लोक 284 से 291 | श्लोक 292 से 302 | श्लोक 303 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 360 | श्लोक 361 से 371 | श्लोक 372 से 381 | श्लोक 382 से 391| श्लोक 392 से 401 | श्लोक 402 से 412 | श्लोक 413 से 421 | श्लोक 422 से 430 | श्लोक 431 से 441 | श्लोक 442 से 453 | श्लोक 454 से 470 | श्लोक 471 से 481 | श्लोक 482 से 491 | श्लोक 492 से 508 | श्लोक 509 से 522 | श्लोक 523 से 533
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