राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन
करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाकापुरुषोंका
वर्णन , महावीर भगवान् की शिष्य परम्परा पर्व 76 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 64 | श्लोक 65 से 72 | श्लोक 73 से 81
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 76- shlok 82 to 93
श्लोक ( Shlok ) 82 – 89
श्रृगालः कश्चिदास्यस्थं मांसपिण्डं विसृष्टवान् । संक्रीडमानमीनादानेच्छुनिपतितोऽम्भसि ॥ ८२ ॥तद्वेगबप्रवाहेण प्रेर्यमाणोऽगमन्मृतिम् । ततो मीनोऽपि दीर्घायुर्जलमध्ये स्थितः सुखम् ॥ ८३ ॥एवं शृगालवलुब्धो मुग्धोऽन्योऽपि विनश्यति । इति तस्करमुख्योक्तिमाकर्ष्यानाकुलात्मकः ॥ ८४ ॥प्रत्यासन्नचिनेयत्वाद्वचः प्रतिभणिष्यति । निद्रालुको वणिक्कश्चिन्निद्रासुखविमोहितः ॥ ८५ ॥सुप्तः परार्थ्यमाणिक्यगर्भकक्षपुटे निजे । चोरैरपहृतोऽनेन दुःखेनामृत दुर्वृतिः ॥ ८६ ॥विषयाल्पसुखेष्वेवं संसक्तो “रागचोरकैः । ज्ञानदर्शनचारित्ररत्नेष्वपहृतेष्वयम् ॥ ८७ ॥जन्मी नश्यति निर्मूलमित्यतः स गदिष्यति । स्वमातुलानीदुर्वाक्यको पात्काञ्चिन्मुमुर्षुकाम् ॥ ८८ ॥वृक्षमूले स्थितां वीक्ष्य सर्वाभरणभूषिताम् । अज्ञातोद्वन्धनोपायामाकुलाकुलचेतसम् ॥ ८९ ॥
वह कहेगा कि एक शृगाल मुखमें मांसका टुकड़ा दाबकर पानीमें जा रहा था वहाँ क्रीड़ा करती हुई मछलीको पकड़नेकी इच्छासे उसने वह मांसका टुकड़ा छोड़ दिया और पानी में कूद पड़ा। पानीके प्रवाहका वेग अधिक था अतः वह उसीमें बह कर मर गया उसके मरनेके बाद दीर्घायु मछली पानीमें सुखसे रहने लगी। इसी प्रकार जो मूर्ख, शृगालके समान लोभी होता है वह अवश्य ही नष्ट होता है। इस तरह विद्युच्चोर की बात सुनकर निकट भव्य होनेके कारण जिसे कुछ भी आकुलता नहीं हुई है ऐसा जम्बूकुमार कहेगा कि निद्रालु प्रकृतिका एक वैश्य नींदके सुखसे विमोहित होकर सो गया और चोरोंने उसके घरमें घुसकर सब बहुमूल्य रत्न चुरा लिये। इसी दुःखसे वह मर गया। इसी प्रकार। यह जीव विषयजन्य थोड़ेसे सुखोंमें आसक्त हो रहा है और राग रूपी चोर इसके ज्ञान-दर्शन तथा चारित्र रूपी रत्न चुरा रहे हैं। इन रत्नोंकी चोरी होने पर यह जीव निर्मूल नष्ट हो जाता है। इसके उत्तरमें वह चोर कहेगा कि कोई स्त्री सासुके दुर्वचन सुनकर क्रोधित हुई और मरनेकी इच्छासे किसी वृक्षके नीचे जा बैठी। वह सब आभूषणोंसे सुशोभित थी परन्तु फाँसी लगाना नहीं जानती थी इसलिए उसका चित्त बड़ा ही व्याकुल हो रहा था ॥ ८२-८९ ॥
“He will say, ‘A jackal, holding a piece of meat in his mouth, was walking into the water. With the desire to catch a fish playing there, he dropped that piece of meat and jumped into the water. The force of the water’s current was strong; therefore, he was swept away in it and died. After his death, the long-lived fish lived happily in the water. Similarly, a fool who is greedy like the jackal is surely destroyed.’ Hearing these words of the thief Vidyucchora, Jambukumar—who, being near to liberation (bhavya), experienced no agitation whatsoever—will say, ‘A merchant of a sleepy nature, infatuated by the pleasure of sleep, fell asleep, and thieves entered his house and stole all the invaluable jewels. He died from this very grief. Similarly, this soul is attached to the fleeting pleasures born of worldly senses, and thieves in the form of attachment (raga) are stealing its jewels of knowledge, perception, and conduct. When these jewels are stolen, this soul is completely destroyed.’ In reply to this, the thief will say, ‘A certain woman, becoming angry upon hearing the harsh words of her mother-in-law, went and sat under a tree with the desire to die. She was adorned with all kinds of ornaments but did not know how to hang herself; therefore, her mind was greatly distressed.'” || 82-89 ||
श्लोक ( Shlok ) 90 – 93
असुवर्णदारको नाम पापी मार्दङ्गिकस्तदा । तदाभरणमादित्सुर्मृदङ्ग स्वं तरोरधः ॥ ९० ॥स्थापयित्वा समारुह्य स्वगलोद्धद्धरज्जुकः । उद्वन्धनक्रमं तस्या दर्शयन् मृत्युचोदित्तः ॥ ९१ ॥मृदङ्गे पतिते भूमौ सद्यः केनापि हेतुना । रज्जुपाताविलीभूतकण्ठः प्रोद्भुत्तलोचनः ॥ ९२ ॥प्रापत्प्रेताधिवासं तीक्ष्यासौ दुर्भृतेर्भयात् । आयानहमतस्तद्लोभो हेयो महांस्त्वया ॥ ९३ ॥
उसी समय सुवर्णदारक नामका मृदङ्गा बजानेवालापापी मृत्युसे प्रेरित हो वहाँ से आ निकला। वह उस स्त्रीके आभूषण लेना चाहता था इसलिए वृत्तके नीचे अपना मृदङ्ग रखकर तथा उसपर चढ़कर अपने गलेमें फाँसीकी रस्सी बाँध उसे मरनेकी रीति दिखलाने लगा। उसने अपने गलेमें रस्सी बाँधी ही थी कि किसी कारणसे नीचेका मृदङ्ग जमीन पर लुढ़क गया। फ्राँसी लग जानेसे उसका गला फँस गया और आँखें निकल आई। इस प्रकार वह मरकर यमराजके घर गया। उसका मरण देख वह स्त्री उस दुःखदायी मरणसे डर गई और अपने घर वापिस आ गई। कहनेका अभिप्राय यह है कि आपको उस मृदङ्ग बजानेवालेके समान बहुत भारी लोभ नहीं करना चाहिये ॥ ९०-९३ ॥
“At that very moment, a sinful mridangam (drum) player named Suvarnadaraka, driven by his impending death, arrived there. He wanted to take that woman’s ornaments; therefore, placing his mridangam beneath the tree and climbing upon it, he tied the noose around his own neck to show her the method of dying. No sooner had he tied the rope around his neck than, for some reason, the mridangam underneath rolled away on the ground. As he was hanged, his neck was choked and his eyes popped out. In this manner, he died and went to the abode of Yama (the God of Death). Seeing his death, that woman became terrified of such a painful demise and returned to her home. The implication is that you should not harbor such immense greed, just like that mridangam player.” || 90-93 ||
श्लोक 94 से 101
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