विमलनाथ तीर्थंकर, धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधरका वर्णन पर्व 59 – श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 242 | श्लोक 243 से 252
English translation of Uttar Puran parv 59- shlok 253 to 262
श्लोक ( Shlok ) 253
तदा सविस्मयो राना गत्वाऽवधिविलोचनम् । वज्रदन्तं तदाख्याय तद्धेतुं पृच्छति स्म सः ॥ २५३ ॥
यह देख राजा बहुत ही आश्चर्यको प्राप्त हुआ। वह वज्रदन्त नामक अवधिज्ञानी मुनिराजके पास गया और यह सब समाचार कहकर उनसे इसका कारण पूछने लगा ॥ २५३ ॥
“Seeing this, the King was greatly astonished. He went to a sage named Vajradanta, who possessed Avadhijnana (clairvoyant knowledge), and after narrating all the news, began to ask him the reason behind it.”253
श्लोक ( Shlok ) 254 – 255
मुनिर्बभाषे भो भूप शृणु तत्संविधानकम् । भरतेऽस्मिन्नृपः प्रीतिभद्रः छत्रपुराधिपः ॥ २५४ ॥सुन्दर्यामभवत्तस्य सुतः प्रीतिङ्कराह्वयः । मन्त्री चित्रमतिस्तस्य कमला कमलोपमा ॥ २५५ ॥
मुनिराजने कहा कि हे राजन् ! मैं सब कारण कहता हूँ तू सुन। इसी भरतक्षेत्रमें छत्रपुर नगरका राजा प्रीतिभद्र था । उसकी सुन्दरी नामकी रानीसे प्रीतिङ्कर नामक पुत्र हुआ। राजाके एक चित्रमति-नामक मंत्री था और लक्ष्मीके समान उसकी कमला नामकी स्त्री थी ।। २५४-२५५ ।।
“The Sage (Muniraj) said, ‘O King! Listen, as I explain all the reasons to you. In this very Bharatkshetra, there was a King named Pritibhadra of Chhatrapur city. He had a son named Pritinkar from his Queen, Sundari. The King had a minister named Chitramati, whose wife, Kamala, was as beautiful as Lakshmi.'”254 – 255
श्लोक ( Shlok ) 256 – 257
गृहिणी तुग्बभूवास्या विचित्रमतिराख्यया । नृपमन्त्रिसुतौ श्रुत्वा धर्म धर्मरुचेर्यतेः ॥ २५६ ॥तदैव भोगनिविण्णौ द्वावप्याददतुस्तपः । क्षीरास्त्रवद्धिरुत्पन्ना प्रीतिक्करमहामुनेः ॥ २५७ ॥
कमलाके विचित्रमति नामका पुत्र हुआ। एक दिन राजा और मंत्री दोनोंके पुत्रोंने धर्मरुचि नामके मुनिराजसे धर्मका उपदेश सुना और उसी समय भोगोंसे उदास होकर दोनोंने तप धारण कर लिया। महामुनि प्रीतिंकरको क्षीरास्त्रव नामकी ऋद्धि उत्पन्न हो गई ।। २५६-२५७ ॥
“Kamala had a son named Vichitramati. One day, the sons of both the King and the Minister heard a discourse on Dharma from a sage named Dharmaruchi. At that very moment, becoming detached from worldly pleasures, both of them embraced penance (asceticism). The great monk Pritinkar then attained the supernatural power known as Kshirasrava-riddhi.”256 – 257
श्लोक ( Shlok ) 258 – 259
साकेतपुरमन्येद्युर्जग्मतुस्तौ यथाक्रमम् । विहरन्तावुपोष्यास्त तत्र मन्त्रिसुतो यतिः ॥ २५८ ॥प्रीतिङ्करः पुरे चर्या यान्तं स्वगृहसन्निधौ । गणिका बुद्धिषेणाख्या प्रणम्य विनयान्विता ॥ २५९ ॥
एक दिन वे दोनों मुनि क्रम-क्रमसे विहार करते हुए साकेतपुर पहुँचे। उनमेंसे मंत्रिपुत्र विचित्रमति मुनि उपवासका नियम लेकर नगरके बाहर रह गये और राजपुत्र प्रीतिंकरमुनि चर्याके लिए नगरमें गये। अपने घरके समीप जाता हुआ देख बुद्धिषेणा नामकी वेश्याने उन्हें बड़ी विनयसे प्रणाम किया ।। २५८-२५९ ॥
“One day, while wandering from place to place, both monks reached Saketpur. Among them, the minister’s son, Monk Vichitramati, stayed outside the city having taken a vow of fasting, while the prince, Monk Pritinkar, entered the city for Charya (seeking alms). Seeing him passing near her house, a courtesan named Buddhishena bowed to him with great humility.” 258 – 259
श्लोक ( Shlok ) 260 – 262
दानयोग्यकुला नाहमस्मीत्यात्मानमुच्छुचा । निन्दन्ती वाढमप्राक्षीन्मुने कथय जन्मिनाम् ॥ २६० ॥ कुलरूपादयः केन जायन्ते संस्तुता इति । मद्यमांसादिकत्यागादित्युदीर्य सुनिश्च सः ॥ २६१ ॥ ततः प्रत्यागतः कस्मात् स्थितो हेतोश्चिरं पुरे। भवानिति तमप्राक्षीद्विचित्रमतिरादरात् ॥ २६२ ॥
और मेरा कुल दान देने योग्य नहीं है इसलिए बड़े शोकसे अपनी निन्दा करती हुई उसने मुनिराजले पूछा कि हे मुने, आप यह बताइये कि प्राणियोंको उत्तम कुल तथा रूप आदिकी प्राप्ति क्रिस कारणसे होती है ? ‘मद्य मांसादिके त्यागसे होती है’ ऐसा कहकर वह मुनि नगरसे वापिस लौट आये । दूसरे विचित्रमति मुनिने उनसे आदरके साथ पूछा कि आप नगरमें बहुत देर तक कैसे ठहरे ? ॥ २६०-२६२ ।।
“And thinking, ‘My lineage is not worthy of giving alms,’ she began to condemn herself with great sorrow. She then asked the Monk, ‘O Sage, please tell me—by what cause do living beings attain a noble lineage, beauty, and such qualities?’ Saying, ‘It is attained by renouncing meat, wine, and such things,’ the Monk returned from the city. Then, the other monk, Vichitramati, asked him respectfully, ‘How did you happen to stay in the city for such a long time?'” 260 – 262
श्लोक 263 से 271
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